नित्य स्तुति करने के नियम और सावधानियाँ – शास्त्रीय एवं व्यावहारिक मार्गदर्शनIt takes 4 minutes... to read this article !

नित्य स्तुति करने के सही नियम, सावधानियाँ और शास्त्रीय मार्गदर्शन। जानें दैनिक स्तुति कैसे करें, क्या करें और क्या न करें।

नित्य स्तुति का अर्थ

नित्य स्तुति का अर्थ है प्रतिदिन नियमित रूप से ईश्वर, देवी या देवता के गुणों का भावपूर्वक स्मरण और गुणगान

यह कोई अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवनशैली है।

नित्य स्तुति साधक के जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन और मानसिक स्थिरता लाती है।

शास्त्रों में नित्य स्तुति का महत्व

वेद, उपनिषद और पुराणों में नित्य स्तुति को भक्ति का मूल आधार बताया गया है।

शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नित्य ईश्वर का स्मरण करता है, उसका मन धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है।

नित्य स्तुति को निरंतर साधना कहा गया है, न कि अवसर विशेष की भक्ति।

नित्य स्तुति और साधना में अंतर

साधना कभी-कभी विशेष काल में की जाती है,

जबकि नित्य स्तुति जीवन का दैनिक अंग बन जाती है।

नित्य स्तुति बिना भय, बिना जोखिम और बिना जटिल विधि के की जाती है।

नित्य स्तुति किसके लिए आवश्यक है

नित्य स्तुति विशेष रूप से आवश्यक है:

• गृहस्थों के लिए

• मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों के लिए

• विद्यार्थियों के लिए

• वरिष्ठ नागरिकों के लिए

• प्रारंभिक साधकों के लिए

यह साधना किसी भी अवस्था में की जा सकती है।

नित्य स्तुति के लिए सही भाव

नित्य स्तुति का आधार भाव है।

आवश्यक भाव:

• श्रद्धा

• विनम्रता

• कृतज्ञता

• समर्पण

बिना इन भावों के स्तुति केवल यांत्रिक क्रिया बन जाती है।

नित्य स्तुति का सही समय

नित्य स्तुति किसी भी समय की जा सकती है, पर शास्त्रों में कुछ समय श्रेष्ठ माने गए हैं:

• प्रातःकाल जागने के बाद

• संध्या समय

• रात्रि में सोने से पहले

सबसे महत्वपूर्ण है नियमितता, समय नहीं।

नित्य स्तुति के लिए स्थान

स्थान से अधिक मन की पवित्रता आवश्यक है।

फिर भी शांत, स्वच्छ और एकांत स्थान स्तुति में सहायक होता है।

घर का पूजा स्थान, शांत कोना या ध्यान कक्ष पर्याप्त है।

नित्य स्तुति में आसन और शरीर

नित्य स्तुति में कठिन आसन आवश्यक नहीं।

सुखासन, पद्मासन या कुर्सी पर सीधा बैठना पर्याप्त है।

मुख्य नियम:

शरीर स्थिर हो, रीढ़ सीधी हो।

नित्य स्तुति में वाणी का नियम

वाणी मधुर, धीमी और स्पष्ट होनी चाहिए।

चीख-चिल्लाकर या जल्दबाजी में स्तुति प्रभावहीन हो जाती है।

यदि वाणी संभव न हो, तो मानसिक स्तुति भी शास्त्रसम्मत है।

नित्य स्तुति में भाषा का चुनाव

नित्य स्तुति मातृभाषा में सर्वाधिक प्रभावी होती है।

संस्कृत, हिंदी या किसी भी भाषा में की गई सच्ची स्तुति स्वीकार्य है।

ईश्वर शब्द नहीं, भाव ग्रहण करता है

नित्य स्तुति के नियम

नित्य स्तुति करते समय कुछ नियमों का पालन आवश्यक है:

• प्रतिदिन करना

• यथासंभव एक ही समय

• मन की शुद्धता

• दिखावे से बचाव

• संक्षिप्त लेकिन भावपूर्ण

नित्य स्तुति में निरंतरता का महत्व

नित्य स्तुति का प्रभाव धीरे-धीरे प्रकट होता है।

इसे तुरंत फल की अपेक्षा से नहीं करना चाहिए।

निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

नित्य स्तुति में सामान्य सावधानियाँ

नित्य स्तुति करते समय निम्न सावधानियाँ रखें:

• अहंकार से बचें

• दूसरों से तुलना न करें

• चमत्कार की अपेक्षा न रखें

• केवल शब्दों पर न अटकें

नित्य स्तुति और अहंकार

अहंकार नित्य स्तुति का सबसे बड़ा शत्रु है।

“मैं बहुत भक्ति करता हूँ” यह भाव साधना को निष्फल कर देता है।

नित्य स्तुति का फल विनम्रता है, न कि गर्व।

नित्य स्तुति में दिखावे से बचाव

दिखावे के लिए की गई स्तुति में आध्यात्मिक शक्ति नहीं होती।

शास्त्रों में गुप्त और सरल भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया है।

नित्य स्तुति और मानसिक अवस्था

यदि मन अशांत हो तो भी स्तुति छोड़नी नहीं चाहिए।

स्तुति स्वयं मन को शांत करने की प्रक्रिया है।

नित्य स्तुति में आलस्य से बचाव

कभी-कभी आलस्य या ऊब आ सकती है।

ऐसे समय स्तुति को छोटा रखें, पर बंद न करें।

नित्य स्तुति और जीवन की व्यस्तता

व्यस्त जीवन में भी 5–10 मिनट की स्तुति संभव है।

लंबी स्तुति आवश्यक नहीं, नियमित स्तुति आवश्यक है।

नित्य स्तुति और गृहस्थ धर्म

नित्य स्तुति गृहस्थ जीवन में संतुलन लाती है।

यह क्रोध, तनाव और निराशा को धीरे-धीरे कम करती है।

नित्य स्तुति और बच्चों

बच्चों को छोटी, सरल स्तुति सिखानी चाहिए।

उन्हें जबरदस्ती नहीं, प्रेम से स्तुति की आदत डालनी चाहिए।

नित्य स्तुति में गुरु की भूमिका

गुरु आवश्यक नहीं, पर मार्गदर्शन उपयोगी हो सकता है।

सच्चा गुरु साधक को दिखावे से दूर रखता है।

नित्य स्तुति में अपेक्षा का त्याग

नित्य स्तुति करते समय “मुझे क्या मिलेगा” यह भाव त्याग देना चाहिए।

स्तुति स्वयं में साधना है, सौदा नहीं।

नित्य स्तुति के दीर्घकालिक लाभ

नित्य स्तुति से दीर्घकाल में:

• मानसिक स्थिरता

• सकारात्मक दृष्टि

• भावनात्मक संतुलन

• आध्यात्मिक परिपक्वता

• जीवन में शांति

प्राप्त होती है।

नित्य स्तुति और ईश्वर से संबंध

नित्य स्तुति ईश्वर को पास लाने का नहीं,

बल्कि स्वयं को ईश्वर के समीप योग्य बनाने का मार्ग है।

निष्कर्ष

नित्य स्तुति कोई कठिन साधना नहीं, बल्कि सरल, सुरक्षित और स्थायी आध्यात्मिक अभ्यास है।

इसके नियम सरल हैं और सावधानियाँ साधक को भटकने से बचाती हैं।

जो व्यक्ति नित्य श्रद्धा और विनम्रता से स्तुति करता है,

उसका जीवन स्वतः ही संतुलित, शांत और अर्थपूर्ण हो जाता है।

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