भीष्म द्वादशी 2026 कब है? संपूर्ण कथा, पूजा विधि, महत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोणIt takes 4 minutes... to read this article !

भीष्म द्वादशी 2026 कब है? जानिए भीष्म पितामह की संपूर्ण कथा, व्रत विधि, दान, पितृ शांति उपाय, ज्योतिषीय व वैज्ञानिक महत्व हिंदी में।

भीष्म द्वादशी 2026: एक तिथि नहीं, मोक्ष की चेतना

क्या मृत्यु भी एक चयन हो सकती है?

क्या कोई मनुष्य अपने जीवन के अंतिम क्षण स्वयं तय कर सकता है—पूर्ण चेतना, शांति और धर्म के साथ?

हजारों वर्षों पहले महाभारत में एक ऐसा ही दृश्य घटा, जब एक महान योद्धा तीरों की शय्या पर लेटे हुए सूर्य की दिशा बदलने की प्रतीक्षा कर रहा था। वह योद्धा कोई और नहीं, भीष्म पितामह थे। जिस दिन उन्होंने उत्तरायण के पावन काल में देह त्याग किया, वही दिन आज भीष्म द्वादशी के रूप में जाना जाता है।

भीष्म द्वादशी 2026 केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है। यह त्याग, आत्मनियंत्रण, धर्म और चेतन मृत्यु (Conscious Death) का अद्भुत संगम है। यह वह दिन है जो हमें याद दिलाता है कि जीवन का अंतिम सत्य केवल मृत्यु नहीं, बल्कि कैसे मृत्यु को स्वीकार किया गया—यह अधिक महत्वपूर्ण है।

शास्त्रों में कहा गया है कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाली आत्मा को ऊर्ध्वगमन प्राप्त होता है। वहीं आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि मृत्यु के समय मन की अवस्था, व्यक्ति की चेतना और मानसिक स्थिरता का गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में भीष्म पितामह का महाप्रयाण केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक चेतना का प्रतीक बन जाता है।

इसी कारण भीष्म द्वादशी को पितृ शांति, मोक्ष साधना और आत्मविश्लेषण का श्रेष्ठ अवसर माना गया है। इस दिन किया गया तिल-जल अर्पण, दान और ध्यान केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और स्वयं के भीतर धर्म की पुनर्स्थापना है।

इस लेख में आप जानेंगे—

भीष्म द्वादशी 2026 कब है, इसकी संपूर्ण कथा, पूजा विधि, ज्योतिषीय संकेत, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वह गहरा संदेश जो इसे आज के युग में भी प्रासंगिक बनाता है।

भीष्म द्वादशी 2026 कब है?

भीष्म द्वादशी माघ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में भीष्म द्वादशी मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को पड़ेगी।

पंचांग विवरण:

  • तिथि: माघ शुक्ल द्वादशी

  • वार: मंगलवार

  • नक्षत्र: श्रवण

  • योग: सिद्ध

  • पुण्यकाल: सूर्योदय से दोपहर तक

भीष्म द्वादशी क्या है?

भीष्म द्वादशी महाभारत के महान योद्धा और धर्मज्ञ भीष्म पितामह के महाप्रयाण की स्मृति में मनाई जाती है। इस दिन उन्होंने उत्तरायण के पावन काल में अपनी इच्छामृत्यु द्वारा देह त्याग किया था। यह तिथि पितृ मोक्ष, धर्म, त्याग और आत्मज्ञान का प्रतीक मानी जाती है।

भीष्म पितामह का जीवन परिचय

भीष्म पितामह का वास्तविक नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र थे। उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया और हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

भीष्म द्वादशी की संपूर्ण पौराणिक कथा

महाभारत युद्ध के दसवें दिन अर्जुन द्वारा रचित शरशय्या पर गिरने के बाद भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने प्राण नहीं त्यागे। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इस अवधि में उन्होंने राजा युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्ष धर्म का उपदेश दिया।

उत्तरायण और भीष्म पितामह का महाप्रयाण

शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है। सूर्य के इस मार्ग में आत्मा का ऊर्ध्वगमन सरल माना जाता है। भीष्म पितामह ने माघ शुक्ल द्वादशी के दिन, पूर्ण चेतना में, भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए देह त्याग किया।

भीष्म द्वादशी का धार्मिक महत्व

  • पितरों की शांति के लिए श्रेष्ठ दिन

  • मोक्ष प्राप्ति का विशेष अवसर

  • धर्म और त्याग की प्रेरणा

  • पितृ दोष शांति में सहायक

भीष्म द्वादशी व्रत विधि (Step-by-Step)

  1. ब्रह्ममुहूर्त में स्नान (तिल मिश्रित जल से)

  2. स्वच्छ वस्त्र धारण करें

  3. संकल्प लें:

 
ॐ भीष्म पितामह प्रीत्यर्थं माघ शुक्ल द्वादशी व्रतं करिष्ये।
  1. विष्णु सहस्रनाम या गीता के 12वें अध्याय का पाठ

  2. तिल-जल अर्पण

  3. दान और ब्राह्मण भोजन

भीष्म द्वादशी पर दान का महत्व

  • तिल दान

  • अन्न दान

  • वस्त्र दान

  • जल पात्र दान

  • गौ सेवा

ज्योतिषीय दृष्टिकोण

माघ शुक्ल द्वादशी पर सूर्य, गुरु और चंद्र का प्रभाव आत्मिक उन्नति को प्रोत्साहित करता है। यह दिन विशेष रूप से कर्क, मीन, धनु और वृश्चिक राशि वालों के लिए लाभकारी माना गया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

उत्तरायण में सूर्य की किरणें विटामिन-डी संश्लेषण, मानसिक संतुलन और इम्युनिटी के लिए उपयोगी मानी जाती हैं। उपवास और स्नान शरीर के डिटॉक्स और कोशिकीय मरम्मत में सहायक होते हैं।

आध्यात्मिक और चेतना विज्ञान

आधुनिक न्यूरोसाइंस भी मानता है कि मृत्यु के समय चेतना की अवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भीष्म पितामह की इच्छामृत्यु को आज के शब्दों में Conscious Death कहा जा सकता है।

भीष्म द्वादशी में क्या करें, क्या न करें

करें:

  • ध्यान और जप

  • दान और सेवा

  • शास्त्र अध्ययन

न करें:

  • मांसाहार

  • मद्यपान

  • झूठ और क्रोध

पितृ दोष और भीष्म द्वादशी

इस दिन तिल-जल अर्पण करने से पितृ दोष शांत होता है और पूर्वजों को तृप्ति मिलती है।

Frequently Asked Questions (FAQ)

भीष्म द्वादशी 2026 कब है?

27 जनवरी 2026, मंगलवार।

क्या महिलाएं यह व्रत कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएं भी यह व्रत कर सकती हैं।

क्या उपवास अनिवार्य है?

नहीं, श्रद्धा और भाव प्रधान है।

क्या इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है?

हाँ, यह अत्यंत फलदायी माना गया है।

निष्कर्ष

भीष्म द्वादशी धर्म, त्याग और मोक्ष का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भोग नहीं, बल्कि धर्म और आत्मज्ञान है।

 

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