श्री नृसिंह स्तुतिः पाठ करने की सही विधि, नियम, समय, लाभ और शास्त्रीय महत्व जानें। यह स्तुति भय, नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से रक्षा करती है।
श्री नृसिंह भगवान, श्री विष्णु के उग्र अवतार माने जाते हैं। इनका प्राकट्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए हुआ। श्री नृसिंह स्तुतिः एक अत्यंत प्रभावशाली वैदिक स्तोत्र है, जिसका पाठ भय, शत्रु बाधा, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक अशांति को दूर करता है।
श्री नृसिंह स्तुतिः का उल्लेख नारद पुराण, ब्रह्मांड पुराण एवं वैष्णव परंपरा में मिलता है। इसे भगवान शिव, प्रह्लाद और महर्षियों द्वारा स्तुत रूप में वर्णित किया गया है।
श्री नृसिंह स्तुतिः मूल पाठ
सुरासुरशिरोरत्नकान्तिविच्छुरिताङ्घ्रये ।
नमस्त्रिभुवनेशाय हरये सिंहरूपिणे ॥ १ ॥
शत्रोः प्राणानिलाः पञ्च वयं दश जयोऽत्र कः ।
इति कोपादिवाताम्राः पान्तु वो नृहरेर्नखाः ॥ २ ॥
प्रोज्ज्वलज्ज्वलनज्वालाविकटोरुसटाच्छटः ।
श्वासक्षिप्तकुलक्ष्माभृत्पातु वो नरकेसरी ॥ ३ ॥
व्याधूतकेसरसटाविकरालवक्त्रं
हस्ताग्रविस्फुरितशङ्खगदासिचक्रम् ।
आविष्कृतं सपदि येन नृसिंहरूपं
नारायणं तमपि विश्वसृजं नमामि ॥ ४ ॥
दैत्यास्थिपञ्जरविदारणलब्धरन्ध्र-
-रक्ताम्बुनिर्जरसरिद्धनजातपङ्काः ।
बालेन्दुकोटिकुटिलाः शुकचञ्चुभासा
रक्षन्तु सिंहवपुषो नखरा हरेर्वः ॥ ५ ॥
दिश्यात्सुखं नरहरिर्भुवनैकवीरो
यस्याहवे दितिसुतोद्दलनोद्यतस्य ।
क्रोधोद्धतं मुखमवेक्षितुमक्षमत्वं
जानेऽभवन्निजनखेष्वपि यन्नतास्ते ॥ ६ ॥
वपुर्दलनसम्भ्रमात्स्वनखरं प्रविष्टे रिपौ
क्व यात इति विस्मयात्प्रहितलोचनः सर्वतः ।
वृथेति करताडनान्निपतितं पुरो दानवं
निरीक्ष्य भुवि रेणुवज्जयति जातहासो हरिः ॥ ७ ॥
चटच्चटिति चर्मणि च्छमिति चोच्छलच्छोणिते
धगद्धगिति मेदसि स्फुटरवेऽस्थिनि ष्ठागिति ।
पुनातु भवतो हरेरमरवैरिवक्षःस्थल
क्वणत्करजपञ्जरक्रकचकाषजन्माऽनलः ॥ ८ ॥
ससत्वरमितस्ततस्ततविहस्तहस्ताटवी-
-निकृत्तसुरशत्रुहृत्क्षतजसिक्तवक्षःस्थलः ।
स्फुरद्वरगभस्तिभिः स्थगितसप्तसप्तिद्युतिः
समस्तनिगमस्तुतो नृहरिरस्तु नः स्वस्तये ॥ ९ ॥
चञ्चच्चण्डनखाग्रभेदविगलद्दैत्येन्द्रवक्षःक्षर-
-द्रक्ताभ्यक्तसुपाटलोद्भटसदासम्भ्रान्तभीमाननः ।
तिर्यक्कण्ठकठोरघोषघटनासर्वाङ्गखर्वीभव-
-द्दिङ्मातङ्गनिरीक्षितो विजयते वैकुण्ठकण्ठीरवः ॥ १० ॥
दंष्ट्रासङ्कटवक्त्रकन्दरललज्जिह्वस्य हव्याशन-
-ज्वालाभासुरभूरिकेसरसटाभारस्य दैत्यद्रुहः ।
व्यावल्गद्बलवद्धिरण्यकशिपुक्रोडस्थलास्फालन
स्फारप्रस्फुटदस्थिपञ्जररवक्रूरा नखाः पान्तु वः ॥ ११ ॥
सोमार्धायितनिष्पधानदशनः सन्ध्यायितान्तर्मुखो
बालार्कायितलोचनः सुरधनुर्लेखायितभ्रूलतः ।
अन्तर्नादनिरोधपीवरगलत्त्वक्कूपनिर्यत्तडि-
-त्तारस्फारसटावरुद्धगगनः पायान्नृसिंहः स वः ॥ १२ ॥
विद्युच्चक्रकरालकेसरसटाभारस्य दैत्यद्रुहः
शोणन्नेत्रहुताशडम्बरभृतः सिंहाकृतेः शार्ङ्गिणः ।
विस्फूर्जद्गलगर्जितर्जितककुम्मातङ्गदर्पोदयाः
संरम्भाः सुखयन्तु वः खरनखक्षुण्णद्विषद्वक्षसः ॥ १३ ॥
दैत्यानामधिपे नखाङ्कुरकुटीकोणप्रविष्टात्मनि
स्फारीभूतकरालकेसरसटासङ्घातघोराकृतेः ।
सक्रोधं च सविस्मयं च सगुरुव्रीडं च सान्तःस्मितं
क्रीडाकेसरिणो हरेर्विजयते तत्कालमालोकितम् ॥ १४ ॥
किं किं सिंहस्ततः किं नरसदृशवपुर्देव चित्रं गृहीतो
नैतादृक्क्वापि जीवोऽद्भुतमुपनय मे देव सम्प्राप्त एषः ।
चापं चापं न चापीत्यहहहहहहा कर्कशत्वं नखानां
इत्थं दैत्येन्द्रवक्षः खरनखमुखरैर्जघ्निवान्यः स वोऽव्यात् ॥ १५ ॥
भूयः कण्ठावधूतिव्यतिकरतरलोत्तंसनक्षत्रमाला-
-बालेन्दुक्षुद्रघण्टारणितदशदिशादन्तचीत्कारकारी ।
अव्याद्वो दैत्यराजप्रथमयमपुरीयानघण्टानिनादो
नादो दिग्भित्तिभेदप्रसरसरभसः कूटकण्ठीरवस्य ॥ १६ ॥
अन्तःक्रोधोज्जिहानज्वलनभवशिखाकारजिह्वावलीढ
प्रौढब्रह्माण्डभाण्डः पृथुभुवनगुहागर्भगम्भीरनादः ।
दृप्यत्पारीन्द्रमूर्तिर्मुरजिदवतु वः सुप्रभामण्डलीभिः
कुर्वन्निर्धूमधूमध्वजनिचितमिव व्योम रोमच्छटानाम् ॥ १७ ॥
पायान्मायामृगेन्द्रो जगदखिलमसौ यत्तनूदर्चिरर्चिः
ज्वालाजालावलीढं बत भुवि सकलं व्याकुलं किं न भूयात् ।
न स्याच्चेदाशु तस्याधिकविकटसटाकोटिभिः पाट्यमानात्
इन्दोरानन्दकन्दात्तदुपरि तुहिनासारसन्दोहवृष्टिः ॥ १८ ॥
आदित्याः किं दशैते प्रलयभयकृतः स्वीकृताकाशदेशाः
किं वोल्कामण्डलानि त्रिभुवनदहनायोद्यतानीति भीतैः ।
पायासुर्नारसिंहं वपुरमरगणैर्बिभ्रतः शार्ङ्गपाणेः
दृष्टादृप्तासुरोरस्थलदरणगलद्रक्तरक्ता नखा वः ॥ १९ ॥
इति श्री नृसिंह स्तुतिः ।
श्री नृसिंह स्तुतिः पाठ की विधि
1. पाठ का समय
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प्रातः ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल
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शनिवार या बुधवार विशेष फलदायी
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नृसिंह जयंती पर सर्वोत्तम
2. आसन व दिशा
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कुश या ऊनी आसन
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उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख
3. पूजा सामग्री
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श्री नृसिंह भगवान की प्रतिमा या चित्र
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दीपक, धूप, पुष्प
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तुलसी दल
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पीला या लाल वस्त्र
पाठ के नियम
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स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें
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मन, वाणी और शरीर से शुद्ध रहें
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पाठ के समय मौन और एकाग्रता आवश्यक
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स्तुति का पाठ कम से कम 11 बार
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भय या संकट में 108 बार पाठ विशेष लाभ देता है
श्री नृसिंह स्तुतिः के लाभ
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अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा
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शत्रु बाधा और षड्यंत्र से सुरक्षा
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ग्रह दोष और राहु-केतु शांति
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मानसिक भय, अवसाद और अनिद्रा से मुक्ति
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घर और साधक के चारों ओर सुरक्षा कवच
विशेष साधना उपाय
यदि किसी व्यक्ति पर लगातार नकारात्मक प्रभाव या भय बना रहता है, तो 21 दिनों तक नियमित रूप से दीपक जलाकर श्री नृसिंह स्तुतिः का पाठ करें। यह साधना अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।
ध्यान रखने योग्य बातें
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पाठ अधूरा न छोड़ें
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क्रोध या अशुद्ध अवस्था में पाठ न करें
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स्तुति का उच्चारण स्पष्ट हो
श्री नृसिंह स्तुतिः केवल एक स्तोत्र नहीं बल्कि दिव्य सुरक्षा कवच है। शास्त्रों में वर्णित विधि से किया गया पाठ साधक को भयमुक्त, सुरक्षित और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है।