Fagun Sankashti Chaturthi Vrat Katha: फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, पूजा विधि और आध्यात्मिक महत्व: क्यों यह चतुर्थी सबसे फलदायी मानी गई हैIt takes 7 minutes... to read this article !

Sankashti Chaturthi Vrat Katha In Hindi: फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, पूजा विधि, व्रत नियम और शास्त्रों में बताए गए गणेश उपासना के आध्यात्मिक रहस्य विस्तार से जानें।

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि यह समय मानसिक शुद्धि, कष्ट निवारण और विघ्नों से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में भगवान गणेश को संकटहर्ता कहा गया है, और संकष्टी व्रत उन्हीं की उपासना का विशिष्ट विधान है।

शास्त्रों में संकष्टी चतुर्थी का उल्लेख

गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण में संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व वर्णित मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और संयम के साथ चतुर्थी का व्रत करता है, उसके जीवन से मानसिक, पारिवारिक और कर्मजन्य बाधाएँ धीरे-धीरे दूर होती हैं।

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Fagun Sankashti Chaturthi Vrat Katha In Hindi)

हिंदू धर्मग्रंथों में व्रत और कथा का विशेष स्थान है। व्रत शरीर का अनुशासन है और कथा मन की शुद्धि। फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणपति को समर्पित एक ऐसा पावन पर्व है, जिसमें उपवास, धैर्य, प्रतीक्षा और श्रद्धा—इन चारों का समन्वय दिखाई देता है। शास्त्रों में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, सिद्धिदाता और बुद्धि के अधिष्ठाता के रूप में वर्णित किया गया है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से जीवन के कष्टों, मानसिक उलझनों और कर्मजन्य बाधाओं के निवारण के लिए किया जाता है।

फाल्गुन मास आत्मिक शुद्धि और अंतर्मुखता का प्रतीक माना गया है। इसी कारण फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी की कथा का प्रभाव केवल सांसारिक सुख तक सीमित न रहकर आत्मिक जागरण तक पहुँचता है। यह कथा गणेश पुराण, मुद्गल पुराण तथा लोक-परंपराओं में वर्णित भावार्थ पर आधारित है।

प्राचीन काल की पृष्ठभूमि

प्राचीन काल में एक पुण्यभूमि थी, जहाँ वेदों का नित्य पाठ होता था और धर्म का पालन जीवन का आधार था। उसी भूमि में एक ब्राह्मण दंपत्ति निवास करता था। वे दोनों शुद्ध आचरण वाले, सत्यप्रिय और भगवान के भक्त थे, परंतु उनका जीवन अत्यंत कष्टमय था। निर्धनता, रोग और सामाजिक उपेक्षा उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी थी।

ब्राह्मण प्रतिदिन यज्ञ, जप और देव पूजन करता, किंतु उसके प्रयासों के बावजूद जीवन की कठिनाइयाँ कम नहीं हो रही थीं। वह अक्सर सोचता कि क्या उसके पूर्वजन्म के कर्म इतने कठोर हैं कि ईश्वर की उपासना का भी कोई फल नहीं मिल रहा।

ब्राह्मण की व्यथा और अंतर्द्वंद्व

एक दिन ब्राह्मण अत्यंत व्याकुल होकर अपनी पत्नी से बोला— “हम जीवन भर धर्म का पालन करते आए हैं, फिर भी हमारे कष्ट कम क्यों नहीं होते? क्या ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहे हैं या हमने अनजाने में कोई दोष किया है?”

पत्नी ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “स्वामी, ईश्वर की लीला मनुष्य की बुद्धि से परे है। संभव है कि किसी विशेष व्रत या साधना के बिना हमारे कर्मों का बंधन न टूट रहा हो।”

उस रात ब्राह्मण को नींद नहीं आई। वह मन ही मन ईश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना करता रहा।

दिव्य स्वप्न और गणपति का संकेत

उसी रात्रि ब्राह्मण ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। स्वप्न में उसने देखा कि उसके सामने भगवान गणेश प्रकट हुए हैं। उनका स्वर अत्यंत करुणामय था। गणपति ने कहा—

“हे ब्राह्मण, तुम्हारे कष्टों का कारण तुम्हारे पूर्व कर्म हैं, परंतु उनका निवारण संभव है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। उस दिन श्रद्धा और संयम के साथ मेरा व्रत करो, कथा सुनो और चंद्र दर्शन के बाद ही भोजन ग्रहण करो। तुम्हारे जीवन के संकट धीरे-धीरे समाप्त होंगे।”

इतना कहकर भगवान गणेश अंतर्धान हो गए। ब्राह्मण की नींद खुली तो उसका हृदय आशा से भर गया।

व्रत का संकल्प

प्रातःकाल ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को स्वप्न का विवरण सुनाया। दोनों ने उसी क्षण संकल्प लिया कि वे फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से करेंगे।

चतुर्थी के दिन उन्होंने प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए और भगवान गणेश का ध्यान किया। ब्राह्मण ने संकल्प लिया कि वह पूरे दिन उपवास रखेगा और मन, वचन तथा कर्म से संयम का पालन करेगा।

दिनभर की साधना और प्रतीक्षा

दिनभर ब्राह्मण दंपत्ति ने मौन, जप और ध्यान में समय बिताया। भूख और थकान अवश्य थी, परंतु मन में अद्भुत शांति थी। संध्या के समय उन्होंने दीप प्रज्वलित कर गणपति की पूजा की और मोदक का भोग अर्पित किया।

शास्त्रों में कहा गया है कि संकष्टी चतुर्थी का वास्तविक सार चंद्र दर्शन में निहित है, क्योंकि चंद्र प्रतीक्षा और संयम का प्रतीक है।

चंद्र दर्शन और कथा श्रवण

रात्रि के समय जब आकाश में चंद्रमा उदित हुआ, तब ब्राह्मण ने चंद्र दर्शन कर भगवान गणेश को प्रणाम किया। इसके पश्चात उन्होंने संकष्टी चतुर्थी की कथा सुनी।

कथा सुनते समय उनके मन में अहंकार नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण था। कथा के प्रत्येक शब्द के साथ उनका हृदय हल्का होता गया।

गणपति की कृपा

कहा जाता है कि उसी रात्रि से ब्राह्मण के जीवन में परिवर्तन आरंभ हो गया। कुछ ही समय में उसे ऐसा कार्य मिला, जिससे उसकी निर्धनता दूर होने लगी। उसकी पत्नी का स्वास्थ्य सुधरने लगा और समाज में उसे सम्मान प्राप्त हुआ।

ब्राह्मण समझ गया कि यह सब गणपति की कृपा का परिणाम है। उसने जीवन भर संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने का संकल्प लिया।

कथा का आध्यात्मिक संदेश

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा यह सिखाती है कि ईश्वर की कृपा तत्काल नहीं, बल्कि उचित समय पर प्राप्त होती है। यह व्रत मनुष्य को धैर्य, प्रतीक्षा और आत्मसंयम का अभ्यास कराता है।

भगवान गणेश केवल बाहरी विघ्नों को ही नहीं, बल्कि मन के भीतर के भ्रम, भय और अहंकार को भी दूर करते हैं।

उपसंहार

इस प्रकार फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी की कथा श्रद्धालु को यह बोध कराती है कि सच्ची भक्ति में आडंबर नहीं, बल्कि विनम्रता होती है। जो व्यक्ति श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ इस व्रत को करता है, उसके जीवन में आने वाले संकट धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है।

यही फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पूर्ण शास्त्रीय भावार्थ है।

व्रत विधि (संक्षेप में)

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी पर:

  • प्रातः स्नान कर संकल्प लिया जाता है

  • दिनभर उपवास या फलाहार किया जाता है

  • संध्या के बाद गणेश पूजन किया जाता है

  • चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है

शास्त्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि व्रत का मूल तत्व संयम और श्रद्धा है, न कि कठोरता।

आध्यात्मिक अर्थ और फल

फाल्गुन मास आत्मशुद्धि और अंतर्मुखता का प्रतीक माना गया है। इस मास की संकष्टी चतुर्थी पर किया गया व्रत व्यक्ति को धैर्य, विवेक और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। गणेश उपासना से अहंकार, भ्रम और भय का शमन होता है।

निष्कर्ष

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन और संकटों से उबरने की आध्यात्मिक विधा है। यदि इस व्रत को शास्त्रों में बताए गए भाव और श्रद्धा के साथ किया जाए, तो इसका प्रभाव केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुभव किया जा सकता है।

FAQs: Falgun Ganesh Chaturthi Vrat 2026 Katha

1. फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का व्रत क्यों किया जाता है?

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा से जीवन के कष्ट, विघ्न और मानसिक बाधाओं के निवारण के लिए किया जाता है। शास्त्रों में इसे संकटहर्ता व्रत कहा गया है।

2. संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्र दर्शन क्यों आवश्यक है?

चंद्र दर्शन धैर्य, प्रतीक्षा और आत्मसंयम का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है।

3. क्या संकष्टी चतुर्थी पर निर्जल व्रत अनिवार्य है?

नहीं। स्वास्थ्य और सामर्थ्य के अनुसार फलाहार या सात्त्विक आहार के साथ किया गया व्रत भी पूर्ण फलदायी माना गया है।

4. फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व क्या है?

फाल्गुन मास आत्मशुद्धि और अंतर्मुखता का प्रतीक है। इस मास की संकष्टी चतुर्थी मानसिक शांति और कर्मदोष शमन में विशेष सहायक मानी गई है।

5. संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा कब सुननी चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार संध्या के समय चंद्र दर्शन के बाद व्रत कथा सुनना श्रेष्ठ माना गया है।

6. संकष्टी चतुर्थी पर कौन-सा मंत्र जप करना चाहिए?

‘ॐ गं गणपतये नमः’ और ‘ॐ नमो गणपतये’ मंत्र सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।

7. क्या महिलाएँ संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर सकती हैं?

हाँ। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फलदायी माना गया है। शारीरिक स्थिति के अनुसार व्रत में लचीलापन स्वीकार्य है।

8. संकष्टी चतुर्थी व्रत का पारण कैसे किया जाता है?

चंद्र दर्शन और गणेश पूजन के बाद सात्त्विक भोजन से व्रत का पारण किया जाता है।

9. संकष्टी चतुर्थी व्रत कितनी बार करना चाहिए?

शास्त्रों में एक संकष्टी से लेकर पूरे वर्ष की संकष्टी चतुर्थियाँ करने का उल्लेख मिलता है। यह श्रद्धा पर निर्भर करता है।

10. संकष्टी चतुर्थी व्रत का आध्यात्मिक लाभ क्या है?

यह व्रत मन को स्थिर करता है, धैर्य बढ़ाता है और व्यक्ति को आंतरिक रूप से सशक्त बनाता है।

Disclaimer: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी प्रकार का दावा करना नहीं है।

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