Bhishma Krita Bhagavat Stuti (भगवत् स्तुतिः): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 16 minutes... to read this article !

सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ को परमहंसों की संहिता और साक्षात भगवान श्री कृष्ण का वांग्मय स्वरूप माना गया है। भागवत पुराण के प्रथम स्कंध के नवें अध्याय में एक ऐसा प्रसंग आता है, जो मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य— ‘मृत्यु’— को एक उत्सव और मोक्ष के द्वार में बदल देता है। यह प्रसंग है कुरुक्षेत्र के युद्ध के पश्चात, बाणों की शय्या (शरशय्या) पर लेटे हुए भीष्म पितामह के अंतिम क्षणों का।

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया और युधिष्ठिर को अपने सगे-संबंधियों के वध का भारी शोक हुआ, तब भगवान श्री कृष्ण स्वयं युधिष्ठिर और पांडवों को लेकर भीष्म पितामह के पास उपदेश के लिए गए। भीष्म पितामह, जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था, सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म और स्त्रीधर्म का महान उपदेश दिया।

जब उनके शरीर त्यागने का समय अत्यंत निकट आ गया, तब उन्होंने अपनी वाणी और मन को सभी सांसारिक विषयों से हटा लिया और अपने समक्ष चतुर्भुज रूप में साक्षात खड़े परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण में अपनी दृष्टि स्थिर कर दी। उस समय, 58 दिनों तक तीरों की शय्या पर भयंकर शारीरिक पीड़ा सहने वाले उस महान योद्धा और परम भक्त के मुख से, भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण और विशुद्ध प्रेम से भरी जो अत्यंत दार्शनिक और भावपूर्ण प्रार्थना निकली, उसे ही शास्त्रों में ‘भगवत् स्तुतिः (भीष्म कृतम्)’ या ‘Bhagavat Stuti (Bhishma Kritam)’ कहा जाता है।

यह स्तुति केवल एक वंदना नहीं है; यह जीवन के अंतिम क्षणों में ‘मति’ (बुद्धि) को ‘रति’ (ईश्वरीय प्रेम) में बदलने का अमोघ मंत्र है। जब जीवन में घोर कष्ट हो, मृत्यु का भय सता रहा हो, शरीर रोगों से जर्जर हो गया हो, और संसार से मोह भंग हो चुका हो, तब भीष्म पितामह द्वारा रचित यह ‘भगवत् स्तुति’ जीव को सीधे भगवान के श्रीचरणों (मोक्ष) तक पहुँचाने का कार्य करती है।

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि भीष्म कृत भगवत् स्तुति का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

भीष्म उवाच ।
इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा
भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि ।
स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं
प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं
रविकरगौरवराम्बरं दधाने ।
वपुरलककुलावृताननाब्जं
विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥ २ ॥

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्
कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये ।
मम निशितशरैर्विभिद्यमान
त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३ ॥

सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये
निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य ।
स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा
हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥ ४ ॥

व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य
स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या ।
कुमतिमहरदात्मविद्यया य-
-श्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ५ ॥

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञां
ऋतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुः
हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६ ॥

शितविशिखहतो विशीर्णदंशः
क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।
प्रसभमभिससार मद्वधार्थं
स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे
धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये ।
भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः
यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥ ८ ॥

ललित गति विलास वल्गुहास
प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः ।
कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः
प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥ ९ ॥

मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः
सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् ।
अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो
मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥ १० ॥

तमिममहमजं शरीरभाजां
हृदि हृदि धिष्टितमात्मकल्पितानाम् ।
प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं
समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ ११ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे प्रथमस्कन्धे नवमोऽध्याये भीष्मकृत भगवत् स्तुतिः ।

1. भगवत् स्तुति (भीष्म कृतम्) का प्राकट्य, दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान स्तुति की असीम ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वेदांत दर्शन और ‘मृत्यु-विज्ञान’ को समझने के लिए हमें भीष्म पितामह के भाव और भगवान श्री कृष्ण के ‘पार्थसारथी’ स्वरूप के रहस्य को गहराई से समझना होगा।

‘मति’ का भगवान में विलीन होना (Absolute Surrender of Intellect)

भीष्म पितामह ने अपनी स्तुति के आरंभ में ही कहा है— “इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा…” अर्थात् मेरी यह बुद्धि, जो अब तक अनेक प्रकार के सांसारिक कर्तव्यों, राजकाज और युद्ध में फंसी हुई थी, वह अब सभी तृष्णाओं (इच्छाओं) से मुक्त होकर साक्षात भगवान श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित हो गई है। दार्शनिक दृष्टि से यह स्तुति हमें सिखाती है कि जीवन भर हमारी बुद्धि संसार के विषयों में भटकती है, लेकिन अंत समय में बुद्धि का पूर्ण रूप से भगवान में एकाकार हो जाना ही वास्तविक मोक्ष है।

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भगवान का भक्त-वत्सल स्वरूप (The Charioteer Form)

इस स्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भीष्म पितामह ने भगवान के चतुर्भुज वैकुंठनाथ रूप का नहीं, बल्कि अर्जुन के सारथी (पार्थसारथी) रूप का सबसे अधिक ध्यान किया है। भीष्म जी कहते हैं, “मैं उन श्री कृष्ण का ध्यान करता हूँ, जिनके बालों में कुरुक्षेत्र युद्ध के घोड़ों की उड़ती हुई धूलि भर गई थी, जिनके मुख पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और जिनका कवच मेरे तीरों की मार से कट गया था।” सोचिए, एक भक्त भगवान को घायल करने की बात कर रहा है! यह भगवान और भक्त के बीच के उस अद्वैत प्रेम का दर्शन है, जहाँ भगवान अपने भक्त के तीरों को भी फूलों के समान स्वीकार करते हैं।

भगवान का अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना (God Breaking His Vow for a Devotee)

महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि वे शस्त्र नहीं उठाएंगे। परंतु भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे भगवान से शस्त्र उठवा कर रहेंगे। अपनी स्तुति में भीष्म उस दृश्य को याद करते हैं जब भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन को बचाने के लिए रथ का पहिया (चक्र) उठाकर सिंह की भांति भीष्म को मारने दौड़े थे। भीष्म कहते हैं, “मेरे प्रभु ने मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए अपनी स्वयं की प्रतिज्ञा तोड़ दी।” यह स्तुति इस बात का उद्घोष है कि भगवान अपने भक्त के सम्मान के लिए अपने नियम भी बदल देते हैं।

2. भगवत् स्तुति (भीष्म कृतम्) पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

श्रीमद्भागवत में वर्णित यह स्तुति ज्ञान, वैराग्य, और भक्ति का सर्वोच्च शिखर है। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन (विशेषकर जीवन के उत्तरार्ध में) इस स्तुति का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

आध्यात्मिक लाभ और मोक्ष की प्राप्ति (Spiritual Awakening & Liberation)

  • जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति: यह स्तुति मोक्ष का द्वार है। जो व्यक्ति जीवन के अंतिम समय में या नित्य प्रति इस स्तुति का गान करता है, उसकी बुद्धि भगवान में स्थिर हो जाती है और उसे पुनर्जन्म के कष्ट नहीं सहने पड़ते। वह सीधे भगवान के परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त करता है।

  • निष्काम भक्ति की प्राप्ति: इस स्तुति के प्रभाव से साधक के हृदय में भगवान के प्रति अहैतुकी (बिना किसी सांसारिक स्वार्थ के) भक्ति उत्पन्न होती है। साधक संसार से कुछ भी मांगना छोड़ देता है।

  • अहंकार (Ego) का समूल नाश: भीष्म जैसे महाज्ञानी और महायोद्धा ने अंत में सब कुछ भगवान को सौंप दिया। यह स्तुति साधक के भीतर से “मैं करता हूँ” के अहंकार को नष्ट कर उसे विनम्र और शांत बना देती है।

शारीरिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Physical Endurance & Mental Peace)

  • भयंकर शारीरिक पीड़ा सहने की शक्ति: भीष्म पितामह 58 दिनों तक तीरों की शय्या पर रहे। जिन रोगियों का शरीर बीमारियों से जर्जर हो गया है, जिन्हें भयंकर पीड़ा (Pain) है, यदि उन्हें यह स्तुति सुनाई जाए, तो उनका मन शरीर के कष्ट से अलग होकर भगवान में लग जाता है, जिससे पीड़ा का अनुभव समाप्त हो जाता है।

  • मृत्यु के भय (Thanatophobia) का नाश: संसार का सबसे बड़ा डर मृत्यु है। यह स्तुति मृत्यु को ‘अंत’ नहीं, बल्कि ‘परमात्मा से मिलन का उत्सव’ बना देती है। साधक के मन से मृत्यु का भय पूरी तरह निकल जाता है।

  • असीम मानसिक शांति: जब जीवन में चारों ओर अंधकार हो, अपने सगे-संबंधी भी काम न आ रहे हों, तब भीष्म जी के ये शब्द हृदय में एक असीम सकारात्मक प्रकाश (Positive Light) और शांति भर देते हैं।

लौकिक और कर्म बंधन से मुक्ति के लाभ (Material Detachment)

  • मोह-माया के बंधनों का कटना: इंसान अपने परिवार और संपत्ति से इतना बंध जाता है कि वह शांति से जी नहीं पाता। यह स्तुति साधक को यह बोध कराती है कि अंत में केवल परमात्मा ही अपना है, जिससे सारे मानसिक बंधन (Attachments) कट जाते हैं।

  • सच्चे मार्गदर्शक की प्राप्ति: जीवन के कठिन निर्णयों में (जैसे भीष्म धर्म-संकट में थे), यह स्तुति साधक की बुद्धि को कुशाग्र करती है और उसे भगवान की ओर से सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

3. भगवत् स्तुति (भीष्म कृतम्) की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

भगवान श्री कृष्ण की यह स्तुति विशुद्ध ज्ञान और प्रेम का अद्भुत संगम है। भीष्म पितामह ने इसे शरशय्या पर लेटे हुए किया था, परंतु सामान्य साधकों के लिए इसका त्वरित फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: भगवान श्री कृष्ण की आराधना के लिए बुधवार (Wednesday) और गुरुवार (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त मोक्ष प्रदायिनी एकादशी अत्यंत शुभ है।

  • विशेष तिथियां: ‘भीष्म पंचक’ (कार्तिक मास के अंतिम पाँच दिन – प्रबोधिनी एकादशी से पूर्णिमा तक) और मकर संक्रांति (उत्तरायण का आरंभ) के दिन इस स्तुति का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है। भीष्म जी ने उत्तरायण में ही प्राण त्यागे थे।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) या संध्याकाल होता है। यदि कोई व्यक्ति जीवन के अंतिम क्षणों में हो, तो उसे किसी भी समय यह स्तुति सुनाई जा सकती है।

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दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर रखें। (उत्तरायण मोक्ष की दिशा है)।

  • आसन: बैठने के लिए सफेद या पीले रंग के ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में हल्के पीले (Yellow) या सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत सात्विक और वैराग्यपूर्ण परिणाम देता है।

प्रतिमा स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

  1. एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं।

  2. उस पर भगवान श्री कृष्ण के ‘पार्थसारथी’ रूप (जिसमें वे अर्जुन के रथ को हांक रहे हों) का सुंदर चित्र स्थापित करें। (भीष्म जी ने इसी रूप का ध्यान किया था)।

  3. भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। चंदन या गुलाब की अगरबत्ती जलाएं।

  4. पूजन सामग्री: भगवान को पीला चंदन (गोपी चंदन) का तिलक लगाएं। उन्हें अक्षत, पीले पुष्प, और ‘तुलसी दल’ (Tulsi leaves) अत्यंत प्रिय हैं। (तुलसी के बिना कृष्ण जी की कोई पूजा पूर्ण नहीं होती)।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे वासुदेव, हे पार्थसारथी, मैं अपने जीवन से मोह-माया के नाश, मृत्यु के भय से मुक्ति, अंत काल में सद्गति और आपके श्रीचरणों की शुद्ध निष्काम भक्ति के लिए भीष्म कृत भगवत् स्तुति का नित्य पाठ करूँगा”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और महर्षि वेदव्यास (भागवत के रचयिता) का स्मरण करें।

  • उसके बाद परम भक्त भीष्म पितामह का मानसिक ध्यान कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • भगवान श्री कृष्ण के महामंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” की कम से कम 11 बार या एक माला (108 बार) तुलसी की माला पर जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम वैराग्य और पूर्ण समर्पण के भाव से ‘भगवत् स्तुतिः (भीष्म कृतम्)’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • संस्कृत में रचित श्रीमद्भागवत के इन श्लोकों का स्पष्ट, गंभीर और अत्यंत मधुर स्वर में उच्चारण करें। यदि संस्कृत कठिन लगे, तो इसके हिंदी अर्थ को हृदय में धारण करते हुए पाठ करें। यहाँ ‘निष्काम भाव’ ही सर्वोपरि है।

  • नित्य 1 या 3 बार इसका पाठ करें।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान श्री कृष्ण को माखन-मिश्री, गाय के दूध की खीर, या पंचामृत (तुलसी डालकर) का भोग लगाएं। अंत में श्री कृष्ण जी की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

भीष्म पितामह आजन्म ब्रह्मचारी, सत्यवादी और परम धर्मज्ञ थे। यह स्तुति कोई भौतिक वस्तु (धन या पद) मांगने के लिए नहीं है, यह सीधे परब्रह्म से एकाकार होने का मंत्र है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. निष्काम भाव (Desireless Devotion): यह इस साधना का सबसे बड़ा नियम है। इस स्तुति का पाठ करते समय भगवान से धन, संपत्ति या सांसारिक सुख न मांगें। केवल यह मांगें कि “हे प्रभु, अंत समय में मेरी बुद्धि आपके स्वरूप में ही रमी रहे।”

  2. पूर्ण सात्विकता (Pure Sattvic Diet): अनुष्ठान के दौरान (और जीवन के उत्तरार्ध में) घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें। तामसिक भोजन मति (बुद्धि) को मलिन करता है।

  3. क्षमा भाव (Forgiveness): भीष्म ने पांडवों को क्षमा किया और अपने शत्रुओं के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखी। साधना काल में अपने हृदय से सभी के प्रति द्वेष निकाल दें। जिसने भी आपका बुरा किया है, उसे क्षमा कर दें।

  4. ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): भीष्म पितामह ‘अखंड ब्रह्मचर्य’ के साक्षात प्रतीक थे। साधना के दिनों में शारीरिक और मानसिक रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत फलदायी होता है।

5. भगवत् स्तुति उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

भगवान श्री कृष्ण की पूजा और इस विशिष्ट स्तुति के पाठ में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो:

  • तुलसी की अनिवार्यता: भगवान श्री कृष्ण साक्षात परब्रह्म हैं, अतः उन्हें ‘तुलसी दल’ अनिवार्य रूप से अर्पित करें।

  • मृत्यु शय्या पर पाठ: यदि परिवार में कोई वृद्ध या बीमार व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में हो (मृत्यु शय्या पर हो), तो उसके कान के पास बैठकर इस स्तुति का स्पष्ट और मधुर स्वर में पाठ करना चाहिए। इससे जीवात्मा को शरीर छोड़ने में कष्ट नहीं होता और वह सद्गति को प्राप्त करता है।

  • अशुद्धता का निषेध: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, या अपवित्र अवस्था में श्रीमद्भागवत ग्रंथ या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श न करें। यह ग्रंथ साक्षात कृष्ण स्वरूप है।

  • उच्चारण: यदि संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण बिल्कुल न हो पाए, तो गलत उच्चारण करने के बजाय इसके अर्थ का हिंदी अनुवाद पढ़ना अधिक श्रेष्ठ है।

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6. आधुनिक युग में भीष्म कृत भगवत् स्तुति की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग घोर भौतिकवाद (Materialism) और ‘एंटी-एजिंग’ (Anti-aging) का युग है। आज का इंसान यह मानना ही नहीं चाहता कि उसे एक दिन मरना है। लोग बुढ़ापे और मृत्यु से इतना डरते हैं कि वे डिप्रेशन (Depression) में चले जाते हैं। वे अपनी संपत्ति, अपने पद और अपने शरीर से इतने चिपक जाते हैं कि जब उन्हें छोड़ना पड़ता है, तो उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है।

अस्पतालों में भयंकर बीमारियों से जूझते हुए लोग केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत टूट जाते हैं क्योंकि उन्होंने जीवन में कभी ‘वैराग्य’ या ‘Letting go’ (छोड़ने की कला) नहीं सीखी।

‘भगवत् स्तुति (भीष्म कृतम्)’ आधुनिक इंसान के इसी ‘मृत्यु के भय’ (Fear of Death) और ‘अत्यधिक मोह’ (Attachment) का सबसे शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उपचार (Spiritual Therapy) है। जब आप शांत चित्त से एकांत में बैठकर इस दार्शनिक स्तुति का गान करते हैं, तो:

  1. यह स्तुति आपको ‘मृत्यु की कला’ (Art of Dying) सिखाती है। यह बताती है कि शरीर छोड़ना कोई त्रासदी (Tragedy) नहीं है, बल्कि परमात्मा से मिलने का एक उत्सव है।

  2. यह आपके मस्तिष्क से मोह-माया के जाल को काट देती है। आपको यह स्पष्ट दिखाई देने लगता है कि संसार की कोई भी संपत्ति आपके साथ नहीं जाएगी; केवल आपकी ईश्वरीय ‘मति’ (चेतना) ही आपके साथ जाएगी।

  3. यह आपके भीतर एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति पैदा करती है कि आप जीवन की किसी भी शारीरिक पीड़ा या बीमारी का सामना एक तटस्थ दर्शक (Observer) बनकर कर सकते हैं।

  4. यह आज के अशांत मन को यह विश्वास दिलाती है कि भगवान का ‘पार्थसारथी’ स्वरूप जीवन के कुरुक्षेत्र में भी आपके रथ को चला रहा है, अतः चिंता की कोई बात नहीं है।

Bhagavat Stuti (Bhishma Kritam) केवल कुछ संस्कृत श्लोकों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह एक महापराक्रमी योद्धा, एक आजन्म ब्रह्मचारी और एक परम भक्त के जीवन की अंतिम और सर्वोच्च कमाई है। जब बाणों की शय्या पर लेटे हुए एक वृद्ध की प्रार्थना साक्षात परब्रह्म को अपने सामने खड़े होने पर विवश कर सकती है, तो सोचिए इस स्तुति में कितनी प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति होगी!

जब ये पवित्र और श्रीमद्भागवत के रस से गुंथे हुए श्लोक आपके होठों से गूंजते हैं, तो आपके अंतःकरण की सारी मलिनता, अज्ञान, मोह, और मृत्यु का भय स्वतः ही भस्म होने लगता है।

भगवान श्री कृष्ण अत्यंत कृपालु, दयालु और भक्त-वत्सल हैं; वे केवल आपके हृदय का निर्मल प्रेम और अंत समय की ‘मति’ (बुद्धि) देखते हैं। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के मोह-माया में बुरी तरह उलझ गए हैं, शारीरिक कष्ट असहनीय हो गए हैं, मृत्यु का अकारण भय सता रहा है, और आपको ईश्वर के साक्षात सानिध्य की आवश्यकता है, तो आसन पर बैठें, भगवान के पार्थसारथी स्वरूप का ध्यान करें, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘वासुदेव’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि श्री कृष्ण की एक कृपादृष्टि ने आपके सारे मानसिक बंधनों और भयों को नष्ट कर दिया है, और साक्षात परब्रह्म ने आपके जीवन (और मृत्यु) को असीम शांति, मोक्ष और दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!

भगवत् स्तुतिः (भीष्म कृतम्) : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भीष्म कृत भगवत् स्तुति क्या है और इसका उल्लेख कहाँ मिलता है?

भीष्म कृत भगवत् स्तुति श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध (अध्याय 9) में वर्णित एक अत्यंत दार्शनिक और मोक्षदायिनी प्रार्थना है। महाभारत युद्ध के पश्चात, बाणों की शय्या पर अपने जीवन के अंतिम क्षणों में लेटे हुए भीष्म पितामह ने साक्षात अपने समक्ष खड़े भगवान श्री कृष्ण (पार्थसारथी रूप) की यह स्तुति की थी।

2. इस स्तुति का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस स्तुति का सबसे बड़ा लाभ ‘मोह-माया के बंधनों से पूर्ण मुक्ति’, ‘अकाल मृत्यु या मृत्यु के भय (Thanatophobia) का नाश’, और ‘अंत काल में मोक्ष की प्राप्ति’ है। इसका नियमित पाठ करने से बुद्धि सांसरिक विषयों से हटकर साक्षात भगवान में स्थिर हो जाती है, जिससे भयंकर शारीरिक पीड़ा भी शांत प्रतीत होती है।

3. इस स्तुति का पाठ करने के लिए वर्ष का कौन सा समय सबसे सर्वोत्तम माना गया है?

यद्यपि इसका पाठ कभी भी किया जा सकता है, परंतु कार्तिक मास के अंतिम पाँच दिन (प्रबोधिनी एकादशी से पूर्णिमा तक), जिन्हें ‘भीष्म पंचक’ कहा जाता है, तथा ‘मकर संक्रांति’ (उत्तरायण का आरंभ) के समय इस स्तुति का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी और मोक्ष देने वाला माना गया है।

4. क्या मृत्यु शय्या पर लेटे हुए किसी व्यक्ति को यह स्तुति सुनाई जा सकती है?

जी हाँ, यह इस स्तुति का सबसे बड़ा व्यावहारिक उपयोग है। यदि कोई वृद्ध या बीमार व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में हो और उसे प्राण त्यागने में कष्ट हो रहा हो, तो उसके समीप बैठकर अत्यंत मधुर स्वर में भीष्म कृत इस भगवत् स्तुति का पाठ करना चाहिए। इससे जीवात्मा को शांति मिलती है और वह भगवान के श्रीचरणों को प्राप्त करता है।

5. क्या युवा या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, बिल्कुल! युवाओं और गृहस्थों के लिए यह स्तुति ‘जीने की कला’ और ‘अनासक्ति’ (Detachment) सिखाती है। जब युवा इसका पाठ करते हैं, तो उनके भीतर से अत्यधिक मोह, तनाव, और अहंकार नष्ट होता है। वे जीवन के कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी मानसिक रूप से शांत और ईश्वर से जुड़े रहते हैं। इसके लिए सात्विक आहार और पवित्र विचारों का होना अनिवार्य है।

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