श्री जगद्गुरु स्तुतिः | Jagadguru Stuti (Sri Sacchidananda Shivabhinava Narasimha Bharati Stuti)It takes 1 minutes... to read this article !

Jagadguru Stuti (Sri Sacchidananda Shivabhinava Narasimha Bharati Stuti): जगदगुरु स्तुति — श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नरसिम्ह भारती स्तुति एक पवित्र संस्कृत स्तोत्र है जिसमें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नरसिम्ह भारती की महानता, ज्ञान, भक्तिपूर्ण गुणगान और आध्यात्मिक अनुग्रह का सुंदर वर्णन किया गया है। यह स्तुति पाठकों को भक्ति-भाव, श्रद्धा और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति प्रदान करती है।

यश्शिष्य हृत्ताप दवाग्निभयनिवारिणे महामेघः
यश्शिष्य रोगार्ति महाहिविषविनाशने सुपर्णात्मा ।
यश्शिष्य सन्दोह विपक्षगिरि विभेदने पविस्सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ १ ॥

यं शङ्करार्यापररूप इति तपोनिधिं भजन्त्यार्याः
यं भारतीपुन्तनुरूप इति कलानिधिं स्तुवन्त्यन्ये ।
यं सद्गुणाढ्यं निजदैवमिति नमन्ति संश्रितास्सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ २ ॥

येनाश्रितं सज्जनतुष्टिकरमभीप्सितं चतुर्भद्रं
येनादृतं शिष्यसुधीसुजन शिवङ्करं किरीटाद्यम् ।
येनोद्धृता सम्यमिलोकनुत महानुभाव ता सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ३ ॥

यस्मै नृपाद्याबिरुदं ददति विभूषणादिकं भक्त्या
यस्मै प्रयच्छन्ति मुदाभजक जनानृपोपचारादीन् ।
यस्मै प्रदत्ता गुरुणा स्वकृत तपोविभूतयस्सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ४ ॥

यस्मादभीष्टार्थचयाप्तिरिह भवत्यमोघमार्तानां
यस्मात्कटाक्षास्सदयाः कुशलकरास्सरन्ति भक्तेषु ।
यस्मात्सदानन्दद सूक्त्यमृत धुनी प्रजायते सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ५ ॥

यस्याङ्गके भाति महत्त्वगुणविबोधकं महातेजः
यस्योक्तिपूरे ऋतपूतहित सदम्बुभक्तपानीयम् ।
यस्यान्तरङ्गेहि शिवोहमिति विभावनैकता सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ६ ॥

यस्मिन् स्थिता शृङ्गगिरीड्ययति परम्परात्तदिव्यश्रीः
यस्मिन् चकास्त्युद्धृतवादि जयकरी यशःकरी विद्या ।
यस्मिन् सुविज्ञानविरक्ति शमदमादिसम्पदस्सोर्च्यः
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ७ ॥

योर्च्यो भजेयं शरणं भवुकयुतोस्मि येन यस्मैगीः
दत्ता च यस्मात्सुखमीप्सितमुचितं हि यस्य दासोऽहम् ।
यस्मिन् मनस्सन्ततभक्तियुतमभूत्स एव पाहि त्वं
श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंहभारती स्वामी ॥ ८ ॥

इति श्री जगद्गुरु स्तुतिः

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