आत्मार्पण स्तुति (Atmarpana Stuti Lyrics in Sanskrit) : अप्पय दीक्षित का रहस्य, परम आत्म-समर्पण और मोक्ष प्राप्ति के अकल्पनीय लाभIt takes 19 minutes... to read this article !

सनातन धर्म के इतिहास में ज्ञान, कर्म और भक्ति के अनगिनत मार्ग बताए गए हैं। लेकिन जब इंसान सारे मार्गों पर चलकर थक जाता है, जब उसका सारा ज्ञान, बुद्धि और तर्क जवाब दे जाते हैं, तब केवल एक ही मार्ग शेष बचता है— ‘समर्पण’ (Surrender)। महर्षि पतंजलि से लेकर अद्वैत वेदांत के आचार्यों तक, सभी ने यह माना है कि जब जीव अपना सब कुछ परमात्मा को सौंप देता है (ईश्वर प्रणिधान), तो परमात्मा स्वयं उसका उत्तरदायित्व ले लेते हैं। इसी परम आत्म-समर्पण का साक्षात और ज्वलंत उदाहरण है भगवान शिव को समर्पित— ‘आत्मार्पण स्तुति’ (Atmarpana Stuti)

यह स्तुति कोई सामान्य प्रार्थना नहीं है। इसके रचयिता 16वीं शताब्दी के महान शैव दार्शनिक, अद्वैत वेदांत के प्रकांड विद्वान और परम संत श्री अप्पय दीक्षित (Appayya Dikshitar) हैं। इस स्तुति के जन्म की कथा इतनी अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाली है कि इसे सुनकर यह सिद्ध हो जाता है कि सच्ची भक्ति केवल मस्तिष्क में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा और अवचेतन मन (Subconscious mind) की गहराई में बसती है।

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि आत्मार्पण स्तुति की रचना किस रहस्यमयी और अलौकिक परिस्थिति में हुई, Atmarpana Stuti Lyrics in Sanskrit के पाठ का मूल आध्यात्मिक दर्शन क्या है, ‘उन्मत्त पंचाशती’ का रहस्य क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक विधि क्या है।

अप्पय दीक्षित और ‘आत्मार्पण स्तुति’ के प्राकट्य का अद्भुत रहस्य (The Miraculous Origin)

आत्मार्पण स्तुति (जिसे ‘उन्मत्त पंचाशती’ भी कहा जाता है) की रचना की कथा आध्यात्मिक इतिहास की सबसे विस्मयकारी घटनाओं में से एक है।

श्री अप्पय दीक्षित जी एक महान विद्वान थे। उन्होंने 100 से अधिक ग्रंथों की रचना की थी। वे दिन-रात भगवान शिव की पूजा और वेदांत के प्रचार में लगे रहते थे। लेकिन एक दिन उनके मन में एक बहुत ही सूक्ष्म शंका उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा— “मैं जाग्रत अवस्था (Conscious state) में तो भगवान शिव की इतनी भक्ति करता हूँ, लेकिन क्या यह भक्ति केवल मेरी बुद्धि और ज्ञान का दिखावा तो नहीं है? क्या मेरे अवचेतन मन (Subconscious) की गहराई में भी शिव के प्रति इतना ही प्रेम है? जब इंसान का अपनी बुद्धि पर नियंत्रण नहीं रहता, तब उसके मुँह से वही निकलता है जो उसके भीतर गहराई में दबा होता है।”

अपनी इसी सच्ची भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने एक अत्यंत कठोर निर्णय लिया। उन्होंने ‘धतूरे’ (Datura – Unmatta) का रस (जो कि एक विषैला और मतिभ्रम पैदा करने वाला पौधा है) पीने का निश्चय किया।

रस पीने से पहले उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा— “मैं यह धतूरे का रस पी रहा हूँ। इसके प्रभाव से मैं अपनी चेतना खो दूँगा और उन्मत्त (पागल/Delirious) अवस्था में चला जाऊँगा। उस बेहोशी और मतिभ्रम की अवस्था में मेरे मुँह से जो भी शब्द निकलें, तुम लोग उन्हें भोजपत्र पर लिख लेना। यदि मैं शिव की निंदा करूँ, तो समझ लेना मेरी सारी भक्ति झूठी थी।”

दीक्षित जी ने धतूरे का विषैला रस पी लिया और वे बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़े। कुछ समय बाद, उस घोर मतिभ्रम और उन्मत्त अवस्था में उनके मुँह से संस्कृत के श्लोक फूटने लगे। उनके शिष्यों ने उन्हें लिखना शुरू किया। उस बेहोशी की हालत में दीक्षित जी के मुँह से 50 श्लोक निकले।

जब वे होश में आए और शिष्यों ने उन्हें वे 50 श्लोक पढ़कर सुनाए, तो दीक्षित जी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। वे 50 श्लोक भगवान शिव के प्रति परम समर्पण, अगाध प्रेम और करुणा की पुकार से भरे हुए थे। उस उन्मत्त अवस्था में रची गई इसी 50 श्लोकों की स्तुति को ‘आत्मार्पण स्तुति’ या ‘उन्मत्त पंचाशती’ (पागलपन की अवस्था में रचे गए 50 श्लोक) कहा गया। यह इस बात का प्रमाण था कि अप्पय दीक्षित की रोम-रोम में केवल शिव ही बसे थे।

‘आत्मार्पण’ का दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ (Essence of True Surrender)

इस स्तुति की गहराई को समझने के लिए ‘आत्मार्पण’ शब्द को समझना होगा।

  • आत्म (Atma): स्वयं, अपना अहंकार (Ego), अपनी इच्छाएं और अपनी पहचान।

  • अर्पण (Arpana): सौंप देना, दान कर देना या समर्पित कर देना।

मनोवैज्ञानिक पहलू: हम इंसान अपने जीवन का कंट्रोल हमेशा अपने हाथ में रखना चाहते हैं। हम सोचते हैं कि हम अपने भाग्य के निर्माता हैं। यही ‘कर्तापन का अहंकार’ (Doership ego) हमारे सारे दुखों, तनाव और डिप्रेशन का कारण है। आत्मार्पण का अर्थ है— इस अहंकार को शिव के चरणों में रखकर यह कहना कि “हे महादेव! अब से मेरा शरीर, मेरा मन, मेरे कर्म और मेरे कर्मों का फल सब कुछ आपका है। मैं केवल आपके हाथों की कठपुतली हूँ।”

जब यह भाव भीतर से जाग्रत होता है, तो इंसान का सारा तनाव सेकंडों में शून्य हो जाता है।

आत्मार्पण स्तुति (संस्कृत) | Atmarpana Stuti Lyrics in Sanskrit

कस्ते बोद्धुं प्रभवति परं देवदेव प्रभावं
यस्मादित्थं विविधरचना सृष्टिरेषा बभूव ।
भक्तिग्राह्यस्त्वमिह तदपि त्वामहं भक्तिमात्रात्
स्तोतुं वाञ्छाम्यतिमहदिदं साहसं मे सहस्व ॥ १ ॥

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क्षित्यादीनामवयववतां निश्चितं जन्म तावत्
तन्नास्त्येव क्वचन कलितं कर्त्रधिष्ठानहीनम् ।
नाधिष्ठातुं प्रभवति जडो नाप्यनीशश्च भावः
तस्मादाद्यस्त्वमसि जगतां नाथ जाने विधाता ॥ २ ॥

इन्द्रं मित्रं वरुणमनिलं पद्मजं विष्णुमीशं
प्राहुस्ते ते परमशिव ते मायया मोहितास्त्वाम् ।
एतैः सार्धं सकलमपि यच्छक्तिलेशे समाप्तं
स त्वं देवः शृतिषु विदितः शम्भुरित्यादिदेवः ॥ ३ ॥

आनन्दाब्धेः किमपि च घनीभावमास्थाय रूपं
शक्त्या सार्धं परममुमया शाश्वतं भोगमिच्छन् ।
अध्वातीते शुचिदिवसकृत्कोटिदीप्रे कपर्दिन्
आद्ये स्थाने विहरसि सदा सेव्यमानो गणेशैः ॥ ४ ॥

त्वं वेदान्तैर्विविधमहिमा गीयसे विश्वनेतः
त्वं विप्राद्यैर्वरद निखिलैरिज्यसे कर्मभिः स्वैः ।
त्वं दृष्टानुश्रविकविषयानन्दमात्रावितृष्णैः
अन्तर्ग्रन्थिप्रविलयकृते चिन्त्यसे योगिबृन्दैः ॥ ५ ॥

ध्यायन्तस्त्वां कतिचन भवं दुस्तरं निस्तरन्ति
त्वत्पादाब्जं विधिवदितरे नित्यमाराधयन्तः ।
अन्ये वर्णाश्रमविधिरताः पालयन्तस्त्वदाज्ञां
सर्वं हित्वा भवजलनिधावेष मज्जामि घोरे ॥ ६ ॥

उत्पद्यापि स्मरहर महत्युत्तमानां कुलेऽस्मिन्
आस्वाद्य त्वन्महिमजलधेरप्यहं शीकराणून् ।
त्वत्पादार्चविमुखहृदयश्चापलादिन्द्रियाणां
व्यग्रस्तुच्छेष्वहह जननं व्यर्थयाम्येष पापः ॥ ७ ॥

अर्कद्रोणप्रभृतिकुसुमैरर्चनं ते विधेयं
प्राप्यं तेन स्मरहर फलं मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मीः ।
एतज्जानन्नपि शिव शिव व्यर्थयन्कालमात्मन्
आत्मद्रोही करणविवशो भूयसाधः पतामि ॥ ८ ॥

किं वा कुर्वे विषमविषयस्वैरिणा वैरिणाहं
बद्धः स्वामिन् वपुषि हृदयग्रन्थिना सार्धमस्मिन् ।
उक्ष्णा दर्पज्वरभरजुषा साकमेकत्र नद्धः
श्राम्यन्वत्सः स्मरहर युगे धावता किं करोतु ॥ ९ ॥

नाहं रोद्धुं करणनिचयं दुर्नयं पारयामि
स्मारं स्मारं जनिपथरुजं नाथ सीदामि भीत्या ।
किं वा कुर्वे किमुचितमिह क्वाद्य गच्छामि हन्त
त्वत्पादाब्जप्रपदनमृते नैव पश्याम्युपायम् ॥ १० ॥

उल्लङ्घ्याज्ञामुडुपतिकलाचूड ते विश्ववन्द्य
त्यक्ताचारः पशुवदधुना मुक्तलज्जश्चरामि ।
एवं नानाविधभवततिप्राप्तदीर्घापराधः
क्लेशाम्भोधिं कथमहमृते त्वत्प्रसादात्तरेयम् ॥ ११ ॥

क्षाम्यस्येव त्वमिह करुणासागरः कृत्स्नमागः
संसारोत्थं गिरिश सभयप्रार्थनादैन्यमात्रात् ।
यद्यप्येवं प्रतिकलमहं व्यक्तमागस्सहस्रं
कुर्वन् मूकः कथमिव तथा निस्त्रपः प्रार्थयेयम् ॥ १२ ॥

सर्वं क्षेप्तुं प्रभवति जनः संसृतिप्राप्तमागः
चेतः श्वासप्रशमसमये त्वत्पदाब्जे निधाय ।
तस्मिन्काले यदि मम मनो नाथ दोषत्रयार्तं
प्रज्ञाहीनं पुरहर भवेत् तत्कथं मे घटेत ॥ १३ ॥

प्राणोत्क्रान्तिव्यतिकरदलत्सन्धिबन्धे शरीरे
प्रेमावेशप्रसरदमिताक्रन्दिते बन्धुवर्गे ।
अन्तः प्रज्ञामपि शिव भजन्नन्तरायैरनन्तैः
आविद्धोऽहं त्वयि कथमिमामर्पयिष्यामि बुद्धिम् ॥ १४ ॥

अद्यैव त्वत्पदनलिनयोरर्पयाम्यन्तरात्मन्
आत्मानं मे सह परिकरैरद्रिकन्याधिनाथ ।
नाहं बोद्धुं शिव तव पदं नक्रिया योगचर्याः
कर्तुं शक्नोम्यनितरगतिः केवलं त्वां प्रपद्ये ॥ १५ ॥

यः स्रष्टारं निखिलजगतां निर्ममे पूर्वमीशः
तस्मै वेदानदित सकलान्यश्च साकं पुराणैः ।
तं त्वामाद्यं गुरुमहमसावात्मबुद्धिप्रकाशं
संसारार्तः शरणमधुना पार्वतीशं प्रपद्ये ॥ १६ ॥

ब्रह्मादीन् यः स्मरहर पशून्मोहपाशेन बद्ध्वा
सर्वानेकश्चिदचिदधिकः कारयित्वाऽऽत्मकृत्यम् ।
यश्चैतेषु स्वपदशरणान्विद्यया मोचयित्वा
सान्द्रानन्दं गमयति परं धाम तं त्वाम् प्रपद्ये ॥ १७ ॥

भक्ताग्र्याणां कथमपि परैर्योऽचिकित्स्याममर्त्यैः
संसाराख्यां शमयति रुजं स्वात्मबोधौषधेन ।
तं सर्वाधीश्वर भवमहादीर्घतीव्रामयेन
क्लिष्टोऽहं त्वां वरद शरणं यामि संसारवैद्यम् ॥ १८ ॥

ध्यातो यत्नाद्विजितकरणैर्योगिभिर्यो विमृग्यः
तेभ्यः प्राणोत्क्रमणसमये सन्निधायात्मनैव ।
तद्व्याचष्टे भवभयहरं तारकं ब्रह्म देवः
तं सेवेऽहं गिरिश सततं ब्रह्मविद्यागुरुं त्वाम् ॥ १९ ॥

दासोऽस्मीति त्वयि शिव मया नित्यसिद्धं निवेद्यं
जानास्येतत् त्वमपि यदहं निर्गतिः सम्भ्रमामि ।
नास्त्येवान्यन्मम किमपि ते नाथ विज्ञापनीयं
कारुण्यान्मे शरणवरणं दीनवृत्तेर्गृहाण ॥ २० ॥

ब्रह्मोपेन्द्रप्रभृतिभिरपि स्वेप्सितप्रार्थनाय
स्वामिन्नग्रे चिरमवसरस्तोषयद्भिः प्रतीक्ष्यः ।
द्रागेव त्वां यदिह शरणं प्रार्थये कीटकल्पः
तद्विश्वाधीश्वर तव कृपामेव विश्वस्य दीने ॥ २१ ॥

कर्मज्ञानप्रचयमखिलं दुष्करं नाथ पश्यन्
पापासक्तं हृदयमपि चापारयन्सन्निरोद्धुम् ।
संसाराख्ये पुरहर महत्यन्धकूपे विषीदन्
हस्तालम्ब प्रपतनमिदं प्राप्यते निर्भयोस्मि ॥ २२ ॥

त्वामेवैकं हतजनिपथे पान्थमस्मिन्‍ प्रपञ्चे
मत्वा जन्मप्रचयजलधेः बिभ्यतः पारशून्यात् ।
यत्ते धन्याः सुरवर मुखं दक्षिणं संश्रयन्ति
क्लिष्टं घोरे चिरमिह भवे तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २३ ॥

एकोऽसि त्वं शिव जनिमतामीश्वरो बन्धमुक्त्योः
क्लेशाङ्गारावलिषु लुठतः का गतिस्त्वां विना मे ।
तस्मादस्मिन्निह पशुपते घोरजन्मप्रवाहे
खिन्नं दैन्याकरमतिभयं मां भजस्व प्रपन्नम् ॥ २४ ॥

यो देवानां प्रथममशुभद्रावको भक्तिभाजां
पूर्वं विश्वाधिक शतधृतिं जायमानं महर्षिः ।
दृष्ट्यापश्यत्सकलजगतीसृष्टिसामर्थ्यदात्र्या
स त्वं ग्रन्थिप्रविलयकृते विद्यया योजयास्मान् ॥ २५ ॥

यद्याकाशं शुभद मनुजाश्चर्मवद्वेष्टयेयुः
दुःखस्यान्तं तदपि पुरुषस्त्वामविज्ञाय नैति ।
विज्ञानं च त्वयि शिव ऋते त्वत्प्रसादान्न लभ्यं
तद्दुःखार्तः कमिह शरणं यामि देवं त्वदन्यम् ॥ २६ ॥

किं गूढार्थैरकृतकवचोगुम्भनैः किं पुराणैः
तन्त्राद्यैर्वा पुरुषमतिभिर्दुर्निरूप्यैकमत्यैः ।
किं वा शास्त्रैरफलकलहोल्लासमात्रप्रधानैः
विद्या विद्येश्वर कृतधियां केवलं त्वत्प्रसादात् ॥ २७ ॥

पापिष्टोऽहं विषयचपलः सन्ततद्रोहशाली
कार्पण्यैकस्थिरनिवसतिः पुण्यगन्धानभिज्ञः ।
यद्यप्येवं तदपि शरणं त्वत्पदाब्जं प्रपन्नं
नैनं दीनं स्मरहर तवोपेक्षितुं नाथ युक्तम् ॥ २८ ॥

आलोच्यैवं मयि यदि भवान्नाथ दोषाननन्तान्
अस्मत्पादाश्रयणपदवीं नार्हतीति क्षिपेन्माम् ।
अद्यैवेमं शरणविरहाद्विद्धि भीत्यैव नष्टं
ग्रामो गृह्णात्यहिततनयं किं नु मात्रा निरस्तम् ॥ २९ ॥

क्षन्तव्यं वा निखिलमपि मे भूतभावि व्यलीकं
दुर्व्यापारप्रवणमथवा शिक्षणीयं मनो मे ।
न त्वेवार्त्या निरतिशयया त्वत्पदाब्जं प्रपन्नं
त्वद्विन्यस्ताखिलभरममुं युक्तमीश प्रहातुम् ॥ ३० ॥

सर्वज्ञस्त्वं निरवधिकृपासागरः पूर्णशक्तिः
कस्मादेनं न गणयसि मामापदब्धौ निमग्नम् ।
एकं पापात्मकमपि रुजा सर्वतोऽत्यन्तदीनं
जन्तुं यद्युद्धरसि शिव कस्तावतातिप्रसङ्गः ॥ ३१ ॥

अत्यन्तार्तिव्यथितमगतिं देव मामुद्धरेति
क्षुण्णो मार्गस्त्व शिव पुरा केन वाऽनाथनाथ ।
कामालम्बे बत तदधिकां प्रार्थनारीतिमन्यां
त्रायस्वैनं सपदि कृपया वस्तुतत्त्वं विचिन्त्य ॥ ३२ ॥

एतावन्तं भ्रमणनिचयं प्रापितोऽयं वराकः
श्रान्तः स्वामिन्नगतिरधुना मोचनीयस्त्वयाहम् ।
कृत्याकृत्यव्यपगतमतिर्दीनशाखामृगोऽयं
सन्ताड्यैनं दशनविवृतिं पश्यतस्ते फलं किम् ॥ ३३ ।

माता तातः सुत इति समाबध्य मां मोहपाशै-
रापात्यैवं भवजलनिधौ हा किमीश त्वयाप्तम् ।
एतावन्तं समयमियतीमार्तिमापादितेऽस्मिन्
कल्याणी ते किमिति न कृपा कापि मे भाग्यरेखा ॥ ३४ ॥

भुङ्क्षे गुप्तं बत सुखनिधिं तात साधारणं त्वं
भिक्षावृत्तिं परमभिनयन्मायया मां विभज्य ।
मर्यादायाः सकलजगतां नायकः स्थापकस्त्वं
युक्तं किं तद्वद विभजनं योजयस्वात्मना माम् ॥ ३५ ॥

न त्वा जन्मप्रलयजलधेरुद्धरामीति चेद्धीः
आस्तां तन्मे भवतु च जनिर्यत्र कुत्रापि जातौ ।
त्वद्भक्तानामनितरसुखैः पादधूलीकिशोरैः
आरब्धं मे भवतु भगवन् भावि सर्वं शरीरम् ॥ ३६ ॥

कीटा नागास्तरव इति वा किं न सन्ति स्थलेषु
त्वत्पादाम्भोरुहपरिमलोद्वाहिमन्दानिलेषु ।
तेष्वेकं वा सृज पुनरिमं नाथ दीनार्तिहारिन्
आतोषान्मां मृड भवमहाङ्गरनद्यां लुठन्तम् ॥ ३७ ॥

काले कण्ठस्फुरदसुकलालेशसत्तावलोक-
व्यग्रोदग्रव्यसनिसकलस्निग्धरुद्धोपकण्ठे ।
अन्तस्तोदैरवधिरहितामार्तिमापद्यमाने-
ऽप्यङ्घ्रिद्वन्द्वे तव निविशतामन्तरात्मन् ममात्मा ॥ ३८ ॥

अन्तर्बाष्पाकुलितनयनानन्तरङ्गानपश्यन्
अग्रे घोषं रुदितबहुलं कातराणामशृण्वन् ।
अत्युत्क्रान्तिश्रममगणयन्नन्तकाले कपर्दिन्
अङ्घ्रिद्वन्द्वे तवनिविशतामन्तरात्मन् ममात्मा ॥ ३९ ॥

चारुस्मेराननसरसिजं चन्द्ररेखावतंसं
फुल्लन्मल्लीकुसुमकलिकादामसौभाग्यचोरम् ।
अन्तः पश्याम्यचलसुतया रत्नपीठे निषण्णं
लोकातीतं सततशिवदं रूपमप्राकृतं ते ॥ ४० ॥

स्वप्ने वापि स्वरसविकसद्दिव्यपङ्केरुहाभं
पश्येयं किं तव पशुपते पादयुग्मं कदाचित् ।
क्वाहं पापः क्व तव चरणालोकभाग्यं तथापि
प्रत्याशां मे घटयति पुनर्विश्रुता तेऽनुकम्पा ॥ ४१ ॥

भिक्षावृत्तिं चर पितृवने भूतसङ्घैर्भ्रमेदं
विज्ञातं ते चरितमखिलं विप्रलिप्सोः कपालिन् ।
आवैकुण्ठद्रुहिणमखिलप्राणिनामीश्वरस्त्वं
नाथ स्वप्नेऽप्यहमिह न ते पादपद्मं त्यजामि ॥ ४२ ॥

आलेपनं भसितमावसथः श्मशानं
अस्थीनि ते सततमाभरणानि सन्तु ।
निह्नोतुमीश सकलश्रुतिपारसिद्धं
ऐश्वर्यमम्बुजभवोऽपि च न क्षमस्ते ॥ ४३ ॥

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विविधमपि गुणौघं वेदयन्त्वर्थवादाः
परिमितविभवानां पामराणां सुराणाम् ।
तनुहिमकरमौले तावता त्वत्परत्वे
कति कति जगदीशाः कल्पिता नो भवेयुः ॥ ४४ ॥

विहर पितृवने वा विश्वपारे पुरे वा
रजतगिरितटे वा रत्नसानुस्थले वा ।
दिश भवदुपकण्ठं देहि मे भृत्यभावं
परमशिव तव श्रीपादुकावाहकानाम् ॥ ४५ ॥

बलमबलममीषां बल्वजानां विचिन्त्यं
कथमपि शिव कालक्षेपमात्रप्रधानैः ।
निखिलमपि रहस्यं नाथ निष्कृष्य साक्षात्
सरसिजभवमुख्यैः साधितं नः प्रमाणम् ॥ ४६ ॥

न किञ्चिन्मेनेऽतः समभिलषणीयं त्रिभुवने
सुखं वा दुःखं वा मम भवतु यद्भावि भगवन् ।
समुन्मीलत्पाथोरुहकुहरसौभाग्यमुषिते
पदद्वन्द्वे चेतः परिचयमुपेयान्मम सदा ॥ ४७ ॥

उदरभरणमात्रं साध्यमुद्दिश्य नीचे-
ष्वसकृदुपनिबद्धामाहितोच्छिष्टभावाम् ।
अहमिह नुतिभङ्गीमर्पयित्योपहारं
तव चरणसरोजे तातजातोऽपराधी ॥ ४८ ॥

सर्वं सदाशिव सहस्व ममापराधं
मग्नं समुद्धर महत्यमुमापदब्धौ ।
सर्वात्मना तव पदाम्बुजमेव दीनः
स्वामिन्ननन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ ४९ ॥

आत्मार्पणस्तुतिरियं भगवन्निबद्धा
यद्यप्यनन्यमनसा न मया तथापि ।
वाचापि केवलमयं शरणं वृणीते
दीनो वराक इति रक्ष कृपानिधे माम् ॥ ५० ॥

इति आत्मार्पणस्तुतिः सम्पूर्णा ।

स्तुति का केंद्रीय भाव (The Core Message): इस स्तुति में अप्पय दीक्षित जी एक अबोध और असहाय बालक की तरह भगवान शिव के सामने रोते हैं। वे श्लोकों में कहते हैं:

  • “हे करुणासागर! मैंने अपने जीवन में कोई महान तप नहीं किया, मेरा मन हमेशा सांसारिक विषयों में भटकता रहता है। फिर भी, हे चंद्रचूड़! आप मुझे अपने श्रीचरणों में स्थान दीजिए।”

  • “हे महादेव! यदि आप मुझे मोक्ष नहीं भी देना चाहते, तो मुझे नर्क में ही भेज दीजिए, लेकिन मेरी केवल एक शर्त है— वहाँ भी मेरे हृदय में आपके नाम का स्मरण निरंतर चलता रहे।”

  • “हे गौरीनाथ! यह मेरा शरीर, मेरे प्राण और मेरा यह अहंकार आज से आपका हुआ। अब आप इसे चाहे सुख दें या दुख, मुझे सब सहर्ष स्वीकार है।”

यह स्तुति सौदेबाजी (Bargaining) की प्रार्थना नहीं है कि ‘आप मेरा काम कर दो, तो मैं आपको प्रसाद चढ़ाऊँगा।’ यह बिना किसी शर्त के परमात्मा में विलीन हो जाने की पुकार है।

आत्मार्पण स्तुति पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits of Atmarpana Stuti)

भगवान शिव आशुतोष हैं (शीघ्र प्रसन्न होने वाले)। जब कोई भक्त इस स्तुति के माध्यम से अपना सब कुछ उन्हें सौंप देता है, तो शिव उसकी पूरी रक्षा का भार अपने कंधों पर ले लेते हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रतिदिन ‘आत्मार्पण स्तुति’ का सस्वर पाठ करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

1. भयंकर मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन का पूर्ण नाश

आज के समय में हम कल की चिंता में इतने उलझे हैं कि हमारा वर्तमान नष्ट हो गया है। आत्मार्पण स्तुति सबसे बड़ा ‘एंटी-डिप्रेसेंट’ है। जब साधक यह समझ जाता है कि जीवन की डोरी भगवान शिव के हाथों में सौंप दी गई है, तो उसके अवचेतन मन से सारी चिंताएं (Anxiety), भविष्य का अज्ञात भय और तनाव तुरंत समाप्त हो जाता है। मन एक शांत सरोवर की तरह स्थिर हो जाता है।

2. अहंकार (Ego) का भस्मीकरण और विनम्रता का उदय

व्यक्ति को अपने ज्ञान, रूप, पैसे या पद का बहुत अहंकार होता है। यह स्तुति एक आईना है जो दिखाती है कि परमात्मा के सामने हमारी कोई औकात नहीं है। इसके चिंतन से व्यक्ति का ‘ईगो’ पूरी तरह टूट जाता है और उसके भीतर एक ऐसी असीम विनम्रता (Humility) जन्म लेती है कि उसका आभामंडल अत्यंत आकर्षक और सम्मोहक हो जाता है।

3. जन्म-जन्मांतर के संचित पापों (प्रारब्ध) का शमन

इंसान अपने पिछले जन्मों और इस जन्म के कई अज्ञात पापों के कारण दुख भोगता है। आत्मार्पण स्तुति प्रायश्चित्त की अग्नि है। जब साधक भगवान से अपने पापों की क्षमा मांगकर अपनी आत्मा उन्हें सौंप देता है, तो महादेव अपने त्रिशूल से उसके संचित पापों और बुरे प्रारब्ध (Bad Karma) को नष्ट कर देते हैं।

4. मृत्यु के भय (Fear of Death) से अकल्पनीय मुक्ति

जिसने अपना जीवन ही शिव को दे दिया, उसे मृत्यु से क्या डर? मृत्यु तो केवल शरीर का परिवर्तन है। यह स्तुति मृत्यु के वास्तविकता को स्वीकार करना सिखाती है। भगवान शिव ‘महाकाल’ हैं। जो इस स्तुति के माध्यम से महाकाल की शरण में चला जाता है, उसके लिए मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

5. अकारण शत्रुओं का शमन और विपत्तियों से रक्षा

जब आप स्वयं शिव की संपत्ति बन जाते हैं, तो जो भी आपको नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है, वह वास्तव में शिव से टकरा रहा होता है। यह स्तुति साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बना देती है। बड़े से बड़े शत्रु, षड्यंत्र और तांत्रिक प्रयोग (काले जादू) शिव की इस भस्म के आगे राख हो जाते हैं।

6. आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष (परम मुक्ति) की प्राप्ति

यह इस स्तुति का अंतिम और सर्वोच्च लाभ है। जो भी साधक इस स्तुति को अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है, उसकी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है। उसे ध्यान (Meditation) में गहरे अनुभव होते हैं और जीवन के अंत में वह जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त होकर ‘शिव सायुज्य’ (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

आत्मार्पण स्तुति की प्रामाणिक पाठ और ध्यान विधि (Authentic Puja Vidhi)

भगवान शिव केवल भाव के भूखे हैं। फिर भी, शास्त्रों के अनुसार पूर्ण फल प्राप्ति के लिए इस स्तुति का पाठ निम्नलिखित विधि से करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)

भगवान शिव की स्तुति के लिए सोमवार (Monday), प्रदोष व्रत का दिन, या मासिक शिवरात्रि सबसे श्रेष्ठ और सिद्ध माने जाते हैं। चूँकि यह आत्म-ज्ञान और वैराग्य की स्तुति है, इसलिए इसका पाठ प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सुबह 4:00 से 6:00 बजे) के बीच करना सबसे अधिक फलदायी होता है। संध्या के समय (गोधूलि बेला में) भी इसका पाठ किया जा सकता है।

2. दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। शिव पूजा में सफेद (White) या हल्के पीले रंग के वस्त्र पहनना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि सफेद रंग शांति, वैराग्य और शुद्धता का प्रतीक है।

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें (उत्तर दिशा शिव के निवास ‘कैलाश’ की दिशा है)।

  • आसन: बैठने के लिए कुशा का आसन, चटाई या सफेद ऊनी आसन का प्रयोग करें।

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3. शिवलिंग स्थापना, भस्म और रुद्राक्ष का महत्व

एक स्वच्छ चौकी पर भगवान शिव का चित्र (ध्यान मुद्रा में) या नर्मदेश्वर शिवलिंग स्थापित करें। शिव जी के सामने गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।

भस्म और रुद्राक्ष: आत्मार्पण स्तुति वैराग्य की चरम सीमा है। पाठ से पूर्व अपने मस्तक पर ‘भस्म’ (राख) का त्रिपुंड अवश्य लगाएं और गले में रुद्राक्ष की माला धारण करें। भस्म इस बात का प्रतीक है कि एक दिन यह अहंकार राख हो जाना है।

4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa) और पूर्ण समर्पण

दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, बिल्वपत्र (Bel Patra) और एक सफेद फूल लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का उद्देश्य (जैसे- “हे महादेव, मैं अपने अंतःकरण की शुद्धि, मानसिक शांति और अपना सर्वस्व आपको अर्पण करने के लिए श्री अप्पय दीक्षित रचित आत्मार्पण स्तुति का नित्य पाठ करूँगा”) बोलें और जल ज़मीन पर छोड़ दें।

5. स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)

  • सर्वप्रथम भगवान गणेश (“ॐ गं गणपतये नमः”) और श्री अप्पय दीक्षित जी का मानसिक रूप से स्मरण करें।

  • भगवान शिव को एक अखंड बिल्वपत्र अर्पित करें (यह मन, बुद्धि और अहंकार के समर्पण का प्रतीक है)।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, श्रद्धा और आँखों में प्रायश्चित्त व प्रेम के आँसू लेकर ‘आत्मार्पण स्तुति’ का पाठ आरंभ करें।

  • यदि आप संस्कृत पढ़ने में सहज नहीं हैं, तो इसके अर्थ (हिंदी अनुवाद) का मनन करें या ऑडियो सुनकर आँखें बंद करके शिव के निराकार या साकार स्वरूप का ध्यान करें।

6. क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग

पाठ पूर्ण होने के बाद महादेव को सफेद मिठाई, मिश्री, खीर या ताजे फलों का भोग लगाएं। अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि, “हे शिव! मेरे द्वारा मन, वचन या कर्म से जो भी पाप हुए हैं, उन्हें क्षमा करें और मुझे अपने चरणों में स्थान दें।”

साधना के महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Strict Rules for Sadhana)

जब आप भगवान शिव को अपना सब कुछ सौंपने की बात कर रहे हों, तो आपके आचरण में पवित्रता होनी चाहिए:

  1. पूर्ण सात्विकता: संकल्प के दौरान मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और किसी भी प्रकार के नशे का पूर्णतया त्याग कर दें। शुद्ध आहार से ही शुद्ध विचार जन्म लेते हैं।

  2. ब्रह्मचर्य: जितने दिनों का आपने संकल्प लिया है, उस अवधि में शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करें।

  3. निंदा और क्रोध से बचें: किसी की पीठ पीछे बुराई (Gossip) करना या क्रोध करना साधना की ऊर्जा को नष्ट कर देता है। भगवान शिव को क्षमा और शांति प्रिय है।

  4. सच्चा भाव (No hypocrisy): यह स्तुति दिखावे के लिए नहीं है। जब आप ‘आत्मार्पण’ कह रहे हों, तो भीतर से सच में उस अहंकार को छोड़ने का प्रयास करें।

आधुनिक युग में आत्मार्पण स्तुति की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का मनुष्य ‘कंट्रोल फ्रीक’ (Control Freak) हो गया है। वह अपने करियर, अपनी शादी, अपने बच्चों और यहाँ तक कि अपने भविष्य को भी 100% कंट्रोल करना चाहता है। लेकिन जब प्रकृति का एक छोटा सा धक्का लगता है (जैसे बीमारी, आर्थिक मंदी या रिश्तों का टूटना), तो उसका सारा कंट्रोल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है और वह भयानक डिप्रेशन में चला जाता है।

आत्मार्पण स्तुति आधुनिक इंसान के इसी ‘स्ट्रेस’ का सबसे अचूक इलाज है। यह हमें ‘लेट गो’ (Letting Go) का विज्ञान सिखाती है। जब आप अपना कंट्रोल उस परम शक्ति (महादेव) को सौंप देते हैं, तो आप जीवन को एक उत्सव की तरह जीने लगते हैं। आप कर्म पूरे जोश से करते हैं, लेकिन उसके परिणाम को शिव का प्रसाद मानकर सहर्ष स्वीकार करते हैं। यही मानसिक शांति का सबसे बड़ा रहस्य है।

Atmarpana Stuti केवल संस्कृत के 50 श्लोकों का संग्रह नहीं है; यह इंसान की आत्मा का वह चीत्कार है, जो संसार की ठोकरें खाने के बाद परमात्मा की गोद में सुकून तलाशता है। श्री अप्पय दीक्षित ने धतूरे के विष में भी जिस अमृत (शिव प्रेम) को खोज लिया था, वही अमृत इस स्तुति के एक-एक अक्षर में बसा है।

जब भी आपको लगे कि यह दुनिया बहुत स्वार्थी हो गई है, जब अपने ही साथ छोड़ने लगें, और मन पूरी तरह से टूट जाए, तब एकांत में बैठें, अपनी आँखें बंद करें, मस्तक पर भस्म लगाएं और अपने हृदय की गहराइयों से इस आत्मार्पण स्तुति का गान करें। आप पाएंगे कि एक अदृश्य ऊर्जा ने आपको गले लगा लिया है। आपके सारे दुख, सारी चिंताएं धुल जाएंगी और भीतर केवल एक ही ध्वनि गूंजेगी— शिवोऽहम्… शिवोऽहम्… शिवोऽहम्।

सनातन धर्म के इस अनमोल खजाने को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और महादेव की असीम कृपा प्राप्त करें। ॐ नमः शिवाय!

आत्मार्पण स्तुतिः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. आत्मार्पण स्तुति की रचना किसने की थी और इसकी पृष्ठभूमि क्या है?

आत्मार्पण स्तुति की रचना 16वीं शताब्दी के महान शैव दार्शनिक ‘श्री अप्पय दीक्षित’ जी ने की थी। यह जाँचने के लिए कि उनकी शिव भक्ति केवल दिखावा है या उनके अवचेतन मन में भी रची-बसी है, उन्होंने धतूरे (Datura) का विषैला रस पिया था। उस उन्मत्त (बेहोशी और मतिभ्रम) की अवस्था में उनके मुख से जो 50 श्लोक निकले, वही आत्मार्पण स्तुति है।

2. इस स्तुति को ‘उन्मत्त पंचाशती’ क्यों कहा जाता है?

‘उन्मत्त’ का अर्थ है मतिभ्रम या पागलपन की अवस्था (धतूरे के प्रभाव के कारण), और ‘पंचाशती’ का अर्थ है 50 श्लोकों का संग्रह। चूँकि अप्पय दीक्षित जी ने इस स्तुति के 50 श्लोकों की रचना धतूरे के प्रभाव में उन्मत्त अवस्था में की थी, इसलिए इसे ‘उन्मत्त पंचाशती’ भी कहा जाता है।

3. ‘आत्मार्पण’ का आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ क्या है?

‘आत्मार्पण’ का अर्थ है अपना ‘मैं’ (अहंकार/Ego), अपनी इच्छाएं, अपने कर्म और अपना शरीर सब कुछ ईश्वर के चरणों में बिना किसी शर्त के समर्पित कर देना। यह इस भाव को जाग्रत करना है कि “मैं कुछ नहीं हूँ, जो भी है वह केवल शिव है।”

4. आत्मार्पण स्तुति का पाठ करने से सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस स्तुति के पाठ से व्यक्ति का ‘कर्तापन का अहंकार’ (Doership ego) टूट जाता है, जिससे भयंकर मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इसके सस्वर पाठ से करोड़ों जन्मों के पाप कट जाते हैं, मृत्यु का भय खत्म होता है और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

5. आत्मार्पण स्तुति का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन सर्वोत्तम है?

भगवान शिव को समर्पित इस स्तुति का पाठ करने के लिए ‘सोमवार’ (Monday), ‘प्रदोष व्रत’ और ‘मासिक शिवरात्रि’ का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में (सुबह 4 से 6 बजे के बीच) सफेद वस्त्र धारण कर इसका पाठ करना अत्यंत चमत्कारिक फल देता है।

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