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Nirjala Ekadashi 2026: निर्जला एकादशी पर भूलकर भी न करें ये 11 गलतियां, नहीं मिलेगा व्रत का पूरा फलIt takes 12 minutes... to read this article !

सनातन धर्म में ‘निर्जला एकादशी’ (Nirjala Ekadashi) को व्रतों का राजा कहा जाता है। साल भर में आने वाली सभी 24 एकादशियों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी का सबसे अधिक महत्व है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और पूरी निष्ठा के साथ इस एक दिन का निर्जल व्रत रख लेता है, उसे पूरे वर्ष की एकादशियों का पुण्य एक साथ मिल जाता है। इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहा जाता है, क्योंकि महर्षि वेदव्यास के कहने पर महाबली भीम ने भी बिना अन्न-जल ग्रहण किए इस महाकठिन व्रत को किया था।

साल 2026 में निर्जला एकादशी का पर्व अत्यधिक पवित्र और फलदायी होने वाला है। भयंकर गर्मी के मौसम में बिना पानी पिए पूरे दिन और रात रहना अपने आप में एक कठोर तपस्या है। लेकिन, शास्त्रों के अनुसार, जितना बड़ा यह व्रत है, इसके नियम भी उतने ही कड़े हैं।

कई बार श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से व्रत तो रखते हैं, लेकिन अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे व्रत खंडित हो जाता है और उस तपस्या का कोई पुण्य प्राप्त नहीं होता। अगर आप भी 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो आपको यह अवश्य जानना चाहिए कि Nirjala Ekadashi 2026 पर भूलकर भी न करें ये 11 गलतियां, नहीं मिलेगा व्रत का पूरा फल

इस विस्तृत लेख में हम उन 11 महा-गलतियों, व्रत के कड़े नियमों और शास्त्रों में बताए गए निषेध कार्यों पर गहराई से चर्चा करेंगे, ताकि आपकी पूजा 100% सफल हो सके।

1. भूलकर भी न करें जल का सेवन (Drinking Water)

निर्जला एकादशी के व्रत का सबसे मुख्य नियम ही यह है कि इसमें जल (पानी) की एक बूंद भी गले के नीचे नहीं जानी चाहिए।

  • गलती: कई बार लोग गर्मी से घबराकर कुल्ला करते समय या आचमन करते समय बहुत सारा पानी पी लेते हैं, या बार-बार पानी से मुंह धोते समय अनजाने में पानी निगल लेते हैं।

  • शास्त्रों का नियम: इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय (पारण मुहूर्त) तक पानी पीना पूर्णतः वर्जित है। पूजा के दौरान ‘आचमन’ (हथेली में एक बूंद जल लेकर उसे ग्रहण करना) की अनुमति है, लेकिन वह जल एक बूंद (राई के दाने के बराबर) से अधिक नहीं होना चाहिए। जानबूझकर या लापरवाही से पानी पीने पर यह व्रत वहीं टूट जाता है।

2. चावल पकाना या खाना (Consuming or Cooking Rice)

एकादशी के दिन चावल खाना सबसे बड़ा पाप माना गया है, और निर्जला एकादशी पर तो इसके नियम और भी सख्त हो जाते हैं।

  • गलती: जो लोग व्रत नहीं रख रहे हैं, वे अक्सर घर में चावल पका लेते हैं। व्रत करने वाले व्यक्ति का चावल को छूना या परिवार के अन्य सदस्यों का एकादशी के दिन घर में चावल पकाना भी अशुभ माना जाता है।

  • पौराणिक कारण: महर्षि मेधा के शरीर के अंश धरती पर गिरे थे, जिनसे चावल (धान) और जौ की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए चावल को जीव का रूप माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से अगले जन्म में रेंगने वाले जीव (जैसे कीड़े या सांप) की योनि मिलती है। इस दिन घर में चावल पूर्ण रूप से वर्जित होने चाहिए।

3. एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना (Plucking Tulsi Leaves)

भगवान विष्णु की कोई भी पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी है, लेकिन निर्जला एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को लेकर एक बहुत बड़ी गलती अक्सर लोग कर बैठते हैं।

  • गलती: पूजा के समय या सुबह उठकर ताजे तुलसी के पत्ते तोड़ना।

  • शास्त्रों का नियम: हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सभी एकादशियों के दिन माता तुलसी स्वयं भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। ऐसे में यदि हम एकादशी के दिन उनके पत्ते तोड़ते हैं, तो उन्हें कष्ट होता है और उनका व्रत टूट जाता है। इससे भगवान विष्णु अत्यंत क्रोधित होते हैं। पूजा के लिए हमेशा दशमी तिथि (एक दिन पहले) को ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लेने चाहिए। तुलसी कभी बासी नहीं होती।

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4. तामसिक भोजन घर में लाना या बनाना (Tamasic Food)

भले ही आप निर्जला एकादशी का व्रत कर रहे हों, लेकिन आपके घर के बाकी सदस्यों के खान-पान का असर भी आपके व्रत के वातावरण पर पड़ता है।

  • गलती: व्रत करने वाले के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों का घर में प्याज, लहसुन, अंडा, मांस या मदिरा (शराब) का सेवन करना।

  • शास्त्रों का नियम: एकादशी के दिन घर का पूरा वातावरण सात्विक होना चाहिए। तामसिक भोजन में राक्षसी प्रवृत्ति का वास होता है। यदि घर के किसी कोने में भी तामसिक भोजन बन रहा है, तो उस घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास नहीं होता। इस दिन सभी को शुद्ध शाकाहारी और सात्विक भोजन ही करना चाहिए।

5. दिन या रात में सोना (Sleeping During the Day or Night)

निर्जला एकादशी केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, यह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण (तपस्या) करने का दिन है।

  • गलती: गर्मी और कमजोरी का बहाना बनाकर दिन के समय बिस्तर पर सो जाना, या रात के समय पूरी नींद लेना।

  • शास्त्रों का नियम: एकादशी के दिन दोपहर में सोना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। इससे व्रत का फल आधा हो जाता है। इसके अलावा, एकादशी की रात को ‘जागरण’ (Night Vigil) करने का विधान है। पूरी रात भगवान श्री हरि विष्णु के भजन, कीर्तन और मंत्रों का जाप करना चाहिए। जो व्यक्ति निर्जला एकादशी की रात सो जाता है, वह इस व्रत के दिव्य फलों से वंचित रह जाता है। (बीमार और वृद्ध लोग अपनी क्षमतानुसार आराम कर सकते हैं)।

6. क्रोध करना, झूठ बोलना या अपशब्द कहना (Getting Angry or Lying)

व्रत का अर्थ केवल शरीर का उपवास नहीं, बल्कि मन का भी उपवास (Upavas) है। उपवास का अर्थ है ईश्वर के समीप वास करना।

  • गलती: प्यास और भूख के कारण चिड़चिड़ा होकर परिवार वालों पर गुस्सा करना, बच्चों पर चिल्लाना, या किसी की चुगली (Gossip) करना।

  • शास्त्रों का नियम: श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, क्रोध से भ्रम पैदा होता है और बुद्धि का नाश होता है। यदि आप निर्जला व्रत रखकर भी मन में दूसरों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या क्रोध पालते हैं, या अपशब्द (गाली) बोलते हैं, तो आपका व्रत पूरी तरह निष्फल (Zero) हो जाता है। इस दिन पूर्ण रूप से ‘मौन’ का पालन करना या केवल भगवान का नाम लेना सर्वोत्तम है।

7. ब्रह्मचर्य का पालन न करना (Not Following Celibacy)

एकादशी का व्रत आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाता है। शारीरिक इच्छाओं पर विजय पाना इसका मुख्य उद्देश्य है।

  • गलती: व्रत के दिन या दशमी की रात को शारीरिक संबंध बनाना या मन में कामुक विचार लाना।

  • शास्त्रों का नियम: निर्जला एकादशी के नियम दशमी तिथि (एक दिन पहले) की सूर्यास्त से ही लागू हो जाते हैं। दशमी की रात से लेकर द्वादशी की सुबह व्रत पारण करने तक पूर्ण रूप से ‘ब्रह्मचर्य’ (Celibacy) का पालन करना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर महापाप लगता है और व्यक्ति कई जन्मों तक कष्ट भोगता है।

8. बाल, नाखून काटना या शेविंग करना (Cutting Hair/Nails or Shaving)

व्रत के दिनों में शरीर की साफ-सफाई जरूरी है, लेकिन कुछ कार्य शास्त्रों में निषेध हैं।

  • गलती: एकादशी के दिन सैलून जाना, दाढ़ी बनाना, बाल काटना या महिलाओं का बाल धोना और नाखून काटना।

  • शास्त्रों का नियम: हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन बाल और नाखून काटने से घर में दरिद्रता (Poverty) आती है। ग्रह दोष उत्पन्न होते हैं और माता लक्ष्मी रूठ कर चली जाती हैं। ये सभी कार्य एकादशी से एक दिन पहले ही कर लेने चाहिए।

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9. नमक और मसाले का सेवन (Toothpaste/Brushing Mistake)

निर्जला एकादशी में कुछ भी खाना-पीना मना है, लेकिन सुबह की दिनचर्या में लोग अक्सर एक बड़ी भूल कर देते हैं।

  • गलती: एकादशी की सुबह दातून के बजाय केमिकल वाले टूथपेस्ट (Toothpaste) का इस्तेमाल करना, जिसमें कई बार नमक या अन्य अशुद्धियां होती हैं।

  • शास्त्रों का नियम: व्रत के दिन पेड़ की टहनी (जैसे नीम या बबूल की दातून) से या केवल साफ पानी से कुल्ला करके उंगली से दांत साफ करने चाहिए। टूथपेस्ट गले के नीचे जाने की संभावना रहती है, जिससे अनजाने में अन्न या रसायनों का दोष लग सकता है और व्रत टूट सकता है।

10. दान न करना (Not Giving Charity/Donation)

कोई भी व्रत दान-दक्षिणा के बिना पूर्ण नहीं माना जाता, और निर्जला एकादशी तो मुख्य रूप से जल-दान का पर्व है।

  • गलती: केवल अपनी भूख-प्यास सहकर व्रत पूरा मान लेना और किसी जरूरतमंद को कुछ भी दान न करना।

  • शास्त्रों का नियम: इस दिन भीषण गर्मी होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि निर्जला एकादशी के दिन जल से भरा हुआ मिट्टी का कलश (मटका), हाथ का पंखा, छाता (Umbrella), खरबूजा, तरबूज, और सत्तू का दान करना ‘महादान’ के बराबर है। जो व्यक्ति इस दिन प्यासों को पानी पिलाता है, उसके पितरों को स्वर्ग में तृप्ति मिलती है। बिना दान किए व्रत का केवल 50% फल ही मिलता है।

11. गलत समय पर व्रत का पारण करना (Breaking the Fast at the Wrong Time)

व्रत को शुरू करने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसे सही समय पर खोलना (पारण करना) होता है।

  • गलती: द्वादशी के दिन सुबह उठते ही किसी भी समय पानी पी लेना या भोजन कर लेना।

  • शास्त्रों का नियम: एकादशी व्रत का पारण हमेशा ‘द्वादशी तिथि’ को सूर्योदय के बाद एक विशेष शुभ मुहूर्त में किया जाता है। एक नियम यह भी है कि पारण ‘हरि वासर’ (द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि) के दौरान नहीं करना चाहिए। हरि वासर में व्रत खोलना घोर पाप माना जाता है। हमेशा पंचांग में दिए गए पारण मुहूर्त (Parana Time) के अनुसार, पहले ब्राह्मण को दान-भोजन देकर, फिर भगवान के चरणामृत से ही अपना व्रत खोलना चाहिए।

निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts)

आपके व्रत को सरल और सफल बनाने के लिए यहाँ एक संक्षिप्त तालिका (Table) दी गई है:

निर्जला एकादशी पर क्या करें (Do’s) निर्जला एकादशी पर क्या न करें (Don’ts)
दशमी की रात से ही सात्विक जीवन शैली अपनाएं। घर में भूलकर भी चावल, प्याज़, लहसुन या मांस न पकाएं।
प्यासों को पानी पिलाएं और मिट्टी के घड़े का दान करें। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते बिल्कुल न तोड़ें।
रात में जागकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करें। दिन के समय या रात में गहरी नींद न सोएं।
पारण के समय ब्राह्मणों को भोजन या सीधा (कच्चा अन्न) दें। क्रोध न करें और किसी की चुगली या बुराई न करें।
भगवान विष्णु और शालिग्राम का पंचामृत से अभिषेक करें। व्रत के दिन बाल, नाखून न काटें और शेविंग न करें।
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अगर गलती से व्रत का नियम टूट जाए तो क्या करें? (What to do if a mistake happens?)

इंसान गलतियों का पुतला है। कई बार हम न चाहते हुए भी (जैसे भूलवश पानी पी लेना, या कुल्ला करते समय पानी गले में चले जाना) व्रत का नियम तोड़ देते हैं। यदि ऐसा हो जाए तो घबराएं नहीं।

शास्त्रों में प्रायश्चित का भी विधान है:

  1. क्षमा याचना: उसी क्षण भगवान विष्णु और माता एकादशी से हाथ जोड़कर सच्चे मन से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगें।

  2. व्रत जारी रखें: यदि पानी पी लिया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अब आप भोजन भी कर लें। अपने व्रत को (जल के साथ) पूरा करें।

  3. प्रायश्चित दान: द्वादशी के दिन जब व्रत खोलें, तो अपनी क्षमता के अनुसार किसी गरीब या ब्राह्मण को अतिरिक्त अन्न और जल का दान करें और गौ माता को चारा खिलाएं। भगवान भाव के भूखे हैं, वे आपकी अनजाने में की गई गलती को क्षमा कर देते हैं।

आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Spiritual & Scientific Angle)

निर्जला एकादशी केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है; इसके पीछे गहरा विज्ञान भी छिपा है।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: जून (ज्येष्ठ) की भीषण गर्मी में ‘ड्राई फास्टिंग’ (Dry Fasting) करना शरीर के पाचन तंत्र (Digestive system) को पूरी तरह से विश्राम देता है। यह शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स (Toxins) को बाहर निकालता है और ‘ऑटोफैगी’ (Autophagy) की प्रक्रिया को तेज करता है, जिससे नई कोशिकाओं का निर्माण होता है।

  • आध्यात्मिक दृष्टिकोण: जब इंसान को भयंकर प्यास लगती है और फिर भी वह जल ग्रहण नहीं करता, तो उसका अहंकार (Ego) टूट जाता है। उसे महसूस होता है कि प्रकृति और ईश्वर के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है। यह व्रत आत्मा को परिष्कृत (Purify) करता है और बैकुंठ प्राप्ति का मार्ग खोलता है।

निर्जला एकादशी का व्रत एक तपस्या है, और किसी भी तपस्या की सफलता उसके नियमों के कठोर पालन पर निर्भर करती है। साल 2026 में जब आप यह व्रत रखें, तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि Nirjala Ekadashi 2026 पर भूलकर भी न करें ये 11 गलतियां

शारीरिक रूप से प्यासा रहना आसान हो सकता है, लेकिन मन को क्रोध, ईर्ष्या और लोभ से प्यासा रखना (दूर रखना) ही इस व्रत का असली उद्देश्य है। भगवान विष्णु को दिखावा नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और निष्ठा प्रिय है। दशमी तिथि से लेकर द्वादशी के पारण तक इन 11 नियमों का पालन करें, और विश्वास रखें कि आपकी इस कठिन तपस्या का फल आपको पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के बराबर अवश्य प्राप्त होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. निर्जला एकादशी में अगर प्यास बर्दाश्त न हो तो क्या करें?

यह व्रत पूर्णतः निर्जल है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति की तबियत बहुत अधिक बिगड़ने लगे, चक्कर आएं या प्राण संकट में हों, तो वह आचमनी (पूजा के छोटे चम्मच) से एक घूंट जल ग्रहण कर सकता है। शास्त्रों में प्राण रक्षा को सबसे ऊपर रखा गया है।

2. क्या निर्जला एकादशी पर पानी से स्नान कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। इस दिन स्नान करने की कोई मनाही नहीं है। भीषण गर्मी के कारण आप दिन में दो बार (सुबह और शाम) ठंडे पानी से स्नान कर सकते हैं, इससे शरीर को राहत मिलती है। बस ध्यान रखें कि स्नान करते समय पानी मुंह के अंदर न जाए।

3. निर्जला एकादशी के दिन क्या गर्भवती महिलाएं व्रत रख सकती हैं?

गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों और छोटे बच्चों को निर्जला (बिना पानी का) व्रत नहीं रखना चाहिए। वे फल, दूध और पानी का सेवन करते हुए फलाहारी एकादशी का व्रत कर सकते हैं। भगवान स्वास्थ्य को हानि पहुंचाकर की गई पूजा से प्रसन्न नहीं होते।

4. क्या निर्जला एकादशी के दिन दातून कर सकते हैं?

आप पेड़ की प्राकृतिक दातून (जैसे नीम) का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन इस बात का अत्यधिक ध्यान रखना होगा कि दातून का अर्क या कुल्ले का पानी गले के नीचे (पेट में) न जाए।

5. निर्जला एकादशी का व्रत कब से कब तक माना जाता है?

यह व्रत दशमी तिथि की शाम (सूर्यास्त के बाद) से शुरू हो जाता है, जब आपको अन्न और भारी भोजन त्याग देना चाहिए। एकादशी के सूर्योदय से निर्जल व्रत शुरू होता है, जो अगले दिन (द्वादशी) के सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त में पारण करने तक चलता है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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