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सावन 2026 के Mangla Gauri Vrat कब हैं? विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्वIt takes 16 minutes... to read this article !

हिंदू धर्म में सावन (श्रावण) का महीना अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पूरा मास भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए समर्पित होता है। जिस प्रकार सावन के सोमवार का विशेष महत्व है, उसी प्रकार सावन के प्रत्येक मंगलवार को किया जाने वाला मंगला गौरी व्रत (Mangla Gauri Vrat) भी बहुत ही मंगलकारी और फलदायी माना जाता है। विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद लेकर आता है। वहीं, अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं।

वर्ष 2026 में सावन का महीना और मंगला गौरी व्रत कब-कब पड़ रहे हैं, पूजा की विधि क्या है, इसका पौराणिक महत्व और व्रत कथा क्या है—इन सभी विषयों पर हम इस लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे। यह 100% सटीक और नवीनतम जानकारी पर आधारित है ताकि आप 2026 में पूरे विधि-विधान के साथ माता मंगला गौरी की उपासना कर सकें।

1. मंगला गौरी व्रत क्या है? (What is Mangla Gauri Vrat?)

‘मंगला’ माता पार्वती का ही एक स्वरूप है, जो मंगल (कल्याण) करने वाली हैं। सावन माह में पड़ने वाले हर मंगलवार को माता पार्वती के इसी मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। यह व्रत मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है। नवविवाहित महिलाएं विवाह के बाद पहले सावन से इस व्रत की शुरुआत करती हैं और इसे लगातार पांच सालों तक करने का विधान है। हालांकि, कोई भी विवाहित महिला अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए इस व्रत को जीवन भर कर सकती है।

शास्त्रों के अनुसार, जिस तरह सावन सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, उसी तरह सावन का मंगलवार माता पार्वती (गौरी) को समर्पित है। भगवान शिव और माता पार्वती को एक साथ प्रसन्न करने का यह सबसे उत्तम अवसर होता है। जो महिला सच्चे मन से मंगला गौरी व्रत रखती है, माता पार्वती उसके वैवाहिक जीवन के सभी कष्टों को हर लेती हैं।

2. मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथियां (Mangla Gauri Vrat 2026 Dates)

भारत में पंचांग के अनुसार सावन महीने की शुरुआत अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर होती है। उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर (Purnimant Calendar) का पालन किया जाता है, जबकि पश्चिम और दक्षिण भारत में अमांत कैलेंडर (Amanta Calendar) माना जाता है। इसी कारण से मंगला गौरी व्रत की तिथियों में भी 15 दिनों का अंतर आ जाता है। आइए दोनों कैलेंडरों के अनुसार 2026 की तिथियों को समझते हैं।

उत्तर भारत (पूर्णिमांत कैलेंडर) के अनुसार 2026 की तिथियां

(उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए)

वर्ष 2026 में उत्तर भारत में सावन माह की शुरुआत 30 जुलाई 2026 (गुरुवार) से हो रही है और इसका समापन 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को होगा। इस दौरान कुल चार मंगला गौरी व्रत पड़ेंगे:

व्रत का क्रम दिनांक (Date) वार (Day)
पहला मंगला गौरी व्रत 4 अगस्त 2026 मंगलवार
दूसरा मंगला गौरी व्रत 11 अगस्त 2026 मंगलवार
तीसरा मंगला गौरी व्रत 18 अगस्त 2026 मंगलवार
चौथा मंगला गौरी व्रत 25 अगस्त 2026 मंगलवार

दक्षिण और पश्चिम भारत (अमांत कैलेंडर) के अनुसार 2026 की तिथियां

(गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु के लिए)

इन राज्यों में सावन महीने की शुरुआत 13 अगस्त 2026 (गुरुवार) से होगी और समापन 11 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को होगा। यहाँ भी चार मंगला गौरी व्रत रखे जाएंगे:

व्रत का क्रम दिनांक (Date) वार (Day)
पहला मंगला गौरी व्रत 18 अगस्त 2026 मंगलवार
दूसरा मंगला गौरी व्रत 25 अगस्त 2026 मंगलवार
तीसरा मंगला गौरी व्रत 1 सितंबर 2026 मंगलवार
चौथा मंगला गौरी व्रत 8 सितंबर 2026 मंगलवार

3. मंगला गौरी व्रत में “16 अंक” का रहस्य और महत्व

मंगला गौरी व्रत में ’16’ अंक (Number 16) का विशेष महत्व होता है। हिंदू धर्म में सोलह श्रृंगार, सोलह कलाएं और सोलह संस्कार बताए गए हैं। माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस व्रत में अर्पित की जाने वाली हर पूजा सामग्री 16 की संख्या में होनी चाहिए। इससे माता गौरी अति प्रसन्न होती हैं।

16 की संख्या में उपयोग होने वाली सामग्री:

  • 16 प्रकार के फूल (Flowers)

  • 16 प्रकार के फल (Fruits)

  • 16 पान के पत्ते (Betel Leaves)

  • 16 लौंग और इलायची (Cloves & Cardamom)

  • 16 चूड़ियां और 16 श्रृंगार की वस्तुएं (Bangles and Makeup items)

  • आटे का दीपक (जिसमें 16 बत्तियां लगाई जाती हैं)

  • 16 लड्डू या मिठाइयां (Sweets)

  • 16 सुहागिन महिलाओं को प्रसाद बाँटना

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4. मंगला गौरी व्रत की संपूर्ण पूजा सामग्री (Puja Samagri List)

पूजा शुरू करने से पहले आपके पास निम्नलिखित सामग्रियां होनी चाहिए:

  1. माता मंगला गौरी (पार्वती जी) और भगवान शिव की मूर्ति या चित्र।

  2. चौकी, उस पर बिछाने के लिए लाल और सफेद रंग का साफ कपड़ा।

  3. आटे से बना 16 बत्तियों वाला चौमुखी दीपक।

  4. गाय का शुद्ध घी और रुई की बत्तियां।

  5. कलश, जल, गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)।

  6. मौली (कलावा), रोली, सिंदूर, हल्दी, कुमकुम, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)।

  7. 16 प्रकार के ताजे फूल, फूलों की माला और बेलपत्र।

  8. माता के लिए 16 श्रृंगार का सामान (सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, आलता, चूड़ियां, चुनरी आदि)।

  9. 16 पान के पत्ते, 16 सुपारी, 16 लौंग, 16 इलायची।

  10. नैवेद्य (भोग) के लिए 16 लड्डू, फल और मिष्ठान।

  11. कपूर, धूपबत्ती, और आरती की थाली।

  12. मंगला गौरी व्रत कथा की पुस्तक।

5. मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि (Detailed Puja Vidhi)

मंगला गौरी का व्रत बेहद निष्ठा और पवित्रता के साथ किया जाता है। यदि आप 2026 में यह व्रत रख रही हैं, तो इस पूजा विधि का पालन करें:

प्रात:कालीन संकल्प और तैयारी

  • मंगलवार की सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सूर्य उदय से पहले) उठकर स्नान करें।

  • स्वच्छ और कोरे वस्त्र पहनें। विवाहित महिलाएं लाल, गुलाबी या पीले रंग के वस्त्र (साड़ी या सूट) पहनें और पूरा श्रृंगार करें। काला और सफेद रंग पहनने से बचें।

  • पूजा घर की साफ-सफाई करें और हाथ में थोड़ा सा जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे माता गौरी, मैं अपने पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और संतान सुख के लिए आज आपका मंगला गौरी व्रत कर रही हूँ। कृपया मेरे व्रत को सफल बनाएं।”

पूजा मंडप और चौकी की स्थापना

  • घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में एक लकड़ी की चौकी रखें।

  • चौकी के आधे हिस्से पर लाल कपड़ा (माता गौरी के लिए) और आधे हिस्से पर सफेद कपड़ा (भगवान शिव के लिए) बिछाएं।

  • सफेद कपड़े पर चावल (अक्षत) की नौ ढेरियाँ बनाकर नवग्रह स्थापित करें और लाल कपड़े पर गेहूं की सोलह ढेरियाँ बनाकर षोडश मातृका बनाएं।

  • चौकी के एक तरफ कलश की स्थापना करें। कलश में जल, सिक्का, सुपारी डालें और उसके ऊपर आम के पत्ते रखकर नारियल स्थापित करें।

मुख्य पूजा प्रक्रिया

  1. गणपति आवाहन: किसी भी पूजा की शुरुआत भगवान गणेश से होती है। सबसे पहले गौरी-गणेश का आवाहन करें और उन्हें स्नान कराकर रोली, अक्षत, फूल और दूर्वा अर्पित करें।

  2. माता मंगला गौरी की पूजा: माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र को चौकी पर स्थापित करें। यदि मिट्टी की मूर्ति हो तो और भी उत्तम है।

  3. स्नान और वस्त्र: माता को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। फिर उन्हें लाल चुनरी या वस्त्र अर्पित करें।

  4. सोलह श्रृंगार अर्पण: माता को कुमकुम का तिलक लगाएं। इसके बाद सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी आदि 16 श्रृंगार का सामान माता के चरणों में अर्पित करें।

  5. दीप प्रज्वलन: आटे का एक चौमुखी दीपक बनाएं (जिसमें 16 रुई की बत्तियां हों) और उसे शुद्ध घी से जलाएं। यह दीपक पूजा के दौरान बुझना नहीं चाहिए।

  6. 16 सामग्री का भोग: माता को 16 फूल, 16 पान, 16 लौंग, 16 इलायची और 16 प्रकार के फलों का भोग लगाएं।

  7. कथा श्रवण: हाथ में फूल और अक्षत लेकर मंगला गौरी व्रत की कथा पूरे भक्ति भाव से पढ़ें या सुनें (कथा नीचे दी गई है)।

  8. आरती और क्षमा याचना: कथा समाप्त होने के बाद 16 बत्तियों वाले दीपक या कपूर से माता की आरती करें। अंत में पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।

6. मंगला गौरी व्रत कथा (Mangla Gauri Vrat Katha)

किसी भी व्रत का पूरा फल तब तक नहीं मिलता, जब तक उसकी व्रत कथा न पढ़ी या सुनी जाए। मंगला गौरी व्रत की प्राचीन और प्रामाणिक कथा इस प्रकार है:

प्राचीन काल में कुरु देश में श्रुतकीर्ति (कुछ कथाओं में इनका नाम सेठ धर्मपाल बताया गया है) नामक एक बहुत ही धनवान और धर्मनिष्ठ व्यापारी रहता था। उसके पास धन-संपत्ति, मान-सम्मान किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। उसका जीवन सुखमय था, लेकिन उसके मन में एक बड़ा दुख था—उसे कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए सेठ और उसकी पत्नी ने वर्षों तक कठोर तपस्या की और देवी भगवती की आराधना की।

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उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। सेठ ने संतान सुख की मांग की। माता ने कहा, “तुम्हें पुत्र तो प्राप्त होगा, लेकिन वह अल्पायु होगा। तुम्हारे पुत्र की आयु केवल 16 वर्ष होगी। 16वें वर्ष में सांप के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी।”

यह सुनकर सेठ और उसकी पत्नी बहुत दुखी हुए, लेकिन ‘होनहार’ को कौन टाल सकता है! समय आने पर सेठ की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। सेठ ने उसका नाम ‘चिरायु’ (कुछ जगहों पर नाम शिव बताया गया है) रखा। चिरायु बहुत ही गुणवान और संस्कारी था। सेठ को हमेशा डर सताता रहता था कि 16 वर्ष पूरे होते ही उसका पुत्र उसे छोड़कर चला जाएगा।

जब चिरायु 15 वर्ष का हुआ, तो सेठ ने सोचा कि क्यों न इसका विवाह कर दिया जाए, ताकि शायद इसके भाग्य में कुछ बदलाव आ सके। सेठ ने एक योग्य कन्या की तलाश शुरू की। जल्द ही उन्हें एक सुंदर और संस्कारी कन्या मिल गई। उस कन्या की माता मंगला गौरी की परम भक्त थी और वह हर सावन के मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत पूरे विधि-विधान से करती थी।

कन्या की माता के व्रत के प्रभाव से उस कन्या को माता पार्वती से यह वरदान मिला था कि वह कभी विधवा नहीं होगी, उसे अखंड सौभाग्य प्राप्त होगा। सेठ धर्मपाल को जब यह बात पता चली, तो उसने तुरंत अपने बेटे का विवाह उस कन्या से करा दिया।

विवाह के बाद, जब चिरायु अपने 16वें वर्ष में प्रवेश कर गया, तो एक रात वह सो रहा था। नियति के अनुसार, उसे डसने के लिए एक जहरीला सांप आया। लेकिन उसकी पत्नी (कन्या) ने मंगला गौरी का व्रत रखा हुआ था और माता पार्वती की कृपा से वह जाग रही थी। उसने सांप को देखा और तुरंत एक बर्तन में दूध भरकर सांप के सामने रख दिया। सांप ने दूध पिया और वह कन्या द्वारा रखे गए एक खाली कलश में जाकर बैठ गया। कन्या ने तुरंत उस कलश का मुंह कपड़े से बांध दिया।

अगली सुबह जब कन्या की आंख खुली तो उसने देखा कि सांप कलश के अंदर मर चुका था और एक सुंदर नौलखा हार बन गया था। इस प्रकार, माता मंगला गौरी के व्रत और कन्या के अखंड सौभाग्य के वरदान के कारण चिरायु की मृत्यु टल गई। उसके भाग्य में जो अल्पायु का योग था, वह माता पार्वती की कृपा से दीर्घायु में बदल गया।

सेठ धर्मपाल और उसके परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। उन्होंने अपनी बहू के व्रत की महिमा को पहचाना और तब से पूरे नगर में मंगला गौरी व्रत की महिमा फैल गई। जो भी महिला इस कथा को सुनती है और सच्चे मन से मंगला गौरी का व्रत करती है, माता पार्वती उसके सुहाग की रक्षा करती हैं और उसके परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

(कथा समाप्त होने के बाद माता पार्वती और भगवान शिव के जयकारे लगाएं: बोलिए माता पार्वती की जय! शिव शंकर भगवान की जय!)

7. विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व (Significance for Married Women)

मंगला गौरी व्रत को हिंदू धर्म में ‘अखंड सौभाग्य’ का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए इस व्रत का महत्व करवा चौथ और हरतालिका तीज के समान ही फलदायी है।

  1. पति की दीर्घायु (Long Life of Husband): जिस तरह कथा में कन्या के व्रत से उसके पति की मृत्यु टल गई थी, उसी तरह यह मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति पर आने वाले सभी संकट, अकाल मृत्यु का भय और रोग दूर हो जाते हैं।

  2. वैवाहिक जीवन में मधुरता (Happy Marital Life): अगर पति-पत्नी के बीच अनबन रहती है, क्लेश होता है या वैवाहिक जीवन में तनाव है, तो माता गौरी की आराधना से प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।

  3. संतान सुख (Blessings for Children): जिन महिलाओं को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है, उन्हें सावन के मंगलवार को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। माता पार्वती की कृपा से उन्हें स्वस्थ और संस्कारी संतान की प्राप्ति होती है।

  4. पारिवारिक शांति (Family Peace): इस व्रत के प्रभाव से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। दरिद्रता दूर होती है और परिवार में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

8. अविवाहित कन्याओं के लिए मंगला गौरी व्रत का महत्व

ऐसा नहीं है कि यह व्रत केवल विवाहित महिलाएं ही कर सकती हैं। अविवाहित लड़कियों के लिए भी यह व्रत चमत्कारिक लाभ देने वाला है:

  1. मनचाहा जीवनसाथी (Desired Husband): माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। अविवाहित कन्याएं अच्छे, योग्य और समझदार वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं।

  2. विवाह में आ रही बाधाएं दूर करना: यदि किसी कन्या के विवाह में लगातार देरी हो रही हो, रिश्ते आकर टूट जाते हों, तो मंगला गौरी व्रत करने से विवाह के योग जल्दी बनते हैं।

  3. मांगलिक दोष शांति (Manglik Dosh Shanti): ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन कन्याओं की कुंडली में ‘मंगल दोष’ होता है, उनके विवाह में कई अड़चनें आती हैं। सावन का मंगलवार मंगल ग्रह और माता गौरी दोनों से जुड़ा है। अतः इस व्रत को करने से मांगलिक दोष का प्रभाव शांत होता है और विवाह पश्चात जीवन सुखमय बनता है।

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9. व्रत के नियम, क्या खाएं और क्या न खाएं (Vrat Niyam & Diet)

मंगला गौरी व्रत में नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। यह व्रत पूर्ण श्रद्धा और शारीरिक व मानसिक पवित्रता की मांग करता है।

व्रत के नियम (Rules to Follow):

  • ब्रह्मचर्य का पालन: सावन माह और विशेष रूप से व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का पूर्णतः पालन करना चाहिए।

  • क्रोध और निंदा से बचें: व्रत के दिन मन को शांत रखें। किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या अपशब्दों का प्रयोग न करें। झूठ बोलने से बचें।

  • एक समय भोजन: यह व्रत फलाहार या एक समय के सात्विक भोजन (सेंधा नमक का उपयोग) पर किया जा सकता है। कई महिलाएं इसे निर्जला (बिना जल के) या सिर्फ फलाहार पर करती हैं।

  • जमीन पर सोना: सावन के महीने में तपस्या का भाव रखते हुए व्रत के दिन जमीन पर चटाई बिछाकर सोना शुभ माना जाता है।

क्या खाएं (Foods Allowed):

  • व्रत के दौरान आप ताजे फल, दूध, दही, मट्ठा, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे का हलवा/पूड़ी खा सकती हैं।

  • मखाने की खीर और मेवे (Dry fruits) का सेवन किया जा सकता है।

  • यदि आप सेंधा नमक खाती हैं, तो एक समय शाम को पूजा के बाद आलू या साबूदाने की खिचड़ी खा सकती हैं।

क्या न खाएं (Strictly Avoid):

  • अन्न (गेहूं, चावल, दाल) का सेवन दिन भर वर्जित होता है (यदि आप पूर्ण फलाहारी व्रत कर रही हैं)।

  • प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और अंडे का सेवन पूरी तरह से वर्जित है।

  • बैंगन, मूली और कटहल जैसी सब्जियों को भी सावन के व्रतों में खाने से बचा जाता है।

  • बाहर का बना हुआ जंक फूड या अशुद्ध भोजन बिल्कुल न खाएं।

10. मंगला गौरी व्रत का उद्यापन (Udyapan Vidhi)

यदि आपने मन्नत ली है कि आप 5 वर्ष या किसी निश्चित समय तक मंगला गौरी व्रत करेंगी, तो उस अवधि के पूरा होने पर उद्यापन (व्रत का समापन अनुष्ठान) करना अनिवार्य है। उद्यापन के बिना व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

  • उद्यापन का समय: श्रावण मास के अंतिम मंगलवार को उद्यापन करना सबसे उत्तम माना जाता है।

  • विधि: उद्यापन के दिन विशेष हवन किया जाता है। माता पार्वती और भगवान शिव का गठबंधन (मौली से) कराया जाता है।

  • ब्राह्मण भोज: 16 ब्राह्मणों और 16 सुहागिन महिलाओं को घर बुलाकर आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है।

  • दान-दक्षिणा: सुहागिन महिलाओं को 16 श्रृंगार का सामान, लाल साड़ी या चुनरी, चूड़ियां, बिंदी और दक्षिणा भेंट करके उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

  • विसर्जन: अगले दिन सुबह (बुधवार को) माता की मिट्टी की मूर्ति (यदि बनाई है) को किसी पवित्र नदी या सरोवर में विसर्जित कर दिया जाता है।

11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यहाँ मंगला गौरी व्रत 2026 से जुड़े 5 प्रमुख प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:

प्रश्न 1: 2026 में सावन का पहला मंगला गौरी व्रत कब है?

उत्तर: उत्तर भारत (पूर्णिमांत कैलेंडर) के अनुसार 2026 में पहला मंगला गौरी व्रत 4 अगस्त 2026, मंगलवार को पड़ेगा। वहीं, दक्षिण और पश्चिम भारत (अमांत कैलेंडर) के अनुसार यह 18 अगस्त 2026 को रखा जाएगा।

प्रश्न 2: मंगला गौरी व्रत किसे करना चाहिए?

उत्तर: यह व्रत विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं द्वारा विवाह के बाद पहले सावन से शुरू किया जाता है। इसके अलावा, कोई भी विवाहित महिला अखंड सौभाग्य के लिए और अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर प्राप्ति व मंगल दोष शांति के लिए इस व्रत को कर सकती हैं।

प्रश्न 3: क्या मंगला गौरी व्रत के दौरान पानी पी सकते हैं?

उत्तर: हाँ, यह पूरी तरह से आपकी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है। ज़्यादातर महिलाएं इसे फलाहार पर करती हैं, जिसमें पानी, जूस और दूध पिया जा सकता है। गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग अपनी सेहत के अनुसार व्रत के नियमों में ढील दे सकते हैं।

प्रश्न 4: मंगला गौरी व्रत में 16 अंक का क्या महत्व है?

उत्तर: माता गौरी को 16 श्रृंगार बहुत प्रिय हैं। इसीलिए इस व्रत में पूजा की हर सामग्री—जैसे 16 चूड़ियां, 16 पान के पत्ते, 16 फूल, 16 मिठाइयां और आटे के दीपक में 16 बत्तियां—अर्पित करने का विधान है। यह पूर्णता और सुहाग का प्रतीक है।

प्रश्न 5: क्या इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी जरूरी है?

उत्तर: बिल्कुल। माता पार्वती की पूजा भगवान शिव के बिना अधूरी मानी जाती है। माता गौरी को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का जलाभिषेक करना और शिव-पार्वती की संयुक्त रूप से पूजा करना मंगला गौरी व्रत का एक अनिवार्य हिस्सा है।

मंगला गौरी व्रत (Mangla Gauri Vrat 2026) केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह माता पार्वती के प्रति अटूट आस्था और समर्पण का प्रतीक है। आधुनिक युग में भी महिलाएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाती हैं। सावन 2026 में आने वाले ये चारों मंगलवार आपके जीवन में सकारात्मकता, स्वास्थ्य और दांपत्य सुख लेकर आएं।

यदि आप भी 2026 में इस व्रत को करने जा रही हैं, तो ऊपर दी गई तिथियों और पूजा विधि का विधिवत पालन करें। सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद माता मंगला गौरी अवश्य पूरी करती हैं। अपने घर-परिवार में प्रेम बनाए रखें और सावन के इस पवित्र महीने में भक्ति भाव में डूबे रहें।

॥ जय मंगला गौरी ॥ ॥ ऊँ नमः शिवाय ॥

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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