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Balaram Jayanti 2026: बलराम जयंती कब है? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और रहस्य | Hal ChhathIt takes 13 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ उनके बड़े भाई दाऊ दयाल यानी भगवान बलराम का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान बलराम को शक्ति, कृषि, समृद्धि और अपार बल का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान बलराम शेषनाग के अवतार थे, जिन्होंने द्वापर युग में श्रीकृष्ण की सहायता और धर्म की स्थापना के लिए माता देवकी के सातवें गर्भ के रूप में आकर रोहिणी के गर्भ से जन्म लिया था।

उनके इसी पावन जन्मोत्सव को ‘बलराम जयंती’ (Balaram Jayanti) के रूप में मनाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को हल छठ (Hal Chhath), ललई छठ (Lalahi Chhath), हर छठ, चंदन षष्ठी, बलदेव छठ और रंधन छठ जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। मुख्य रूप से यह पर्व माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। वहीं, किसान भाई इस दिन भगवान बलराम और उनके मुख्य अस्त्र ‘हल’ (Plough) की पूजा करके अच्छी फसल की कामना करते हैं।

यदि आप भी भगवान दाऊ दयाल के भक्त हैं और जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में बलराम जयंती कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की शास्त्र-सम्मत विधि क्या होनी चाहिए और इस दिन से जुड़ी पौराणिक कथाएं क्या हैं, तो यह विस्तृत और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही है।

वर्ष 2026 में बलराम जयंती (हल छठ) कब है? (Balaram Jayanti 2026 Date)

बलराम जयंती मनाने की तिथियां भारत के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न होती हैं।

  • उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार: भगवान बलराम का जन्म भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। इसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले मनाया जाता है।

  • दक्षिण और पूर्वी भारत (विशेषकर इस्कॉन और ओड़िशा) के अनुसार: भगवान बलराम का जन्मोत्सव श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन के दिन) को मनाया जाता है।

चूंकि उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान) में भाद्रपद कृष्ण षष्ठी का पर्व हल छठ या ललई छठ के रूप में बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है, इसलिए हम वर्ष 2026 में इसी तिथि की विस्तार से चर्चा करेंगे।

Balaram Jayanti 2026 Muhurat (बलराम जयंती 2026 शुभ मुहूर्त तालिका)

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 2 सितंबर 2026 को पड़ रही है। अतः हल छठ या बलराम जयंती 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी।

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time)
बलराम जयंती / हल छठ 2026 की तिथि 2 सितंबर 2026 (बुधवार)
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि का आरंभ 2 सितंबर 2026, प्रातः 04:15 बजे से
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि की समाप्ति 3 सितंबर 2026, प्रातः 05:40 बजे तक
प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:10 बजे से 09:20 बजे तक
गोधूलि बेला (संध्या पूजा) मुहूर्त शाम 06:30 बजे से 07:45 बजे तक

(नोट: सूर्योदय और आपके स्थानीय शहर के पंचांग के अनुसार समय में कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है।)

बलराम जयंती को अन्य किन नामों से जाना जाता है?

भारत विविधताओं का देश है। भगवान बलराम के जन्मोत्सव को क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है:

  1. हल छठ (Hal Chhath): भगवान बलराम का मुख्य अस्त्र ‘हल’ (किसान का हल) है। इसलिए षष्ठी तिथि को पड़ने वाले इस पर्व को ‘हल छठ’ कहा जाता है।

  2. ललई छठ या हर छठ (Lalahi Chhath): उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में माताओं द्वारा बच्चों की सलामती के लिए रखे जाने वाले इस व्रत को ललई छठ कहा जाता है।

  3. बलदेव छठ (Baladeva Chhath): ब्रज मंडल (मथुरा, वृंदावन, गोकुल) में दाऊ जी (बलराम) को बलदेव कहा जाता है, इसलिए इसे बलदेव छठ कहते हैं।

  4. चंदन षष्ठी (Chandan Shashthi): गुजरात और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में इसे चंदन षष्ठी के रूप में मनाया जाता है।

  5. रंधन छठ (Randhan Chhath): कई स्थानों पर इस दिन शीतला माता के लिए भी भोजन पकाया जाता है, जिसे रंधन छठ कहते हैं।

बलराम जयंती का धार्मिक और कृषि महत्व (Significance of Balaram Jayanti)

बलराम जयंती केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है; यह भारतीय संस्कृति के मूल आधार ‘कृषि’ (Agriculture) और ‘मातृत्व’ (Motherhood) का अद्भुत संगम है।

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1. कृषि और किसानों का पर्व (Festival of Farmers)

भगवान बलराम कृषि के आदि-देवता माने जाते हैं। उनका मुख्य अस्त्र ‘हल’ और ‘मूसल’ है, जो सीधे तौर पर खेती और किसानों की मेहनत का प्रतिनिधित्व करता है। हल छठ के दिन किसान अपने हलों, कृषि उपकरणों और बैलों की पूजा करते हैं। इस दिन खेतों में हल चलाना वर्जित माना जाता है। यह पर्व किसानों को उनकी मेहनत का सम्मान देने और अच्छी फसल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करने का अवसर है।

2. माताओं द्वारा संतान के लिए व्रत (Vrat for Children’s Longevity)

माताओं के लिए हल छठ का व्रत अत्यंत कठोर और फलदायी होता है। माताएं इस दिन निर्जला या फलाहारी व्रत रखकर भगवान बलराम से अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अपार बल की कामना करती हैं। मान्यता है कि जो माता इस व्रत को पूरे विधि-विधान से रखती है, उसकी संतान पर कभी कोई संकट नहीं आता और वह बलराम जी के समान बलवान व यशस्वी बनती है।

3. बल और धैर्य का प्रतीक

बलराम जी अत्यंत क्रोधी स्वभाव के माने जाते थे, लेकिन श्री कृष्ण के प्रति उनका प्रेम और धैर्य अतुलनीय था। वे बुराई का नाश करने वाले अपार ‘शारीरिक बल’ का प्रतीक हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से व्यक्ति के भीतर शारीरिक और मानसिक शक्ति का संचार होता है।

भगवान बलराम के जन्म की अद्भुत पौराणिक कथा (The Mythological Story of Sankarshana)

बलराम जयंती के व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब पूजा के समय उनकी जन्म कथा का श्रवण किया जाए। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान बलराम का जन्म एक अत्यंत रहस्यमयी और दिव्य घटना थी।

कंस का अत्याचार और देवकी का सातवां गर्भ

द्वापर युग में मथुरा का राजा कंस अत्यंत अत्याचारी हो गया था। उसने अपने ही पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर राजगद्दी हथिया ली थी। जब कंस अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से कराकर उन्हें विदा कर रहा था, तब आकाशवाणी हुई कि— “हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा काल बनेगा।”

यह सुनकर कंस भयभीत और क्रोधित हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। क्रूर कंस ने एक-एक करके देवकी के छह नवजात पुत्रों को पत्थरों पर पटक कर मार डाला।

जब माता देवकी सातवीं बार गर्भवती हुईं, तो उनके गर्भ में साक्षात भगवान शेषनाग (अनंत) ने प्रवेश किया। कंस इस गर्भ को भी नष्ट करने की योजना बना रहा था। तब भगवान विष्णु ने अपनी ‘योगमाया’ (Yogamaya) को बुलाया।

योगमाया द्वारा गर्भ का संकर्षण (स्थानांतरण)

भगवान विष्णु ने योगमाया को आदेश दिया कि— “हे देवी! तुम मथुरा के कारागार में जाओ और देवकी के सातवें गर्भ (जिसमें शेषनाग हैं) को वहां से निकालकर गोकुल में नंद बाबा के घर रह रही वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित (Transplant) कर दो।”

योगमाया ने ईश्वर की आज्ञा का पालन किया। उन्होंने अपनी माया से देवकी के गर्भ को आकर्षित करके माता रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। मथुरा में यह अफवाह फैल गई कि देवकी का सातवां गर्भ गिर गया है (मिसकैरेज हो गया है)। कंस यह जानकर निश्चिंत हो गया।

बलराम का जन्म और नामकरण

उधर गोकुल में, भाद्रपद कृष्ण षष्ठी के दिन माता रोहिणी ने एक अत्यंत सुंदर, बलवान और गौर वर्ण (सफेद रंग) वाले पुत्र को जन्म दिया।

चूंकि उन्हें देवकी के गर्भ से खींचकर (संकर्षण करके) रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया गया था, इसलिए महर्षि गर्ग ने उनका नाम ‘संकर्षण’ (Sankarshana) रखा। अत्यधिक बलवान होने के कारण वे ‘बलराम’ कहलाए, और हल धारण करने के कारण उन्हें ‘हलधर’ कहा गया।

आगे चलकर बलराम जी ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण के साथ मिलकर पूतना, बकासुर, धेनुकासुर और प्रलम्बासुर जैसे भयंकर राक्षसों का वध किया और महाभारत के युद्ध में तटस्थ रहकर भी धर्म का अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया।

बलराम जयंती (हल छठ) की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

हल छठ का व्रत और पूजा मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि अन्य व्रतों से थोड़ी अलग और विशेष होती है। वर्ष 2026 में 2 सितंबर को नीचे दी गई विधि के अनुसार पूजा करें:

पूजा की तैयारी (Preparations)

  • इस दिन पूजा के लिए एक छोटी सी ‘कुंडी’ (छोटा सा तालाब या गड्ढा) बनाई जाती है। यदि घर में कच्ची मिट्टी की जगह न हो, तो गमले या परात में मिट्टी रखकर उसमें एक छोटा सा तालाब बना लें।

  • उस तालाब के किनारे पलाश (ढाक), कुश (Kusha grass), और कांसी (Kansi) की टहनियां गाड़ दी जाती हैं। इसे भगवान बलराम के प्रतीकात्मक खेत के रूप में माना जाता है।

पूजा की विधि (The Puja Process)

  1. प्रातःकालीन स्नान: व्रत करने वाली माताएं सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. तालाब (कुंडी) की सजावट: बनाए गए छोटे से तालाब (कुंडी) को गाय के गोबर से लीपें।

  3. भगवान बलराम का ध्यान: कुंडी के पास बैठकर भगवान गणेश, माता पार्वती, शिव जी और अंत में भगवान बलराम का ध्यान करें।

  4. अभिषेक और श्रृंगार: प्रतीकात्मक रूप से भगवान बलराम को स्नान कराएं। उन्हें चंदन का तिलक लगाएं और पीले/नीले वस्त्र अर्पित करें (बलराम जी को नीला रंग बहुत प्रिय है)।

  5. विशेष प्रसाद का भोग: हल छठ की पूजा में गाय के दूध या दही का प्रयोग नहीं होता। इस दिन भैंस के दूध, भैंस के घी और भैंस के दही का ही प्रयोग किया जाता है। पूजा में भुने हुए चने, जौ, मक्का, धान का लावा और महुआ (Mahua) का भोग लगाया जाता है।

  6. पसरी का चावल (Tinni Rice): इस दिन विशेष रूप से ‘पसरी’ या ‘तिन्नी का चावल’ (एक जंगली चावल जो बिना जोते उगता है) का प्रसाद बनाया जाता है।

  7. कथा श्रवण: पूजा स्थल पर बैठकर सभी माताएं एक साथ भगवान बलराम के जन्म और हल छठ की पौराणिक कथा सुनें।

  8. आरती और परिक्रमा: कथा समाप्त होने के बाद कपूर से आरती करें और उस पवित्र कुंडी (तालाब) की परिक्रमा करें।

  9. क्षमा प्रार्थना: अंत में हाथ जोड़कर अपनी संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करें और पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।

हल छठ (बलराम जयंती) व्रत के कड़े नियम (Strict Rules of the Vrat)

हल छठ का व्रत अन्य साधारण व्रतों से काफी भिन्न है। इस व्रत में प्रकृति और बिना जोती गई चीजों के उपयोग का विशेष महत्व है। जो माताएं इस व्रत को रखती हैं, उन्हें इन नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

  1. हल से जोती गई चीजों का निषेध: इस व्रत का सबसे बड़ा नियम यह है कि व्रत रखने वाले को कोई भी ऐसा अन्न, फल या सब्जी नहीं खानी चाहिए जिसे हल चलाकर (खेत जोतकर) उगाया गया हो। गेहूं, साधारण चावल, दालें आदि इस दिन वर्जित हैं।

  2. तालाब या जंगल की उपज का प्रयोग: व्रत में केवल वही चीजें खाई जाती हैं जो अपने आप तालाबों, जंगलों या बिना जोते उग आती हैं। जैसे— तिन्नी का चावल (Tinni Rice), महुआ, सिंघाड़ा, मोरधन (सामा के चावल), और तालाब में उगने वाले फल।

  3. गाय के दूध का निषेध: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हल छठ के दिन गाय के दूध, दही या घी का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। इस दिन केवल भैंस के दूध या उससे बनी चीजों का ही प्रयोग किया जाता है।

  4. खेतों में काम न करना: हल छठ के दिन किसानों के लिए खेतों में हल चलाना, कुदाल चलाना या मिट्टी खोदना वर्जित माना जाता है। यह भगवान हलधर को विश्राम देने का दिन है।

  5. ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत के दिन मन, वचन और कर्म से सात्विक रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन करें और किसी की निंदा (Gossip) या चुगली करने से बचें।

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भगवान बलराम के प्रमुख और प्रसिद्ध मंदिर (Famous Temples of Lord Balaram)

यद्यपि भगवान बलराम की पूजा श्रीकृष्ण के साथ ही की जाती है, लेकिन भारत में कुछ ऐसे अत्यंत सिद्ध और प्राचीन मंदिर हैं, जो मुख्य रूप से दाऊ दयाल को समर्पित हैं:

  1. दाऊजी मंदिर, बलदेव (मथुरा): उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में बलदेव (दाऊजी) नामक कस्बे में भगवान बलराम का सबसे विशाल और प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां बलराम जयंती (देवछठ) का मेला बहुत धूमधाम से लगता है। यहां दाऊजी को भांग और माखन का विशेष भोग लगाया जाता है।

  2. श्री जगन्नाथ मंदिर (पुरी, ओडिशा): चार धामों में से एक पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण (जगन्नाथ) के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा की विशाल काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियां विराजमान हैं।

  3. रेवती-बलराम मंदिर (गुजरात): भगवान बलराम की पत्नी का नाम रेवती था। गुजरात के कई हिस्सों में रेवती-बलराम के सुंदर मंदिर स्थापित हैं।

  4. अनंत वासुदेव मंदिर (भुवनेश्वर): यहां भी भगवान बलराम की पूजा अत्यंत भव्य रूप में की जाती है।

Balaram Jayanti 2026 का यह पावन पर्व हमें केवल उपवास रखना नहीं सिखाता, बल्कि यह हमारी जड़ों (Roots), हमारी कृषि प्रधान संस्कृति और मातृशक्ति के समर्पण को दर्शाता है। भगवान बलराम का ‘हल’ यह संदेश देता है कि कड़ी मेहनत और पुरुषार्थ के बिना जीवन की बंजर जमीन पर सफलता की फसल नहीं उगाई जा सकती।

दूसरी ओर, माताओं द्वारा अपनी संतान के लिए रखा गया यह ‘हल छठ’ का कठोर निर्जला व्रत इस बात का प्रतीक है कि एक मां अपने बच्चों की सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए किसी भी कष्ट को सह सकती है।

वर्ष 2026 में 2 सितंबर को आने वाले इस महान पर्व पर आप भी पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ दाऊ दयाल की पूजा करें। भगवान हलधर आपके घर को धन, धान्य, सुख, शांति और आपके बच्चों को उत्तम स्वास्थ्य व अपार बल प्रदान करें, यही हमारी मंगल कामना है।

“बोलो दाऊ दयाल महाराज की जय!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Balaram Jayanti 2026)

1. वर्ष 2026 में बलराम जयंती कब है?

उत्तर: उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में बलराम जयंती (हल छठ या ललई छठ) भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि यानी 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। वहीं इस्कॉन और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में इसे सावन पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन मनाया जाता है।

2. बलराम जयंती को हल छठ (Hal Chhath) क्यों कहते हैं?

उत्तर: भगवान बलराम के मुख्य अस्त्र ‘हल’ (Plough) और ‘मूसल’ हैं। चूंकि यह पर्व भाद्रपद की षष्ठी (छठ) तिथि को मनाया जाता है और इस दिन हल (खेती के उपकरण) की विशेष रूप से पूजा की जाती है, इसलिए इस पर्व को ‘हल छठ’ या ‘हर छठ’ के नाम से जाना जाता है।

3. हल छठ (बलराम जयंती) के व्रत में क्या खाया जाता है?

उत्तर: इस व्रत का सबसे कड़ा नियम यह है कि हल चलाकर उगाई गई कोई भी चीज (जैसे गेहूं, चना, सामान्य चावल) नहीं खाई जाती। व्रत में तिन्नी का चावल (पसरी का चावल), तालाब में उगने वाले सिंघाड़े, महुआ, और बिना जोते उगने वाले कंद-मूल ही खाए जाते हैं। इस दिन गाय के दूध की जगह भैंस के दूध और दही का उपयोग किया जाता है।

4. भगवान बलराम का मुख्य अस्त्र क्या है और यह क्या दर्शाता है?

उत्तर: भगवान बलराम का मुख्य अस्त्र ‘हल’ (Plough) है। यह केवल एक युद्ध का हथियार नहीं है, बल्कि यह कृषि, उर्वरता (Fertility) और किसानों की कड़ी मेहनत का प्रतीक है। हल इस बात का संकेत है कि मनुष्य को अपनी मेहनत से समाज का भरण-पोषण करना चाहिए। जब असुरों का नाश करना होता है, तब यही हल एक भयंकर अस्त्र बन जाता है।

5. भगवान बलराम किसके अवतार थे?

उत्तर: पौराणिक कथाओं और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान बलराम साक्षात ‘शेषनाग’ (अनंत) के अवतार थे। जिस प्रकार त्रेता युग में भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में शेषनाग अवतरित हुए थे, उसी प्रकार द्वापर युग में श्रीकृष्ण की सेवा और सहायता के लिए वे बड़े भाई ‘बलराम’ के रूप में अवतरित हुए।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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