Home Blog

Randhan Chhath 2026 Date: रांधण छठ कब है? जानिए महत्व, पूजा विधि और शीतला सातम की खास तैयारीIt takes 13 minutes... to read this article !

भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले व्रत और त्योहार केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका सीधा संबंध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, स्वास्थ्य और हमारे दैनिक जीवन के अनुशासन से होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार ऐसे ही अनूठे और विशिष्ट त्योहारों में से एक है— ‘रांधण छठ’ (Randhan Chhath)

यह पर्व मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों में অত্যন্ত उल्लास और गहरी आस्था के साथ मनाया जाता है। ‘रांधण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘भोजन पकाना’ (Cooking)। यह पर्व ‘शीतला सातम’ (Sheetala Satam) या ‘बासौड़ा’ से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। शीतला सातम के दिन घर में चूल्हा (अग्नि) जलाना पूर्णतः वर्जित होता है, इसलिए सातम के लिए सारा भोजन (नैवेद्य और परिवार के लिए खाना) रांधण छठ के दिन ही पकाया जाता है।

इस विस्तृत और शोधपरक लेख में हम जानेंगे कि वर्ष 2026 में रांधण छठ कब है, इस पर्व का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है, महिलाएं इस दिन शीतला सप्तमी की तैयारी कैसे करती हैं, और इस दिन चूल्हे (गैस स्टोव) की पूजा का क्या विधान है।

1. वर्ष 2026 में रांधण छठ कब है? (Randhan Chhath 2026 Date)

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शीतला माता का पूजन दो अलग-अलग समय पर किया जाता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह पर्व चैत्र मास (होली के बाद) में आता है, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य पश्चिमी राज्यों में यह पर्व श्रावण (सावन) मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी (छठ) और सप्तमी (सातम) को कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक पहले मनाया जाता है।

श्रावण मास की रांधण छठ और शीतला सातम का महत्व विशेष रूप से बहुत अधिक है, क्योंकि यह मानसून (बारिश) का समय होता है जब बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। अतः शीतला सातम 3 सितंबर को होगी, और उससे ठीक एक दिन पहले यानी 2 सितंबर 2026 (बुधवार) को रांधण छठ का पर्व मनाया जाएगा।

रांधण छठ 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त तालिका (Muhurat Table)

पर्व / विवरण (Festival Details) तिथि और समय (Date & Time)
रांधण छठ 2026 की तारीख 2 सितंबर 2026 (बुधवार)
श्रावण कृष्ण षष्ठी तिथि का आरंभ 1 सितंबर 2026, रात्रि 08:10 बजे से
श्रावण कृष्ण षष्ठी तिथि की समाप्ति 2 सितंबर 2026, रात्रि 09:25 बजे तक
भोजन पकाने का श्रेष्ठ समय 2 सितंबर 2026 को पूरे दिन
चूल्हा पूजन (Stove Puja) का समय 2 सितंबर 2026, रात्रि भोजन पकाने के पश्चात
शीतला सातम (अगला दिन) 3 सितंबर 2026 (गुरुवार)

(नोट: सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, लेकिन मुख्य पर्व 2 सितंबर को ही मनाया जाएगा।)

2. रांधण छठ का शाब्दिक अर्थ और मूल उद्देश्य (Meaning & Purpose)

‘रांधण’ (Randhan) एक गुजराती और राजस्थानी शब्द है, जिसका सीधा अर्थ है— ‘रसोई बनाना’ या ‘खाना पकाना’। ‘छठ’ (Chhath) का अर्थ है हिंदू पंचांग की षष्ठी तिथि।

यह दिन मुख्य रूप से गृहणियों (महिलाओं) के लिए बहुत व्यस्तता भरा होता है। इस पर्व का मूल उद्देश्य अगले दिन यानी ‘शीतला सातम’ (Sheetala Saptami) की तैयारी करना है। शीतला माता को ‘ठंडक’ और ‘शीतलता’ की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यदि सातम के दिन घर में चूल्हा (आग) जलाया जाए, तो माता शीतला को गर्मी लगती है और वे रुष्ट हो सकती हैं, जिससे परिवार में चेचक (Smallpox), खसरा या आंखों की बीमारियां हो सकती हैं।

ये भी पढ़ें:  2026 Amavasya Tithi Calendar: कब है कौन-सी अमावस्या? जानें Month-Wise Date & Time

इसलिए, माता को प्रसन्न रखने और परिवार को निरोगी रखने के लिए रांधण छठ के दिन ही अगले 24 घंटों के लिए पूरे परिवार का भोजन और माता का प्रसाद (नैवेद्य) पकाकर रख लिया जाता है।

3. रांधण छठ और शीतला सातम का धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व (Significance)

हमारे पूर्वजों ने त्योहारों को बहुत ही सोच-समझकर प्रकृति के नियमों के साथ गूंथा है। रांधण छठ केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं।

धार्मिक महत्व (Religious Importance)

धर्म ग्रंथों के अनुसार, माता शीतला देवी दुर्गा का ही एक रोग-नाशक स्वरूप हैं। रांधण छठ के दिन भोजन पकाकर और चूल्हे को शांत करके हम अग्नि देव को विश्राम देते हैं और शीतला माता का आह्वान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि सातम की रात को माता शीतला हर घर की रसोई में भ्रमण करने आती हैं। यदि उन्हें चूल्हा जलता हुआ या गर्म मिलता है, तो वे क्रोधित होकर श्राप दे देती हैं, लेकिन यदि चूल्हा ठंडा और पूजा किया हुआ मिलता है, तो वे परिवार को सुख, शांति, आरोग्यता और बच्चों को दीर्घायु का आशीर्वाद देकर जाती हैं।

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण (Scientific Perspective)

  1. ऋतु परिवर्तन (Change of Season): श्रावण का महीना मानसून का चरम समय होता है। इस समय वातावरण में अत्यधिक नमी (Humidity) होती है, जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए सबसे अनुकूल समय है।

  2. फर्मेंटेशन (Fermentation) का लाभ: रांधण छठ के दिन पकाया गया भोजन जब रात भर रखा रहता है, तो उसमें प्राकृतिक रूप से हल्का खमीर (Fermentation) उठ जाता है। सावन के मौसम में यह फर्मेंटेड भोजन (जैसे दही, राबड़ी, कुलेर) एक बेहतरीन ‘प्रोबायोटिक’ (Probiotic) का काम करता है। यह पेट के गुड बैक्टीरिया (Good Bacteria) को बढ़ाता है, आंतों को मजबूत करता है और इम्युनिटी (Immunity) बूस्ट करता है।

  3. महिलाओं को विश्राम: पूरे वर्ष भर महिलाएं सुबह से शाम तक रसोई की गर्मी में काम करती हैं। रांधण छठ के बहाने, शीतला सातम के दिन महिलाओं को रसोई के काम और आग की गर्मी से एक दिन का पूर्ण विश्राम (Day off) मिल जाता है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है।

4. महिलाएं रांधण छठ के दिन कैसे करती हैं शीतला सातम की तैयारी? (Preparations)

रांधण छठ का दिन घर की महिलाओं के लिए एक उत्सव की तरह होता है। इस दिन रसोई घर में एक अलग ही रौनक होती है। सातम की तैयारी के लिए निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:

I. घर और रसोई की साफ-सफाई (Cleaning)

रांधण छठ की सुबह सबसे पहले पूरे घर और विशेषकर रसोई घर (Kitchen) की बहुत अच्छी तरह से साफ-सफाई की जाती है। पुराने समय में रसोई को गाय के गोबर और मिट्टी से लीपा जाता था। आजकल गैस स्टोव, स्लैब और बर्तनों को अच्छी तरह से धोकर चमकाया जाता है। पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है।

II. सात्विक भोजन पकाना (Cooking Satvik Food)

इस दिन पकने वाले भोजन में किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों (लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा) का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होता है। सारा भोजन शुद्ध घी या मूंगफली के तेल में पकाया जाता है। महिलाएं स्नान करने के बाद ही भोजन पकाना शुरू करती हैं।

III. माता शीतला के लिए विशेष नैवेद्य (Prasad for Goddess)

माता शीतला के भोग के लिए कुछ विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं, जो तासीर में ठंडे होते हैं और जल्दी खराब नहीं होते। इनमें मुख्य हैं:

  • कुलेर (Kuler): यह शीतला माता का सबसे प्रिय भोग है। इसे बनाने के लिए बाजरे के कच्चे आटे में देसी घी और बारीक पिसा हुआ गुड़ मिलाया जाता है। इसे बिना गैस जलाए हाथों से गूंथ कर लड्डू का आकार दिया जाता है।

  • राबड़ी (Rabdi): बाजरे या मक्के के आटे को छाछ (Buttermilk) में पकाकर राबड़ी बनाई जाती है। यह रात भर में फर्मेंट होकर अगले दिन पेट को बहुत ठंडक पहुंचाती है।

  • मीठे चावल (Sweet Rice): गुड़ या शक्कर वाले चावल बनाए जाते हैं।

  • दही (Curd): दूध को जमाकर रात में ही ताजा दही तैयार कर लिया जाता है।

ये भी पढ़ें:  Ashadha Gupt Navratri 2026: घर में अखंड ज्योति कैसे जलाएं? जानिए जलाने के शास्त्रोक्त नियम

IV. परिवार के लिए व्यंजन (Food for the Family)

नैवेद्य के अलावा, रांधण छठ पर पूरे परिवार के लिए अगले दिन खाने हेतु ढेरों स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं।

5. रांधण छठ पर बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन (Traditional Foods Table)

गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस दिन विशेष प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, जो अगले दिन (ठंडे होने पर) और भी स्वादिष्ट लगते हैं।

व्यंजन का नाम (Name of Dish) मुख्य सामग्री (Main Ingredients) विशेषता (Specialty)
बाजरे के ठेपले/रोटी बाजरे का आटा, मेथी, मसाले बाजरा स्वास्थ्यवर्धक होता है और जल्दी खराब नहीं होता।
मीठे पुए (Gulgule) गेहूं का आटा, गुड़ या चीनी, घी तेल या घी में तले होने के कारण ये कई दिनों तक ताजे रहते हैं।
बेसन की पपड़ी/सेव बेसन, अजवाइन, तेल कुरकुरा नाश्ता जो बच्चों को बहुत पसंद आता है।
दही-वड़े (Dahi Vada) उड़द/मूंग की दाल, दही शीतलता प्रदान करने वाला मुख्य व्यंजन।
पूरी और सूखी सब्जी गेहूं का आटा, आलू या करेले की सब्जी सूखी सब्जी (बिना पानी वाली) जल्दी खराब नहीं होती।
मालपुआ (Malpua) मैदा/आटा, दूध, चीनी की चाशनी पारंपरिक और लोकप्रिय मीठा व्यंजन।

6. रांधण छठ की रात: चूल्हा पूजन विधि (Chulha Puja Vidhi)

रांधण छठ का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रात के समय होने वाला ‘चूल्हा पूजन’ (Stove Puja) है। जब रात का सारा खाना बन जाता है, दूध गरम हो जाता है और यह सुनिश्चित हो जाता है कि अब अगले 24 घंटों तक अग्नि जलाने की कोई आवश्यकता नहीं है, तब यह पूजा की जाती है।

चूल्हा पूजन के चरण (Steps for Stove Worship):

  1. चूल्हे की सफाई: गैस स्टोव (चूल्हे) को गीले कपड़े से बहुत अच्छी तरह से पोंछकर साफ किया जाता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि चूल्हे पर भोजन का कोई भी अंश (जूठन) न गिरा हो।

  2. ठंडा करना: चूल्हे को पूरी तरह से ठंडा होने दिया जाता है।

  3. तिलक और सजावट: चूल्हे या गैस स्टोव के बर्नर के पास कुमकुम (रोली), हल्दी और चंदन से स्वास्तिक (Swastik) का चिह्न बनाया जाता है।

  4. पुष्प और जल: चूल्हे पर पुष्प (फूल) अर्पित किए जाते हैं। कुछ स्थानों पर चूल्हे के पास एक छोटी सी टहनी (जैसे कपास या नीम का पौधा) रख दी जाती है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है।

  5. प्रार्थना: घर की मुख्य महिला हाथ जोड़कर अग्नि देव (चूल्हा देवता) से प्रार्थना करती है:

    “हे अग्नि देव! आपने पूरे वर्ष हमारे परिवार के लिए भोजन पकाने में हमारी सहायता की है। माता शीतला की कृपा प्राप्ति के लिए कल हम आपको विश्राम दे रहे हैं। कृपया आप शांत रहें, हमारे घर में शीतलता बनाए रखें और हमारे परिवार की रक्षा करें।”

  6. वर्जना (Strict Rule): एक बार जब चूल्हे की पूजा हो जाती है, तो उसके बाद गलती से भी गैस नहीं जलाई जाती, यहां तक कि माचिस की तीली जलाना भी वर्जित हो जाता है।

7. रांधण छठ और शीतला सातम के कड़े नियम (Rules and Precautions)

इस व्रत और पर्व के कुछ बहुत ही कड़े नियम हैं, जिनका पालन सदियों से किया जा रहा है। यदि इन नियमों का उल्लंघन किया जाए, तो माता शीतला रुष्ट हो सकती हैं:

  • गर्म भोजन का पूर्ण निषेध: शीतला सातम के दिन भूलकर भी कोई गर्म चीज नहीं खानी चाहिए। बाजार से लाया गया ताजा गर्म समोसा, कचौरी या रेस्टोरेंट का खाना भी इस दिन वर्जित है।

  • गर्म पेय पदार्थों से दूरी: रांधण छठ की रात चूल्हा ठंड़ा होने के बाद, अगले पूरे दिन (शीतला सातम को) चाय, कॉफी या गर्म दूध नहीं पीना चाहिए।

  • गर्म पानी से स्नान न करें: व्रत करने वाली महिलाओं और परिवार के अन्य सदस्यों को शीतला सातम के दिन ठंडे (सामान्य) जल से ही स्नान करना चाहिए। गीजर या हीटर का प्रयोग वर्जित है।

  • अग्नि न जलाएं: घर में माचिस जलाना, अगरबत्ती जलाना (कुछ परम्पराओं में), या आग सेंकना पूर्णतः वर्जित है। माता शीतला की पूजा भी ‘ठंडी आरती’ (बिना दीपक जलाए या केवल कपूर के छोटे टुकड़े से) की जाती है।

  • सिलाई और कटाई की मनाही: रांधण छठ और शीतला सातम के दिन घर में कैंची, सुई-धागे का प्रयोग करना या कपड़े काटना वर्जित माना जाता है।

8. रांधण छठ: पारिवारिक एकता और उल्लास का पर्व (A Festival of Family Unity)

रांधण छठ केवल रसोई तक सीमित नहीं है, यह पारिवारिक जुड़ाव का एक बहुत बड़ा अवसर है।

ये भी पढ़ें:  अथर्ववेद में शंख का रहस्य: नकारात्मक शक्तियों और दरिद्रता को दूर करने का महा-उपाय

आधुनिक युग में जहां हर कोई अपने-अपने मोबाइल और ऑफिस के कामों में व्यस्त रहता है, रांधण छठ के दिन पूरे परिवार की महिलाएं एक साथ मिलकर रसोई में काम करती हैं। दादी, नानी, बहुएं और बेटियां मिलकर पारंपरिक गीत गाती हैं और पुरानी रेसिपीज (Recipes) एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सिखाती हैं।

अगले दिन, शीतला सातम पर जब घर में कोई खाना नहीं बनता, तो पूरा परिवार एक साथ बैठकर ‘पिकनिक’ (Picnic) के अंदाज़ में उस ठंडे और स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेता है। यह दिन महिलाओं को शारीरिक आराम देने के साथ-साथ परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) बिताने का अवसर प्रदान करता है।

Randhan Chhath 2026 का पर्व, जो 2 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा, भारतीय संस्कृति की उस गहरी सोच का परिणाम है, जो मनुष्य, प्रकृति और स्वास्थ्य के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस अग्नि के बिना हमारा जीवन संभव नहीं है, उसे भी वर्ष में एक दिन विश्राम देना आवश्यक है।

रांधण छठ के दिन भोजन पकाने से लेकर चूल्हे को ठंडा कर उसकी पूजा करने तक की पूरी प्रक्रिया में एक गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संदेश छिपा है। मौसम के बदलाव के समय यह बासी (फर्मेंटेड) भोजन हमारे शरीर के लिए एक प्राकृतिक औषधि का कार्य करता है।

इस वर्ष रांधण छठ पर आप भी अपने परिवार के साथ मिलकर पारंपरिक पकवान बनाएं, सात्विकता का पालन करें और माता शीतला से अपने परिवार की आरोग्यता (Good Health) और सुख-शांति की प्रार्थना करें। माता शीतला आपके बच्चों को दीर्घायु और आपके घर को हमेशा शीतल व आनंदित रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs Regarding Randhan Chhath)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में रांधण छठ (Randhan Chhath) किस तारीख को है?

उत्तर: वर्ष 2026 में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की रांधण छठ 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। इसके ठीक अगले दिन 3 सितंबर को शीतला सातम का पर्व मनाया जाएगा।

प्रश्न 2: रांधण छठ का अर्थ क्या होता है?

उत्तर: गुजराती और राजस्थानी भाषा में ‘रांधण’ का अर्थ होता है ‘भोजन पकाना’ (Cooking) और ‘छठ’ का अर्थ है षष्ठी तिथि। चूंकि शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता, इसलिए षष्ठी तिथि (छठ) के दिन ही अगले दिन के लिए सारा भोजन पका लिया जाता है। इसीलिए इस दिन को ‘रांधण छठ’ कहा जाता है।

प्रश्न 3: चूल्हा पूजन (Stove Puja) कब और क्यों किया जाता है?

उत्तर: रांधण छठ की रात को जब अगले दिन के लिए सारा भोजन पक जाता है और दूध आदि गर्म हो जाता है, तब गैस स्टोव (चूल्हे) को अच्छी तरह साफ करके उसकी पूजा की जाती है। कुमकुम से स्वास्तिक बनाकर अग्नि देव को विश्राम दिया जाता है। इसका उद्देश्य माता शीतला को यह संदेश देना है कि हमारे घर में शीतलता है, अतः आप हमारे घर में पधारें और आरोग्यता का आशीर्वाद दें।

प्रश्न 4: शीतला माता का सबसे प्रिय भोग (Prasad) क्या है जो रांधण छठ पर बनता है?

उत्तर: माता शीतला का सबसे प्रिय भोग ‘कुलेर’ और ‘राबड़ी’ है। कुलेर बाजरे के आटे, देसी घी और गुड़ को बिना आग पर पकाए (केवल हाथों से मसलकर) बनाया जाता है। इसके अलावा बाजरे की राबड़ी, दही, और मीठे चावल माता को विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि ये सभी तासीर में ठंडे होते हैं।

प्रश्न 5: क्या रांधण छठ के दिन भी व्रत रखा जाता है?

उत्तर: नहीं, रांधण छठ के दिन व्रत नहीं रखा जाता। यह दिन मुख्य रूप से भोजन पकाने (तैयारी करने) का दिन होता है। मुख्य व्रत और नियम (जैसे गर्म भोजन न करना, चूल्हा न जलाना) अगले दिन यानी ‘शीतला सातम’ (Sheetala Satam) पर लागू होते हैं। रांधण छठ के दिन महिलाएं सामान्य सात्विक भोजन ग्रहण कर सकती हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!