सनातन हिंदू धर्म में प्रकृति, पशु-पक्षियों और पर्यावरण के संरक्षण को हमेशा से सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। हमारे व्रत और त्योहार इसी बात का प्रमाण हैं कि हम केवल देवी-देवताओं की ही नहीं, बल्कि उन जीवों की भी पूजा करते हैं जो मानव जीवन का आधार हैं। ऐसा ही एक अत्यंत पावन और वात्सल्य से भरा पर्व है— ‘बहुला चतुर्थी’ (Bahula Chaturthi), जिसे उत्तर भारत में ‘बहुला चौथ’ और गुजरात में ‘बोल चौथ’ (Bol Choth) के नाम से भी जाना जाता है।
यह व्रत मुख्य रूप से गौ माता (Cow) और उनके बछड़े के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, संतान की लंबी आयु और भगवान श्री कृष्ण व भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
यदि आपके मन में भी यह प्रश्न है कि बहुला चतुर्थी कब है? और इस व्रत का क्या महत्व है? तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं। इस विस्तृत और शोधपरक लेख में हम वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, गौ माता की पूजा विधि, इस दिन के कड़े नियम, पौराणिक व्रत कथा और जीवन के संकटों को दूर करने वाले विशेष उपायों के बारे में गहराई से जानेंगे।
1. वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी कब है? (Bahula Chaturthi 2026 Date)
हिंदू पंचांग के अनुसार, बहुला चतुर्थी का व्रत भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। (दक्षिण भारत और गुजरात के ‘अमावस्यांत पंचांग’ के अनुसार इसे श्रावण मास की कृष्ण चतुर्थी कहा जाता है, लेकिन पर्व एक ही दिन पड़ता है)। यह व्रत रक्षाबंधन के चार दिन बाद और जन्माष्टमी से चार दिन पहले आता है। इसी दिन भगवान गणेश की ‘हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी’ भी मनाई जाती है।
वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी का पावन पर्व 31 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। सोमवार का दिन भगवान शिव का होता है, और इस दिन गौ माता व गजानन की पूजा का संयोग इसे और भी अधिक फलदायी बना रहा है।
बहुला चतुर्थी 2026: शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय (Muhurat Table)
यह व्रत चंद्रोदय (चंद्रमा के दर्शन) के बाद ही पूर्ण माना जाता है। भक्तों की सुविधा के लिए यहाँ 31 अगस्त 2026 की बहुला चतुर्थी पूजा के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:
| विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time) |
| बहुला चतुर्थी 2026 की तिथि | 31 अगस्त 2026 (सोमवार) |
| भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि का आरंभ | 31 अगस्त 2026, प्रातः 08:50 बजे से |
| भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि की समाप्ति | 1 सितंबर 2026, प्रातः 07:41 बजे तक |
| गौ माता और गणेश पूजा का प्रातःकालीन मुहूर्त | सुबह 09:10 बजे से 10:45 बजे तक |
| गोधूलि बेला (शाम की पूजा) का मुहूर्त | शाम 06:40 बजे से 08:05 बजे तक |
| चंद्रोदय का समय (Moonrise Time) | रात्रि लगभग 08:50 बजे (स्थानीय समयानुसार) |
(नोट: चंद्रोदय के समय में आपके शहर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार 5 से 15 मिनट का अंतर आ सकता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।)
2. बहुला चतुर्थी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (Significance of Bahula Chauth)
बहुला चतुर्थी का पर्व भारतीय संस्कृति के उस मूल विचार को दर्शाता है, जिसमें जीवों के प्रति करुणा और वात्सल्य की भावना छिपी है। इस पर्व का महत्व तीन मुख्य दृष्टिकोणों से देखा जाता है:
I. गौ माता और श्री कृष्ण का प्रेम
भगवान श्री कृष्ण को गायों से अत्यंत प्रेम था। उनके बचपन की सारी लीलाएं गौ-चारण और ब्रज की गायों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ‘बहुला’ वास्तव में एक कामधेनु (गाय) का नाम था, जो श्री कृष्ण को बहुत प्रिय थी। बहुला चतुर्थी का दिन भगवान कृष्ण के उसी पशु-प्रेम और बहुला गाय की सत्यनिष्ठा को समर्पित है।
II. संतान की रक्षा का पर्व
जिस प्रकार एक गाय अपने बछड़े की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देती है, उसी प्रकार माताएं अपनी संतान पर आने वाले हर संकट को टालने के लिए बहुला चतुर्थी का निर्जला व्रत रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन गौ माता की पूजा करने से बच्चों को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त होती है।
III. विघ्नहर्ता गणेश की कृपा
चूंकि यह दिन भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी (संकष्टी चतुर्थी) का भी होता है, इसलिए इस दिन भगवान गणेश के ‘हेरम्ब’ स्वरूप की भी पूजा की जाती है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखकर गजानन और गौ माता की संयुक्त पूजा करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, मानसिक तनाव और हर प्रकार के विघ्न (बाधाएं) दूर हो जाते हैं।
3. बहुला चतुर्थी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
बहुला चतुर्थी के दिन भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, श्री कृष्ण और विशेष रूप से गौ माता (बछड़े सहित) की पूजा का विधान है। पूजा पूरे विधि-विधान से करने पर ही व्रत का पूर्ण फल मिलता है:
पूजा की तैयारी और सामग्री
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पूजा के लिए गाय और बछड़े की मिट्टी की मूर्ति (यदि मिट्टी की न हो, तो चित्र भी रख सकते हैं)।
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भगवान गणेश और श्री कृष्ण का चित्र।
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जल का कलश, रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल)।
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ताजे फूल, दूर्वा (घास), और गौ माता के लिए हरा चारा।
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भोग के लिए गुड़, चना, फल और मिठाइयां।
प्रातःकालीन पूजा विधि
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स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त में) उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें— “हे श्री कृष्ण, हे गजानन! मैं अपनी संतान और परिवार की रक्षा के लिए आज बहुला चतुर्थी का व्रत करने का संकल्प लेती हूँ।”
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चौकी स्थापना: पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश, श्री कृष्ण और मिट्टी से बनी गाय-बछड़े की मूर्ति स्थापित करें।
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गणेश और कृष्ण पूजन: सबसे पहले विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पंचोपचार पूजन करें। उन्हें दूर्वा और मोदक अर्पित करें। फिर भगवान श्री कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
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गौ माता की पूजा: मिट्टी की गाय और बछड़े को जल का छींटा देकर स्नान कराएं। उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
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नैवेद्य और चारा: गौ माता के समक्ष गुड़, भुने हुए चने और हरा चारा (घास) अर्पित करें।
संध्याकालीन पूजा और चंद्र दर्शन (Evening Puja & Moonrise)
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शाम के समय (गोधूलि बेला में) यदि संभव हो, तो किसी गौशाला में जाएं या अपने घर के आस-पास किसी जीवित गाय और उसके बछड़े की पूजा करें। उन्हें अपने हाथों से गुड़ और रोटी खिलाएं।
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रात के समय जब चंद्रमा उदय हो जाए, तो एक चांदी या तांबे के लोटे में जल, सफेद फूल और अक्षत लेकर चंद्र देव को अर्घ्य दें।
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चंद्रमा की पूजा के बाद ‘बहुला चतुर्थी की व्रत कथा’ सुनें या पढ़ें।
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अंत में भगवान की आरती कर अपना व्रत खोलें (पारण करें)।
4. बहुला चतुर्थी व्रत के कड़े नियम और सावधानियां (Strict Rules of the Vrat)
यह व्रत बहुत ही पवित्रता और समर्पण की मांग करता है। बहुला चतुर्थी के कुछ अत्यंत कड़े नियम हैं, जिनका पालन हर व्रती को करना चाहिए:
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गाय के दूध का सख्त निषेध: बहुला चतुर्थी के व्रत का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण नियम यह है कि इस दिन गाय के दूध और उससे बनी किसी भी वस्तु (जैसे गाय का दही, गाय का घी, या पनीर) का सेवन वर्जित होता है।
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बछड़े का अधिकार: मान्यता है कि बहुला चौथ के दिन गाय के दूध पर केवल और केवल उसके बछड़े का अधिकार होता है। इसलिए इस दिन मानव को गाय का दूध नहीं पीना चाहिए। आप भैंस या बकरी के दूध का उपयोग कर सकते हैं।
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सात्विक आहार: व्रत के दिन और पारण के समय भोजन पूर्णतः सात्विक होना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन घर में किसी को भी नहीं करना चाहिए।
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क्रोध और अपशब्द न बोलें: यह वात्सल्य और करुणा का पर्व है। इस दिन किसी पर क्रोध करना, बच्चों को डांटना या किसी जानवर को मारना घोर पाप माना जाता है। गाय को भूलकर भी दुत्कारना नहीं चाहिए।
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चाकू का प्रयोग (कुछ क्षेत्रों में): गुजरात (बोल चौथ) और कुछ अन्य क्षेत्रों में, इस दिन महिलाएं चाकू से सब्जियां नहीं काटती हैं। भोजन बिना काटे या एक दिन पहले कटी हुई सब्जियों से पकाया जाता है।
5. बहुला चतुर्थी (बहुला गाय) की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)
किसी भी व्रत का फल उसकी कथा के श्रवण के बिना अधूरा रहता है। बहुला चतुर्थी की यह मर्मस्पर्शी कथा सत्य, धर्म और वात्सल्य का उत्कृष्ट उदाहरण है:
पौराणिक कथा:
द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण गोकुल में निवास करते थे, तब उनके पास हजारों गाएं थीं। उन सभी गायों में एक गाय श्री कृष्ण को बहुत प्रिय थी, जिसका नाम ‘बहुला’ था। बहुला स्वभाव से अत्यंत शांत, सत्यवादी और अपने बछड़े से अत्यधिक प्रेम करने वाली थी।
एक दिन बहुला गाय जंगल में हरी घास चरते-चरते अपनी झुंड से बहुत दूर निकल गई। घना जंगल था और तभी वहां एक खूंखार शेर आ गया। शेर बहुला को देखकर दहाड़ने लगा और बोला, “आज तो मुझे बहुत अच्छा शिकार मिल गया है, मैं तुम्हें खाकर अपनी भूख मिटाऊंगा।”
बहुला शेर को देखकर घबरा गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने शेर से प्रार्थना करते हुए कहा, “हे वनराज! मैं आपका भोजन बनने के लिए तैयार हूँ, लेकिन घर पर मेरा एक छोटा सा बछड़ा है, जो अभी पूरी तरह से मेरे ही दूध पर निर्भर है। वह सुबह से मेरा इंतजार कर रहा है। कृपया मुझे बस एक बार घर जाने दें। मैं अपने बछड़े को दूध पिलाकर और उसे समझाकर आपके पास वापस आ जाऊंगी।”
शेर जोर से हंसा और बोला, “तुम क्या मुझे मूर्ख समझती हो? मौत के मुंह से बचकर कोई भी जानवर वापस नहीं आता। मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा।”
बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ ली और कहा, “हे वनराज, सत्य ही मेरा धर्म है। यदि मैं अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस न आऊं, तो मुझे सबसे घोर पाप लगे।” बहुला की सत्यनिष्ठा और आंखों में मातृत्व का दुख देखकर शेर का मन पिघल गया और उसने बहुला को वापस जाने की अनुमति दे दी।
बहुला दौड़ती हुई गोकुल पहुंची। उसने अपने बछड़े को जी भरकर दूध पिलाया, उसे खूब प्यार किया और उसे अन्य गायों के भरोसे छोड़कर वापस जंगल की ओर चल दी। बछड़ा रोता रहा, लेकिन बहुला ने अपने सत्य के धर्म को नहीं छोड़ा।
जब बहुला शेर के पास पहुंची, तो शेर उसे वापस देखकर हैरान रह गया। उसने सोचा कि यह कोई साधारण गाय नहीं है। वास्तव में, वह शेर कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण थे। श्री कृष्ण ने बहुला की परीक्षा लेने के लिए ही अपनी माया से शेर का रूप धारण किया था।
श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उन्होंने बहुला को गले लगा लिया। भगवान कृष्ण ने कहा, “हे बहुला! तुम सत्य और धर्म की परीक्षा में उत्तीर्ण हुई हो। तुम्हारे इस वात्सल्य और सत्यनिष्ठा के कारण पूरा संसार तुम्हारी पूजा करेगा। आज भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी का दिन है। जो भी माता आज के दिन तुम्हारी पूजा करेगी और व्रत रखेगी, उसकी संतान हमेशा सुरक्षित रहेगी और उसे मेरे गोलोक धाम की प्राप्ति होगी।”
तभी से इस दिन को ‘बहुला चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाने लगा और माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत करने लगीं।
6. बहुला चतुर्थी के दिन किए जाने वाले अचूक उपाय (Special Remedies)
यदि आपके जीवन में कोई विशेष संकट है, संतान से जुड़ी कोई चिंता है, या आर्थिक तंगी बनी हुई है, तो 31 अगस्त 2026 को बहुला चतुर्थी के दिन इन विशेष उपायों (Upay) को अवश्य आजमाएं:
I. संतान की सफलता और उत्तम स्वास्थ्य के लिए
यदि आपकी संतान अक्सर बीमार रहती है या पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता, तो बहुला चतुर्थी के दिन अपने हाथों से गुड़ और चने की दाल गाय और उसके बछड़े को खिलाएं। खिलाते समय भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करें। गाय के शरीर पर हाथ फेरें। इस उपाय से बच्चे के जीवन से हर नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है।
II. आर्थिक तंगी (दरिद्रता) दूर करने के लिए
लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा है या कर्जा बढ़ गया है, तो इस दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (हरी घास) और मोदक का भोग लगाएं। साथ ही, गौ माता के लिए घर में बनने वाली सबसे पहली रोटी (गौ ग्रास) निकालें और उस पर थोड़ा सा घी व शक्कर रखकर गाय को खिलाएं। गौ माता में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है, जो प्रसन्न होकर घर को धन-धान्य से भर देते हैं।
III. विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए
जिन कन्याओं या युवकों के विवाह में अड़चनें आ रही हैं, उन्हें बहुला चतुर्थी की शाम को किसी गौशाला में जाकर चारा दान करना चाहिए और भगवान शिव-पार्वती व श्री कृष्ण के मंदिर में एक मीठा पान अर्पित करना चाहिए। यह उपाय शीघ्र विवाह के योग बनाता है।
IV. घर में सुख-शांति (पारिवारिक कलह से मुक्ति) के लिए
यदि घर में अक्सर क्लेश रहता है, तो शाम के समय चंद्र देव को अर्घ्य देते समय जल में थोड़ा सा सफेद चंदन और अक्षत मिलाएं। चंद्र देव से परिवार की शांति की प्रार्थना करें। इसके अलावा, तुलसी माता के पास घी का दीपक अवश्य जलाएं।
7. बहुला चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी का अद्भुत संगम
यह ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि बहुला चतुर्थी हमेशा ‘संकष्टी चतुर्थी’ के दिन ही पड़ती है। इसलिए यह दिन भगवान गणेश की आराधना का भी है।
जहाँ गौ माता की पूजा वात्सल्य, पोषण और शांति प्रदान करती है, वहीं भगवान गणेश की पूजा बुद्धि, विवेक और विघ्नों (रुकावटों) का नाश करती है। जो भक्त इस दिन ‘गणेश चालीसा’ या ‘संकटनाशन गणेश स्तोत्र’ का पाठ करता है और गौ माता की सेवा करता है, उसे एक साथ कई जन्मों के पुण्य की प्राप्ति होती है।
Bahula Chaturthi 2026 केवल एक व्रत नहीं है, बल्कि यह मातृशक्ति (Motherhood), सत्य और जीवों के प्रति दया का एक महान उत्सव है। 31 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन पर्व हमें याद दिलाता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं, जैसा कि उन्होंने बहुला गाय की थी।
इस बहुला चतुर्थी पर आप भी पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ गौ माता और गजानन की पूजा करें। अपनी संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए व्रत रखें। याद रखें कि इस दिन गाय के दूध का सेवन भूलकर भी न करें और गौ माता को अपने हाथों से चारा अवश्य खिलाएं। भगवान श्री कृष्ण, गजानन और गौ माता आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें।
“ॐ सुरभ्यै नमः”
(बोलो गौ माता की जय!)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Bahula Chaturthi 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी (Bahula Chauth) कब मनाई जाएगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी का पावन पर्व 31 अगस्त 2026, सोमवार के दिन मनाया जाएगा। इसी दिन भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी होने के कारण ‘हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी’ और गुजरात में ‘बोल चौथ’ भी मनाई जाएगी।
प्रश्न 2: बहुला चतुर्थी के दिन गाय का दूध क्यों नहीं पिया जाता है?
उत्तर: धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथाओं के अनुसार, बहुला चतुर्थी के दिन गाय के दूध पर केवल और केवल उसके बछड़े (Calf) का अधिकार होता है। यह पर्व गाय और बछड़े के प्रेम को समर्पित है, इसलिए मनुष्य इस दिन गाय के दूध या उससे बनी किसी भी चीज (दही, घी, मक्खन) का सेवन नहीं करते हैं।
प्रश्न 3: बहुला कौन थी और उसकी पूजा क्यों होती है?
उत्तर: ‘बहुला’ द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण की सबसे प्रिय गाय का नाम था। उसने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए एक खूंखार शेर के सामने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी, लेकिन अपने बछड़े को दिया हुआ वचन निभाया था। उसकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उसे वरदान दिया था कि भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन उसकी पूजा की जाएगी।
प्रश्न 4: क्या बहुला चतुर्थी के व्रत में पानी पी सकते हैं?
उत्तर: पारंपरिक रूप से बहुला चतुर्थी का व्रत माताएं अपनी संतान के लिए ‘निर्जला’ (बिना पानी के) रखती हैं। यह व्रत सुबह से शुरू होकर रात को चंद्रमा के दर्शन (अर्घ्य देने) के बाद ही खोला जाता है। हालांकि, गर्भवती, बीमार या बुजुर्ग महिलाएं अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार फलाहार ले सकती हैं या पानी पी सकती हैं।
प्रश्न 5: गुजरात में ‘बोल चौथ’ (Bol Choth) के क्या नियम हैं?
उत्तर: गुजरात में बहुला चतुर्थी को ‘बोल चौथ’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन वहां एक विशेष नियम का पालन किया जाता है, जिसके तहत महिलाएं चाकू (Knife) से सब्जियां या कोई अन्य चीज नहीं काटती हैं। भोजन पकाने के लिए या तो बिना कटी हुई चीजों का उपयोग किया जाता है, या सब्जियां एक दिन पहले ही काट कर रख ली जाती हैं। यह अहिंसा और जीवों के प्रति करुणा का प्रतीक है।