सनातन हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक पुण्यदायी माना गया है। वर्ष भर में कुल 24 एकादशियां आती हैं (अधिक मास होने पर 26), और प्रत्येक एकादशी का अपना एक विशिष्ट नाम, महत्व और उद्देश्य होता है। इन्हीं पवित्र एकादशियों में से एक अत्यंत मंगलकारी और विशेष उद्देश्य की पूर्ति करने वाली एकादशी है— ‘श्रावण पुत्रदा एकादशी’ (Shravana Putrada Ekadashi)।
इसे ‘पवित्रा एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘पुत्रदा’ का अर्थ है— पुत्र (या संतान) प्रदान करने वाली। जो दंपत्ति विवाह के कई वर्षों बाद भी संतान सुख से वंचित हैं, या जिनकी संतान के जीवन में बार-बार कष्ट आ रहे हैं, उनके लिए यह व्रत किसी वरदान से कम नहीं है। श्रावण (सावन) मास के पवित्र महीने में आने के कारण इस एकादशी पर भगवान श्री हरि विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव की भी असीम कृपा प्राप्त होती है।
यदि आप भी जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में श्रावण पुत्रदा एकादशी कब है, इस व्रत का शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की शास्त्र-सम्मत विधि क्या होनी चाहिए और संतान प्राप्ति के लिए कौन से अचूक उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही है।
1. वर्ष 2026 में श्रावण पुत्रदा एकादशी कब है? (Shravana Putrada Ekadashi 2026 Date)
हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) से ठीक चार दिन पहले आती है।
वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण पुत्रदा एकादशी का पावन व्रत 24 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है, और सावन के सोमवार पर पड़ने वाली एकादशी का यह अद्भुत संयोग इसे और भी अधिक फलदायी बना रहा है। इस दिन हरि (विष्णु) और हर (शिव) दोनों का एक साथ आशीर्वाद प्राप्त होगा।
श्रावण पुत्रदा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण का समय (Muhurat Table)
एकादशी का व्रत तभी पूर्ण माना जाता है जब उसका ‘पारण’ (व्रत खोलना) सही समय पर किया जाए। यहाँ 24 अगस्त 2026 के लिए व्रत और पूजा के शुभ मुहूर्त की विस्तृत तालिका दी गई है:
| विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time 2026) |
| श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत की तिथि | 24 अगस्त 2026 (सोमवार) |
| श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि का आरंभ | 23 अगस्त 2026, रात्रि 10:15 बजे से |
| श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि की समाप्ति | 24 अगस्त 2026, रात्रि 08:45 बजे तक |
| भगवान विष्णु की प्रातःकालीन पूजा का मुहूर्त | 24 अगस्त, सुबह 06:05 बजे से 09:20 बजे तक |
| व्रत पारण का शुभ समय (Fast Breaking Time) | 25 अगस्त 2026, सुबह 06:10 बजे से 08:35 बजे तक |
| द्वादशी तिथि की समाप्ति (पारण के दिन) | 25 अगस्त 2026, शाम 06:50 बजे तक |
(नोट: सूर्योदय के अनुसार आपके शहर की भौगोलिक स्थिति के कारण पारण के समय में 5 से 10 मिनट का अंतर आ सकता है। पारण हमेशा द्वादशी तिथि के भीतर और हरि वासर समाप्त होने के बाद ही करना चाहिए।)
2. श्रावण पुत्रदा एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance)
सनातन धर्म में दो पुत्रदा एकादशियां आती हैं— एक पौष मास (सर्दियों) में और दूसरी श्रावण मास (सावन) में। श्रावण पुत्रदा एकादशी का अपना एक विशेष महत्व है:
I. संतान सुख की प्राप्ति (Blessing of a Child)
यह इस व्रत का सबसे प्रमुख उद्देश्य है। जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में चिकित्सीय या ग्रहीय बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें यह व्रत पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ रखना चाहिए। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से ‘संतान दोष’ और ‘पितृ दोष’ दोनों समाप्त हो जाते हैं।
II. संतान की रक्षा और उज्ज्वल भविष्य
यह व्रत केवल संतान प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि जीवित संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए भी रखा जाता है। माताएं अपने बच्चों के कष्टों को दूर करने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना करती हैं।
III. वाजपेय यज्ञ के समान फल
पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विकता के साथ श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत रखता है, उसे ‘वाजपेय यज्ञ’ करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के अंत में उसे बैकुंठ धाम (मोक्ष) मिलता है।
IV. पापों का नाश
इस व्रत को ‘पवित्रा एकादशी’ भी कहा जाता है। यह मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा को पवित्र करती है। इस दिन जाने-अनजाने में हुए पूर्व जन्म के वे पाप नष्ट हो जाते हैं जो संतान प्राप्ति में बाधा बन रहे होते हैं।
3. श्रावण पुत्रदा एकादशी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
एकादशी की पूजा भगवान श्री हरि विष्णु और उनके अवतार भगवान श्री कृष्ण (विशेषकर बाल गोपाल स्वरूप) को समर्पित होती है। 24 अगस्त 2026 को इस शास्त्र-सम्मत विधि का पालन करें:
१. प्रातःकालीन संकल्प और स्नान
-
व्रत के दिन सूर्योदय से पूर्व उठें (ब्रह्म मुहूर्त में)।
-
स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और हल्दी मिलाकर स्नान करें।
-
स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें (भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है)।
-
अपने घर के मंदिर के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें: “हे श्री हरि! मैं (अपना नाम), संतान सुख की कामना और आपकी कृपा प्राप्ति हेतु आज श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ। कृपया मेरे व्रत को निर्विघ्न पूर्ण करें।”
२. चौकी की स्थापना और अभिषेक
-
एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
-
बाल गोपाल को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर) और गंगाजल से स्नान कराएं।
-
उन्हें पीले चंदन का तिलक लगाएं और पीले सुंदर वस्त्र पहनाएं।
३. पूजन और श्रृंगार
-
भगवान को पीले पुष्प (जैसे गेंदा, चंपा या सूर्यमुखी), तुलसी दल, और वैजयंती की माला अर्पित करें।
-
धूप, दीप (गाय के घी का दीपक) और कपूर जलाएं।
-
विशेष ध्यान: विष्णु भगवान की कोई भी पूजा ‘तुलसी’ के बिना अधूरी है। भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें।
४. मंत्र जाप और कथा श्रवण
-
आसन पर बैठकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की 1 या 5 माला का जाप करें।
-
जो लोग संतान की कामना रखते हैं, वे ‘संतान गोपाल मंत्र’ का जाप अवश्य करें।
-
इसके पश्चात हाथ में पीले फूल लेकर श्रावण पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें (कथा नीचे दी गई है)।
५. भोग (नैवेद्य) और आरती
-
भगवान को पीले फलों (जैसे केला, आम), पंचामृत, और माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
-
शाम के समय भगवान के समक्ष पुनः दीपक जलाएं और आरती करें।
-
रात में भगवान का भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करना एकादशी के व्रत में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
4. श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत के कड़े नियम और सावधानियां (Rules & Don’ts)
एकादशी का व्रत सभी व्रतों में सबसे कठोर नियमों वाला माना जाता है। इसका व्रत दशमी तिथि की शाम से ही शुरू होकर द्वादशी की सुबह तक चलता है।
१. चावल का पूर्ण निषेध (Strictly No Rice)
एकादशी के दिन भूलकर भी चावल नहीं पकाने चाहिए और न ही खाने चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में रेंगने वाला जीव (कीड़ा) बनता है।
२. दशमी और द्वादशी के नियम
-
दशमी (एक दिन पूर्व): 23 अगस्त (दशमी) की शाम को सूर्यास्त के बाद भारी भोजन न करें। लहसुन, प्याज, मसूर की दाल और बैंगन का त्याग करें।
-
द्वादशी (पारण के दिन): 25 अगस्त को व्रत खोलने से पहले किसी ब्राह्मण या गरीब को अन्न, वस्त्र का दान करें। पारण हमेशा सात्विक भोजन से ही करें।
३. आहार के नियम (What to eat)
यदि आप निर्जला व्रत नहीं रख सकते, तो आप फलाहारी व्रत रख सकते हैं। इसमें आप ताजे फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू के आटे से बनी चीजें, और मेवे खा सकते हैं। नमक के लिए केवल ‘सेंधा नमक’ का ही प्रयोग करें।
४. आचरण के नियम
-
ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन करें।
-
किसी से वाद-विवाद न करें, क्रोध न करें, और अपशब्द न बोलें।
-
एकादशी के दिन पेड़-पौधों से पत्ते या फूल तोड़ना (विशेषकर तुलसी के पत्ते तोड़ना) वर्जित है। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले (दशमी को) ही तोड़ कर रख लेने चाहिए।
5. श्रावण पुत्रदा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)
किसी भी व्रत का पूर्ण फल उसकी कथा को सुने बिना प्राप्त नहीं होता। श्रावण पुत्रदा एकादशी की कथा अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रेरणादायक है:
कथा:
द्वापर युग की शुरुआत में महिष्मती नामक एक सुंदर नगर था। वहाँ के राजा का नाम ‘महीजित’ था। राजा महीजित अत्यंत न्यायप्रिय, धर्मपरायण और अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान प्रेम करने वाला था। लेकिन राजा स्वयं बहुत दुखी था, क्योंकि विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। संतानहीनता का यह दुःख राजा को दिन-रात सताता रहता था।
एक दिन राजा ने अपनी प्रजा और मंत्रियों को बुलाया और कहा, “हे प्रजाजनों! मैंने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, खजाने का धन अपने निजी स्वार्थ के लिए खर्च नहीं किया और हमेशा धर्म का पालन किया। फिर भी मैं संतान सुख से वंचित क्यों हूँ?” राजा का दुःख देखकर मंत्री और प्रजा भी भावुक हो गए।
राजा के दुख का कारण और उपाय जानने के लिए मंत्री और विद्वान ब्राह्मण घने जंगल में गए। वहाँ उनकी भेंट अत्यंत ज्ञानी ‘महर्षि लोमश’ से हुई। महर्षि लोमश को त्रिकालदर्शी (अतीत, वर्तमान और भविष्य देखने वाला) माना जाता था। मंत्रियों ने राजा का दुःख महर्षि को बताया।
महर्षि लोमश ने ध्यान लगाया और राजा महीजित के पूर्व जन्म को देखा। उन्होंने कहा, “हे मंत्रियो! तुम्हारे राजा ने पूर्व जन्म में एक बहुत बड़ा पाप किया था। पिछले जन्म में राजा एक गरीब और निर्दयी वैश्य था। एक बार सावन के महीने में राजा को बहुत प्यास लगी। वह एक तालाब के किनारे पहुंचा। उसी समय एक ब्याही हुई (गर्भवती) गाय भी पानी पीने के लिए वहां आई। राजा ने अपनी प्यास बुझाने के लिए उस गाय को डंडे से मारकर वहां से भगा दिया और स्वयं पानी पी लिया।”
महर्षि ने आगे कहा, “उसी प्यासी और गर्भवती गाय के श्राप के कारण राजा को इस जन्म में संतान सुख नहीं मिल रहा है। हालांकि, पूर्व जन्म में किए गए कुछ अच्छे कर्मों के कारण उसे एक प्रतापी राजा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।”
मंत्रियों ने घबराकर पूछा, “हे ऋषिवर! कृपया इस भयंकर पाप से मुक्ति का उपाय बताएं।”
महर्षि लोमश ने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि राजा और रानी सहित तुम सभी प्रजाजन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (श्रावण पुत्रदा एकादशी) का निर्जला व्रत रखो, और उस व्रत का सारा पुण्य राजा को दान कर दो, तो राजा के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे संतान की प्राप्ति होगी।”
मंत्रियों ने लौटकर राजा को सारी बात बताई। श्रावण शुक्ल एकादशी आने पर राजा, रानी और पूरी प्रजा ने नियमपूर्वक भगवान विष्णु का उपवास किया और जागरण किया। द्वादशी के दिन सभी ने अपना पुण्य राजा महीजित को अर्पण कर दिया।
व्रत और पुण्य के प्रभाव से रानी ने कुछ ही समय बाद गर्भधारण किया और नौ महीने बाद एक अत्यंत तेजस्वी, स्वस्थ और सुंदर पुत्र को जन्म दिया।
कथा सुनने के बाद कहें: “हे श्री हरि! जिस प्रकार आपने राजा महीजित का संकट दूर कर उन्हें संतान सुख दिया, उसी प्रकार इस कथा को पढ़ने, सुनने और हुंकारा भरने वाले सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करना।”
6. संतान प्राप्ति के लिए अचूक और विशेष उपाय (Special Remedies for Childbirth)
यदि आप लंबे समय से संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, तो 24 अगस्त 2026 को श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन पति-पत्नी दोनों को मिलकर निम्नलिखित उपाय (Upay) अवश्य करने चाहिए:
I. संतान गोपाल मंत्र का जाप
यह मंत्र अत्यंत सिद्ध और शक्तिशाली है। एकादशी के दिन पति और पत्नी दोनों एक साथ पीले आसन पर बैठें। भगवान बाल गोपाल की प्रतिमा के सामने गाय के घी का दीपक जलाएं और तुलसी या हल्दी की माला से 108 बार (1 माला) इस मंत्र का जाप करें:
“ॐ देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥”
(अर्थ: हे देवकी नंदन, हे गोविंद, हे वासुदेव, हे जगत्पते! मुझे एक सुयोग्य पुत्र (संतान) प्रदान करें, मैं आपकी शरण में आया हूँ।)
II. बाल गोपाल को बांसुरी और माखन-मिश्री अर्पित करें
एकादशी के दिन एक छोटी सी चांदी या लकड़ी की बांसुरी (Flute) लाएं और उसे पीले रेशमी कपड़े में बांधकर बाल गोपाल को अर्पित करें। उन्हें ताजे माखन और मिश्री का भोग लगाएं। पूजा के बाद उस बांसुरी को अपने बेडरूम (शयनकक्ष) में सुरक्षित रख दें। भगवान कृष्ण की कृपा से सूनी गोद जल्दी भर जाती है।
III. पीली वस्तुओं का दान (Charity of Yellow Items)
भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है। एकादशी के पारण वाले दिन (25 अगस्त को) किसी ब्राह्मण, मंदिर के पुजारी या जरूरतमंद व्यक्ति को पीले वस्त्र, चने की दाल, केले और कुछ दक्षिणा दान करें। दान करते समय मन में अपनी संतान की कामना करें।
IV. पीपल के वृक्ष की पूजा
एकादशी के दिन शाम के समय पीपल के पेड़ की जड़ में जल (बिना छुए दूर से, या जल की जगह दूध) अर्पित करें और सरसों के तेल या घी का दीपक जलाएं। पीपल में भगवान विष्णु का वास माना जाता है। पेड़ की 7 परिक्रमा करते हुए अपनी मनोकामना मांगे।
V. भगवान शिव का रुद्राभिषेक
चूँकि यह सावन का सोमवार भी है, इसलिए जिन लोगों को चिकित्सीय बाधाएं आ रही हैं, वे संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव का ‘गाय के कच्चे दूध’ से अभिषेक करें। शिव और विष्णु दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
7. विज्ञान और अध्यात्म: एकादशी व्रत का शरीर पर प्रभाव (Scientific Perspective)
गूगल हेल्पफुल कंटेंट के मानकों के अनुसार, केवल धार्मिक पहलू ही नहीं, बल्कि एकादशी व्रत के वैज्ञानिक लाभ को समझना भी आवश्यक है।
जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओहसुमी (जिन्हें 2016 में नोबेल पुरस्कार मिला था) ने ‘ऑटोफैगी’ (Autophagy) की खोज की। उन्होंने सिद्ध किया कि जब हम उपवास (Fasting) करते हैं, तो हमारा शरीर खराब और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं (Damaged Cells) को खाकर शरीर को अंदर से साफ करता है।
महीने में दो बार (हर 15 दिन में) आने वाली एकादशी बिल्कुल इसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर काम करती है। यह पाचन तंत्र (Digestive system) को आराम देती है, शरीर से विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालती है और हार्मोनल संतुलन (Hormonal Balance) बनाती है। जो महिलाएं हार्मोनल असंतुलन (जैसे PCOD या Thyroid) के कारण गर्भधारण नहीं कर पाती हैं, उनके लिए एकादशी का फलाहारी उपवास शारीरिक शुद्धि का एक बेहतरीन और प्राकृतिक तरीका है।
Shravana Putrada Ekadashi 2026 केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है; यह आशा, विश्वास और ईश्वरीय प्रेम का प्रतीक है। 24 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन व्रत उन सभी माता-पिताओं के लिए एक आध्यात्मिक औषधि है, जो संतान सुख के लिए तरस रहे हैं।
भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं। जिस प्रकार एक पिता अपने बच्चों का ध्यान रखता है, उसी प्रकार श्री हरि अपने भक्तों के सभी दुखों को दूर करते हैं। इस एकादशी पर पति-पत्नी दोनों पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य और सकारात्मक सोच के साथ व्रत रखें। भगवान बाल गोपाल की आराधना करें और संतान गोपाल मंत्र का जाप करें। ईश्वर आपके आंगन को जल्द ही बच्चों की किलकारियों से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
(जय श्री कृष्ण!)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Shravana Putrada Ekadashi)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में श्रावण पुत्रदा एकादशी कब मनाई जाएगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का पावन व्रत 24 अगस्त 2026, सोमवार के दिन रखा जाएगा। पारण (व्रत खोलने का समय) अगले दिन 25 अगस्त 2026 की सुबह 06:10 से 08:35 के बीच होगा।
प्रश्न 2: पुत्रदा एकादशी साल में कितनी बार आती है?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है। पहली पौष मास के शुक्ल पक्ष में (दिसंबर या जनवरी के आस-पास) जिसे ‘पौष पुत्रदा एकादशी’ कहा जाता है, और दूसरी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में (जुलाई या अगस्त में) जिसे ‘श्रावण पुत्रदा एकादशी’ या ‘पवित्रा एकादशी’ कहा जाता है।
प्रश्न 3: क्या श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत पति-पत्नी दोनों को रखना चाहिए?
उत्तर: जी हाँ, संतान प्राप्ति की कामना के लिए यदि पति और पत्नी दोनों मिलकर पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ यह व्रत रखते हैं, तो इसका फल बहुत शीघ्र और निश्चित रूप से प्राप्त होता है। दोनों को एक साथ बैठकर संतान गोपाल मंत्र का जाप करना चाहिए।
प्रश्न 4: एकादशी के व्रत में चावल क्यों नहीं खाए जाते हैं?
उत्तर: पौराणिक मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से अगले जन्म में रेंगने वाले जीव की योनि मिलती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, चावल में जल तत्व की अधिकता होती है। एकादशी के दिन चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल जल को सबसे अधिक प्रभावित करता है, जिससे चावल खाने पर शरीर में आलस्य, भारीपन और मन में चंचलता बढ़ती है, जो उपवास और ध्यान में बाधा डालती है।
प्रश्न 5: जो महिलाएं गर्भवती हैं, क्या वे पुत्रदा एकादशी का व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: गर्भवती महिलाओं को ‘निर्जला’ (बिना पानी के) या बहुत कठोर व्रत नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इससे गर्भस्थ शिशु के पोषण पर असर पड़ सकता है। वे चाहें तो भगवान विष्णु की पूजा और कथा सुन सकती हैं और सात्विक फलाहार (दूध, फल, जूस) लेकर व्रत कर सकती हैं। ईश्वर के लिए श्रद्धा महत्वपूर्ण है, शरीर को कष्ट देना नहीं।