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Andal Jayanti 2026: अंडाल जयंती कब है? जानें देवी अंडाल का रहस्य, पूजा विधि और कथाIt takes 13 minutes... to read this article !

भारतीय संत परंपरा में भक्ति के दो प्रमुख मार्ग रहे हैं— उत्तर भारत में जहाँ मीराबाई ने भगवान कृष्ण को अपना सर्वस्व मानकर भक्ति की नई मिसाल कायम की, वहीं दक्षिण भारत में एक ऐसी महान संत और कवयित्री हुईं, जिनका भगवान विष्णु (श्री रंगनाथ) के प्रति प्रेम इतना अटूट था कि स्वयं भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। हम बात कर रहे हैं ‘देवी अंडाल’ (Goddess Andal) की, जिन्हें दक्षिण भारत की मीरा और माता भूदेवी (पृथ्वी की देवी) का अवतार माना जाता है।

तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में देवी अंडाल के जन्मोत्सव को ‘तिरुवाडिपुरम’ (Thiruvadipooram) या ‘अंडाल जयंती’ के रूप में अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक संत की जयंती नहीं है, बल्कि यह शुद्ध भक्ति, नारी सशक्तिकरण और ईश्वरीय प्रेम का एक महा-उत्सव है।

यदि आपके मन में भी यह प्रश्न है कि अंडाल जयंती कब है? (Andal Jayanti Kab Hai) और अंडाल जयंती क्या है और क्यों मनाई जाती है? तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं। इस विस्तृत और शोधपरक लेख में हम वर्ष 2026 में अंडाल जयंती की सटीक तिथि, देवी अंडाल की रहस्यमयी पौराणिक कथा, ‘तिरुप्पावै’ का महत्व, घर पर पूजा करने की विधि और सुखी दांपत्य जीवन के लिए किए जाने वाले अचूक उपायों पर गहराई से चर्चा करेंगे।

1. वर्ष 2026 में अंडाल जयंती कब है? (Andal Jayanti 2026 Date & Muhurat)

अंडाल जयंती (तिरुवाडिपुरम) की तिथि तमिल पंचांग (Tamil Calendar) के अनुसार निर्धारित की जाती है। यह पर्व तमिल महीने ‘आदि’ (Aadi) में आता है, जब चंद्रमा ‘पूरम’ (Purva Phalguni) नक्षत्र में स्थित होता है। इसे ‘आदि पूरम’ (Aadi Pooram) भी कहा जाता है। उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार, यह समय आमतौर पर श्रावण (सावन) मास के आस-पास (जुलाई-अगस्त) में पड़ता है।

वैदिक और तमिल पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में अंडाल जयंती 15 अगस्त 2026, शनिवार को मनाई जाएगी। यह दिन भारतीय स्वतंत्रता दिवस के साथ पड़ रहा है, जो इसे और भी अधिक उल्लासपूर्ण बना देगा।

अंडाल जयंती 2026: शुभ मुहूर्त तालिका (Muhurat Table)

यहाँ 15 अगस्त 2026 के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त और पूरम नक्षत्र के समय का विस्तृत विवरण दिया गया है:

पर्व / विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time)
अंडाल जयंती (तिरुवाडिपुरम) 2026 15 अगस्त 2026 (शनिवार)
पूरम (पूर्वा फाल्गुनी) नक्षत्र का आरंभ 15 अगस्त 2026, प्रातः 08:30 बजे से
पूरम नक्षत्र की समाप्ति 16 अगस्त 2026, प्रातः 06:45 बजे तक
पूजा का प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त सुबह 09:00 बजे से 11:30 बजे तक
गोधूलि बेला (शाम की पूजा) मुहूर्त शाम 06:45 बजे से 08:05 बजे तक

(नोट: अंडाल जयंती की पूजा में पूरम नक्षत्र का विशेष महत्व है। इसलिए 15 अगस्त को सुबह 08:30 बजे के बाद पूजा करना सबसे अधिक फलदायी रहेगा।)

2. देवी अंडाल कौन थीं? (Who was Goddess Andal?)

दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के 12 परम भक्त संत हुए हैं, जिन्हें ‘अलवार’ (Alvars) कहा जाता है। इन 12 अलवार संतों में देवी अंडाल एकमात्र महिला संत (Female Alvar) थीं।

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उनका वास्तविक नाम ‘गोदा’ (Goda / Kothai) था, जिसका अर्थ है ‘फूलों की माला’। उनका जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं हुआ था। वे तुलसी के पौधे के नीचे एक तुलसी के फूल के रूप में प्रकट हुई थीं। अंडाल ने अपना पूरा जीवन भगवान विष्णु (विशेषकर उनके श्री रंगनाथ स्वरूप) की भक्ति में समर्पित कर दिया था। उनकी रचनाएं ‘तिरुप्पावै’ (Thiruppavai) और ‘नाचियार तिरुमोझी’ (Nachiyar Thirumozhi) आज भी तमिल साहित्य और वैष्णव संप्रदाय की अमूल्य धरोहर हैं।

3. अंडाल जयंती क्या है और क्यों मनाई जाती है? (Significance of Andal Jayanti)

अंडाल जयंती मनाने के पीछे गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कारण छिपे हैं:

I. भूदेवी (माता पृथ्वी) का प्राकट्य दिवस

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी अंडाल साक्षात माता ‘भूदेवी’ (भगवान विष्णु की पत्नी और पृथ्वी की देवी) का अवतार थीं। उन्होंने मानव जाति को भगवान की भक्ति का सही मार्ग दिखाने के लिए धरती पर अवतार लिया था। उनके अवतरण दिवस (आदि पूरम) को मनाकर हम माता भूदेवी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

II. जीव और परमात्मा के मिलन का प्रतीक

अंडाल की कथा केवल एक संत की कथा नहीं है, बल्कि यह ‘जीवात्मा’ (मनुष्य) की ‘परमात्मा’ (ईश्वर) से मिलने की तड़प का प्रतीक है। अंडाल ने सिद्ध किया कि यदि मनुष्य पूरे हृदय और पवित्रता से ईश्वर को चाहे, तो स्वयं भगवान उसे स्वीकार करने आते हैं। अंडाल जयंती इसी ‘शुद्ध प्रेम’ (Pure Love) का उत्सव है।

III. शक्ति (देवी) की आराधना का दिन

तमिलनाडु के अधिकांश शक्ति पीठों और अम्मन मंदिरों में इस दिन देवी को कांच की चूड़ियां (Bangles) पहनाई जाती हैं (Bangle Festival)। मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने माता का स्वरूप धारण किया था। अतः यह दिन स्त्री शक्ति और मातृत्व का भी पर्व है।

4. देवी अंडाल के जन्म और विवाह की रहस्यमयी पौराणिक कथा (The Legend of Andal)

अंडाल की कथा चमत्कार, समर्पण और भक्ति के सर्वोच्च शिखर को दर्शाती है:

जन्म (The Discovery of Goda)

तमिलनाडु के ‘श्रीविल्लीपुत्तुर’ (Srivilliputhur) नामक एक गांव में विष्णुचित्त (Vishnuchitta) नामक एक महान संत रहते थे। वे भी 12 अलवार संतों में से एक थे (जिन्हें पेरियालवार कहा जाता था)। उनका मुख्य कार्य प्रतिदिन भगवान विष्णु (वटपत्रशायी) के लिए फूलों की माला गूंथना था।

एक दिन, जब विष्णुचित्त तुलसी के बगीचे में फूल तोड़ रहे थे, तो उन्हें एक नवजात कन्या मिली। यह कन्या साक्षात भूदेवी का अवतार थी। विष्णुचित्त ने उसे ईश्वर का आशीर्वाद माना और उसका नाम ‘गोदा’ रखा। उन्होंने गोदा का पालन-पोषण भगवान श्री कृष्ण की कहानियों और विष्णु भक्ति के माहौल में किया।

अंडाल का भगवान से प्रेम (The Secret Love)

जैसे-जैसे गोदा बड़ी हुईं, उनका प्रेम भगवान विष्णु (श्री रंगनाथ) के प्रति बढ़ता गया। उन्होंने मन ही मन भगवान श्री रंगनाथ को अपना पति मान लिया। गोदा के पिता प्रतिदिन भगवान के लिए जो माला बनाते थे, गोदा चुपके से उस माला को पहले खुद पहन लेती थीं। वह यह देखना चाहती थीं कि क्या वह माला भगवान पर अच्छी लगेगी या नहीं। माला पहनने के बाद वह उसे वापस टोकरी में रख देती थीं, और उनके पिता अनजाने में वही माला भगवान को पहना देते थे। (गोदा का अर्थ है— जो भगवान पर शासन करती है)।

भगवान का स्वप्न (The Divine Revelation)

एक दिन पिता विष्णुचित्त ने गोदा को माला पहनते हुए देख लिया। वे बहुत क्रोधित हुए कि उनकी बेटी ने भगवान के लिए बनाई गई माला को जूठा (अपवित्र) कर दिया है। उस दिन उन्होंने वह माला भगवान को नहीं चढ़ाई और क्षमा मांगी।

उसी रात भगवान विष्णु ने विष्णुचित्त के स्वप्न में आकर कहा, “हे विष्णुचित्त! आज तुमने मुझे माला क्यों नहीं पहनाई? मुझे वही माला पसंद है जो पहले गोदा ने पहनी हो। उसमें उसका सच्चा प्रेम और सुगंध है।”

यह सुनकर विष्णुचित्त को एहसास हुआ कि गोदा कोई साधारण बालिका नहीं, बल्कि साक्षात देवी है। उसी दिन से गोदा का नाम ‘अंडाल’ (जिसने भगवान पर विजय प्राप्त कर ली हो) पड़ गया।

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श्री रंगनाथ से विवाह (The Divine Marriage)

जब अंडाल विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने घोषणा कर दी कि वह केवल और केवल ‘श्रीरंगम’ के पीठाधीश्वर भगवान ‘श्री रंगनाथ’ से ही विवाह करेंगी। उनके पिता चिंतित हो गए। तब भगवान रंगनाथ ने श्रीरंगम के पुजारियों को स्वप्न में आदेश दिया कि वे एक पालकी लेकर श्रीविल्लीपुत्तुर जाएं और अंडाल को पूरे सम्मान के साथ दुल्हन के रूप में श्रीरंगम लाएं।

जब अंडाल दुल्हन के रूप में श्रीरंगम मंदिर के गर्भगृह में पहुंचीं, तो वह एक दिव्य प्रकाश में बदल गईं और साक्षात भगवान श्री रंगनाथ की मूर्ति में विलीन (Merge) हो गईं। यह जीवात्मा का परमात्मा में अमर मिलन था।

5. अंडाल जयंती (तिरुवाडिपुरम) की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

दक्षिण भारत में यह पूजा अत्यंत विस्तृत होती है, लेकिन यदि आप घर पर अंडाल जयंती की पूजा करना चाहते हैं, तो 15 अगस्त 2026 को इस सरल विधि का पालन करें:

१. प्रातःकालीन स्नान और संकल्प

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। स्नान के बाद स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र (विशेषकर रेशमी साड़ी या धोती) धारण करें।

  • हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि आप देवी अंडाल और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए आज पूजा कर रहे हैं।

२. चौकी की स्थापना और सजावट

  • एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।

  • उस पर देवी अंडाल और भगवान श्री रंगनाथ (विष्णु) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। (अंडाल देवी की पहचान उनके जूड़े (Hair bun) और हाथ में तोते (Parrot) से होती है)।

  • चौकी को ताजे फूलों और तुलसी के पत्तों से सजाएं।

३. देवी अंडाल का श्रृंगार और पुष्प माला

  • देवी अंडाल को फूलों की माला अत्यंत प्रिय थी। इसलिए घर पर ताजे फूलों (विशेषकर चमेली, गुलाब और तुलसी) से अपने हाथों से एक सुंदर माला बनाएं।

  • देवी को वह माला पहनाएं और उन्हें लाल कुमकुम, हल्दी और चंदन का तिलक लगाएं।

४. तिरुप्पावै का पाठ (Recitation of Thiruppavai)

  • देवी अंडाल द्वारा रचित 30 भजनों का संग्रह ‘तिरुप्पावै’ कहलाता है। पूजा के दौरान इसका पाठ करना सबसे अधिक शुभ माना जाता है। (यदि तमिल नहीं आती, तो आप विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो नारायणाय” का जाप कर सकते हैं)।

५. नैवेद्य (भोग) और आरती

  • दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार इस दिन ‘चक्कर पोंगल’ (Chakkara Pongal – गुड़ और चावल की मीठी डिश), अक्कारावदीसल (Akkaravadisal), और ताजे फलों का भोग लगाया जाता है।

  • अंत में गाय के घी का दीपक जलाकर देवी अंडाल और भगवान विष्णु की आरती करें।

6. श्रीविल्लीपुत्तुर मंदिर: अंडाल की जन्मभूमि (The Srivilliputhur Temple)

अंडाल जयंती के दिन तमिलनाडु के ‘श्रीविल्लीपुत्तुर अंडाल मंदिर’ (Srivilliputhur Andal Temple) का नजारा देखने लायक होता है। यह वही स्थान है जहाँ अंडाल का जन्म हुआ था।

  • मंदिर का गोपुरम: इस मंदिर का गोपुरम (मुख्य द्वार की मीनार) इतना भव्य है कि इसे तमिलनाडु सरकार के आधिकारिक ‘राज्य चिह्न’ (State Emblem) के रूप में अपनाया गया है।

  • रथ यात्रा (Chariot Festival): आदि पूरम के दिन यहाँ एक विशाल रथ यात्रा निकाली जाती है। देवी अंडाल और भगवान रंगमन्नार की मूर्तियों को एक विशाल रथ में बिठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है। लाखों भक्त इस रथ को खींचने के लिए आते हैं।

  • कांच की चूड़ियों का प्रसाद: इस दिन मंदिर में आने वाली सभी सुहागिन महिलाओं को कांच की चूड़ियां (Glass Bangles) प्रसाद के रूप में दी जाती हैं।

7. अंडाल जयंती के दिन किए जाने वाले अचूक उपाय (Special Astrological Remedies)

देवी अंडाल विवाह, प्रेम और अखंड सौभाग्य की प्रतीक हैं। यदि आपके जीवन में विवाह या दांपत्य सुख से जुड़ी समस्याएं हैं, तो इस दिन (15 अगस्त 2026) निम्नलिखित उपाय (Upay) अवश्य करें:

I. विवाह में देरी दूर करने के उपाय (For Early Marriage)

जिन कन्याओं या युवकों के विवाह में बार-बार बाधाएं आ रही हैं, उन्हें अंडाल जयंती के दिन देवी अंडाल या माता लक्ष्मी को अपने हाथों से गूंथी हुई ताजे फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। साथ ही ‘तिरुप्पावै’ के भजनों का ऑडियो सुनें। देवी अंडाल की कृपा से शीघ्र विवाह के योग बन जाते हैं।

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II. दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ाने के लिए (For Marital Bliss)

पति-पत्नी के बीच यदि कलह रहता है, तो इस दिन माता को लाल रंग की 11 कांच की चूड़ियां और कुमकुम अर्पित करें। पूजा के बाद उन चूड़ियों को पत्नी स्वयं धारण कर ले और उसी कुमकुम से मांग भरे। इससे पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम बढ़ता है।

III. संतान प्राप्ति के लिए उपाय

आदि पूरम का दिन शक्ति (देवी) की मातृत्व ऊर्जा का भी दिन है। जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिल रहा है, उन्हें इस दिन देवी के मंदिर में जाकर ‘चक्कर पोंगल’ (गुड़ की खीर) का भोग लगाना चाहिए और उसे 9 छोटी कन्याओं को प्रसाद रूप में बांटना चाहिए।

IV. घर में धन और शांति के लिए

अंडाल देवी को माता भूदेवी (पृथ्वी) का रूप माना जाता है। इस दिन घर के आंगन में या तुलसी के पौधे के पास गाय के घी का दीपक जलाएं और तुलसी माता की 11 परिक्रमा करें। इससे घर की दरिद्रता दूर होती है।

8. मार्गशीर्ष (Margazhi) और तिरुप्पावै का महत्व

यद्यपि अंडाल का जन्म ‘आदि’ (श्रावण) महीने में हुआ था, लेकिन उनकी रचनाओं का पाठ मुख्य रूप से सर्दियों में ‘मार्गशीर्ष’ (Margazhi) महीने में किया जाता है। मार्गशीर्ष (दिसंबर-जनवरी) के दौरान दक्षिण भारत के सभी वैष्णव मंदिरों में सुबह-सुबह ‘तिरुप्पावै’ के भजनों का गायन होता है।

अंडाल ने इन भजनों में कल्पना की थी कि वह एक ‘गोपी’ है और श्री कृष्ण को जगाने के लिए अन्य सखियों के साथ जा रही है। यह साहित्य और भक्ति का ऐसा अनूठा संगम है, जो मनुष्य के अहंकार को गलाकर उसे ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है।

Andal Jayanti 2026 (तिरुवाडिपुरम) केवल दक्षिण भारत का एक क्षेत्रीय त्योहार नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए एक आध्यात्मिक संदेश है। 15 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी कठोर योग या संन्यास की आवश्यकता नहीं है; शुद्ध प्रेम, सरल हृदय और अटूट विश्वास ही ईश्वर तक पहुँचने का सबसे छोटा मार्ग है।

देवी अंडाल (गोदा) का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि हमारी भावना सच्ची है, तो भगवान हमारी जूठी माला भी प्रेम से पहन लेते हैं। इस वर्ष आप भी अंडाल जयंती के दिन अपने घर में तुलसी माता की पूजा करें, भगवान विष्णु को फूलों की माला अर्पित करें और अपने भीतर के अहंकार को मिटाकर ईश्वर से प्रेम करना सीखें। देवी अंडाल आपके जीवन को सुख, सौभाग्य और ईश्वरीय प्रेम से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।

“ॐ नमो नारायणाय! आंडाल तिरुवडीगले शरणम्!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Andal Jayanti 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में अंडाल जयंती (तिरुवाडिपुरम) कब है?

उत्तर: तमिल पंचांग के अनुसार, ‘आदि’ महीने के ‘पूरम’ नक्षत्र में अंडाल जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह शुभ तिथि और नक्षत्र 15 अगस्त 2026, शनिवार के दिन पड़ रहा है। (यह भारत के स्वतंत्रता दिवस के दिन ही है)।

प्रश्न 2: देवी अंडाल (Andal) को दक्षिण भारत की मीरा क्यों कहा जाता है?

उत्तर: जिस प्रकार उत्तर भारत में संत मीराबाई ने भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मानकर अपना पूरा जीवन उनकी भक्ति और विरह में बिता दिया, ठीक उसी प्रकार दक्षिण भारत में देवी अंडाल ने भगवान श्री रंगनाथ (विष्णु) को अपना पति मानकर उनके प्रति अटूट प्रेम और भक्ति प्रदर्शित की। उनके इसी निस्वार्थ और शुद्ध प्रेम के कारण उन्हें ‘दक्षिण भारत की मीरा’ कहा जाता है।

प्रश्न 3: देवी अंडाल (गोदा) के माता-पिता कौन थे?

उत्तर: देवी अंडाल का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं हुआ था। वे विष्णुचित्त (पेरियालवार) नामक एक महान संत को श्रीविल्लीपुत्तुर के मंदिर के बगीचे में तुलसी के पौधे के नीचे एक फूल के रूप में मिली थीं। विष्णुचित्त ने ही उन्हें अपनी पुत्री ‘गोदा’ के रूप में पाला था। धार्मिक मान्यता है कि वे साक्षात माता भूदेवी (पृथ्वी की देवी) का अवतार थीं।

प्रश्न 4: देवी अंडाल की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाएं कौन सी हैं?

उत्तर: देवी अंडाल ने तमिल साहित्य को दो अमूल्य रचनाएं दी हैं: पहला ‘तिरुप्पावै’ (Thiruppavai), जिसमें 30 भक्ति भजन हैं जो भगवान विष्णु को जगाने और उनकी स्तुति करने के लिए गाए जाते हैं। दूसरा ‘नाचियार तिरुमोझी’ (Nachiyar Thirumozhi), जिसमें 143 छंद हैं जो भगवान रंगनाथ के प्रति उनके विरह और प्रेम को दर्शाते हैं।

प्रश्न 5: अंडाल जयंती के दिन सुहागिन महिलाओं को कांच की चूड़ियां क्यों बांटी जाती हैं?

उत्तर: अंडाल जयंती (आदि पूरम) को मातृत्व और शक्ति की आराधना का दिन भी माना जाता है। दक्षिण भारत की मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी पार्वती माता के रूप में आती हैं और उनकी ‘गोदभराई’ (Baby Shower / Valaikappu) की रस्म की जाती है। इसी खुशी में मंदिरों में देवी को कांच की चूड़ियां पहनाई जाती हैं और बाद में उन्हें सुहागिन महिलाओं और गर्भवती स्त्रियों को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है ताकि उनका सुहाग और संतान सुरक्षित रहें।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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