सनातन हिंदू धर्म में प्रकृति, कृषि और देवी-देवताओं के जन्मोत्सवों का गहरा संबंध है। इन्हीं पावन पर्वों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और माताओं की श्रद्धा का प्रतीक पर्व है— ‘हल षष्ठी’ (Hal Shashthi)। इसे भारत के विभिन्न हिस्सों में ‘बलराम जयंती’ (Balaram Jayanti), ‘ललई छठ’ (Lalahi Chhath), ‘हर छठ’ (Har Chhath), ‘बलदेव छठ’, और ‘रंधन छठ’ (Randhan Chhath) जैसे कई नामों से जाना जाता है।
यह पावन दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई, शेषावतार भगवान ‘बलराम’ (दाऊ दयाल) के प्राकट्य दिवस (जन्मोत्सव) के रूप में मनाया जाता है। भगवान बलराम का मुख्य अस्त्र ‘हल’ (Plough) है, इसीलिए इस त्योहार को ‘हल षष्ठी’ कहा जाता है। यह पर्व माताओं द्वारा अपने पुत्रों की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठोर और फलदायी व्रत है, साथ ही यह किसान भाइयों के लिए कृषि के देवता की वंदना का दिन भी है।
यदि आप भी जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में हल षष्ठी (बलराम जयंती) कब है, इस व्रत के क्या कड़े नियम हैं, पसही (तिन्नी) के चावल का क्या महत्व है, पूजा की शास्त्र-सम्मत विधि क्या होनी चाहिए और अपनी संतान के उत्तम भविष्य के लिए कौन से अचूक उपाय करने चाहिए, तो यह अत्यंत विस्तृत, ज्ञानवर्धक और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।
1. वर्ष 2026 में हल षष्ठी (बलराम जयंती) कब है? (Hal Shashthi 2026 Date & Time)
हिंदू पंचांग के अनुसार, हल षष्ठी या बलराम जयंती का पर्व हर वर्ष भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) से ठीक दो दिन पहले आता है। (दक्षिण भारत के अमावस्यांत पंचांग के अनुसार इसे श्रावण मास का कृष्ण पक्ष माना जाता है, लेकिन त्योहार का दिन एक ही रहता है)।
वैदिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में हल षष्ठी (बलराम जयंती) का पावन पर्व 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाया जाएगा।
हल षष्ठी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)
किसी भी व्रत और पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है, जब उसे सही मुहूर्त में किया जाए। 2026 में हल षष्ठी के व्रत और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त की तालिका यहाँ दी गई है:
| विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time 2026) |
| हल षष्ठी (बलराम जयंती) की मुख्य तिथि | 2 सितंबर 2026 (बुधवार) |
| भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि का आरंभ | 2 सितंबर 2026, प्रातः 06:13 बजे से |
| भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि की समाप्ति | 3 सितंबर 2026, प्रातः 04:26 बजे तक |
| प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त | सुबह 07:35 बजे से 09:10 बजे तक |
| अभिजीत मुहूर्त (दोपहर की पूजा) | सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक |
| गोधूलि बेला (संध्या पूजा का समय) | शाम 06:35 बजे से 07:55 बजे तक |
(नोट: चूँकि 2 सितंबर की सुबह 06:13 बजे से षष्ठी तिथि लग रही है और पूरे दिन व्याप्त रहेगी, इसलिए व्रत और पूजा-अनुष्ठान 2 सितंबर 2026, बुधवार को ही संपन्न किए जाएंगे।)
2. हल षष्ठी क्या है और क्यों मनाई जाती है? (Significance of Hal Shashthi)
‘हल’ (Plough) कृषि का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है, जिससे धरती का सीना चीरकर बीज बोए जाते हैं, और ‘षष्ठी’ (छठ) वह तिथि है जिस दिन भगवान बलराम का जन्म हुआ था। भगवान बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है और वे अत्यंत बलशाली थे। उन्होंने अपने अस्त्र के रूप में ‘हल’ और ‘मूसल’ को धारण किया था, इसलिए उन्हें ‘हलधर’ भी कहा जाता है।
इस पर्व को मनाने के पीछे कई गहरे धार्मिक, सामाजिक और कृषि आधारित कारण छिपे हैं:
I. भगवान बलराम का जन्मोत्सव
द्वापर युग में जब कंस के अत्याचार बढ़ गए, तब भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लेने से पहले शेषनाग को अपने बड़े भाई के रूप में पृथ्वी पर भेजा। भगवान बलराम माता देवकी के सातवें गर्भ में आए थे, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया था। भाद्रपद कृष्ण षष्ठी के दिन उनका जन्म हुआ था। उनकी जयंती मनाकर हम शक्ति, शौर्य और धर्म की स्थापना की वंदना करते हैं।
II. संतान की रक्षा का पर्व (Lalahi Chhath)
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में इस दिन माताएं अपनी संतानों (विशेषकर पुत्रों) की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में आने वाले सभी संकटों से रक्षा के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। भगवान बलराम ने जिस प्रकार हमेशा अपने छोटे भाई कृष्ण की रक्षा की, उसी प्रकार माताएं प्रार्थना करती हैं कि बलराम जी उनकी संतानों की भी रक्षा करें।
III. कृषि और किसानों का सम्मान
भगवान बलराम को भारत का पहला कृषि देवता (God of Agriculture) माना जाता है। उन्होंने यमुना नदी का मार्ग बदलकर खेतों तक पानी पहुँचाया था और खेती की नई तकनीकें सिखाई थीं। इसलिए हल षष्ठी के दिन किसान अपने ‘हल’ (Plough) और खेती के अन्य उपकरणों की पूजा करते हैं।
IV. मन की भूमि को जोतना (Spiritual Meaning)
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, जिस प्रकार हल से कठोर मिट्टी को खोदा जाता है ताकि वह उपजाऊ बन सके, उसी प्रकार भगवान बलराम (गुरु रूप में) हमारे हृदय रूपी कठोर मिट्टी को जोतकर उसमें से अहंकार, क्रोध और अज्ञानता रूपी खरपतवार को निकाल देते हैं, ताकि उसमें ईश्वर के प्रति प्रेम और शांति का बीज बोया जा सके।
3. हल षष्ठी (ललई छठ) व्रत के कड़े और विशिष्ट नियम (Rules of Hal Shashthi Vrat)
हल षष्ठी का व्रत आम व्रतों से बिल्कुल अलग है। इस व्रत में प्रकृति और कृषि के प्रति एक विशेष सम्मान प्रकट किया जाता है, जिसके कारण इसके नियम बहुत कठोर और अनूठे होते हैं:
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हल से जुता हुआ अन्न वर्जित है: यह हल षष्ठी व्रत का सबसे बड़ा नियम है। इस दिन व्रत करने वाली माताएं उस अन्न, फल या सब्जी का सेवन बिल्कुल नहीं करतीं जो खेत में हल चलाकर (जुताई करके) उगाए गए हों। (अर्थात गेहूं, साधारण चावल, दाल, आदि पूर्णतः वर्जित हैं)।
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पसही या तिन्नी का चावल (Tinni Rice): इस व्रत में मुख्य रूप से तालाबों में अपने आप उगने वाले ‘पसही’ (तिन्नी) के चावल का सेवन किया जाता है, क्योंकि इसे उगाने के लिए हल नहीं चलाना पड़ता।
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गाय के दूध और घी का निषेध: इस पावन व्रत में गाय का दूध, दही या गाय के घी का प्रयोग वर्जित होता है। इसका कारण यह है कि गाय के बछड़े बैल बनकर हल खींचते हैं, और यह दिन हल को आराम देने का है। इस दिन केवल भैंस का दूध, भैंस का दही और भैंस का घी ही पूजा में चढ़ाया जाता है और व्रती द्वारा खाया जाता है।
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महुए का विशेष प्रयोग: पूजा में और फलाहार में ‘महुए’ (Mahua) के पेड़ की दातुन, महुए के पत्ते और महुए का फल विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह भी बिना जोते जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है।
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मिट्टी का चूल्हा: व्रत का भोजन पकाने के लिए मिट्टी के चूल्हे और भैंस के गोबर के कंडे का प्रयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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निर्जला या फलाहारी: कई माताएं इस व्रत को पूरे दिन निर्जला रखती हैं और शाम को पूजा और कथा सुनने के बाद तिन्नी के चावल और भैंस के दूध से पारण करती हैं।
4. हल षष्ठी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
यदि आप 2 सितंबर 2026 को हल षष्ठी का व्रत रख रही हैं, तो इस शास्त्र-सम्मत और पारंपरिक विधि से पूजा करें:
१. प्रातःकालीन स्नान और संकल्प
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षष्ठी तिथि की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें। महुए की दातुन से दांत साफ करें।
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स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र (पीले या सुहाग के रंग के) धारण करें।
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हाथ में कुश (घास), भैंस का दूध और जल लेकर संकल्प लें: “हे हलधर बलराम जी! मैं (अपना नाम और गोत्र), अपने पुत्र/संतान की लंबी आयु, आरोग्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए आज हल षष्ठी का व्रत कर रही हूँ। कृपया मेरे व्रत को निर्विघ्न पूर्ण करें।”
२. पूजा स्थल की तैयारी (छठ माता का निर्माण)
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घर के आंगन में या किसी साफ स्थान पर गाय/भैंस के गोबर से लिपाई करें।
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वहां मिट्टी से एक छोटा सा तालाब (कुंड) बनाएं। उस तालाब के किनारे झरबेरी (Ber), पलाश और कांसी (Kush grass) की टहनियां गाड़ दें। (इसे सगरी कहा जाता है)।
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दीवार पर गोबर या गेरू से छठी माता (हल षष्ठी माता) का चित्र बनाएं।
३. भगवान बलराम और षष्ठी माता की पूजा
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सगरी (तालाब) के पास एक लकड़ी की चौकी पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
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सबसे पहले भगवान गणेश जी की पूजा करें।
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इसके बाद भगवान बलराम और षष्ठी माता को रोली, अक्षत, पीला चंदन, और फूल अर्पित करें।
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उन्हें भैंस का दूध, भैंस का दही, और महुए का फल चढ़ाएं।
४. सात अनाजों (सतनजा) का अर्पण
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इस पूजा में भुना हुआ ‘सतनजा’ (सात प्रकार का बिना जुता हुआ अन्न या भुने हुए चने, मक्का, ज्वार आदि) अर्पित किया जाता है।
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धूप और घी (भैंस का) का दीपक जलाएं।
५. व्रत कथा और आरती
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पूजा स्थल पर बैठकर हाथ में तिन्नी का चावल और कुश लेकर ‘हल षष्ठी की व्रत कथा’ (कथा नीचे दी गई है) का पाठ करें या किसी अन्य महिला से सुनें।
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कथा सुनने के बाद भगवान बलराम जी और छठी माता की आरती करें।
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अंत में अपनी संतान की रक्षा के लिए प्रार्थना करें और पूजा में हुई भूल-चूक की क्षमा मांगें।
६. पारण (व्रत खोलना)
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शाम के समय (या चंद्रोदय के बाद) माताएं भैंस के दूध, तिन्नी के चावल और महुए से बने प्रसाद को ग्रहण करके अपना व्रत खोलती हैं।
5. हल षष्ठी (ललई छठ) की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)
हल षष्ठी की कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से यह पौराणिक कथा सबसे अधिक सुनी जाती है:
कथा (एक ग्वालिन और बछड़े की कहानी):
प्राचीन काल में एक दूध बेचने वाली ग्वालिन (अहीरिन) थी। वह गर्भवती थी, फिर भी दूध-दही बेचने का काम करती थी। हल षष्ठी (हर छठ) के दिन उसे प्रसव पीड़ा (Labor pain) शुरू हुई, लेकिन वह लालच में आकर दूध-दही बेचने निकल पड़ी। रास्ते में ही उसने एक खेत के किनारे एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।
ग्वालिन ने अपने नवजात शिशु को खेत के पास ही कंटीली झाड़ियों (झरबेरी) के नीचे एक कपड़े में लपेट कर रख दिया और पास के गांव में दूध बेचने चली गई।
वह दिन हल षष्ठी का था। गांव में सभी माताएं हल षष्ठी की पूजा कर रही थीं। नियम के अनुसार, आज के दिन गाय का दूध और दही वर्जित था, केवल भैंस का दूध ही पूजा में इस्तेमाल किया जाना था। लेकिन उस लालची ग्वालिन ने गांव की महिलाओं से झूठ बोल दिया कि यह भैंस का दूध है, जबकि वास्तव में वह गाय का दूध और दही था। महिलाओं ने अनजाने में उसी गाय के दूध से हल षष्ठी माता की पूजा कर ली, जिससे माता क्रोधित हो गईं।
ग्वालिन के इस पाप और झूठ का दंड उसे तुरंत मिल गया। जब वह गांव से दूध बेचकर लौटी, तो उसने देखा कि खेत में काम कर रहे एक किसान का हल गलती से उसके नवजात शिशु को लग गया था और बच्चा मृत पड़ा था।
यह देखकर ग्वालिन जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसे तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया कि उसने हल षष्ठी माता के व्रत में झूठ बोलकर गाय का दूध बेचा है, और उसी पाप के कारण उसके बेटे की मृत्यु हुई है।
वह रोती हुई तुरंत गांव में वापस गई और उन सभी व्रत करने वाली महिलाओं के पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगी। उसने अपना पाप स्वीकार कर लिया कि उसने भैंस के दूध की जगह गाय का दूध दिया था। महिलाओं को उस पर दया आ गई। उन्होंने ग्वालिन को क्षमा कर दिया और हल षष्ठी माता से प्रार्थना की कि, “हे माता! इस अज्ञानी को क्षमा कर दें और इसके पुत्र को जीवनदान दें।”
चूंकि ग्वालिन ने सत्य बोलकर प्रायश्चित कर लिया था, इसलिए हल षष्ठी माता (षष्ठी देवी) प्रसन्न हो गईं। जब ग्वालिन वापस उस खेत में गई, तो उसने देखा कि उसका पुत्र जीवित हो गया है और झाड़ियों के नीचे खेल रहा है। ग्वालिन ने प्रसन्न होकर षष्ठी माता को दंडवत प्रणाम किया। उसी दिन से उसने हर वर्ष पूरे नियम और निष्ठा के साथ हल षष्ठी का व्रत करना शुरू कर दिया।
(कथा के अंत में कहें: हे हल षष्ठी माता! जिस प्रकार आपने उस ग्वालिन के पुत्र की रक्षा की, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वाली सभी माताओं की संतानों की रक्षा करना।)
6. देश के विभिन्न राज्यों में हल षष्ठी का स्वरूप (Regional Variations of Hal Shashthi)
भारत विविधताओं का देश है। भगवान बलराम का यह जन्मोत्सव देश के अलग-अलग कोनों में अपनी स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है:
I. ब्रज और मथुरा (उत्तर प्रदेश): ‘बलदेव छठ’ (Baldev Chhath)
भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और विशेषकर ‘दाऊजी’ (बलदेव) मंदिर में यह दिन अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है। यहां इसे ‘बलदेव छठ’ कहा जाता है। ब्रजवासी इस दिन भगवान बलराम की विशाल प्रतिमा का दूध और पंचामृत से अभिषेक करते हैं। यहां बलराम जी को भद्राक्ष और छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं।
II. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार: ‘ललई छठ’ या ‘हर छठ’
इन क्षेत्रों में यह पर्व माताओं द्वारा अपने पुत्रों की रक्षा के लिए रखा जाता है। इसे ललई छठ या हर छठ कहते हैं। यहां महिलाएं तालाब बनाकर पूजा करती हैं और पलाश के पत्तों पर भुने हुए सतनजे (सात अनाज) का प्रसाद चढ़ाती हैं। पसही (तिन्नी) के चावल का सेवन यहां की मुख्य परंपरा है।
III. गुजरात: ‘रंधन छठ’ (Randhan Chhath)
गुजरात में इस दिन को रंधन छठ के रूप में जाना जाता है। रंधन का अर्थ है ‘भोजन पकाना’। इस दिन महिलाएं अगले दिन (शीतला सप्तमी) के लिए रात को ही खूब सारा स्वादिष्ट भोजन (मिठाइयां, थेपला आदि) पका कर रख लेती हैं, क्योंकि अगले दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और बासी (ठंडा) भोजन खाकर माता शीतला की पूजा की जाती है, ताकि बच्चों को बीमारियों से बचाया जा सके।
IV. ओड़िशा (Odisha)
ओड़िशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर में भगवान बलभद्र (बलराम) मुख्य देवताओं में से एक हैं। हल षष्ठी के दिन वहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और किसान अपने खेती के उपकरणों की पूजा करते हैं।
7. हल षष्ठी 2026 पर किए जाने वाले अचूक और विशेष उपाय (Astrological Remedies)
यदि 2 सितंबर 2026 को हल षष्ठी के दिन आप कुछ विशेष ज्योतिषीय और आध्यात्मिक उपाय (Upay) करते हैं, तो भगवान बलराम की कृपा से जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं:
I. संतान के स्वास्थ्य और बुरी नजर से रक्षा के लिए
यदि आपकी संतान बार-बार बीमार पड़ती है या उसे नजर बहुत लगती है, तो हल षष्ठी के दिन भगवान बलराम के मंदिर में या घर पर उनके चित्र के सामने ‘काले रंग का धागा’ रखें। पूजा के बाद उस धागे पर हल्दी लगाएं और “ॐ श्री बलभद्राय नमः” मंत्र का 21 बार जाप करके उस धागे को अपने बच्चे के गले या दाहिनी कलाई पर बांध दें। यह एक अभेद्य रक्षा-कवच का काम करेगा।
II. शारीरिक और मानसिक शक्ति प्राप्ति के लिए
भगवान बलराम असीम बल और शक्ति के प्रतीक हैं। यदि आप मानसिक रूप से कमजोर महसूस कर रहे हैं या शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं, तो इस दिन भगवान बलराम को ‘माखन-मिश्री’ का भोग लगाएं और किसी भी व्यायामशाला (Gym/Akhada) में जाकर मिट्टी को प्रणाम करें या कुछ दान करें। इससे शारीरिक बल में वृद्धि होती है।
III. किसानों की अच्छी फसल और उन्नति के लिए
किसान भाइयों को इस दिन अपने ‘हल’ (Tractor या खेती के अन्य उपकरण) को अच्छी तरह धोकर साफ करना चाहिए। उस पर रोली-चंदन से स्वास्तिक बनाना चाहिए और फूल चढ़ाने चाहिए। खेत में एक छोटा सा पौधा अवश्य लगाएं। भगवान बलराम की कृपा से पूरे वर्ष फसल अच्छी होती है और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव होता है।
IV. घर के क्लेश और क्रोध शांत करने के लिए (For Peace)
भगवान बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है, इसलिए उनका क्रोध बहुत तेज था। यदि घर में पति या बच्चों को बहुत गुस्सा आता है, तो हल षष्ठी के दिन शिवलिंग पर ठंडा जल (भैंस के दूध में मिलाकर) चढ़ाएं और चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा अर्पित करें। इससे परिवार का क्रोध शांत होता है और प्रेम बढ़ता है।
8. हल षष्ठी का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Perspective)
भारत के त्योहार केवल अंधविश्वास नहीं हैं; उनके पीछे गहरा विज्ञान और मनोविज्ञान छिपा है:
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तिन्नी के चावल और भैंस का दूध: भाद्रपद (मानसून) के मौसम में पाचन तंत्र (Digestive system) बहुत कमजोर हो जाता है। साधारण चावल पचने में भारी होते हैं, जबकि तिन्नी (जंगली चावल) फाइबर से भरपूर और पचने में बहुत आसान होते हैं। भैंस का दूध शरीर को शीतलता (Coolness) प्रदान करता है, जो मानसून की उमस भरी गर्मी में शरीर के तापमान को नियंत्रित रखता है।
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हल न चलाना (Resting the Soil): यह त्योहार कृषि भूमि और बैलों को आराम देने का संदेश देता है। लगातार जुताई करने से मिट्टी की उर्वरता (Fertility) कम हो जाती है। यह दिन इकोलॉजी (Ecology) और प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है।
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मातृत्व का मनोविज्ञान: यह व्रत माताओं को मानसिक शक्ति देता है। जब एक मां पूरे दिन भूखी-प्यासी रहकर अपनी संतान के लिए प्रार्थना करती है, तो उसके भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से बच्चे के मनोविज्ञान और स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव डालती है।
Hal Shashthi 2026 (2 सितंबर 2026) का पर्व केवल एक दिन का उपवास नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि, शक्ति और निस्वार्थ मातृत्व के संगम का एक महा-उत्सव है। भगवान बलराम का हल हमें यह संदेश देता है कि जीवन में सफलता पाने के लिए हमें अपने मन की बंजर भूमि को जोतकर उसमें कर्म और भक्ति के बीज बोने होंगे।
माताओं का यह कठिन व्रत यह सिद्ध करता है कि दुनिया में एक मां की प्रार्थनाओं से बढ़कर कोई रक्षा-कवच नहीं है। इस वर्ष आप भी हल षष्ठी का व्रत पूरे विधि-विधान और कड़े नियमों (जैसे हल से जुता हुआ अन्न न खाना) के साथ रखें। भगवान दाऊ दयाल (बलराम जी) और छठी माता आपके बच्चों को दीर्घायु करें, उनके जीवन से सभी संकटों का नाश करें और आपके घर को सुख-समृद्धि से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।
“बोलो हलधर बलराम भगवान की जय! छठी माता की जय!”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Hal Shashthi 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में हल षष्ठी (बलराम जयंती / ललई छठ) किस तारीख को है?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, हल षष्ठी का पावन पर्व भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 2 सितंबर 2026, बुधवार को पड़ रही है। इसी दिन बलराम जयंती, हर छठ और रंधन छठ भी मनाई जाएगी।
प्रश्न 2: हल षष्ठी के व्रत में गाय का दूध या घी क्यों वर्जित है?
उत्तर: हल षष्ठी कृषि और हल की वंदना का दिन है। चूंकि गाय का बछड़ा (बैल) ही हल खींचकर खेतों की जुताई करता है, इसलिए इस दिन गाय और उसके बछड़े के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए गाय के दूध, दही या घी का प्रयोग वर्जित माना जाता है। इस व्रत में केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 3: हल षष्ठी के व्रत में कौन सा अन्न खाया जाता है?
उत्तर: हल षष्ठी व्रत का सबसे कड़ा नियम यह है कि इस दिन हल चलाकर (जुताई करके) उगाया गया कोई भी अन्न, फल या सब्जी नहीं खाई जाती है (जैसे गेहूं, साधारण चावल, दालें आदि)। इस व्रत में तालाबों या जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले ‘पसही’ या ‘तिन्नी के चावल’ (Wild Rice) का ही सेवन किया जाता है। साथ ही महुए (Mahua) का प्रयोग फलाहार में होता है।
प्रश्न 4: हल षष्ठी की पूजा में सगरी (तालाब) और पलाश का क्या महत्व है?
उत्तर: पूजा के दौरान आंगन में मिट्टी और गोबर से एक छोटा सा प्रतीकात्मक तालाब (कुंड) बनाया जाता है जिसे ‘सगरी’ कहते हैं। इसके किनारे झरबेरी, कांसी की घास और पलाश की टहनियां गाड़ी जाती हैं। यह प्रकृति, जल स्रोत और कृषि भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। माताएं इन्हीं के पास बैठकर पूजा करती हैं और भगवान बलराम (कृषि देवता) से अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं।
प्रश्न 5: क्या यह व्रत केवल पुत्रवती माताएं ही रख सकती हैं?
उत्तर: प्राचीन काल की मान्यताओं के अनुसार यह व्रत मुख्य रूप से पुत्रों की रक्षा के लिए (ललई छठ के रूप में) रखा जाता था। लेकिन आधुनिक समय में, माताएं अपनी ‘संतान’ (चाहे वह पुत्र हो या पुत्री) के कल्याण, लंबी आयु और संकटों से रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं। भगवान की दृष्टि में पुत्र और पुत्री दोनों समान हैं।