Home Blog

Bach Baras 2026 Date: बछ बारस कब है? जानें सही तिथि, पूजा विधि, महत्व और व्रत कथाIt takes 15 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में प्रकृति, नदियों, वृक्षों और पशु-पक्षियों को देवताओं के समान पूजनीय माना गया है। पशुओं में ‘गौ माता’ (गाय) का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि वेदों के अनुसार गाय के शरीर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इसी गौ माता और उनके बछड़े (Calf) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और अपनी संतान की लंबी आयु की कामना के लिए एक अत्यंत ही पवित्र व्रत रखा जाता है, जिसे ‘बछ बारस’ (Bach Baras) कहा जाता है।

इसे ‘गोवत्स द्वादशी’ (Govatsa Dwadashi) के नाम से भी जाना जाता है। मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह त्योहार बहुत ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। माताएं इस दिन पूर्ण रूप से व्रत रखती हैं, गाय और बछड़े की पूजा करती हैं, और अपने पुत्रों व परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। इस व्रत के नियम बहुत ही अनूठे और कठिन होते हैं, जैसे इस दिन चाकू से कटी हुई कोई भी चीज़ नहीं खाई जाती और गाय के दूध का पूर्णतः त्याग किया जाता है।

यदि आप भी जानना चाहती हैं कि वर्ष 2026 में बछ बारस कब है (Bach Baras 2026 Date), इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की सही विधि क्या होनी चाहिए, इस व्रत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है और अपनी संतान के उत्तम भविष्य के लिए कौन से उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।

1. वर्ष 2026 में बछ बारस कब है? (Bach Baras 2026 Date & Time)

हिंदू पंचांग के अनुसार, बछ बारस का पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार श्री कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) के ठीक चार दिन बाद आता है।

वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में श्री कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर (शुक्रवार) को मनाई जाएगी। अतः इसके चार दिन बाद, वर्ष 2026 में बछ बारस का पावन पर्व 8 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा।

बछ बारस 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)

माताओं की सुविधा के लिए यहाँ 8 सितंबर 2026 की बछ बारस पूजा के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time 2026)
बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) की मुख्य तिथि 8 सितंबर 2026 (मंगलवार)
भाद्रपद कृष्ण द्वादशी तिथि का आरंभ 7 सितंबर 2026, रात्रि (देर शाम) से
भाद्रपद कृष्ण द्वादशी तिथि की समाप्ति 8 सितंबर 2026, रात्रि तक
प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:35 बजे से 10:45 बजे तक
गोधूलि बेला (शाम की पूजा का मुहूर्त) शाम 06:20 बजे से 07:45 बजे तक
मुख्य उद्देश्य संतान की रक्षा और गौ माता की सेवा

(नोट: कई स्थानों पर कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी (दिवाली से पहले) को भी गोवत्स द्वादशी या ‘वसु बारस’ के रूप में मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान और उत्तर भारत में भाद्रपद की बछ बारस ही मुख्य रूप से माताओं द्वारा मनाई जाती है।)

2. बछ बारस क्या है और क्यों मनाई जाती है? (Significance of Bach Baras)

‘बछ’ का अर्थ है बछड़ा (गाय का बच्चा) और ‘बारस’ का अर्थ है द्वादशी (12वीं तिथि)। अतः यह दिन पूर्ण रूप से गौ माता और उनके नवजात बछड़े को समर्पित है। इस पर्व को मनाने के पीछे कई गहरे धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक कारण छिपे हैं:

I. संतान की रक्षा का पर्व (Protection of Children)

यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतानों (विशेषकर पुत्रों) की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उन्हें हर प्रकार के संकटों से बचाने के लिए रखती हैं। जिस प्रकार एक गौ माता अपने बछड़े से निस्वार्थ प्रेम करती है और उसकी रक्षा करती है, उसी प्रकार इस दिन माताएं गौ माता से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी संतानों पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

ये भी पढ़ें:  भोजन के बाद थाली में हाथ धोना क्यों है खतरनाक? जानें इसके धार्मिक और वैज्ञानिक नुकसान

II. भगवान श्री कृष्ण की प्रसन्नता

भगवान श्री कृष्ण को गौ माता और बछड़ों से अत्यंत प्रेम था। उनके बचपन का अधिकांश समय गायों को चराते और उनके साथ खेलते हुए बीता था। इसलिए उन्हें ‘गोपाल’ और ‘गोविंद’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति बछ बारस के दिन गाय और बछड़े की पूजा करता है, उसे सीधे भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

III. कृषि और पर्यावरण का सम्मान

गाय भारत की कृषि व्यवस्था की धुरी रही है। गाय का दूध, गोबर, और मूत्र (पंचगव्य) स्वास्थ्य और कृषि दोनों के लिए अमृत के समान हैं। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हमें पशुधन (Livestock) का सम्मान करना चाहिए और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

3. बछ बारस व्रत के कड़े और अनूठे नियम (Rules of Bach Baras Vrat)

बछ बारस का व्रत आम व्रतों से बिल्कुल अलग है। इसके नियम बहुत ही विशिष्ट और प्रकृति के करीब होते हैं। व्रत करने वाली माताओं को इन नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है:

  1. चाकू से कटी वस्तु का निषेध: यह बछ बारस का सबसे बड़ा नियम है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं चाकू (Knife), कैंची या किसी भी धारदार हथियार से कटी हुई कोई भी चीज़ (सब्जी, फल आदि) नहीं खाती हैं। जो भी पकाया जाता है, उसे साबुत (Whole) ही पकाया जाता है।

  2. गाय के दूध और घी का त्याग: इस दिन गाय के दूध, गाय के दही, गाय के घी या गाय के दूध से बनी किसी भी मिठाई का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। इसका कारण यह है कि आज के दिन गाय के दूध पर केवल उसके बछड़े का ही अधिकार माना जाता है। महिलाएं इस दिन केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग करती हैं।

  3. गेहूं और चावल का त्याग: कई क्षेत्रों (विशेषकर राजस्थान) में इस दिन गेहूं (Wheat) और चावल का सेवन नहीं किया जाता है। भोजन में मुख्य रूप से बाजरा, मोठ, चने, और मक्का का उपयोग किया जाता है।

  4. अंकुरित अन्न (Sprouts) का प्रयोग: बछ बारस के दिन साबुत अनाज (जैसे साबुत मूंग, मोठ, और चने) को भिगोकर और अंकुरित करके खाया जाता है। कढ़ी (भैंस के छाछ से बनी) और बाजरे की रोटी (बिना चाकू के काटे) इस दिन का मुख्य भोजन होता है।

4. बछ बारस की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

बछ बारस की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय (गोधूलि बेला) की जाती है, जब गायें चरकर वापस लौटती हैं। हालांकि, सुबह भी पूजा की जा सकती है। 8 सितंबर 2026 को इस पारंपरिक विधि से पूजा करें:

१. पूजा की तैयारी और सामग्री

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (सुहाग के रंग जैसे लाल, पीला या गुलाबी) धारण करें।

  • पूजा के लिए सामग्री एकत्रित करें: रोली, कुमकुम, अक्षत (चावल नहीं, बल्कि बाजरा या ज्वार का उपयोग कर सकते हैं), मौली (कलावा), ताजे फूल, भीगे हुए चने-मोठ, और गुड़।

२. गौ माता और बछड़े की खोज

  • इस दिन एक ऐसी गाय की खोज की जाती है जिसका नवजात या छोटा बछड़ा (Calf) उसके साथ हो।

  • यदि घर में गाय नहीं है, तो गौशाला (Goshala) जाकर या आस-पास के किसी स्थान पर जाकर पूजा की जाती है।

३. मुख्य पूजा प्रक्रिया

  • सबसे पहले गौ माता और बछड़े को शुद्ध जल से स्नान कराएं (या केवल जल का छींटा देकर पवित्र करें)।

  • गाय और बछड़े दोनों के माथे पर हल्दी, कुमकुम और रोली का तिलक लगाएं।

  • उनके सींगों (Horns) पर मौली (पवित्र धागा) बांधें और उन्हें फूलों की माला पहनाएं।

  • इसके बाद गौ माता और बछड़े को भीगे हुए अंकुरित चने, मोठ, बाजरा और गुड़ अपने हाथों से खिलाएं।

४. सगरी (तालाब) का निर्माण

  • यदि असली गाय न मिले, तो घर के आंगन में मिट्टी से एक छोटा सा तालाब (सगरी) बनाया जाता है। उसमें पानी भरा जाता है और मिट्टी की ही गाय और बछड़े की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा की जाती है।

  • पूजा के बाद सगरी में भीगे हुए चने-मोठ और सिक्के डाले जाते हैं।

५. व्रत कथा और आरती

  • हाथ में भीगे हुए चने और मोठ लेकर बछ बारस की पौराणिक कथा (कथा नीचे दी गई है) पढ़ें या सुनें।

  • कथा सुनने के बाद गौ माता की आरती उतारें (भैंस के घी का दीपक जलाकर)।

  • अंत में गौ माता के चरण स्पर्श करें, उस मिट्टी (गौधूली) को अपने माथे पर लगाएं और अपनी संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करें।

  • जिनका पुत्र होता है, माताएं पूजा के बाद अपने पुत्र के माथे पर तिलक लगाती हैं और उसे लड्डू या मिठाई खिलाती हैं।

ये भी पढ़ें:  Annaprashan Muhurat 2026: जानें अन्नप्राशन संस्कार के शुभ मुहूर्त, तिथियां और विधि

5. बछ बारस की पौराणिक व्रत कथा (The Pauranik Vrat Katha)

बछ बारस की कई लोक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन राजस्थान और मध्य प्रदेश में सास-बहू और बछड़ों (मूंग-मोठ) की यह कथा सबसे अधिक सुनी जाती है:

कथा (सास-बहू और मूंग-मोठ की कहानी):

प्राचीन काल में एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी बहुत ही धार्मिक और सुसंस्कृत थी। उनके घर में बहुत सी गायें थीं, जिनमें से एक गाय ने हाल ही में दो बछड़ों को जन्म दिया था। उन दोनों बछड़ों का नाम साहूकार की पत्नी ने प्यार से ‘मूंग’ और ‘मोठ’ रखा था।

साहूकार के घर में एक नई बहू आई। वह थोड़ी नासमझ थी। भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (बछ बारस) का दिन था। सास ने अपनी नई बहू से कहा, “बहू! आज बछ बारस है। मैं खेत पर जा रही हूँ, तुम घर में ‘मूंग-मोठ’ पका लेना (सास का तात्पर्य अनाज वाले साबुत मूंग और मोठ की सब्जी बनाने से था)।”

बहू बहुत ही भोली और अज्ञानी थी। उसने सोचा कि सास ने गाय के दोनों बछड़ों (जिनका नाम मूंग और मोठ था) को पकाने के लिए कहा है। उसने बिना कुछ सोचे-समझे, दोनों बछड़ों को काट दिया और उन्हें पतीले में पकाने के लिए रख दिया।

शाम को जब सास खेत से वापस लौटी, तो उसने बहू से पूछा, “बहू, तुमने मूंग-मोठ पका लिए?”

बहू ने मासूमियत से जवाब दिया, “हाँ सासू मां, मैंने दोनों को काट कर चूल्हे पर चढ़ा दिया है।”

यह सुनते ही सास के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह दौड़कर रसोई में गई और देखा कि पतीले में दोनों बछड़े पड़े हैं। सास सिर पीट-पीट कर रोने लगी कि यह कैसा अनर्थ हो गया। आज के दिन तो गाय और बछड़ों की पूजा की जाती है, और इस पगली बहू ने बछड़ों को ही मार दिया।

थोड़ी देर में गौ माता जंगल से चरकर वापस आ गई और रंभाने (आवाज़ लगाने) लगी। जब बछड़े नहीं आए, तो गाय व्याकुल हो गई। सास को डर था कि राजा को पता चलेगा तो उन्हें मृत्युदंड मिलेगा। सास ने तुरंत दोनों मृत बछड़ों को एक गड्ढे में छुपा दिया।

जब गौ माता उस गड्ढे के पास पहुंची, तो उसने अपने खुरों (पैरों) से मिट्टी खोदनी शुरू कर दी। गौ माता की ममता और बछ बारस के व्रत के प्रभाव से एक चमत्कार हुआ। मिट्टी हटते ही दोनों बछड़े (मूंग और मोठ) जीवित होकर बाहर निकल आए और अपनी माँ का दूध पीने लगे।

जब सास ने यह चमत्कार देखा, तो वह गौ माता के चरणों में गिर पड़ी। पूरे गांव में यह खबर फैल गई कि गौ माता के आशीर्वाद से बछड़े जीवित हो गए हैं। उसी दिन से पूरे गांव ने यह संकल्प लिया कि भाद्रपद कृष्ण द्वादशी के दिन कोई भी चाकू से कटी हुई चीज़ नहीं खाएगा, गाय के दूध का सेवन नहीं करेगा और पूरे नियम से बछ बारस का व्रत रखकर गौ माता की पूजा करेगा।

(कथा के अंत में कहें: हे गौ माता! जैसे आपने अपने बछड़ों मूंग-मोठ को जीवनदान दिया, वैसे ही इस कथा को कहने, सुनने और हुंकारा भरने वाले सभी की संतानों की रक्षा करना और उन्हें लंबी आयु प्रदान करना।)

6. संतान की रक्षा और उन्नति के लिए विशेष उपाय (Special Astrological Remedies)

बछ बारस का दिन संतान प्राप्ति और संतान की समस्याओं को दूर करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। 8 सितंबर 2026 को इन अचूक उपायों को अवश्य आजमाएं:

I. संतान प्राप्ति के लिए (For Childbirth)

जो माताएं संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें बछ बारस के दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखना चाहिए। एक ऐसी गाय की खोज करें जो पहली बार माता बनी हो (जिसका पहला बछड़ा हो)। उस बछड़े के माथे पर हल्दी का तिलक लगाकर उसे अपने हाथों से हरा चारा और गुड़ खिलाएं। भगवान श्री कृष्ण के ‘संतान गोपाल मंत्र’ का 108 बार जाप करें। गौ माता की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।

II. बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए (For Child’s Health)

यदि आपका बच्चा बार-बार बीमार पड़ता है, तो बछ बारस के दिन गौ माता के चरणों की मिट्टी (गौधूली) को एक छोटी सी चांदी या तांबे की डिब्बी में भर लें। उस मिट्टी से अपने बच्चे के माथे पर 43 दिनों तक लगातार तिलक करें। यह गौधूली एक अभेद्य रक्षा-कवच का काम करेगी और बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार होगा।

III. नवग्रह शांति और बुरी नजर से बचाव

यदि बच्चे की कुंडली में राहु-केतु या शनि का दोष है, तो बछ बारस के दिन काले या सफेद रंग की गाय को बाजरे की रोटी और भैंस का मक्खन खिलाएं। साथ ही, बच्चे के सिर से सात बार एक मुट्ठी साबुत मोठ उतारकर (वारकर) गाय को खिला दें। इससे नवग्रह शांत होते हैं और बुरी नजर (Evil Eye) का प्रभाव खत्म होता है।

ये भी पढ़ें:  Bhadli Navami 2026: क्यों खास मानी जाती है भड़ली नवमी? जानें धार्मिक मान्यता

IV. घर में सुख-शांति और आर्थिक उन्नति के लिए

गौ माता में साक्षात माता लक्ष्मी का वास माना गया है। इस दिन शाम के समय गौशाला में जाकर गायों के पीने के पानी की व्यवस्था करें और गौशाला में भैंस के घी का एक बड़ा दीपक जलाएं। यह उपाय परिवार के आर्थिक संकटों को दूर करता है और घर में अटूट शांति स्थापित करता है।

7. क्या है पंचगव्य? और इसका धार्मिक महत्व

बछ बारस का पर्व हमें गाय के महत्व को गहराई से समझने का अवसर देता है। हिंदू धर्म में ‘पंचगव्य’ (Panchagavya) को सबसे पवित्र माना गया है।

पंचगव्य गाय से प्राप्त होने वाली पांच चीजों का मिश्रण है:

  1. गाय का दूध

  2. गाय का दही

  3. गाय का घी

  4. गोमूत्र

  5. गोबर (गोमय)

किसी भी यज्ञ, हवन या शरीर की शुद्धि के लिए पंचगव्य का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद में पंचगव्य को एक महा-औषधि (Super Medicine) माना गया है, जो शरीर के कई भयंकर रोगों (जैसे कैंसर, त्वचा रोग) को ठीक करने की क्षमता रखता है। बछ बारस हमें याद दिलाता है कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारे जीवन और स्वास्थ्य की रक्षक है।

8. भारत के विभिन्न राज्यों में बछ बारस का स्वरूप (Regional Variations)

यद्यपि यह पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसके नाम और तिथियों में क्षेत्रीय भिन्नताएं हैं:

  • राजस्थान और मध्य प्रदेश: यहाँ इसे ‘बछ बारस’ के रूप में भाद्रपद (भादों) कृष्ण द्वादशी को पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। अंकुरित अन्न और बाजरे की रोटी इस दिन का मुख्य आकर्षण होती है।

  • महाराष्ट्र और गुजरात (वसु बारस): इन राज्यों में यह त्योहार दिवाली से ठीक पहले (धनतेरस के एक दिन पूर्व) ‘वसु बारस’ या गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। (2026 में यह नवंबर के महीने में आएगा)। यहाँ महिलाएं इस दिन रंगोली बनाती हैं और गाय की पूजा करती हैं।

  • उत्तर प्रदेश: कई हिस्सों में इसे ‘गोवत्स द्वादशी’ कहा जाता है। यहाँ भी माताएं अपने पुत्रों की रक्षा के लिए इस व्रत का पालन करती हैं।

Bach Baras 2026 (8 सितंबर 2026) का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के उस निस्वार्थ स्वरूप का जश्न है जो एक माँ अपनी संतान के लिए रखती है—चाहे वह माँ मनुष्य हो या गौ माता।

आज के आधुनिक युग में जब मनुष्य प्रकृति और पशु-पक्षियों से दूर होता जा रहा है, बछ बारस का यह त्योहार हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि जो पशु हमें दूध देकर पलता है, उसका हमारे जीवन में माँ के समान ही अधिकार और सम्मान होना चाहिए।

इस वर्ष आप भी बछ बारस का व्रत पूर्ण निष्ठा, नियमों (चाकू का प्रयोग न करना, गाय का दूध न पीना) और विश्वास के साथ रखें। गौ माता को हरा चारा खिलाएं और भगवान श्री कृष्ण से अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। गौ माता की कृपा से आपके घर-आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती रहें और आपका परिवार सदा सुरक्षित रहे, यही हमारी मंगल कामना है।

“बोलो गौ माता की जय! भगवान श्री कृष्ण की जय!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Bach Baras 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में बछ बारस (Bach Baras) किस तारीख को है?

उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, बछ बारस का पावन पर्व भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 8 सितंबर 2026, मंगलवार को पड़ रही है। यह श्री कृष्ण जन्माष्टमी के चार दिन बाद आता है।

प्रश्न 2: बछ बारस के व्रत में गाय का दूध क्यों नहीं पिया जाता है?

उत्तर: बछ बारस पूर्ण रूप से बछड़े (गाय के बच्चे) को समर्पित त्योहार है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर गाय के दूध पर केवल और केवल उसके नवजात बछड़े का ही अधिकार होता है। इसलिए, गौ माता और बछड़े के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं गाय के दूध, दही या घी का सेवन नहीं करती हैं, बल्कि भैंस के दूध का उपयोग करती हैं।

प्रश्न 3: बछ बारस के दिन चाकू से कटी हुई चीजें क्यों नहीं खाई जाती हैं?

उत्तर: यह इस व्रत का एक अत्यंत कड़ा और पारंपरिक नियम है। इस दिन चाकू (Knife), कैंची या किसी भी धारदार हथियार का प्रयोग करना वर्जित माना जाता है। इसलिए महिलाएं सब्जी काटना, फल काटना या कपड़े काटना जैसे काम नहीं करती हैं। भोजन में साबुत अनाज (जैसे साबुत मोठ, मूंग, चने) और बिना कटी हुई चीजें (जैसे कढ़ी और साबुत बाजरे की रोटी) ही पकाई और खाई जाती हैं।

प्रश्न 4: बछ बारस की पूजा में सगरी (तालाब) का क्या महत्व है?

उत्तर: पूजा के दौरान घर के आंगन में मिट्टी से एक छोटा सा प्रतीकात्मक तालाब बनाया जाता है, जिसे ‘सगरी’ कहते हैं। यह जल स्रोत और जीवन का प्रतीक है। महिलाएं सगरी के पास मिट्टी की गाय और बछड़े की मूर्ति रखकर उनकी पूजा करती हैं और सगरी में भीगे हुए चने, मोठ और सिक्के डालती हैं। यह परम्परा सुख, समृद्धि और संतान की खुशहाली की कामना के लिए की जाती है।

प्रश्न 5: क्या बछ बारस का व्रत कुंवारी कन्याएं रख सकती हैं?

उत्तर: पारंपरिक रूप से बछ बारस का व्रत मुख्य रूप से माताएं (जिनके पुत्र या संतान है) अपनी संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए रखती हैं। हालांकि, जिन महिलाओं की संतान नहीं है, वे संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत कर सकती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर और गौ माता के आशीर्वाद के लिए पूजा में सम्मिलित हो सकती हैं और गौ सेवा कर सकती हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!