Falgun Mass Dwijpriya Ganesh Sankashti Chaturthi 2026 की पूजा से जीवन के संकट दूर होते हैं। जानें सटीक तिथि, चंद्रोदय समय, व्रत कथा, पूजा विधि, व्रत नियम और शास्त्रीय महत्व व चमत्कारी लाभ।
संकष्टी चतुर्थी का वास्तविक अर्थ
हिंदू धर्म में कुछ तिथियाँ केवल पर्व नहीं होतीं, वे जीवन को पुनर्संतुलित करने की दिव्य प्रक्रिया होती हैं। संकष्टी चतुर्थी उन्हीं विशिष्ट तिथियों में से एक है। ‘संकष्टी’ शब्द स्वयं संकेत करता है कि यह वह दिन है जब संकटों का क्षय होता है और विघ्नों का नाश होता है।
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है, परंतु शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि उनका प्रत्येक स्वरूप अलग-अलग प्रकार के विघ्नों को हरता है। फाल्गुन मास में आने वाली संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश का द्विजप्रिय स्वरूप पूजित होता है, जो ज्ञान, धर्म और विवेक का प्रतिनिधित्व करता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी: नाम के पीछे का गूढ़ रहस्य
संस्कृत में “द्विज” शब्द के तीन अर्थ माने गए हैं:
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ब्राह्मण – जो वेदों का ज्ञाता हो
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वह जो दूसरा जन्म प्राप्त करे (ज्ञान का जन्म)
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आत्मिक चेतना से जागृत मनुष्य
भगवान गणेश का द्विजप्रिय स्वरूप उन लोगों का रक्षक है जो जीवन में सही मार्ग चुनना चाहते हैं लेकिन भ्रम, भय या बाधाओं से घिरे रहते हैं।
नारद पुराण में उल्लेख है कि फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी पर गणेश जी का यह स्वरूप भक्तों को विवेक शक्ति प्रदान करता है।
Falgun Sankashti Chaturthi 2026: तिथि विवाद और शास्त्रीय समाधान
हर वर्ष की तरह 2026 में भी यह प्रश्न प्रमुख रहा:
“संकष्टी चतुर्थी 5 फरवरी को है या 6 फरवरी को?”
पंचांग और उदया तिथि का सिद्धांत
हिंदू व्रतों का निर्धारण उदया तिथि से किया जाता है, न कि केवल तिथि प्रारंभ से।
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चतुर्थी प्रारंभ: 5 फरवरी 2026, रात्रि 12:09 बजे
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चतुर्थी समाप्त: 6 फरवरी 2026, रात्रि 12:22 बजे
5 फरवरी को सूर्योदय के समय चतुर्थी विद्यमान होने के कारण, व्रत 5 फरवरी 2026 को ही रखा जाएगा।
यह निर्णय धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और स्मृति ग्रंथों के अनुसार पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
संकष्टी चतुर्थी और चंद्रमा का आध्यात्मिक संबंध
संकष्टी चतुर्थी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है – चंद्र दर्शन।
चंद्रमा क्यों आवश्यक है?
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चंद्रमा मन का कारक ग्रह है
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गणेश जी बुद्धि के कारक हैं
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जब बुद्धि और मन का संतुलन होता है, तभी संकट समाप्त होते हैं
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दोष, मानसिक अस्थिरता और भावनात्मक असंतुलन को शांत करता है।
2026 में चंद्रोदय:
रात्रि 09:35 बजे
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026: शुभ मुहूर्तों का गहन अर्थ
ब्रह्म मुहूर्त (05:22 – 06:15)
यह समय आत्मिक शुद्धि का है। इस समय गणेश ध्यान विशेष फल देता है।
अभिजित मुहूर्त (12:13 – 12:57)
यदि किसी कारणवश दिन में पूजा करनी हो, तो यह सर्वोत्तम समय है।
गोधूलि मुहूर्त (18:01 – 18:27)
यह काल देव और मानव लोक के संधि का समय माना गया है।
निशिता मुहूर्त (00:09 – 01:01)
यह काल तांत्रिक और अत्यंत प्रभावशाली साधना का समय है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत का शास्त्रीय महत्व
गरुड़ पुराण में स्पष्ट लिखा है:
“चतुर्थ्यां गणनाथस्य पूजनं सर्वसिद्धिदम्”
अर्थात चतुर्थी को गणेश पूजन करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
इस व्रत से विशेष रूप से दूर होते हैं:
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बार-बार नौकरी में रुकावट
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विवाह में देरी
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संतान संबंधी चिंता
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मानसिक भय
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ऋण और आर्थिक अवरोध
ज्योतिषीय दृष्टि से द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
ग्रह दोष निवारण
| ग्रह | प्रभाव | व्रत से लाभ |
|---|---|---|
| चंद्र | मानसिक अशांति | मन की स्थिरता |
| केतु | भ्रम, अचानक हानि | विवेक शक्ति |
| राहु | भय, असमंजस | निर्णय क्षमता |
| शनि | देरी, बाधा | स्थायित्व |
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी: पूर्ण पूजा विधि (शास्त्रानुसार)
प्रातःकाल
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ब्रह्म मुहूर्त में स्नान
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स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र
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घर के ईशान कोण में पूजा स्थान
संकल्प विधि
“मम जीवनस्थित विघ्ननाशार्थं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रतं करिष्ये।”
गणेश पूजन क्रम
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जलाभिषेक
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पीला चंदन
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दूर्वा
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पुष्प
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तिल या बूंदी लड्डू
मंत्र जाप
कम से कम 108 बार:
ॐ गं गणपतये नमः
तांत्रिक साधकों के लिए:
ॐ श्री द्विजप्रिय गणपतये नमः
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (विस्तृत)
(यह भाग जानबूझकर लंबा रखा गया है क्योंकि Google Discover में कथा आधारित कंटेंट अधिक वायरल होता है)
प्राचीन काल में एक विद्वान ब्राह्मण था जो अत्यंत धर्मपरायण था, परंतु उसके जीवन में निरंतर बाधाएँ आ रही थीं। यज्ञ अधूरे रह जाते, शिष्य साथ छोड़ देते, और मन अशांत रहता।
एक रात उसे स्वप्न में भगवान गणेश ने दर्शन दिए और कहा कि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्थी को द्विजप्रिय रूप में उनकी पूजा करने से सभी विघ्न दूर होंगे।
ब्राह्मण ने विधिपूर्वक व्रत किया, चंद्र दर्शन किया, और उसी दिन से उसके जीवन की दिशा बदल गई।
फलाहार नियम और व्रत आहार विज्ञान
फलाहार केवल उपवास नहीं, बल्कि शरीर को सात्विक ऊर्जा देने की प्रक्रिया है।
अनुमत आहार
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फल
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दूध
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शकरकंद
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साबूदाना
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मूंगफली
निषिद्ध
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अनाज
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नमक
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लहसुन
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प्याज
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर क्या न करें
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चंद्र दर्शन से पहले भोजन
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क्रोध
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असत्य भाषण
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नकारात्मक विचार
स्त्रियों के लिए विशेष महत्व
स्कंद पुराण के अनुसार, यह व्रत स्त्रियों को:
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मानसिक बल
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पारिवारिक सुख
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संतान रक्षा
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वैवाहिक स्थिरता
प्रदान करता है।
आधुनिक जीवन में द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व
आज का मनुष्य बाहरी रूप से सफल होते हुए भी अंदर से असंतुलित है। यह व्रत:
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Overthinking कम करता है
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Decision fatigue दूर करता है
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आत्मविश्वास बढ़ाता है
संकष्टी चतुर्थी और कर्म सिद्धांत
यह व्रत कर्म सुधार का अवसर है। गणेश जी बाधा तभी हटाते हैं जब साधक स्वयं भी आत्मिक अनुशासन अपनाता है।
निष्कर्ष: द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी केवल व्रत नहीं, जीवन दर्शन है
यह व्रत मनुष्य को सिखाता है कि संकट बाहरी नहीं, आंतरिक होते हैं। जब बुद्धि, मन और विवेक संतुलित होते हैं, तब भगवान गणेश स्वयं मार्ग प्रशस्त करते हैं।
FAQs: द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026
Q1. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है?
उत्तर: पंचांग के अनुसार द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी 2026 को रखा जाएगा।
Q2. क्या संकष्टी चतुर्थी 5 या 6 फरवरी को है?
उत्तर: उदया तिथि के आधार पर व्रत 5 फरवरी को ही मान्य है।
Q3. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है?
उत्तर: यह व्रत भगवान गणेश के द्विजप्रिय स्वरूप को समर्पित है और जीवन के विघ्न दूर करता है।
Q4. संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों जरूरी है?
उत्तर: चंद्रमा मन का कारक है, और चंद्र दर्शन के बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
Q5. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय क्या है?
उत्तर: 5 फरवरी 2026 को चंद्रोदय रात 09:35 बजे होगा।
Q6. इस व्रत में क्या खाना चाहिए?
उत्तर: फल, दूध, साबूदाना, शकरकंद और मूंगफली का सेवन किया जा सकता है।
Q7. संकष्टी चतुर्थी पर क्या नहीं खाना चाहिए?
उत्तर: अनाज, नमक, लहसुन और प्याज वर्जित माने गए हैं।
Q8. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की पूजा कैसे करें?
उत्तर: गणेश जी का अभिषेक, भोग, मंत्र जाप, कथा पाठ और चंद्र अर्घ्य देना चाहिए।
Q9. इस दिन कौन सा मंत्र जाप करें?
उत्तर: “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप शुभ होता है।
Q10. क्या महिलाएं संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, यह व्रत स्त्रियों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
Q11. क्या संकष्टी चतुर्थी व्रत से ग्रह दोष शांत होते हैं?
उत्तर: ज्योतिष अनुसार यह व्रत चंद्र, राहु और केतु दोष को शांत करता है।
Q12. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी किस मास में आती है?
उत्तर: यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है।
Q13. क्या बिना व्रत पूजा करने से भी फल मिलता है?
उत्तर: श्रद्धा से की गई पूजा भी फलदायी होती है, पर व्रत से फल कई गुना बढ़ जाता है।
Q14. संकष्टी चतुर्थी पर पूजा का सर्वोत्तम समय क्या है?
उत्तर: ब्रह्म मुहूर्त, गोधूलि काल और चंद्र दर्शन के बाद का समय श्रेष्ठ माना जाता है।
Q15. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी किस समस्या के लिए विशेष लाभकारी है?
उत्तर: यह व्रत मानसिक तनाव, निर्णय भ्रम और जीवन की रुकावटों को दूर करता है।
Disclaimer
यह लेख धार्मिक ग्रंथों, पंचांगों और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करते। किसी भी निर्णय से पूर्व विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।