मंत्र जाप की सही विधिIt takes 4 minutes... to read this article !

मंत्र जाप की शास्त्रोक्त विधि: नियम, प्रक्रिया और साधक के लिए संपूर्ण मार्गदर्शन। मंत्र साधना का वास्तविक आधार मंत्र जाप है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि यदि मंत्र जाप सही विधि से किया जाए, तो साधारण मंत्र भी प्रभावशाली बन जाता है, और यदि विधि गलत हो, तो शक्तिशाली मंत्र भी निष्फल हो सकता है।

इसी कारण शास्त्र वचन है—

“विधिहीनं जपं त्याज्यम्”

अर्थात बिना विधि के किया गया मंत्र जाप फल नहीं देता।

यह लेख मंत्र जाप की शुद्ध, सुरक्षित और व्यावहारिक विधि प्रस्तुत करता है, जो गृहस्थ और साधक—दोनों के लिए उपयुक्त है।

मंत्र जाप क्या है? (What is Mantra Jap)

मंत्र जाप का अर्थ केवल मंत्र बोलना नहीं है।

यह एक त्रिस्तरीय साधना प्रक्रिया है:

  • ध्वनि (शुद्ध उच्चारण)

  • मन (एकाग्रता)

  • भाव (श्रद्धा और समर्पण)

जब ध्वनि, मन और भाव एक साथ जुड़ते हैं, तब मंत्र जाप वास्तविक साधना बनता है।

मंत्र जाप का उद्देश्य (Purpose of Mantra Jap)

मंत्र जाप का लक्ष्य केवल इच्छापूर्ति नहीं है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं:

  • मन की शुद्धि

  • चेतना का परिष्कार

  • नकारात्मक संस्कारों का क्षय

  • देव-तत्त्व से संबंध

  • आत्मिक स्थिरता और संतुलन

जब साधना का उद्देश्य शुद्ध होता है, तब मंत्र स्वतः प्रभाव देता है।

मंत्र जाप की तैयारी (Mantra Jap Preparation)

स्थान की शुद्धि

मंत्र जाप के लिए स्थान का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आदर्श स्थान होना चाहिए:

  • शांत

  • स्वच्छ

  • नियमित (एक ही स्थान)

घर में उपयुक्त स्थान:

  • पूजा कक्ष

  • शांत कोना

  • पूर्व या उत्तर दिशा

दीप या धूप से स्थान शुद्ध करना शास्त्रसम्मत माना गया है।

शारीरिक शुद्धि

मंत्र जाप से पूर्व:

  • स्नान करें

  • स्वच्छ वस्त्र पहनें

  • सात्त्विक अवस्था में रहें

यह बाहरी शुद्धि आंतरिक एकाग्रता को बढ़ाती है।

मानसिक तैयारी

  • कुछ क्षण मौन

  • श्वास-प्रश्वास को शांत करना

  • मन को वर्तमान में लाना

अशांत मन से किया गया जप केवल यांत्रिक होता है।

मंत्र जाप के लिए आसन और बैठने की विधि

आसन का महत्व

मंत्र जाप में आसन ऊर्जा संरक्षण का माध्यम है।

उपयुक्त आसन:

  • कुश आसन

  • ऊन का आसन

  • सूती आसन

भूमि पर सीधे बैठना ऊर्जा क्षय का कारण माना गया है।

बैठने की मुद्रा

  • रीढ़ सीधी

  • गर्दन और सिर संतुलित

  • आँखें बंद या अर्धमुद्रित

यह मुद्रा मंत्र ऊर्जा को ऊपर की ओर प्रवाहित करती है।

मंत्र जाप की दिशा (Direction for Mantra Jap)

शास्त्रों के अनुसार:

  • पूर्व दिशा — ज्ञान और साधना

  • उत्तर दिशा — उन्नति और स्थिरता

इन दिशाओं में मुख करके मंत्र जाप करना श्रेष्ठ माना गया है।

मंत्र जाप की शास्त्रोक्त विधि (Step-by-Step)

संकल्प

मंत्र जाप से पूर्व संकल्प आवश्यक है।

संकल्प में शामिल करें:

  • साधक का नाम

  • साधना का उद्देश्य

  • मंत्र

  • अवधि

संकल्प साधना को दिशा और स्थिरता देता है।

मंत्र का उच्चारण

  • स्पष्ट उच्चारण

  • मध्यम स्वर

  • बिना जल्दबाज़ी

ध्यान रखें:

  • न बहुत तेज़

  • न बहुत धीमा

  • अशुद्ध उच्चारण से बचें

यदि उच्चारण में संदेह हो, तो सरल मंत्र चुनना श्रेष्ठ है।

माला का प्रयोग

  • 108 दानों की माला

  • तर्जनी उँगली का प्रयोग न करें

  • सुमेरु को पार न करें

माला अनुशासन और एकाग्रता बनाए रखती है।

मंत्र जाप की संख्या (Mantra Jap Count)

शास्त्रों में सामान्यतः शुभ मानी गई संख्याएँ:

  • 108

  • 54

  • 27

संख्या से अधिक नियमितता और निरंतरता महत्वपूर्ण है।

मंत्र जाप का सही समय (Best Time for Mantra Jap)

श्रेष्ठ समय:

  • ब्रह्म मुहूर्त

  • प्रातःकाल

  • संध्या

रात्रि मंत्र जाप विशेष साधनाओं के लिए होता है और गुरु मार्गदर्शन आवश्यक होता है।

मंत्र जाप के प्रकार (Types of Mantra Jap)

वाचिक जप

स्पष्ट उच्चारण के साथ — प्रारंभिक साधकों के लिए।

उपांशु जप

हल्के स्वर में — मध्यम साधकों के लिए।

मानसिक जप

मन में किया गया जप — उन्नत साधकों के लिए।

मानसिक जप को सबसे शक्तिशाली माना गया है।

मंत्र जाप में होने वाली सामान्य गलतियाँ

  • अनियमितता

  • जल्दबाज़ी

  • कई मंत्र एक साथ करना

  • भाव की कमी

  • साधना बीच में छोड़ना

इनसे मंत्र जाप का प्रभाव कम हो जाता है।

गृहस्थ के लिए मंत्र जाप विधि

गृहस्थ साधकों के लिए मंत्र जाप:

  • सीमित समय

  • सरल मंत्र

  • नियमित दिनचर्या

उपयुक्त मंत्र:

  • गायत्री मंत्र

  • महामृत्युंजय मंत्र

  • ॐ नमः शिवाय

मंत्र जाप से होने वाले लाभ और परिवर्तन

नियमित मंत्र जाप से:

  • मन शांत होता है

  • विचार स्पष्ट होते हैं

  • भय और तनाव कम होते हैं

  • आत्मबल बढ़ता है

  • साधना में रुचि विकसित होती है

ये परिवर्तन धीरे-धीरे लेकिन स्थायी होते हैं।

मंत्र जाप से जुड़ी भ्रांतियाँ

  • तुरंत चमत्कार की अपेक्षा

  • केवल संख्या पर निर्भरता

  • भाव की आवश्यकता न समझना

वास्तव में मंत्र जाप धैर्य, अनुशासन और श्रद्धा की साधना है।

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निष्कर्ष

मंत्र जाप साधना का हृदय है।

शास्त्रोक्त विधि से किया गया मंत्र जाप साधक को

धीरे-धीरे बाहरी अशांति से भीतर की स्थिरता और आत्मिक संतुलन की ओर ले जाता है।

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