दश महाविद्या शाबर मंत्र | गोरखनाथ परंपरा में शक्ति साधना का रहस्यIt takes 7 minutes... to read this article !

दश महाविद्या शाबर मंत्र का शास्त्रीय विवेचन। जानिए गोरखनाथ परंपरा, शाबर मंत्रों का आध्यात्मिक अर्थ, शिव-शक्ति संवाद और दश महाविद्या का तांत्रिक दर्शन।

दश महाविद्या शाबर मंत्र: नाथ योग और तंत्र शास्त्र में शक्ति चेतना का दार्शनिक विवेचन

भारतीय तांत्रिक परंपरा में दश महाविद्या को केवल देवी-स्वरूप नहीं, बल्कि चेतना की दस मूल अवस्थाओं के रूप में समझा गया है। नाथ संप्रदाय और शाबर परंपरा में इन महाविद्याओं का उल्लेख मंत्र, कथा और प्रतीकात्मक संवाद के माध्यम से किया गया है। दश महाविद्या शाबर मंत्र इसी परंपरा का एक विशिष्ट उदाहरण है, जिसमें शक्ति, गुरु और योग चेतना का गूढ़ समन्वय दिखाई देता है।

दश महाविद्या शाबर मंत्र क्या है?

दश महाविद्या शाबर मंत्र एक काव्यात्मक, प्रतीकात्मक और ध्यानप्रधान मंत्र है, जो नाथ योग, सिद्ध परंपरा और तंत्र दर्शन से जुड़ा माना जाता है। यह मंत्र किसी एक देवी की आराधना तक सीमित नहीं, बल्कि शक्ति के क्रमिक विकास और साधक की आंतरिक यात्रा का वर्णन करता है।

इस मंत्र में शब्दों से अधिक महत्व भाव, ध्यान और बोध को दिया गया है।

शाबर मंत्र परंपरा का शास्त्रीय आधार

शाबर मंत्रों की विशेषता यह मानी जाती है कि वे—

  • संस्कृत के कठोर व्याकरण से मुक्त

  • लोकभाषा और प्रतीकात्मक कथाओं से युक्त

  • गुरु-परंपरा पर आधारित

  • अनुभव प्रधान

होते हैं। नाथ योगियों ने शाबर मंत्रों को साधना से अधिक चेतना शिक्षण का माध्यम माना है।

दश महाविद्या शाबर मंत्र (शास्त्रीय पाठ)

सत नमो आदेश ।

गुरुजी को आदेश ।

ॐ गुरुजी ।

ॐ सोऽहं सिद्ध की काया,

तीसरा नेत्र त्रिकुटी ठहराया ।

गगण मण्डल में अनहद बाजा,

वहाँ देखा शिवजी बैठा ।

गुरु हुकम से भितरी बैठा,

शून्य में ध्यान गोरख दिठा ।

यही ध्यान तपे महेशा,

यही ध्यान ब्रह्माजी लाग्या ।

यही ध्यान विष्णु की माया ।

ॐ कैलाश गिरी से आयी पार्वती देवी,

जाकै सन्मुख बैठ गोरक्ष योगी ।

देवी ने किया आदेश,

नहीं लिया आदेश, नहीं दिया उपदेश ।

सती मन में क्रोध समाई,

नौ दरवाजे खुले कपाट ।

दसवें द्वारे अग्नि प्रजाले,

तब शक्ति की ज्योति समाई ।

राखी-राखी गोरख राखी,

मैं हूँ तेरी चेली ।

संसार सृष्टि की हूँ मैं माई ।

गोरख देखे सत्य की दृष्टि,

तब गोरख कली बिच कहाया ।

सिद्धों का मर्म न जाने कोई ।

तब सती ने शक्ति की खेल दिखाई,

दश महाविद्या की प्रगटली ज्योति ।

मंत्र का तांत्रिक और दार्शनिक अर्थ

यह मंत्र चेतना की आंतरिक यात्रा को दर्शाता है।

  • गुरु चेतना का प्रवेश द्वार हैं

  • त्रिकुटी और तीसरा नेत्र आत्मबोध के प्रतीक हैं

  • नौ द्वार इंद्रिय बंधनों का संकेत करते हैं

  • दसवां द्वार शक्ति के प्राकट्य का बिंदु है

  • दश महाविद्या चेतना की पूर्णता को दर्शाती हैं

नाथ दर्शन के अनुसार शक्ति बाहर से प्राप्त नहीं होती, वह साधक के भीतर प्रकट होती है।

क्या यह मंत्र जप के लिए है?

शाबर परंपरा में इस प्रकार के मंत्रों को सामान्य जप-मंत्र की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इन्हें—

  • ध्यान

  • मनन

  • प्रतीकात्मक पाठ

  • गुरु-वाणी

के रूप में समझा जाता है। इसका उद्देश्य किसी त्वरित फल की प्राप्ति नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और विवेक का विकास है।

वरिष्ठ ज्योतिषीय और तांत्रिक दृष्टिकोण

अनुभवजन्य दृष्टि से यह माना जाता है कि दश महाविद्या शाबर मंत्र का प्रभाव बाहरी घटनाओं में नहीं, बल्कि साधक के दृष्टिकोण, धैर्य और मानसिक परिपक्वता में परिलक्षित होता है। यह साधना व्यक्ति को शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी सिखाती है।

दश महाविद्या और नाथ संप्रदाय का ऐतिहासिक संबंध

नाथ संप्रदाय का मूल उद्देश्य मोक्ष को किसी एक देव-आराधना से नहीं, बल्कि अनुभवजन्य योग से जोड़ना रहा है। गोरक्षनाथ, मीननाथ और अन्य सिद्धों ने शक्ति को देवी के बाहरी स्वरूप से अधिक अंतःचेतना की प्रक्रिया के रूप में देखा। इसी दृष्टि से दश महाविद्या को नाथ परंपरा में दस देवियाँ नहीं, बल्कि साधक के भीतर जाग्रत होने वाली दस अवस्थाएँ माना गया।

शाबर मंत्रों में देवी, शिव और गुरु के संवाद इसी परंपरा के दार्शनिक संकेत हैं। यहाँ उपासक और उपास्य के बीच दूरी नहीं, बल्कि एकात्मता की बात की जाती है।

दश महाविद्या: देवी नहीं, चेतना के दस स्तर

तांत्रिक दर्शन में दश महाविद्या को अक्सर देवी-स्वरूपों में प्रस्तुत किया जाता है, किंतु नाथ और सिद्ध परंपरा में इनका अर्थ अधिक गूढ़ है।

  • काली: समय-बोध और मृत्यु का स्वीकार

  • तारा: चेतना का मार्गदर्शन

  • त्रिपुरसुंदरी: संतुलित चेतना

  • भुवनेश्वरी: आंतरिक आकाश

  • छिन्नमस्ता: अहंकार-विच्छेद

  • धूमावती: शून्य की स्वीकृति

  • बगलामुखी: मन का स्थिरीकरण

  • मातंगी: वाणी और अभिव्यक्ति

  • कमला: चेतना की परिपक्वता

शाबर मंत्र में इनका नाम न लेकर भी इनके भावात्मक संकेत स्पष्ट दिखाई देते हैं।

गुरु-तत्व का विशेष स्थान

शाबर मंत्रों में गुरु को देवी से पहले स्थान दिया गया है। “गुरुजी को आदेश” जैसे वाक्य यह दर्शाते हैं कि—

  • शक्ति का प्रवाह गुरु के बिना असंतुलित हो सकता है

  • गुरु ही चेतना को दिशा देता है

  • बिना गुरु साधना भटकाव बन सकती है

नाथ परंपरा में गुरु कोई व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि जाग्रत विवेक का प्रतीक है।

नौ द्वार और दसवाँ द्वार: योगिक व्याख्या

मंत्र में वर्णित नौ द्वार मानव शरीर के इंद्रिय द्वारों को दर्शाते हैं। तंत्र और योग दोनों में माना गया है कि जब तक चेतना इन द्वारों में उलझी रहती है, तब तक शक्ति का पूर्ण प्राकट्य नहीं होता।

दसवाँ द्वार सहस्रार या ब्रह्मरंध्र का प्रतीक है, जहाँ—

  • शक्ति ऊपर की ओर प्रवाहित होती है

  • अहंकार का क्षय होता है

  • चेतना व्यापक बनती है

यही दश महाविद्या का सामूहिक बिंदु माना गया है।

शाबर मंत्रों की भाषा: अशुद्ध नहीं, जानबूझकर सरल

अक्सर शाबर मंत्रों को भाषा की दृष्टि से “अशुद्ध” कहा जाता है। परंतु शास्त्रीय दृष्टि से यह एक सजग चयन है।

  • सरल भाषा मन को सीधे प्रभावित करती है

  • संस्कृत का बौद्धिक भार कम होता है

  • साधक भाव में प्रवेश करता है

नाथ योगियों का मानना था कि मंत्र तभी जीवित है जब वह साधक की चेतना में उतर सके।

दश महाविद्या शाबर मंत्र और आधुनिक साधक

आज के समय में इस मंत्र को चमत्कार, वशीकरण या भय से जोड़ना एक आधुनिक भ्रांति है। परंपरागत दृष्टि में यह मंत्र—

  • आत्म-अनुशासन सिखाता है

  • मानसिक स्थिरता विकसित करता है

  • भय, अहंकार और भ्रम को कम करता है

इसी कारण वरिष्ठ आचार्य इसे साधना नहीं, आत्मिक शिक्षण मानते हैं।

इस मंत्र से जुड़ी आम गलत धारणाएँ

  1. यह मंत्र त्वरित सिद्धि देता है

  2. इसे बिना समझ जप किया जा सकता है

  3. यह केवल देवी-पूजा है

  4. इसका उद्देश्य सांसारिक लाभ है

शास्त्रीय दृष्टि से ये सभी धारणाएँ अपूर्ण मानी जाती हैं।

साधक की योग्यता: शास्त्रीय दृष्टिकोण

नाथ और तांत्रिक ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि शक्ति साधना में—

  • मानसिक संतुलन

  • नैतिक आचरण

  • गुरु-श्रद्धा

अनिवार्य हैं। योग्यता का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि परिपक्वता है।

दश महाविद्या शाबर मंत्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष

आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह मंत्र—

  • प्रतीकों द्वारा अवचेतन से संवाद करता है

  • कथा के माध्यम से भय को स्वीकार करता है

  • अहंकार को धीरे-धीरे विघटित करता है

इसी कारण इसका प्रभाव धीरे लेकिन स्थायी माना जाता है।

तंत्र, भय और उत्तरदायित्व

तंत्र शास्त्र में शक्ति को भयावह नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वपूर्ण माना गया है। शाबर मंत्रों में चेतावनी छिपी होती है कि शक्ति बिना विवेक के विनाशक हो सकती है।

नाथ सिद्धों ने इसी कारण साधना से अधिक संयम पर बल दिया।

निष्कर्ष: यह मंत्र किसके लिए है और किसके लिए नहीं

यह मंत्र उनके लिए है—

  • जो आत्म-अवलोकन चाहते हैं

  • जो गुरु-मार्ग में विश्वास रखते हैं

  • जो शक्ति को नियंत्रण नहीं, समझना चाहते हैं

यह मंत्र उनके लिए नहीं—

  • जो त्वरित चमत्कार चाहते हैं

  • जो भय या लोभ से प्रेरित हैं

  • जो आचरण को महत्व नहीं देते

दश महाविद्या शाबर मंत्र: Frequently Asked Questions (FAQs)

1. दश महाविद्या शाबर मंत्र का मूल उद्देश्य क्या है?

इस मंत्र का उद्देश्य साधक की चेतना को गुरु और शक्ति तत्व से जोड़ना है। इसे आत्मबोध और आंतरिक संतुलन की साधना माना गया है।

2. क्या यह मंत्र किसी एक देवी की उपासना से जुड़ा है?

यह मंत्र किसी एक देवी तक सीमित नहीं है। इसमें दश महाविद्या को शक्ति की विभिन्न अवस्थाओं के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

3. शाबर मंत्रों में कथा और संवाद शैली क्यों होती है?

कथा शैली प्रतीकों के माध्यम से चेतना पर गहरा प्रभाव डालती है, जिससे साधक मंत्र के भाव को अनुभव कर सके।

4. क्या इस मंत्र का नियमित जप किया जा सकता है?

इसे सामान्य जप से अधिक ध्यान और मनन के रूप में ग्रहण करना शास्त्रसम्मत माना गया है।

5. दश महाविद्या शाबर मंत्र को गुप्त परंपरा क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसका प्रभाव साधक की मानसिक स्थिति, आचरण और गुरु-सम्बंध पर निर्भर करता है।

दश महाविद्या शाबर मंत्र नाथ योग और तांत्रिक परंपरा का एक प्रतीकात्मक मंत्र है, जिसमें शक्ति को देवी के रूप से अधिक चेतना की अवस्था के रूप में समझा गया है। यह मंत्र साधक को गुरु-तत्व, शून्य-चेतना और आंतरिक जागरण से जोड़ता है।

शास्त्रीय अस्वीकरण

यह लेख नाथ संप्रदाय, तंत्र शास्त्र और शाबर परंपरा के दार्शनिक अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक और शैक्षिक जानकारी प्रदान करना है। किसी भी साधना या प्रयोग से पूर्व योग्य गुरु या आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है।

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