श्री मातङ्गी स्तुतिः (Shri Matangi Stuti Lyrics in Sanskrit) : वाक् सिद्धि, सम्मोहन और कला-संगीत में अपार सफलता का तांत्रिक रहस्यIt takes 13 minutes... to read this article !

सनातन धर्म के तंत्र शास्त्र में ‘दस महाविद्याओं’ (Ten Cosmic Wisdom Goddesses) का सर्वोच्च स्थान है। इन दस महाविद्याओं में नौवें स्थान पर विराजमान हैं— माता मातंगी (Goddess Matangi)। जिस प्रकार वैदिक साधनाओं में ज्ञान, कला और वाणी की देवी माता सरस्वती हैं, ठीक उसी प्रकार तंत्र शास्त्र में इन सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी माता मातंगी हैं। इसी कारण इन्हें ‘तांत्रिक सरस्वती’ भी कहा जाता है। श्री विद्या (ललिता त्रिपुरसुंदरी) के दरबार में माता मातंगी ‘मंत्रिणी’ (Prime Minister) के पद पर आसीन हैं।

आज के आधुनिक युग में जहाँ सफलता काफी हद तक आपके ‘कम्युनिकेशन स्किल्स’ (Communication Skills), आपकी कला, आपकी वाणी के प्रभाव और आपके व्यक्तित्व के आकर्षण पर निर्भर करती है, वहाँ माता मातंगी की उपासना अकल्पनीय परिणाम देती है। जो व्यक्ति समाज पर अपना प्रभाव छोड़ना चाहता है, उसके लिए ‘श्री मातङ्गी स्तुतिः’ (Shri Matangi Stuti) एक जाग्रत और अमोघ अस्त्र है।

इस अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि माता मातंगी का तांत्रिक रहस्य क्या है, उन्हें ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ क्यों कहा जाता है, Shri Matangi Stuti Lyrics in Sanskrit के पाठ का गहरा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में वाक् सिद्धि और सम्मोहन कैसे प्राप्त होता है, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक व तांत्रिक विधि क्या है।

माता मातंगी कौन हैं? (The Mystery of Goddess Matangi)

माता मातंगी के प्राकट्य और उनके स्वरूप का रहस्य अत्यंत गहरा है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती एक साथ बैठकर भोजन कर रहे थे। उनके भोजन करने के बाद जो भोजन का कुछ अंश (जूठन / Leftover) गिर गया, उसी गिरे हुए ‘उच्छिष्ट’ (जूठे) भाग से एक अत्यंत श्याम वर्णा (गहरे हरे रंग की) दिव्य कन्या प्रकट हुई। यही कन्या माता मातंगी कहलाईं।

चूँकि इनका प्राकट्य उच्छिष्ट (जूठे) भोजन से हुआ था, इसलिए तंत्र में इन्हें ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ या ‘उच्छिष्ट मातंगी’ भी कहा जाता है।

‘उच्छिष्ट’ का दार्शनिक रहस्य: रूढ़िवादी समाज में जूठे भोजन या अपवित्रता को हेय दृष्टि से देखा जाता है। माता मातंगी की साधना हमें यह सिखाती है कि परब्रह्म के लिए कुछ भी ‘पवित्र’ या ‘अपवित्र’ नहीं है। वे इस द्वैत (Duality) से परे हैं। समाज में जिसे तिरस्कृत किया जाता है, ईश्वर उसमें भी व्याप्त है। मातंगी साधना साधक के भीतर के ‘शुद्ध’ और ‘अशुद्ध’ के भ्रम को तोड़कर उसे अद्वैत चेतना में स्थापित करती है।

स्वरूप का ध्यान: माता मातंगी का वर्ण गहरा हरा (Dark Emerald Green) है। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, खड्ग (तलवार) और वीणा धारण करती हैं। उनके साथ अक्सर एक तोता (Parrot) बैठा होता है, जो वाक्-शक्ति का प्रतीक है।

श्री मातङ्गी स्तुतिः का मूल दर्शन और भाव (Essence of the Stuti)

श्री मातङ्गी स्तुतिः मूल पाठ (Shri Matangi Stuti Lyrics in Sanskrit)

मातङ्गि मातरीशे मधुमदमथनाराधिते महामाये ।
मोहिनि मोहप्रमथिनि मन्मथमथनप्रिये नमस्तेऽस्तु ॥ १ ॥

स्तुतिषु तव देवि विधिरपि पिहितमतिर्भवति विहितमतिः ।
तदपि तु भक्तिर्मामपि भवतीं स्तोतुं विलोभयति ॥ २ ॥

यतिजनहृदयनिवासे वासववरदे वराङ्गि मातङ्गि ।
वीणावादविनोदिनि नारदगीते नमो देवि ॥ ३ ॥

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देवि प्रसीद सुन्दरि पीनस्तनि कम्बुकण्ठि घनकेशि ।
मातङ्गि विद्रुमौष्ठि स्मितमुग्धाक्ष्यम्ब मौक्तिकाभरणे ॥ ४ ॥

भरणे त्रिविष्टपस्य प्रभवसि तत एव भैरवी त्वमसि ।
त्वद्भक्तिलब्धविभवो भवति क्षुद्रोऽपि भुवनपतिः ॥ ५ ॥

पतितः कृपणो मूकोऽप्यम्ब भवत्याः प्रसादलेशेन ।
पूज्यः सुभगो वाग्मी भवति जडश्चापि सर्वज्ञः ॥ ६ ॥

ज्ञानात्मिके जगन्मयि निरञ्जने नित्यशुद्धपदे ।
निर्वाणरूपिणि शिवे त्रिपुरे शरणं प्रपन्नस्त्वाम् ॥ ७ ॥

त्वां मनसि क्षणमपि यो ध्यायति मुक्तामणीवृतां श्यामाम् ।
तस्य जगत्त्रितयेऽस्मिन् कास्ताः ननु याः स्त्रियोऽसाध्याः ॥ ८ ॥

साध्याक्षरेण गर्भितपञ्चनवत्यक्षराञ्चिते मातः ।
भगवति मातङ्गीश्वरि नमोऽस्तु तुभ्यं महादेवि ॥ ९ ॥

विद्याधरसुरकिन्नरगुह्यकगन्धर्वयक्षसिद्धवरैः ।
आराधिते नमस्ते प्रसीद कृपयैव मातङ्गि ॥ १० ॥

वीणावादनवेलानर्तदलाबुस्थगित वामकुचाम् ।
श्यामलकोमलगात्रीं पाटलनयनां स्मरामि त्वाम् ॥ ११ ॥

अवटुतटघटितचूलीताडिततालीपलाशताटङ्काम् ।
वीणावादनवेलाकम्पितशिरसं नमामि मातङ्गीम् ॥ १२ ॥

माता मरकतश्यामा मातङ्गी मदशालिनी ।
कटाक्षयतु कल्याणी कदम्बवनवासिनी ॥ १३ ॥

वामे विस्तृतिशालिनि स्तनतटे विन्यस्तवीणामुखं
तन्त्रीं तारविराविणीमसकलैरास्फालयन्ती नखैः ।
अर्धोन्मीलदपाङ्गमंसवलितग्रीवं मुखं बिभ्रती
माया काचन मोहिनी विजयते मातङ्गकन्यामयी ॥ १४ ॥

वीणावाद्यविनोदनैकनिरतां लीलाशुकोल्लासिनीं
बिम्बोष्ठीं नवयावकार्द्रचरणामाकीर्णकेशावलिम् ।
हृद्याङ्गीं सितशङ्खकुण्डलधरां शृङ्गारवेषोज्ज्वलां
मातङ्गीं प्रणतोऽस्मि सुस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलाम् ॥ १५ ॥

स्रस्तं केसरदामभिः वलयितं धम्मिल्लमाबिभ्रती
तालीपत्रपुटान्तरेषु घटितैस्ताटङ्किनी मौक्तिकैः ।
मूले कल्पतरोर्महामणिमये सिंहासने मोहिनी
काचिद्गायनदेवता विजयते वीणावती वासना ॥ १६ ॥

वेणीमूलविराजितेन्दुशकलां वीणानिनादप्रियां
क्षोणीपालसुरेन्द्रपन्नगवरैराराधिताङ्घ्रिद्वयाम् ।
एणीचञ्चललोचनां सुवसनां वाणीं पुराणोज्ज्वलां
श्रोणीभारभरालसामनिमिषः पश्यामि विश्वेश्वरीम् ॥ १७ ॥

मातङ्गीस्तुतिरियमन्वहं प्रजप्ता
जन्तूनां वितरति कौशलं क्रियासु ।
वाग्मित्वं श्रियमधिकां च गानशक्तिं
सौभाग्यं नृपतिभिरर्चनीयतां च ॥ १८ ॥

इति मन्त्रकोशे श्री मातङ्गी स्तुतिः ।

स्तुति का केंद्रीय भाव (The Core Message): श्री मातङ्गी स्तुति में साधक माता के उसी श्याम वर्ण, संगीत-प्रेमी और सम्मोहक स्वरूप का ध्यान करता है। स्तुति का भाव कुछ इस प्रकार होता है:

  • “हे वीणावादिनी, श्यामांगी माता! जो तीनों लोकों को अपने सौंदर्य और वाणी से मोहित कर लेती हैं, मैं आपके श्रीचरणों में प्रणाम करता हूँ।”

  • “हे मंत्रिणी! आपके चरणों की धूलि जिसके मस्तक पर पड़ जाती है, वह महामूर्ख भी रातों-रात बृहस्पति के समान महाज्ञानी और श्रेष्ठ कवि बन जाता है।”

  • “हे उच्छिष्ट चांडालिनी! मेरे कंठ में विराजमान होकर मेरी वाणी को ऐसा ओज और प्रभाव दें कि मेरा हर शब्द सत्य हो जाए और सुनने वाले मेरे वशीभूत हो जाएं।”

यह स्तुति इंसान के गले में स्थित ‘विशुद्धि चक्र’ (Throat Chakra) को जाग्रत करती है। जब विशुद्धि चक्र जाग्रत होता है, तो व्यक्ति की वाणी में ‘सरस्वती’ का वास हो जाता है।

श्री मातङ्गी स्तुति पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

माता मातंगी ‘राज-राजेश्वरी’ की मंत्री हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और गुरु-निर्देशन में प्रतिदिन ‘श्री मातङ्गी स्तुति’ का सस्वर पाठ करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ, तांत्रिक और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

1. तीव्र वाक् सिद्धि (Power of Spoken Word) और सम्मोहन

यह इस स्तुति का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ है। ‘वाक् सिद्धि’ का अर्थ है— जो कह दिया जाए, वह सत्य हो जाए। जो लोग राजनीति (Politics), वकालत (Law), मोटिवेशनल स्पीकिंग, या सेल्स (Sales) के क्षेत्र में हैं, उनके लिए यह स्तुति ब्रह्मास्त्र है। इसका पाठ करने वाले साधक की आवाज़ में इतना भयंकर सम्मोहन (Magnetic Attraction) आ जाता है कि लोग मंत्रमुग्ध होकर उसकी बात सुनते हैं और उसकी आज्ञा का पालन करते हैं।

2. संगीत, गायन, अभिनय और 64 कलाओं में अपार सफलता

माता मातंगी 64 कलाओं (64 Fine Arts) की अधिष्ठात्री हैं। जो लोग कला के क्षेत्र से जुड़े हैं—जैसे गायक (Singers), अभिनेता (Actors), नर्तक (Dancers), चित्रकार या लेखक—उन्हें मातंगी साधना अवश्य करनी चाहिए। इस स्तुति के प्रभाव से साधक की कला में एक ईश्वरीय ‘स्पार्क’ (Divine Spark) आ जाता है, जिससे वह रातों-रात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँच जाता है।

3. भयंकर शत्रुओं का उच्चाटन और स्तम्भन (Defeating Enemies)

तंत्र में मातंगी को केवल ज्ञान की ही नहीं, बल्कि शत्रुओं का नाश करने वाली उग्र देवी भी माना गया है। यदि आपके विरोधी आपको परेशान कर रहे हैं, या आपके खिलाफ झूठे मुकदमे (Court Cases) चल रहे हैं, तो मातंगी स्तुति का पाठ विरोधियों की ‘बुद्धि और वाणी का स्तम्भन’ (Paralyzing their speech and thoughts) कर देता है। शत्रु आपके सामने खड़े होकर बोल ही नहीं पाते।

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4. दांपत्य जीवन का क्लेश मिटना और प्रेम की प्राप्ति

माता मातंगी आकर्षण और प्रेम की भी देवी हैं। यदि पति-पत्नी के बीच रोज़ क्लेश रहता है, घर टूट रहा है, या कोई व्यक्ति अपने सच्चे प्रेम को प्राप्त करना चाहता है, तो इस स्तुति का सात्विक पाठ अद्भुत वशीकरण का कार्य करता है। यह घर के वास्तु और वातावरण को प्रेममय बना देता है।

5. स्मरण शक्ति, मेधा और बुद्धि का तीव्र विकास

जो विद्यार्थी या शोधकर्ता (Researchers) पढ़ाई में कमज़ोर हैं या जिन्हें चीज़ें याद नहीं रहतीं, उनके लिए यह स्तुति वरदान है। यह स्तोत्र मस्तिष्क की सोई हुई कोशिकाओं (Brain Cells) को सक्रिय करता है। साधक की तर्क क्षमता (Logical reasoning) और रचनात्मकता (Creativity) कई गुना बढ़ जाती है।

6. सांसारिक ऐश्वर्य और राज-मान्यता की प्राप्ति

चूँकि मातंगी देवी श्री विद्या की ‘मंत्री’ हैं, इसलिए वे साधक को सत्ता, राज-मान्यता (Government Favors) और समाज में उच्च पद दिलाती हैं। इस स्तुति के पाठ से व्यक्ति को भौतिक सुख (वाहन, भवन, धन) और अंततः आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

श्री मातङ्गी स्तुति की प्रामाणिक पाठ और अर्चन विधि (Authentic Puja Vidhi)

दस महाविद्याओं की साधना अत्यंत सूक्ष्म और उग्र होती है। माता मातंगी की साधना को दो मार्गों से किया जाता है: वाम मार्ग (तांत्रिक/जूठे मुँह) और दक्षिण मार्ग (वैदिक/सात्विक)। सामान्य गृहस्थों को हमेशा ‘दक्षिण मार्ग’ का ही चुनाव करना चाहिए। पूर्ण फल प्राप्ति के लिए इस स्तुति का पाठ निम्नलिखित विधि से करें:

1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)

माता मातंगी की आराधना के लिए बुधवार (Wednesday), शुक्रवार (Friday), तृतीया तिथि, पूर्णिमा और गुप्त नवरात्रि के दिन सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माने जाते हैं। पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या रात्रि का समय (रात 9 बजे के बाद निशीथ काल) होता है। तंत्र में रात्रि साधना का विशेष महत्व है।

2. दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। माता मातंगी का वर्ण हरा है, इसलिए पाठ के समय हरे रंग (Green) या लाल रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत चमत्कारिक परिणाम देता है।

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए हरे या लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।

3. माता की स्थापना और पूजन सामग्री

एक लकड़ी की चौकी पर हरा या लाल कपड़ा बिछाकर माता मातंगी (या महाविद्या यंत्र) का चित्र स्थापित करें। माता के समक्ष तिल के तेल या शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप (विशेषकर चंदन या मोगरा) जलाएं। माता को लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब), कुमकुम, अक्षत, और बिल्वपत्र अर्पित करें। यदि आपके पास संगीत का कोई वाद्य यंत्र (जैसे वीणा, गिटार या हारमोनियम) है, तो उसे भी पास रखकर पूजें।

4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- “हे माता मातंगी, मैं अपनी वाक् सिद्धि, कला में सफलता या अमुक कार्य की सिद्धि के लिए आपकी स्तुति का 21/41 दिन तक पाठ करूँगा”) बोलें और जल ज़मीन पर छोड़ दें।

5. स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)

  • सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश और भगवान शिव (मातंगी के भैरव – मतंग भैरव) का मानसिक रूप से स्मरण करें।

  • अपने गुरु को प्रणाम करें (दस महाविद्या साधना में गुरु का स्मरण अत्यंत आवश्यक है)।

  • माता मातंगी के बीज मंत्र “ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा” की एक माला (स्फटिक या रुद्राक्ष पर) जपें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ ‘श्री मातङ्गी स्तुति’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • नित्य 1, 3 या 11 बार इसका पाठ अपनी संकल्पित अवधि तक करें।

6. वाम मार्ग का रहस्य (चेतावनी)

नोट: वाम मार्ग (तांत्रिक पद्धति) में साधक मुँह में पान, लौंग या प्रसाद चबाते हुए (अर्थात जूठे मुँह – उच्छिष्ट अवस्था में) माता का पाठ करता है। परंतु बिना योग्य गुरु के यह तांत्रिक प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। गृहस्थ साधक सात्विक (दक्षिण) मार्ग से स्वच्छ होकर ही पाठ करें।

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7. क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (नैवेद्य)

पाठ पूर्ण होने के बाद माता को मोदक, खीर, ताजे फल या मिश्री का भोग लगाएं। अंत में माता की आरती करें और हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें।

साधना के अत्यंत महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Strict Rules for Sadhana)

दस महाविद्याओं की साधना आग से खेलने के समान है, नियम टूटने पर नुकसान भी हो सकता है:

  1. गुरु दीक्षा का महत्व: यदि आप कोई बड़ा तांत्रिक अनुष्ठान कर रहे हैं, तो बिना गुरु के न करें। सामान्य स्तुति पाठ आप सात्विक भाव से कर सकते हैं।

  2. स्त्रियों का सर्वोच्च सम्मान: मातंगी साधना का सबसे बड़ा नियम यह है कि आप किसी भी स्त्री का अपमान न करें। चाहे वह कोई भी हो, उसमें माता का ही अंश देखें। स्त्री का अपमान करने वाले का सर्वनाश निश्चित है।

  3. वशीकरण का दुरुपयोग वर्जित: वाक् सिद्धि या वशीकरण की शक्ति प्राप्त होने पर इसका प्रयोग किसी को अनैतिक रूप से नुकसान पहुँचाने या अपनी वासना पूर्ति के लिए कभी न करें। देवी इसका घोर दंड देती हैं।

  4. गोपनीयता (Secrecy): अपनी मातंगी साधना को हमेशा गुप्त रखें।

  5. पूर्ण सात्विक आहार: संकल्प के दिनों में मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का पूर्णतया त्याग कर दें।

आधुनिक युग में मातंगी स्तुति की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का युग ‘प्रेजेंटेशन’ (Presentation) का युग है। आप अंदर से कितने भी ज्ञानी क्यों न हों, यदि आपको अपनी बात सामने वाले के सामने रखनी (Communicate करनी) नहीं आती, तो आप पीछे रह जाएंगे।

श्री मातङ्गी स्तुति आधुनिक युवा, कॉर्पोरेट लीडर्स, वकीलों और कलाकारों के लिए एक ‘पर्सनालिटी डेवलपमेंट टूल’ (Personality Development Tool) की तरह कार्य करती है। जब आप इस स्तुति का पाठ करते हैं, तो आपकी ‘थ्रोट चक्र’ (विशुद्धि चक्र) की ऊर्जा खुल जाती है। आपके भीतर का सारा ‘स्टेज फियर’ (Stage Fear) और आत्मविश्वास की कमी (Low Confidence) खत्म हो जाती है। आप जो बोलते हैं, वह सीधे लोगों के दिलों में उतर जाता है।

Shri Matangi Stuti केवल कुछ संस्कृत के शब्दों का संग्रह नहीं है; यह तंत्र विज्ञान की वह गुप्त कुँजी है जो मनुष्य को अज्ञान, भय और असफलता के अंधकार से निकालकर सर्वोच्च शिखर पर बैठा देती है। माता मातंगी वह शक्ति हैं जो हमारे शब्दों में प्राण फूंकती हैं।

जब भी आपको लगे कि आपकी कोई सुन नहीं रहा, आप अपनी कला में संघर्ष कर रहे हैं, या आपके विरोधी आप पर हावी हो रहे हैं, तो बुधवार या शुक्रवार को हरा वस्त्र धारण करें, घी का दीपक जलाएं, और पूर्ण हृदय से इस स्तुति का गान करते हुए माता मातंगी को पुकारें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि आपकी वाणी में सरस्वती का वास हो गया है और साक्षात माता मातंगी ने आपके लिए सफलता के सारे बंद दरवाज़े खोल दिए हैं। जय माता मातंगी! जय श्री विद्या!

श्री मातङ्गी स्तुतिः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. माता मातंगी कौन हैं और दस महाविद्याओं में उनका क्या स्थान है?

माता मातंगी सनातन तंत्र शास्त्र की ‘दस महाविद्याओं’ में नौवें (9th) स्थान पर विराजमान हैं। उन्हें ‘तांत्रिक सरस्वती’ भी कहा जाता है, क्योंकि वे वाक्-शक्ति, संगीत, 64 कलाओं और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं। श्री विद्या परंपरा में वे माता ललिता त्रिपुरसुंदरी की ‘मंत्री’ (Prime Minister) मानी जाती हैं।

2. माता मातंगी को ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ क्यों कहा जाता है?

पौराणिक और तांत्रिक कथाओं के अनुसार, माता मातंगी का प्राकट्य भगवान शिव और माता पार्वती के भोजन के ‘उच्छिष्ट’ (जूठे या बचे हुए) भाग से हुआ था। तंत्र में यह इस बात का प्रतीक है कि परब्रह्म के लिए पवित्र और अपवित्र का कोई भेद नहीं है; वे सभी द्वैत भावों से परे हैं। इसलिए इन्हें उच्छिष्ट चांडालिनी कहा जाता है।

3. श्री मातङ्गी स्तुति का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस स्तुति का सबसे बड़ा लाभ ‘वाक् सिद्धि’ (जो कहा जाए वह सत्य हो जाए) और ‘सम्मोहन’ (आकर्षण) की प्राप्ति है। इसके नियमित पाठ से संगीत, गायन, अभिनय जैसी कलाओं में अकल्पनीय सफलता मिलती है। यह विरोधियों का उच्चाटन करती है, स्मरण शक्ति बढ़ाती है और कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय दिलाती है।

4. इस स्तुति का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?

माता मातंगी की आराधना के लिए ‘बुधवार’ (Wednesday) और ‘शुक्रवार’ (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस स्तुति का पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या रात्रि में (निशीथ काल) हरे रंग के वस्त्र धारण करके और उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना सर्वाधिक फलदायी होता है।

5. क्या कोई सामान्य गृहस्थ व्यक्ति भी इस तांत्रिक स्तुति का पाठ कर सकता है?

जी हाँ, बिल्कुल! सामान्य गृहस्थ व्यक्ति ‘दक्षिण मार्ग’ (सात्विक विधि) का पालन करते हुए पूर्ण पवित्रता, स्वच्छता और श्रद्धा के साथ इस स्तुति का पाठ कर सकता है। गृहस्थों को ‘वाम मार्ग’ (जूठे मुँह पाठ करने की तांत्रिक विधि) का प्रयोग बिना योग्य गुरु के निर्देशन के कभी नहीं करना चाहिए।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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