श्री महालक्ष्मी स्तुतिः | Sri Mahalakshmi StutiIt takes 2 minutes... to read this article !

Sri Mahalakshmi Stuti: श्री महालक्ष्मी स्तुति एक सुंदर संस्कृत स्तोत्र है जिसमें देवी महालक्ष्मी की विभिन्‍न रूपों, समृद्धि, ज्ञान, स्वास्थ्य और कल्याण की प्राप्ति हेतु उनके गुणों और कृपा का भावपूर्ण स्तुति-गान किया गया है। यह भक्ति-प्रधान स्तुति पाठक को आध्यात्मिक शांति और समृद्धि की अनुभूति कराती है।

आदिलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।
यशो देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १ ॥

सन्तानलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु पुत्रपौत्रप्रदायिनि ।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ २ ॥

विद्यालक्ष्मि नमस्तेऽस्तु ब्रह्मविद्यास्वरूपिणि ।
विद्यां देहि कलान् देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ३ ॥

धनलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वदारिद्र्यनाशिनि ।
धनं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ४ ॥

धान्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वाभरणभूषिते ।
धान्यं देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ५ ॥

मेधालक्ष्मि नमस्तेऽस्तु कलिकल्मषनाशिनि ।
प्रज्ञां देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ६ ॥

गजलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वदेवस्वरूपिणि ।
अश्वांश्च गोकुलं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ७ ॥

वीरलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु पराशक्तिस्वरूपिणि ।
वीर्यं देहि बलं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ८ ॥

जयलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वकार्यजयप्रदे ।
जयं देहि शुभं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ९ ॥

भाग्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सौमाङ्गल्यविवर्धिनि ।
भाग्यं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १० ॥

कीर्तिलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु विष्णुवक्षःस्थलस्थिते ।
कीर्तिं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ११ ॥

आरोग्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वरोगनिवारणि ।
आयुर्देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १२ ॥

सिद्धलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वसिद्धिप्रदायिनि ।
सिद्धिं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १३ ॥

सौन्दर्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वालङ्कारशोभिते ।
रूपं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १४ ॥

साम्राज्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।
मोक्षं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १५ ॥

मङ्गले मङ्गलाधारे माङ्गल्ये मङ्गलप्रदे ।
मङ्गलार्थं मङ्गलेशि माङ्गल्यं देहि मे सदा ॥ १६ ॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १७ ॥

शुभं भवतु कल्याणी आयुरारोग्यसम्पदाम् ।
मम शत्रुविनाशाय दीपलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥ [ज्योति]

॥ इति श्री महालक्ष्मी स्तुतिः ॥

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