दशश्लोकी स्तुतिः (Dashashloki Stuti Lyrics in Sanskrit) : अर्थ, अद्वैत रहस्य और आत्म-साक्षात्कार के लाभIt takes 12 minutes... to read this article !

सनातन धर्म की आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा में ‘अद्वैत वेदांत’ (Advaita Vedanta) का स्थान सर्वोच्च है। जब भी हम अद्वैत यानी ‘ईश्वर और आत्मा के एक होने’ की बात करते हैं, तो आदि गुरु शंकराचार्य जी का नाम सबसे पहले आता है। शंकराचार्य जी ने अपने जीवनकाल में अनेक स्तोत्रों, स्तुतियों और भाष्यों की रचना की, लेकिन जब बात आत्म-परिचय (Self-Realization) की आती है, तो उनके द्वारा रचित ‘दशश्लोकी स्तुतिः’ (Dashashloki Stuti) एक ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है, जो मनुष्य के सारे अज्ञान, भ्रम और अहंकार को जड़ से उखाड़ फेंकता है।

हम जीवन भर खुद को एक शरीर, एक नाम, एक जाति या एक पदवी (Job Title) के रूप में पहचानते हैं। यही पहचान हमारे सारे दुखों, तनावों और मृत्यु के भय का कारण बनती है। ‘दशश्लोकी स्तुति’ 10 श्लोकों का वह ब्रह्मांडीय दर्पण है, जो हमें हमारा असली चेहरा दिखाता है। यह स्तुति उद्घोष करती है कि “मैं शरीर नहीं, मन नहीं, बल्कि मैं तो शुद्ध शिव (चेतना) हूँ।”

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि दशश्लोकी स्तुति की रचना कैसे हुई, इसका गहरा आध्यात्मिक रहस्य क्या है, Dashashloki Stuti Lyrics in Sanskrit के पाठ का मूल दर्शन क्या है, इसके अभ्यास से कौन से अकल्पनीय मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं, और आज के तनावपूर्ण युग में इसे ध्यान का माध्यम कैसे बनाया जाए।

दशश्लोकी स्तुति की उत्पत्ति: एक अद्भुत ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कथा

‘दशश्लोकी’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘दस श्लोकों का समूह’। इस स्तुति के जन्म की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है।

कथा के अनुसार, जब आदि गुरु शंकराचार्य केवल 8 वर्ष के बालक थे, तब वे सत्य की खोज में अपने घर (केरल) से निकल पड़े थे। पैदल यात्रा करते हुए वे नर्मदा नदी के तट पर ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश) पहुँचे। वहाँ एक गुफा में महान संत ‘गोविंद भगवत्पाद’ समाधि में लीन थे। बालक शंकर उस गुफा के द्वार पर गए और गुरु की स्तुति करने लगे।

जब गुरु गोविंद भगवत्पाद की समाधि टूटी, तो उन्होंने बालक शंकर से पूछा— “कोऽसि त्वम्?” (तुम कौन हो?)

इस छोटे से प्रश्न का उत्तर एक सामान्य व्यक्ति अपना नाम या अपने माता-पिता का नाम बताकर देता। लेकिन बालक शंकर ने उस समय 10 संस्कृत श्लोकों में जो उत्तर दिया, वही आज ‘दशश्लोकी स्तुतिः’ के नाम से विख्यात है। बालक ने कहा कि “मैं न तो यह शरीर हूँ, न मैं जल हूँ, न अग्नि हूँ और न ही वायु हूँ। इन सबको जानने वाली जो शुद्ध चेतना है— शिवः केवलोऽहम् (मैं केवल शिव हूँ)।” यह सुनकर गुरु गोविंद भगवत्पाद अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने शंकर को अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।

दशश्लोकी स्तुति का मूल दर्शन: ‘नेति-नेति’ का विज्ञान

दशश्लोकी स्तुति उपनिषदों के ‘नेति-नेति’ (Neti-Neti – न इति, न इति अर्थात यह भी नहीं, यह भी नहीं) सिद्धांत पर आधारित है।

अद्वैत वेदांत कहता है कि सत्य (ईश्वर/आत्मा) को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। इसलिए, हम जो कुछ भी देख सकते हैं, छू सकते हैं, या सोच सकते हैं— उसे नकारते जाना ही सत्य तक पहुँचने का मार्ग है।

दशश्लोकी स्तुति में शंकराचार्य जी इसी ‘नेति-नेति’ का प्रयोग करते हुए हमारी झूठी पहचान को तोड़ते हैं:

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  1. पंच महाभूतों का निषेध: मैं न पृथ्वी हूँ, न जल हूँ, न अग्नि हूँ, न वायु हूँ और न आकाश हूँ।

  2. इंद्रियों का निषेध: मैं देखने वाली आँख, सुनने वाले कान या बोलने वाली जीभ भी नहीं हूँ।

  3. मन और बुद्धि का निषेध: मैं सोचने वाला मन, निर्णय लेने वाली बुद्धि या अभिमान करने वाला अहंकार भी नहीं हूँ।

  4. जातियों और आश्रमों का निषेध: मैं न तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हूँ और न ही ब्रह्मचारी, गृहस्थ या संन्यासी हूँ।

जब यह सब कुछ ‘मैं’ नहीं हूँ, तो फिर ‘मैं’ कौन हूँ? स्तुति के हर श्लोक का अंतिम चरण एक ही महान उद्घोष करता है— “तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्” (उन सबके निषेध के बाद जो एकमात्र शेष बचता है, वह शुद्ध कल्याणकारी चेतना यानी ‘शिव’ केवल मैं ही हूँ)।

दशश्लोकी स्तुतिः (संस्कृत) | Dashashloki Stuti Lyrics in Sanskrit

साम्बो नः कुलदैवतं पशुपते साम्ब त्वदीया वयं
साम्बं स्तौमि सुरासुरोरगगणाः साम्बेन सन्तारिताः ।
साम्बायास्तु नमो मया विरचितं साम्बात्परं नो भजे
साम्बस्यानुचरोऽस्म्यहं मम रतिः साम्बे परब्रह्मणि ॥ १ ॥

विष्ण्वाद्याश्च पुरत्रयं सुरगणा जेतुं न शक्ताः स्वयं
यं शम्भुं भगवन्वयं तु पशवोऽस्माकं त्वमेवेश्वरः ।
स्वस्वस्थाननियोजिताः सुमनसः स्वस्था बभूवुस्तत-
-स्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ २ ॥

क्षोणी यस्य रथो रथाङ्गयुगलं चन्द्रार्कबिम्बद्वयं
कोदण्डः कनकाचलो हरिरभूद्बाणो विधिः सारथिः ।
तूणीरो जलधिर्हयाः श्रुतिचयो मौर्वी भुजङ्गाधिप-
-स्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ३ ॥

येनापादितमङ्गजाङ्गभसितं दिव्याङ्गरागैः समं
येन स्वीकृतमब्जसम्भवशिरः सौवर्णपात्रैः समम् ।
येनाङ्गीकृतमच्युतस्य नयनं पूजारविन्दैः समं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ४ ॥

गोविन्दादधिकं न दैवतमिति प्रोच्चार्य हस्तावुभा-
-वुद्धृत्याथ शिवस्य संनिधिगतो व्यासो मुनीनां वरः ।
यस्य स्तम्भितपाणिरानतिकृता नन्दीश्वरेणाभव-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ५ ॥

आकाशश्चिकुरायते दशदिशाभोगो दुकूलायते
शीतांशुः प्रसवायते स्थिरतरानन्दः स्वरूपायते ।
वेदान्तो निलयायते सुविनयो यस्य स्वभावायते
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ६ ॥

विष्णुर्यस्य सहस्रनामनियमादम्भोरुहाण्यर्चय-
-न्नेकोनोपचितेषु नेत्रकमलं नैजं पदाब्जद्वये ।
सम्पूज्यासुरसंहतिं विदलयंस्त्रैलोक्यपालोऽभव-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ७ ॥

शौरिं सत्यगिरं वराहवपुषं पादाम्बुजादर्शने
चक्रे यो दयया समस्तजगतां नाथं शिरोदर्शने ।
मिथ्यावाचमपूज्यमेव सततं हंसस्वरूपं विधिं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ८ ॥

यस्यासन्धरणीजलाग्निपवनव्योमार्कचन्द्रादयो
विख्यातास्तनवोऽष्टधा परिणता नान्यत्ततो वर्तते ।
ओङ्कारार्थविवेचनी श्रुतिरियं चाचष्ट तुर्यं शिवं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ ९ ॥

विष्णुब्रह्मसुराधिपप्रभृतयः सर्वेऽपि देवा यदा
सम्भूताज्जलधेर्विषात्परिभवं प्राप्तास्तदा सत्वरम् ।
तानार्तांशरणागतानिति सुरान्योऽरक्षदर्धक्षणा-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्मणि ॥ १० ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ दशश्लोकीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

स्तुति का केंद्रीय भाव: यह स्तुति केवल देवताओं को प्रसन्न करने वाला सामान्य स्तोत्र नहीं है; यह एक ‘ज्ञान योग’ (Path of Knowledge) है। इसका प्रत्येक श्लोक साधक को बाहर की दुनिया से खींचकर उसके भीतर की अनंत गहराई में ले जाता है। यह स्तुति हमें सिखाती है कि हमारी वास्तविक प्रकृति सच्चिदानंद (सत्-चित्-आनंद) है, जिसे न कोई शस्त्र काट सकता है, न आग जला सकती है और न पानी भिगो सकता है।

दशश्लोकी स्तुति पाठ और चिंतन के अकल्पनीय लाभ (Benefits of Dashashloki Stuti)

जब कोई साधक केवल होठों से नहीं, बल्कि अपनी पूर्ण चेतना और समझ के साथ इस दशश्लोकी स्तुति का पाठ और मनन (Contemplation) करता है, तो उसके जीवन में अद्भुत और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आते हैं:

1. मृत्यु के भय (Fear of Death) से पूर्ण मुक्ति

मनुष्य का सबसे बड़ा डर मृत्यु है। हम मृत्यु से इसलिए डरते हैं क्योंकि हम खुद को ‘शरीर’ मानते हैं। दशश्लोकी स्तुति का पहला सूत्र ही यह है कि “मैं शरीर नहीं हूँ।” जब साधक को यह गहरा बोध हो जाता है कि वह एक शाश्वत चेतना (Eternal Consciousness) है जिसका कभी जन्म नहीं हुआ, तो उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है? इस ज्ञान के उदय होते ही मृत्यु का भय जड़ से खत्म हो जाता है।

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2. भयंकर डिप्रेशन, तनाव और एंग्जायटी का नाश

आज के समय में अवसाद (Depression) और चिंता (Anxiety) का सबसे बड़ा कारण हमारी ‘पहचान का संकट’ (Identity Crisis) है। हम अपनी नौकरी, बैंक बैलेंस या रिश्तों को अपना ‘मैं’ मान लेते हैं। जब ये टूटते हैं, तो हम बिखर जाते हैं। दशश्लोकी हमें इन सभी झूठी पहचानों से मुक्त करती है। जब आपको पता चलता है कि आप अनंत आकाश की तरह मुक्त हैं, तो छोटी-मोटी सांसारिक परेशानियां आपके मन को छू भी नहीं पातीं।

3. अहंकार (Ego) का पूर्ण भस्मीकरण

समाज में व्यक्ति अपने पद, रूप, या ज्ञान का बहुत बड़ा अहंकार पाल लेता है। शंकराचार्य जी इस स्तुति में हर प्रकार के अहंकार को कुचल देते हैं। वे कहते हैं— “जब तुम्हारा कोई नाम, रूप या जाति है ही नहीं, तो तुम किस बात का अभिमान कर रहे हो?” इसके चिंतन से व्यक्ति के भीतर एक असीम विनम्रता और शांति का जन्म होता है।

4. एकाग्रता (Concentration) और ध्यान में गहराई

जो साधक ध्यान (Meditation) करते हैं, लेकिन उनका मन विचारों में भटकता रहता है, उनके लिए यह स्तुति एक ‘गाइडेड मेडिटेशन’ (Guided Meditation) का कार्य करती है। दशश्लोकी के श्लोकों का मानसिक जप करने से बाहरी विचार स्वतः गिरने लगते हैं और साधक अपनी नाभि या हृदय चक्र में स्थित शुद्ध शिव तत्व का अनुभव करने लगता है।

5. वैराग्य (Detachment) और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization)

यह स्तुति सांसारिक वस्तुओं के प्रति एक स्वस्थ वैराग्य पैदा करती है। व्यक्ति दुनिया में रहते हुए, सारे काम करते हुए भी मन से कमल के पत्ते की तरह अलिप्त (Detached) रहता है। अंततः यही स्तुति साधक को ‘मोक्ष’ (Liberation) या आत्म-साक्षात्कार के द्वार तक ले जाती है।

दशश्लोकी स्तुति की प्रामाणिक अभ्यास और ध्यान विधि (Authentic Method of Contemplation)

दशश्लोकी स्तुति सामान्य पूजा-पाठ या कर्मकांड का हिस्सा नहीं है। यह ‘वेदांत’ का सूत्र है। इसलिए इसके पाठ की विधि भी अन्य स्तोत्रों से भिन्न और अधिक अंतर्मुखी (Introvert) होती है:

1. स्थान और समय का चुनाव

दशश्लोकी स्तुति के मनन के लिए सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 4 से 6 बजे के बीच) का होता है। उस समय प्रकृति शांत होती है और मन में रजोगुण और तमोगुण कम होते हैं। अभ्यास के लिए किसी एकांत, शांत और स्वच्छ स्थान का चुनाव करें जहाँ आपको कोई परेशान न करे।

2. आसन और शारीरिक स्थिति

  • जमीन पर एक कुशा या ऊनी आसन बिछाकर ‘सुखासन’ (Cross-legged) या ‘पद्मासन’ में बैठ जाएं।

  • अपनी रीढ़ की हड्डी (Spine) और गर्दन को बिल्कुल सीधा रखें।

  • आँखें कोमलता से बंद कर लें और दोनों हाथों को ‘ज्ञान मुद्रा’ (तर्जनी और अंगूठे को मिला लें) में घुटनों पर रखें।

3. श्रवण, मनन और निदिध्यासन (The Vedantic Process)

  • श्रवण (Listening/Reading): सबसे पहले दशश्लोकी स्तुति के एक श्लोक को धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से संस्कृत में पढ़ें या सुनें।

  • मनन (Reflection): उस श्लोक के अर्थ पर विचार करें। जैसे, यदि श्लोक कहता है “मैं पृथ्वी, जल या आकाश नहीं हूँ”, तो अपनी बुद्धि से सोचें कि मेरा शरीर तो इन 5 तत्वों से बना है और नष्ट हो जाएगा, तो मैं यह शरीर कैसे हो सकता हूँ?

  • निदिध्यासन (Deep Meditation): जब तर्क शांत हो जाए, तो श्लोक के अंतिम शब्द “शिवः केवलोऽहम्” (मैं केवल शिव हूँ) पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दें। इस अवस्था में कोई विचार न हो, केवल एक विशुद्ध ‘होने का अहसास’ (Sense of Being) हो।

4. दैनिक जीवन में प्रयोग (Integration in Daily Life)

केवल 15 मिनट आंख बंद करके बैठने से वेदांत सिद्ध नहीं होता। दिन भर के कार्यों के दौरान, जब भी आपको क्रोध आए, ईर्ष्या हो, या तनाव हो, तो एक सेकंड के लिए रुकें और खुद को याद दिलाएं— “मैं यह क्रोध करने वाला मन नहीं हूँ, मैं तो शांत शिव हूँ।” यह अभ्यास आपके जीवन को पूरी तरह से बदल देगा।

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आधुनिक युग (Modern World) में दशश्लोकी स्तुति की असीम प्रासंगिकता

आज का युग ‘सोशल मीडिया’ और दिखावे का युग है। इंसान की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कितने ‘लाइक्स’ (Likes) मिले या समाज उसे किस नज़र से देखता है। हम खुद को उस प्रोफाइल पिक्चर या उस बायोडेटा (Resume) तक सीमित कर चुके हैं जो वास्तव में हम हैं ही नहीं।

इस भयंकर मानसिक भटकाव के दौर में, दशश्लोकी स्तुति एक ‘वेक-अप कॉल’ (Wake-up call) है। यह हमें आभासी दुनिया (Virtual World) से खींचकर वास्तविक स्वरूप (Real Self) में लाती है। यह हमें याद दिलाती है कि हम कोई साधारण जीव नहीं हैं जो केवल जन्म लेने, पैसा कमाने और मर जाने के लिए आए हैं। हम तो वह अनंत चेतना हैं जो पूरे ब्रह्मांड का आधार है।

छात्र, व्यवसायी, कर्मचारी या গৃহिणी— कोई भी व्यक्ति जब इस स्तुति के दर्शन को अपने जीवन में उतारता है, तो उसकी कार्यक्षमता (Efficiency) और निर्णय लेने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि अब उसके भीतर हारने का या कुछ खोने का डर समाप्त हो चुका होता है।

Dashashloki Stuti आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा मानवता को दिया गया एक ऐसा अनमोल उपहार है, जो अज्ञान के घोर अंधकार को चीरकर सत्य का प्रकाश फैलाता है। यह कोई बाहरी देवता की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह अपने ही भीतर बैठे उस परमात्मा (शिव) से मिलने का सीधा मार्ग है।

जब जीवन की परेशानियां भारी लगने लगें, जब लगे कि दुनिया आपको समझ नहीं रही है, तो किसी एकांत कोने में बैठ जाएं, आँखें बंद करें और दशश्लोकी स्तुति के इस महामंत्र का मानसिक गान करें— “शिवः केवलोऽहम्… शिवः केवलोऽहम्।” आप पाएंगे कि सारी चिंताएं धुएं की तरह उड़ गईं हैं और भीतर केवल एक असीम, अगाध और परमानंद से भरी हुई शांति शेष रह गई है। उसी शांति का नाम शिव है, उसी शांति का नाम आप हैं। ॐ नमः शिवाय!

दशश्लोकी स्तुतिः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. दशश्लोकी स्तुति की रचना किसने की थी और इसकी पृष्ठभूमि क्या है?

दशश्लोकी स्तुति की रचना अद्वैत वेदांत के महान आचार्य ‘आदि गुरु शंकराचार्य’ जी ने की थी। कथा के अनुसार, जब 8 वर्ष की आयु में बालक शंकर अपने गुरु ‘गोविंद भगवत्पाद’ से मिले, तो गुरु के यह पूछने पर कि “तुम कौन हो?”, बालक शंकर ने जिन 10 श्लोकों में अपनी वास्तविक पहचान (शुद्ध चेतना के रूप में) बताई, वही दशश्लोकी स्तुति है।

2. अद्वैत वेदांत में ‘शिवः केवलोऽहम्’ का क्या अर्थ है?

‘शिवः केवलोऽहम्’ का अर्थ है— “मैं केवल शिव हूँ।” अद्वैत वेदांत के अनुसार, यहाँ ‘शिव’ का अर्थ किसी विशेष रूप वाले देवता से नहीं है, बल्कि उस शुद्ध, निराकार, कल्याणकारी और शाश्वत चेतना (Pure Consciousness) से है जो सभी प्राणियों के भीतर व्याप्त है। शरीर, मन और अहंकार के निषेध के बाद जो सत्य शेष बचता है, वही शिव है और वही हमारी आत्मा है।

3. दशश्लोकी स्तुति और निर्वाण षट्कम् (Nirvana Shatakam) में क्या अंतर है?

दोनों ही आदि गुरु शंकराचार्य जी की महान रचनाएं हैं और दोनों का दार्शनिक आधार ‘अद्वैत वेदांत’ है। ‘निर्वाण षट्कम्’ में 6 श्लोक हैं (मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं…), जबकि ‘दशश्लोकी स्तुति’ में 10 श्लोक हैं (न भूमिर्न तोयं…)। दोनों का उद्देश्य एक ही है— मनुष्य को यह याद दिलाना कि वह शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध शिव स्वरूप है।

4. क्या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति भी दशश्लोकी स्तुति का पाठ कर सकता है?

जी हाँ, बिल्कुल! सत्य और आत्मज्ञान पर सबका समान अधिकार है। कोई भी गृहस्थ, छात्र या व्यावसायिक व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इसका पाठ कर सकता है। यह स्तुति सांसारिक कार्यों को छोड़ने को नहीं कहती, बल्कि उन्हें बिना किसी मानसिक तनाव और अहंकार के करने की शक्ति प्रदान करती है।

5. दशश्लोकी स्तुति के पाठ और मनन से सबसे बड़ा लाभ क्या होता है?

दशश्लोकी स्तुति के मनन से मनुष्य को ‘मृत्यु के भय’ और ‘अहंकार’ से पूर्णतः मुक्ति मिल जाती है। इसके अभ्यास से मानसिक अवसाद (Depression) और पहचान का संकट (Identity Crisis) खत्म होता है, और साधक के भीतर असीम शांति, वैराग्य और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का उदय होता है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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