श्री शिव स्तुतिः (इन्द्रादि कृतम्) | Indra Krita Shiva StutiIt takes 1 minutes... to read this article !

Indra Krita Shiva Stuti: इन्द्र कृत शिव स्तुति एक पवित्र संस्कृत स्तोत्र है जिसमें देवताओं के राजा इन्द्र द्वारा भगवान शिव की महिमा, शक्ति और भक्तिपूर्ण स्तुति का सुंदर वर्णन किया गया है। यह स्तुति पाठक को शिव भक्ति, आध्यात्मिक शांति और ईश्वर के अनुग्रह की अनुभूति प्रदान करती है।

नमामि सर्वे शरणार्थिनो वयं
महेश्वर त्र्यम्बक भूतभावन ।
उमापते विश्वपते मरुत्पते
जगत्पते शङ्कर पाहि नस्स्वयम् ॥ १ ॥

जटाकलापाग्र शशाङ्कदीधिति
प्रकाशिताशेषजगत्त्रयामल ।
त्रिशूलपाणे पुरुषोत्तमाऽच्युत
प्रपाहिनो दैत्यभयादुपस्थितात् ॥ २ ॥

त्वमादिदेवः पुरुषोत्तमो हरि-
र्भवो महेशस्त्रिपुरान्तको विभुः ।
भगाक्षहा दैत्यरिपुः पुरातनो
वृषध्वजः पाहि सुरोत्तमोत्तम ॥ ३ ॥

गिरीशजानाथ गिरिप्रियाप्रिय
प्रभो समस्तामरलोकपूजित ।
गणेश भूतेश शिवाक्षयाव्यय
प्रपाहि नो दैत्यवरान्तकाऽच्युत ॥ ४ ॥

पृथ्व्यादितत्त्वेषु भवान् प्रतिष्ठितो
ध्वनिस्वरूपो गगने विशेषतः ।
लिनो द्विधा तेजसि स त्रिधाजले
चतुःक्षितौ पञ्चगुणप्रधानः ॥ ५ ॥

अग्निस्वरूपोसि तरौ तथोपले
सत्त्वस्वरूपोसि तथा तिलेष्वपि ।
तैलस्वरूपो भगवान् महेश्वरः
प्रपाहि नो दैत्यगणार्दितान् हर ॥ ६ ॥

नासीद्यदाकाण्डमिदं त्रिलोचन
प्रभाकरेन्द्रेन्दु विनापि वा कुतः ।
तदा भवानेव विरुद्धलोचन
प्रमादबाधादिविवर्जितः स्थितः ॥ ७ ॥

कपालमालिन् शशिखण्डशेखर
श्मशानवासिन् सितभस्मगुम्भित ।
फणीन्द्रसंवीततनोन्तकान्तक
प्रपाहि नो दक्षधिया सुरेश्वर ॥ ८ ॥

भवान् पुमान् शक्तिरियं गिरेस्सुता
सर्वाङ्गरूपा भगवन्-स्तदात्वयि ।
त्रिशूलरूपेण जगद्भयङ्करे
स्थितं त्रिनेत्रेषु मखाग्नयस्त्रयः ॥ ९ ॥

जटास्वरूपेण समस्तसागराः
कुलाचलास्सिन्धुवहाश्च सर्वशः ।
शरीरजं ज्ञानमिदं त्ववस्थितं
तदेव पश्यन्ति कुदृष्ट यो जनाः ॥ १० ॥

नारायणस्त्वं जगतां समुद्भव-
स्तथा भवानेव चतुर्मुखो महान् ।
सत्त्वादिभेदेन तथाग्निभेदितो
युगादिभेदेन च संस्थितस्त्रिधा ॥ ११ ॥

भवन्तमेते सुरनायकाः प्रभो
भवार्थिनोऽन्यस्य वदन्ति तोषयन् ।
यतस्ततोनो भव भूतिभूषण
प्रप्राहि विश्वेश्वर रुद्र ते नमः ॥ १२ ॥

इति श्री वराहपुराणे इन्द्रादिकृत शिवस्तुतिः ।

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