सूर्य स्तुति (ऋग्वेदीय) | Surya Stuti (Rigveda)It takes 1 minutes... to read this article !

Surya Stuti (Rigveda): सूर्य स्तुति (ऋग्वेद) एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है जिसमें ऋग्वेद के सनातन मंत्रों के माध्यम से भगवान सूर्य देव की महिमा, जीवन-दायिनी शक्ति और भक्ति-भाव का दिव्य वर्णन किया गया है। यह स्तुति पाठक को ऊर्जा, भक्ति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है।

(ऋ।वे।१।०५०।१)

उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑: ।
दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ॥ १

अप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभि॑: ।
सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे ॥ २

अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जना॒ग्ं अनु॑ ।
भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा ॥ ३

त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य ।
विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम् ॥ ४

प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विश॑: प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान् ।
प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे ॥ ५

येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जना॒ग्ं अनु॑ ।
त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि ॥ ६

वि द्यामे॑षि॒ रज॑स्पृ॒थ्वहा॒ मिमा॑नो अ॒क्तुभि॑: ।
पश्य॒ञ्जन्मा॑नि सूर्य ॥ ७

स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य ।
शो॒चिष्के॑शं विचक्षण ॥ ८

अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युव॒: सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्य॑: ।
ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः ॥ ९

उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् ।
दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥ १०

उ॒द्यन्न॒द्य मि॑त्रमह आ॒रोह॒न्नुत्त॑रां॒ दिव॑म् ।
हृ॒द्रो॒गं मम॑ सूर्य हरि॒माणं॑ च नाशय ॥ ११

शुके॑षु मे हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि ।
अथो॑ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि ॥ १२

उद॑गाद॒यमा॑दि॒त्यो विश्वे॑न॒ सह॑सा स॒ह ।
द्वि॒षन्तं॒ मह्यं॑ र॒न्धय॒न्मो अ॒हं द्वि॑ष॒ते र॑धम् ॥ १३

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