श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति (Shri Chandrasekharendra Saraswati Stuti Lyrics in Sanskrit) : महापेरियवा का रहस्य, गुरु कृपा और आध्यात्मिक शांति के अद्भुत लाभIt takes 13 minutes... to read this article !

सनातन धर्म की महान परंपरा में ईश्वर से भी ऊँचा स्थान ‘गुरु’ को दिया गया है। गुरु वह प्रकाश है जो शिष्य के भीतर के अज्ञान रूपी घोर अंधकार को नष्ट कर उसे साक्षात परब्रह्म का दर्शन कराता है। हमारे इतिहास में कई ऐसे संत हुए हैं जो केवल उपदेशक नहीं थे, बल्कि साक्षात ‘जीवन्मुक्त’ (Liberated while living) थे। 20वीं सदी के ऐसे ही एक अलौकिक संत, अद्वैत वेदांत के साक्षात स्वरूप और कांची कामकोटि पीठ के 68वें जगद्गुरु थे— श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्वामिगल, जिन्हें भक्त अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से ‘महापेरियवा’ (Maha Periyava – The Great Sage) कहते हैं।

महापेरियवा को इस धरती पर ‘चलता-फिरता ईश्वर’ (Walking God) माना जाता था। जिन्होंने अपना पूरा 100 वर्ष का जीवन (1894-1994) अत्यंत कठोर तपस्या, सादगी और सनातन धर्म के संरक्षण में बिता दिया। उनकी महिमा, उनके असीम ज्ञान और उनकी करुणा का गान करने के लिए भक्तों और विद्वानों द्वारा ‘श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति’ (Shri Chandrasekharendra Saraswati Stuti) की रचना की गई है।

जब जीवन दिशाहीन हो जाए, मन घोर भटकाव का शिकार हो, और कोई मार्गदर्शक न मिले, तब एक सच्चे गुरु की स्तुति इंसान को भवसागर से पार लगा देती है। इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि महापेरियवा का जीवन दर्शन क्या था, Shri Chandrasekharendra Saraswati Stuti Lyrics in Sanskrit के पाठ का मूल भाव क्या है, गुरु कृपा से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इस पवित्र स्तुति को सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक विधि क्या है।

महापेरियवा (श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) : तपस्या और करुणा के साक्षात अवतार

इस स्तुति की गहराई और इसकी शक्ति को समझने के लिए पहले उस महान विभूति को समझना आवश्यक है जिसके लिए यह रची गई है।

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी ने मात्र 13 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण कर लिया था और कांची कामकोटि पीठ (आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित) के पीठाधिपति बन गए थे। उनका जीवन किसी सामान्य धर्मगुरु जैसा नहीं था। वे एक सच्चे संन्यासी थे। उन्होंने पूरे भारतवर्ष की यात्रा नंगे पैर (बिना जूतों के) की। वे केवल भिक्षा का भोजन करते थे, घास की झोपड़ी में सोते थे और कभी किसी भौतिक सुख-सुविधा को स्पर्श तक नहीं किया।

ज्ञान और करुणा का संगम: उनके पास बड़े-बड़े राजनेता, वैज्ञानिक और विदेशी विद्वान अपने प्रश्नों के उत्तर खोजने आते थे, और दूसरी ओर एक साधारण गरीब किसान भी अपनी व्यथा लेकर आता था। महापेरियवा की दृष्टि में दोनों समान थे। उनकी केवल एक दृष्टि (कृपा कटाक्ष) से लोगों की बड़ी-बड़ी बीमारियां दूर हो जाती थीं और जीवन की जटिल समस्याएं सुलझ जाती थीं। वे अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च शिखर पर बैठे थे, फिर भी उनके हृदय में हर जीव के लिए एक माँ जैसी करुणा थी।

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति का मूल दर्शन (Essence of Guru Stuti)

सनातन दर्शन में ‘गुरु’ शब्द दो अक्षरों से बना है: ‘गु’ अर्थात अंधकार और ‘रु’ अर्थात उसे मिटाने वाला प्रकाश।

यह स्तुति केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं है; यह उस ‘गुरु तत्व’ (Guru Principle) की वंदना है जो श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती के शरीर में पूर्ण रूप से जाग्रत था। जब हम इस स्तुति का पाठ करते हैं, तो हम वास्तव में उस सर्वोच्च चेतना से जुड़ रहे होते हैं जो काल, स्थान और शरीर के बंधनों से मुक्त है।

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स्तुति का दर्शन यह है कि परमात्मा को खोजना अत्यंत कठिन है, क्योंकि वह निराकार है। परंतु गुरु उसी निराकार परमात्मा का ‘साकार रूप’ है, जिसे हम देख सकते हैं, सुन सकते हैं और जिसके चरणों में सिर रख सकते हैं। महापेरियवा की स्तुति हमें यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि गुरु के प्रति पूर्ण और निष्कपट ‘समर्पण’ (Surrender) से प्राप्त होता है।

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति (संस्कृत) | Shri Chandrasekharendra Saraswati Stuti Lyrics in Sanskrit

शृतिस्मृतिपुराणोक्त धर्ममार्गरतं गुरुम् ।
भक्तानां हित वक्तारं नमस्ये चित्तशुद्धये ॥ १ ॥

अद्वैतानन्दभरितं साधूनामुपकारिणम् ।
सर्वशास्त्रविदं शान्तं नमस्ये चित्तशुद्धये ॥ २ ॥

धर्मभक्तिज्ञानमार्गप्रचारे बद्धकङ्कणम् ।
अनुग्रहप्रदातारं नमस्ये चित्तशुद्धये ॥ ३ ॥

भगवत्पादपादाब्जविनिवेशित चेतसः ।
श्रीचन्द्रशेखरगुरोः प्रसादो मयिजायताम् ॥ ४ ॥

क्षेत्रतीर्थकथाभिज्ञः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
चन्द्रशेखर्यवर्योमे सन्निधत्ता सदाहृदि ॥ ५ ॥

पोषणे वेदशास्त्राणां दत्तचित्तमहर्निशम् ।
क्षेत्रयात्रारतं वन्दे सद्गुरुं चन्द्रशेखरम् ॥ ६ ॥

वेदज्ञान् वेदभाष्यज्ञान् कर्तुं यस्य समुद्यमः ।
गुरुर्यस्य महादेवः तं वन्दे चन्द्रशेखरम् ॥ ७ ॥

मणिवाचक गोदादि भक्ति वागमृतैर्बृशम् ।
बालानां भगवद्भक्तिं वर्धयन्तं गुरुं भजे ॥ ८ ॥

लघूपदेशैर्नास्तिक्य भावमर्दन कोविदम् ।
शिवं स्मितमुखं शान्तं प्रणतोऽस्मि जगद्गुरुम् ॥ ९ ॥

विनयेन प्रार्थयेऽहं विद्यां बोधयमे गुरो ।
मार्गमन्यं नजानेऽहं भवन्तं शरणङ्गतः ॥ १० ॥

स्तुति का केंद्रीय भाव (The Core Message): इस स्तुति के श्लोकों में महापेरियवा के अलौकिक स्वरूप का ध्यान किया गया है:

  • “मैं उन श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती को प्रणाम करता हूँ, जिनका मुखमंडल पूर्णिमा के चंद्रमा के समान शांत और शीतल है, और जिनकी आँखें करुणा की वर्षा करती हैं।”

  • “जो आदि शंकराचार्य की महान परंपरा के सच्चे वाहक हैं, जिन्होंने वेदों और शास्त्रों के ज्ञान को अपने जीवन में साक्षात जिया है।”

  • “हे गुरुदेव! जिनके चरणों की धूलि मात्र से जन्म-मरण के सारे दुख नष्ट हो जाते हैं, और जो अज्ञान रूपी अंधकार को चीरने वाले सूर्य के समान हैं, मैं अपना सर्वस्व आपको समर्पित करता हूँ।”

यह स्तुति इंसान के उस अहंकार को तोड़ती है जो उसे यह सोचने पर मजबूर करता है कि वह अपनी बुद्धि से ईश्वर को पा लेगा। यह सिखाती है कि गुरु की कृपा के बिना आध्यात्मिक मार्ग पर एक कदम भी नहीं बढ़ाया जा सकता।

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

गुरु की महिमा वेदों से भी परे है। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, प्रेम और विश्वास के साथ महापेरियवा की इस स्तुति का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन में साक्षात गुरु का अदृश्य मार्गदर्शन प्राप्त होता है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:

1. भयंकर मानसिक भटकाव और डिप्रेशन (तनाव) से पूर्ण मुक्ति

आज के युग में इंसान बाहर से तो बहुत सफल है, लेकिन भीतर से वह एक घोर खालीपन (Emptiness) और डिप्रेशन का शिकार है। जब साधक इस स्तुति का पाठ करता है, तो उसे महसूस होता है कि एक असीम शक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया है। गुरु की यह ऊर्जा अवचेतन मन से सारी चिंताओं (Anxiety) और भविष्य के अज्ञात भय को जड़ से मिटा देती है। मन एक शांत सरोवर की तरह स्थिर हो जाता है।

2. जीवन की जटिल समस्याओं का चमत्कारिक समाधान

कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जहाँ हमारी सारी योजनाएं फेल हो जाती हैं। महापेरियवा को उनके भक्त ‘संकटमोचक’ मानते हैं। इस स्तुति के सस्वर पाठ से व्यक्ति के जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं (चाहे वह करियर की हो, स्वास्थ्य की हो या मुकदमों की) इस प्रकार सुलझ जाती हैं जैसे बर्फ पिघल रही हो। गुरु कृपा बंद दरवाजों को खोलने की चाबी है।

3. अहंकार (Ego) का भस्मीकरण और सादगी का उदय

महापेरियवा सादगी की चरम सीमा थे। जब आप उनकी स्तुति करते हैं, तो आपका अपना ‘ईगो’ (मैं इतना बड़ा हूँ, मेरे पास इतना पैसा है) टूटने लगता है। आपको समझ आता है कि संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी घास की झोपड़ी में रहता था। यह बोध व्यक्ति के भीतर विनम्रता लाता है, जिससे उसके आपसी रिश्ते, परिवार और समाज में उसका सम्मान कई गुना बढ़ जाता है।

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4. विद्या, बुद्धि और स्मरण शक्ति (Memory) में अद्भुत वृद्धि

चूँकि महापेरियवा साक्षात माँ सरस्वती (ज्ञान की देवी) के अवतार माने जाते हैं, इसलिए जो विद्यार्थी या ज्ञान पिपासु इस स्तुति का पाठ करते हैं, उनकी एकाग्रता (Concentration) और स्मरण शक्ति अद्भुत रूप से बढ़ जाती है। व्यक्ति को सही समय पर सही निर्णय (Decision Making) लेने की तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त होती है।

5. नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) और बुरे प्रारब्ध का शमन

गुरु की दृष्टि में वह शक्ति होती है जो पिछले जन्मों के संचित बुरे कर्मों (प्रारब्ध) को भस्म कर सकती है। इस स्तुति का पाठ साधक के चारों ओर एक ‘गुरु-कवच’ (Aura of Protection) बना देता है। कोई भी बुरी नज़र, तांत्रिक प्रयोग या नकारात्मक ऊर्जा उस साधक को छू भी नहीं सकती जो महापेरियवा की शरण में है।

6. आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) और आध्यात्मिक उन्नति

यह इस स्तुति का अंतिम और सबसे बड़ा लाभ है। जो साधक मोक्ष और आत्मज्ञान की तलाश में हैं, उनके लिए यह स्तुति एक सीढ़ी है। गुरु का ध्यान साधक की ‘कुंडलिनी’ शक्ति को शांत और सुरक्षित तरीके से जाग्रत करता है, जिससे ध्यान (Meditation) में गहरे अनुभव प्राप्त होते हैं और अंततः ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ही ब्रह्म हूँ) का बोध होता है।

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति की प्रामाणिक पाठ और ध्यान विधि (Authentic Puja Vidhi)

सच्चे संत और गुरु किसी कर्मकांड के भूखे नहीं होते, वे केवल शिष्य के हृदय का भाव देखते हैं। फिर भी, शास्त्रों और पीठ की परंपरा के अनुसार इस स्तुति का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे निम्नलिखित विधि से करना चाहिए:

1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)

गुरु की आराधना के लिए गुरुवार (Thursday), पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा या अनुषा (Anusham) नक्षत्र (जो महापेरियवा का जन्म नक्षत्र है) का दिन सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माना जाता है। पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सुबह 4:00 से 6:00 बजे) के बीच होता है। संध्या काल में भी इसका पाठ किया जा सकता है।

2. दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। गुरु पूजा में सफेद (White) या हल्के पीले रंग के वस्त्र पहनना सबसे उत्तम माना जाता है, जो सात्विकता और शांति का प्रतीक हैं।

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए सफेद ऊनी आसन, चटाई या कुशा के आसन का प्रयोग करें।

3. गुरु चित्र की स्थापना और पूजन सामग्री

एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर सफेद या पीला कपड़ा बिछाकर महापेरियवा (श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) का एक सुंदर चित्र स्थापित करें। उनके समक्ष गाय के शुद्ध घी का दीपक या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूप और अगरबत्ती जलाएं। महापेरियवा को बिल्वपत्र (Bel Patra), तुलसी, और सुगंधित पुष्प (विशेषकर सफेद फूल या गेंदा) अत्यंत प्रिय थे, उन्हें यह अर्पित करें। मस्तक पर चंदन या भस्म का तिलक लगाएं।

4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa) और आत्म-समर्पण

दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का उद्देश्य (जैसे- “हे गुरुदेव, मैं अपने मन की शांति, अमुक कार्य की सिद्धि और आपकी असीम कृपा प्राप्ति के लिए आपकी स्तुति का नित्य पाठ करूँगा”) बोलें और जल ज़मीन पर छोड़ दें।

5. स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)

  • सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश का स्मरण करें (“ॐ गं गणपतये नमः”)।

  • इसके बाद आदि गुरु शंकराचार्य और महापेरियवा का मानसिक रूप से ध्यान करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम श्रद्धा और प्रेम के साथ ‘श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • यदि आप संस्कृत पढ़ने में सहज नहीं हैं, तो किसी शुद्ध ऑडियो को चलाकर आँखें बंद करें और गुरु के शांत मुखमंडल और करुणा भरी आँखों का मानसिक ध्यान करें।

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6. क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (नैवेद्य)

पाठ पूर्ण होने के बाद गुरुदेव को सात्विक भोग (जैसे- दूध, केले, मिश्री, या ताजे फल) अर्पित करें। महापेरियवा अत्यंत सादा भोजन ग्रहण करते थे, इसलिए आपका भाव शुद्ध होना चाहिए। अंत में गुरु आरती करें और हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि, “हे गुरुदेव! मेरे अपराधों को क्षमा करें और मुझे हमेशा अपने चरणों की छाया में रखें।”

साधना के महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Strict Rules for Sadhana)

जब आप महापेरियवा जैसे सिद्ध ‘जीवन्मुक्त’ महापुरुष की आराधना कर रहे हों, तो आपके आचरण में पवित्रता होनी चाहिए:

  1. पूर्ण सात्विकता: गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और किसी भी प्रकार के नशे का पूर्णतया त्याग करना अनिवार्य है।

  2. अहिंसा और परोपकार: महापेरियवा हर जीव (पशु-पक्षियों सहित) में ईश्वर देखते थे। किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाएं और भूखों को भोजन कराएं। यह गुरु पूजा का सबसे बड़ा अंग है।

  3. सत्य आचरण: झूठ न बोलें और छल-कपट से दूर रहें। गुरु से कुछ भी छिपा नहीं है, इसलिए उनके सामने पूर्णतः पारदर्शी (Transparent) बनें।

  4. धर्म का पालन: अपनी सनातन परंपराओं, संध्यावंदन और नित्य कर्मों का पालन करें, जिस पर महापेरियवा ने जीवन भर बल दिया था।

आधुनिक युग में महापेरियवा की स्तुति की प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का युग ‘मटेरियलिज्म’ (भौतिकवाद) की चरम सीमा पर है। हम सभी कुछ न कुछ ‘अचीव’ (Achieve) करने के लिए दौड़ रहे हैं, लेकिन अंदर से पूरी तरह थके हुए हैं। हमें लगता है कि सुख बाहर की चीज़ों में है।

महापेरियवा का जीवन और उनकी स्तुति इस आधुनिक दौड़ पर एक ब्रेक का कार्य करती है। यह हमें सिखाती है कि असली सुख ‘इकट्ठा करने’ (Accumulation) में नहीं, बल्कि ‘छोड़ने’ (Renunciation) में है। जब एक आधुनिक युवा या व्यापारी इस गुरु स्तुति का गान करता है, तो उसे यह प्रेरणा मिलती है कि वह अपने कर्म तो करे, लेकिन फल की आसक्ति में पागल न हो। गुरु का ध्यान उसे एक ऐसा मनोवैज्ञानिक ‘बैलेंस’ (Balance) देता है जिससे वह समाज में रहते हुए भी एक संन्यासी जैसी शांति का अनुभव कर पाता है।

Shri Chandrasekharendra Saraswati Stuti केवल कुछ श्लोकों का संग्रह नहीं है; यह एक ऐसे महापुरुष से जुड़ने का ‘ब्रॉडबैंड कनेक्शन’ है जो आज भी सूक्ष्म रूप से अपने भक्तों की रक्षा कर रहे हैं। महापेरियवा केवल कांची मठ के मठाधीश नहीं थे, वे सम्पूर्ण मानवता के जगद्गुरु हैं।

जब भी जीवन की परेशानियां भारी लगने लगें, जब ऐसा लगे कि कोई मार्ग दिखाने वाला नहीं है, तो एक शांत कोने में बैठें, घी का दीपक जलाएं, और आँखें बंद करके महापेरियवा के उस शांत, सौम्य और करुणा से भरे चेहरे का ध्यान करते हुए इस स्तुति का पाठ करें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि एक ठंडी हवा के झोंके ने आपकी सारी चिंताओं को उड़ा दिया है और साक्षात गुरुदेव ने आपके सिर पर अपना आशीर्वाद भरा हाथ रख दिया है। जय जय शंकर, हर हर शंकर! महापेरियवा शरणम्!

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती (महापेरियवा) कौन थे?

श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती (1894-1994) कांची कामकोटि पीठ के 68वें जगद्गुरु और पीठाधिपति थे। अद्वैत वेदांत के इस सर्वोच्च संत को भक्त अत्यंत श्रद्धा से ‘महापेरियवा’ (The Great Sage) कहते हैं। उन्होंने अत्यंत कठोर, सादा और तपस्यापूर्ण जीवन जिया और पूरे भारत में सनातन धर्म व वेदों के संरक्षण का अभूतपूर्व कार्य किया।

2. श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्तुति का मुख्य विषय क्या है?

यह स्तुति महापेरियवा के अलौकिक गुणों, उनकी करुणा, उनके अगाध वैदिक ज्ञान, उनकी अद्वैत निष्ठा और उनके तपस्यापूर्ण जीवन की महिमा का गान करती है। इसका मुख्य विषय उस सर्वोच्च ‘गुरु तत्व’ को प्रणाम करना है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

3. इस गुरु स्तुति का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस स्तुति के सस्वर पाठ से भयंकर मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety) और भटकाव नष्ट हो जाता है। साधक को जीवन की बड़ी से बड़ी समस्याओं का चमत्कारिक समाधान मिलता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, और सबसे महत्वपूर्ण—सच्चे गुरु की असीम कृपा और आत्म-शांति प्राप्त होती है।

4. इस स्तुति का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन सर्वोत्तम है?

गुरु की आराधना के लिए ‘गुरुवार’ (Thursday), पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा और ‘अनुषा’ (Anusham) नक्षत्र का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में सादे और स्वच्छ (सफेद या पीले) वस्त्र धारण कर इसका पाठ करना अत्यंत चमत्कारिक फल देता है।

5. क्या गुरु दीक्षा के बिना भी कोई सामान्य व्यक्ति इस स्तुति का पाठ कर सकता है?

जी हाँ, बिल्कुल! महापेरियवा की करुणा पूरे विश्व के लिए समान है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह दीक्षित हो या न हो, पूर्ण सात्विकता, पवित्रता और एक अबोध बालक जैसी श्रद्धा के साथ इस स्तुति का पाठ करके गुरुदेव का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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