सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में भगवान शिव को ‘महादेव’ और ‘परमेश्वर’ के रूप में पूजा जाता है। भगवान शिव की महिमा इतनी अपार है कि उनके भक्तों की सूची में केवल देवता, मनुष्य, या ऋषि-मुनि ही नहीं, बल्कि दानव और असुर भी सर्वोच्च स्थान पर रहे हैं। शिव की भक्ति में कोई भेद नहीं है; जो भी सच्चे हृदय और पूर्ण समर्पण के साथ उन्हें पुकारता है, आशुतोष शिव उसके हो जाते हैं।
भगवान शिव के ऐसे ही परम भक्तों में सर्वोपरि नाम आता है— लंकापति रावण (लंकेश्वर) का। रावण चारों वेदों और छह शास्त्रों का ज्ञाता, परम ज्ञानी और शिव का अनन्य भक्त था। जब रावण का अहंकार चरम पर था और उसने कैलाश पर्वत को उठाने का दुस्साहस किया, तब भगवान शिव ने मात्र अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को दबाकर उसके अहंकार को चूर-चूर कर दिया था। उस असहनीय पीड़ा और अंतर्ज्ञान के क्षण में, अपने अहंकार को त्यागकर रावण (लंकेश्वर) ने जिस दिव्य, नाद-युक्त और अत्यंत शक्तिशाली स्तुति का गान किया, उसे ही शास्त्रों में ‘श्री शिव स्तुतिः (लंकेश्वर कृतम्)’ या ‘Lankeshwara Krita Shiva Stuti’ के नाम से जाना जाता है।
यह स्तुति (जिसमें शिव तांडव स्तोत्र सहित रावण द्वारा रचित अन्य शिव वंदनाएं भी समाहित मानी जाती हैं) केवल शब्दों का समूह नहीं है; यह एक परम ज्ञानी के अहंकार के टूटने और उसकी आत्मा के परमात्मा (शिव) के साथ एकाकार होने का जीवंत प्रमाण है। जब जीवन में विपत्तियां आपको तोड़ रही हों, आपका ज्ञान और शक्ति काम न आ रही हो, और आपको ईश्वर की तत्काल कृपा की आवश्यकता हो, तब लंकेश्वर कृत यह शिव स्तुति एक अमोघ अस्त्र का कार्य करती है।
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्) का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
श्री शिव स्तुतिः (लंकेश्वर कृतम्) | Lankeshwara Krita Shiva Stuti
गले कलितकालिमः प्रकटितेन्दुफालस्थले
विनाटितजटोत्करं रुचिरपाणिपाथोरुहे ।
उदञ्चितकपालजं जघनसीम्नि सन्दर्शित
द्विपाजिनमनुक्षणं किमपि धाम वन्दामहे ॥ १ ॥
वृषोपरि परिस्फुरद्धवलदामधामश्रिया
कुबेरगिरि-गौरिमप्रभवगर्वनिर्वासि तत् ।
क्वचित्पुनरुमा-कुचोपचितकुङ्कुमै रञ्जितं
गजाजिनविराजितं वृजिनभङ्गबीजं भजे ॥ २ ॥
उदित्वर-विलोचनत्रय-विसृत्वरज्योतिषा
कलाकरकलाकर-व्यतिकरेण चाहर्निशम् ।
विकासित जटाटवी विहरणोत्सवप्रोल्लस-
त्तरामर तरङ्गिणी तरल-चूडमीडे मृडम् ॥ ३ ॥
विहाय कमलालयाविलसितानि विद्युन्नटी-
विडंबनपटूनि मे विहरणं विधत्तां मनः ।
कपर्दिनि कुमुद्वतीरमणखण्डचूडामणौ
कटी तटपटी भवत्करटिचर्मणि ब्रह्मणि ॥ ४ ॥
भवद्भवनदेहली-विकटतुण्ड-दण्डाहति
त्रुटन्मुकुटकोटिभि-र्मघवदादिभिर्भूयते ।
व्रजेम भवदन्तिकं प्रकृतिमेत्य पैशाचकीं
किमित्यमरसम्पदः प्रमथनाथ नाथामहे ॥ ५ ॥
त्वदर्चनपरायण-प्रमथकन्यकालुण्ठित
प्रसूनसफलद्रुमं कमपि शैलमाशान्महे ।
अलं तटवितर्दिकाशयितसिद्ध-सीमन्तिनी
प्रकीर्ण सुमनोमनो-रमणमेरुणामेरुणा ॥ ६ ॥
न जातु हर यातु मे विषयदुर्विलासं मनो
मनोभवकथास्तु मे न च मनोरथातिथ्यभूः ।
स्फुरत्सुरतरङ्गिणी-तटकुटीरकोटा वस-
न्नये शिव दिवानिशं तव भवानि पूजापरः ॥ ७ ॥
विभूषण सुरापगा शुचितरालवालावली-
वलद्बहलसीकर-प्रकरसेकसंवर्धिता ।
महेश्वर सुरद्रुमस्फुरित-सज्जटामञ्जरी
नमज्जनफलप्रदा मम नु हन्त भूयादियम् ॥ ८ ॥
बहिर्विषयसङ्गति-प्रतिनिवर्तिताक्षापले-
स्समाधिकलितात्मनः पशुपतेरशेषात्मनः ।
शिरस्सुरसरित्तटी-कुटिलकल्पकल्पद्रुमं
निशाकर कलामहं वटुविमृष्यमाणां भजे ॥ ९ ॥
त्वदीय सुरवाहिनी विमलवारिधारावल-
ज्जटागहनगाहिनी मतिरियं मम क्रामतु ।
सुरोत्तमसरित्तटी-विटपिताटवी प्रोल्लस-
त्तपस्वि-परिषत्तुलाममल मल्लिकाभ प्रभो ॥ १० ॥
इति श्रीलंकेश्वरविरचिता शिवस्तुतिः ॥
1. श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्) का प्राकट्य, दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान स्तुति की ऊर्जा, इसकी प्रचंड शक्ति और इसके पीछे छिपे ब्रह्मांडीय विज्ञान को समझने के लिए हमें रावण के अंतर्द्वंद्व और ‘शिव’ तत्व के रहस्य को गहराई से समझना होगा।
अहंकार का पतन और शरणागति का उदय
दार्शनिक दृष्टि से रावण (लंकेश्वर) केवल एक असुर राजा नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर बैठे ‘अहंकार’ (Ego), ‘शक्ति के मद’ और ‘ज्ञान के घमंड’ का प्रतीक है। रावण को अपनी शक्ति पर इतना घमंड था कि वह शिव के निवास स्थान, कैलाश पर्वत को ही उखाड़ने चला गया। परंतु जब महादेव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबाया, तो रावण के हाथ पर्वत के नीचे दब गए।
उस भयंकर पीड़ा में रावण का सारा घमंड शून्य हो गया। उसे यह बोध हो गया कि उसकी समस्त शक्तियां और ज्ञान इस परम सत्ता (शिव) के आगे तुच्छ हैं। तब उसने अपने ही स्नायुओं (नसों) से वीणा बनाकर सामवेद के मंत्रों के साथ शिव की जो प्रचंड स्तुति गाई, उसने महादेव को भी पिघला दिया। यह स्तुति हमें सिखाती है कि चाहे आप कितने भी बड़े ज्ञानी या धनवान क्यों न हों, ईश्वर के समक्ष आपकी ‘शरणागति’ (Surrender) ही आपका उद्धार कर सकती है।
नाद-ब्रह्म और प्रचंड ऊर्जा का स्रोत
लंकेश्वर कृत स्तुतियों की सबसे बड़ी विशेषता उनका ‘नाद’ (Sound/Rhythm) और ‘छंद’ है। इसमें प्रयुक्त संस्कृत के शब्द डमरू की ध्वनि की तरह गूंजते हैं। जब इन श्लोकों का सस्वर गान किया जाता है, तो यह हमारे शरीर के सुप्त चक्रों (विशेषकर मूलाधार और आज्ञा चक्र) को झकझोर कर रख देता है। यह स्तुति शरीर में असीम ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है।
2. श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृत) पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
लंकेश्वर द्वारा रचित यह स्तुति कोई सामान्य प्रार्थना नहीं है; यह शिव को प्रसन्न करने का एक अत्यंत जाग्रत और सिद्ध मार्ग है। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन इस स्तुति का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
लौकिक, भौतिक और करियर संबंधी लाभ (Material & Career Benefits)
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अजेय शक्ति और साहस की प्राप्ति: रावण महापराक्रमी था। जो व्यक्ति उसकी रचित इस स्तुति का गान करता है, उसके भीतर का सारा डर और कायरता समाप्त हो जाती है। साधक जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना एक शेर की तरह करता है।
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शत्रुओं का पूर्ण शमन: यदि आपके गुप्त शत्रु आपको परेशान कर रहे हैं या आपको झूठे मुकदमों में फंसाया गया है, तो इस स्तुति का पाठ विरोधियों का ‘स्तम्भन’ कर देता है। महादेव के तेज के आगे कोई भी विरोधी टिक नहीं सकता।
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सात्विक ऐश्वर्य और धन की प्राप्ति: यद्यपि रावण का धन तामसिक था, परंतु शिव स्तुति के प्रभाव से साधक को सात्विक धन, यश, कीर्ति और राजसी सुख प्राप्त होते हैं। अटके हुए सरकारी और प्रशासनिक कार्य पूर्ण होते हैं।
मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Mental Peace & Stability)
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अहंकार और मानसिक विकारों का नाश: यह स्तुति रावण के अहंकार टूटने का परिणाम है। इसका पाठ साधक के भीतर से ‘कर्त्ता भाव’ (मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ) को मिटा देता है, जिससे सारा मानसिक तनाव (Stress) और चिंता छूमंतर हो जाती है।
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डिप्रेशन (Depression) से मुक्ति: जब जीवन में चारों ओर अंधकार हो, तब इस स्तुति की प्रचंड ध्वनि मन के जालों को काट देती है और एक गज़ब की सकारात्मक ऊर्जा (Positivity) का संचार करती है।
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वाक् सिद्धि और कलात्मक विकास: रावण एक महान कवि, संगीतज्ञ और वक्ता था। इस स्तुति के नियमित गान से साधक की वाणी में ओज आता है, गला सुरीला होता है और कला (Art & Music) के क्षेत्र में अपार सफलता मिलती है।
आध्यात्मिक और ज्योतिषीय लाभ (Spiritual & Astrological Benefits)
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नवग्रह शांति (विशेषकर शनि और राहु): रावण ने सभी ग्रहों को अपने अधीन कर लिया था। लंकेश्वर कृत स्तुति का पाठ करने से जन्म कुंडली के सभी उग्र ग्रह (विशेष रूप से शनि, राहु और केतु) शांत होकर साधक के अनुकूल शुभ फल देने लगते हैं।
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भयंकर दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु से रक्षा: शिव साक्षात महाकाल हैं। यह स्तुति साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच (Aura) बना देती है, जिससे मारकेश की दशा और अकाल मृत्यु के योग टल जाते हैं।
3. श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्) की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
भगवान शिव की उपासना में भाव ही सर्वोपरि है, परंतु लंकेश्वर कृत यह स्तुति अत्यंत उग्र और ऊर्जावान है। अतः, इसके पूर्ण और त्वरित फल प्राप्ति के लिए शास्त्रों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान शिव की आराधना के लिए सोमवार (Monday) और शनिवार (Saturday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है (क्योंकि यह स्तुति असीम शक्ति प्रदान करती है)।
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विशेष तिथियां: प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि, और श्रावण मास के दिनों में इस स्तुति का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।
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समय: इस स्तुति के पाठ का सबसे उत्तम समय ‘प्रदोष काल’ (गोधूलि बेला – सूर्यास्त का समय) होता है, क्योंकि इसी समय शिव तांडव करते हैं और रावण ने भी इसी काल में स्तुति की थी।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North – कैलाश की दिशा) की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए सफेद ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। शिव पूजा में सफेद (White) या हल्के पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
शिवलिंग की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
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एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर सफेद या पीला कपड़ा बिछाएं।
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उस पर नर्मदेश्वर शिवलिंग, पारद शिवलिंग, या भगवान शिव का सपरिवार चित्र स्थापित करें।
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भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। धूप, लोहबान या चंदन की अगरबत्ती जलाएं।
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पूजन सामग्री: भगवान शिव को पीला या सफेद चंदन अर्पित करें। उन्हें अक्षत (साबुत चावल), बिल्वपत्र (Bel Patra – तीन पत्तियों वाले), धतूरा और सफेद पुष्प अत्यंत प्रिय हैं।
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भस्म और रुद्राक्ष: रावण स्वयं भस्म रमाता था। पाठ पर बैठने से पूर्व अपने मस्तक, कंठ और भुजाओं पर ‘भस्म’ का त्रिपुंड अवश्य लगाएं और गले में रुद्राक्ष की माला धारण करें।
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे देवाधिदेव महादेव, मैं अपने कार्य में आ रही बाधाओं के नाश, शत्रुओं पर विजय, मान-सम्मान की प्राप्ति और आपके श्रीचरणों की भक्ति के लिए लंकेश्वर कृत श्री शिव स्तुति का 21/41 दिन तक नित्य पाठ करूँगा”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और माता पार्वती का स्मरण करें (“ॐ गं गणपतये नमः”)।
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भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” की कम से कम 11 बार या एक माला (108 बार) रुद्राक्ष की माला पर जप करें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, असीम ऊर्जा और शिव के विराट स्वरूप का ध्यान करते हुए ‘श्री शिव स्तुतिः (लंकेश्वर कृतम्)’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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इस स्तुति का नाद बहुत तीव्र है, अतः इसका उच्चारण स्पष्ट, गंभीर और थोड़े ऊंचे स्वर (लयबद्ध तरीके) में करना चाहिए। यदि संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो आप इसका ऑडियो चलाकर मानसिक रूप से शिव का ध्यान कर सकते हैं।
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नित्य 1, 3 या 5 बार इसका पाठ अपनी संकल्पित अवधि तक करें।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान शिव को गाय के कच्चे दूध, खीर, सफेद मिठाई, मिश्री, या ऋतुफल का भोग लगाएं। अंत में शिव जी की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना (अपराध सहस्राणि…) अवश्य करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
रावण एक महान भक्त था, लेकिन उसके पतन का कारण उसकी तामसिक प्रवृत्तियां और अहंकार था। अतः, जब आप लंकेश्वर कृत स्तुति का पाठ करें, तो रावण की भक्ति को अपनाएं, उसके दुर्गुणों को नहीं। इन नियमों का कड़ाई से पालन करें:
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पूर्ण सात्विकता (Pure Sattvic Diet): अनुष्ठान के दौरान घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें। तामसिक भोजन आपके भीतर उग्रता भर देगा, जो पतन का कारण बन सकता है।
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अहंकार शून्यता (Zero Ego): यह इस साधना का सबसे बड़ा नियम है। आपको अपनी विद्या, धन या बल का तनिक भी घमंड नहीं करना है। स्वयं को शिव का दास मानकर ही स्तुति करें।
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ब्रह्मचर्य का कठोर पालन (Celibacy): रावण के पतन का एक मुख्य कारण उसका कामुक स्वभाव था। अतः साधना अवधि में शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
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अहिंसा और करुणा (Compassion): किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाएं, न ही किसी निर्बल व्यक्ति का अपमान करें।
5. शिव उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
भगवान शिव की पूजा में कुछ ऐसी वस्तुएं और कार्य हैं जो शास्त्रों में सर्वथा वर्जित (Prohibited) बताए गए हैं। साधक को इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए:
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तुलसी दल वर्जित: भगवान शिव की पूजा में ‘तुलसी’ (Tulsi) के पत्तों का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए। शिव पुराण में इसका स्पष्ट निषेध है।
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कुमकुम (सिंदूर) का निषेध: शिवलिंग पर कभी भी कुमकुम या सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता है। शिव वैरागी हैं और सिंदूर सौभाग्य का प्रतीक है। शिव को केवल भस्म, पीला या सफेद चंदन ही लगाएं।
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केतकी और चंपा के फूल वर्जित: शिव जी की पूजा में केतकी (Ketaki) और चंपा के फूलों का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। सफेद रंग के फूल (आक, धतूरा, चमेली) ही श्रेष्ठ माने गए हैं।
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हल्दी का निषेध: शिवलिंग पर हल्दी भी नहीं चढ़ाई जाती, क्योंकि हल्दी का संबंध सौंदर्य प्रसाधन और स्त्रियों से है।
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जलाधारी को न लांघें: शिव मंदिर में परिक्रमा करते समय ध्यान रखें कि शिवलिंग से जो जल बहकर बाहर आता है (जलाधारी/सोमसूत्र), उसे कभी लांघना नहीं चाहिए। परिक्रमा हमेशा आधी ही की जाती है।
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शंख से जल वर्जित: शिवलिंग पर जल या दूध कभी भी शंख से नहीं चढ़ाना चाहिए। हमेशा तांबे या पीतल के लोटे का ही प्रयोग करें। (दूध तांबे के बर्तन से न चढ़ाएं, उसके लिए पीतल/चांदी का पात्र प्रयोग करें)।
6. आधुनिक युग में लंकेश्वर कृत शिव स्तुति की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक इंसान बहुत हद तक रावण (लंकेश्वर) की ही प्रवृत्ति जी रहा है। हमारे पास दुनिया भर की डिग्रियां (ज्ञान) हैं, अपार धन-संपत्ति है, और हर सुख-सुविधा है। लेकिन इन सबके साथ हमारे भीतर एक भयंकर ‘अहंकार’ पनप गया है कि “मैं ही सब कुछ चला रहा हूँ।” और जब यह आधुनिक इंसान किसी भयंकर बीमारी, आर्थिक मंदी या अप्रत्याशित संकट के कैलाश पर्वत के नीचे दबता है, तब उसका सारा ज्ञान और धन धरा का धरा रह जाता है।
‘श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्)’ आधुनिक इंसान के इस मनोवैज्ञानिक और लौकिक भटकाव का सबसे बड़ा उपचार है। जब आप इस स्तुति का गान करते हैं, तो:
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यह आपको ‘सरेंडर’ (Surrender/समर्पण) करना सिखाती है। यह बताती है कि ब्रह्मांड की सर्वोच्च सत्ता के सामने झुकना कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।
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यह आपके भीतर दबी हुई असीम ऊर्जा और पोटेंशियल (Potential) को बाहर लाती है, जिससे आप जीवन की बड़ी से बड़ी बाधा को चीरकर बाहर आ सकते हैं।
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यह स्तुति आपके भीतर के ‘रावण’ (अहंकार और वासना) का वध करके, आपके भीतर शुद्ध ‘शिव तत्व’ (कल्याण और शांति) की स्थापना करती है।
Lankeshwara Krita Shiva Stuti (श्री शिव स्तुतिः) केवल कुछ श्लोकों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा के असीम अहंकार के टूटने और परमेश्वर शिव के श्रीचरणों में विलीन होने की साक्षात गर्जना है। जब ये संस्कृत के प्रचंड और ओजस्वी मंत्र आपके होठों से गूंजते हैं, तो ब्रह्मांड की समस्त नकारात्मक शक्तियां भयभीत होकर आपका मार्ग छोड़ देती हैं।
भगवान महादेव परम दयालु हैं; वे यह नहीं देखते कि आपका अतीत कितना कलंकित रहा है, वे केवल यह देखते हैं कि वर्तमान में आपकी पुकार में कितनी सच्चाई है। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के क्रूर संघर्षों से हार रहे हैं, शत्रु हावी हो रहे हैं, और आपके अपने बाहुबल ने जवाब दे दिया है, तो प्रदोष काल में सफेद आसन पर बैठें, शिवलिंग पर जल अर्पित करें, मस्तक पर भस्म लगाएं, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘महाकाल’ को पुकारें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि शिव की कृपा ने आपके सारे दुखों, चिंताओं और शत्रुओं को भस्म कर दिया है, और आपके जीवन को पुनः अपार शक्ति, यश और शांति के प्रकाश से भर दिया है। हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!
श्री शिव स्तुतिः (लंकेश्वर कृतम्) : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्) क्या है और इसकी रचना किसने की थी?
श्री शिव स्तुति (लंकेश्वर कृतम्) लंका के राजा और भगवान शिव के परम भक्त ‘रावण’ (लंकेश्वर) द्वारा रचित एक अत्यंत शक्तिशाली, जाग्रत और ओजस्वी स्तोत्र है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब रावण ने कैलाश पर्वत उखाड़ने का प्रयास किया और शिव जी ने उसके अहंकार को कुचल दिया, तब उसी पीड़ा और पश्चाताप में रावण ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए इस दिव्य स्तुति का गान किया था।
2. लंकेश्वर कृत शिव स्तुति का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?
इस स्तुति का सबसे बड़ा और चमत्कारिक लाभ ‘अजेय साहस’, ‘मानसिक ऊर्जा’ और ‘शत्रुओं पर पूर्ण विजय’ प्राप्त होना है। इसके नियमित पाठ से मन का सारा भय और डिप्रेशन (Anxiety) दूर होता है, वाक् सिद्धि (बोलने की कला) प्राप्त होती है, और जन्म कुंडली के उग्र ग्रह (जैसे शनि और राहु) शांत होकर शुभ फल देने लगते हैं।
3. इस स्तुति का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?
भगवान शिव की इस प्रचंड स्तुति के गान के लिए ‘सोमवार’ (Monday) और ‘शनिवार’ (Saturday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस स्तुति का पाठ ‘प्रदोष काल’ (गोधूलि बेला – सूर्यास्त के समय) में करना सर्वाधिक फलदायी होता है, क्योंकि रावण ने भी इसी बेला में शिव तांडव और स्तुति का गान किया था।
4. भगवान शिव की पूजा और इस स्तुति के पाठ में किन वस्तुओं का प्रयोग सर्वथा वर्जित है?
शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव की पूजा में ‘तुलसी दल’ (तुलसी के पत्ते), ‘कुमकुम’ (सिंदूर), ‘हल्दी’, ‘केतकी’ और ‘चंपा के फूल’ चढ़ाना सर्वथा वर्जित है। इसके अतिरिक्त, शिवलिंग पर दूध कभी भी तांबे के लोटे या शंख से नहीं चढ़ाना चाहिए। शिव जी को केवल भस्म, चंदन, बिल्वपत्र (बेलपत्र), धतूरा और सफेद पुष्प ही अर्पित करने चाहिए।
5. क्या रावण द्वारा रचित स्तुति का पाठ सामान्य गृहस्थ व्यक्ति कर सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल! रावण एक असुर था, लेकिन उसकी ‘भक्ति’ और ‘ज्ञान’ सर्वोच्च कोटि का था। कोई भी गृहस्थ पूर्ण सात्विकता और पवित्रता का पालन करते हुए आत्म-कल्याण और सफलता के लिए इस स्तुति का नित्य पाठ कर सकता है। बस ध्यान रहे कि साधक को रावण की ‘भक्ति’ को अपनाना है, उसके ‘अहंकार’ और ‘दुर्गुणों’ को नहीं। पाठ के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार अनिवार्य है।