अग्नि सूक्तम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ें। यह वैदिक सूक्त अग्निदेव को समर्पित है, जिसमें अग्नि को यज्ञ का वाहक, देवताओं का दूत और दिव्य शक्ति के रूप में स्तुति की गई है।
अग्नि सूक्तम् ऋग्वेद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक सूक्त है, जो अग्निदेव को समर्पित है। इसमें अग्नि को देवताओं का आह्वानकर्ता, यज्ञ का माध्यम और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इस लेख में अग्नि सूक्तम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया गया है।
Agni Suktam | अग्नि सूक्तम्
१. ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम
होतारं रत्नधातमम ॥१॥
२. अग्नि पूर्वेभिॠषिभिरिड्यो नूतनैरुत ।
स देवाँ एह वक्षति ॥२॥
३. अग्निना रयिमश्न्वत् पोषमेव दिवेदिवे ।
यशसं वीरवत्तमम् ॥३॥
४. अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत परिभूरसि ।
स इद्देवेषु गच्छति ॥४॥
५. अग्निहोर्ता कविक्रतु सत्यश्चित्रश्रवस्तम ।
देवि देवेभिरा गमत् ॥५॥
६. यदग्ङ दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि ।
तवेत्तत् सत्यमग्ङिर ॥६॥
७. उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम् ।
नमो भरन्त एमसि ॥७॥
८.राजन्तमध्वराणां गोपांमृतस्य दीदिविम् ।
वर्धमानं स्वे दमे ॥८॥
९. स न पितेव सूनवेग्ने सूपायनो भव ।
सचस्वा न स्वस्तये ॥९॥