सनातन हिंदू धर्म में भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए ‘प्रदोष व्रत’ (Pradosh Vrat) को सबसे मंगलकारी, फलदायी और परम पवित्र व्रत माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक चंद्र मास (Lunar Month) के दोनों पक्षों— शुक्ल पक्ष (Waxing Moon) और कृष्ण पक्ष (Waning Moon)— की त्रयोदशी तिथि (13वें दिन) को प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस प्रकार, एक सामान्य वर्ष में कुल 24 प्रदोष व्रत आते हैं। लेकिन वर्ष 2026 विशेष है, क्योंकि इस वर्ष पंचांग में ‘अधिक मास’ (Adhik Maas) का योग बन रहा है, जिसके कारण वर्ष 2026 में कुल 26 प्रदोष व्रत रखे जाएंगे।
‘प्रदोष’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘रात्रि का आरंभ’ या ‘गोधूलि बेला’। यह वह पावन समय होता है जब दिन ढल रहा होता है और रात्रि का आगमन हो रहा होता है। शिव महापुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, प्रदोष काल के समय भगवान आशुतोष (शिव जी) कैलाश पर्वत पर अपने रजत भवन में अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी स्तुति करते हैं। जो भी भक्त इस समय भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट, दरिद्रता, रोग और ऋण (कर्ज) पल भर में नष्ट हो जाते हैं।
यदि आप भी महादेव के परम भक्त हैं और वर्ष 2026 में उनकी विशेष कृपा पाने के लिए प्रदोष का व्रत रखने का संकल्प ले रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका (Ultimate Guide) है। यहाँ हम आपके लिए लेकर आए हैं— “Pradosh Vrat 2026 Calendar: कब है प्रदोष व्रत? देखें Month-Wise Date & Puja Time”।
Pradosh Vrat 2026 Calendar (Quick Reference Table)
पाठकों की सुविधा के लिए हमने पूरे वर्ष 2026 की प्रदोष व्रत तिथियों की एक ‘क्विक रेफरेंस टेबल’ तैयार की है, जिसे आप स्क्रीनशॉट लेकर सेव कर सकते हैं:
इस विस्तृत और शोधपरक लेख में हम साल 2026 की सभी प्रदोष तिथियों, उनके वार के अनुसार प्रकार, प्रदोष काल का सटीक समय, शिव पूजा की संपूर्ण विधि, रुद्राभिषेक के नियम और इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा (Pradosh Vrat Katha) पर गहराई से चर्चा करेंगे।
1. वार के अनुसार प्रदोष व्रत के 7 प्रकार और उनका महत्व (Types of Pradosh Vrat)
प्रदोष व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जिस दिन (वार) को पड़ता है, उसी के अनुसार इसका नाम और इसका फल (Benefit) बदल जाता है। सप्ताह के 7 दिनों के आधार पर प्रदोष व्रत 7 प्रकार के होते हैं। साल 2026 के कैलेंडर को समझने से पहले, आइए जानते हैं कि कौन-सा प्रदोष व्रत किस मनोकामना को पूर्ण करता है:
I. सोम प्रदोष व्रत (Soma Pradosh) – सोमवार
जब त्रयोदशी तिथि सोमवार (Monday) के दिन पड़ती है, तो उसे ‘सोम प्रदोष’ कहा जाता है।
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महत्व: सोमवार भगवान शिव का अपना दिन है। इस दिन प्रदोष व्रत रखने से मानसिक शांति मिलती है, चंद्र दोष समाप्त होता है, और मन की हर सात्विक इच्छा (इच्छित फल) पूर्ण होती है। यह व्रत अवसाद (Depression) और तनाव को दूर करने में रामबाण है।
II. भौम प्रदोष व्रत (Bhauma Pradosh) – मंगलवार
जब प्रदोष व्रत मंगलवार (Tuesday) को आता है, तो वह ‘भौम प्रदोष’ कहलाता है।
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महत्व: मंगलवार हनुमान जी (रुद्रावतार) और मंगल ग्रह का दिन है। यह व्रत कर्जों (Debts) से भारी मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। जो लोग लंबे समय से आर्थिक संकट या बैंक के कर्जे में डूबे हैं, उन्हें भौम प्रदोष का व्रत अवश्य करना चाहिए। इससे शारीरिक रोग भी दूर होते हैं।
III. सौम्य / बुध प्रदोष व्रत (Saumya Pradosh) – बुधवार
जब त्रयोदशी तिथि बुधवार (Wednesday) को पड़ती है, तो इसे ‘सौम्य प्रदोष’ या बुध प्रदोष कहा जाता है।
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महत्व: यह व्रत बुद्धि, विद्या, और व्यापार (Business) में वृद्धि के लिए किया जाता है। जिन विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता चाहिए या जिन लोगों का व्यापार मंदी में चल रहा है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत शुभ है।
IV. गुरु प्रदोष व्रत (Guru Pradosh) – गुरुवार
गुरुवार (Thursday) को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को ‘गुरु प्रदोष’ कहा जाता है।
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महत्व: गुरुवार देवताओं के गुरु बृहस्पति का दिन है। यह व्रत शत्रुओं के नाश, मुकदमों में जीत और जीवन में सफलता (Success) के लिए किया जाता है। इससे पितृ दोष की शांति भी होती है और महिलाओं को अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है।
V. भृगु / शुक्र प्रदोष व्रत (Bhrigu Pradosh) – शुक्रवार
जब प्रदोष व्रत शुक्रवार (Friday) को आता है, तो उसे ‘भृगु प्रदोष’ या शुक्र प्रदोष कहते हैं।
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महत्व: शुक्रवार शुक्र ग्रह का दिन है जो ऐश्वर्य और दांपत्य सुख का कारक है। यह व्रत जीवन में अपार धन, वैभव, विलासिता और पारिवारिक सुख-शांति प्रदान करता है। पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ाने के लिए यह उत्तम व्रत है।
VI. शनि प्रदोष व्रत (Shani Pradosh) – शनिवार
शनिवार (Saturday) के दिन पड़ने वाले व्रत को ‘शनि प्रदोष’ कहा जाता है।
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महत्व: सोम प्रदोष के बाद शनि प्रदोष को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। जो लोग शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या राहु-केतु के बुरे प्रभाव से पीड़ित हैं, उनके लिए यह व्रत रक्षा कवच है। यह व्रत पुत्र प्राप्ति (संतान सुख) और नौकरी में प्रमोशन के लिए अचूक माना गया है।
VII. रवि / भानु प्रदोष व्रत (Ravi Pradosh) – रविवार
जब त्रयोदशी तिथि रविवार (Sunday) को पड़े, तो उसे ‘रवि प्रदोष’ कहते हैं।
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महत्व: रविवार सूर्य देव का दिन है। यह व्रत अच्छी सेहत, लंबी आयु, मान-सम्मान (Fame) और समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए रखा जाता है। इससे हृदय रोग और आंखों की समस्याओं में भी आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
2. Pradosh Vrat 2026 Calendar: साल 2026 की सभी 26 तिथियों की Month-Wise List
हिंदू पंचांग की गणनाओं के आधार पर, वर्ष 2026 में अधिक मास (Adhik Maas) के कारण कुल 26 प्रदोष व्रत आएंगे। आइए जानते हैं कि कौन-से महीने में कौन-सा प्रदोष व्रत पड़ रहा है।
(नोट: प्रदोष व्रत की तिथि शाम के समय त्रयोदशी तिथि की उपस्थिति के आधार पर तय होती है।)
जनवरी 2026 के प्रदोष व्रत
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16 जनवरी 2026 (शुक्रवार): माघ कृष्ण पक्ष – भृगु (शुक्र) प्रदोष व्रत
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31 जनवरी 2026 (शनिवार): माघ शुक्ल पक्ष – शनि प्रदोष व्रत (जनवरी का महीना शनि प्रदोष के साथ समाप्त होगा, जो भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा दिलाएगा।)
फरवरी 2026 के प्रदोष व्रत
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15 फरवरी 2026 (रविवार): फाल्गुन कृष्ण पक्ष – रवि प्रदोष व्रत
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1 मार्च 2026 (रविवार): फाल्गुन शुक्ल पक्ष – रवि प्रदोष व्रत (फरवरी के चक्र की समाप्ति मार्च की 1 तारीख को होगी)
मार्च 2026 के प्रदोष व्रत
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17 मार्च 2026 (मंगलवार): चैत्र कृष्ण पक्ष – भौम प्रदोष व्रत (कर्ज मुक्ति का महा-दिन)
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31 मार्च 2026 (मंगलवार): चैत्र शुक्ल पक्ष – भौम प्रदोष व्रत
अप्रैल 2026 के प्रदोष व्रत
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15 अप्रैल 2026 (बुधवार): वैशाख कृष्ण पक्ष – सौम्य (बुध) प्रदोष व्रत
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29 अप्रैल 2026 (बुधवार): वैशाख शुक्ल पक्ष – सौम्य (बुध) प्रदोष व्रत
मई 2026 के प्रदोष व्रत (अधिक मास आरंभ)
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15 मई 2026 (शुक्रवार): ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष – भृगु (शुक्र) प्रदोष व्रत
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29 मई 2026 (शुक्रवार): अधिक मास शुक्ल पक्ष – भृगु (शुक्र) प्रदोष व्रत (मई के अंत में अधिक मास शुरू होने के कारण यह दुर्लभ व्रत होगा, जिसका फल दस गुना अधिक मिलेगा।)
जून 2026 के प्रदोष व्रत (अधिक मास प्रभाव)
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13 जून 2026 (शनिवार): अधिक मास कृष्ण पक्ष – शनि प्रदोष व्रत (तंत्र बाधा शांति के लिए उत्तम)
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27 जून 2026 (शनिवार): ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष – शनि प्रदोष व्रत
जुलाई 2026 के प्रदोष व्रत (चातुर्मास आरंभ)
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13 जुलाई 2026 (सोमवार): आषाढ़ कृष्ण पक्ष – सोम प्रदोष व्रत (महादेव की असीम कृपा का दिन)
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27 जुलाई 2026 (सोमवार): आषाढ़ शुक्ल पक्ष – सोम प्रदोष व्रत
अगस्त 2026 के प्रदोष व्रत (सावन का महीना)
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11 अगस्त 2026 (मंगलवार): श्रावण (सावन) कृष्ण पक्ष – भौम प्रदोष व्रत
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25 अगस्त 2026 (मंगलवार): श्रावण (सावन) शुक्ल पक्ष – भौम प्रदोष व्रत (सावन के महीने में पड़ने वाले ये दोनों प्रदोष व्रत पूरे साल में सबसे पवित्र माने जाएंगे।)
सितंबर 2026 के प्रदोष व्रत
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9 सितंबर 2026 (बुधवार): भाद्रपद कृष्ण पक्ष – सौम्य (बुध) प्रदोष व्रत
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24 सितंबर 2026 (गुरुवार): भाद्रपद शुक्ल पक्ष – गुरु प्रदोष व्रत
अक्टूबर 2026 के प्रदोष व्रत (पितृ पक्ष व शरद ऋतु)
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8 अक्टूबर 2026 (गुरुवार): आश्विन कृष्ण पक्ष – गुरु प्रदोष व्रत
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24 अक्टूबर 2026 (शनिवार): आश्विन शुक्ल पक्ष – शनि प्रदोष व्रत
नवंबर 2026 के प्रदोष व्रत
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7 नवंबर 2026 (शनिवार): कार्तिक कृष्ण पक्ष – शनि प्रदोष व्रत (दिवाली के आस-पास का समय)
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23 नवंबर 2026 (सोमवार): कार्तिक शुक्ल पक्ष – सोम प्रदोष व्रत (कार्तिक माह का पवित्र प्रदोष)
दिसंबर 2026 के प्रदोष व्रत
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6 दिसंबर 2026 (रविवार): मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष – रवि प्रदोष व्रत
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22 दिसंबर 2026 (मंगलवार): मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष – भौम प्रदोष व्रत
(नोट: ऊपर दी गई तिथियां पंचांग की त्रयोदशी गणना के आधार पर हैं। स्थानीय शहर के सूर्यास्त समय के अनुसार तिथि में मामूली भिन्नता आ सकती है।)
3. प्रदोष काल क्या है? (What is Pradosh Kaal & Puja Time)
प्रदोष व्रत में पूरा दिन व्रत रखने के बाद मुख्य पूजा ‘प्रदोष काल’ में ही की जाती है। यदि पूजा प्रदोष काल में न की जाए, तो व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।
प्रदोष काल की गणना कैसे होती है? शास्त्रों के अनुसार, सूर्यास्त (Sunset) से 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक का समय (कुल 90 मिनट या डेढ़ घंटा) ‘प्रदोष काल’ कहलाता है।
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गर्मियों में: सूर्यास्त देर से (लगभग 6:30 से 7:15 PM के बीच) होता है, इसलिए पूजा का समय शाम 6:00 बजे से रात 8:00 बजे के बीच रहता है।
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सर्दियों में: सूर्यास्त जल्दी (लगभग 5:30 से 6:00 PM के बीच) होता है, इसलिए पूजा का समय शाम 4:45 से 7:15 बजे के बीच रहता है। (आप अपने शहर के सूर्यास्त का समय गूगल या पंचांग में देखकर अपना प्रदोष काल आसानी से निकाल सकते हैं।)
4. प्रदोष व्रत पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
भगवान शिव बहुत ही भोले हैं (इसलिए उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है)। वे महंगी सामग्रियों से नहीं, बल्कि सच्चे भाव से प्रसन्न होते हैं। प्रदोष व्रत की पूजा दो चरणों में होती है— एक सुबह और दूसरी शाम को।
पहला चरण: सुबह का संकल्प और पूजा
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ब्रह्म मुहूर्त स्नान: त्रयोदशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें (काले रंग के कपड़े भूलकर भी न पहनें)।
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संकल्प लें: घर के मंदिर में हाथ में थोड़ा जल और अक्षत (चावल) लेकर महादेव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें— “हे भोलेनाथ! मैं आज निराहार/फलाहार रहकर आपका प्रदोष व्रत करूंगा, कृपया मेरी पूजा स्वीकार करें।”
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दिन का नियम: पूरे दिन ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जाप करते रहें। क्रोध, झूठ, और ब्रह्मचर्य तोड़ने जैसे पापों से दूर रहें।
दूसरा चरण: प्रदोष काल की मुख्य पूजा (रुद्राभिषेक)
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शाम का स्नान: सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
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पूजा की तैयारी: घर के मंदिर या किसी शिवालय (Shiv Mandir) में जाएं। एक थाली में पूजा की सामग्री सजाएं— गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, सफेद चंदन, भस्म, बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद फूल और जनेऊ।
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शिवलिंग का अभिषेक (Abhishek):
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सबसे पहले शिवलिंग पर गंगाजल से स्नान कराएं।
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इसके बाद ‘पंचामृत’ (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें। दूध चढ़ाते समय महामृत्युंजय मंत्र “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…” का पाठ करें।
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अंत में फिर से शुद्ध जल से अभिषेक करें।
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श्रृंगार और अर्पण: शिवलिंग पर सफेद चंदन से त्रिपुंड (तीन रेखाएं) बनाएं। 11 या 21 बेलपत्र (बिना कटे-फटे) लें, उन पर चंदन से ‘राम’ लिखें और उल्टी तरफ से शिवलिंग पर अर्पित करें।
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दीपक और आरती: गाय के घी का दीपक जलाएं। धूप-बत्ती करें और माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय जी की भी पूजा करें।
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कथा का पाठ: पूजा के बाद ‘प्रदोष व्रत कथा’ अवश्य पढ़ें या सुनें। बिना कथा के कोई भी व्रत अधूरा माना जाता है। अंत में शिव जी की आरती करें और उनसे क्षमा प्रार्थना करें।
5. प्रदोष व्रत कथा (Pradosh Vrat Katha) – समुद्र मंथन का रहस्य
प्रदोष व्रत क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे स्कंद पुराण में एक अत्यंत रहस्यमयी और रोचक कथा का वर्णन है:
प्राचीन काल में, दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग लोक के देवता अपनी शक्ति और ऐश्वर्य खो बैठे थे। तब भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर में ‘समुद्र मंथन’ (Churning of the Ocean) किया। मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया।
जब मंथन शुरू हुआ, तो सबसे पहले उसमें से ‘हलाहल विष’ (कालकूट) निकला। उस भयानक विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे, हाहाकार मच गया। देवता, असुर, यक्ष और गंधर्व— सभी प्राण बचाने के लिए भागने लगे। कोई भी उस विष को ग्रहण करने में समर्थ नहीं था।
अंततः, सभी देवता भागकर कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की शरण में पहुंचे और त्राहि-त्राहि करने लगे। उनकी करुण पुकार सुनकर करुणामयी भगवान शिव तुरंत उस विष को पीने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने पूरे हलाहल विष को अपने गले (कंठ) में रोक लिया। विष के भयंकर प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया, और तभी से वे ‘नीलकंठ’ (Neelkanth) कहलाए।
जिस दिन महादेव ने इस विष को पीकर सृष्टि की रक्षा की थी, वह त्रयोदशी की तिथि थी और समय प्रदोष काल (शाम का समय) था। विष के प्रभाव से शिवजी को मूर्च्छा आ गई थी, तब देवताओं ने जल और बेलपत्र से उन्हें शीतलता प्रदान की। जब शाम को शिवजी को होश आया, तो वे अत्यंत प्रसन्न थे और उन्होंने प्रसन्नता में तांडव नृत्य किया।
तभी से यह मान्यता बन गई कि जो भी व्यक्ति त्रयोदशी की शाम (प्रदोष काल) को भगवान शिव की आराधना करेगा, महादेव उसके जीवन के सारे ‘विष’ (दुख, रोग, दरिद्रता) पी लेंगे और उसे अमृत (सुख-समृद्धि) प्रदान करेंगे।
6. प्रदोष व्रत में क्या खाएं और क्या न खाएं? (Vrat Food Rules)
व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि पेट को आराम देकर शरीर की शुद्धि करना भी है। प्रदोष व्रत के भोजन नियम इस प्रकार हैं:
क्या खा सकते हैं? (What to eat)
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फलाहार: पूरे दिन में आप ताजे फल (सेब, केला, पपीता आदि) और फलों का रस ले सकते हैं।
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डेयरी उत्पाद: गाय का दूध, छाछ, दही और पनीर का सेवन किया जा सकता है।
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सात्विक अल्पाहार: शाम की पूजा पूरी करने के बाद आप साबूदाना की खिचड़ी, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरी, सेंधा नमक के साथ उबले आलू, और मखाने की खीर खाकर अपना व्रत खोल (पारण कर) सकते हैं। कई लोग इसे केवल मीठा खाकर भी खोलते हैं (नमक का त्याग करते हैं)।
क्या बिल्कुल न खाएं? (What to strictly avoid)
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अन्न (गेहूं, चावल, दालें) इस दिन वर्जित हैं।
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साधारण नमक (सफेद नमक), लाल मिर्च और गरम मसाले का प्रयोग न करें।
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लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा (शराब) का सेवन तो भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
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व्रत वाले दिन बार-बार चाय या कॉफी पीने से भी बचना चाहिए, क्योंकि यह पेट में गैस और एसिडिटी बनाता है।
7. वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण (Scientific Benefits of Pradosh Vrat)
प्रदोष व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है; यह हमारे शरीर की जैविक घड़ी (Biological Clock) को प्रकृति के साथ सिंक (Sync) करने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है:
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शरीर की डीटॉक्सिफिकेशन (Detoxification): महीने में दो बार त्रयोदशी के दिन अन्न का त्याग करने से हमारी आंतों (Intestines) को आराम मिलता है। शरीर की ऊर्जा भोजन पचाने के बजाय, डैमेज कोशिकाओं को रिपेयर करने में लग जाती है (ऑटोफैगी)।
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चंद्रमा का प्रभाव: त्रयोदशी के दिन चंद्रमा का आकार और उसका गुरुत्वाकर्षण बल बहुत तेज़ी से बदल रहा होता है, जो हमारे शरीर के जल तत्व को प्रभावित करता है। इससे मन अशांत और विचलित हो सकता है। व्रत रखकर और शाम को ध्यान (Meditation/Mantra Jaap) करने से मन पर नियंत्रण स्थापित होता है।
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ऊर्जा का संतुलन: गोधूलि बेला (प्रदोष काल) वह समय है जब सूर्य की गर्म ऊर्जा और चंद्रमा की ठंडी ऊर्जा मिलती है। इस संधिकाल में रीढ़ की हड्डी सीधी करके शिव मंत्रों का जाप करने से ‘कुण्डलिनी शक्ति’ जाग्रत होती है।
“Pradosh Vrat 2026 Calendar: कब है प्रदोष व्रत? देखें Month-Wise Date & Puja Time” के इस विस्तृत लेख का मुख्य उद्देश्य आपको तिथियों की जानकारी देने के साथ-साथ इस महान व्रत के विज्ञान और दर्शन से जोड़ना है।
कलियुग के इस भागदौड़ भरे जीवन में, जहां हर व्यक्ति मानसिक तनाव, बीमारियों और आर्थिक संघर्षों से जूझ रहा है, प्रदोष व्रत एक कल्पवृक्ष के समान है। साल 2026 में अधिक मास के संयोग के साथ आ रहे इन 26 प्रदोष व्रतों में से आप अपनी श्रद्धा अनुसार कुछ विशेष व्रत (जैसे सोमवार या शनिवार वाले) भी कर सकते हैं।
बस याद रखें, महादेव बहुत ही निर्मल हृदय वाले हैं। वे सोने-चांदी के छत्र से नहीं, बल्कि दो बूंद आंसुओं और एक बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं। प्रदोष काल में एक घी का दीपक जलाएं, ॐ नमः शिवाय का जाप करें, और सब कुछ उन पर छोड़ दें। वह नीलकंठ आपके जीवन के सारे विष पीकर उसे सुख और शांति से भर देगा।
हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में अधिक मास (Adhik Maas) के प्रदोष व्रत कब हैं?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार 2026 में अधिक मास (मलमास) मई और जून के महीने में पड़ रहा है। अधिक मास का शुक्ल पक्ष प्रदोष व्रत 29 मई 2026 को (भृगु प्रदोष) और कृष्ण पक्ष का प्रदोष 13 जून 2026 को (शनि प्रदोष) रहेगा।
प्रश्न 2: प्रदोष व्रत में पारण (व्रत खोलने) का सही समय क्या है?
उत्तर: एकादशी के विपरीत, प्रदोष व्रत में अगले दिन का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। शाम के समय (प्रदोष काल) शिव जी की पूजा, आरती और कथा संपन्न करने के बाद रात को ही सात्विक फलाहार ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है।
प्रश्न 3: क्या महिलाएं मासिक धर्म (Periods) में प्रदोष व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: हाँ, व्रत का संकल्प मानसिक होता है। महिलाएं मासिक धर्म के दौरान उपवास (Fasting) रख सकती हैं और मानसिक रूप से मंत्रों का जाप कर सकती हैं। लेकिन उन्हें भगवान की मूर्ति या शिवलिंग को स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही पूजा की सामग्री को छूना चाहिए। पूजा किसी अन्य सदस्य से करवानी चाहिए।
प्रश्न 4: बिना शिवलिंग के घर पर प्रदोष की पूजा कैसे करें?
उत्तर: यदि आपके घर में शिवलिंग नहीं है या आप मंदिर नहीं जा सकते, तो एक लकड़ी की चौकी पर शिव-पार्वती की तस्वीर (Photo) रखें। सामने मिट्टी से एक प्रतीकात्मक शिवलिंग बना लें या केवल तस्वीर के सामने ही फूल, बेलपत्र और दीप जलाकर मानसिक पूजा कर लें। महादेव भाव देखते हैं, मूर्त रूप नहीं।
प्रश्न 5: क्या प्रदोष व्रत में नमक खा सकते हैं?
उत्तर: कई पुराणों में प्रदोष व्रत को ‘मीठा व्रत’ कहा गया है, अर्थात इसमें केवल फल, दूध और मीठा खाने का विधान है। हालांकि, यदि शारीरिक कमजोरी है, तो आप शाम की पूजा के बाद फलाहार में सेंधा नमक (Rock Salt) का उपयोग कर सकते हैं। साधारण सफेद नमक पूरी तरह से वर्जित है।