Home Blog

Aghora Beej Mantra Sadhana: कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में भगवान शिव को ब्रह्मांड की सर्वोच्च सत्ता (परम चेतना) माना गया है। शिव के अनगिनत स्वरूप हैं, जिनमें से कुछ अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी हैं (जैसे सदाशिव, चंद्रशेखर), तो कुछ अत्यंत उग्र और भयंकर हैं (जैसे महाकाल, भैरव, वीरभद्र)। इन्हीं उग्र और रहस्यमयी स्वरूपों में से एक है भगवान शिव का ‘अघोर’ (Aghora) स्वरूप।

‘अघोर’ शब्द सुनते ही आम जनमानस के मन में भय, श्मशान, भस्म और तांत्रिक क्रियाओं की छवि उभरने लगती है। लेकिन वास्तविकता में ‘अघोर’ का अर्थ इसके बिल्कुल विपरीत है। ‘अ’ (नहीं) + ‘घोर’ (भयंकर) = अर्थात जो भयंकर नहीं है, जो अत्यंत सरल और सहज है। भगवान शिव का यह स्वरूप अपने भक्तों के लिए परम दयालु और कल्याणकारी है, जबकि पापियों, राक्षसों और नकारात्मक शक्तियों के लिए यह महा-भयंकर (घोरतम) है।

वर्तमान वर्ष 2026 के इस घोर कलियुग में, जहाँ मनुष्य हर कदम पर मानसिक तनाव, अज्ञात भय, छिपे हुए शत्रुओं, तंत्र-मंत्र (Black Magic) और भयंकर बीमारियों से जूझ रहा है, वहाँ ‘Aghora Beej Mantra Sadhana’ एक अभेद्य सुरक्षा कवच (Ultimate Protective Shield) के रूप में कार्य करती है। अघोर साधना मनुष्य के मन से ‘भय’ (Fear) को जड़ से समाप्त कर उसे ‘अभय’ (Fearless) बना देती है।

लेकिन, यह एक विशुद्ध तांत्रिक और उग्र साधना है। इसे बिना सही विधि, नियमों और सावधानियों के करना विनाशकारी भी हो सकता है। यदि आप अपने जीवन के सभी संकटों का समूल नाश कर एक निडर, आध्यात्मिक और समृद्ध जीवन जीना चाहते हैं, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही है।

यहाँ हम “Aghora Beej Mantra Sadhana: कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां” विषय पर गहराई से चर्चा करेंगे और इसके तांत्रिक व वैदिक रहस्यों को उजागर करेंगे।

1. भगवान शिव का ‘अघोर’ स्वरूप क्या है?

शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार, परब्रह्म शिव के पांच मुख्य मुख (चेहरे) हैं, जिन्हें ‘पंचब्रह्म’ (Panchabrahma) कहा जाता है। ये पांच मुख सृष्टि के पांच तत्वों (Earth, Water, Fire, Air, Space) और पांच दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हीं में से दक्षिण दिशा (South) की ओर देखने वाला मुख ‘अघोर’ कहलाता है।

भगवान शिव के पंचमुख (Panchamukhi Shiva) का विवरण

साधकों को अघोर ऊर्जा को समझने के लिए शिव के पांचों मुखों का ज्ञान होना आवश्यक है:

मुख का नाम (Face) दिशा (Direction) पंचतत्व (Element) स्वरूप और कार्य (Nature & Function)
सद्योजात (Sadyojata) पश्चिम (West) पृथ्वी (Earth) यह सृष्टि की रचना (Creation) और इच्छा शक्ति का प्रतीक है। अत्यंत सौम्य।
वामदेव (Vamadeva) उत्तर (North) जल (Water) यह पालन-पोषण (Preservation) और ज्ञान का प्रतीक है।
अघोर (Aghora) दक्षिण (South) अग्नि (Fire) यह संहार (Destruction/Transformation), पुनर्जन्म और तंत्र का प्रतीक है।
तत्पुरुष (Tatpurusha) पूर्व (East) वायु (Air) यह आवरण (Concealment), तपस्या और ध्यान का प्रतीक है।
ईशान (Ishana) ऊर्ध्व (Upward) आकाश (Space) यह अनुग्रह (Grace), मोक्ष और समस्त विद्याओं का प्रतीक है।

अघोर स्वरूप की पहचान: भगवान अघोर का स्वरूप काले मेघों के समान कृष्ण वर्ण (Dark) है। इनके मस्तक पर चंद्रमा, तीन नेत्र, गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला है। इनके हाथों में त्रिशूल, परशु (कुल्हाड़ी), कपाल और खड्ग होता है। यह अग्नि तत्व के स्वामी हैं, जो जीवन के सभी दुखों और पापों को भस्म कर देते हैं।

2. अघोर मंत्र और अघोर बीज मंत्र (The Aghora Mantras)

अघोर स्वरूप की उपासना के लिए शास्त्रों में वैदिक और तांत्रिक दोनों प्रकार के मंत्रों का उल्लेख है। साधक अपनी दीक्षा और गुरु के निर्देशानुसार मंत्र का चयन करते हैं।

I. वैदिक अघोर मंत्र (यजुर्वेद – रुद्राष्टाध्यायी)

यह मंत्र भगवान शिव के अघोर और घोर दोनों स्वरूपों को नमन करता है। जो साधक तांत्रिक बीज मंत्रों का जाप नहीं कर सकते, वे इस वैदिक मंत्र का पाठ कर सकते हैं:

ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।

सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥

अर्थ: “जो स्वरूप अघोर (शांत और कल्याणकारी) हैं, जो स्वरूप घोर (भयंकर) हैं, और जो घोर से भी अति घोर (महाभयंकर) हैं। हे भगवान शिव! आपके उन सभी रुद्र स्वरूपों को मेरा बारंबार प्रणाम है।”

II. अघोर बीज मंत्र (तांत्रिक मंत्र – सर्वाधिक उग्र)

तंत्र शास्त्र में अघोर ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए बीजाक्षरों (Seed syllables) का संपुट लगाया जाता है। यह मंत्र अमोघ है और इसका प्रहार कभी खाली नहीं जाता:

॥ ॐ ह्रीं स्फुरों अघोररूपाय अघोरस्त्राय फट् ॥

(Om Hreem Sphurom Aghoraroopaya Aghorastraya Phat)

बीजाक्षरों का रहस्य:

  • ॐ (Om): परब्रह्म की मूल ध्वनि।

  • ह्रीं (Hreem): माया बीज (माता भुवनेश्वरी की शक्ति), जो शिव को सक्रिय करती है।

  • स्फुरों (Sphurom): यह स्फुरण (Vibration) और प्रचंड ऊर्जा के प्रकटीकरण का तांत्रिक बीज है।

  • अघोररूपाय (Aghoraroopaya): अघोर स्वरूप धारण करने वाले महादेव को।

  • अघोरस्त्राय (Aghorastraya): अघोर अस्त्र (Weapon of Aghora) को, जो सभी शत्रुओं और संकटों का नाश करता है।

  • फट् (Phat): यह अस्त्र बीज है। इसका प्रयोग तंत्र बाधा, नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं को नष्ट करने (Destroy/Sever) के लिए किया जाता है।

3. Aghora Beej Mantra Sadhana के चमत्कारिक लाभ (Benefits)

जो साधक पूर्ण निर्भयता, निष्ठा और कड़े नियमों के साथ ‘अघोर बीज मंत्र’ की साधना करता है, वह साधारण मनुष्य से उठकर एक महामानव (Superhuman) बनने की राह पर चल पड़ता है। इसके लाभ अकल्पनीय हैं:

1. तंत्र-मंत्र और काले जादू का सर्वनाश (Destruction of Black Magic)

कलियुग में ईर्ष्या के कारण कई लोग दूसरों पर तांत्रिक प्रयोग, मारण क्रिया या वशीकरण करवा देते हैं। अघोर मंत्र साधना ऐसे किसी भी ‘किए-कराए’ (Black Magic) को तुरंत काट देती है। अघोर अस्त्र (फट्) नकारात्मक ऊर्जा को उसी व्यक्ति पर वापस पलट देता है जिसने उसे भेजा हो।

2. अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा

दक्षिण दिशा यमराज (मृत्यु) की दिशा है और भगवान अघोर इसी दिशा के अधिपति हैं। इसलिए, अघोर साधना करने वाले साधक को कभी भी अकाल मृत्यु, एक्सीडेंट या अचानक हृदय गति रुकने (Heart attack) का भय नहीं रहता। यमराज के दूत भी ऐसे साधक से दूर रहते हैं।

3. शत्रुओं का शमन (Victory over Enemies)

यदि आपके जीवन में छिपे हुए या प्रत्यक्ष शत्रु बहुत बढ़ गए हैं जो आपको मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान कर रहे हैं, तो अघोर साधना से शत्रुओं का दमन हो जाता है। शत्रु स्वयं ही साधक से भयभीत होकर दूर हो जाते हैं या उनके षड्यंत्र विफल हो जाते हैं।

4. अज्ञात भय और फोबिया की समाप्ति (Ultimate Fearlessness)

अघोर का मुख्य उद्देश्य ही ‘भय’ को मारना है। जिन लोगों को अंधेरे, मृत्यु, बीमारी या भविष्य का अज्ञात डर सताता रहता है, यह मंत्र उनके अवचेतन मन (Subconscious mind) से इन सभी डरों को निकालकर उनके भीतर एक सिंह के समान निडरता भर देता है।

5. कुंडलिनी जागरण (Spiritual Awakening)

अघोर ऊर्जा शरीर के मूलाधार चक्र (Root Chakra) में स्थित कुंडलिनी शक्ति को तेजी से जाग्रत करती है। साधक को ध्यान में अलौकिक अनुभूतियां होती हैं और उसका ‘तीसरा नेत्र’ (Third Eye) खुलने लगता है, जिससे उसे भूत और भविष्य का भान होने लगता है।

4. Aghora Beej Mantra Sadhana: संपूर्ण तांत्रिक साधना विधि (Step-by-Step Guide)

चेतावनी: अघोर साधना एक उग्र तांत्रिक साधना है। इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन (दीक्षा) के बाद ही करना चाहिए। यहाँ दी गई विधि साधकों के ज्ञानवर्धन और शास्त्र-सम्मत जानकारी के लिए है।

साधना का समय और आवश्यक सामग्रियां

  • सर्वोत्तम दिन: यह साधना किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, शिवरात्रि या ग्रहण काल में शुरू की जानी चाहिए।

  • सर्वोत्तम समय: अघोर साधना कभी भी दिन में नहीं होती। इसके लिए निशीथ काल (मध्यरात्रि 11:30 बजे से 2:00 बजे के बीच) का समय ही एकमात्र विकल्प है।

  • दिशा (Direction): आपका मुख हमेशा दक्षिण (South) दिशा की ओर होना चाहिए।

  • आसन (Asana): काले या गहरे लाल रंग का ऊनी आसन (Blanket)।

  • वस्त्र (Clothes): काले या लाल रंग के बिना सिले हुए सूती वस्त्र (जैसे धोती)।

  • माला (Rosary): रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठित माला (108 मनकों वाली) या काले हकीक की माला।

चरण 1: स्नान और रक्षा विधान (Purification & Shielding)

  • मध्यरात्रि में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  • साधना कक्ष एकांत होना चाहिए। सबसे पहले एक आसन पर बैठें और अपने चारों ओर जल या भस्म से एक घेरा (रक्षा रेखा) बनाएं। भगवान भैरव से अपनी रक्षा की प्रार्थना करें, क्योंकि उग्र ऊर्जाएं आकर्षित हो सकती हैं।

ये भी पढ़ें:  Karwa Chauth Kab Hai: 2026 में करवा चौथ व्रत कब है? जानें Sargi Rules और Moonrise Time की पूरी जानकारी

चरण 2: चौकी और चित्र स्थापना (Altar Setup)

  • अपने सामने एक लकड़ी की चौकी पर काला या लाल कपड़ा बिछाएं।

  • चौकी पर भगवान शिव के अघोर स्वरूप, महाकाल या पारद शिवलिंग की स्थापना करें। साथ में भगवान गणेश और अपने गुरु का चित्र भी रखें।

  • दीपक: सरसों के तेल (Mustard Oil) या तिल के तेल का एक बड़ा चौमुखी दीपक प्रज्वलित करें, जो पूरी साधना के दौरान न बुझे।

  • गुग्गुल, लोबान या लाल चंदन की धूप जलाएं।

चरण 3: संकल्प लेना (Taking Sankalpa)

  • दाहिने हाथ में थोड़ा सा जल, काले तिल, लाल फूल और एक सिक्का लें।

  • “हे परमपिता अघोरेश्वर! मैं (अपना नाम और गोत्र), अपने जीवन के सभी भयों, तंत्र बाधाओं और शत्रुओं के नाश हेतु तथा आपकी परम कृपा प्राप्ति हेतु, आज से (11, 21 या 41) दिनों तक, प्रतिदिन रुद्राक्ष की माला से ‘अघोर बीज मंत्र’ की (11, 21 या 51) माला का मध्यरात्रि में जाप करने का संकल्प लेता हूँ। कृपया मेरी रक्षा करें और साधना सिद्ध करें।”

  • जल को जमीन पर छोड़ दें।

चरण 4: गुरु, गणेश और भैरव पूजन

  • सबसे पहले विघ्नहर्ता गणेश जी की 1 माला “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करें।

  • अपने गुरु का ध्यान करें और 1 माला गुरु मंत्र का जाप करें। गुरु की आध्यात्मिक ऊर्जा ही इस उग्र साधना में आपको टूटने से बचाती है।

  • तत्पश्चात भगवान काल भैरव का स्मरण करें— “ॐ काल भैरवाय नमः” (1 माला)।

चरण 5: ध्यान और मंत्र जाप (Meditation & Japa)

  • आंखें बंद करें और भगवान शिव के अघोर स्वरूप का ध्यान करें, जिनके मस्तक पर प्रलयंकारी अग्नि है और जो आपके सभी दुखों को भस्म कर रहे हैं।

  • गौमुखी (Mala Bag) के अंदर रुद्राक्ष की माला लें। तर्जनी (Index finger) का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए।

  • मंत्र: “॥ ॐ ह्रीं स्फुरों अघोररूपाय अघोरस्त्राय फट् ॥”

  • मंत्र का उच्चारण অত্যন্ত स्पष्ट, गहरा और नाभि (Navel) से आना चाहिए। इसे ‘उपांशु’ (केवल होंठ हिलें, धीमी आवाज) या मानसिक रूप से जपें।

  • सुमेरु (ऊपरी मनका) को पार न करें, वहीं से माला पलट लें। अपनी संकल्पित संख्या (जैसे 11 या 21 माला) पूर्ण करें।

चरण 6: क्षमा प्रार्थना और विसर्जन (Conclusion)

  • जाप पूरा होने के बाद थोड़ा सा जल हाथ में लेकर साधना का फल भगवान शिव के अघोर स्वरूप को समर्पित कर दें ( “ॐ तत्सत ब्रह्मार्पणमस्तु” )।

  • भगवान शिव से अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगें।

  • तुरंत आसन से न उठें। ध्यान रखें, अघोर साधना के बाद शरीर का तापमान बहुत बढ़ जाता है, इसलिए 10 मिनट शांति से बैठकर ऊर्जा को शांत (Grounding) होने दें।

5. साधना काल में पालन करने योग्य कड़े नियम (Strict Rules of Sadhana)

अघोर साधना आग से खेलने के समान है। यदि नियमों का पालन किया जाए, तो यह घर को रोशन करती है; यदि तोड़ा जाए, तो जला भी सकती है।

  1. कठोर ब्रह्मचर्य (Absolute Celibacy): अनुष्ठान के पहले दिन से अंतिम दिन तक शारीरिक, मानसिक और वैचारिक ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। कामुक विचार आपकी सारी ऊर्जा को नष्ट कर देंगे।

  2. गोपनीयता (Extreme Secrecy): तांत्रिक साधना की सबसे बड़ी शर्त गोपनीयता है। आप अघोर साधना कर रहे हैं, यह बात आपके गुरु के अलावा किसी (पत्नी/मित्र) को पता नहीं होनी चाहिए। बताने से ऊर्जा लीक (Leak) हो जाती है।

  3. स्त्रियों का सम्मान: अघोर साधना में शक्ति (माता) का विशेष स्थान है। साधना काल में किसी भी स्त्री का अपमान या उस पर बुरी नजर डालना, साधक का सर्वनाश कर सकता है।

  4. सात्विक आहार: यदि आप गृहस्थ हैं और यह साधना कर रहे हैं, तो मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन और प्याज का पूर्ण त्याग करें। (अघोरियों का वाम मार्गी आहार अलग होता है, लेकिन गृहस्थों को सात्विक मार्ग ही अपनाना चाहिए)।

  5. भूमि शयन (Sleeping on the Floor): विलासिता का त्याग करें। जमीन पर कंबल या चटाई बिछाकर सोएं।

  6. क्रोध का त्याग: अघोर मंत्र अग्नि तत्व को बढ़ाता है, जिससे साधक को बहुत जल्दी भयानक क्रोध आ सकता है। यदि आपने साधना काल में क्रोध किया या किसी को अपशब्द कहे, तो आपका सारा तपोबल उसी क्षण शून्य (Zero) हो जाएगा। स्वयं को जल के समान शांत रखें।

6. अघोर साधना में अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानियां (Precautions & Warnings)

  • डरावने अनुभव (Terrifying Visions): अघोर साधना के दौरान जब आपके अवचेतन मन का डर बाहर आता है, तो आपको भयानक आकृतियां, श्मशान के दृश्य या अजीब आवाजें महसूस हो सकती हैं। यह अघोर ऊर्जा द्वारा आपकी परीक्षा है। साधक को डरकर आंखें नहीं खोलनी चाहिए और न ही आसन छोड़ना चाहिए। शिव का स्मरण करें, कुछ भी आपका अहित नहीं कर सकता।

  • गुरु का होना अनिवार्य है: कभी भी किसी किताब या इंटरनेट से पढ़कर सीधे इस उग्र साधना को शुरू न करें। गुरु साधक की ऊर्जा के स्तर (Energy level) की जांच करके ही उसे अस्त्र और रक्षा मंत्र प्रदान करते हैं।

  • लालच या नुकसान की भावना: यदि आप किसी का अकारण बुरा करने या अहंकार वश यह साधना कर रहे हैं, तो अघोर अस्त्र पलटकर आपको ही नष्ट कर देगा। भाव हमेशा आत्म-रक्षा और आत्म-कल्याण का होना चाहिए।

  • दिशा का भ्रम: मध्यरात्रि में हमेशा दक्षिण दिशा की ओर ही मुख करें। किसी अन्य दिशा में किया गया अघोर जाप फलित नहीं होता।

ये भी पढ़ें:  Shreem Beej Mantra से धन आकर्षण कैसे होता है? जानें रहस्य और विधि

7. अघोर दर्शन: वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Psychological Perspective)

आधुनिक मनोविज्ञान (Psychology) में कार्ल जुंग (Carl Jung) ने ‘शैडो सेल्फ’ (Shadow Self) की अवधारणा दी है। हमारे अवचेतन मन में बहुत से दबे हुए डर, गुस्सा, वासना और नकारात्मकता (Shadows) छिपे होते हैं, जिन्हें हम स्वीकार नहीं करना चाहते।

अघोर दर्शन और ‘Aghora Beej Mantra Sadhana’ वास्तव में इस ‘शैडो सेल्फ’ का सामना करने का सबसे प्राचीन और शक्तिशाली विज्ञान है। अघोर का अर्थ है— जो घृणा (Disgust) और भय से परे है। जब साधक अघोर मंत्र का जाप करता है, तो वह अपने भीतर के सभी अंधकारों (Demons) को स्वीकार करके उन्हें शिव की अग्नि में भस्म कर देता है।

यही कारण है कि अघोर साधना पूरी करने के बाद व्यक्ति को दुनिया की कोई भी परिस्थिति, बीमारी या मौत भी डरा नहीं सकती। उसका मन एक ठहरे हुए सरोवर के समान परम शांत और आनंदित हो जाता है।

Aghora Beej Mantra Sadhana तंत्र शास्त्र का वह परम रहस्य है, जो मनुष्य को उसके सबसे बड़े शत्रु— ‘भय’— से मुक्ति दिलाता है। कलियुग के इस अंधकारमय समय में, जहाँ मनुष्य चारो ओर से मानसिक और भौतिक संकटों से घिरा हुआ है, भगवान शिव का यह अघोर स्वरूप एक अजेय रक्षक की भांति खड़ा है।

इस विस्तृत लेख के माध्यम से आपने जाना कि अघोर स्वरूप क्या है, अघोर बीज मंत्र का अर्थ और शक्ति क्या है, इसके चमत्कारिक लाभ क्या हैं, और इसे करने की तांत्रिक विधि, नियम तथा सावधानियां क्या हैं।

पुनः यह स्मरण रहे कि भगवान शिव की यह उग्र शक्ति अत्यधिक कल्याणकारी होने के साथ-साथ अत्यंत क्रोधी भी है। इसलिए इस मार्ग पर कदम रखने से पहले एक समर्थ गुरु की खोज अवश्य करें। योग्य गुरु के निर्देशन, पूर्ण निर्भयता, शिव के प्रति अटूट प्रेम और शुद्ध आचरण के साथ की गई अघोर साधना, साधक को शिव के ही समान अजेय, शांत और परम ज्ञानी बना देती है।

॥ ॐ ह्रीं स्फुरों अघोररूपाय अघोरस्त्राय फट् ॥

॥ हर हर महादेव ॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या गृहस्थ (Family oriented) लोग अघोर साधना कर सकते हैं?

उत्तर: हाँ, गृहस्थ लोग अघोर साधना कर सकते हैं, लेकिन उन्हें श्मशान में बैठकर की जाने वाली ‘वाम मार्गी’ (तांत्रिक) अघोर साधना से बचना चाहिए। गृहस्थों को किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेकर घर के एकांत कक्ष में, सात्विक नियमों (बिना मांस-मदिरा के) के साथ ‘दक्षिण मार्गी’ अघोर साधना करनी चाहिए, जो पूरी तरह सुरक्षित और रक्षात्मक होती है।

प्रश्न 2: अघोर साधना हमेशा मध्यरात्रि (निशीथ काल) में ही क्यों की जाती है?

उत्तर: तंत्र शास्त्र के अनुसार, सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय दैवीय और सात्विक ऊर्जाओं का होता है। जबकि सूर्यास्त के बाद, विशेषकर मध्यरात्रि (11:30 PM से 2:00 AM) का समय, उग्र, तांत्रिक और गुप्त शक्तियों के प्रकटीकरण का समय होता है। अघोर ऊर्जा अग्नि तत्व और संहार से जुड़ी है, जो निशीथ काल के एकांत और शांत वातावरण में सबसे अधिक तीव्रता से जाग्रत होती है।

प्रश्न 3: क्या महिलाएं (स्त्रियां) अघोर बीज मंत्र की साधना कर सकती हैं?

उत्तर: आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा का कोई जेंडर नहीं होता। महिलाएं भी अघोर साधना कर सकती हैं, लेकिन उग्र साधना होने के कारण उन्हें गुरु का मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए। महिलाओं को केवल मासिक धर्म (Periods) के 4-5 दिनों के दौरान यह अनुष्ठान रोक देना चाहिए और शुद्धि के पश्चात ही साधना को आगे बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 4: साधना के दौरान यदि बहुत अधिक क्रोध आए या शरीर में गर्मी महसूस हो, तो क्या करें?

उत्तर: अघोर मंत्र (विशेषकर ‘स्फुरों’ और ‘फट्’ बीज) शरीर में प्रचंड अग्नि तत्व को बढ़ाते हैं, जिससे शरीर का तापमान बढ़ना और अकारण क्रोध आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे शांत करने के लिए प्रतिदिन साधना के बाद सुबह भगवान शिव (शिवलिंग) पर जल या कच्चा दूध अवश्य चढ़ाएं। दिन भर में अधिक मात्रा में पानी पिएं और क्रोध आने पर ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक स्मरण कर स्वयं को शांत करें।

प्रश्न 5: क्या बिना गुरु दीक्षा के केवल पुस्तक या इंटरनेट से पढ़कर यह साधना की जा सकती है?

उत्तर: नहीं, यह अत्यंत खतरनाक है। अघोर साधना विशुद्ध रूप से एक ‘उग्र तांत्रिक साधना’ है। बिना गुरु के रक्षा मंत्र, दिशा-निर्देश और ऊर्जा के संतुलन के बिना यह साधना करना, बिना सुरक्षा उपकरण के आग में कूदने के समान है। साधक को भयंकर डरावने अनुभव हो सकते हैं या वह मानसिक संतुलन खो सकता है। इसलिए गुरु की शरण में जाना अनिवार्य है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!