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Nirjala Ekadashi 2026: क्या बिना पानी पिए ही रखना चाहिए व्रत? जानें शास्त्र क्या कहते हैंIt takes 10 minutes... to read this article !

हिंदू धर्म में भगवान श्री हरि विष्णु को प्रसन्न करने और मोक्ष की प्राप्ति के लिए एकादशी व्रतों का अत्यंत महत्व है। एक वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘निर्जला एकादशी’ (Nirjala Ekadashi) को सभी एकादशियां में सर्वोच्च और सबसे कठिन माना गया है। इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहा जाता है।

साल 2026 में जब ज्येष्ठ मास की प्रचंड और चिलचिलाती गर्मी अपने चरम पर होगी, तब यह पावन व्रत रखा जाएगा। इस व्रत का नाम सुनते ही सबसे पहला सवाल जो हर श्रद्धालु के मन में आता है, वह यह है कि— “क्या इस भीषण गर्मी में सचमुच जल की एक बूंद पिए बिना ही व्रत रखना चाहिए?”

जो लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, उनके लिए यह तपस्या हो सकती है। लेकिन बुजुर्गों, बीमारों और पहली बार व्रत रखने वालों के मन में यह भारी संशय रहता है कि यदि प्यास बर्दाश्त न हो तो क्या करें? क्या पानी पीने से व्रत टूट जाएगा? क्या भगवान क्रोधित होंगे?

इस विस्तृत लेख में हम आपकी इसी दुविधा को दूर करेंगे। हम यहाँ आपको पूर्णत: वैज्ञानिक और शास्त्रों के प्रमाणिक नियमों के आधार पर बताएंगे कि निर्जला एकादशी 2026 का व्रत पानी पीकर रखा जा सकता है या नहीं, और इसके पीछे धर्मग्रंथ क्या कहते हैं।

निर्जला एकादशी का मूल अर्थ और नियम (Meaning of Nirjala Ekadashi)

‘निर्जला’ शब्द का सीधा अर्थ है— ‘जल के बिना’ (Without Water)

परंपरागत और पौराणिक नियमों के अनुसार, इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन (द्वादशी तिथि) के सूर्योदय तक अन्न के साथ-साथ जल (पानी) का भी पूर्ण रूप से त्याग किया जाता है। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास जी के कहने पर महाबली भीमसेन ने अपने जीवन में केवल यही एक व्रत रखा था और वह भी बिना पानी पिए। इसीलिए मान्यता है कि जो व्यक्ति पूरे 24 घंटे बिना अन्न-जल के इस व्रत को पार कर लेता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का पुण्य एक साथ मिल जाता है।

क्या बिना पानी पिए ही रखना चाहिए व्रत? शास्त्र क्या कहते हैं?

जब बात शास्त्रों और धर्मग्रंथों की आती है, तो सनातन धर्म हमेशा संतुलन और करुणा सिखाता है। हमारे धर्मग्रंथ इंसान को शारीरिक यातना देकर भगवान को खुश करने की वकालत कभी नहीं करते।

“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”

अर्थात्: यह शरीर ही धर्म के पालन का सबसे पहला और मुख्य साधन है।

यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेगा, तो आप भगवान की भक्ति, ध्यान या कोई भी धार्मिक कार्य कैसे करेंगे?

शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि यदि आपकी शारीरिक क्षमता अनुमति देती है और आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं, तो आपको यह व्रत ‘निर्जल’ (बिना पानी के) ही रखना चाहिए। यह आपकी इंद्रियों (senses) पर विजय प्राप्त करने का साधन है।

लेकिन, यदि प्यास के कारण आपके प्राण संकट में आ जाएं, चक्कर आने लगें, या आपकी तबियत इतनी बिगड़ जाए कि आप भगवान का नाम जपने के बजाय केवल पानी के बारे में सोच रहे हों, तो ऐसा व्रत शास्त्रों की दृष्टि में ‘तामसिक’ या ‘कष्टदायी’ माना जाता है। भगवान विष्णु भाव के भूखे हैं, शारीरिक यातना के नहीं। ऐसी स्थिति में शास्त्र आपको जल ग्रहण करने की अनुमति देते हैं।

किन लोगों को पानी पीने (सजल व्रत) की छूट है? (Exemptions in Shastras)

शास्त्रों में कुछ विशेष परिस्थितियों और लोगों के लिए निर्जला व्रत के कड़े नियमों में छूट दी गई है। निम्नलिखित श्रेणी के लोग बिना किसी दोष या पाप के पानी पीकर या फलाहार करके एकादशी का व्रत कर सकते हैं:

श्रेणी (Category) विवरण और छूट (Details & Exemptions)
गर्भवती महिलाएं (Pregnant Women) गर्भ में पल रहे शिशु और माता के स्वास्थ्य के लिए जल और पोषण अनिवार्य है। गर्भवती महिलाओं को निर्जल व्रत नहीं रखना चाहिए। वे फल, दूध और पानी का सेवन कर सकती हैं।
स्तनपान कराने वाली माताएं (Nursing Mothers) जो माताएं शिशु को अपना दूध पिलाती हैं, उनके लिए निर्जल रहना शिशु के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इन्हें सजल (पानी के साथ) व्रत करना चाहिए।
वृद्धजन (Elderly People 60+) उम्र के साथ शरीर की क्षमता कम हो जाती है। बुजुर्गों को प्यास और गर्मी बर्दाश्त करने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। वे अपनी दवाइयों के साथ जल ग्रहण कर सकते हैं।
बीमार व्यक्ति (Sick/Medical Conditions) जिन्हें डायबिटीज (मधुमेह), रक्तचाप (Blood Pressure), किडनी की समस्या या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, उन्हें किसी भी स्थिति में निर्जल व्रत नहीं रखना चाहिए।
छोटे बच्चे (Children) बच्चों का शरीर कोमल होता है। उन पर निर्जला उपवास के कड़े नियम लागू नहीं होते।

यदि पानी पीना पड़े तो उसके शास्त्र-सम्मत नियम क्या हैं? (Rules for Drinking Water)

यदि आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं, लेकिन व्रत के बीच में भयंकर गर्मी के कारण आपकी हालत खराब हो जाती है और प्यास बर्दाश्त नहीं होती, तो आपको पानी पी लेना चाहिए। लेकिन इसके भी कुछ नियम हैं ताकि व्रत का पूर्ण खंडन न हो:

1. आचमन का नियम: पूजा करते समय ‘आचमन’ किया जाता है। आचमन में हथेली में केवल एक बूंद (राई के दाने के बराबर) जल लेकर उसे पिया जाता है। शास्त्र कहते हैं कि आचमन करने से व्रत नहीं टूटता। यदि प्यास से गला बहुत सूख रहा है, तो आप 2-3 बार आचमन कर सकते हैं।

2. सूर्य देव या तुलसी को अर्घ्य देकर: यदि आचमन से काम न चले और प्राण संकट में हों, तो सीधे बोतल या गिलास से पानी न पिएं। पहले भगवान श्री हरि विष्णु से अपनी शारीरिक असमर्थता के लिए क्षमा मांगें। उसके बाद तुलसी माता या सूर्य देव को जल अर्पित करें और उसी कलश से थोड़ा सा जल ‘चरणामृत’ या ‘प्रसाद’ के रूप में ग्रहण कर लें।

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3. नींबू पानी या शर्बत न पिएं: यदि आप व्रत में पानी पी रहे हैं, तो केवल सादा और शुद्ध पानी पिएं। प्यास बुझाने के लिए उसमें नींबू, चीनी, या कोई फ्लेवर डालकर शर्बत न बनाएं।

4. प्रायश्चित दान: यदि आपने संकल्प निर्जला का लिया था लेकिन पानी पीना पड़ गया, तो घबराएं नहीं और न ही मन में अपराधबोध (Guilt) पालें। द्वादशी के दिन पारण करते समय अपनी क्षमता के अनुसार किसी ब्राह्मण को अतिरिक्त जल का कलश, अन्न या दक्षिणा दान कर दें। भगवान क्षमाशील हैं।

निर्जला न रह पाएं तो व्रत कैसे करें? (Alternative Ways to Fast)

यदि आपको पहले से ही पता है कि आप गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकते और निर्जल नहीं रह सकते, तो आपको व्रत छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आप ‘सजल एकादशी’ (जल के साथ) या ‘फलाहारी एकादशी’ का पालन कर सकते हैं।

व्रत के विभिन्न स्तर (Levels of Fasting) इस प्रकार हैं:

  • प्रथम स्तर (सर्वोत्तम): निर्जला व्रत (बिना अन्न और बिना जल के)।

  • द्वितीय स्तर (मध्यम): सजल व्रत (बिना अन्न के, केवल जल, नींबू पानी या नारियल पानी पीकर)।

  • तृतीय स्तर (सामान्य): क्षीराहार व्रत (जल के साथ-साथ केवल दूध, छाछ या फलों के रस का सेवन)।

  • चतुर्थ स्तर: फलाहारी व्रत (जिसमें जल, दूध के अलावा एक समय सात्विक फल जैसे केला, सेब, पपीता आदि खाया जाता है)।

  • पंचम स्तर: यदि फल से भी काम न चले, तो सिंघाड़े या कुट्टू के आटे से बना सात्विक फलाहार (बिना नमक या केवल सेंधा नमक के साथ) एक समय लिया जा सकता है।

आप अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार इनमें से किसी भी एक विकल्प को चुन सकते हैं। ध्यान रहे, किसी भी स्तर में अन्न (गेहूं, चावल, दाल) खाना पूर्णतः वर्जित है।

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य के नजरिए से निर्जला व्रत (Health Perspective)

धार्मिक पहलू के अलावा, हमें 2026 की भीषण गर्मी में स्वास्थ्य विज्ञान (Medical Science) को भी समझना चाहिए।

फायदे (Pros): मेडिकल साइंस ‘ड्राई फास्टिंग’ (Dry Fasting – बिना पानी के उपवास) को सेलुलर रीजनरेशन (Cellular Regeneration) के लिए अच्छा मानता है। 12 से 24 घंटे बिना पानी के रहने पर शरीर में ‘ऑटोफैगी’ (Autophagy) की प्रक्रिया शुरू होती है, जो खराब और मृत कोशिकाओं को नष्ट करके शरीर को अंदर से साफ करती है।

नुकसान (Cons): मई-जून की गर्मी में शरीर को पसीने के रूप में बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यदि आप निर्जल उपवास करते हैं और धूप में बाहर जाते हैं, तो आपको ‘डिहाइड्रेशन’ (Dehydration), हीटस्ट्रोक, सिरदर्द और ब्लड प्रेशर गिरने की गंभीर समस्या हो सकती है।

इसलिए विज्ञान भी यही सलाह देता है कि यदि आप एयर-कंडीशन्ड (AC) कमरे में हैं या दिन भर आराम कर सकते हैं, तभी इस ड्राई फास्ट को चुनें। धूप में मेहनत मजदूरी करने वालों या ऑफिस जाने वालों को जल अवश्य ग्रहण करना चाहिए।

निर्जला एकादशी 2026: पूजा विधि और पारण के नियम

चाहे आप निर्जल व्रत रखें या सजल, भगवान की पूजा का तरीका समान ही रहेगा।

  1. सुबह की शुरुआत: एकादशी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। पीले वस्त्र पहनें।

  2. संकल्प लें: पूजा घर में भगवान विष्णु के सामने हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प लें। यदि आप पानी पीकर व्रत रख रहे हैं, तो संकल्प में कहें— “हे प्रभु! मैं अपनी शारीरिक क्षमता अनुसार सजल/फलाहारी व्रत का संकल्प ले रहा हूँ।”

  3. पूजा करें: भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक करें। उन्हें पीले फूल, चंदन और तुलसी अर्पित करें। (याद रखें, एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना पाप है, इसे एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।

  4. दान-पुण्य: इस भीषण गर्मी में प्यासों को पानी पिलाएं। जल से भरा हुआ मिट्टी का घड़ा (मटका), हाथ का पंखा और छाता दान करना महादान माना जाता है।

  5. रात्रि जागरण: रात में सोए बिना भगवान के भजन-कीर्तन करें।

  6. पारण (व्रत खोलना): अगले दिन (द्वादशी को) शुभ मुहूर्त में ब्राह्मण को सीधा (कच्चा अन्न) और दक्षिणा देकर, भगवान के चरणामृत से अपना व्रत खोलें।

Nirjala Ekadashi 2026 का व्रत निस्संदेह आत्म-नियंत्रण और भक्ति की सर्वोच्च परीक्षा है। “क्या बिना पानी पिए ही रखना चाहिए व्रत?” इस सवाल का सटीक उत्तर आपके स्वयं के शरीर और अंतरात्मा के पास है।

शास्त्रों का स्पष्ट संदेश है कि जो स्वस्थ हैं, वे निर्जल रहें। जो कमजोर या बीमार हैं, वे जल और फल ग्रहण करें। भगवान श्री हरि विष्णु किसी भी भक्त की शारीरिक यातना से नहीं, बल्कि उसके हृदय के शुद्ध भाव, परोपकार और भक्ति से प्रसन्न होते हैं। व्रत में भूखे रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप क्रोध न करें, झूठ न बोलें और किसी का दिल न दुखाएं। सच्ची श्रद्धा से किया गया फलाहारी व्रत भी आपको 24 एकादशियों के बराबर पुण्य दिला सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. निर्जला एकादशी में स्नान करते समय पानी मुंह में चला जाए तो क्या व्रत टूट जाता है?

गर्मी के कारण आप दिन में स्नान कर सकते हैं। यदि स्नान करते समय या कुल्ला करते समय अनजाने में पानी की कुछ बूंदें गले में चली जाएं, तो इससे व्रत नहीं टूटता। भगवान केवल आपकी नीयत देखते हैं।

2. क्या मैं निर्जला एकादशी पर नारियल पानी पी सकता हूँ?

यदि आपने पूर्ण ‘निर्जला’ (बिना पानी का) संकल्प लिया है, तो आप नारियल पानी नहीं पी सकते। लेकिन यदि आप ‘सजल’ (पानी के साथ) व्रत रख रहे हैं, तो नारियल पानी ऊर्जा और हाइड्रेशन का एक बेहतरीन और सात्विक स्रोत है।

3. व्रत के बीच में तबियत खराब होने पर पानी पीने के बाद क्या मैं खाना खा सकता हूँ?

नहीं। यदि आपने स्वास्थ्य कारणों से पानी पी लिया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपका व्रत पूरी तरह समाप्त हो गया है। आप अपना व्रत केवल जल या फल के साथ अगले दिन तक जारी रखें। अन्न (चावल, रोटी) खाना एकादशी के दिन पूर्णतः वर्जित है।

4. क्या निर्जला एकादशी पर थूक घोंट सकते हैं?

हाँ, थूक निगलना एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। इससे निर्जला व्रत खंडित नहीं होता है।

5. 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत कब खोला जाएगा?

व्रत हमेशा एकादशी के अगले दिन यानी ‘द्वादशी तिथि’ के सूर्योदय के बाद पारण मुहूर्त में खोला जाता है। पंचांग के अनुसार पारण का जो शुभ समय निर्धारित हो, उसी में व्रत खोलना चाहिए; हरि वासर में व्रत कभी नहीं खोलना चाहिए।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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