भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए व्रतों और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं पवित्र और अत्यंत महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है— ‘कजरी तीज’ (Kajari Teej)। हरियाली तीज के ठीक पंद्रह दिन बाद आने वाली इस तीज को महिलाओं के अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है।
श्रावण मास की रिमझिम फुहारों के विदा होने और भाद्रपद (भादों) मास के आगमन के साथ ही प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। इसी प्राकृतिक उल्लास और शिव-पार्वती के अलौकिक प्रेम को समर्पित है कजरी तीज। मुख्य रूप से यह पर्व राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और गुजरात के कुछ हिस्सों में अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है।
यदि आप भी इस वर्ष कजरी तीज का व्रत रखने जा रही हैं और जानना चाहती हैं कि वर्ष 2026 में कजरी तीज कब है (Kajari Teej 2026 Date), इसका शुभ मुहूर्त क्या है, नीमड़ी माता की पूजा कैसे की जाती है, और इस व्रत की पौराणिक कथा क्या है, तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं।
इस अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक लेख में हम आपको कजरी तीज के व्रत से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी प्रदान करेंगे, ताकि आपका व्रत पूर्ण विधि-विधान से संपन्न हो सके और आपको माता पार्वती का अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त हो।
1. वर्ष 2026 में कजरी तीज कब है? (Kajari Teej 2026 Date & Time)
हिंदू पंचांग के अनुसार, कजरी तीज का पावन पर्व हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इसे रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) के तीसरे दिन मनाया जाता है।
वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2026 की शाम को होगा और इसका समापन 31 अगस्त 2026 को होगा। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, वर्ष 2026 में कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित होने के कारण इस वर्ष कजरी तीज का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
कजरी तीज 2026: शुभ मुहूर्त तालिका (Muhurat Table)
सुहागिन महिलाओं और व्रतियों की सुविधा के लिए यहाँ 31 अगस्त 2026 की कजरी तीज पूजा के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:
| पर्व / विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time) |
| कजरी तीज 2026 की तिथि | 31 अगस्त 2026 (सोमवार) |
| भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि का आरंभ | 30 अगस्त 2026, शाम 04:30 बजे से |
| भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि की समाप्ति | 31 अगस्त 2026, दोपहर 02:45 बजे तक |
| नीमड़ी माता की पूजा का प्रातःकालीन मुहूर्त | सुबह 06:05 बजे से 08:35 बजे तक |
| गोधूलि बेला (संध्या) पूजा का मुहूर्त | शाम 06:40 बजे से 08:05 बजे तक |
| चंद्रोदय (Moonrise) का संभावित समय | रात्रि 08:55 बजे (स्थानीय समयानुसार भिन्न हो सकता है) |
(नोट: पूजा हमेशा शुभ चौघड़िया में करना अधिक फलदायी माना जाता है। चंद्रोदय के समय में आपके शहर के अनुसार 5-10 मिनट का अंतर हो सकता है।)
2. कजरी तीज को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को इसकी विशेषताओं और परंपराओं के कारण विभिन्न नामों से पुकारा जाता है:
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बड़ी तीज (Badi Teej): हरियाली तीज को ‘छोटी तीज’ कहा जाता है, जबकि भाद्रपद मास की इस तीज को ‘बड़ी तीज’ कहा जाता है।
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सातूड़ी तीज (Satudi Teej): राजस्थान और मारवाड़ क्षेत्र में इस दिन सत्तू (Sattu) बनाने और खाने की विशेष परंपरा है। जौ, गेहूं, चावल और चने के सत्तू बनाए जाते हैं। इसी कारण इसे ‘सातूड़ी तीज’ भी कहते हैं।
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कजली तीज (Kajali Teej): भादों के महीने में आसमान में छाने वाले काले कजरारे बादलों के कारण इसे कजली तीज का नाम दिया गया है।
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नीमड़ी तीज: इस दिन मुख्य रूप से नीम के पेड़ (नीमड़ी माता) की पूजा की जाती है, इसलिए इसे यह नाम भी दिया गया है।
3. कजरी तीज का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (Significance)
कजरी तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत का धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय महत्व अत्यंत गहरा है।
I. शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए 108 जन्म लिए थे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भाद्रपद कृष्ण तृतीया के दिन ही उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया था। इसलिए यह दिन पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है।
II. अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु
जो सुहागिन महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखकर माता पार्वती, भगवान शिव और नीमड़ी माता की पूजा करती हैं, उनके पति पर आने वाला हर संकट टल जाता है। माता पार्वती उन्हें अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं।
III. कुंवारी कन्याओं के लिए उत्तम वर की प्राप्ति
यह व्रत केवल सुहागिनें ही नहीं, बल्कि कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं। मान्यता है कि यदि विवाह योग्य कन्या इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करे, तो उसके विवाह में आ रही सभी अड़चनें दूर हो जाती हैं और उसे भगवान शिव के समान ही योग्य और प्रेम करने वाला वर प्राप्त होता है।
IV. सत्तू का वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक महत्व
इस व्रत में ‘सत्तू’ (Sattu) का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार, भादों के महीने में शरीर में पित्त (गर्मी) का प्रकोप बढ़ जाता है। सत्तू की तासीर ठंडी होती है, जो शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। पारण के समय सत्तू खाने से शरीर को तुरंत ऊर्जा (Energy) मिलती है।
4. कजरी तीज और हरियाली तीज में क्या अंतर है? (Difference Table)
अक्सर लोग छोटी तीज और बड़ी तीज को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। इन दोनों में मुख्य अंतर इस प्रकार है:
| विशेषता (Feature) | हरियाली तीज (छोटी तीज) | कजरी तीज (बड़ी/सातूड़ी तीज) |
| महीना (Month) | श्रावण (सावन) मास का शुक्ल पक्ष | भाद्रपद (भादों) मास का कृष्ण पक्ष |
| प्रतीक (Symbolism) | हरियाली, प्रकृति का उल्लास और सावन के झूले | काले बादल, सत्तू, और नीमड़ी माता की पूजा |
| मुख्य पूजा | शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा | शिव-पार्वती के साथ नीम के पेड़ (नीमड़ी माता) की पूजा |
| व्रत का पारण | बिना चंद्रमा देखे पारण किया जा सकता है | चंद्र दर्शन (चंद्रमा को अर्घ्य देने) के बाद ही व्रत खोला जाता है |
| मुख्य प्रसाद | घेवर, मालपुआ | विभिन्न प्रकार के सत्तू (Sattu) (जौ, गेहूं, चावल, चने के) |
5. कजरी तीज (सातूड़ी तीज) की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
कजरी तीज की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय (गोधूलि बेला में) की जाती है। इस पूजा में ‘नीमड़ी माता’ (नीम के पेड़) का विशेष महत्व है। यदि आप घर पर पूजा कर रही हैं, तो इस विधि का पालन करें:
पूजा की आवश्यक सामग्री (Puja Samagri)
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मिट्टी, गाय का गोबर
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नीम की एक छोटी टहनी (नीमड़ी माता के रूप में)
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जल का कलश, कच्चा दूध
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रोली, मोली (कलावा), हल्दी, मेहंदी, काजल, सिंदूर
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अक्षत (चावल), सत्तू, घी, गुड़, फल, नींबू, ककड़ी
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सुहाग का सामान (चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर आदि)
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दीपक, कपूर, अगरबत्ती
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परावर्तक (Reflection) देखने के लिए जल और दूध से भरा एक बर्तन
पूजा की विस्तृत प्रक्रिया (The Puja Process)
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स्थान का चुनाव और तालाब बनाना:
घर के आंगन में या किसी खुले स्थान (बालकनी) पर गाय के गोबर या मिट्टी से एक छोटा सा प्रतीकात्मक तालाब (पाल) बनाएं।
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नीमड़ी माता की स्थापना:
उस तालाब के किनारे मिट्टी से एक छोटी सी दीवार बनाएं और उसमें नीम की एक टहनी गाड़ दें। इसे ही ‘नीमड़ी माता’ कहा जाता है।
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तालाब में जल और दूध डालना:
पूजा शुरू करने से पहले उस प्रतीकात्मक तालाब में कच्चा दूध और शुद्ध जल भर दें।
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नीमड़ी माता का श्रृंगार और पूजा:
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नीमड़ी माता को जल और कच्चे दूध के छींटे देकर स्नान कराएं।
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इसके बाद उन्हें रोली, हल्दी और मेहंदी का तिलक लगाएं।
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माता को मोली (लाल धागा) और सुहाग का सारा सामान (चुनरी, चूड़ियां, बिंदी) अर्पित करें।
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इसके बाद माता को फल (विशेषकर ककड़ी और नींबू) और सत्तू का भोग लगाएं।
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जल में परछाई (Reflection) देखना (सबसे महत्वपूर्ण विधान):
कजरी तीज की पूजा का यह सबसे अनूठा हिस्सा है। तालाब में जो दूध और जल भरा गया है, उसमें सुहागिन महिलाएं निम्नलिखित चीजों की परछाई (Reflection) देखती हैं:
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सबसे पहले जल में एक नींबू की परछाई देखें।
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फिर ककड़ी की परछाई देखें।
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इसके बाद नीम की टहनी (नीमड़ी माता) की परछाई देखें।
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अंत में अपनी ओढ़नी/पल्लू या सुहाग के गहनों की परछाई देखें।
(मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में आने वाली हर बुरी नजर और संकट उस जल में समा जाता है और सुहाग सुरक्षित रहता है।)
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कथा श्रवण:
परछाई देखने के बाद, हाथ में थोड़े से अक्षत (चावल) और सत्तू लेकर कजरी तीज की कथा सुनें (कथा नीचे दी गई है)।
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चंद्र दर्शन और अर्घ्य (Moon Sighting):
कजरी तीज का व्रत करवा चौथ की तरह चंद्रमा को देखकर खोला जाता है। रात को जब चंद्रमा उदय हो जाए, तो चंद्र देव को रोली, अक्षत, और जल का अर्घ्य दें। चंद्र देव से अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें।
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व्रत का पारण:
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथ से जल पीकर और सत्तू खाकर ही व्रत का पारण (Fast break) करें।
6. कजरी तीज व्रत के कड़े नियम और सावधानियां (Strict Rules of the Vrat)
कजरी तीज का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए महिलाओं को निम्नलिखित नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:
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निर्जला व्रत: कजरी तीज का व्रत मुख्य रूप से निर्जला (बिना अन्न और जल के) रखा जाता है। गर्भवती महिलाएं या बीमार महिलाएं फलाहार कर सकती हैं, लेकिन स्वस्थ महिलाओं को निर्जला व्रत ही रखना चाहिए।
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काले और सफेद वस्त्रों का निषेध: पूजा के समय या व्रत के दिन सुहागिन महिलाओं को काले, नीले या पूर्णतः सफेद वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। इस दिन लाल, हरा, पीला या गुलाबी रंग पहनना सबसे शुभ माना जाता है।
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सोलह श्रृंगार: व्रत करने वाली महिलाओं को इस दिन सोलह श्रृंगार अवश्य करना चाहिए। हाथों में मेहंदी, पैरों में आलता और मांग में सिंदूर लगाना अनिवार्य है।
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क्रोध और विवाद से बचें: व्रत के दिन मन को पूरी तरह शांत और सात्विक रखना चाहिए। पति से विवाद करना, किसी की चुगली करना या क्रोध करने से व्रत का फल नष्ट हो जाता है।
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सत्तू का पारण: व्रत हमेशा सत्तू खाकर ही खोला जाता है। पारण के भोजन में लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक वस्तु का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
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बड़ों का आशीर्वाद: पूजा और पारण के पश्चात अपनी सास या घर की बुजुर्ग महिलाओं को सत्तू, फल और सुहाग का सामान (बायना) देकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद अवश्य लें।
7. कजरी तीज की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)
किसी भी व्रत का पूर्ण फल उसकी कथा को सुने बिना नहीं मिलता। कजरी तीज की सबसे प्रसिद्ध और प्रचलित कथा इस प्रकार है:
गरीब ब्राह्मण और सत्तू की कथा:
प्राचीन काल में एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण और उसकी पत्नी (ब्राह्मणी) रहते थे। वे इतने गरीब थे कि कई बार उन्हें भूखे ही सोना पड़ता था, लेकिन ब्राह्मणी भगवान शिव और माता पार्वती की परम भक्त थी।
भाद्रपद मास की तृतीया तिथि आने वाली थी। ब्राह्मणी ने अपने पति से कहा, “स्वामी, कल कजरी तीज है। मैंने माता पार्वती और नीमड़ी माता का व्रत रखा है। पूजा और पारण के लिए मुझे किसी भी कीमत पर चने का सत्तू चाहिए। कृपया आप कहीं से सत्तू का प्रबंध कर दें।”
ब्राह्मण अत्यंत उदास हो गया। उसने कहा, “मैं इतना गरीब हूँ, मेरे पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। मैं सत्तू कैसे लाऊं?” ब्राह्मणी ने दृढ़ता से कहा, “मुझे नहीं पता, आप चाहे जहां से लाएं, मुझे मेरे व्रत के लिए सत्तू चाहिए।”
रात का समय था। ब्राह्मण सत्तू की तलाश में निकला। कोई चारा न देख वह गांव के सेठ की दुकान में चुपके से घुस गया। उसने वहां चने की दाल देखी, उसे पीसा और सत्तू बनाकर एक पोटली में बांधने लगा। खटपट की आवाज सुनकर सेठ के नौकर जाग गए। उन्होंने ब्राह्मण को पकड़ लिया और सेठ के सामने पेश किया।
सेठ ने क्रोधित होकर पूछा, “तू चोरी क्यों कर रहा था?” ब्राह्मण ने रोते हुए कहा, “हे सेठ! मैं चोर नहीं हूँ। मेरी पत्नी का कजरी तीज का व्रत है और उसके पारण के लिए मुझे सत्तू चाहिए था। मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने केवल सवा किलो सत्तू लिया है, इसके अलावा मैंने कुछ नहीं छुआ।”
सेठ ने जब ब्राह्मण की पोटली खोली तो उसमें वास्तव में केवल सत्तू ही था। सेठ ब्राह्मण की पत्नी की शिव-पार्वती के प्रति भक्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने ब्राह्मण से कहा, “आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्म की बहन है।” सेठ ने ब्राह्मण को आदर सहित बिठाया और उसे सत्तू के साथ-साथ कपड़े, गहने, फल और बहुत सा धन देकर विदा किया।
ब्राह्मण ने घर लौटकर अपनी पत्नी को सारी बात बताई। ब्राह्मणी ने उसी सत्तू से नीमड़ी माता की पूजा की और अपना व्रत खोला। माता पार्वती की कृपा से उनकी सारी दरिद्रता दूर हो गई और वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
कथा सुनने के बाद कहें: “हे नीमड़ी माता! जैसे आपने उस ब्राह्मणी की पुकार सुनी और उसकी दरिद्रता दूर कर सुहाग की रक्षा की, वैसे ही इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी के सुहाग की रक्षा करना।”
8. कजरी तीज के दिन किए जाने वाले विशेष उपाय (Special Remedies)
यदि आपके वैवाहिक जीवन में परेशानियां आ रही हैं, पति-पत्नी में अनबन रहती है, या विवाह में देरी हो रही है, तो कजरी तीज के दिन ये विशेष उपाय (Upay) अवश्य करें:
I. वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ाने के लिए
यदि पति-पत्नी के बीच अक्सर झगड़े होते हैं, तो कजरी तीज की शाम को माता पार्वती को 11 हल्दी की गांठें पीले धागे में बांधकर अर्पित करें। साथ ही शिव-पार्वती को लाल रंग के पुष्प (गुलाब या गुड़हल) चढ़ाएं। इससे वैवाहिक जीवन में मिठास लौट आती है।
II. कुंवारी कन्याओं के शीघ्र विवाह के लिए
जिन कन्याओं के विवाह में देरी हो रही है, उन्हें कजरी तीज के दिन निर्जला व्रत रखना चाहिए और शाम को भगवान शिव का कच्चे दूध और केसर से अभिषेक करना चाहिए। इसके पश्चात माता पार्वती को लाल चुनरी और सुहाग की सामग्री अर्पित करें। ऐसा करने से योग्य वर की प्राप्ति के योग शीघ्र बनते हैं।
III. धन और आर्थिक संकट दूर करने के लिए
दरिद्रता दूर करने और घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए कजरी तीज के दिन पूजा के समय एक लाल कपड़े में 5 कौड़ियां और 5 गोमती चक्र रखें। पूजा के बाद इस पोटली को अपनी तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रख दें। माता पार्वती और लक्ष्मी जी की कृपा से कभी धन की कमी नहीं होगी।
IV. पति की लंबी आयु और तरक्की के लिए
इस दिन नीमड़ी माता (नीम के पेड़) की जड़ में जल, दूध और थोड़ा सा गुड़ अर्पित करें। इसके बाद पेड़ की सात परिक्रमा (Rounds) करें और कच्चे सूत (सफेद धागे) को पेड़ के चारों ओर लपेटें। यह उपाय पति की तरक्की के बंद रास्ते खोलता है और उन्हें बुरी नजर से बचाता है।
9. कजरी तीज पर सत्तू (Sattu) का महत्व और इसे कैसे बनाएं?
कजरी तीज बिना सत्तू के अधूरी है। सत्तू केवल प्रसाद नहीं, बल्कि यह राजस्थानी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इस दिन सास अपनी बहू को सत्तू भेजती है, जिसे ‘सिंजारा’ भी कहा जाता है।
सत्तू कैसे बनाएं?
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सामग्री: इस दिन जौ, गेहूं, चावल और चने का सत्तू बनाया जाता है।
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विधि: सबसे पहले अनाज को भून लिया जाता है। फिर उसे चक्की में पीसकर पाउडर (सत्तू) बनाया जाता है।
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तैयारी: इस पाउडर में गाय का शुद्ध घी, पिसी हुई चीनी (बूरा) या गुड़, और सूखे मेवे (Dry fruits) मिलाए जाते हैं।
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पिंड बनाना: घी के कारण यह मिश्रण आसानी से बंध जाता है। इसे एक गोल आकार (पिंड/लड्डू) दिया जाता है। इसे चांदी के वर्क और बादाम-पिस्ते से सजाया जाता है।
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रात को चंद्र दर्शन के बाद व्रत करने वाली महिला इसी सत्तू से एक टुकड़ा तोड़कर अपना व्रत खोलती है।
Kajari Teej 2026 केवल एक व्रत नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के बीच समर्पण, त्याग और अटूट प्रेम का सबसे सुंदर प्रकटीकरण है। 31 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार माता पार्वती ने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त किया था, उसी प्रकार सच्चे प्रेम और निष्ठा से हर वैवाहिक रिश्ते को मजबूत बनाया जा सकता है।
इस वर्ष कजरी तीज पर आप भी पूर्ण श्रद्धा और कड़े नियमों का पालन करते हुए नीमड़ी माता और शिव-पार्वती की पूजा करें। सत्तू का भोग लगाएं और चंद्र देव को अर्घ्य देकर अपने सुहाग की लंबी आयु की प्रार्थना करें। भगवान शिव और माता गौरी आपके वैवाहिक जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार प्रेम से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।
“बोलो उमापति महादेव की जय! नीमड़ी माता की जय!”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Kajari Teej 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में कजरी तीज (Kajari Teej) किस तारीख को मनाई जाएगी?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का उदय होने के कारण कजरी तीज का पावन पर्व 31 अगस्त 2026, सोमवार के दिन मनाया जाएगा।
प्रश्न 2: कजरी तीज को ‘सातूड़ी तीज’ (Satudi Teej) क्यों कहा जाता है?
उत्तर: राजस्थान और मारवाड़ क्षेत्र में कजरी तीज के दिन चने, जौ, गेहूं और चावल का ‘सत्तू’ (Sattu) बनाने, पूजा में माता को चढ़ाने और उसी सत्तू को खाकर व्रत खोलने की प्राचीन परंपरा है। सत्तू की इस विशेष प्रधानता के कारण ही इसे ‘सातूड़ी तीज’ कहा जाता है।
प्रश्न 3: कजरी तीज के व्रत में नीम के पेड़ (नीमड़ी माता) की पूजा क्यों की जाती है?
उत्तर: मान्यता है कि कजरी तीज के दिन नीम के पेड़ में साक्षात माता पार्वती का वास होता है, जिन्हें ‘नीमड़ी माता’ कहा जाता है। नीम का पेड़ आरोग्यता, पवित्रता और शीतलता का प्रतीक है। नीमड़ी माता की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में आने वाली नकारात्मकता और बीमारियां दूर होती हैं, और पति को लंबी आयु प्राप्त होती है।
प्रश्न 4: क्या कजरी तीज के व्रत में पानी पी सकते हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से कजरी तीज का व्रत ‘निर्जला’ (बिना अन्न और जल के) रखा जाता है। सुहागिन महिलाएं पूरा दिन पानी नहीं पीती हैं और रात को चंद्र दर्शन (चंद्रमा को अर्घ्य देने) के बाद ही जल और सत्तू ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। हालांकि, गर्भवती, बीमार या बुजुर्ग महिलाएं फलाहार कर सकती हैं या जल ग्रहण कर सकती हैं।
प्रश्न 5: कजरी तीज के दिन जल में परछाई देखने की रस्म क्यों की जाती है?
उत्तर: पूजा के दौरान एक बर्तन में जल और दूध मिलाकर उसमें नींबू, ककड़ी, नीम की टहनी और अंत में अपने गहनों या पल्लू की परछाई (Reflection) देखी जाती है। इसके पीछे तांत्रिक और धार्मिक मान्यता यह है कि ऐसा करने से महिला के सुहाग पर लगी कोई भी बुरी नजर, संकट या नकारात्मक ऊर्जा उस जल में उतर जाती है और उसका वैवाहिक जीवन सुरक्षित हो जाता है।