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Yajurveda Upakarma 2026: यजुर्वेद उपाकर्म कब है? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्वIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म और वैदिक परंपराओं में वेदों का अध्ययन, मन-वचन की शुद्धता और नियमों का पालन सर्वोच्च माना गया है। प्राचीन काल से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग (द्विज) द्वारा ‘यज्ञोपवीत’ (जनेऊ) धारण करने की एक परम पवित्र परंपरा रही है। जनेऊ केवल सूत का एक साधारण धागा नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक तेज, संयम, संस्कार और वेदों के प्रति हमारे अटूट समर्पण का प्रतीक है। हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के आस-पास इस पवित्र धागे को बदलने, पुराने पापों का प्रायश्चित करने और वेदों के अध्ययन को पुनः प्रारंभ करने के लिए एक महा-अनुष्ठान किया जाता है, जिसे ‘उपाकर्म’ (Upakarma) कहा जाता है।

जानें श्रावण मास के इस वैदिक पर्व की तिथि, पूजा विधि और ब्राह्मण परंपरा का महत्व

चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) के अनुयायियों के लिए उपाकर्म की तिथियां पंचांग की गणनाओं के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं। इनमें से ‘यजुर्वेद उपाकर्म’ (Yajurveda Upakarma) का विशेष महत्व है, जिसे दक्षिण भारत में ‘अवनि अवित्तम’ (Avani Avittam) और उत्तर भारत में ‘श्रावणी पर्व’ के नाम से जाना जाता है।

यदि आप भी यजुर्वेद की किसी शाखा के अनुयायी हैं और जानना चाहते हैं कि यजुर्वेद उपाकर्म कब है और इसका क्या महत्व है? तथा वर्ष 2026 में इस वैदिक पर्व की तिथि, शुभ मुहूर्त, नया जनेऊ धारण करने की सही पूजा विधि, संकल्प के नियम और ब्राह्मण परंपरा से जुड़ी आवश्यक सावधानियां क्या हैं, तो यह अत्यंत विस्तृत और शोधपरक लेख विशेष रूप से आपके लिए ही है।

वर्ष 2026 में यजुर्वेद उपाकर्म कब है? (Yajurveda Upakarma 2026 Date & Muhurat)

यजुर्वेदियों का उपाकर्म हमेशा श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, विशेषकर जब पूर्णिमा तिथि पर ‘श्रवण’ या ‘धनिष्ठा’ (अवित्तम) नक्षत्र का शुभ प्रभाव होता है।

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह 09:08 बजे से प्रारंभ होकर 28 अगस्त की सुबह 09:48 बजे तक रहेगी। चूँकि यजुर्वेद उपाकर्म के लिए पूर्णिमा तिथि का दिन का समय (मध्याह्न या संगव काल) अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, इसलिए वर्ष 2026 में यजुर्वेद उपाकर्म 27 अगस्त 2026, गुरुवार को संपन्न किया जाएगा। इसके ठीक अगले दिन, यानी 28 अगस्त (शुक्रवार) को रक्षाबंधन, श्रावणी पूर्णिमा और ‘गायत्री जपम’ का महान अनुष्ठान होगा।

यजुर्वेद उपाकर्म 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका

पर्व / विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time)
यजुर्वेद उपाकर्म 2026 की मुख्य तिथि 27 अगस्त 2026 (गुरुवार)
श्रावण पूर्णिमा तिथि का आरंभ 27 अगस्त 2026, प्रातः 09:08 बजे से
श्रावण पूर्णिमा तिथि की समाप्ति 28 अगस्त 2026, प्रातः 09:48 बजे तक
उपाकर्म (जनेऊ बदलने) का श्रेष्ठ मुहूर्त 27 अगस्त, सुबह 06:30 बजे से 09:30 बजे तक
अवनि अवित्तम (तमिलनाडु और दक्षिण भारत में) 27 अगस्त 2026
गायत्री जपम (Gayatri Japam) 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार)

(नोट: सूर्योदय और आपकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार पंचांग के मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है, लेकिन यजुर्वेदियों का मुख्य उपाकर्म अनुष्ठान 27 अगस्त की सुबह ही किया जाएगा।)

यजुर्वेद उपाकर्म क्या है? (What is Yajurveda Upakarma?)

‘उपाकर्म’ संस्कृत भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘उप’ (जिसका अर्थ है समीप या आरंभ) और ‘कर्म’ (जिसका अर्थ है कार्य या वेदों का पवित्र अध्ययन)। प्राचीन गुरुकुल परंपरा में, श्रावण मास की पूर्णिमा से ब्राह्मण और ऋषि-मुनि अपने वेदों के अध्ययन का एक नया सत्र (New Academic Year of Vedas) शुरू करते थे, जिसे ‘उपाकर्म’ कहा जाता था। छह महीने बाद माघ मास में इसका समापन होता था, जिसे ‘उत्सर्जन’ कहते थे।

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यजुर्वेद भारत का वह वेद है जिसमें यज्ञों की संपूर्ण प्रक्रियाओं, कर्मकांडों और आहुतियों के मंत्रों का विस्तृत वर्णन है। जो ब्राह्मण या द्विज यजुर्वेद की शाखाओं (जैसे कृष्ण यजुर्वेद या शुक्ल यजुर्वेद) का पालन करते हैं, वे श्रावण मास की पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अपने पुराने जनेऊ को त्याग कर पूरे विधि-विधान से नया जनेऊ धारण करते हैं, इसी पवित्र वैदिक कर्म को ‘यजुर्वेद उपाकर्म’ कहा जाता है।

तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में इस पर्व को ‘अवनि अवित्तम’ (Avani Avittam) कहा जाता है, क्योंकि यह तमिल महीने ‘अवनि’ और ‘अवित्तम’ (धनिष्ठा) नक्षत्र के शुभ योग में आता है।

यजुर्वेद उपाकर्म का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of the Festival)

यजुर्वेद उपाकर्म मात्र धागा बदलने की एक वार्षिक रस्म नहीं है; यह एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और प्रायश्चित अनुष्ठान है। ब्राह्मण परंपरा में इस दिन का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है:

1. पापों का प्रायश्चित (Atonement of Sins – Kamokarshit Japam)

पूरे वर्ष भर जीवन जीते हुए मनुष्य से जाने-अनजाने में कई पाप होते हैं, जैसे अशुद्ध भोजन ग्रहण करना, क्रोध करना, असत्य बोलना या वैदिक नियमों का उल्लंघन करना। उपाकर्म के दिन ब्राह्मण ‘कामोकार्षीन्मन्युरकार्षीत्’ (Kamokarshit Manyurakarshit) नामक महामंत्र का जाप करते हैं। इस मंत्र का अर्थ है— “मैंने काम (लौकिक इच्छा) और क्रोध के वश में होकर जो भी पाप किए हैं, मैं उन सभी के लिए ईश्वर से क्षमा मांगता हूँ।” यह एक तरह का आध्यात्मिक शुद्धिकरण (Spiritual Cleansing) है, जो मन को निर्मल कर देता है।

2. ऋषियों के प्रति कृतज्ञता (Rishi Tarpanam)

हमारे सनातन धर्म, वेदों और ज्ञान की रक्षा उन महान ऋषियों ने की है जिन्होंने जंगलों में रहकर कठोर तपस्या की (जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, अत्रि, और कश्यप)। उपाकर्म के दिन ‘ऋषि तर्पण’ किया जाता है। जल और काले तिल (या अक्षत) के माध्यम से उन महान गुरुओं और सप्त-ऋषियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। यह उन्हें यह बताने का माध्यम है कि हम उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को आगे बढ़ाएंगे।

3. वेदों के अध्ययन का पुनरारंभ (Restarting Vedic Studies)

आधुनिक युग की भागदौड़ में लोग वेदों और उपनिषदों के नियमित अध्ययन से दूर हो गए हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि एक ‘द्विज’ होने के नाते हमारा मूल कर्तव्य वेदों का ज्ञान प्राप्त करना और उसे आचरण में उतारना है। नया जनेऊ धारण करते समय हम ईश्वर से वेदों को पढ़ने, समझने और उन्हें अपने जीवन में लागू करने की नई ऊर्जा मांगते हैं।

4. यज्ञोपवीत (जनेऊ) की पवित्रता को पुनर्स्थापित करना

यज्ञोपवीत (जनेऊ) के पुराने हो जाने, टूट जाने या दैनिक जीवन में अशुद्ध हो जाने पर इसके आध्यात्मिक प्रभाव और ऊर्जा कम हो जाते हैं। उपाकर्म के दिन वैदिक मंत्रों द्वारा नए जनेऊ को अभिमंत्रित कर धारण किया जाता है, जिससे साधक के भीतर एक नया दिव्य तेज (Aura) उत्पन्न होता है, जो उसे नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित रखता है।

यजुर्वेद उपाकर्म की संपूर्ण पूजा और अनुष्ठान विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

यजुर्वेद उपाकर्म की प्रक्रिया बहुत ही विस्तृत, पवित्र और वैदिक नियमों से बंधी होती है। इसे किसी योग्य पुरोहित या गुरु के निर्देशन में समूह (Group) में किया जाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसकी मुख्य प्रक्रिया इस प्रकार है:

1. प्रातःकालीन स्नान और संकल्प (Snanam and Sankalpam)

सूर्योदय से पूर्व उठकर नदी, सरोवर या घर में ही पवित्र तीर्थों का आवाहन कर स्नान किया जाता है। इसके बाद स्वच्छ धोती (पंचा) धारण की जाती है। शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई सिला हुआ वस्त्र नहीं होना चाहिए। फिर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर आचमन किया जाता है और उपाकर्म का ‘महा-संकल्प’ लिया जाता है— “मैं अपने समस्त पापों के क्षय, अपनी आत्मा की शुद्धि और वेदों के ज्ञान की प्राप्ति के लिए यह उपाकर्म अनुष्ठान कर रहा हूँ।”

2. कामोकार्षीत जपम (Kamokarshit Japam)

यह प्रायश्चित का मुख्य मंत्र है। ब्राह्मण अपने दोनों हाथों को जोड़कर 108 बार या 1008 बार “कामोकार्षीन्मन्युरकार्षीन् नमो नमः” मंत्र का जाप करते हैं। इस जाप से वर्ष भर के पाप भस्म हो जाते हैं। जाप के बाद फिर से स्नान (या जल का मार्जन) किया जाता है।

3. महा संकल्प और देव-ऋषि-पितृ तर्पण (Tarpanam)

स्नान के बाद नया यज्ञोपवीत धारण करने का महा-संकल्प लिया जाता है। जनेऊ धारण करने से पहले ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नवग्रहों, और विशेषकर वेदों के रचयिता सप्त ऋषियों (व्यास, पराशर आदि) को जल से तर्पण दिया जाता है। जिनके पिता जीवित नहीं हैं, वे इस दिन अपने पितरों (Ancestors) को भी तर्पण देते हैं ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो।

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4. नया यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करना (Yajnopavitam Dharanam)

यह उपाकर्म का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। नए जनेऊ को कुमकुम, हल्दी और चंदन लगाकर पवित्र किया जाता है। फिर दोनों हाथों से जनेऊ को पकड़कर, सूर्य देव के दर्शन करते हुए निम्नलिखित सिद्ध वैदिक मंत्र का पूर्ण स्वर में उच्चारण कर नया जनेऊ धारण किया जाता है:

यज्ञोपवीत धारण मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

(अर्थ: यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है, जो प्रजापति (ब्रह्मा जी) के साथ ही उत्पन्न हुआ था। यह आयु, तेज, बल और पवित्रता प्रदान करने वाला है, मैं इस शुभ्र (सफेद) यज्ञोपवीत को धारण करता हूँ।)

5. पुराना जनेऊ उतारना (Yajnopavitam Visarjanam)

नया जनेऊ धारण करने के बाद, पुराने जनेऊ को शरीर से उतारने का भी एक विशिष्ट मंत्र और नियम होता है:

यज्ञोपवीत विसर्जन मंत्र:

एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।

जीर्णत्वात्ते परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्॥

(अर्थ: हे पवित्र सूत्र! इतने दिनों तक मैंने तुम्हें धारण किया और तुमने मेरी रक्षा की। अब जीर्ण (पुराने) हो जाने के कारण मैं तुम्हें त्याग रहा हूँ, तुम यथा सुख जाओ।)

पुराने जनेऊ को पैरों से नहीं छूना चाहिए। इसे सिर के ऊपर से निकालकर किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है या किसी पवित्र पेड़ (पीपल/तुलसी/बरगद) के नीचे रख दिया जाता है।

6. वेदारंभ (Vedarambham)

अंत में गुरु या पुरोहित द्वारा यजुर्वेद के कुछ चुनिंदा मंत्रों (जैसे तैत्तिरीय उपनिषद, रुद्राध्याय या पुरुष सूक्त) का पाठ किया जाता है और सभी शिष्य उसे दोहराते हैं। इसके साथ ही उपाकर्म का अनुष्ठान पूर्ण होता है और वेदों के अध्ययन का नया सत्र शुरू हो जाता है।

यज्ञोपवीत (जनेऊ) का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य (Scientific & Spiritual Importance of Janeu)

जनेऊ केवल सूत का धागा नहीं है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा विज्ञान, एक्यूप्रेशर और अध्यात्म काम करता है:

  • तीन सूत्र (Three Strands): जनेऊ में मुख्य रूप से 3 धागे होते हैं, जो ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन) और शिव (संहार) के प्रतीक हैं। यह सत्व, रज और तम— तीनों गुणों, और देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण का भी प्रतीक है।

  • नौ तार (Nine Threads): इन 3 धागों में से प्रत्येक धागा 3-3 बारीक तारों से मिलकर बना होता है। कुल 9 तार शरीर के नौ द्वारों (दो आंख, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुंह, और दो मल-मूत्र के द्वार) को संयमित और पवित्र रखने का प्रतीक हैं।

  • ब्रह्म ग्रंथि (Brahma Knot): जनेऊ में जो गांठ लगाई जाती है, उसे ‘ब्रह्म ग्रंथि’ कहते हैं। यह गांठ याद दिलाती है कि मनुष्य को अपने जीवन में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों को एक साथ बांध कर रखना है।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Acupressure Science): मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को दाहिने कान पर लपेटा जाता है। कान की नसें सीधे पेट और आंतों (Intestines) से जुड़ी होती हैं। कान पर जनेऊ लपेटने से कान की नसों पर दबाव (Acupressure) पड़ता है, जिससे पेट पूरी तरह साफ होता है और कब्ज, हर्निया व प्रोस्टेट जैसी बीमारियों से बचाव होता है। यह रक्तचाप (Blood Pressure) को भी नियंत्रित रखता है और स्मरण शक्ति बढ़ाता है।

गायत्री जपम: उपाकर्म का अगला दिन (Gayatri Japam on 28 August 2026)

यजुर्वेद उपाकर्म (27 अगस्त 2026) के ठीक अगले दिन, यानी 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को ब्राह्मणों द्वारा ‘गायत्री जपम’ (Gayatri Japam) का महान अनुष्ठान किया जाएगा।

  • क्या है गायत्री जपम? उपाकर्म के दिन वेदों के अध्ययन का आरंभ होता है और पुराने पापों का प्रायश्चित किया जाता है। एक बार शरीर और आत्मा शुद्ध हो जाने के बाद, उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से भरने के लिए ठीक अगले दिन साधक वेदमाता गायत्री का महा-जाप करते हैं।

  • जाप की विधि: इस दिन प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में स्नान कर, नया जनेऊ धारण किए हुए व्यक्ति एक ही आसन पर बैठकर 1008 बार (अथवा समयाभाव में कम से कम 108 बार) गायत्री मंत्र का मानसिक जाप करता है।

“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥”

यह वैदिक जाप साधक के ‘आज्ञा चक्र’ (Third Eye) को जागृत करता है, बुद्धि को प्रखर बनाता है और उसे असाधारण बौद्धिक क्षमता, तेज और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।

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यजुर्वेद उपाकर्म के कड़े नियम और सावधानियां (Rules & Guidelines for Brahmins)

उपाकर्म एक परम सात्विक और ऊर्जावान अनुष्ठान है, इसलिए इसका पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों को कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  1. पूर्ण सात्विकता: उपाकर्म के एक दिन पूर्व से ही घर में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का पूर्णतः निषेध होना चाहिए। सादा और सात्विक भोजन (बिना अधिक मसालों का) ही ग्रहण करें।

  2. ब्रह्मचर्य का पालन: शारीरिक, मानसिक और वैचारिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना इस अनुष्ठान की पहली शर्त है। कामुक विचार पूजा के तपोबल को नष्ट कर देते हैं।

  3. क्षौर कर्म (बाल और नाखून काटना): उपाकर्म से एक दिन पहले (बुधवार को) ही क्षौर कर्म (बाल, दाढ़ी और नाखून काटना) कर लेना चाहिए। उपाकर्म के दिन शरीर के बाल या नाखून काटना सर्वथा वर्जित है।

  4. जनेऊ का सम्मान और रक्षा: नया जनेऊ धारण करने के बाद उसकी पवित्रता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। यदि जनेऊ गलती से टूट जाए, या घर में जन्म-मरण (सूतक-पातक) हो जाए, तो जनेऊ को तुरंत बदल लेना चाहिए। अशुद्ध जनेऊ पहनने से दोष लगता है।

  5. महिलाओं का योगदान: यद्यपि उपाकर्म अनुष्ठान मुख्य रूप से पुरुषों (द्विजों) द्वारा किया जाता है, लेकिन घर की महिलाएं इस दिन घर को गंगाजल से पवित्र करती हैं, सात्विक भोजन (जैसे खीर, सत्तू, या दाल-चावल) बनाती हैं और अपने पति या पुत्र के अनुष्ठान में सहयोग करती हैं। इसी दिन कई जगह बहनें अपने भाइयों को राखी भी बांधती हैं, क्योंकि रक्षाबंधन और अवनि अवित्तम (उपाकर्म) लगभग साथ-साथ चलते हैं।

Yajurveda Upakarma 2026 केवल एक धार्मिक कर्मकांड या पुरानी परंपरा नहीं है; यह मनुष्य को उसकी जड़ों (Roots), उसके वैदिक ज्ञान, उसकी अंतरात्मा और उसके कर्तव्यों (Duties) की याद दिलाने वाला एक महा-उत्सव है। 27 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन पर्व हमें अवसर देता है कि हम अपने जीवन की बुराइयों, क्रोध और पापों का प्रायश्चित करें और एक नए, पवित्र और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत करें।

जनेऊ का वह साधारण सा दिखने वाला धागा वास्तव में ऋषियों का वह अमोघ कवच है, जो मनुष्य को हर प्रकार के अधर्म, रोगों और पतन से बचाता है। इस वर्ष आप भी पूरे विधि-विधान से किसी योग्य ब्राह्मण या गुरु के सानिध्य में यजुर्वेद उपाकर्म करें, नया यज्ञोपवीत धारण करें और अगले दिन (28 अगस्त) 1008 बार गायत्री मंत्र का जाप कर अपने जीवन को सार्थक, तेजस्वी और ऊर्जावान बनाएं।

“ॐ वेदपुरुषाय नमः”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Yajurveda Upakarma 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में यजुर्वेद उपाकर्म (Yajurveda Upakarma) किस तारीख को मनाया जाएगा?

उत्तर: वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में यजुर्वेद उपाकर्म का पावन अनुष्ठान 27 अगस्त 2026, गुरुवार के दिन किया जाएगा। इसके ठीक अगले दिन, 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) और गायत्री जपम का अनुष्ठान होगा।

प्रश्न 2: अवनि अवित्तम (Avani Avittam) और उपाकर्म में क्या अंतर है?

उत्तर: अवनि अवित्तम और उपाकर्म दोनों एक ही अनुष्ठान के दो नाम हैं। दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में इसे ‘अवनि अवित्तम’ कहा जाता है क्योंकि यह पर्व हमेशा तमिल महीने ‘अवनि’ में और ‘अवित्तम’ (धनिष्ठा) नक्षत्र के योग में आता है। उत्तर भारत में इसी पर्व को श्रावणी पर्व या उपाकर्म कहा जाता है।

प्रश्न 3: नया जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

उत्तर: नया जनेऊ धारण करते समय सूर्य देव का दर्शन करते हुए यह पवित्र मंत्र बोलना चाहिए: “ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥” यह मंत्र जनेऊ को अभिमंत्रित कर साधक में आयु, बल और दिव्य तेज का संचार करता है।

प्रश्न 4: गायत्री जपम उपाकर्म के अगले दिन ही क्यों किया जाता है?

उत्तर: उपाकर्म के दिन कामोकार्षीत जप के माध्यम से पुराने पापों का प्रायश्चित किया जाता है और वेदों के अध्ययन का संकल्प लेकर नया जनेऊ धारण किया जाता है। एक बार जब शरीर, मन और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं, तो उस शुद्ध अंतःकरण को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से भरने के लिए ठीक अगले दिन वेदमाता का महा-मंत्र (गायत्री मंत्र) 1008 बार जपा जाता है।

प्रश्न 5: यदि उपाकर्म के दिन किसी कारणवश नया जनेऊ न पहन पाएं, तो क्या करें?

उत्तर: यदि आप स्वास्थ्य संबंधी समस्या, सूतक-पातक (परिवार में जन्म या मृत्यु) या किसी अन्य अपरिहार्य कारणवश मुख्य उपाकर्म के दिन (27 अगस्त 2026) नया जनेऊ धारण नहीं कर पाते हैं, तो भाद्रपद (भादों) महीने की पूर्णिमा को, या किसी भी शुभ दिन अपने गुरु/पुरोहित से संकल्प कराकर, प्रायश्चित मंत्र का जाप करने के बाद नया जनेऊ धारण कर सकते हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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