सनातन हिंदू धर्म में प्रकृति, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों को देवतुल्य माना गया है। हमारी संस्कृति में पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के कई पर्व हैं, जिनमें ‘गौ माता’ (गाय) का स्थान सबसे ऊंचा है। वेदों और पुराणों के अनुसार, गौ माता के शरीर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। गौ माता और उनके बछड़े (नवजात शिशु) के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने तथा अपनी संतान की लंबी आयु व खुशहाली की कामना के लिए जो सबसे पवित्र व्रत रखा जाता है, उसे ‘गोवत्स द्वादशी’ (Govatsa Dwadashi) कहा जाता है।
गोवत्स द्वादशी को भारत के अलग-अलग राज्यों में वसु बारस (Vasu Baras), बाघ बारस (Vagh Baras), बछ बारस (Bach Baras) और नंदिनी व्रत (Nandini Vrat) के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत कई स्थानों पर धनतेरस से एक दिन पहले इसी गोवत्स द्वादशी के साथ हो जाती है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति के लिए गाय और उसके बछड़े की विधि-विधान से पूजा करती हैं।
यदि आप भी यह जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी कब है (Govatsa Dwadashi 2026 Date), इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की शास्त्र-सम्मत विधि क्या होनी चाहिए, इस व्रत के क्या कड़े नियम हैं और अपनी संतान के उत्तम भविष्य के लिए कौन से उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत, शोधपरक और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।
1. वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी कब है? (Govatsa Dwadashi 2026 Date & Time)
भारत में गोवत्स द्वादशी मुख्य रूप से दो अलग-अलग महीनों में मनाई जाती है, जो क्षेत्रों की मान्यताओं पर निर्भर करता है:
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कार्तिक मास की गोवत्स द्वादशी (वसु बारस): यह दीपावली (धनतेरस) से ठीक एक दिन पहले आती है। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में इसे वसु बारस के रूप में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
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भाद्रपद मास की गोवत्स द्वादशी (बछ बारस): यह श्री कृष्ण जन्माष्टमी के चार दिन बाद आती है, जिसे मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत में मनाया जाता है। (वर्ष 2026 में यह 8 सितंबर को है)।
चूंकि संपूर्ण भारत में दीपावली के समय आने वाली ‘कार्तिक कृष्ण द्वादशी’ को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है, इसलिए हम यहाँ दीपावली के पूर्व आने वाली गोवत्स द्वादशी (Vasu Baras) की तिथियों की चर्चा कर रहे हैं।
वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में कार्तिक मास की गोवत्स द्वादशी (वसु बारस) 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी का होता है, और गौ माता में भी लक्ष्मी का वास माना जाता है, इसलिए 2026 की यह गोवत्स द्वादशी अत्यंत मंगलकारी है।
गोवत्स द्वादशी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)
माताओं और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहाँ 6 नवंबर 2026 की गोवत्स द्वादशी पूजा के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:
| विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time 2026) |
| गोवत्स द्वादशी (वसु बारस) की तिथि | 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि का आरंभ | 5 नवंबर 2026, देर रात से |
| कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि की समाप्ति | 6 नवंबर 2026, रात्रि तक |
| गोधूलि बेला (शाम की पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त) | शाम 05:25 बजे से 06:50 बजे तक |
| प्रदोष काल मुहूर्त | शाम 05:25 बजे से रात्रि 08:05 बजे तक |
| मुख्य उद्देश्य | संतान की रक्षा, सुख-समृद्धि और गौ सेवा |
(नोट: गोवत्स द्वादशी की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय (गोधूलि बेला में) की जाती है, जब गायें जंगल से चरकर वापस अपने घर (गौशाला) लौटती हैं।)
2. गोवत्स द्वादशी क्या है और क्यों मनाई जाती है? (Significance of Govatsa Dwadashi)
‘गोवत्स’ दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘गो’ (गाय) और ‘वत्स’ (बछड़ा)। ‘द्वादशी’ हिंदू पंचांग की 12वीं तिथि है। यह दिन पूर्ण रूप से गौ माता और उनके नवजात बछड़े को समर्पित है। इस पर्व को मनाने के पीछे कई गहरे धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं:
I. संतान की रक्षा और दीर्घायु का पर्व (Protection of Children)
यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतानों (विशेषकर पुत्रों) की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उन्हें हर प्रकार के संकटों से बचाने के लिए रखती हैं। जिस प्रकार एक गौ माता अपने बछड़े से निस्वार्थ प्रेम करती है और उसकी रक्षा करती है, उसी प्रकार इस दिन माताएं गौ माता से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी संतानों पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और उन्हें सद्मार्ग पर चलाएं।
II. भगवान श्री कृष्ण और श्री राम से संबंध
भगवान श्री कृष्ण को गौ माता और बछड़ों से अत्यंत प्रेम था। उनके बचपन का अधिकांश समय गायों को चराते और उनके साथ खेलते हुए बीता था। इसलिए उन्हें ‘गोपाल’, ‘गोविंद’ और ‘माधव’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति गोवत्स द्वादशी के दिन गाय और बछड़े की पूजा करता है, उसे सीधे भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
III. समुद्र मंथन और कामधेनु की उत्पत्ति
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर का मंथन किया था, तो उसमें से 14 अनमोल रत्न निकले थे। उन रत्नों में से एक दिव्य ‘कामधेनु गाय’ (Kamadhenu) भी थीं। कामधेनु सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती हैं। गोवत्स द्वादशी का दिन कामधेनु और उनकी पुत्री नंदिनी के प्राकट्य और उनके पूजन का भी प्रतीक है।
IV. दीपावली के आगमन का सूचक (Beginning of Diwali Festivities)
गोवत्स द्वादशी के दिन से ही घरों में दीपावली की सजावट, रंगोली बनाना और दीप जलाना शुरू हो जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात में इस दिन महिलाएं अपने घर के आंगन में गाय के खुर (पैर के निशान) की रंगोली बनाती हैं, जो यह दर्शाता है कि गौ माता के रूप में साक्षात लक्ष्मी उनके घर में प्रवेश कर रही हैं।
3. गोवत्स द्वादशी (वसु बारस) व्रत के कड़े और अनूठे नियम (Rules of the Vrat)
गोवत्स द्वादशी का व्रत आम व्रतों से बिल्कुल अलग है। इसके नियम बहुत ही विशिष्ट, कठिन और प्रकृति के करीब होते हैं। व्रत करने वाली माताओं को इन नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है:
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गाय के दूध और उससे बनी चीजों का त्याग: यह गोवत्स द्वादशी का सबसे बड़ा नियम है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं गाय के दूध, दही, घी, छाछ या गाय के दूध से बनी किसी भी मिठाई (जैसे पेड़ा, बर्फी) का सेवन पूर्णतः नहीं करती हैं। इसका कारण यह है कि आज के दिन गाय के दूध पर केवल और केवल उसके बछड़े का ही अधिकार माना जाता है। महिलाएं इस दिन केवल भैंस या बकरी के दूध, दही और घी का ही उपयोग करती हैं।
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गेहूं और चावल का निषेध: कई क्षेत्रों में इस दिन गेहूं (Wheat) और चावल (Rice) का सेवन नहीं किया जाता है। भोजन में मुख्य रूप से बाजरा, मोठ, चने, ज्वार और मक्का का उपयोग किया जाता है।
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चाकू से कटी वस्तु का निषेध: कुछ परम्पराओं में (विशेषकर बछ बारस में) इस दिन चाकू, कैंची या किसी भी धारदार हथियार से कटी हुई कोई भी चीज़ नहीं खाई जाती है। जो भी पकाया जाता है, वह साबुत (Whole) पकाया जाता है।
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अंकुरित अन्न (Sprouts) का प्रयोग: गोवत्स द्वादशी के दिन साबुत अनाज (जैसे साबुत मूंग, मोठ और चने) को भिगोकर और अंकुरित करके खाया जाता है। कढ़ी (भैंस के छाछ से बनी) और बाजरे की रोटी इस दिन का मुख्य भोजन होती है।
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तवे का उपयोग न करना: कई परिवारों में इस दिन तवे पर रोटी नहीं सेंकी जाती, बल्कि भोजन उबालकर या कड़ाही में तलकर बनाया जाता है।
4. गोवत्स द्वादशी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
गोवत्स द्वादशी की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय (गोधूलि बेला) की जाती है। यदि आप शहर में रहते हैं और असली गाय नहीं मिल रही है, तो आप मिट्टी की गाय-बछड़े की पूजा कर सकते हैं। 6 नवंबर 2026 को इस पारंपरिक विधि से पूजा करें:
१. पूजा की तैयारी और सामग्री
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सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (सुहाग के रंग जैसे लाल, पीला, हरा या गुलाबी) धारण करें। दिन भर निर्जला या फलाहारी व्रत का संकल्प लें।
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पूजा के लिए सामग्री एकत्रित करें: रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत (बाजरा या ज्वार), मौली (कलावा), ताजे फूल, भीगे हुए अंकुरित चने-मोठ, गुड़, और भैंस का घी।
२. गौ माता और बछड़े की खोज
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इस दिन एक ऐसी गाय की खोज की जाती है जिसका नवजात या छोटा बछड़ा (Calf) उसके साथ हो।
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शाम के समय गौशाला (Goshala) जाकर या आस-पास के किसी स्थान पर जाकर यह पूजा संपन्न की जाती है।
३. मुख्य पूजा प्रक्रिया (गोधूलि बेला में)
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सबसे पहले गौ माता और बछड़े को शुद्ध जल से स्नान कराएं (या केवल जल का छींटा देकर पवित्र करें)।
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गाय और बछड़े दोनों के माथे पर हल्दी, कुमकुम और रोली का तिलक लगाएं।
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उनके सींगों (Horns) पर मौली (पवित्र धागा) या सूत बांधें और उन्हें पीले फूलों की माला पहनाएं।
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इसके बाद गौ माता की पीठ पर हाथ फेरें (इससे रक्तचाप और मानसिक तनाव कम होता है)।
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गौ माता और बछड़े को भीगे हुए अंकुरित चने, मोठ, बाजरा, हरा चारा और गुड़ अपने हाथों से खिलाएं।
४. घर पर पूजा (यदि असली गाय न मिले)
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यदि असली गाय न मिले, तो घर के आंगन में या पूजा कक्ष में एक पीढ़े पर साफ लाल कपड़ा बिछाएं।
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मिट्टी, पीतल या चांदी की गाय और बछड़े की मूर्ति स्थापित करें।
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मूर्ति का पंचामृत (भैंस के दूध से बना) से स्नान कराएं। तिलक करें, फूल चढ़ाएं और अंकुरित मूंग-मोठ व गुड़ का भोग लगाएं।
५. व्रत कथा और आरती
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पूजा स्थल पर बैठकर हाथ में भीगे हुए चने और मोठ लेकर गोवत्स द्वादशी की पौराणिक कथा (कथा नीचे दी गई है) पढ़ें या सुनें।
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कथा सुनने के बाद गौ माता की आरती उतारें (भैंस के घी का दीपक या कर्पूर जलाकर)।
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अंत में गौ माता के चरण स्पर्श करें, उस मिट्टी (गौधूली) को अपने माथे पर लगाएं और अपनी संतान की लंबी आयु व प्रगति की प्रार्थना करें।
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पूजा के पश्चात माताएं अपने बच्चों के माथे पर तिलक लगाती हैं और उन्हें आशीर्वाद देती हैं।
5. गोवत्स द्वादशी की पौराणिक व्रत कथाएं (The Pauranik Vrat Katha)
गोवत्स द्वादशी से जुड़ी मुख्य रूप से दो लोक और पौराणिक कथाएं अत्यंत प्रचलित हैं:
कथा 1: राजा दिलीप और नंदिनी गाय की कथा
रघुवंश (भगवान राम के वंश) के एक अत्यंत प्रतापी राजा थे— राजा दिलीप। उनके पास सब कुछ था, लेकिन कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा दिलीप और उनकी पत्नी रानी सुदक्षिणा ने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाकर उपाय पूछा। महर्षि वशिष्ठ ने कहा, “हे राजन! आपसे अनजाने में कामधेनु गाय का अपमान हुआ था। उसी के श्राप के कारण आपको संतान नहीं हो रही है। यदि आप कामधेनु की पुत्री ‘नंदिनी’ की निस्वार्थ भाव से सेवा करें, तो आपका यह श्राप कट सकता है।”
राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा ने अपने राजसी वस्त्र त्याग दिए और साधारण वेशभूषा में आश्रम में रहकर नंदिनी गाय की सेवा शुरू कर दी। राजा नंदिनी के साथ-साथ वन में जाते, उसके रुकने पर रुकते और उसके चलने पर चलते। एक दिन नंदिनी की परीक्षा लेने के लिए स्वयं एक सिंह (Lion) ने नंदिनी पर हमला कर दिया। राजा दिलीप ने सिंह से प्रार्थना की कि वह नंदिनी को छोड़ दे और उसके बदले राजा को अपना आहार बना ले।
राजा के इस समर्पण और गौ-प्रेम को देखकर सिंह गायब हो गया और नंदिनी ने प्रसन्न होकर राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। उसी वरदान के फलस्वरूप राजा दिलीप को ‘रघु’ नामक प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ। मान्यता है कि वह कार्तिक कृष्ण द्वादशी का ही दिन था। इसलिए संतान प्राप्ति और रक्षा के लिए इस दिन गौ पूजा की जाती है।
कथा 2: सास-बहू और बछड़े (मूंग-मोठ) की लोक कथा
प्राचीन काल में एक साहूकार की पत्नी थी, जिसके घर में बहुत सी गायें थीं। एक गाय ने हाल ही में दो बछड़ों को जन्म दिया था, जिनका नाम साहूकारनी ने प्यार से ‘मूंग’ और ‘मोठ’ रखा था। गोवत्स द्वादशी के दिन साहूकारनी खेत पर जाते समय अपनी भोली बहू से कह गई कि, “आज बारस है, तुम मूंग-मोठ पका लेना।” (सास का तात्पर्य अनाज वाले साबुत मूंग और मोठ की सब्जी बनाने से था)।
नासमझ बहू ने सोचा कि सास ने गाय के दोनों बछड़ों को पकाने के लिए कहा है। उसने दोनों बछड़ों को काट कर पतीले में पकाने के लिए चढ़ा दिया। जब सास वापस आई और उसने यह अनर्थ देखा, तो वह सिर पीटकर रोने लगी। उसने डर के मारे मृत बछड़ों को एक गड्ढे में छुपा दिया।
शाम को जब गौ माता वापस आई और अपने बछड़ों को न पाकर रंभाने लगी, तो उसने उसी गड्ढे के पास जाकर अपने सींगों से मिट्टी खोदनी शुरू कर दी। गौ माता की ममता और द्वादशी के व्रत के प्रभाव से चमत्कार हुआ; दोनों बछड़े जीवित होकर मिट्टी से बाहर निकल आए और अपनी माँ का दूध पीने लगे। जब सास-बहू ने यह चमत्कार देखा, तो वे गौ माता के चरणों में गिर पड़ीं। उसी दिन से पूरे गांव ने यह संकल्प लिया कि इस दिन कोई भी कटी हुई चीज़ नहीं खाएगा, गाय के दूध का सेवन नहीं करेगा और पूरे नियम से गौ माता की पूजा करेगा।
(कथा के अंत में कहें: हे गौ माता! जैसे आपने राजा दिलीप की मनोकामना पूरी की और बछड़ों को जीवनदान दिया, वैसे ही इस कथा को कहने, सुनने और हुंकारा भरने वाले सभी की संतानों की रक्षा करना और उन्हें दीर्घायु प्रदान करना।)
6. संतान की रक्षा, धन और उन्नति के लिए विशेष उपाय (Special Astrological Remedies)
गोवत्स द्वादशी का दिन अत्यंत सिद्ध माना जाता है। 6 नवंबर 2026 को गोधूलि बेला में यदि आप इन अचूक उपायों को आजमाते हैं, तो जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं:
I. नवग्रह शांति और बुरी नजर से बचाव के लिए
यदि आपके बच्चे को बार-बार बुरी नजर (Evil Eye) लगती है या उसकी कुंडली में राहु-केतु का दोष है, तो गोवत्स द्वादशी के दिन अपने बच्चे के सिर से सात बार एक मुट्ठी साबुत मोठ और गुड़ उबारकर (वारकर) किसी काले रंग की गाय को खिला दें। इससे नवग्रह शांत होते हैं और बच्चे का स्वास्थ्य बेहतर होता है।
II. संतान प्राप्ति के लिए अचूक उपाय (For Childbirth)
जो माताएं संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें गोवत्स द्वादशी के दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखना चाहिए। एक ऐसी गाय की खोज करें जो पहली बार माता बनी हो। उस बछड़े के माथे पर हल्दी का तिलक लगाकर उसे अपने हाथों से हरा चारा, गुड़ और भीगे चने खिलाएं। भगवान श्री कृष्ण के ‘संतान गोपाल मंत्र’ (ॐ देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥) का 108 बार जाप करें। गौ माता की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।
III. घर में सुख-शांति और आर्थिक उन्नति के लिए (For Wealth)
दीपावली के आगमन का यह प्रथम दिन है। गौ माता में साक्षात माता लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) का वास माना गया है। इस दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से स्वास्तिक बनाएं। किसी गौशाला (Goshala) में जाकर गायों के चारे-पानी के लिए अपनी सामर्थ्य अनुसार धन का गुप्त दान करें। गौशाला में एक बड़ा घी का दीपक जलाएं। यह उपाय परिवार के आर्थिक संकटों को जड़ से खत्म कर देता है।
IV. मानसिक तनाव और डिप्रेशन दूर करने के लिए
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोण से, गाय की रीढ़ की हड्डी (Spine) पर हाथ फेरने से मनुष्य का रक्तचाप (Blood Pressure) और मानसिक तनाव कम होता है। गोवत्स द्वादशी के दिन कम से कम 15 मिनट तक गौ माता की पीठ पर सहलाएं, इससे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
7. गोवत्स द्वादशी का वैज्ञानिक और पर्यावरणिक दृष्टिकोण (Scientific Perspective)
भारत के त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे गहरा विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश छिपा है:
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दूध पर बछड़े का अधिकार: गोवत्स द्वादशी का नियम कि ‘आज गाय का दूध नहीं पीना है’, यह सिखाता है कि पशुओं के दूध पर पहला अधिकार उनके नवजात बच्चों का है। यह पशु क्रूरता (Animal Cruelty) के खिलाफ एक बहुत बड़ा प्राचीन संदेश है।
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अंकुरित अन्न का सेवन: नवंबर के महीने में मौसम बदल रहा होता है। साबुत और अंकुरित अनाज (Sprouts) खाने से शरीर को उच्च मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और विटामिन्स मिलते हैं, जो सर्दियों के आने से पहले शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाते हैं।
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मिट्टी और गौधूली: गाय के चलने से उड़ने वाली धूल (गौधूली) में एंटी-बैक्टीरियल गुण माने जाते हैं। इसे माथे पर लगाने से मानसिक शांति मिलती है।
8. भारत के विभिन्न राज्यों में गोवत्स द्वादशी का स्वरूप (Regional Variations)
यद्यपि यह पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसके नाम और तिथियों में क्षेत्रीय भिन्नताएं इसे और भी रंग-बिरंगा बना देती हैं:
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महाराष्ट्र (वसु बारस – Vasu Baras): महाराष्ट्र में दीपावली की शुरुआत इसी दिन से होती है। इसे ‘वसु बारस’ कहा जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं, गाय की पूजा करती हैं और अपने घर के बाहर सुंदर रंगोली बनाती हैं। शाम को परिवार के साथ मिलकर पूरन पोली (Puran Poli) का आनंद लिया जाता है।
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गुजरात (बाघ बारस – Vagh Baras): गुजरात में इसे बाघ बारस कहते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन अपने पुराने बही-खातों को बंद करने की प्रक्रिया शुरू करते हैं और धन की देवी लक्ष्मी की प्रार्थना करते हैं।
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राजस्थान और उत्तर भारत (बछ बारस): यहाँ भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को ‘बछ बारस’ के रूप में मनाया जाता है। अंकुरित अन्न और बाजरे की रोटी इस दिन का मुख्य आकर्षण होती है। कार्तिक मास में भी गौ पूजा का विधान है।
Govatsa Dwadashi 2026 (6 नवंबर 2026) का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के उस निस्वार्थ स्वरूप और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता का जश्न है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जो पशु हमें दूध देकर पलता है, उसका हमारे जीवन में माँ के समान ही अधिकार और सम्मान होना चाहिए।
दीपावली के प्रकाश पर्व की शुरुआत में आने वाला यह दिन हमें यह संदेश देता है कि असली लक्ष्मी (धन-समृद्धि) वही है जहाँ पशुओं, विशेषकर गौ माता का सम्मान होता है।
इस वर्ष आप भी गोवत्स द्वादशी (वसु बारस) का व्रत पूर्ण निष्ठा, नियमों (गाय का दूध न पीना) और विश्वास के साथ रखें। गौ माता को हरा चारा खिलाएं और भगवान श्री कृष्ण से अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। गौ माता और कामधेनु की कृपा से आपके घर-आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती रहें, लक्ष्मी का स्थायी वास हो, और आपका परिवार सदा सुरक्षित रहे, यही हमारी मंगल कामना है।
“बोलो गौ माता की जय! भगवान श्री कृष्ण की जय!”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Govatsa Dwadashi 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी (वसु बारस) किस तारीख को मनाई जाएगी?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, दीपावली से पूर्व आने वाली गोवत्स द्वादशी (कार्तिक कृष्ण द्वादशी) का पावन पर्व वर्ष 2026 में 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इसे महाराष्ट्र और गुजरात में वसु बारस या बाघ बारस के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न 2: गोवत्स द्वादशी के व्रत में गाय का दूध क्यों नहीं पिया जाता है?
उत्तर: गोवत्स द्वादशी पूर्ण रूप से बछड़े (गाय के बच्चे) को समर्पित त्योहार है। धार्मिक और नैतिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर गाय के दूध पर केवल और केवल उसके नवजात बछड़े का ही अधिकार होता है। इसलिए, गौ माता और बछड़े के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं गाय के दूध, दही या घी का सेवन नहीं करती हैं, बल्कि भैंस या बकरी के दूध का उपयोग करती हैं।
प्रश्न 3: क्या गोवत्स द्वादशी और बछ बारस एक ही त्योहार हैं?
उत्तर: अर्थ और पूजा विधि के दृष्टिकोण से दोनों एक ही त्योहार हैं, क्योंकि दोनों में गाय और बछड़े की पूजा होती है। परंतु तिथियों में अंतर है। उत्तर भारत (विशेषकर राजस्थान) में इसे ‘बछ बारस’ के नाम से भाद्रपद (भादों) महीने में कृष्ण जन्माष्टमी के 4 दिन बाद मनाया जाता है। जबकि महाराष्ट्र, गुजरात आदि में इसे दीपावली से ठीक पहले (कार्तिक मास में) ‘गोवत्स द्वादशी’ या ‘वसु बारस’ के रूप में मनाया जाता है।
प्रश्न 4: गोवत्स द्वादशी के दिन खाने (भोजन) के क्या विशेष नियम हैं?
उत्तर: इस दिन के व्रत नियम बहुत कड़े होते हैं। व्रत करने वाली महिलाएं गेहूं, चावल और गाय के दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करती हैं। भोजन में मुख्य रूप से साबुत अंकुरित अनाज (जैसे भीगे हुए मूंग, मोठ, चने), बाजरे की रोटी और भैंस के दूध से बनी कढ़ी का ही उपयोग किया जाता है। कई परम्पराओं में इस दिन चाकू से कटी हुई कोई भी चीज़ नहीं खाई जाती।
प्रश्न 5: क्या गोवत्स द्वादशी का व्रत कुंवारी कन्याएं या पुरुष रख सकते हैं?
उत्तर: पारंपरिक रूप से गोवत्स द्वादशी का व्रत मुख्य रूप से माताएं (जिनके पुत्र या संतान है) अपनी संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए रखती हैं। हालांकि, जिन महिलाओं की संतान नहीं है, वे संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत कर सकती हैं। कुंवारी कन्याएं, पुरुष और बच्चे भी अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और गौ माता के आशीर्वाद के लिए इस दिन पूजा में सम्मिलित हो सकते हैं और गौ सेवा कर सकते हैं।