भारतीय संस्कृति पूरी तरह से प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान पर आधारित है। हमारे यहाँ के त्योहार न केवल ऋतुओं के परिवर्तन का जश्न मनाते हैं, बल्कि उन मूक पशुओं के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जो मानव जीवन का आधार हैं। ऐसा ही एक अत्यंत सुंदर और महत्वपूर्ण त्योहार है— ‘पोला पिथोरा’ (Pola Pithora)।
यह दिन मुख्य रूप से दो महान पर्वों का संगम है— किसानों का प्रमुख त्योहार ‘बैल पोला’ (Bail Pola) और माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु के लिए रखा जाने वाला ‘पिठौरी अमावस्या’ (Pithori Amavasya) का व्रत। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कई हिस्सों में इस दिन की छटा देखते ही बनती है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश और गुजरात के जनजातीय क्षेत्रों में ‘पिथौरा’ (Pithora) चित्रकला और देव पूजा का भी इस दिन विशेष महत्व होता है।
यदि आप भी जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में पोला पिथोरा कब है (Pola Pithora 2026 Date), इसका धार्मिक और कृषि आधारित महत्व क्या है, इस दिन बैलों और 64 योगिनियों की पूजा कैसे की जाती है, और माताओं के इस व्रत की पौराणिक कथा क्या है, तो यह अत्यंत विस्तृत, ज्ञानवर्धक और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।
1. वर्ष 2026 में पोला पिथोरा (बैल पोला और पिठौरी अमावस्या) कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, ‘पोला’ और ‘पिठौरी अमावस्या’ का यह संयुक्त पर्व हर वर्ष श्रावण (सावन) मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। (ध्यान दें: महाराष्ट्र और गुजरात में ‘अमावस्यांत पंचांग’ का पालन होता है, जिसके अनुसार यह श्रावण अमावस्या होती है। वहीं उत्तर भारत के ‘पूर्णिमांत पंचांग’ के अनुसार इसे भाद्रपद अमावस्या कहा जाता है, जिसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहते हैं)। कैलेंडर चाहे जो भी हो, पूरे देश में यह पर्व एक ही दिन मनाया जाता है।
वैदिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में पोला पिथोरा (बैल पोला और पिठौरी अमावस्या) का पावन पर्व 12 अगस्त 2026, बुधवार को अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
पोला पिथोरा 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)
यहाँ 12 अगस्त 2026 के लिए पूजा और व्रत के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:
| विवरण (Event Details) | तिथि और समय (Date & Time 2026) |
| पोला पिथोरा 2026 की मुख्य तिथि | 12 अगस्त 2026 (बुधवार) |
| श्रावण/भाद्रपद अमावस्या तिथि का आरंभ | 11 अगस्त 2026, रात्रि (देर शाम) से |
| अमावस्या तिथि की समाप्ति | 12 अगस्त 2026, सायं 06:45 बजे तक |
| बैल पोला (बैलों की पूजा) का शुभ समय | 12 अगस्त, प्रातः 07:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक |
| पिठौरी अमावस्या (माताओं का व्रत पूजा) | 12 अगस्त, गोधूलि बेला (शाम 05:45 बजे से 07:15 बजे तक) |
| पर्व का मुख्य उद्देश्य | कृषि पशुओं का सम्मान और संतान की रक्षा |
(नोट: अमावस्या तिथि 12 अगस्त को दिन भर व्याप्त रहेगी, इसलिए स्नान, दान, बैलों की पूजा और पिठौरी माता का व्रत इसी दिन मान्य होगा।)
2. पोला पिथोरा का क्या अर्थ है? (Meaning of Pola Pithora)
‘पोला पिथोरा’ शब्द में भारत की दो प्राचीन परंपराएं समाहित हैं। आइए इन्हें विस्तार से समझें:
I. पोला (Bail Pola)
‘पोला’ का अर्थ है बैलों का त्योहार। मानसून के मौसम में जब खेतों की जुताई, बुवाई और रोपाई का सबसे कठिन काम पूरा हो जाता है, तब किसान अपने बैलों (Bulls/Oxen) को आराम देते हैं। यह त्योहार बैलों के कठोर परिश्रम के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करने का दिन है। इस दिन बैलों से कोई काम नहीं लिया जाता, बल्कि उन्हें एक राजा की तरह सजाया और पूजा जाता है।
II. पिथोरा (पिठौरी अमावस्या / Pithori Amavasya)
‘पिथोरा’ या ‘पिठौरी’ का संबंध आटे (जिसको मराठी और हिंदी में ‘पीठ’ या ‘पीठा’ कहा जाता है) से है। इस दिन माताएं आटे (गूंथे हुए पीठे) से 64 योगिनियों (चौंसठ योगिनी देवी) और सप्तमातृकाओं की मूर्तियां बनाती हैं और उनकी पूजा करती हैं। यह व्रत माताएं अपनी संतानों की लंबी आयु, उनके उत्तम स्वास्थ्य और उनकी रक्षा के लिए रखती हैं।
III. जनजातीय ‘पिथौरा’ कला (Tribal Pithora Art)
मध्य प्रदेश (विशेषकर झाबुआ) और गुजरात के राठवा (Rathwa) और भिलाला आदिवासी समुदायों में ‘पिथौरा’ उनके आराध्य देव हैं। इस दिन और इसके आस-पास के समय में वे अपने घरों की दीवारों पर अत्यंत सुंदर ‘पिथौरा पेंटिंग’ बनाते हैं। यह चित्रकला उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि ईश्वर को घर में आमंत्रित करने का एक पवित्र अनुष्ठान है।
3. बैल पोला: किसानों का महापर्व (The Grand Festival of Farmers)
भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति की आत्मा गांवों में बसती है। बैल पोला किसानों के लिए दिवाली से कम नहीं होता।
बैलों का श्रृंगार और आराम (Decoration of Bulls)
पोला के दिन सुबह से ही किसान अपने बैलों को नहला-धुला कर साफ करते हैं। उनके सींगों (Horns) को रंगा जाता है और उन पर चमकीले छल्ले (Rings) या पीतल के कैप पहनाए जाते हैं। बैलों के गले में नई घंटियां (Bells), मोतियों की माला और रंग-बिरंगे फीते बांधे जाते हैं। उनकी पीठ पर सुंदर और कढ़ाईदार शॉल (झूल) डाली जाती है।
जुलूस और मेला (The Procession)
दोपहर के समय पूरे गांव के लोग अपने सजे-धजे बैलों को लेकर गांव के मुखिया (पाटिल) के घर या गांव के खुले मैदान में इकट्ठा होते हैं। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों (जैसे लेझिम) की थाप पर बैलों का जुलूस निकाला जाता है। इस दिन बैलों के सम्मान में गांव में मेला लगता है और कोई भी किसान अपने बैल को हल या गाड़ी में नहीं जोतता।
बच्चों का पोला (तन्हा पोला – Tanha Pola)
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में एक बहुत ही प्यारी परंपरा है जिसे ‘तन्हा पोला’ या ‘छोटा पोला’ कहा जाता है। पोला के अगले दिन, छोटे बच्चे लकड़ी या मिट्टी से बने छोटे बैलों के खिलौनों को सजाते हैं और उन्हें पूरे मोहल्ले में घुमाते हैं। लोग बच्चों को इस प्यारे जुलूस के लिए बख्शीश (पैसे) और मिठाइयां देते हैं। यह बच्चों को बचपन से ही पशुओं का सम्मान करना सिखाता है।
4. पिठौरी अमावस्या: माताओं का कठोर व्रत (Pithori Amavasya Vrat)
पोला के दिन ही घर की महिलाएं ‘पिठौरी अमावस्या’ का व्रत रखती हैं। यह व्रत उन माताओं के लिए विशेष फलदायी है जिनकी संतान अक्सर बीमार रहती है या जिन महिलाओं को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है।
व्रत का संकल्प और नियम
माताएं इस दिन प्रातःकाल स्नान करके निर्जला (बिना पानी के) या फलाहारी व्रत का संकल्प लेती हैं। यह व्रत संतान के शारीरिक और मानसिक विकास की कामना के साथ किया जाता है।
64 योगिनियों की पूजा क्यों? (Worship of 64 Yoginis)
हिंदू धर्म में 64 योगिनियों को माता दुर्गा का उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना गया है, जो हर प्रकार के संकट, बीमारियों और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती हैं। पिठौरी अमावस्या के दिन माताएं आटे से इन 64 योगिनियों की छोटी-छोटी आकृतियां बनाती हैं और उन्हें एक चौकी पर स्थापित करती हैं। मान्यता है कि योगिनियां प्रसन्न होकर बच्चों को अभयदान (सुरक्षा) देती हैं।
5. पोला पिथोरा की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
12 अगस्त 2026 को पोला और पिठौरी अमावस्या की पूजा को शास्त्र-सम्मत और पारंपरिक तरीके से ऐसे संपन्न करें:
१. बैल पोला की पूजा विधि (Morning Rituals for Bulls)
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सुबह बैलों को हल्दी, उबटन और तेल लगाकर अच्छी तरह से नहलाएं।
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उनके सींगों को रंगें और उन्हें आभूषणों व नई रस्सियों से सजाएं।
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दोपहर या शाम के समय, जब बैलों का जुलूस वापस घर आता है, तो घर की महिलाएं दरवाजे पर उनकी आरती उतारती हैं।
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बैलों के पैरों को धोया जाता है और उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाया जाता है।
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उन्हें खाने के लिए ‘पूरन पोली’ (गुड़ और चने की दाल से बनी मीठी रोटी), ज्वार और हरा चारा अपने हाथों से खिलाया जाता है।
२. पिठौरी अमावस्या की पूजा विधि (Evening Rituals for Mothers)
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शाम के समय (गोधूलि बेला) घर के पूजा कक्ष में एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
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गेहूं या चावल के आटे (पीठे) को गूंथकर उससे 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा) की आकृतियां बनाएं।
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इन आकृतियों को चौकी पर स्थापित करें।
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उन्हें कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल), और लाल फूल अर्पित करें।
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सुहाग का सामान (चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर) देवी को चढ़ाएं।
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धूप, गाय के घी का दीपक और कपूर जलाकर आरती करें।
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नैवेद्य के रूप में देवी को आटे से बने पकवान, पूरन पोली, और मौसमी फलों का भोग लगाएं।
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पूजा के अंत में पिठौरी अमावस्या की व्रत कथा (कथा नीचे पढ़ें) का श्रवण करें।
6. पिठौरी अमावस्या की पौराणिक व्रत कथा (The Pauranik Vrat Katha)
किसी भी व्रत का पूर्ण फल उसकी कथा को सुने बिना प्राप्त नहीं होता। पिठौरी अमावस्या की कथा एक माँ के अपने बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और ईश्वर पर उसके विश्वास को दर्शाती है:
कथा (सुशीला और देवी की कृपा):
प्राचीन काल में एक अत्यंत धार्मिक और सदाचारी ब्राह्मण परिवार था। उनके घर में सुशीला नाम की एक स्त्री थी, जो बहुत ही गुणवान थी। सुशीला के साथ एक बहुत बड़ी त्रासदी थी। जब भी वह किसी संतान (विशेषकर पुत्र) को जन्म देती, जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसकी संतान की मृत्यु हो जाती थी। एक-एक करके उसके कई पुत्रों की मृत्यु हो गई।
सुशीला इस बात से अत्यंत दुखी और निराश रहने लगी। समाज में लोग उसे ‘बांझ’ या ‘अभागिन’ कहने लगे। एक बार सावन के महीने में उसकी एक और संतान की मृत्यु हो गई। सुशीला अपने मरे हुए बच्चे को गोद में लेकर रोती हुई घने जंगल की ओर भाग गई।
वह जंगल में विलाप कर रही थी कि तभी वहां साक्षात ‘माता पार्वती’ (कुछ कथाओं में 64 योगिनियां) प्रकट हुईं। देवी ने सुशीला को रोते हुए देखा तो उसका कारण पूछा। सुशीला ने अपने सारे दुख माता को बता दिए।
माता पार्वती को सुशीला पर अत्यंत दया आई। उन्होंने कहा, “हे पुत्री! तू शोक मत कर। श्रावण मास की अमावस्या तिथि आ रही है। तू घर जाकर इस दिन उपवास रख। गेहूं या चावल के आटे (पीठे) से 64 योगिनियों और मेरी (पार्वती) मूर्ति बनाकर पूरे विधि-विधान से पूजा कर। देवी को मीठे पकवानों का भोग लगा। इस ‘पिठौरी अमावस्या’ के व्रत के प्रभाव से तेरी मृत संतानें भी जीवित हो उठेंगी और भविष्य में तेरे बच्चों को कभी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा।”
माता के कहे अनुसार सुशीला ने श्रावण अमावस्या के दिन पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ पिठौरी का व्रत किया। आटे से योगिनियों की मूर्तियां बनाईं और उनका पूजन किया। व्रत और पूजा के प्रभाव से एक चमत्कार हुआ। सुशीला के जितने भी पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए थे, वे सभी जीवित होकर उसके सामने आ खड़े हुए।
सुशीला की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसने माता पार्वती और योगिनियों को दंडवत प्रणाम किया। जब वह अपने बच्चों को लेकर गांव लौटी, तो सभी लोग चकित रह गए। उसी दिन से महिलाओं ने अपनी संतान की रक्षा, लंबी आयु और उनके सुखमय जीवन के लिए पिठौरी अमावस्या का व्रत रखना शुरू कर दिया।
(कथा सुनने के बाद मन ही मन कहें: हे चौंसठ योगिनी माता! जिस प्रकार आपने सुशीला के बच्चों की रक्षा की और उन्हें जीवनदान दिया, उसी प्रकार इस कथा को पढ़ने, सुनने और हुंकारा भरने वाली सभी माताओं की संतानों की रक्षा करना।)
7. पोला पिथोरा पर बनने वाले पारंपरिक पकवान (Traditional Delicacies)
भारतीय त्योहारों की असली मिठास उनके पारंपरिक व्यंजनों में बसती है। पोला और पिथोरा के दिन घरों में विशेष प्रकार के शाकाहारी और सात्विक पकवान बनाए जाते हैं:
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पूरन पोली (Puran Poli): यह महाराष्ट्र और मध्य भारत का सबसे प्रसिद्ध व्यंजन है। चने की दाल और गुड़ (या चीनी) को उबालकर, पीसकर उसे गेहूं के आटे की लोई में भरकर तवे पर घी के साथ सेंका जाता है। यह बैलों को खिलाया जाने वाला मुख्य प्रसाद है।
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करंजी (Karanji / Gujiya): आटे या मैदे से बनी इस मिठाई के अंदर कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल, सूजी, मेवे और चीनी भरी जाती है।
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कढ़ी और ज्वार की भाकरी: ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन बेसन और छाछ से बनी कढ़ी और ज्वार की मोटी रोटी (भाकरी) बनाई जाती है।
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आटे के मीठे गुलगुले (Pude): पिठौरी अमावस्या के कारण इस दिन आटे (पीठे) से बने मीठे पुए या गुलगुले विशेष रूप से देवी को भोग लगाने के लिए बनाए जाते हैं।
8. पोला पिथोरा के दिन किए जाने वाले अचूक उपाय (Astrological Remedies)
यदि 12 अगस्त 2026 को पोला पिथोरा के दिन आप कुछ विशेष ज्योतिषीय और आध्यात्मिक उपाय (Upay) करते हैं, तो देवी की कृपा से जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं:
I. बच्चों की बीमारियों और बुरी नजर से बचाव के लिए
यदि आपका बच्चा बार-बार बीमार पड़ता है या उसे नजर बहुत लगती है, तो पिठौरी अमावस्या के दिन माताएं एक ‘काले रंग का धागा’ देवी की मूर्ति (64 योगिनियों) के सामने रखें। पूजा के बाद उस धागे पर हल्दी-कुमकुम लगाएं और “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जाप करके उस धागे को अपने बच्चे के गले या दाहिनी कलाई पर बांध दें। यह धागा एक अभेद्य रक्षा-कवच का काम करेगा।
II. संतान प्राप्ति के लिए अचूक उपाय (For Childbirth)
जो माताएं संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें पिठौरी अमावस्या के दिन निर्जला व्रत रखकर माता पार्वती और 64 योगिनियों को हरे रंग की चूड़ियां, लाल चुनरी और मीठे पुए का भोग लगाना चाहिए। पूजा के बाद वह प्रसाद 7 कुंवारी कन्याओं में बांट दें। देवी की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।
III. कालसर्प दोष और पितृ दोष निवारण (For Pitru Dosh)
चूंकि यह श्रावण मास की अमावस्या है, इसलिए यह दिन पितरों की शांति के लिए अत्यंत फलदायी होता है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष या कालसर्प दोष है, उन्हें इस दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करके पीपल के पेड़ की जड़ में काले तिल मिला हुआ जल अर्पित करना चाहिए। साथ ही किसी गरीब को अन्न का दान करें।
IV. घर में धन-धान्य और कृषि में उन्नति के लिए
किसान भाइयों और व्यापार करने वालों को इस दिन अपने घर या खेत में एक ‘पीपल’ या ‘नीम’ का पौधा लगाना चाहिए। इसके साथ ही, बैलों को (या किसी भी गाय-बैल को) अपने हाथों से गुड़ और रोटी खिलाएं। इससे परिवार में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती।
9. जनजातीय संस्कृति में ‘पिथौरा’ कला का महत्व (The Pithora Tribal Art)
जब हम ‘पोला पिथोरा’ की बात करते हैं, तो मध्य प्रदेश (अलराजपुर, झाबुआ) और गुजरात (छोटा उदयपुर) की आदिवासी बेल्ट में मनाई जाने वाली ‘पिथौरा कला’ का जिक्र करना अनिवार्य है।
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पिथौरा बाबा (Pithora Baba): राठवा (Rathwa) और भिलाला जनजातियों के लिए ‘पिथौरा’ उनके सर्वोच्च देवता हैं। वे मानते हैं कि पिथौरा बाबा घोड़ों पर सवार होकर आते हैं और उनके दुखों को दूर करते हैं।
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कला एक अनुष्ठान है: जब किसी परिवार की मन्नत पूरी होती है (जैसे अच्छी फसल, बीमारी से मुक्ति), तो वे अपने घर की दीवार पर ‘पिथौरा पेंटिंग’ (Pithora Wall Painting) करवाते हैं।
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चित्रकला की विशेषता: इस चित्रकला को बनाने वाले कलाकारों को ‘लखाड़ा’ (Lakhada) कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से घोड़ों, सूर्य, चंद्रमा, जानवरों, और प्रकृति के दृश्यों को अत्यंत चटक रंगों (लाल, हरा, पीला, नीला) से बनाया जाता है। यह पेंटिंग एक प्रकार का ‘जीवित मंदिर’ मानी जाती है, जिसके सामने वे गाते, नाचते और पूजा करते हैं।
10. पोला पिथोरा के दिन क्या करें और क्या न करें? (Do’s and Don’ts)
त्योहार की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए:
क्या करें (Do’s):
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इस दिन पशुओं (विशेषकर गाय और बैलों) के प्रति सम्मान प्रकट करें। यदि आपके पास बैल नहीं हैं, तो किसी गौशाला में जाकर चारा दान करें।
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घर में पूर्ण सात्विकता और शांति का माहौल बनाए रखें।
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माताओं को अपने बच्चों के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए और उनके अच्छे भविष्य की कामना करनी चाहिए।
क्या न करें (Don’ts):
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पोला के दिन बैलों से किसी भी प्रकार का काम (जैसे खेत जोतना या गाड़ी खींचना) नहीं करवाना चाहिए। यह उन्हें आराम देने का दिन है।
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अमावस्या का दिन होने के कारण घर में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) बिल्कुल न बनाएं और न खाएं।
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किसी भी गरीब, बेसहारा या पशु का अपमान न करें।
Pola Pithora 2026 (12 अगस्त 2026) का पर्व केवल एक दिन का उपवास या मेला नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि, शक्ति और निस्वार्थ मातृत्व के संगम का एक महा-उत्सव है। बैलों का यह त्योहार हमें यह संदेश देता है कि जो पशु हमारे लिए कठोर परिश्रम करते हैं, उनका हमारे जीवन में कितना महत्व है और हमें उनके प्रति कितना कृतज्ञ होना चाहिए।
वहीं, पिठौरी अमावस्या का कठिन व्रत यह सिद्ध करता है कि दुनिया में एक माँ की प्रार्थनाओं और उसके प्रेम से बढ़कर कोई रक्षा-कवच नहीं है।
इस वर्ष आप भी पोला पिथोरा के इस दोहरे उत्सव का आनंद लें। पूरे विधि-विधान से पशुधन की पूजा करें, योगिनियों का ध्यान करें और पिठौरी माता का व्रत रखें। माता पार्वती और 64 योगिनियां आपके बच्चों को दीर्घायु करें, उनके जीवन से सभी संकटों का नाश करें और किसानों के घर को अन्न-धन से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।
“बोलो पिठौरी माता की जय! अन्नदाता किसान की जय!”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Pola Pithora 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में पोला पिथोरा (बैल पोला और पिठौरी अमावस्या) किस तारीख को है?
उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, बैल पोला और पिठौरी अमावस्या का पर्व श्रावण (सावन) मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 12 अगस्त 2026, बुधवार के दिन अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
प्रश्न 2: बैल पोला (Bail Pola) का त्योहार क्यों मनाया जाता है?
उत्तर: बैल पोला मुख्य रूप से किसानों का त्योहार है। मानसून के दौरान खेतों में लगातार और कठोर परिश्रम करने के बाद, किसान इस दिन अपने बैलों (Bulls) को आराम देते हैं। यह त्योहार बैलों की सेवा और कृषि में उनके महत्वपूर्ण योगदान के प्रति कृतज्ञता (धन्यवाद) व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें पूरन पोली खिलाई जाती है।
प्रश्न 3: पिठौरी अमावस्या (Pithori Amavasya) का व्रत कौन और क्यों रखता है?
उत्तर: पिठौरी अमावस्या का व्रत मुख्य रूप से माताएं (सुहागिन महिलाएं) रखती हैं। यह व्रत संतान की लंबी आयु, उनके उत्तम स्वास्थ्य, उन्हें हर प्रकार की बीमारियों व संकटों से बचाने और अकाल मृत्यु के भय को दूर करने के लिए रखा जाता है। जो महिलाएं संतान प्राप्ति की इच्छा रखती हैं, वे भी इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करती हैं।
प्रश्न 4: पिठौरी अमावस्या के दिन 64 योगिनियों की पूजा कैसे की जाती है?
उत्तर: इस दिन माताएं गूंथे हुए आटे (पीठे) से 64 योगिनियों (Goddesses) और सप्तमातृकाओं की छोटी-छोटी आकृतियां या मूर्तियां बनाती हैं। इन मूर्तियों को एक चौकी पर स्थापित कर कुमकुम, हल्दी, पुष्प और सुहाग का सामान अर्पित किया जाता है। योगिनियों को उग्र और रक्षक देवियां माना जाता है, जो बच्चों को अभयदान (सुरक्षा) प्रदान करती हैं।
प्रश्न 5: ‘पिथौरा’ (Pithora) कला क्या है और इसका इस त्योहार से क्या संबंध है?
उत्तर: मध्य प्रदेश और गुजरात की आदिवासी जनजातियों (राठवा और भिलाला) में ‘पिथौरा’ उनके सर्वोच्च लोक देवता हैं। किसी मन्नत के पूरी होने पर या त्योहार के समय, ये जनजातियां अपने घरों की दीवारों पर घोड़ों, प्रकृति और देवों की रंग-बिरंगी चित्रकला (Pithora Painting) बनाती हैं। यह केवल एक चित्र नहीं, बल्कि ईश्वर को घर में स्थापित करने का एक पवित्र अनुष्ठान है, जो इस त्योहार के समय विशेष रूप से किया जाता है।