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Santan Saptami 2026: संतान साते कब है? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और संतान प्राप्ति के अचूक उपायIt takes 16 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में एक माता का अपने बच्चों के प्रति प्रेम और समर्पण अत्यंत वंदनीय माना गया है। भारतीय संस्कृति में ऐसे कई व्रत और त्योहार हैं जो विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखे जाते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत ही पावन और फलदायी व्रत है— ‘संतान साते’ जिसे ‘संतान सप्तमी’ (Santan Saptami) या ‘मुक्ताभरण सप्तमी’ के नाम से भी जाना जाता है।

यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। मान्यता है कि जो भी माताएं इस दिन पूरी श्रद्धा और कड़े नियमों के साथ यह व्रत रखती हैं, उनके बच्चों पर आने वाले सभी संकट भगवान भोलेनाथ हर लेते हैं। जिन दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो रही है, उनके लिए भी यह व्रत किसी वरदान से कम नहीं है।

यदि आप भी जानना चाहती हैं कि वर्ष 2026 में संतान साते (संतान सप्तमी) कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा में 7 पुओं (मीठी पूरी) और 7 गांठ वाले धागे का क्या महत्व है, इस व्रत की पौराणिक कथा क्या है, और संतान की तरक्की के लिए कौन से अचूक उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।

1. वर्ष 2026 में संतान साते (संतान सप्तमी) कब है? (Santan Saptami 2026 Date & Time)

हिंदू पंचांग के अनुसार, संतान साते (संतान सप्तमी) का पावन व्रत हर वर्ष भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। यह त्योहार गणेश चतुर्थी के तीन दिन बाद और राधा अष्टमी से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है।

वैदिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को है। अतः भाद्रपद शुक्ल सप्तमी की तिथि के अनुसार, वर्ष 2026 में संतान साते (संतान सप्तमी) का महापर्व 17 सितंबर 2026, गुरुवार को अत्यंत श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ मनाया जाएगा। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और गुरु ग्रह (जो संतान के कारक हैं) का दिन होता है, जिससे इस वर्ष इस व्रत का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

संतान साते 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)

संतान सप्तमी की पूजा मुख्य रूप से प्रातःकाल (सुबह) या मध्याह्न (दोपहर) में की जाती है। 17 सितंबर 2026 के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त की तालिका यहाँ दी गई है:

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time 2026)
संतान साते (संतान सप्तमी) की मुख्य तिथि 17 सितंबर 2026 (गुरुवार)
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि का आरंभ 16 सितंबर 2026, सायं 06:15 बजे से
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि की समाप्ति 17 सितंबर 2026, सायं 05:30 बजे तक
प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:40 बजे से 10:45 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त (दोपहर की पूजा के लिए) सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
मुख्य देवी-देवता भगवान शिव और माता पार्वती

(नोट: सप्तमी तिथि 17 सितंबर को शाम तक व्याप्त रहेगी, इसलिए उदया तिथि के नियमानुसार व्रत और पूजा 17 सितंबर 2026 को ही संपन्न की जाएगी।)

2. संतान साते (संतान सप्तमी) क्या है और यह क्यों मनाई जाती है? (Significance of Santan Saptami)

संतान साते का व्रत एक मां के संकल्प और ईश्वर पर उसके अटूट विश्वास का प्रतीक है। इस व्रत को रखने के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण छिपे हैं:

I. संतान की रक्षा और दीर्घायु

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की हर प्रकार के रोगों, दुर्घटनाओं और संकटों से रक्षा करना है। भगवान शिव, जिन्हें ‘महामृत्युंजय’ कहा जाता है, वे अकाल मृत्यु को भी टालने में सक्षम हैं। माताएं इस दिन भगवान शिव और माता गौरी से प्रार्थना करती हैं कि उनके बच्चों की आयु लंबी हो और उनका जीवन बाधा रहित हो।

II. संतान प्राप्ति का आशीर्वाद (Blessing for Childless Couples)

जो दंपत्ति लंबे समय से संतान सुख से वंचित हैं या जिन्हें बार-बार गर्भपात (Miscarriage) का सामना करना पड़ रहा है, उनके लिए संतान सप्तमी का व्रत अत्यंत चमत्कारिक माना जाता है। पूर्ण निष्ठा से यह व्रत करने पर भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।

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III. बच्चों की प्रगति और सद्बुद्धि

केवल जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संतान का संस्कारी, बुद्धिमान और सफल होना भी आवश्यक है। यह व्रत बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए भी रखा जाता है, ताकि वे समाज में एक अच्छे नागरिक बन सकें और अपने माता-पिता का नाम रोशन करें।

3. संतान सप्तमी व्रत के विशेष और कड़े नियम (Rules of Santan Saate Vrat)

यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है, इसलिए इसमें पवित्रता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस व्रत के कुछ अनूठे नियम हैं:

  1. 7 का अंक (Number 7): ‘साते’ या ‘सप्तमी’ का अर्थ 7 है। इसलिए इस पूजा में हर चीज़ 7 की संख्या में होती है। पूजा में 7 पुए (मीठी पूरी) चढ़ाए जाते हैं, और जो धागा (डोरा) पहना जाता है, उसमें भी 7 गांठें लगाई जाती हैं।

  2. प्रसाद का नियम: माता पार्वती और भगवान शिव को जो 7 पुए या मीठी पूरियां प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती हैं, व्रत खोलने (पारण करने) पर माताएं उन्हीं 7 पुओं को खाकर अपना व्रत खोलती हैं। यह प्रसाद किसी अन्य व्यक्ति या यहां तक कि पति को भी नहीं दिया जाता।

  3. निर्जला या फलाहारी व्रत: महिलाएं अपनी क्षमता के अनुसार इसे निर्जला (बिना पानी के) या फलाहारी रख सकती हैं। हालांकि, पूजा संपन्न होने के बाद ही प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

  4. पवित्रता: व्रत के दिन घर में मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होता है। क्रोध करने और किसी को अपशब्द कहने से व्रत का फल नष्ट हो जाता है।

4. संतान सप्तमी की संपूर्ण पूजा सामग्री (Puja Samagri List)

पूजा प्रारंभ करने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लें कि आपके पास सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो:

  • भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र (शिव परिवार)

  • चांदी का कड़ा (Silver Bangle): (यदि चांदी का कड़ा न हो, तो सूती धागे में 7 गांठें लगाकर डोरा बनाया जाता है)

  • पीला या लाल साफ कपड़ा (चौकी पर बिछाने के लिए)

  • गंगाजल, गाय का दूध, दही, घी, शहद (पंचामृत के लिए)

  • पीला चंदन, रोली, कुमकुम, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)

  • बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और ताजे फूल (लाल और सफेद)

  • प्रसाद: 7 मीठे पुए (आटे और गुड़/चीनी से बने), केले, और नारियल

  • धूप, गाय के घी का दीपक, कपूर और कलावा (मौली)

5. संतान साते (संतान सप्तमी) की शास्त्र-सम्मत पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

17 सितंबर 2026 को प्रातःकाल या मध्याह्न में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा इस पारंपरिक और शास्त्र-सम्मत विधि से करें:

१. प्रातःकालीन स्नान और संकल्प

  • सूर्योदय से पूर्व उठें और स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (लाल, पीला या हरा) धारण करें।

  • घर के मंदिर में हाथ में जल और एक पुष्प लेकर संकल्प लें: “हे उमापति महादेव! मैं (अपना नाम), अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य, उज्ज्वल भविष्य और पारिवारिक सुख-शांति के लिए आज संतान सप्तमी का व्रत कर रही हूँ। कृपया मेरे व्रत को निर्विघ्न पूर्ण करें।”

२. पूजा स्थल की सजावट

  • घर के एक साफ हिस्से में या पूजा कक्ष में एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।

  • चौकी पर शिव परिवार (भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश और कार्तिकेय) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  • मूर्ति के सामने एक कलश स्थापित करें।

३. डोरा या कड़ा पूजन (Worship of the Holy Thread)

  • पूजा में सबसे महत्वपूर्ण होता है ‘डोरा’ (धागा)। एक साफ सूती धागे (मौली) में 7 गांठें लगा लें। यदि आपके पास चांदी का कड़ा है, तो उसे भी रख लें।

  • इस धागे या कड़े को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं और शिव जी के सामने रखें।

४. षोडशोपचार पूजा

  • भगवान गणेश का ध्यान कर पूजा का आरंभ करें।

  • भगवान शिव को पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें पीला चंदन, बेलपत्र, धतूरा और सफेद फूल अर्पित करें।

  • माता पार्वती को कुमकुम का तिलक लगाएं और लाल चुनरी व सुहाग का सामान अर्पित करें।

  • धागे (डोरे) पर रोली और चंदन लगाकर उसकी पूजा करें।

५. नैवेद्य (भोग) अर्पण

  • घर पर शुद्ध घी, आटे और गुड़ (या चीनी) से बने 7 मीठे पुए (Puwa) शिव-पार्वती को अर्पित करें।

  • साथ ही ताजे फल और पान-सुपारी चढ़ाएं।

६. व्रत कथा, आरती और डोरा धारण

  • हाथ में फूल और अक्षत लेकर संतान सप्तमी की पौराणिक व्रत कथा (कथा नीचे दी गई है) पढ़ें या सुनें।

  • कथा समाप्त होने के बाद घी का दीपक जलाकर आरती उतारें।

  • पूजा के बाद वह 7 गांठों वाला धागा (या चांदी का कड़ा) अपने दाहिने हाथ में धारण कर लें।

  • शाम को (या पूजा के बाद) माताएं उन्हीं 7 पुओं को खाकर अपना व्रत खोलती हैं।

6. संतान साते (संतान सप्तमी) की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)

किसी भी व्रत का पूर्ण फल इस पौराणिक कथा को सुने बिना प्राप्त नहीं होता। यह कथा कर्मों के फल, ईर्ष्या के दुष्परिणाम और इस व्रत के चमत्कारी प्रभाव को दर्शाती है:

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कथा (रानी चंद्रमुखी और ब्राह्मणी रूपमती): प्राचीन काल में अयोध्यापुरी का प्रतापी राजा नहुष था। उसकी पत्नी का नाम रानी चंद्रमुखी था। रानी के राज्य में एक विष्णुदत्त नामक ब्राह्मण रहता था, जिसकी पत्नी का नाम रूपमती था। रानी चंद्रमुखी और ब्राह्मणी रूपमती में बहुत गहरी मित्रता थी।

एक दिन दोनों सहेलियां सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं। वहां उन्होंने देखा कि कुछ महिलाएं मिलकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर रही थीं। रानी और ब्राह्मणी ने उन महिलाओं से इस पूजा के बारे में पूछा। महिलाओं ने बताया, “यह संतान सप्तमी का व्रत है। इसे करने से संतान की प्राप्ति होती है और बच्चों की हर विपत्ति से रक्षा होती है।”

यह सुनकर रानी चंद्रमुखी और ब्राह्मणी रूपमती ने भी उसी क्षण सरयू नदी के जल को हाथ में लेकर संकल्प किया कि वे भी आजीवन यह संतान सप्तमी का व्रत करेंगी और भगवान शिव को धागा (डोरा) बांधेंगी।

व्रत का भूलना और अगला जन्म: परंतु घर लौटने के बाद सांसारिक मोह-माया में फंसकर दोनों सहेलियां अपना संकल्प भूल गईं। उन्होंने कभी यह व्रत नहीं किया। समय बीतने के बाद दोनों की मृत्यु हो गई। व्रत का संकल्प तोड़कर भगवान का अपमान करने के कारण, अगले जन्म में ब्राह्मणी रूपमती एक ‘बंदरिया’ (Monkey) बनी और रानी चंद्रमुखी एक ‘मुर्गी’ (Chicken) की योनि में जन्मी।

पशु योनि में भी दोनों को अपने पिछले जन्म की मित्रता याद थी। परंतु पापों का दंड भोगने के बाद, उन्हें पुनः मनुष्य योनि प्राप्त हुई।

मनुष्य रूप में पुनर्जन्म: इस बार ब्राह्मणी रूपमती ने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया और उसका नाम ‘ईश्वरी’ रखा गया। वहीं रानी चंद्रमुखी ने एक राजा के घर जन्म लिया और उसका नाम ‘रूपमती’ पड़ा। ईश्वरी (पूर्व की ब्राह्मणी) का विवाह एक कुलीन ब्राह्मण से हुआ और रूपमती (पूर्व की रानी) का विवाह एक चक्रवर्ती राजा से हुआ।

ईश्वरी को अपने पिछले जन्म का सब कुछ याद था। इसलिए उसने इस जन्म में नियम से ‘संतान सप्तमी’ का व्रत करना शुरू कर दिया। इस व्रत के प्रताप से ईश्वरी को आठ सुंदर और स्वस्थ पुत्र प्राप्त हुए। वहीं दूसरी ओर, रानी रूपमती (पूर्व की रानी चंद्रमुखी) को पिछले जन्म का कुछ याद नहीं था, इसलिए उसने व्रत नहीं किया। परिणामस्वरूप, उसके जो भी बच्चे होते, वे जन्म लेते ही मर जाते। रानी हमेशा दुखी और निराश रहती थी।

ईर्ष्या और चमत्कार: एक दिन ईश्वरी (ब्राह्मणी) अपने आठों पुत्रों को लेकर अपनी पुरानी सहेली रानी रूपमती से मिलने महल में गई। रानी अपने मृत बच्चों के शोक में थी और ईश्वरी के सुंदर, स्वस्थ बच्चों को देखकर उसके मन में भयंकर ईर्ष्या पैदा हो गई।

रानी ने ईश्वरी के बच्चों को मारने की साजिश रची। उसने ईश्वरी के बच्चों के भोजन में जहर मिला दिया, लेकिन भगवान शिव की कृपा (संतान सप्तमी के व्रत) से बच्चों को कुछ नहीं हुआ। फिर रानी ने उन्हें गहरी खाई में धकेलने और कुएं में फेंकने का प्रयास किया, लेकिन हर बार महादेव ने उन बच्चों की रक्षा की और वे हंसते-खेलते जीवित बच गए।

सत्य का ज्ञान और व्रत का पालन: जब रानी अपने सभी कुप्रयासों में विफल हो गई, तो वह ईश्वरी के पैरों में गिर पड़ी और क्षमा मांगते हुए रोने लगी। उसने पूछा, “हे सखी! मैंने तुम्हारे बच्चों को मारने के कई प्रयास किए, लेकिन इनका बाल भी बांका नहीं हुआ। तुम्हारे पास ऐसी कौन सी जादुई शक्ति है?”

ईश्वरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे सखी! यह कोई जादू नहीं है। क्या तुम्हें हमारा पिछला जन्म याद है जब हम सरयू नदी के तट पर गए थे और संतान सप्तमी का संकल्प लेकर भूल गए थे? मैंने इस जन्म में अपनी गलती सुधार ली है। मैं भगवान शिव और माता पार्वती का ‘संतान सप्तमी’ का व्रत पूरे नियमों से करती हूँ। उसी व्रत के प्रताप से भगवान भोलेनाथ मेरे बच्चों की रक्षा कर रहे हैं।”

ईश्वरी की बात सुनकर रानी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने ईश्वरी से व्रत की विधि पूछी और पूर्ण निष्ठा, पश्चाताप और भक्ति भाव से ‘संतान सप्तमी’ का व्रत किया। भगवान शिव और माता पार्वती ने रानी को क्षमा कर दिया और उसे भी स्वस्थ, सुंदर और दीर्घायु पुत्र की प्राप्ति हुई।

(कथा के अंत में कहें: हे उमापति महादेव! जिस प्रकार आपने ईश्वरी और रानी पर कृपा की और उनके बच्चों की रक्षा की, उसी प्रकार इस कथा को पढ़ने, सुनने और हुंकारा भरने वाली सभी माताओं की संतानों की रक्षा करना और उन्हें दीर्घायु प्रदान करना।)

7. संतान की रक्षा, धन और उन्नति के लिए विशेष उपाय (Astrological Remedies on Santan Saptami)

संतान सप्तमी का दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत सिद्ध माना जाता है। 17 सितंबर 2026 को पूजा के साथ-साथ यदि आप इन अचूक उपायों को आजमाते हैं, तो जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं:

I. संतान प्राप्ति के लिए अचूक उपाय (For Childbirth)

जो माताएं संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें संतान सप्तमी के दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखना चाहिए। शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर कच्चा दूध, केसर और बेलपत्र अर्पित करें। इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण के ‘संतान गोपाल मंत्र’ (ॐ देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥) का 108 बार जाप करें। भगवान शिव और कृष्ण की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।

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II. बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए (For Child’s Health)

यदि आपका बच्चा बार-बार बीमार पड़ता है या उसे नजर बहुत लगती है, तो संतान साते के दिन पूजा में रखे गए 7 गांठ वाले धागे (डोरे) को बच्चे के गले या दाहिने हाथ में बांध दें। यह धागा एक अभेद्य रक्षा-कवच (Shield) का काम करता है और बच्चे को हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियों से बचाता है।

III. बच्चों की विद्या और एकाग्रता के लिए

जिन बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता, माताएं इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ श्री गणेश जी (जो ज्ञान के देवता हैं) को पीले फूल और दूर्वा अर्पित करें। पूजा के बाद बच्चे के माथे पर शिव जी पर चढ़ाए गए चंदन का तिलक लगाएं। इससे एकाग्रता (Concentration) बढ़ती है।

IV. घर में सुख-शांति और आर्थिक उन्नति के लिए

इस दिन शाम के समय (प्रदोष काल में) शिव मंदिर में जाकर गाय के घी का एक बड़ा दीपक जलाएं और ‘दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र’ या ‘शिव चालीसा’ का पाठ करें। यह उपाय परिवार के आर्थिक संकटों को जड़ से खत्म कर देता है और घर में अटूट शांति स्थापित करता है।

8. क्या है 7 की संख्या का रहस्य? (The Mystery of Number 7)

संतान सप्तमी के व्रत में हर वस्तु 7 की संख्या में होती है (7 पुए, 7 गांठें)। हिंदू धर्म में अंक 7 को अत्यंत शुभ, पूर्ण और रहस्यमयी माना गया है।

  • हमारे शरीर में 7 चक्र (Chakras) होते हैं।

  • आकाश में सप्तर्षि (7 ऋषि) हैं।

  • विवाह में 7 फेरे लिए जाते हैं।

  • संगीत में 7 सुर होते हैं।

  • प्रकाश में 7 रंग (Rainbow) होते हैं।

इस प्रकार, 7 की संख्या ब्रह्मांड की पूर्णता का प्रतीक है। 7 पुए और 7 गांठें ईश्वर को यह दर्शाने के लिए हैं कि माता अपने बच्चे के लिए सभी सात जन्मों की सुरक्षा और पूर्णता की कामना कर रही है।

9. संतान साते के दिन क्या करें और क्या न करें? (Do’s and Don’ts)

व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए:

क्या करें (Do’s):

  • इस दिन पूर्ण सात्विकता बनाए रखें। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और मन को शांत रखें।

  • जरूरतमंद बच्चों को मिठाई, फल, दूध या शिक्षा से जुड़ी सामग्री (किताबें, पेन) का दान करें।

  • अपने बच्चों के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दें और उन्हें अच्छे संस्कार सिखाएं।

क्या न करें (Don’ts):

  • इस दिन घर में लहसुन, प्याज, अंडा, मांस और मदिरा का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

  • व्रत रखने वाली माताओं को क्रोध नहीं करना चाहिए, बच्चों को डांटना या पीटना नहीं चाहिए।

  • भगवान शिव की पूजा में कभी भी कुमकुम या सिंदूर का प्रयोग (शिवलिंग पर) न करें, यह केवल माता पार्वती को चढ़ाया जाता है।

Santan Saptami 2026 (17 सितंबर 2026) का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के उस निस्वार्थ स्वरूप और प्रेम का जश्न है जो एक माँ अपनी संतान के लिए रखती है। कथा में वर्णित ईश्वरी का विश्वास हमें यह सिखाता है कि जो माता अपने बच्चों को भगवान शिव के भरोसे छोड़ देती है, उस पर दुनिया की कोई भी बुरी ताकत हावी नहीं हो सकती।

इस वर्ष आप भी संतान साते (संतान सप्तमी) का व्रत पूर्ण निष्ठा, नियमों (7 पुए और 7 गांठें) और विश्वास के साथ रखें। भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाएं और माता पार्वती से अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। भगवान उमापति महादेव की कृपा से आपके घर-आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती रहें, वे स्वस्थ और संस्कारवान बनें, और आपका परिवार सदा सुरक्षित रहे, यही हमारी मंगल कामना है।

“बोलो उमापति महादेव की जय! माता पार्वती की जय!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Santan Saptami 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में संतान साते (संतान सप्तमी) किस तारीख को मनाई जाएगी?

उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का पावन पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 17 सितंबर 2026, गुरुवार को पड़ रही है। यह त्योहार गणेश चतुर्थी के तीन दिन बाद आता है।

प्रश्न 2: संतान सप्तमी का व्रत क्यों रखा जाता है?

उत्तर: यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, उज्ज्वल भविष्य और उन्हें सभी प्रकार के रोगों व संकटों से बचाने के लिए रखा जाता है। इसके साथ ही, जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं, वे भी भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद के लिए यह व्रत पूर्ण निष्ठा से रखते हैं।

प्रश्न 3: इस व्रत में 7 की संख्या (7 पुए और 7 गांठें) का क्या महत्व है?

उत्तर: ‘सप्तमी’ का अर्थ 7 होता है। हिंदू धर्म में 7 का अंक पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक है (जैसे 7 जन्म, 7 फेरे, 7 चक्र)। पूजा में माताएं आटे और गुड़ से बने 7 मीठे पुए (Puwe) भगवान को चढ़ाती हैं और 7 गांठों वाला डोरा (धागा) पहनती हैं, जो सात जन्मों तक संतान की रक्षा और पूर्णता का प्रतीक है। व्रत खोलने पर माताएं इन्हीं 7 पुओं को खाती हैं।

प्रश्न 4: संतान साते की पूजा में किस देवता की आराधना की जाती है?

उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से देवों के देव महादेव (भगवान शिव) और माता पार्वती की आराधना की जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव अकाल मृत्यु को टालने वाले और संकटमोचन हैं। उनकी पूजा करने से संतान पर आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

प्रश्न 5: क्या इस व्रत को बीच में छोड़ा जा सकता है?

उत्तर: धार्मिक मान्यताओं और व्रत कथा के अनुसार, यदि किसी ने संतान सप्तमी का व्रत संकल्प लेकर शुरू किया है, तो उसे बीच में छोड़ना नहीं चाहिए (कथा में रानी चंद्रमुखी को व्रत भूलने का दंड मिला था)। यदि कोई महिला अस्वस्थ है या व्रत रखने में असमर्थ है, तो वह फलाहार कर सकती है या उसकी जगह उसके पति भी यह व्रत रख सकते हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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