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Rishi Panchami 2026 Date: ऋषि पंचमी कब है? जानिए सप्तर्षि पूजा का महत्व, शुभ मुहूर्त, व्रत कथा और अचूक उपायIt takes 15 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में ज्ञान, तपस्या और गुरुओं का स्थान सर्वोच्च माना गया है। भारतीय संस्कृति उन महान ऋषियों और मुनियों की सदैव ऋणी रही है, जिन्होंने अपने तप और ज्ञान से वेदों, पुराणों और उपनिषदों की रचना की तथा मानव जाति को धर्म का मार्ग दिखाया। इन्हीं सप्तर्षियों (सात महान ऋषियों) के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है— ‘ऋषि पंचमी’ (Rishi Panchami)

यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं से रजस्वला (मासिक धर्म / Menstruation) अवस्था के दौरान जाने-अनजाने में जो भी धार्मिक भूलें या अशुद्धियां हो जाती हैं, उनके प्रायश्चित और पाप मुक्ति के लिए ऋषि पंचमी का व्रत सबसे फलदायी माना गया है। गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन मनाए जाने वाले इस पर्व में सप्तर्षियों के साथ-साथ देवी अरुंधती की भी पूजा की जाती है।

यदि आप भी जानना चाहती हैं कि वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी कब है (Rishi Panchami 2026 Date), सप्तर्षि कौन हैं, इस व्रत में ‘अपामार्ग’ (चिरचिटा) का क्या महत्व है, बिना हल चले अन्न का नियम क्या है, और इस दिन की पौराणिक व्रत कथा क्या है, तो यह अत्यंत विस्तृत, ज्ञानवर्धक और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।

1. वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी कब है? (Rishi Panchami 2026 Date & Time)

हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी का पावन व्रत हर वर्ष भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को रखा जाता है। यह त्योहार श्री गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) के ठीक एक दिन बाद मनाया जाता है।

वैदिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर (सोमवार) को है। अतः इसके ठीक अगले दिन, वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी का महापर्व 15 सितंबर 2026, मंगलवार को अत्यंत श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ मनाया जाएगा।

ऋषि पंचमी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों की तालिका (Muhurat Table)

ऋषि पंचमी की पूजा मुख्य रूप से प्रातःकाल (सुबह) या मध्याह्न काल में की जाती है। 15 सितंबर 2026 के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त की तालिका यहाँ दी गई है:

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time 2026)
ऋषि पंचमी व्रत की मुख्य तिथि 15 सितंबर 2026 (मंगलवार)
भाद्रपद शुक्ल पंचमी तिथि का आरंभ 14 सितंबर 2026, सायं 04:15 बजे से
भाद्रपद शुक्ल पंचमी तिथि की समाप्ति 15 सितंबर 2026, दोपहर 02:45 बजे तक
सप्तर्षि पूजा का प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त सुबह 07:45 बजे से 10:15 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त (दोपहर की पूजा) सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
मुख्य देवी-देवता सप्तर्षि (सात ऋषि) और देवी अरुंधती

(नोट: पंचमी तिथि 15 सितंबर को दोपहर तक व्याप्त रहेगी, इसलिए उदया तिथि के नियमानुसार व्रत और सप्तर्षि पूजा 15 सितंबर को ही की जाएगी।)

2. ऋषि पंचमी क्या है और यह व्रत क्यों रखा जाता है? (Significance of Rishi Panchami)

ऋषि पंचमी किसी देवी-देवता का त्योहार नहीं है, बल्कि यह उन सात महान ऋषियों (सप्तर्षि) को समर्पित है जिन्होंने अपने तप और ज्ञान से इस ब्रह्मांड का कल्याण किया। इस व्रत को रखने के पीछे गहरे धार्मिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं:

I. रजस्वला दोष (मासिक धर्म की अशुद्धि) से मुक्ति

प्राचीन काल में और हिंदू शास्त्रों के अनुसार, महिलाओं के रजस्वला (Menstruation) होने के दिनों में उन्हें धार्मिक कार्यों, रसोई और पूजा-पाठ से दूर रहने का नियम था (जिसका मुख्य उद्देश्य उन्हें शारीरिक आराम देना था)। लेकिन कई बार जाने-अनजाने में महिलाओं से इन नियमों का उल्लंघन हो जाता है, जिससे उन्हें ‘रजस्वला दोष’ लगता है। मान्यता है कि ऋषि पंचमी का व्रत पूरे विधि-विधान से करने पर महिलाओं को इन सभी दोषों और जाने-अनजाने हुए पापों से मुक्ति मिल जाती है और उनका शरीर व आत्मा शुद्ध हो जाती है।

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II. सप्तर्षियों के प्रति कृतज्ञता

हमारे गोत्र (Gotra) और वंश इन्हीं ऋषियों के नाम पर आधारित हैं। हम सभी किसी न किसी ऋषि की संतान हैं। वर्ष में एक दिन अपने मूल पूर्वजों (ऋषियों) को जल अर्पण (तर्पण) करना और उनकी पूजा करना हमारा परम कर्तव्य है। यह व्रत ज्ञान, सद्बुद्धि और विद्या की प्राप्ति के लिए भी रखा जाता है।

III. शारीरिक और मानसिक शुद्धि

यह व्रत पूर्णतः डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification) की प्रक्रिया पर आधारित है। इस दिन विशेष जड़ी-बूटियों (अपामार्ग) से स्नान किया जाता है और केवल प्राकृतिक, बिना हल चले अन्न का सेवन किया जाता है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की शुद्धि करता है।

3. सप्तर्षि कौन हैं? (Who are the Saptarishis?)

आकाश मंडल में ‘सप्तर्षि तारामंडल’ (Ursa Major) के रूप में चमकने वाले इन सात ऋषियों के नाम विभिन्न कल्पों और मन्वंतरों में बदलते रहते हैं। वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर के अनुसार, ऋषि पंचमी के दिन जिन सात महान ऋषियों और एक देवी की पूजा की जाती है, वे इस प्रकार हैं:

  1. महर्षि कश्यप: सृष्टि के रचयिता और सभी देवों-असुरों के पिता।

  2. महर्षि अत्रि: भगवान दत्तात्रेय, चंद्रमा और दुर्वासा ऋषि के पिता।

  3. महर्षि भारद्वाज: आयुर्वेद और विमान शास्त्र के महान ज्ञाता।

  4. महर्षि विश्वामित्र: गायत्री मंत्र के दृष्टा और भगवान राम के गुरु।

  5. महर्षि गौतम: अहल्या के पति और न्याय दर्शन के प्रणेता।

  6. महर्षि जमदग्नि: भगवान परशुराम के पिता।

  7. महर्षि वशिष्ठ: सूर्यवंश (भगवान राम के कुल) के कुलगुरु।

  8. देवी अरुंधती: महर्षि वशिष्ठ की पत्नी, जो अपनी पवित्रता और पतिव्रता धर्म के लिए पूजनीय हैं। (सप्तर्षियों के साथ इनकी पूजा अनिवार्य है)।

4. अपामार्ग (चिरचिटा / आंधीझाड़ा) का वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व

ऋषि पंचमी के व्रत में ‘अपामार्ग’ (जिसे आम भाषा में चिरचिटा, आंधीझाड़ा या लटजीरा भी कहा जाता है) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक जंगली औषधीय पौधा है जिसके बीज कपड़ों पर चिपक जाते हैं।

  • दातुन (Brush): इस दिन सुबह उठकर सबसे पहले अपामार्ग की टहनी से दातुन (दांत साफ) किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, अपामार्ग मुंह के सभी बैक्टीरिया और पायरिया जैसे रोगों को खत्म कर देता है।

  • स्नान (Bathing): नहाने के पानी में अपामार्ग के पत्ते, आंवला और विशेष औषधियां डाली जाती हैं। कई महिलाएं अपामार्ग की टहनियों को सिर पर रखकर स्नान करती हैं। यह जड़ी-बूटियां शरीर की त्वचा (Skin) को शुद्ध करती हैं और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती हैं।

  • पाप नाशक: धार्मिक मान्यता है कि अपामार्ग के प्रयोग से शरीर के बाहरी और भीतरी सभी पाप व अशुद्धियां धुल जाती हैं।

5. ऋषि पंचमी व्रत के कड़े नियम (Rules of Rishi Panchami Vrat)

यह व्रत प्रकृति और सादगी को समर्पित है। इसके नियम अत्यंत कड़े होते हैं:

  • हल से जुता हुआ अन्न वर्जित है: यह ऋषि पंचमी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण नियम है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं खेत में हल चलाकर (जुताई करके) उगाया गया कोई भी अन्न (जैसे गेहूं, चावल, दालें आदि) नहीं खाती हैं।

  • क्या खाएं (Falahar): इस व्रत में मुख्य रूप से तालाबों या जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले ‘पसई/तिन्नी के चावल’ (Wild Rice), सामा के चावल (Samo Rice), मोरधन, शकरकंद (Sweet potato), और कंदमूल का सेवन किया जाता है। सब्जियां भी वही खाई जाती हैं जो बिना जोते लताओं (Vines) पर लगती हैं (जैसे तोरई, लौकी, कद्दू)।

  • गाय के दूध का त्याग: कुछ क्षेत्रों में इस दिन गाय के दूध का भी सेवन नहीं किया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि गाय के दूध पर उसके बछड़े का अधिकार है।

  • ब्रह्मचर्य और सत्य: व्रत के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए और असत्य बोलने से बचना चाहिए।

6. ऋषि पंचमी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

15 सितंबर 2026 को प्रातःकाल या मध्याह्न में सप्तर्षियों की पूजा इस शास्त्र-सम्मत विधि से करें:

१. स्नान और शुद्धि

  • सुबह सूर्योदय से पूर्व उठें। अपामार्ग (चिरचिटा) की दातुन से मुंह साफ करें।

  • नहाने के पानी में आंवला, अपामार्ग के पत्ते और गंगाजल डालकर स्नान करें।

  • स्वच्छ और कोरे (या धुले हुए पवित्र) वस्त्र धारण करें। महिलाएं लाल, पीला या गुलाबी वस्त्र पहन सकती हैं।

२. पूजा स्थल की स्थापना

  • घर के पूजा कक्ष या आंगन में गाय के गोबर से लीपकर (या गंगाजल छिड़ककर) एक स्थान पवित्र करें।

  • वहां एक लकड़ी की चौकी रखें और उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं।

  • हल्दी, कुमकुम या अष्टगंध से कपड़े पर सात ऋषियों (सप्तर्षि) और देवी अरुंधती का प्रतीक (सात छोटी ढेरी या रेखाएं) बनाएं। आप चाहें तो सप्तर्षि की तस्वीर या कलश भी स्थापित कर सकते हैं।

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३. पंचामृत स्नान और श्रृंगार

  • सप्तर्षियों का ध्यान करते हुए उन्हें जल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) का छींटा देकर प्रतीकात्मक स्नान कराएं।

  • उन्हें पीला चंदन, कुमकुम, रोली, और अक्षत (बिना जुते हुए चावल या सामा के चावल) अर्पित करें।

  • ऋषियों को जनेऊ (यज्ञोपवीत) और पीले पुष्पों की माला पहनाएं।

४. नैवेद्य (भोग) अर्पण

  • सप्तर्षियों को ताजे फल, कंदमूल, शकरकंद, और बिना जुते हुए अन्न (सामा के चावल की खीर) का भोग लगाएं।

  • धूप, गाय के घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित करें।

५. व्रत कथा और आरती

  • हाथ में पुष्प और सामा के चावल लेकर ऋषि पंचमी की व्रत कथा (नीचे दी गई है) का पाठ करें या सुनें।

  • कथा के पश्चात् सप्तर्षियों की आरती उतारें।

  • पूजा के अंत में हाथ जोड़कर अपने जाने-अनजाने हुए पापों (विशेषकर रजस्वला अवस्था में हुई भूलों) के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

  • पूजा के बाद किसी योग्य ब्राह्मण या साधु को दान-दक्षिणा (वस्त्र, फल, अन्न) अवश्य दें।

7. ऋषि पंचमी की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)

ऋषि पंचमी के व्रत का पूर्ण फल इस पौराणिक कथा को सुने बिना प्राप्त नहीं होता। यह कथा कर्मों के फल और इस व्रत के महत्व को दर्शाती है:

कथा (ब्राह्मण उत्तंक और सुशीला की कहानी): विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुशीला था, जो अत्यंत पतिव्रता थी। उनके दो बच्चे थे— एक पुत्र और एक पुत्री। जब पुत्री विवाह योग्य हुई, तो ब्राह्मण ने उसका विवाह एक सुयोग्य वर से कर दिया। परंतु भाग्य का खेल देखिए, विवाह के कुछ ही दिनों बाद पुत्री के पति की मृत्यु हो गई और वह कम उम्र में ही विधवा हो गई।

दुखित होकर वह कन्या अपने माता-पिता के घर वापस आ गई। उत्तंक ब्राह्मण ने गंगा किनारे एक कुटिया बनाई और अपनी पत्नी व पुत्री के साथ वहीं तपस्या करते हुए जीवन बिताने लगा।

एक दिन वह विधवा पुत्री नदी के किनारे सो रही थी। अचानक उसकी माता सुशीला ने देखा कि उसकी पुत्री के शरीर पर कीड़े (Insects) पड़ गए हैं। यह वीभत्स दृश्य देखकर सुशीला घबरा गई और दौड़कर अपने पति उत्तंक के पास गई। उसने रोते हुए पूछा, “हे स्वामी! मेरी इस संस्कारी पुत्री की यह क्या दुर्दशा हो गई है? इसे कौन से पाप की सजा मिल रही है?”

उत्तंक ब्राह्मण एक सिद्ध योगी थे। उन्होंने ध्यान लगाकर अपनी पुत्री के पूर्व जन्म को देखा और कहा, “हे भद्रे! हमारी पुत्री पिछले जन्म में भी एक ब्राह्मणी थी। उस जन्म में इसने रजस्वला (मासिक धर्म) होने पर भी रसोई घर में प्रवेश किया था और पूजा के बर्तनों को छू लिया था। जब इसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो इसने उस पाप का प्रायश्चित नहीं किया और न ही ‘ऋषि पंचमी’ का व्रत रखा। उसी रजस्वला दोष और पाप के कारण इस जन्म में यह विधवा हुई है और इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।”

सुशीला ने रोते हुए पूछा, “हे प्राणनाथ! अब मेरी पुत्री इस भयंकर पाप से कैसे मुक्त हो सकती है?”

उत्तंक ब्राह्मण ने उपाय बताते हुए कहा, “यदि हमारी पुत्री इसी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (ऋषि पंचमी) को पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और नियमों (बिना हल चले अन्न का सेवन) के साथ सप्तर्षियों की पूजा करे और व्रत रखे, तो इसके पूर्व जन्म के सभी पाप भस्म हो जाएंगे।”

पिता की आज्ञा मानकर उस कन्या ने ऋषि पंचमी का व्रत पूरे विधि-विधान और कठोर नियमों के साथ किया। उसने अपामार्ग से स्नान किया और सप्तर्षियों से क्षमा मांगी। व्रत के प्रभाव से उसके शरीर के कीड़े नष्ट हो गए, वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गई और मृत्यु के पश्चात् उसे उत्तम लोकों की प्राप्ति हुई।

(कथा के अंत में कहें: हे सप्तर्षियों! जिस प्रकार आपने उस कन्या के पाप नष्ट किए, उसी प्रकार इस कथा को पढ़ने और सुनने वाली सभी माताओं और बहनों के जाने-अनजाने हुए पापों को क्षमा करना और उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करना।)

8. ऋषि पंचमी के दिन किए जाने वाले अचूक उपाय (Special Remedies)

यदि जीवन में अशांति है, विद्या में रुकावट आ रही है या कोई मानसिक तनाव है, तो 15 सितंबर 2026 को ऋषि पंचमी के दिन इन उपायों को अवश्य करें:

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I. बुद्धि और विद्या प्राप्ति के लिए (For Education and Wisdom)

सप्तर्षि ज्ञान के सर्वोच्च प्रतीक हैं। जिन विद्यार्थियों या लोगों का पढ़ाई में मन नहीं लगता, उन्हें ऋषि पंचमी के दिन भगवान शिव (जो सभी विद्याओं के स्वामी हैं) और सप्तर्षियों को पीले पुष्प और पीला चंदन अर्पित करना चाहिए। साथ ही ‘गायत्री मंत्र’ का 108 बार जाप करें। इससे एकाग्रता और बुद्धि का विकास होता है।

II. पितृ दोष शांति के लिए (For Pitru Dosh)

हमारे गोत्र ऋषियों से ही चले हैं। यदि कुंडली में पितृ दोष है या परिवार में अकारण कलह रहती है, तो इस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में तिल डालकर सप्तर्षियों और अपने गोत्र के ऋषि के नाम से तर्पण (जल अर्पण) करें। इससे पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं।

III. शारीरिक रोगों से मुक्ति के लिए

यदि त्वचा संबंधी कोई रोग है या स्वास्थ्य खराब रहता है, तो ऋषि पंचमी के दिन अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को साफ करके उसे एक लाल धागे में बांधकर अपनी दाहिनी कलाई या गले में धारण करें। आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र में अपामार्ग को नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियों को खींचने वाला माना गया है।

IV. घर में सकारात्मकता के लिए

इस दिन घर के पूजा कक्ष में या आंगन में एक चौकोर मंडप (रंगोली) बनाएं और उसमें 7 मिट्टी के दीपक गाय के घी से जलाएं। यह सात दीपक सप्तर्षियों के प्रतीक हैं, जो आपके घर के अंधकार (अज्ञानता) को दूर कर सकारात्मकता (Positivity) भर देंगे।

9. मासिक धर्म (Menstruation) और हिंदू धर्म: एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक युग में कई लोगों को लगता है कि हिंदू धर्म में मासिक धर्म को ‘अछूत’ माना जाता है, लेकिन इसके पीछे का मूल विज्ञान कुछ और था।

प्राचीन काल में महिलाओं का कार्य अत्यधिक शारीरिक श्रम (चक्की पीसना, कुएं से पानी लाना, लकड़ी काटना) वाला होता था। मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के शरीर से रक्तस्राव (Blood loss) होता है, जिससे वे शारीरिक रूप से कमजोर महसूस करती हैं। उन्हें इस दौरान पूर्ण विश्राम (Complete Rest) देने के लिए ही यह नियम बनाया गया था कि वे 3-4 दिनों तक रसोई या पूजा के कठिन कार्यों से दूर रहें।

इसे ‘अशुद्धि’ का नाम इसलिए दिया गया ताकि लोग (विशेषकर पुरुष) इस नियम का सख्ती से पालन करें और महिलाओं को आराम दें। ऋषि पंचमी का व्रत उस विश्राम अवधि के बाद शरीर और मन को पुनः शुद्ध करने (Detoxify) और सकारात्मक ऊर्जा से भरने का एक शानदार आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक तरीका है।

Rishi Panchami 2026 (15 सितंबर 2026) का पर्व केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों (महान ऋषियों) के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है। यह दिन हमें सिखाता है कि मनुष्य से जीवन में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन उन गलतियों का पश्चाताप (Repentance) करना और स्वयं को सुधारना ही सच्चे धर्म का मार्ग है।

इस वर्ष आप भी ऋषि पंचमी का व्रत पूर्ण निष्ठा, नियमों (बिना हल चले अन्न का सेवन) और विश्वास के साथ रखें। अपामार्ग से स्नान कर शारीरिक शुद्धि करें और सप्तर्षियों का ध्यान कर आत्मिक शुद्धि करें। सप्तर्षि और देवी अरुंधती आपके जीवन के सभी दोषों को दूर करें, आपको सद्बुद्धि प्रदान करें और आपके परिवार को सुख-समृद्धि से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।

“ॐ सप्तर्षिभ्यो नमः! ॐ अरुंधत्यै नमः!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Rishi Panchami 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) किस तारीख को मनाई जाएगी?

उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी का पावन पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 15 सितंबर 2026, मंगलवार को पड़ रही है। यह श्री गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन आता है।

प्रश्न 2: ऋषि पंचमी का व्रत मुख्य रूप से क्यों रखा जाता है?

उत्तर: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत महिलाओं द्वारा मुख्य रूप से ‘रजस्वला दोष’ (मासिक धर्म के दौरान जाने-अनजाने में पूजा या रसोई से जुड़ी हुई गलतियों/अशुद्धियों) से मुक्ति और उनके प्रायश्चित के लिए रखा जाता है। इस व्रत को करने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है।

प्रश्न 3: ऋषि पंचमी के व्रत में हल से जुता हुआ अन्न क्यों नहीं खाया जाता है?

उत्तर: ऋषि पंचमी का व्रत पूर्ण रूप से प्रकृति और सादगी को समर्पित है। ऋषियों का जीवन अत्यंत सादा और प्राकृतिक था। इसलिए, इस व्रत में धरती का सीना चीरकर (हल चलाकर) उगाया गया कोई भी अन्न (जैसे गेहूं, चावल) नहीं खाया जाता। इसमें केवल जंगलों या तालाबों में स्वयं उगने वाले कंदमूल, फल, सामा (Samo) या तिन्नी के चावल (Wild Rice) का ही सेवन किया जाता है।

प्रश्न 4: ऋषि पंचमी की पूजा में ‘अपामार्ग’ (चिरचिटा) का क्या महत्व है?

उत्तर: अपामार्ग (चिरचिटा या आंधीझाड़ा) एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है। ऋषि पंचमी के दिन सुबह इसी की टहनी से दातुन (मंजन) किया जाता है और नहाने के पानी में इसके पत्ते डाले जाते हैं। मान्यता है कि अपामार्ग के प्रयोग से शरीर के बाहरी और भीतरी सभी दोष, बीमारियां और पाप नष्ट हो जाते हैं और पूर्ण शुद्धि प्राप्त होती है।

प्रश्न 5: ऋषि पंचमी के दिन किन-किन ऋषियों की पूजा की जाती है?

उत्तर: इस दिन वैवस्वत मन्वंतर के सात महान ऋषियों (सप्तर्षि) की पूजा की जाती है, जिनके नाम हैं— महर्षि कश्यप, महर्षि अत्रि, महर्षि भारद्वाज, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि गौतम, महर्षि जमदग्नि और महर्षि वशिष्ठ। इन सात ऋषियों के साथ महर्षि वशिष्ठ की पत्नी ‘देवी अरुंधती’ की पूजा करना भी अनिवार्य माना जाता है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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