सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जिस एक शक्ति को समस्त वेदों, उपनिषदों और पुराणों का सार माना गया है, वे हैं— वेदमाता भगवती गायत्री (Maa Gayatri)। महर्षि विश्वामित्र द्वारा दृष्ट ‘गायत्री मंत्र’ को हिंदू धर्म का सबसे पवित्र और शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं कहा है— “गायत्री छन्दसामहम्” (अर्थात्, छन्दों में मैं गायत्री हूँ)। गायत्री केवल एक मंत्र या देवी नहीं हैं; वे साक्षात परब्रह्म का वह प्रकाश स्वरूप हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रकाशित करता है और हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य के प्रकाश (Illumination) की ओर ले जाता है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन त्रिदेवों की आराध्या होने के कारण माता गायत्री को ‘त्रिपदा’ और ‘वेदमाता’ कहा जाता है। जब मनुष्य का जीवन अज्ञान, वैचारिक भटकाव, गलत निर्णयों, बुद्धि की मलिनता, और सांसारिक दुखों से घिर जाता है, तब माता गायत्री की शरण में जाना ही एकमात्र ऐसा उपाय है जो उसके अंतःकरण को सूर्य के समान तेजवान बना देता है।
भगवती गायत्री की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत ज्ञान, प्राणशक्ति और उनकी अहैतुकी कृपा को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों ने उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री गायत्री सहस्रनाम’ (Gayatri Sahasranamam) के नाम से जाना जाता है।
‘सहस्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा ‘ज्ञान और तेज’ का अस्त्र है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर बौद्धिक और भौतिक संघर्षों, दरिद्रता, और रुके हुए कार्यों को पल भर में खोल देता है। जब व्यक्ति को समाज में एक स्थिर पद, कुशाग्र बुद्धि, तेजस्वी व्यक्तित्व, और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की आवश्यकता होती है, तब यह ‘श्री गायत्री सहस्रनाम’ साक्षात कल्पवृक्ष सिद्ध होता है।
गायत्री सहस्रनाम हिंदी | Gayatri Sahasranaam
ॐ तत्काररूपायै नमः
ॐ तत्वज्ञायै नमः
ॐ तत्पदार्थस्वरूपिण्यै नमः
ॐ तपस्स्वाध्यानिरतायै नमः
ॐ तपस्विजनसन्नुतायै नमः
ॐ तत्कीर्तिगुणसम्पन्नायै नमः
ॐ तथ्यवाचे नमः
ॐ तपोनिधये नमः
ॐ तत्वोपदेशसंबन्धायै नमः
ॐ तपोलोकनिवासिन्यै नमः
ॐ तरुणादित्यसंकाशायै नमः
ॐ तप्तकाञ्चनभूषणायै नमः
ॐ तमोपहारिण्यै नमः
ॐ तन्त्र्यै नमः
ॐ तारिण्यै नमः
ॐ ताररूपिण्यै नमः
ॐ तलादिभुवनान्तस्थायै नमः
ॐ तर्कशास्त्रविधायिन्यै नमः
ॐ तन्त्रसारायै नमः
ॐ तन्त्रमात्रे नमः
ॐ तन्त्रमार्गप्रदर्शिनियै नमः
ॐ तत्वायै नमः
ॐ तन्त्रविधानज्ञायै नमः
ॐ तन्त्रस्थायै नमः
ॐ तन्त्रसाक्षिण्यै नमः
ॐ तदेकध्याननिरतायै नमः
ॐ तत्त्वज्ञानप्रबोधिन्यै नमः
ॐ तन्नाममन्त्रसुप्रीतायै नमः
ॐ तपस्विजनसेवितायै नमः
ॐ सकाररूपायै नमः
ॐ सावित्र्यै नमः
ॐ सर्वरूपायै नमः
ॐ सनातन्यै नमः
ॐ संसारदुःखशमन्यै नमः
ॐ सर्वयागफलप्रदायै नमः
ॐ सकलायै नमः
ॐ सत्यसङ्कल्पायै नमः
ॐ सत्यायै नमः
ॐ सत्यप्रदायिन्यै नमः
ॐ सन्तोषजनन्यै नमः
ॐ सारायै नमः
ॐ सत्यलोकनिवासिन्यै नमः
ॐ समुद्रतनयाराध्यायै नमः
ॐ सामगानप्रियायै नमः
ॐ सत्यै नमः
ॐ समान्यै नमः
ॐ सामदेव्यै नमः
ॐ समस्तसुरसेवितायै नमः
ॐ सर्वसम्पत्तिजनन्यै नमः
ॐ सद्गुणायै नमः ॥ 50 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ सकलेष्टदायै नमः
ॐ सनकादिमुनिध्येयायै नमः
ॐ समानाधिकवर्जितायै नमः
ॐ साध्यायै नमः
ॐ सिद्धायै नमः
ॐ सुधावासायै नमः
ॐ सिद्ध्यै नमः
ॐ साध्यप्रदायिन्यै नमः
ॐ सद्युगाराध्यनिलयायै नमः
ॐ समुत्तिर्णायै नमः
ॐ सदाशिवायै नमः
ॐ सर्ववेदान्तनिलयायै नमः
ॐ सर्वशास्त्रर्थगोचरायै नमः
ॐ सहस्रदलपद्मस्थायै नमः
ॐ सर्वज्ञायै नमः
ॐ सर्वतोमुख्यै नमः
ॐ समयायै नमः
ॐ समयाचारायै नमः
ॐ सदसद्ग्रन्थिभेदिन्यै नमः
ॐ सप्तकोटिमहामन्त्रमात्रे नमः
ॐ सर्वप्रदायिन्यै नमः
ॐ सगुणायै नमः
ॐ संभ्रमायै नमः
ॐ साक्षिण्यै नमः
ॐ सर्वचैतन्यरूपिण्यै नमः
ॐ सत्कीर्तये नमः
ॐ सात्विकायै नमः
ॐ साध्व्यै नमः
ॐ सच्चिदानन्दस्वरूपिण्यै नमः
ॐ सङ्कल्परूपिण्यै नमः
ॐ सन्ध्यायै नमः
ॐ सालग्रामनिवासिन्यै नमः
ॐ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तायै नमः
ॐ सत्यज्ञानप्रबोधिन्यै नमः
ॐ विकाररूपायै नमः
ॐ विप्रश्रियै नमः
ॐ विप्राराधनतत्परायै नमः
ॐ विप्रप्रियायै नमः
ॐ विप्रकल्याण्यै नमः
ॐ विप्रवाक्यस्वरूपिण्यै नमः
ॐ विप्रमन्दिरमध्यस्थायै नमः
ॐ विप्रवादविनोदिन्यै नमः
ॐ विप्रोपाधिविनिर्भेत्र्यै नमः
ॐ विप्रहत्याविमोचन्यै नमः
ॐ विप्रत्रात्र्यै नमः
ॐ विप्रगात्रायै नमः
ॐ विप्रगोत्रविवर्धिन्यै नमः
ॐ विप्रभोजनसन्तुष्टायै नमः
ॐ विष्णुरूपायै नमः
ॐ विनोदिन्यै नमः ॥ 100 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ विष्णुमायायै नमः
ॐ विष्णुवन्द्यायै नमः
ॐ विष्णुगर्भायै नमः
ॐ विचित्रिण्यै नमः
ॐ वैष्णव्यै नमः
ॐ विष्णुभगिन्यै नमः
ॐ विष्णुमायाविलासिन्यै नमः
ॐ विकाररहितायै नमः
ॐ विश्वाविज्ञानघनरूपिण्यै नमः
ॐ विबुधायै नमः
ॐ विष्णुसंकल्पायै नमः
ॐ विश्वामित्रप्रसादिन्यै नमः
ॐ विष्णुचैतन्यनिलयायै नमः
ॐ विष्णुस्वायै नमः
ॐ विश्वसाक्षिण्यै नमः
ॐ विवेकिन्यै नमः
ॐ वियद्रूपायै नमः
ॐ विजयायै नमः
ॐ विश्वमोहिन्यै नमः
ॐ विद्याधर्यै नमः
ॐ विधानज्ञायै नमः
ॐ वेदतत्वार्थरूपिण्यै नमः
ॐ विरूपाक्ष्यै नमः
ॐ विराड्रूपायै नमः
ॐ विक्रमायै नमः
ॐ विश्वमङ्गलायै नमः
ॐ विश्वंभरासमाराध्यायै नमः
ॐ विश्वभ्रमणकारिण्यै नमः
ॐ विनायक्यै नमः
ॐ विनोदस्थायै नमः
ॐ वीरगोष्ठीविवर्धिन्यै नमः
ॐ विवाहरहितायै नमः
ॐ विन्ध्यायै नमः
ॐ विन्ध्याचलनिवासिन्यै नमः
ॐ विद्याविद्याकर्यै नमः
ॐ विद्यायै नमः
ॐ विद्याविद्याप्रबोधिन्यै नमः
ॐ विमलायै नमः
ॐ विभवायै नमः
ॐ वेद्यायै नमः
ॐ विश्वस्थायै नमः
ॐ विविधोज्ज्वलायै नमः
ॐ वीरमध्यायै नमः
ॐ वरारोहायै नमः
ॐ वितन्त्रायै नमः
ॐ विश्वनायिकायै नमः
ॐ वीरहत्याप्रशमन्यै नमः
गायत्री सहस्रनाम
ॐ विनम्रजनपालिन्यै नमः
ॐ वीरधियै नमः
ॐ विविधाकारायै नमः
ॐ विरोधिजननाशिन्यै नमः
ॐ तुकाररूपायै नमः
ॐ तुर्यश्रियै नमः
ॐ तुलसीवनवासिन्यै नमः
ॐ तुरङ्ग्यै नमः
ॐ तुरगारूढायै नमः
ॐ तुलादानफलप्रदायै नमः
ॐ तुलामाघस्नानतुष्टायै नमः
ॐ तुष्टिपुष्टिप्रदायिन्यै नमः
ॐ तुरङ्गमप्रसन्तुष्टायै नमः
ॐ तुलितायै नमः
ॐ तुल्यमध्यगायै नमः
ॐ तुङ्गोत्तुङ्गायै नमः
ॐ तुङ्गकुचायै नमः
ॐ तुहिनाचलसंस्थितायै नमः
ॐ तुंबुरादिस्तुतिप्रीतायै नमः
ॐ तुषारशिखरीश्वर्यै नमः
ॐ तुष्टायै नमः
ॐ तुष्टिजनन्यै नमः
ॐ तुष्टलोकनिवासिन्यै नमः
ॐ तुलाधारायै नमः
ॐ तुलामध्यायै नमः
ॐ तुलस्थायै नमः
ॐ तुर्यरूपिण्यै नमः
ॐ तुरीयगुणगंभीरायै नमः
ॐ तूर्यनादस्वरूपिण्यै नमः
ॐ तूर्यविद्यालास्यतुष्टायै नमः
ॐ तूर्यशास्त्रीर्थवादिन्यै नमः
ॐ तुरीयशास्त्रतत्वज्ञायै नमः
ॐ तूर्यवादविनोदिन्यै नमः
ॐ तूर्यनादान्तनिलयायै नमः
ॐ तूर्यानन्दस्वरूपिण्यै नमः
ॐ तुरीयभक्तिजनन्यै नमः
ॐ तुर्यमार्गप्रदर्शिन्यै नमः
ॐ वकाररूपायै नमः
ॐ वागीश्यै नमः
ॐ वरेण्यायै नमः
ॐ वरसंविधायै नमः
ॐ वरायै नमः
ॐ वरिष्ठायै नमः
ॐ वैदेह्यै नमः
ॐ वेदशास्त्रप्रदर्शिन्यै नमः
ॐ विकल्पशमन्यै नमः
ॐ वाण्यै नमः
ॐ वाञ्चितार्थफलप्रदायै नमः
ॐ वयस्थायै नमः
ॐ वयोमध्यायै नमः
ॐ वयोवस्थाविवर्जितायै नमः
ॐ वन्दिन्यै नमः
ॐ वादिन्यै नमः ॥ 200 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ वर्यायै नमः
ॐ वाङ्मय्यै नमः
ॐ वीरवन्दितायै नमः
ॐ वानप्रस्थाश्रमस्थायै नमः
ॐ वनदुर्गायै नमः
ॐ वनालयायै नमः
ॐ वनजाक्ष्यै नमः
ॐ वनचर्यै नमः
ॐ वनितायै नमः
ॐ विश्वमोहिन्यै नमः
ॐ वशिष्ठवामदेवादिवन्द्यायै नमः
ॐ वन्द्यस्वरूपिण्यै नमः
ॐ वैद्यायै नमः
ॐ वैद्यचिकित्सायै नमः
ॐ वसुन्धरायै नमः
ॐ वषट्कार्यै नमः
ॐ वसुत्रात्रे नमः
ॐ वसुमात्रे नमः
ॐ वसुजन्मविमोचिन्यै नमः
ॐ वसुप्रदाय नमः
ॐ वासुदेव्यै नमः
ॐ वासुदेवमनोहर्यै नमः
ॐ वासवार्चितपादश्रियै नमः
ॐ वासवारिविनाशिन्यै नमः
ॐ वागीश्यै नमः
ॐ वाङ्मनस्थायै नमः
ॐ वशिन्यै नमः
ॐ वनवासभुवे नमः
ॐ वामदेव्यै नमः
ॐ वरारोहायै नमः
ॐ वाद्यघोषणतत्परायै नमः
ॐ वाचस्पतिसमाराध्यायै नमः
ॐ वेदमात्रे नमः
ॐ विनोदिन्यै नमः
ॐ रेकाररूपायै नमः
ॐ रेवायै नमः
ॐ रेवातीरनिवासिन्यै नमः
ॐ राजीवलोचनायै नमः
ॐ रामायै नमः
ॐ रागिण्यै नमः
ॐ रतिवन्दितायै नमः
ॐ रमण्यै नमः
ॐ रामजप्त्र्यै नमः
ॐ राज्यपायै नमः
ॐ रजताद्रिगायै नमः
ॐ राकिण्यै नमः 250
गायत्री सहस्रनाम
ॐ रेवत्यै नमः
ॐ रक्षायै नमः
ॐ रुद्रजन्मायै नमः
ॐ रजस्वलायै नमः
ॐ रेणुकारमण्यै नमः
ॐ रम्यायै नमः
ॐ रतिवृद्धायै नमः
ॐ रतायै नमः
ॐ रत्यै नमः
ॐ रावणानन्दसन्धायिन्यै नमः
ॐ राजश्रियै नमः
ॐ राजशेखर्यै नमः
ॐ रणमध्यायै नमः
ॐ रथारूढायै नमः
ॐ रविकोटिसमप्रभायै नमः
ॐ रविमण्डलमध्यस्थायै नमः
ॐ रजन्यै नमः
ॐ रविलोचनायै नमः
ॐ रथाङ्गपाण्यै नमः
ॐ रक्षोघ्न्यै नमः
ॐ रागिण्यै नमः
ॐ रावणार्चितायै नमः
ॐ रंभादिकन्यकाराध्यायै नमः
ॐ राज्यदायै नमः
ॐ राजवर्धिन्यै नमः
ॐ रजताद्रीशसक्थिस्थायै नमः
ॐ रम्यायै नमः
ॐ राजीवलोचनायै नमः
ॐ रम्यवाण्यै नमः
ॐ रमाराध्यायै नमः
ॐ राज्यधात्र्यै नमः
ॐ रतोत्सवायै नमः
ॐ रेवत्यै नमः
ॐ रतोत्साहायै नमः
ॐ राजहृद्रोगहारिण्यै नमः
ॐ रङ्गप्रवृद्धमधुरायै नमः
ॐ रङ्गमण्डपमध्यगायै नमः
ॐ रञ्जितायै नमः
ॐ राजजनन्यै नमः
ॐ रम्यायै नमः
ॐ राकेन्दुमध्यगायै नमः
ॐ राविण्यै नमः
ॐ रागिण्यै नमः
ॐ रंज्यायै नमः
ॐ राजराजेश्वरार्चितायै नमः
ॐ राजन्वत्यै नमः
ॐ राजनीत्यै नमः
ॐ रजताचलवासिन्यै नमः
ॐ राघवार्चितपादश्रियै नमः
ॐ राघवायै नमः
ॐ राघवप्रियायै नमः
ॐ रत्ननूपुरमध्याढ्यायै नमः
ॐ रत्नदीपनिवासिन्यै नमः
ॐ रत्नप्राकारमध्यस्थायै नमः ॥ 300 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ रत्नमण्डपमध्यगायै नमः
ॐ रत्नाभिषेकसन्तुष्टायै नमः
ॐ रत्नांग्यै नमः
ॐ रत्नदायिन्यै नमः
ॐ णिकाररूपिण्यै नमः
ॐ नित्यायै नमः
ॐ नित्यतृप्तायै नमः
ॐ निरञ्जनायै नमः
ॐ निद्रात्ययविशेषज्ञायै नमः
ॐ नीलजीमूतसन्निभायै नमः
ॐ नीवारशुकवत्तन्व्यै नमः
ॐ नित्यकल्याणरूपिण्यै नमः
ॐ नित्योत्सवायै नमः
ॐ नित्यपूज्यायै नमः
ॐ नित्यानन्दस्वरूपिण्यै नमः
ॐ निर्विकल्पायै नमः
ॐ निर्गुणस्थायै नमः
ॐ निश्चिन्तायै नमः
ॐ निरुपद्रवायै नमः
ॐ निस्संशयायै नमः
ॐ निरीहायै नमः
ॐ निर्लोभायै नमः
ॐ नीलमूर्धजायै नमः
ॐ निकिलागममध्यस्थायै नमः
ॐ निकिलागमसंस्थितायै नमः
ॐ नित्योपाधिविनिर्मुक्तायै नमः
ॐ नित्यकर्मफलप्रदायै नमः
ॐ नीलग्रीवायै नमः
ॐ निराहारायै नमः
ॐ निरञ्जनवरप्रदायै नमः
ॐ नवनीतप्रियायै नमः
ॐ नार्यै नमः
ॐ नरकार्णवतारिण्यै नमः
ॐ नारायण्यै नमः
ॐ निरीहायै नमः
ॐ निर्मलायै नमः
ॐ निर्गुणप्रियायै नमः
ॐ निश्चिन्तायै नमः
ॐ निगमाचारनिखिलागमवेदिन्यै नमः
ॐ निमेषायै नमः
ॐ निमेषोत्पन्नायै नमः
ॐ निमेषाण्डविधायिन्यै नमः
ॐ निर्विघ्नायै नमः
ॐ निवातदीपमध्यस्थायै नमः
ॐ नीचनाशिन्यै नमः
ॐ नीलवेण्यै नमः
ॐ नीलखण्डायै नमः
ॐ निर्विषायै नमः
ॐ निष्कशोभितायै नमः
ॐ नीलांशुकपरीधानायै नमः
गायत्री सहस्रनाम
ॐ निन्दघ्न्यै नमः
ॐ निरीश्वर्यै नमः
ॐ निश्वासोच्छ्वासमध्यस्थायै नमः
ॐ नित्ययौवनविलासिन्यै नमः
ॐ यङ्काररूपायै नमः
ॐ यन्त्रेश्यै नमः
ॐ यन्त्त्र्यै नमः
ॐ यन्त्रयशस्विन्यै नमः
ॐ यन्त्राराधनसंतुष्टायै नमः
ॐ यजमानस्वरूपिण्यै नमः
ॐ योगिपूज्यायै नमः
ॐ यकारस्थायै नमः
ॐ यूपस्तंभनिवासिन्यै नमः
ॐ यमघ्न्यै नमः
ॐ यमकल्पायै नमः
ॐ यशःकामायै नमः
ॐ यतीश्वर्यै नमः
ॐ यमादियोगनिरतायै नमः
ॐ यतिदुःखापहारिण्यै नमः
ॐ यज्ञायै नमः
ॐ यज्वै नमः
ॐ यजुर्गेयायै नमः
ॐ यज्ञेश्वरपतिव्रतायै नमः
ॐ यज्ञसूत्रप्रदायै नमः
ॐ यष्ट्रयै नमः
ॐ यज्ञकर्मफलप्रदायै नमः
ॐ यवाङ्कुरप्रियायै नमः
ॐ यन्त्र्यै नमः
ॐ यवदघ्न्यै नमः
ॐ यवार्चितायै नमः
ॐ यज्ञकर्त्र्यै नमः
ॐ यज्ञाङ्ग्यै नमः
ॐ यज्ञवाहिन्यै नमः
ॐ यज्ञसाक्षिण्यै नमः
ॐ यज्ञमुख्यै नमः
ॐ यजुष्यै नमः
ॐ यज्ञरक्षण्यै नमः
ॐ भकाररूपायै नमः
ॐ भद्रेश्यै नमः
ॐ भद्रकल्याणदायिन्यै नमः
ॐ भक्तप्रियायै नमः
ॐ भक्तसखायै नमः
ॐ भक्ताभीष्टस्वरूपिण्यै नमः
ॐ भगिन्यै नमः
ॐ भक्तसुलभायै नमः
ॐ भक्तिदायै नमः
ॐ भक्तवत्सलायै नमः
ॐ भक्तचैतन्यनिलयायै नमः
ॐ भक्तबन्धविमोचन्यै नमः
ॐ भक्तस्वरूपिण्यै नमः ॥ 400 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ भाग्यायै नमः
ॐ भक्तारोग्यप्रदायिन्यै नमः
ॐ भक्तमात्रे नमः
ॐ भक्तगम्यायै नमः
ॐ भक्ताभीष्टप्रदायिन्यै नमः
ॐ भास्कर्यै नमः
ॐ भैरव्यै नमः
ॐ भोग्यायै नमः
ॐ भवान्यै नमः
ॐ भयनाशिन्यै नमः
ॐ भद्रात्मिकायै नमः
ॐ भद्रदायिन्यै नमः
ॐ भद्रकाल्यै नमः
ॐ भयङ्कर्यै नमः
ॐ भगनिष्यन्दिन्यै नमः
ॐ भूम्न्यै नमः
ॐ भवबन्धविमोचन्यै नमः
ॐ भीमायै नमः
ॐ भवसखायै नमः
ॐ भङ्ग्यै नमः
ॐ भङ्गुरायै नमः
ॐ भीमदर्शिन्यै नमः
ॐ भल्ल्यै नमः
ॐ भिल्लीधरायै नमः
ॐ भीर्वै नमः
ॐ भेरुण्डायै नमः
ॐ भीमपापघ्न्यै नमः
ॐ भावज्ञायै नमः
ॐ भोगदात्र्यै नमः
ॐ भवघ्न्यै नमः
ॐ भूतिभूषणायै नमः
ॐ भूतिदायै नमः
ॐ भूमिदात्र्यै नमः
ॐ भूपतित्वप्रदायिन्यै नमः
ॐ भ्रामर्यै नमः
ॐ भ्रमर्यै नमः
ॐ भार्यै नमः
ॐ भवसागरतारिण्यै नमः
ॐ भण्डासुरवधोत्साहायै नमः
ॐ भाग्यदायै नमः
ॐ भावनोदिन्यै नमः
ॐ गोकाररूपायै नमः
ॐ गोमात्रे नमः
ॐ गुरुपत्न्यै नमः
ॐ गुरुप्रियायै नमः
ॐ गोरोचनप्रियायै नमः
ॐ गौर्यै नमः
ॐ गोविन्दगुणवर्धिन्यै नमः
ॐ गोपालचेष्टासन्तुष्टायै नमः
ॐ गोवर्धनवर्धिन्यै नमः
ॐ गोविन्दरूपिण्यै नमः
ॐ गोप्त्र्यै नमः
ॐ गोकुलानांविवर्धिन्यै नमः
ॐ गीतायै नमः
ॐ गीताप्रियायै नमः
ॐ गेयायै नमः
ॐ गोदायै नमः
ॐ गोरूपधारिण्यै नमः
ॐ गोप्यै नमः
ॐ गोहत्याशमन्यै नमः
ॐ गुणिन्यै नमः
ॐ गुणविग्रहायै नमः
ॐ गोविन्दजनन्यै नमः
ॐ गोष्ठायै नमः
ॐ गोप्रदायै नमः
ॐ गोकुलोत्सवायै नमः
ॐ गोचर्यै नमः
ॐ गौतम्यै नमः
ॐ गङ्गायै नमः
ॐ गोमुख्यै नमः
ॐ गुरुवासिन्यै नमः
ॐ गोपाल्यै नमः
ॐ गोमय्यै नमः
ॐ गुंभायै नमः
ॐ गोष्ठ्यै नमः
ॐ गोपुरवासिन्यै नमः
ॐ गरुडायै नमः
ॐ गमनश्रेष्ठायै नमः
ॐ गारुडायै नमः
ॐ गरुडध्वजायै नमः
ॐ गंभीरायै नमः
ॐ गण्डक्यै नमः
ॐ गुंभायै नमः
ॐ गरुडध्वजवल्लभायै नमः
ॐ गगनस्थायै नमः
ॐ गयावासायै नमः
ॐ गुणवृत्यै नमः
ॐ गुणोद्भवायै नमः
ॐ देकाररूपायै नमः
ॐ देवेश्यै नमः
ॐ दृग्रूपायै नमः
ॐ देवतार्चितायै नमः
ॐ देवराजेश्वरार्धाङ्ग्यै नमः
ॐ दीनदैन्यविमोचन्यै नमः
ॐ देशकालपरिज्ञानायै नमः
ॐ देशोपद्रवनाशिन्यै नमः
ॐ देवमात्रे नमः
ॐ देवमोहायै नमः
ॐ देवदानवमोहिन्यै नमः
ॐ देवेन्द्रार्चितपादश्रियै नमः 500 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ देवदेवप्रसादिन्यै नमः
ॐ देशान्तर्यै नमः
ॐ देशरूपायै नमः
ॐ देवालयनिवासिन्यै नमः
ॐ देशभ्रमणसन्तुष्टायै नमः
ॐ देशस्वास्थ्यप्रदायिन्यै नमः
ॐ देवयानायै नमः
ॐ देवतायै नमः
ॐ देवसैन्यप्रपालिन्यै नमः
ॐ वकाररूपायै नमः
ॐ वाग्देव्यै नमः
ॐ वेदमानसगोचरायै नमः
ॐ वैकुण्ठदेशिकायै नमः
ॐ वेद्यायै नमः
ॐ वायुरूपायै नमः
ॐ वरप्रदायै नमः
ॐ वक्रतुण्डार्चितपदायै नमः
ॐ वक्रतुण्डप्रसादिन्यै नमः
ॐ वैचित्ररूपायै नमः
ॐ वसुधायै नमः
ॐ वसुस्थानायै नमः
ॐ वसुप्रियायै नमः
ॐ वषट्कारस्वरूपायै नमः
ॐ वरारोहायै नमः
ॐ वरासनायै नमः
ॐ वैदेहीजनन्यै नमः
ॐ वेद्यायै नमः
ॐ वैदेहीशोकनाशिन्यै नमः
ॐ वेदमात्रे नमः
ॐ वेदकन्यायै नमः
ॐ वेदरूपायै नमः
ॐ विनोदिन्यै नमः
ॐ वेदान्तवादिन्यै नमः
ॐ वेदान्तनिलयप्रियायै नमः
ॐ वेदश्रवायै नमः
ॐ वेदघोषायै नमः
ॐ वेदगीतविनोदिन्यै नमः
ॐ वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञायै नमः
ॐ वेदमार्गप्रदर्शन्यै नमः
ॐ वैदिकीकर्मफलदायै नमः
ॐ वेदसागरवाडवायै नमः
ॐ वेदवन्द्यायै नमः 550
गायत्री सहस्रनाम
ॐ वेदगुह्यायै नमः
ॐ वेदाश्वरथवाहिन्यै नमः
ॐ वेदचक्रायै नमः
ॐ वेदवन्द्यायै नमः
ॐ वेदाङ्ग्यै नमः
ॐ वेदवित्कव्यै नमः
ॐ सकाररूपायै नमः
ॐ सामन्तायै नमः
ॐ सामगानविचक्षणायै नमः
ॐ साम्राज्ञै नमः
ॐ नामरूपायै नमः
ॐ सदानन्दप्रदायिन्यै नमः
ॐ सर्वदृक्सन्निविष्टायै नमः
ॐ सर्वसम्प्रेषिण्यै नमः
ॐ सहायै नमः
ॐ सव्यापसव्यदायै नमः
ॐ सव्यसध्रीच्यै नमः
ॐ सहायिन्यै नमः
ॐ सकलायै नमः
ॐ सागरायै नमः
ॐ सारायै नमः
ॐ सार्वभौमस्वरूपिण्यै नमः
ॐ सन्तोषजनन्यै नमः
ॐ सेव्यायै नमः
ॐ सर्वेश्यै नमः
ॐ सर्वरञ्जन्यै नमः
ॐ सरस्वत्यै नमः
ॐ समाराध्यायै नमः
ॐ सामदायै नमः
ॐ सिन्धुसेवितायै नमः
ॐ सम्मोहिन्यै नमः
ॐ सदामोहायै नमः
ॐ सर्वमाङ्गलदायिन्यै नमः
ॐ समस्तभुवनेशान्यै नमः
ॐ सर्वकामफलप्रदायै नमः
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायै नमः
ॐ साध्व्यै नमः
ॐ सर्वज्ञानप्रदायिन्यै नमः
ॐ सर्वदारिद्र्यशमन्यै नमः
ॐ सर्वदुःखविमोचन्यै नमः
ॐ सर्वरोगप्रशमन्यै नमः
ॐ सर्वपापविमोचन्यै नमः
ॐ समदृष्ट्यै नमः
ॐ समगुणायै नमः
ॐ सर्वगोप्त्र्यै नमः
ॐ सहायिन्यै नमः
ॐ सामर्थ्यवाहिन्यै नमः
ॐ साङ्ख्यायै नमः
ॐ सान्द्रानन्दपयोधरायै नमः
ॐ संकीर्णमन्दिरस्थानायै नमः
ॐ साकेतकुलपालिन्यै नमः
ॐ संहारिण्यै नमः
ॐ सुधारूपायै नमः
ॐ साकेतपुरवासिन्यै नमः
ॐ संबोधिन्यै नमः
ॐ समस्तेश्यै नमः
ॐ सत्यज्ञानस्वरूपिण्यै नमः
ॐ सम्पत्कर्यै नमः ॥ 600 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ समानाङ्ग्यै नमः
ॐ सर्वभावसुसंस्थितायै नमः
ॐ सन्ध्यावन्दनसुप्रीतायै नमः
ॐ सन्मार्गकुलपालिन्यै नमः
ॐ सञ्जीविन्यै नमः
ॐ सर्वमेधायै नमः
ॐ सभ्यायै नमः
ॐ साधुसुपूजितायै नमः
ॐ समिद्धायै नमः
ॐ सामिधेन्यै नमः
ॐ सामान्यायै नमः
ॐ सामवेदिन्यै नमः
ॐ समुत्तीर्णायै नमः
ॐ सदाचारायै नमः
ॐ संहारायै नमः
ॐ सर्वपावन्यै नमः
ॐ सर्पिण्यै नमः
ॐ सर्वमात्रे नमः
ॐ सामदानासुखप्रदायै नमः
ॐ सर्वरोगप्रशमन्यै नमः
ॐ सर्वज्ञत्वफलप्रदायै नमः
ॐ सङ्क्रमायै नमः
ॐ समदायै नमः
ॐ सिन्धवे नमः
ॐ सर्गादिकरणक्षमायै नमः
ॐ सङ्कटायै नमः
ॐ सङ्कटहरायै नमः
ॐ सकुङ्कुमविलेपनायै नमः
ॐ सुमुखायै नमः
ॐ सुमुखप्रीतायै नमः
ॐ समानाधिकवर्जितायै नमः
ॐ संस्तुतायै नमः
ॐ स्तुतिसुप्रीतायै नमः
ॐ सत्यवादिन्यै नमः
ॐ सदास्पदायै नमः
ॐ धीकाररूपायै नमः
ॐ धीमात्रे नमः
ॐ धीरायै नमः
ॐ धीरप्रसादिन्यै नमः
ॐ धीरोत्तमायै नमः 650
गायत्री सहस्रनाम
ॐ धीरधीरायै नमः
ॐ धीरस्थायै नमः
ॐ धीरशेखरायै नमः
ॐ धृतिरूपायै नमः
ॐ धनाढ्यायै नमः
ॐ धनपायै नमः
ॐ धनदायिन्यै नमः
ॐ धीरूपायै नमः
ॐ धीरवन्द्यायै नमः
ॐ धीरप्रभायै नमः
ॐ धीरमानसायै नमः
ॐ धीगेयायै नमः
ॐ धीपदस्थायै नमः
ॐ धीशानायै नमः
ॐ धीप्रसादिन्यै नमः
ॐ मकाररूपायै नमः
ॐ मैत्रेयायै नमः
ॐ महामङ्गलदेवतायै नमः
ॐ मनोवैकल्यशमन्यै नमः
ॐ मलयाचलवासिन्यै नमः
ॐ मलयध्वजराजश्रियै नमः
ॐ मयामोहविभेदिन्यै नमः
ॐ महादेव्यै नमः
ॐ महारूपायै नमः
ॐ महाभैरवपूजितायै नमः
ॐ मनुप्रीतायै नमः
ॐ मन्त्रमूर्त्यै नमः
ॐ मन्त्रवश्यायै नमः
ॐ महेश्वर्यै नमः
ॐ मत्तमातङ्गगमनायै नमः
ॐ मधुरायै नमः
ॐ मेरुमण्टपायै नमः
ॐ महागुप्तायै नमः
ॐ महभूतमहाभयविनाशिन्यै नमः
ॐ महाशौर्यायै नमः
ॐ मन्त्रिण्यै नमः
ॐ महावैरिविनाशिन्यै नमः
ॐ महालक्ष्म्यै नमः
ॐ महागौर्यै नमः
ॐ महिषासुरमर्दिन्यै नमः
ॐ मह्यै नमः
ॐ मण्डलस्थायै नमः
ॐ मधुरागमपूजितायै नमः
ॐ मेधायै नमः
ॐ मेधाकर्यै नमः
ॐ मेध्यायै नमः
ॐ माधव्यै नमः
ॐ मधुमर्दिन्यै नमः
ॐ मन्त्रायै नमः
ॐ मन्त्रमय्यै नमः
ॐ मान्यायै नमः
ॐ मायायै नमः
ॐ माधवमत्रिण्यै नमः
ॐ मायादूरायै नमः
ॐ मायाव्यै नमः
ॐ मायाज्ञायै नमः
ॐ मानदायिन्यै नमः
ॐ मयासङ्कल्पजनन्यै नमः
ॐ मायामायविनोदिन्यै नमः
ॐ मायाप्रपञ्चशमन्यै नमः ॥ 700 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ मायासंहाररूपिण्यै नमः
ॐ मायामन्त्रप्रसादायै नमः
ॐ मायाजनविमोहिन्यै नमः
ॐ महापथायै नमः
ॐ महाभोगायै नमः
ॐ महाविघ्नविनाशिन्यै नमः
ॐ महानुभावायै नमः
ॐ मन्त्रढ्यायै नमः
ॐ महामङ्गलदेवतायै नमः
ॐ हिकाररूपायै नमः
ॐ हृद्यायै नमः
ॐ हितकार्यप्रवर्धिन्यै नमः
ॐ हेयोपाधिविनिर्मुक्तायै नमः
ॐ हीनलोकविनाशिन्यै नमः
ॐ ह्रीङ्कार्यै नमः
ॐ ह्रींमत्यै नमः
ॐ हृद्यायै नमः
ॐ ह्रींदेव्यै नमः
ॐ ह्रींस्वभाविन्यै नमः
ॐ ह्रींमन्दिरायै नमः
ॐ हितकरायै नमः
ॐ हृष्टायै नमः
ॐ ह्रींकुलोद्भवायै नमः
ॐ हितप्रज्ञायै नमः
ॐ हितप्रीतायै नमः
ॐ हितकारुण्यवर्धिन्यै नमः
ॐ हितासिन्यै नमः
ॐ हितक्रोधायै नमः
ॐ हितकर्मफलप्रदायै नमः
ॐ हिमायै नमः
ॐ हैम्न्यै नमः
ॐ हैमवत्यै नमः
ॐ हेमाचलनिवासिन्यै नमः
ॐ हिमागजायै नमः
ॐ हितकर्यै नमः
ॐ हितायै नमः
ॐ हितकर्मस्वभाविन्यै नमः
ॐ धीकाररूपायै नमः
ॐ धिषणायै नमः
ॐ धर्मरूपायै नमः
ॐ धनेश्वर्यै नमः
ॐ धनुर्धरायै नमः
ॐ धराधारायै नमः
ॐ धर्मकर्मफलप्रदायै नमः
ॐ धर्माचारायै नमः
ॐ धर्मसारायै नमः
ॐ धर्ममध्यनिवासिन्यै नमः
ॐ धनुर्विद्यायै नमः
ॐ धनुर्वेदायै नमः
ॐ धन्यायै नमः
ॐ धूर्तविनाशिन्यै नमः
ॐ धनधान्यायै नमः
ॐ धेनुरूपायै नमः
ॐ धनाढ्यायै नमः
ॐ धनदायिन्यै नमः
ॐ धनेशै नमः
ॐ धर्मनिरतायै नमः
ॐ धर्मराजप्रसादिन्यै नमः
ॐ धर्मस्वरूपायै नमः
ॐ धर्मेश्यै नमः
ॐ धर्माधर्मविचारिण्यै नमः
ॐ धर्मसूक्ष्मायै नमः
ॐ धर्मगेहायै नमः
ॐ धर्मिष्ठायै नमः
ॐ धर्मगोचरायै नमः
ॐ योकाररूपायै नमः
ॐ योगेश्यै नमः
ॐ योगस्थायै नमः
ॐ योगरूपिण्यै नमः
ॐ योग्यायै नमः
ॐ योगीशवरदायै नमः
ॐ योगमार्गनिवासिन्यै नमः
ॐ योगासनस्थायै नमः
ॐ योगेश्यै नमः
ॐ योगमायाविलासिन्यै नमः
ॐ योगिन्यै नमः
ॐ योगरक्तायै नमः
ॐ योगाङ्ग्यै नमः
ॐ योगविग्रहायै नमः
ॐ योगवसायै नमः
ॐ योगभोग्यायै नमः
ॐ योगमार्गप्रदर्शिन्यै नमः
ॐ योकाररूपायै नमः
ॐ योधाढ्यायै नमः
ॐ योध्र्यै नमः
ॐ योधसुतत्परायै नमः
ॐ योगिन्यै नमः
ॐ योगिनीसेव्यायै नमः
ॐ योगज्ञानप्रबोधिन्यै नमः
ॐ योगेश्वरप्राणनाथायै नमः
ॐ योगीश्वरहृदिस्थितायै नमः
ॐ योगायै नमः
ॐ योगक्षेमकर्त्र्यै नमः
ॐ योगक्षेमविधायिन्यै नमः
ॐ योगराजेश्वराराध्यायै नमः
ॐ योगानन्दस्वरूपिण्यै नमः
ॐ नकाररूपायै नमः
ॐ नादेश्यै नमः
ॐ नामपारायणप्रियायै नमः
ॐ नवसिद्धिसमाराध्यायै नमः ॥ 800 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ नारायणमनोहर्यै नमः
ॐ नारायण्यै नमः
ॐ नवाधारायै नमः
ॐ नवब्रह्मार्चिताङ्घ्रिकायै नमः
ॐ नगेन्द्रतनयाराध्यायै नमः
ॐ नामरूपविवर्जितायै नमः
ॐ नरसिंहार्चितपदायै नमः
ॐ नवबन्धविमोचन्यै नमः
ॐ नवग्रहार्चितपदायै नमः
ॐ नवमीपूजनप्रियायै नमः
ॐ नैमित्तिकार्थफलदायै नमः
ॐ नन्दितारिविनाशिन्यै नमः
ॐ वनपीठस्थितायै नमः
ॐ नादायै नमः
ॐ नवर्षिगणसेवितायै नमः
ॐ नवसूत्रविधानज्ञायै नमः
ॐ नैमिशारण्यवासिन्यै नमः
ॐ नवचन्दनदिग्धाङ्गायै नमः
ॐ नवकुङ्कुमधारिण्यै नमः
ॐ नववस्त्रपरीधानायै नमः
ॐ नवरत्नविभूषणायै नमः
ॐ नव्यभस्मविदिग्धाङ्गायै नमः
ॐ नवचन्द्रकलाधरायै नमः
ॐ प्रकाररूपायै नमः
ॐ प्राणेश्यै नमः
ॐ प्राणसंरक्षण्यै नमः
ॐ पराय नमः
ॐ प्राणसञ्जीविन्यै नमः
ॐ प्राच्यायै नमः
ॐ प्राणिप्राणप्रबोधिन्यै नमः
ॐ प्रज्ञायै नमः
ॐ प्राज्ञायै नमः
ॐ प्रभापुष्पायै नमः
ॐ प्रतीच्यै नमः
ॐ प्रभुदायै नमः
ॐ प्रियायै नमः
ॐ प्राचीनायै नमः
ॐ पाणिचित्तस्थायै नमः
ॐ प्रभायै नमः
ॐ प्रज्ञानरूपिण्यै नमः850
गायत्री सहस्रनाम
ॐ प्रभातकर्मसन्तुष्टायै नमः
ॐ प्राणायामपरायणायै नमः
ॐ प्रायज्ञायै नमः
ॐ प्रणवायै नमः
ॐ प्राणायै नमः
ॐ प्रवृत्यै नमः
ॐ प्रकृत्यै नमः
ॐ परायै नमः
ॐ प्रबन्धायै नमः
ॐ प्रथमायै नमः
ॐ प्रगायै नमः
ॐ प्रारब्धनाशिन्यै नमः
ॐ प्रबोधनिरतायै नमः
ॐ प्रेक्ष्यायै नमः
ॐ प्रबन्धायै नमः
ॐ प्राणसाक्षिण्यै नमः
ॐ प्रयागतीर्थनिलयायै नमः
ॐ प्रत्यक्षपरमेश्वर्यै नमः
ॐ प्रणवाद्यन्तनिलयायै नमः
ॐ प्रणवादये नमः
ॐ प्रजेश्वर्यै नमः
ॐ चोकाररूपायै नमः
ॐ चोरघ्न्यै नमः
ॐ चोरबाधाविनाशिन्यै नमः
ॐ चैतन्यायै नमः
ॐ चेतनस्थायै नमः
ॐ चतुरायै नमः
ॐ चमत्कृत्यै नमः
ॐ चक्रवर्तिकुलाधारायै नमः
ॐ चक्रिण्यै नमः
ॐ चक्रधारिण्यै नमः
ॐ चित्तगेयायै नमः
ॐ चिदानन्दायै नमः
ॐ चिद्रूपायै नमः
ॐ चिद्विलासिन्यै नमः
ॐ चिन्तायै नमः
ॐ चित्तप्रशमन्यै नमः
ॐ चिन्तितार्थफलप्रदायै नमः
ॐ चांपेय्यै नमः
ॐ चंपकप्रीतायै नमः
ॐ चण्ड्यै नमः
ॐ चण्डाट्टहासिन्यै नमः
ॐ चण्डेश्वर्यै नमः
ॐ चण्डमात्रे नमः
ॐ चण्डमुण्डविनाशिन्यै नमः
ॐ चकोराक्ष्यै नमः
ॐ चिरप्रीतायै नमः
ॐ चिकुरायै नमः
ॐ चिकुरालकायै नमः
ॐ चैतन्यरूपिण्यै नमः
ॐ चैत्र्यै नमः
ॐ चेतनायै नमः
ॐ चित्तसाक्षिण्यै नमः
ॐ चित्रायै नमः
ॐ चित्रविचित्राङ्ग्यै नमः
ॐ चित्रगुप्तप्रसादिन्यै नमः
ॐ चलनायै नमः
ॐ चक्रसंस्थायै नमः
ॐ चांपेय्यै नमः
ॐ चलचित्रिण्यै नमः ॥ 900 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ चन्द्रमण्डलमध्यस्थायै नमः
ॐ चन्द्रकोटिसुशीतलायै नमः
ॐ चन्द्रायै नमः
ॐ चण्डमहोदर्यै नमः
ॐ चर्चितारये नमः
ॐ चन्द्रमात्रे नमः
ॐ चन्द्रकान्तायै नमः
ॐ चलेश्वर्यै नमः
ॐ चराचरनिवासिन्यै नमः
ॐ चक्रपाणिसहोदर्यै नमः
ॐ दकाररूपायै नमः
ॐ दत्तश्रियै नमः
ॐ दारिद्र्यच्छेदकारिण्यै नमः
ॐ दत्तात्रेयवरदायै नमः
ॐ दर्यायै नमः
ॐ दीनवत्सलायै नमः
ॐ दक्षाराध्यायै नमः
ॐ दक्षकन्यायै नमः
ॐ दक्षयज्ञविनाशिन्यै नमः
ॐ दक्षायै नमः
ॐ दाक्षायण्यै नमः
ॐ दीक्षायै नमः
ॐ दृष्टायै नमः
ॐ दक्षवरप्रदायै नमः
ॐ दक्षिणायै नमः
ॐ दक्षिणाराध्यायै नमः
ॐ दक्षिणामूर्तिरूपिण्यै नमः
ॐ दयावत्यै नमः
ॐ दमस्वान्तायै नमः
ॐ दनुजारये नमः
ॐ दयानिध्यै नमः
ॐ दन्तशोभनिभायै नमः
ॐ देव्यै नमः
ॐ दमनायै नमः
ॐ दाडिमस्तनायै नमः
ॐ दण्डायै नमः
ॐ दायित्र्यै नमः
ॐ दण्डिन्यै नमः
ॐ दमनप्रियायै नमः
ॐ दण्डकारण्यनिलयायै नमः
ॐ दण्डकारिविनाशिन्यै नमः
ॐ दंष्ट्राकरालवदनायै नमः
ॐ दण्डशोभायै नमः
ॐ दरोदर्यै नमः
ॐ दरिद्रारिष्टशमन्यै नमः
ॐ दम्यायै नमः
ॐ दमनपूजितायै नमः
ॐ दानवार्चितपादश्रियै नमः
ॐ द्राविणायै नमः
ॐ द्राविण्यै नमः 950
गायत्री सहस्रनाम
ॐ दयायै नमः
ॐ दामोदर्यै नमः
ॐ दानवार्यै नमः
ॐ दामोदरसहोदर्यै नमः
ॐ दात्र्यै नमः
ॐ दानप्रियायै नमः
ॐ दाम्न्यै नमः
ॐ दानश्रियै नमः
ॐ द्विजवन्दितायै नमः
ॐ दन्तिगायै नमः
ॐ दण्डिन्यै नमः
ॐ दूर्वायै नमः
ॐ दधिदुग्धस्वरूपिण्यै नमः
ॐ दाडिमीबीजसन्दोहायै नमः
ॐ दन्तपङ्क्तिविराजितायै नमः
ॐ दर्पणायै नमः
ॐ दर्पणस्वच्छायै नमः
ॐ द्रुममण्डलवासिन्यै नमः
ॐ दशावतारजनन्यै नमः
ॐ दशदिग्दैवपूजितायै नमः
ॐ दमायै नमः
ॐ दशदिशायै नमः
ॐ दृश्यायै नमः
ॐ दशदास्यै नमः
ॐ दयानिध्यै नमः
ॐ देशकालपरिज्ञानायै नमः
ॐ देशकालविशोधिन्यै नमः
ॐ दशम्यादिकलाराध्यायै नमः
ॐ दशग्रीवविरोधिन्यै नमः
ॐ दशापराधशमन्यै नमः
ॐ दशवृत्तिफलप्रदायै नमः
ॐ यात्काररूपिण्यै नमः
ॐ याज्ञ्यै नमः
ॐ यादव्यै नमः
ॐ यादवार्चितायै नमः
ॐ ययातिपूजनप्रीतायै नमः
ॐ याज्ञक्यै नमः 1000
गायत्री सहस्रनाम
ॐ याजकप्रियायै नमः
ॐ यजमानायै नमः
ॐ यदुप्रीतायै नमः
ॐ यामपूजाफलप्रदायै नमः
ॐ यशस्विन्यै नमः
ॐ यमाराध्यायै नमः
ॐ यमकन्यायै नमः
ॐ यतीश्वर्यै नमः
ॐ यमादियोगसन्तुष्टायै नमः
ॐ योगीन्द्रहृदयायै नमः
ॐ यमायै नमः
ॐ यमोपाधिविनिर्मुक्तायै नमः
ॐ यशस्यविधिसन्नुतायै नमः ॥ 1000 ॥
गायत्री सहस्रनाम
ॐ यवीयस्यै नमः
ॐ युवप्रीतायै नमः
ॐ यात्रानन्दायै नमः
ॐ यतीश्वर्यै नमः
ॐ योगप्रियायै नमः
ॐ योगगम्यायै नमः
ॐ योगध्येयायै नमः
ॐ यतेच्छगायै नमः
ॐ यागप्रियायै नमः
ॐ यज्ञसेन्यै नमः
ॐ योगरूपायै नमः
ॐ यथेष्टदायै नमः
॥ इति गायत्री सहस्रनाम सम्पूर्ण ॥
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री गायत्री सहस्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
1. श्री गायत्री सहस्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान सहस्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैदिक दर्शन और ‘गायत्री-तत्व’ को समझने के लिए हमें भगवती गायत्री के स्वरूप, 24 अक्षरों के रहस्य और सहस्रनाम के विज्ञान को गहराई से समझना होगा।
गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का विस्तार
गायत्री मंत्र में 24 अक्षर होते हैं, और हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट देवता, शक्ति और सिद्धियों का प्रतीक है। ‘श्री गायत्री सहस्रनाम’ वास्तव में इन्हीं 24 अक्षरों की ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक विराट विस्तार है। माता गायत्री के ये 1000 नाम संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में व्याप्त ईश्वरीय चेतना (Cosmic Consciousness) का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब साधक इन नामों का गान करता है, तो वह ब्रह्मांड के सभी देवताओं और शक्तियों की एक साथ स्तुति कर रहा होता है।
‘भर्गो देवस्य धीमहि’ – बुद्धि का प्रबोधन
गायत्री का मूल कार्य है— ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ अर्थात्, हमारी बुद्धि (Intellect) को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करना। मानव जीवन की हर सफलता या विफलता उसकी ‘बुद्धि’ और ‘निर्णय क्षमता’ पर निर्भर करती है। श्री गायत्री सहस्रनाम का पाठ साधक के भीतर उसी ‘भर्ग’ (पापनाशक तेज) को जाग्रत करता है। यह स्तुति मस्तिष्क के सोए हुए तंतुओं (Neurons) को जाग्रत कर उन्हें सूर्य के समान प्रखर बना देती है।
‘सहस्रनाम’ का नाद-विज्ञान (The Science of 1000 Names)
सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च चक्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। माता गायत्री के ये हज़ार नाम (जैसे- ॐ सावित्र्यै नमः, ॐ ब्रह्मवादिन्यै नमः, ॐ वेदमात्रे नमः) वास्तव में उनके हज़ार गुण और अनंत ज्ञान के परिचायक हैं। प्रत्येक नाम एक शक्तिशाली बीज मंत्र की तरह कार्य करता है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) को शुद्ध कर कुण्डलिनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाता है।
2. श्री गायत्री सहस्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
भगवती गायत्री साक्षात प्राणशक्ति, बुद्धि, सफलता और तेज की प्रदात्री हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
बौद्धिक, शैक्षणिक और करियर संबंधी लाभ (Intellect & Career Success)
-
कुशाग्र बुद्धि और अमोघ स्मरण शक्ति (Superb Memory): माता गायत्री को ‘सरस्वती’ का ही स्वरूप माना जाता है। विद्यार्थियों (Students), शोधकर्ताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह सहस्रनाम वेद-तुल्य है। इसके पाठ से एकाग्रता (Focus) बढ़ती है और स्मरण शक्ति अत्यंत प्रखर हो जाती है।
-
निर्णय लेने की अचूक क्षमता (Decision Making Power): जीवन में जब भी असमंजस (Confusion) की स्थिति हो, यह पाठ मस्तिष्क को वह स्पष्टता (Clarity) प्रदान करता है जिससे व्यक्ति दूरदर्शी और सही निर्णय ले पाता है।
-
वाक्-सिद्धि और नेतृत्व क्षमता (Leadership): गायत्री उपासक की वाणी में एक अद्भुत ओज और आकर्षण (Charisma) आ जाता है। समाज और कार्यक्षेत्र में लोग उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं और उसका सम्मान करते हैं।
लौकिक, पारिवारिक और आर्थिक लाभ (Worldly & Financial Bliss)
-
दरिद्रता का नाश और सात्विक धन की प्राप्ति: गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाला धन ‘सात्विक’ होता है। यह वह धन है जो घर में शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि लाता है, न कि कलह और बीमारियां।
-
पारिवारिक क्लेश का शमन: जिस घर में नित्य गायत्री सहस्रनाम की ध्वनि गूंजती है, वहाँ से अज्ञान, अंधकार और क्लेश समाप्त हो जाते हैं। परिवार के सदस्यों में सामंजस्य (Harmony) और प्रेम बढ़ता है।
-
रोगमुक्ति और दीर्घायु: गायत्री मंत्र को प्राणशक्ति (Life Force) का मंत्र कहा गया है। इसके नामों के गान से शरीर में प्राणायाम के समान ऊर्जा का संचार होता है, जिससे प्राणशक्ति मजबूत होती है और असाध्य रोगों में लाभ मिलता है।
आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Spiritual & Psychological Healing)
-
तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: आधुनिक जीवन के तनाव, चिंता (Anxiety) और ओवरथिंकिंग को शांत करने के लिए गायत्री सहस्रनाम अमोघ है। यह मस्तिष्क को असीम शीतलता और शांति प्रदान करता है।
-
ब्रह्म-तेज की प्राप्ति: गायत्री साधक के मुखमंडल पर एक अलौकिक ‘तेज’ (Aura) आ जाता है। उसके आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा स्वतः भस्म हो जाती है।
-
आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization): यह सहस्रनाम साधक को भौतिकता से परे ले जाकर उसकी आत्मा के वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
3. श्री गायत्री सहस्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
माता गायत्री की उपासना अत्यंत सात्विक, निर्मल, और प्रकाशमयी होती है। इस सिद्ध सहस्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
-
दिन: माता गायत्री की आराधना के लिए रविवार (Sunday – सूर्य का दिन), गुरुवार (Thursday – ज्ञान का दिन), और शुक्रवार (Friday – शक्ति का दिन) सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं।
-
विशेष तिथियां: गायत्री जयंती (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी), नवरात्रि, वसंत पंचमी, और किसी भी मास की पूर्णिमा के दिन इस सहस्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।
-
समय: गायत्री उपासना का सबसे उत्तम समय ‘त्रिकाल संध्या’ है। लेकिन गृहस्थों के लिए प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) या ठीक सूर्योदय के समय (जब सूर्य लाल हो) इसका पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
-
दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East – सूर्य और ज्ञान की दिशा) की ओर रखें।
-
आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), सफेद (White), या कुशा के आसन का प्रयोग करें। कुशा का आसन गायत्री साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
-
वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में हल्के पीले, श्वेत या केसरिया रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
प्रतिमा स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
| सामग्री / विधान | विवरण |
| प्रतिमा / चित्र | एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर पीला या सफेद कपड़ा बिछाकर वेदमाता गायत्री (हंस पर विराजमान, पंचमुखी या एकमुखी) का चित्र स्थापित करें। |
| दीपक | माता के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। चंदन या मोगरा की सात्विक धूप जलाएं। |
| तिलक | माता गायत्री को पीला चंदन, अष्टगंध या गोपी चंदन का तिलक लगाएं। स्वयं भी मस्तक पर पीला चंदन धारण करें। |
| पुष्प और नैवेद्य | उन्हें पीले पुष्प (गेंदा, चंपा) या सफेद पुष्प (मोगरा, कमल) अत्यंत प्रिय हैं। |
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (पीले रंगे हुए चावल) और एक पीला पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे वेदमाता गायत्री, मैं अपने जीवन से समस्त अज्ञान, बौद्धिक जड़ता व दरिद्रता के नाश, परीक्षा/कार्यक्षेत्र में सफलता, और आपकी कृपा के लिए श्री गायत्री सहस्रनाम का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
सहस्रनाम का पाठ (Chanting Method & Archana)
-
सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश, अपने माता-पिता और गुरु का मानसिक ध्यान कर उन्हें प्रणाम करें।
-
सूर्य देव (सविता) का स्मरण करते हुए उन्हें अर्घ्य दें (यदि सूर्योदय का समय हो)।
-
गायत्री महामंत्र “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्” की कम से कम 11 बार या एक माला (हल्दी, रुद्राक्ष या चंदन की माला पर) जप करें।
-
अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और पूर्ण शरणागति के साथ ‘श्री गायत्री सहस्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें। संस्कृत के श्लोकों का स्पष्ट, शुद्ध और लयबद्ध उच्चारण करें।
-
सहस्रार्चन विधि: यदि आप विशेष मनोकामना पूर्ति (जैसे किसी बड़ी परीक्षा में सफलता) चाहते हैं, तो सहस्रनाम के प्रत्येक नाम (जैसे- ॐ सावित्र्यै नमः) के साथ माता को एक पीला पुष्प या अक्षत दाना अर्पित करें।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
पाठ पूर्ण होने के बाद माता गायत्री को गाय के दूध की खीर, पीले मिष्ठान्न, मिश्री, या ऋतुफल का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से माता की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
माता गायत्री परम सात्विक और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। उनकी साधना में निर्मलता, पवित्रता और सत्य का होना अत्यंत आवश्यक है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
-
पूर्ण सात्विकता (Strict Sattvic Diet): गायत्री साधना का यह सबसे कठोर नियम है। अनुष्ठान के दौरान या नित्य पाठ करने वाले साधक को मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। तामसिक भोजन बुद्धि को मलिन (Dull) करता है, जो गायत्री के ‘ज्ञान-तत्व’ के बिल्कुल विपरीत है।
-
सत्य का आचरण (Truthfulness): माता गायत्री सत्य और ज्ञान की प्रतीक हैं। जो व्यक्ति व्यापार या नौकरी में बेईमानी, धोखाधड़ी, चुगली या असत्य का सहारा लेता है, उसकी गायत्री साधना कभी फलित नहीं होती। वाणी में सत्य और मधुरता रखें।
-
ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): विशेष अनुष्ठान (21, 41 दिन या सवा लाख जप) के दौरान शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। अपनी ऊर्जा (Ojas) को बचाकर रखना ही इस साधना का मूल है।
-
स्त्रियों और माता-पिता का सम्मान: जो व्यक्ति अपनी माता, पत्नी या किसी भी स्त्री का अपमान करता है, उसे वेदमाता गायत्री की कृपा कभी नहीं मिल सकती।
-
निरंतरता (Consistency): गायत्री साधना में नागा (Break) नहीं होना चाहिए। इसे नित्य नियम बनाकर उसी समय पर करना चाहिए।
5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
माता गायत्री की पूजा और सहस्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई विपरीत प्रभाव न पड़े:
-
उच्चारण की शुद्धता (Correct Pronunciation): गायत्री सहस्रनाम वेदों का सार है। इसके संस्कृत शब्दों का उच्चारण यथासंभव शुद्ध होना चाहिए। यदि संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो पहले इसे ध्यान से सुनें और फिर धीरे-धीरे पढ़ें। अशुद्ध उच्चारण से विपरीत फल तो नहीं मिलता, लेकिन पूर्ण फल मिलने में विलंब होता है।
-
अहंकार का त्याग: ज्ञान प्राप्त होने पर अक्सर मनुष्य में अहंकार (Ego) आ जाता है। गायत्री उपासक को विद्या पाकर विनम्र होना चाहिए। “विद्या ददाति विनयं” का पालन करें।
-
स्वार्थ और प्रतिशोध की भावना: यह स्तुति आत्म-उन्नति, शांति और जगत कल्याण के लिए है। किसी व्यक्ति का अहित करने या उससे बदला लेने (Revenge) के लिए कभी भी गायत्री माता की स्तुति न करें। वे माता हैं, किसी का अमंगल नहीं करतीं।
-
शारीरिक पवित्रता (Sutak/Patak): बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक, पातक, या महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान) में मूर्ति, यंत्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है।
6. आधुनिक युग में गायत्री सहस्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘मानसिक भटकाव’ (Mental Distraction), ‘सूचनाओं की बाढ़’ (Information Overload), और ‘बौद्धिक जड़ता’ का युग है। मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग के कारण आज के मनुष्य, विशेषकर युवाओं का मस्तिष्क शांत नहीं है। ‘ओवरथिंकिंग’ (Overthinking), ‘फोकस की कमी’ (Lack of focus/ADHD लक्षण), और ‘निर्णय न ले पाने की अक्षमता’ (Decision Fatigue) आज की सबसे बड़ी मानसिक बीमारियां बन चुकी हैं।
इसके अतिरिक्त, अनुचित आहार-विहार और अत्यधिक तनाव के कारण लोगों की प्राणशक्ति (Immunity and Vitality) कमजोर हो गई है।
‘श्री गायत्री सहस्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘बौद्धिक भटकाव’, ‘तनाव’ और ‘अज्ञान’ का सबसे शक्तिशाली वैदिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है।
जब आप प्रातःकाल शांत मन से बैठकर संस्कृत के इन ओजस्वी 1000 नामों का गान करते हैं, तो:
-
यह सहस्रनाम आपके मस्तिष्क की कार्यक्षमता (Cognitive function) को चरम पर ले जाता है। यह ‘ब्रेन फॉग’ (Brain fog) को हटाकर आपके भीतर एक लेज़र-समान एकाग्रता (Laser-sharp focus) उत्पन्न करता है।
-
यह आपके अवचेतन मन को शुद्ध करता है। आज हम जो भी नकारात्मक खबरें या बातें दिन भर सुनते हैं, वे हमारे मन में बैठ जाती हैं। गायत्री के 1000 नाम मानसिक डिटॉक्स (Mental Detoxification) का काम करते हैं।
-
यह आपके आस-पास एक ऐसा शक्तिशाली ‘तेजस्वी ऑरा’ (Aura of Illumination) बनाता है कि आपके व्यक्तित्व में एक गजब का आकर्षण और नेतृत्व क्षमता (Leadership) आ जाती है।
-
यह आज के युग में आपके घर को हर प्रकार की ‘वैचारिक नकारात्मकता’ से सुरक्षित रखता है, जिससे परिवार में अपार शांति, स्वास्थ्य, और सुसंस्कारों का वास होता है।
Gayatri Sahasranamam (श्री गायत्री सहस्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह संपूर्ण वैदिक वांग्मय का सार, परब्रह्म के प्रकाश और ब्रह्मांडीय ज्ञान की जननी का साक्षात आवाहन है। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, सात्विकता और अहंकार रहित होकर इस स्तुति का गान करता है, तो वेदमाता गायत्री उसके अंतःकरण को अपने परम प्रकाश से आलोकित कर देती हैं।
माता गायत्री अत्यंत कृपालु, ज्ञानदायिनी और अपने भक्तों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली साक्षात जगन्माता हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में सब कुछ धुंधला हो गया है, बहुत मेहनत के बाद भी बुद्धि सही दिशा में काम नहीं कर रही है, शिक्षा या करियर में भटकाव है, और मन अशांत है, तो रविवार या गुरुवार की सुबह पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक जलाएं, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपनी ‘वेदमाता’ को पुकारें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि गायत्री के इन पावन नामों ने आपके जीवन की सारी मानसिक बाधाओं, अज्ञानता और भयों को भस्म कर दिया है, और साक्षात त्रिदेवों की शक्ति ने आपके जीवन को अपार सफलता, असीम शांति, कुशाग्र बुद्धि और परम तेज के दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
श्री गायत्री सहस्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री गायत्री सहस्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?
श्री गायत्री सहस्रनाम वेदों की जननी, माता गायत्री के 1000 पावन व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इन नामों में माता के अनंत गुण, ज्ञान, और ब्रह्मांडीय शक्तियां समाहित हैं। इसका महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि यह स्तुति साधक की बुद्धि को कुशाग्र करती है, अज्ञान और नकारात्मकता को नष्ट करती है, और जीवन में शिक्षा, करियर व अध्यात्म में सर्वोच्च सफलता प्रदान करती है।
2. इस सहस्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?
इस सहस्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘अतुलनीय बुद्धि व एकाग्रता की प्राप्ति’ और ‘मानसिक तनाव (Overthinking) से मुक्ति’ है। इसके नियमित पाठ से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति प्रखर होती है, वाणी में तेज और आकर्षण आता है, व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता अचूक हो जाती है, और घर में सात्विक धन व सुख-शांति का वास होता है।
3. इस सहस्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?
माता गायत्री की आराधना के लिए ‘रविवार’ (Sunday – सूर्य/तेज का दिन) और ‘गुरुवार’ (Thursday – ज्ञान का दिन) सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं। गायत्री जयंती और पूर्णिमा के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय) स्नान के पश्चात, पीले या श्वेत वस्त्र धारण कर, पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
4. क्या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति श्री गायत्री सहस्रनाम का पाठ कर सकते हैं?
जी हाँ, बिल्कुल! कोई भी गृहस्थ (स्त्री या पुरुष) पूर्ण सात्विकता और पवित्रता का पालन करते हुए इस सहस्रनाम का पाठ कर सकता है। माता गायत्री सभी की माँ हैं और वे गृहस्थों को सद्बुद्धि व सन्मार्ग प्रदान करती हैं। केवल महिलाओं को अपने मासिक धर्म के दौरान इसके पाठ या पुस्तक के स्पर्श से बचना चाहिए।
5. वेदमाता गायत्री की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा नियम क्या है?
गायत्री साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘पूर्ण सात्विकता’ और ‘सत्य का आचरण’ है। जो साधक मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन करता है, या व्यापार/नौकरी में बेईमानी और झूठ का सहारा लेता है, उसकी गायत्री साधना कभी फलित नहीं होती। शरीर और मन की पवित्रता, स्त्रियों का सम्मान, और ब्रह्मचर्य (विशेष अनुष्ठान के दौरान) इस साधना के मूलभूत नियम हैं।