Shri Guru Sahasranama (श्री गुरु सहस्त्रनाम): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 46 minutes... to read this article !

सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, ईश्वर से भी ऊँचा स्थान यदि किसी को दिया गया है, तो वे हैं— सद्गुरु। संत कबीरदास जी ने स्पष्ट कहा है— “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥” अर्थात् यदि साक्षात ईश्वर और गुरु दोनों एक साथ खड़े हों, तो सर्वप्रथम गुरु के ही चरणों में वंदना करनी चाहिए, क्योंकि गुरु के बिना ईश्वर को पहचानने की दृष्टि ही प्राप्त नहीं हो सकती।

संस्कृत व्याकरण के अनुसार, ‘गु’ का अर्थ है ‘अंधकार’ (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ है ‘नष्ट करने वाला’ (प्रकाश)। जो हमारे जीवन के अज्ञान, भ्रम और भटकाव रूपी अंधकार को नष्ट कर ज्ञान का सूर्योदय करता है, वही ‘गुरु’ है। जब मनुष्य का जीवन घोर निराशा, सही मार्गदर्शन के अभाव, करियर व शिक्षा में आ रही बाधाओं और मानसिक अशांति से घिर जाता है, तब ‘गुरु-तत्व’ की शरण में जाना ही एकमात्र और सबसे अचूक उपाय बचता है।

परब्रह्म स्वरूप गुरुदेव की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत ज्ञान, वात्सल्य और अहैतुकी कृपा को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों और आचार्यों ने ‘गुरु-तत्व’ (भगवान दत्तात्रेय, शिव स्वरूप दक्षिणामूर्ति या अपने इष्ट गुरु) के एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री गुरु सहस्त्रनाम’ (Shri Guru Sahasranama) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्त्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा ‘ज्ञान और कृपा’ का अस्त्र है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर बौद्धिक संघर्षों, दरिद्रता, पूर्व जन्म के पाप कर्मों और रुके हुए कार्यों को पल भर में खोल देता है। जब व्यक्ति को समाज में एक स्थिर पद, कुशाग्र बुद्धि, श्रेष्ठ मार्गदर्शन और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की आवश्यकता होती है, तब यह ‘श्री गुरु सहस्त्रनाम’ साक्षात कल्पवृक्ष सिद्ध होता है।

श्री गुरु सहस्त्रनाम | Guru Sahastranaam

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुस्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अथ श्री गुरु अष्टोत्तर सहस्र नामावळिः ।

ॐ सद्गुरवे नमः ।

ॐ जगद्गुरवे नमः ।

ॐ अभयकराय नमः ।

ॐ आत्मज्ञानिने नमः ।

ॐ आदर्श ज्ञानमूर्तये नमः ।

ॐ अहिंसा ज्योत्यै नमः ।

ॐ अमनस्क योगस्थाय नमः ।

ॐ अद्वितीयाय नमः ।

ॐ अजात वैरिणे नमः ।

ॐ आदरणीय गुण गम्भीराय नमः । १०

ॐ आजानुबाहवे नमः ।

ॐ आत्मयात्रार्थं पराश्रयाय नमः ।

ॐ अनभिषिक्त विश्वाचार्याय नमः ।

ॐ अक्षरोपासकाय नमः ।

ॐ अक्षर दीप्ति दर्शकाय नमः ।

ॐ अमित तेजस्विने नमः ।

ॐ अणुमहद्व्यापि परतत्व वेत्ताय नमः ।

ॐ अक्षर पद वाक्यार्थ मौल्यमापकाय नमः ।

ॐ अन्तः सत्य दर्शकाय नमः ।

ॐ अन्तः सत्व प्रवर्धकाय नमः । २०

ॐ अनुपम वात्सल्य सागराय नमः ।

ॐ अनुपम धीवराय नमः ।

ॐ अनुत्तमाय नमः ।

ॐ अप्रबुद्ध युवजन वैद्याय नमः ।

ॐ अकर्तारवे नमः ।

ॐ उदारचरित नमः ।

ॐ औदार्यगुणनिधये नमः ।

ॐ ऋषिसम्प्रदाय परम्परावनाय नमः ।

ॐ आर्जित विद्याप्रवृद्ध्यर्थं प्रवचनकाराय नमः ।

ॐ आषाढमास पौर्णिमास्यां विश्वाद्यन्ताराध्याय नमः । ३०

ॐ अनुदिनाभ्यासे ध्येयगम्यमिति बोधकाय नमः ।

ॐ आप्तशिष्य नन्दने दैवीवात्सल्य पारिजाताय नमः ।

ॐ अनेक मनोविभ्रान्ति विदूराय नमः ।

ॐ आत्मस्वाम्ये आत्मौपम्य सुखलीनाय नमः ।

ॐ अल्पकालिक श्रममल्पेत्युपदेशकाय नमः ।

ॐ ऊर्ध्वगति प्रियोद्धारकाय नमः ।

ॐ उदासीनाय नमः ।

ॐ अध्यात्म योगनिष्ठाय नमः ।

ॐ अनिरीक्षित घटनावळिमध्ये शिलासदृशाय नमः ।

ॐ ऋषिसन्देशामृत प्रसारकाय नमः । ४०

ॐ ऋषिरचित सद्ग्रन्थ मर्मबोधकाय नमः ।

ॐ आत्मतृप्ताय नमः ।

ॐ अध्यात्म योगनिष्ठाय नमः ।

ॐ अनुभव तत्पराय नमः ।

ॐ अपर विद्यातट दर्शकाय नमः ।

ॐ आर्षसंस्कृति रक्षकाय नमः ।

ॐ आत्मश्रद्धा संवर्तकाय नमः ।

ॐ अन्तःकरण वैकल्य भिषजे नमः ।

ॐ अन्धश्रद्धाहरण कोविदाय नमः ।

ॐ अनुभवरहित संवाद दूराय नमः । ५०

ॐ अप्रतीकाराय नमः ।

ॐ आत्मज्ञान बोधनार्थमागत गुरुरूप देवदूताय नमः ।

ॐ अभोक्ताय नमः ।

ॐ अतिथि सेवारत शिष्य प्रशिक्षकाय नमः ।

ॐ ईषणत्रय पाशमुक्ताय नमः ।

ॐ ईप्सित दायकाय नमः ।

ॐ अन्नमय कोशे सात्विकाहार साफल्यदर्शिने नमः ।

ॐ आनन्दमय कोशे प्रमोदाय नमः ।

ॐ अनिर्विण्ण मानसाय नमः ।

ॐ अज्ञान महार्णव तारकाय नमः । ६०

ॐ अगणित शास्त्र रहस्यज्ञाय नमः ।

ॐ अनुपम प्रवचनकाराय नमः ।

ॐ असम वचनसुधा वाहकाय नमः ।

ॐ अविनाशि सञ्चित कर्मवेत्ताय नमः ।

ॐ अविद्यान्धकार क्लेशहराय नमः ।

ॐ अग्रहण लोपहराय नमः ।

ॐ अन्यथाग्रहण निवारकाय नमः ।

ॐ अहं ब्रह्मास्म्यनुभव सिद्धाय नमः ।

ॐ उपनिषद्व्याख्यानकाराय नमः ।

ॐ उद्योगशीलत्व प्रेरकाय नमः । ७०

ॐ ओमित्येकाक्षरोपासकाय नमः ।

ॐ उपनिषदनुभवज्ञाय नमः ।

ॐ अस्मिता पाश विमोचकाय नमः ।

ॐ आग्नेय धारण तोषिताय नमः ।

ॐ आत्मनिवेदना तल्लीनाय नमः ।

ॐ आज्ञा चक्रे द्विदळयुत नळिन दर्शकाय नमः ।

ॐ आबाल गोपाराध्याय नमः ।

ॐ अघराशि हर कृपावर्षाय नमः ।

ॐ आलस्य जडत्व दूराय नमः ।

ॐ आत्मौपम्य प्रकाशिताय नमः । ८०

ॐ अन्तर्मुखे सर्ववृत्ति निरोधकाय नमः ।

ॐ अखण्डजप निरताय नमः ।

ॐ अक्षय मुदाकर निधये नमः ।

ॐ आस्तिक समुदायोद्धारकाय नमः ।

ॐ अवर्णनीय शक्तिनिधये नमः ।

ॐ अजप गायत्री मन्त्र तत्पराय नमः ।

ॐ अध्यात्मसाधक मनोदौर्बल्य निवारकाय नमः ।

ॐ अपार संसार वारिधि तारकाय नमः ।

ॐ आत्मारामाय नमः ।

ॐ अन्तःसुखाय नमः । ९०

ॐ अन्तरारामाय नमः ।

ॐ अन्तर्ज्योति स्थापकाय नमः ।

ॐ अस्त्रविद्या परिणताय नमः ।

ॐ आत्मस्वाम्ये आत्मौपम्य श्रीयुताय नमः ।

ॐ अनन्तजीव प्रज्ञारूप ब्रह्मज्ञाय नमः ।

ॐ अनित्य नित्य समदर्शिने नमः ।

ॐ आत्मज्ञानैश्वर्य समन्विताय नमः ।

ॐ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषं हृदिदर्शकाय नमः ।

ॐ अश्वत्थ तरुवत् सनातन संसारमिति ज्ञातृवे नमः ।

ॐ अभ्यासयोगे शिक्षनिरीक्षकाय नमः । १००

ॐ अनर्घ्य सद्विचार रत्नाकराय नमः ।

ॐ अवस्थाधीनोऽपि अवस्थातीताय नमः ।

ॐ अनुपम ग्रहणविधाने आर्जितानन्त ज्ञानाय नमः ।

ॐ अल्पमेधसां प्रगत्यर्थं तपोधनाय नमः ।

ॐ आसुरीगुण सहितस्य दीर्घकाल विद्याप्रदायकाय नमः ।

ॐ अज्ञानविमोहितस्य विभिन्न शिक्षणप्रदाय नमः ।

ॐ अभ्यासात् चलित मानसस्य पुनश्चेतनकराय नमः ।

ॐ इतिहासं घटनप्रधानमेति दर्शकाय नमः ।

ॐ अधर्माभिवृद्धे क्रान्तिपुरुष धर्मस्थापकाय नमः ।

ॐ आर्जवगुण सम्पन्नाय नमः । ११०

ॐ अन्तर्बहिर्वृत्ति विलास प्रेक्षकाय नमः ।

ॐ अपार ललितकलाम्बुधि रसास्वादकाय नमः ।

ॐ अनसूयवे नमः ।

ॐ इहामुत्रार्थ फलभोगविरक्ताय नमः ।

ॐ उपाधि योगात् प्राप्तजन्म रहस्यज्ञाय नमः ।

ॐ आकाश वायु पावक वारि पृथ्विगुण वैलक्षण्य वेत्ताय नमः ।

ॐ अनाहतनाद मुदित योगीश्वराय नमः ।

ॐ अतन्द्रिताय नमः ।

ॐ अक्रोधाय नमः ।

ॐ अखण्ड ब्रह्मानुभवे तुरीयाय नमः । १२०

ॐ आज्ञाधारक शिष्यवृन्देण आश्रम निर्वाहकाय नमः ।

ॐ अनुद्विग्न कर्मपटवे नमः ।

ॐ अनाहत चक्रे द्वादश नळिन दर्शकाय नमः ।

ॐ उदार विच्छिन्न तनु प्रसुप्त संस्कार विवेचकाय नमः ।

ॐ अपार्थ भावकालुष्य दूराय नमः ।

ॐ आस्तेयापरिग्रह व्रताय नमः ।

ॐ अद्वैतसुधा स्वातिवृष्टि मूलाय नमः ।

ॐ अद्वितीय समुदायोद्धारकाय नमः ।

ॐ अनुदिन साधनलता संवर्धकाय नमः ।

ॐ अपचारकर्म निवर्तकाय नमः । १३०

ॐ उन्नतकार्य निर्वहणे निरीक्षकाय नमः ।

ॐ अवसानकाले उत्तरायन दक्षिनायन गतिर्वेत्ताय नमः ।

ॐ उत्तरायन गतिर्ज्योतिर्मयमितिवेत्ताय नमः ।

ॐ अवसानकाले गम्यज्ञाने ज्ञातव्यमिति बोधकाय नमः ।

ॐ ओजस् वह्निदर्शने सूक्ष्मदर्शकाय नमः ।

ॐ अपार्थ कल्पना मकरच्छेदकाय नमः ।

ॐ अभ्यास समये ज्ञानार्थि नियन्त्रकाय नमः ।

ॐ एक कार्याचरण नैरन्तर्ये सिद्धीश्वराय नमः ।

ॐ ऐहिक मनोरथ त्यागे परिपक्वाय नमः ।

ॐ ऊर्ध्वगति प्रियाय नमः । १४०

ॐ कुटुम्ब सदृश विश्व सङ्घटनापराय नमः ।

ॐ कृत निश्चयाय नमः ।

ॐ कृतकृत्याय नमः ।

ॐ कारुण्य निधये नमः ।

ॐ खेदचित्त परिवर्तक चिकित्सकाय नमः ।

ॐ खण्डन मण्डन दूराय नमः ।

ॐ कान्तिवलये सुधीवराय नमः ।

ॐ केवलाय नमः ।

ॐ गुणसागराय नमः ।

ॐ गुणातीताय नमः । १५०

ॐ गहनतत्त्ववेत्ताय नमः ।

ॐ गोचरागोचर तत्त्वज्ञान सहिताय नमः ।

ॐ गूढ योगानुष्ठान बोधकाय नमः ।

ॐ गाढभक्ति विधाने सञ्चालकाय नमः ।

ॐ गुणगम्भीराय नमः ।

ॐ कामना वेदना रहिताय नमः ।

ॐ गुहोपम हृदये प्राणस्पर्श मुखेन समाधिस्थाय नमः ।

ॐ अनायास ग्रन्थाध्ययनाध्यापन रताय नमः ।

ॐ गुरुस्थाने पूजित प्राज्ञ शेखराय नमः ।

ॐ कर्माकर्म विकर्म भेदज्ञाय नमः । १६०

ॐ घनपाठ पठन प्रियाय नमः ।

ॐ कृतसाकार तत्त्व साक्षात्काराय नमः ।

ॐ कवित्व स्फूर्ति सागर निशाकराय नमः ।

ॐ गुणमहात्म्यासक्त भक्तवरेण्याय नमः ।

ॐ कारुण्य महिमा पूर्णाय नमः ।

ॐ गुरुकुल सागरे नाविकाय नमः ।

ॐ गुणशेखराय नमः ।

ॐ सुगुण मय मनोवृत्ति प्रदीपकाय नमः ।

ॐ कलिकालुष्य हराय नमः ।

ॐ काय क्लेश भयस्थ धृतिकारकाय नमः । १७०

ॐ काव्यकर्म मोदप्रियाय नमः ।

ॐ कोमल हित मित सत्यवादिने नमः ।

ॐ कीर्ति सम्पद् मोह वर्जिताय नमः ।

ॐ काल धर्माधीन कर्मे कृपाकराय नमः ।

ॐ केवल जप तप मौन व्रताय नमः ।

ॐ कवि पुङ्गवाय नमः ।

ॐ कवि वृन्द वर्णित गुण सामर्थ्य सहिताय नमः ।

ॐ कलोपासक सत्त्व वर्धकाय नमः ।

ॐ खिन्नचित्त परितापोपाय नमः ।

ॐ गुरु शिष्य भावैक्य नन्दन विहारिणे नमः । १८०

ॐ विज्ञान विमाने संशोधन गगन यात्रिकाय नमः ।

ॐ काषाय वस्त्र धारिणे नमः ।

ॐ कृत्स्नविदे नमः ।

ॐ गायक कवि विचक्षण वन्द्याय नमः ।

ॐ गायत्री मन्त्र महिमा वेत्ताय नमः ।

ॐ गुरुकुलाचार्यत्वे शिष्यगण नियामकाय नमः ।

ॐ घर्षणहीन जीवन निर्देशकाय नमः ।

ॐ गम्य द्रष्टाराय नमः ।

ॐ कामसङ्कल्प वर्जिताय नमः ।

ॐ कर्तृत्व भोकृत्व रहिताय नमः । १९०

ॐ दैवगत प्राणाय नमः ।

ॐ गीतसुधास्वादकाय नमः ।

ॐ चित्तवृत्ति शुद्धीकराय नमः ।

ॐ जीवेश्वराभेद दर्शकाय नमः ।

ॐ जीवभाव दूरीकर वचनसुधाकराय नमः ।

ॐ ज्ञान विज्ञान पूर्णाय नमः ।

ॐ जीव शुभ चिन्तकाय नमः ।

ॐ ज्ञानाम्बुधि तल रत्नान्वेषकाय नमः ।

ॐ जरा जाड्य यातना निवारकाय नमः ।

ॐ जनन मरण विज्ञान शोधकाय नमः । २००

ॐ जलीय धारण विधान बोधकाय नमः ।

ॐ जप तप ध्यानादि योगे निर्मग्नाय नमः ।

ॐ जीवसंस्करण शास्त्रविदे नमः ।

ॐ चित्त चाञ्चल्य निवारकाय नमः ।

ॐ ज्ञानगम्य सिद्धाय नमः ।

ॐ ज्ञानखड्ग धराय नमः ।

ॐ जीवन्मुक्ताय नमः ।

ॐ जीवोत्कर्षाय नमः ।

ॐ जाग्रत्स्वप्नेति सत्यसाक्षिणे नमः ।

ॐ ज्ञानपीठ दीप्ति प्रसारकाय नमः । २१०

ॐ सुज्ञान विश्वविद्यालये प्राचार्याय नमः ।

ॐ कमण्डल धारिणे नमः ।

ॐ कठोर तपस्विने नमः ।

ॐ कठिण दीक्षाबद्ध कङ्कणाय नमः ।

ॐ कुण्डलिनी शक्त्युद्दीपने बलशालिने नमः ।

ॐ कल्पना लोकयाने पुलकिताय नमः ।

ॐ कार्पण्य दोष निवारकाय नमः ।

ॐ कर्म भाव ज्ञान ध्यान पोषकाय नमः ।

ॐ कार्य निर्वहणे निर्देशकाय नमः ।

ॐ गृहस्थाश्रम पावित्र्य रक्षकाय नमः । २२०

ॐ गुणग्रहण तपोवने पुनीताय नमः ।

ॐ गीताभ्यासरत विद्या पोषकाय नमः ।

ॐ गोरक्षा व्रत सम्बद्धाय नमः ।

ॐ घृतसेवित जिह्वोपमे निर्लिप्ताय नमः ।

ॐ कर्पूरवत् गुरुपदे विद्रावकाय नमः ।

ॐ जाह्नवी वारिवत् पतित पावकाय नमः ।

ॐ नीरज पत्रवत् निस्सङ्गाय नमः ।

ॐ कर्पूर नीराजनवत् निश्शेषाहं दर्शकाय नमः ।

ॐ गुणक्षये कुलक्षयेति बोधकाय नमः ।

ॐ जीवन यात्रे आमिषदूर योगिने नमः । २३०

ॐ अनिर्वाच्य पदात्मिका तत्त्वज्ञाय नमः ।

ॐ चतुरन्तःकरणे स्वयं प्रसन्नाय नमः ।

ॐ जित क्रोधाय नमः ।

ॐ चाक्षुष ज्योति दर्शकाय नमः ।

ॐ चित्त चाञ्चल्य निवारक बहुविध मन्त्र तन्त्र विशारदाय नमः ।

ॐ चित्तप्रसाद नवनीताशुप्रदाय नमः ।

ॐ चित्तशुद्धि लाभार्थं भक्तिपथे शिक्षकाय नमः ।

ॐ चिन्मयानन्दाय नमः ।

ॐ जठराग्नि रूपे अग्नितत्त्व दर्शकाय नमः ।

ॐ जन्म कर्म रहस्य वेत्ताय नमः । २४०

ॐ ज्ञातृ ज्ञान ज्ञेय रहितावस्था लीनाय नमः ।

ॐ चराचर भावनाय नमः ।

ॐ गुणग्रहणाभ्यासलग्न हृदय वासिने नमः ।

ॐ करण सामरस्य सुखकारणाय नमः ।

ॐ ज्ञानभूषण तीर्थाय नमः ।

ॐ चिन्ता सन्तति नाशकाय नमः ।

ॐ अनेक जन्म वृत्तान्तज्ञाय नमः ।

ॐ चलद्देवालयाय नमः ।

ॐ जनन मरण चक्रव्यूह भेदकाय नमः ।

ॐ ज्ञानोत्सवरूप ज्ञानयज्ञ प्रियाय नमः । २५०

ॐ धर्मसम्मूढोद्धारकाय नमः ।

ॐ वचन वेग नियन्त्रकाय नमः ।

ॐ नवयुग प्रवर्तकाय नमः ।

ॐ आत्मसाम्राज्य पतये नमः ।

ॐ आवृत्त लोचनाय नमः ।

ॐ अनन्त कल्याण गुणनिधये नमः ।

ॐ शिष्याधिकारानुसार विद्याप्रदाय नमः ।

ॐ दुर्गुणारण्य दाहकाय नमः ।

ॐ तमोगुण वृक्ष कुठाराय नमः ।

ॐ सर्व विद्या सार सागराय नमः । २६०

ॐ प्रेमयोगेश्वराय नमः ।

ॐ परमाप्त शिष्य मात्र वेद्य महिमान्विताय नमः ।

ॐ अभूतपूर्व कृपानिकेतनाय नमः ।

ॐ सृजनात्मिक कार्यार्थं कल्पना शक्त्युद्दीपकाय नमः ।

ॐ नयन मनोहर बहु रूपाकार वर्णवलये विरागिणे नमः ।

ॐ दूर समीप देशात् विविध गन्धसेवने गन्धविरागिणे नमः ।

ॐ धीरोदात्ताय नमः ।

ॐ दृढ चित्ताय नमः ।

ॐ दूरीकृत कपट शिष्याय नमः ।

ॐ ध्यानानन्द निश्चलाय नमः । २७०

ॐ निरुपम मनीषिणे नमः ।

ॐ तारतम्य भेद रहिताय नमः ।

ॐ नादबिन्दु कळातीत तत्त्वपराय नमः ।

ॐ धूममय दक्षिणायनमिति बोधकाय नमः ।

ॐ त्रिताप सन्त्रस्थावनाय नमः ।

ॐ दिव्य ज्योतिर्विज्ञाने प्रमुदिताय नमः ।

ॐ मनोबुद्धि तेजोवर्धक भास्वर ज्योति दर्शने नमः ।

ॐ दिव्य चेतनाय नमः ।

ॐ धीर गम्भीर प्राज्ञाय नमः ।

ॐ धीर प्रशान्त योगिने नमः । २८०

ॐ निन्दा स्तुति समाय नमः ।

ॐ निर्लेप योगे कर्मविमुक्ताय नमः ।

ॐ तीर्थरूपाय नमः ।

ॐ निर्धूत कलुष साधक प्रियाय नमः ।

ॐ देवदूताय नमः ।

ॐ श्री सरस्वती देवि प्रतिनिध्यै नमः ।

ॐ स्वतपोबल प्रसादकाय नमः ।

ॐ धर्मक्षेत्रे न्यायाधीशाय नमः ।

ॐ तपोयज्ञ निरताय नमः ।

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ॐ दोष दुरित दूराय नमः । २९०

ॐ क्षमा कामधेनवे नमः ।

ॐ तापत्रय समरे जयशालिने नमः ।

ॐ त्रिसन्ध्योपासित गायत्री मन्त्र व्रताय नमः ।

ॐ दीन दलित सेवासक्ताय नमः ।

ॐ धर्मपाठ प्रवचन दीप्ति शोभिताय नमः ।

ॐ दीर्घसूत्रता हराय नमः ।

ॐ दिव्य नेत्रोन्मीलन योगिवरेण्याय नमः ।

ॐ दृग् दृश्य विवेचन बोधकाय नमः ।

ॐ द्युतिमय दिव्य नेत्राय नमः ।

ॐ दुर्विज्ञेय अन्तर्मर्मविदे नमः । ३००

ॐ धर्म स्थापन तत्पराय नमः ।

ॐ देह नश्वरत्व प्रबोधकाय नमः ।

ॐ धर्म मर्यादा रक्षकाय नमः ।

ॐ धर्म साम्राज्य चक्रवर्तिने नमः ।

ॐ निराकार विश्व प्रभूपासन तन्मयाय नमः ।

ॐ निरुपम गुणशक्ति प्रसारकाय नमः ।

ॐ निरुपाधिक तत्त्वे निर्मग्नाय नमः ।

ॐ निष्काम कर्मचक्र प्रवर्तकाय नमः ।

ॐ तापस ध्येयाय नमः ।

ॐ त्यागधन सदनाय नमः । ३१०

ॐ निवारित सर्वारिष्ठाय नमः ।

ॐ नित्यानित्य पदार्थ विवेकपूर्णाय नमः ।

ॐ तारक मन्त्रोपासकाय नमः ।

ॐ निगमागम शास्त्राराधकाय नमः ।

ॐ निष्कलाय नमः ।

ॐ देवदानव पूजिताय नमः ।

ॐ देहनगर यात्रे अन्तर्योगिने नमः ।

ॐ निर्भीति सन्तोष तपो प्रेरकाय नमः ।

ॐ तत्त्वमस्यादि लक्ष्य दर्शकाय नमः ।

ॐ तितिक्षोपरति साधन बोधकाय नमः । ३२०

ॐ निर्व्याज कृपा सागराय नमः ।

ॐ निराशिने नमः ।

ॐ निर्लोभाय नमः ।

ॐ निरुपद्रवकर ध्येयगामिने नमः ।

ॐ निरपाय प्राचार्याय नमः ।

ॐ निरङ्कुश मति शिष्याराधिताय नमः ।

ॐ निग्रहानुग्रह निधये नमः ।

ॐ देदीप्यमान धी शक्तियुताय नमः ।

ॐ त्रिपुण्ड्र विराजिताय नमः ।

ॐ अकाम हताय नमः । ३३०

ॐ अनहं वादिने नमः ।

ॐ देवव्रताय नमः ।

ॐ गुरुसेवा निष्ठाय नमः ।

ॐ निवृत्ति प्रधान साधकानां ध्यानयान शिक्षकाय नमः ।

ॐ प्रवृत्तिप्रिय साधकानां कर्मक्षेत्रे चालकाय नमः ।

ॐ पूर्णप्रज्ञ ब्रह्मज्ञाय नमः ।

ॐ जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यानुभव विश्लेषकाय नमः ।

ॐ प्रीति शान्ति सान्त्वनादि भावान् स्पर्शज्ञाय नमः ।

ॐ सान्त जीवात्माश्रय परमात्मेति द्रष्टाराय नमः ।

ॐ आर्जितानन्त ज्ञानदान प्रियाय नमः । ३४०

ॐ प्रति शाखे द्वा सप्ततिः नाडी ज्ञानज्ञाय नमः ।

ॐ दुर्लभतर मेधावी जन्मधारिणे नमः ।

ॐ दान यज्ञ कर्म परायणाय नमः ।

ॐ ध्यानरक्त निरुपम शान्त रजसाय नमः ।

ॐ त्रिविध श्रद्धा यज्ञ दान तपोभिः जीव परिवर्तकाय नमः ।

ॐ भास्वर ज्योति दर्शकाय नमः ।

ॐ मनो बुद्धि तेजो वर्धकाय नमः ।

ॐ प्रसन्न मनोसाम्राज्याधिपाय नमः ।

ॐ बुद्धि व्यवसाय चतुराय नमः ।

ॐ भक्तिगान लोलाय नमः । ३५०

ॐ मन्त्र तन्त्र रूप सर्वाक्षराराधकाय नमः ।

ॐ जिज्ञासु परमाश्रयाय नमः ।

ॐ प्रशान्त मानसाय नमः ।

ॐ ब्रह्म कमलोपम दिव्य चरणाय नमः ।

ॐ ब्रह्मतत्व्वासनाय नमः ।

ॐ मृदु पल्लवोपमाभय हस्ताय नमः ।

ॐ मुक्ति मोद प्रदाय नमः ।

ॐ बुद्धाय नमः ।

ॐ प्रबुद्धाय नमः ।

ॐ प्रसिद्धाय नमः । ३६०

ॐ परिशुद्धाय नमः ।

ॐ प्राज्ञ श्रेष्ठाय नमः ।

ॐ भाव विश्लेषण विशारदाय नमः ।

ॐ परा विद्यालय स्थापकाय नमः ।

ॐ परमहंसाय नमः ।

ॐ परमात्म प्रतिनिधये नमः ।

ॐ प्रतिभा ज्योतिरुद्दीपकाय नमः ।

ॐ दिव्य स्फुरण पारिजात तरुवे नमः ।

ॐ बहुक्रिया प्रक्रिया सौधामिनि रूपाय नमः ।

ॐ प्रपन्न चिन्तामणि ध्यान सदनाय नमः । ३७०

ॐ परानाद सम्मुदिताय नमः ।

ॐ पश्यन्ती मध्यमा वैखरी वाग्विलास रञ्जनाय नमः ।

ॐ प्रमाणादि पञ्चवृत्ति विश्लेषण कोविदाय नमः ।

ॐ भेदरहित मोदे साधक पावनाय नमः ।

ॐ प्रणिपातेन प्रसन्नाय नमः ।

ॐ परिप्रश्नेन धी प्रचोदकाय नमः ।

ॐ गुरुकुल सेवा सन्तुष्टाय नमः ।

ॐ भगवद्ध्यानानन्द तल्लीनाय नमः ।

ॐ ब्रह्मर्षिणे नमः ।

ॐ ब्रह्माण्ड वलये नित्य कल्याणप्रियाय नमः । ३८०

ॐ गीतसुधा स्तुताय नमः ।

ॐ प्राप्त सिद्धि कम्पन रोमाञ्चन विस्मिताय नमः ।

ॐ पर्णकुटीर वासाय नमः ।

ॐ ब्रह्मभाव वर्चस्विने नमः ।

ॐ भक्तिभाव द्रवित मनस्काय नमः ।

ॐ अश्रु स्वेद कम्पन प्रलय वैवर्ण्य परवशाय नमः ।

ॐ परम श्रेष्ठ योगिने नमः ।

ॐ ब्रह्मभाव रञ्जनाय नमः ।

ॐ निन्दास्तुति समाय नमः ।

ॐ नारीकुलात्म शक्ति संवर्धकाय नमः । ३९०

ॐ निःश्रेयस परपथ दर्शकाय नमः ।

ॐ निष्कलङ्काय नमः ।

ॐ नीति न्याय रक्षकाय नमः ।

ॐ निश्चिन्त जीव यात्रार्थिने नमः ।

ॐ त्याग शीलत्वाराधाकाय नमः ।

ॐ निस्पृहाय नमः ।

ॐ नतलोक जनाराधन विश्वासपात्राय नमः ।

ॐ नित्य संन्यासिने नमः ।

ॐ दशदिग्व्यापक पञ्चभूताराधाकाय नमः ।

ॐ निर्ममाय नमः । ४००

ॐ धारणावस्थे निगृहीत वृत्तिबाहुळ्याय नमः ।

ॐ हृत्पीठे प्रतिशाखे द्वासप्ततिः नाडी ज्ञानपूर्णाय नमः ।

ॐ परम शिष्टाय नमः ।

ॐ पञ्चविषय स्पन्दन रहिताय नमः ।

ॐ पृथक् पृथक् निर्माणे पकृति कला कौशलज्ञाय नमः ।

ॐ प्राज्ञमणि व्याख्यात महिमान्विताय नमः ।

ॐ महर्षिगण सेविताय नमः ।

ॐ महोदार चरिताय नमः ।

ॐ प्रत्यक्ष देवाय नमः ।

ॐ मन्दस्मित वदनाय नमः । ४१०

ॐ मुख्यप्राण शक्ति ज्ञाने शुद्धाय नमः ।

ॐ भानुवत् सगुण ब्रह्मेति उपासकाय नमः ।

ॐ साकार निराकार जीव जगद् ज्ञाने सर्वज्ञाय नमः ।

ॐ मोक्षपरायण साधन पथ दर्शकाय नमः ।

ॐ पुरुषोत्तम ज्ञानविलीनाय नमः ।

ॐ ब्रह्मसूत्रार्थ व्याख्ये सत्य प्रतिपादकाय नमः ।

ॐ प्रकृतिलीला निरूपक वरदमूर्तये नमः ।

ॐ जलधारा मुखेन कळशे आध्यात्मिक शक्ति वाहकाय नमः ।

ॐ मन्त्रपठन शक्ति महत्त्व वेत्ताय नमः ।

ॐ पशु पक्षि प्राणिभिः सहस्मित वाग्मिने नमः । ४२०

ॐ पुराण साहित्यं शिक्षाप्रधानमिति विमर्शकाय नमः ।

ॐ मल विक्षेप आवरणेति त्रिदोष रहिताय नमः ।

ॐ दृष्टिं ज्ञानमयं कृत्वा ब्रह्ममय जगद्रष्टाराय नमः ।

ॐ दृष्टिं प्रेममयं कृत्वा सुखमय जीवन दर्शिने नमः ।

ॐ दृष्टिं विज्ञानमयं कृत्वा गुणमय देहयात्रा दर्शिने नमः ।

ॐ दृष्टिं ध्यानमयं कृत्वा सृष्टिं शान्तमय दर्शिने नमः ।

ॐ परकीय स्वकीय भेदातीताय नमः ।

ॐ नीराजन कर्पूरवत् शिवपदे विद्रावकाय नमः ।

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानदीप स्थापकाय नमः ।

ॐ भावसमन्वित बुधवरेण्याय नमः । ४३०

ॐ त्रिविध श्रद्धा विभेदकाय नमः ।

ॐ त्रिगुणानुसारे जीव परिवर्तकाय नमः ।

ॐ मनोनेत्र दर्शितासङ्ख्य दिव्यरूपाय नमः ।

ॐ पुण्यफल प्राप्ति समये दैवार्पणे धन्याय नमः ।

ॐ बहुविद्या पारङ्गताय नमः ।

ॐ पञ्चयज्ञ कर्तृवे नमः ।

ॐ मुद्रासहित ध्यान निरताय नमः ।

ॐ स्वगुरु चरणे परमाप्त शिष्याय नमः ।

ॐ प्रियं वदाय नमः ।

ॐ पोषकाग्नि वीक्षकाय नमः । ४४०

ॐ मोघाशाबद्ध चक्षून्मीलनकराय नमः ।

ॐ परि परि क्रियाकलाप रक्ति जागर्तिने नमः ।

ॐ मृदुल शिशु चलन वलन वर्तनास्वादकाय नमः ।

ॐ प्रथम दर्शने गुरुमुपसङ्गम्य शरणागताय नमः ।

ॐ पाठ प्रवचने सत्यतत्त्व निरूपकाय नमः ।

ॐ मङ्गल कार्यक्षेत्रे सञ्चारिणे नमः ।

ॐ मनोहर साकार देवदर्शकाय नमः ।

ॐ मन्दस्मित मुखाय नमः ।

ॐ मनोरञ्जने भगवत्कथा तन्मयाय नमः ।

ॐ मन्दमति वेगवर्धकाय नमः । ४५०

ॐ परोपदेशे भगवत्स्वरूप नमः ।

ॐ परिपूर्णत्व प्रेमिणे नमः ।

ॐ मनो दुर्दशा निवारकाय नमः ।

ॐ मायाजाल रूप विषयव्यूह भेदकाय नमः ।

ॐ पञ्चतन्मात्रा व्यापकत्व वेत्ताय नमः ।

ॐ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धमय सूक्ष्मदेह दर्शिने नमः ।

ॐ शारीरिक दशदोष निवारणासूत्र बोधकाय नमः ।

ॐ पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत जन्य ब्रह्माण्ड वैभव वेत्ताय नमः ।

ॐ भगवन्निष्ठ जीवयात्रा तत्पराय नमः ।

ॐ निष्कामयोग शिक्षकाय नमः । ४६०

ॐ ब्राह्मीमुहूर्ते अन्तर्विद्या मग्नाय नमः ।

ॐ जिज्ञासारण्ये दृग्पथ दर्शकाय नमः ।

ॐ ज्ञानदीपोत्सव तुष्ठाय नमः ।

ॐ ज्ञानाग्नि दग्धकर्माय नमः ।

ॐ जीवरहस्य बोधकाय नमः ।

ॐ विज्ञानप्रियाराधिताय नमः ।

ॐ जरा व्याधि भीतिहराय नमः ।

ॐ जीवन निस्सारत्व प्रबोधकाय नमः ।

ॐ जन्मकर्म रहस्य प्रसारकाय नमः ।

ॐ जिज्ञासुवृन्द भगवते नमः । ४७०

ॐ जाति वर्ण कुल भेद प्रकाशकाय नमः ।

ॐ जलजदलमम्बुवत् निर्लिप्ताय नमः ।

ॐ ज्ञानतपस्विने नमः ।

ॐ ज्ञानवृद्धाय नमः ।

ॐ प्रपन्नमनो विराजिताय नमः ।

ॐ मूलाधार चक्रे चतुर्दळ पद्म दर्शकाय नमः ।

ॐ मूलाधारे व श ष स चतुरक्षरोत्पत्तिविदे नमः ।

ॐ मणिपूर चक्रे दशदळ नीरज दर्शिने नमः ।

ॐ ब भ म य र ल इति षडक्षरोत्पत्तिविदे नमः ।

ॐ मनोलये समाधिस्थाय नमः । ४८०

ॐ पञ्चविषय पराङ्मुखाय नमः ।

ॐ मौढ्यजाड्य वैद्याय नमः ।

ॐ प्राणमय कोशे श्वासनियन्त्रकाय नमः ।

ॐ मनोमय कोशे चाञ्चल्य दूराय नमः ।

ॐ मुक्तसङ्गाय नमः ।

ॐ प्रणव नादानुसन्धान निरताय नमः ।

ॐ प्रमाणादि पञ्चवृत्ति रहिताय नमः ।

ॐ महा विरक्ताय नमः ।

ॐ महा शक्ताय नमः ।

ॐ महा वीर धीराय नमः । ४९०

ॐ भगवद्गीता पीयूष रक्ताय नमः ।

ॐ बीजाक्षर जप परिणामज्ञाय नमः ।

ॐ ज्ञानासक्त हृदयेश्वराय नमः ।

ॐ प्रत्येक चक्रे विशिष्ट कान्ति दर्शकाय नमः ।

ॐ पद्मदळ रूपे अक्षरोत्पत्ति प्रेक्षकाय नमः ।

ॐ मनोवैरिवर्ग विनाशकाय नमः ।

ॐ प्रातःस्मरणीयाय नमः ।

ॐ पराविद्योपासना तन्मयाय नमः ।

ॐ पाप पुण्यादि द्वन्द्वातीताय नमः ।

ॐ भगवद्विभूति वैविध्यज्ञाय नमः । ५००

ॐ पञ्चकरण वेत्ताय नमः ।

ॐ भक्ति ज्ञान वैराग्य श्री सम्पन्नाय नमः ।

ॐ पञ्चप्राण क्रिया वैचित्र्य चकिताय नमः ।

ॐ पञ्चोपप्राण स्थूलक्रिया साक्षिणे नमः ।

ॐ मोघाशा शतैर्बद्ध नेत्रोन्मीलनकराय नमः ।

ॐ भावसङ्घर्षण शामकाय नमः ।

ॐ प्राणोपासकाय नमः ।

ॐ ब्रह्मानुभव शरधि निमग्नाय नमः ।

ॐ प्रयाणकाले प्राणत्याग मार्ग निर्देशकाय नमः ।

ॐ परम विरहासक्ति भक्ति बन्धिताय नमः । ५१०

ॐ परतत्त्व भेद दर्शकाय नमः ।

ॐ पञ्चविषय स्पन्दन रहिताय नमः ।

ॐ प्रमोदाय नमः ।

ॐ पाञ्चभौतिक देह मोह हराय नमः ।

ॐ पञ्चक्लेश वश मनुज भक्ति मात्रेण सुखीति निरूपकाय नमः ।

ॐ भीति भ्रान्ति हराय नमः ।

ॐ पुरुषोत्तम धामारूढाय नमः ।

ॐ परम्परा प्राप्त बहुविद्या पोषकाय नमः ।

ॐ परस्परं भावयितुं शिक्षकाय नमः ।

ॐ प्रज्ञारोहण शक्ति वर्धकाय नमः । ५२०

ॐ मृदु स्पन्दनमये स्पर्शाकर्षण वर्जिताय नमः ।

ॐ मनोगत कामपीडा निवारकाय नमः ।

ॐ मनोदशा सुधारकाय नमः ।

ॐ मनोबल वर्धकाय नमः ।

ॐ मनोविकृति ग्राहवती मध्ये शिक्ष संरक्षकाय नमः ।

ॐ प्रशान्त चित्ताय नमः ।

ॐ बाह्याभ्यन्तर शुचिनिष्ठाय नमः ।

ॐ परचित्त ज्ञानसहिताय नमः ।

ॐ प्रत्यक्षानुभवस्थाय नमः ।

ॐ प्रिय मोद प्रमोद हर्षज्ञाय नमः । ५३०

ॐ भोग त्याग धनाय नमः ।

ॐ प्रारब्धं भोक्तत्वमिति प्रतिपादकाय नमः ।

ॐ बालक बालिका हृदये भक्तिज्योति स्थापकाय नमः ।

ॐ परोपकारार्थं जन्मधराय नमः ।

ॐ प्रयासमय कर्मक्षेत्राद् निर्गमिताय नमः ।

ॐ फलकामना रहित शुद्ध भक्ताय नमः ।

ॐ पतित तारकाय नमः ।

ॐ परतत्त्वध्याने एकाकिने नमः ।

ॐ पार्थिव धारण सौलभ्य निरूपकाय नमः ।

ॐ पूजासक्ति प्रियाय नमः । ५४०

ॐ भद्रप्रिय प्रीति सागराय नमः ।

ॐ प्रसन्न मनो स्रोताय नमः ।

ॐ मनन मन्थन ध्येयाय नमः ।

ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।

ॐ मन्त्राभ्यास योगेन ज्ञेयदर्शिने नमः ।

ॐ मानसोद्विग्नता शून्याय नमः ।

ॐ मनोखिन्नत्व निवारक योगवैद्याय नमः ।

ॐ योगभ्रष्ट हृदये अचिरेण ध्यानदीप स्थापकाय नमः ।

ॐ शिष्योत्तम तेजोवलये विराजिताय नमः ।

ॐ षड्रसमय भोजने रसाकर्षण रहिताय नमः । ५५०

ॐ शतविध भाव वाग्जाले शब्दाकर्षण रहिताय नमः ।

ॐ विभाजकाग्नि वीक्षकाय नमः ।

ॐ रञ्जकाग्नि क्रिया दर्शकाय नमः ।

ॐ विसर्जकाग्नि वरदानवेत्ताय नमः ।

ॐ विद्यामण्टपे मोदलहरि रञ्जकाय नमः ।

ॐ विविध यज्ञ प्रेरकाय नमः ।

ॐ विशिष्ट तपोनिष्ठा गरिमाविदे नमः ।

ॐ स्वाधीनकृत रजोगुणाद्भुत कृतिकाराय नमः ।

ॐ ज्ञानदाने आश्चर्यकर वाङ्मिने नमः ।

ॐ वानप्रस्थाश्रम मार्गदर्शिने नमः । ५६०

ॐ यज्ञशिष्टाशिन पावकाय नमः ।

ॐ विद्वत् शिखरे अक्षरार्थ नादलोलाय नमः ।

ॐ योगशिबिरार्थि परिवेष्टितोदार शिक्षकाय नमः ।

ॐ योगबल सम्पन्न प्रज्ञासञ्चारिणे नमः ।

ॐ यत चित्तात्मने नमः ।

ॐ योगीश्वराय नमः ।

ॐ योगेश्वराय नमः ।

ॐ योगीश गण्याय नमः ।

ॐ योग प्रशिक्षकाय नमः ।

ॐ योगज्ञान दुरन्धराय नमः । ५७०

ॐ योगसेवालये शान्तरजसाय नमः ।

ॐ योगसाधन नैरन्तर्ये दग्ध दुरिताय नमः ।

ॐ योगतन्त्रानुशासकाय नमः ।

ॐ योगारूढाय नमः ।

ॐ यत वाक्कायचित्ताय नमः ।

ॐ युवक युवती शक्ति संवर्धकाय नमः ।

ॐ वयोमिति रहित जीव विकास कारणाय नमः ।

ॐ यौगिकसिद्धि पूर्णाय नमः ।

ॐ योगशास्त्र दुरन्धराय नमः ।

ॐ यशापयश समदर्शिने नमः । ५८०

ॐ योगसेवा दीक्षाप्रदाय नमः ।

ॐ हृदयग्रन्थि विभेदकाय नमः ।

ॐ देश दिक्काल निमित्ते प्रकटित साकार ब्रह्मवेत्ताय नमः ।

ॐ द्वासप्ततिः नाडीषु व्यान सञ्चार स्पर्शज्ञाय नमः ।

ॐ तैजस ज्योति प्रकाशाय नमः ।

ॐ दैवापचार कर्मदोष निवारकाय नमः ।

ॐ दैवोपचार विधान बोधकाय नमः ।

ॐ दीर्घकाल साधना साफल्य निधीश्वराय नमः ।

ॐ नवनवीन मनोनिग्रह तन्त्रज्ञाय नमः ।

ॐ ध्यान ध्यातृ ध्येय त्रिपुटि रहिताय नमः । ५९०

ॐ मूलाधार चक्रे पृथ्वी महाभूत दर्शिने नमः ।

ॐ स्वाधिष्ठान पद्मे जल महाभूत तत्त्वज्ञाय नमः ।

ॐ मणिपूर ब्रह्मकमले तेजो तत्त्वविदे नमः ।

ॐ अनाहत चक्रे वायु महाभूत स्पर्शज्ञाय नमः ।

ॐ विशुद्ध चक्रे आकाश तत्त्वस्थिताय नमः ।

ॐ आज्ञा चक्रे स्थितचित्तस्य त्रिकालज्ञान वेत्ताय नमः ।

ॐ सहस्रार चक्रे सच्चिदानन्द स्वरूप लीनाय नमः ।

ॐ शक्तिपुञ्ज प्रसारकाय नमः ।

ॐ सद्धर्म साधक दिव्य चक्षून्मीलनाय नमः ।

ॐ साक्षात् परब्रह्मेति प्रकीर्तिताय नमः । ६००

ॐ शिष्य काय वाङ्मन बुद्धिबल सञ्चालकाय नमः ।

ॐ सर्वदा पुण्यकर्मबल प्रचारकाय नमः ।

ॐ शमदमाद्यन्तर्वित्तेशाय नमः ।

ॐ संन्यासाश्रम निधानाय नमः ।

ॐ सूक्ष्मतत्त्व दर्शकाय नमः ।

ॐ गीतसुधापान तल्लीनाय नमः ।

ॐ संन्यासाश्रम गरिमाविदे नमः ।

ॐ सर्वज्ञ मूर्तये नमः ।

ॐ सर्वकलाभिमान पूर्णाय नमः ।

ॐ सात्विक धृति धारण शिक्षकाय नमः । ६१०

ॐ सङ्कल्पमात्रेण सिद्धि प्रदर्शकाय नमः ।

ॐ स्फुरण सौधामिनि हृदयाय नमः ।

ॐ काव्य वाचन प्रहर्षाय नमः ।

ॐ शान्तिमय भुवनप्रियाय नमः ।

ॐ समस्त धर्मकार्ये वार्षिकाराधना संलग्नाय नमः ।

ॐ समय शक्ति सम्पद्विनियोगे शिष्यबल साक्षिणे नमः ।

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ॐ सुज्ञान विज्ञान तृप्तात्मने नमः ।

ॐ साकार निराकार समप्रहर्षाय नमः ।

ॐ सुलभाराधान पथ भक्तियोग प्रसारकाय नमः ।

ॐ सुनायास योगासना शिक्षकाय नमः । ६२०

ॐ संस्कृत्यैव जीवविकास विज्ञानेति दर्शिने नमः ।

ॐ स्वेच्छाप्रवर्तन निषेधकाय नमः ।

ॐ सार्वजनिक सेवा संलग्नाय नमः ।

ॐ सख्यासक्ति भक्ति रञ्जिताय नमः ।

ॐ स्मरणासक्ति भक्ति तोषिताय नमः ।

ॐ सत्य मिथ्य दर्शने सम्यग्दर्शिने नमः ।

ॐ सर्व देश काल जन सम्पूज्याय नमः ।

ॐ सच्चिन्तन समयं शुक्ल पक्षेति निरूपकाय नमः ।

ॐ विषय चिन्तन समयं कृष्ण पक्षेति प्रसारकाय नमः ।

ॐ हृदय गुहान्तर्प्रकाशाय नमः । ६३०

ॐ शरणागत धीतन्त्रज्ञाय नमः ।

ॐ विश्व कुटुम्ब मोदकारणाय नमः ।

ॐ सर्व विरक्ताय नमः ।

ॐ राजयोगाधीश्वराय नमः ।

ॐ श‍ृति घोष भाग्य प्रदाय नमः ।

ॐ सर्वात्म भावनाय नमः ।

ॐ साधक निरीक्षकाय नमः ।

ॐ शिष्य सौशील्य परीक्षकाय नमः ।

ॐ समस्त देश विदेश प्रेम प्रपूर्णाय नमः ।

ॐ सर्व पुरुषार्थ साफल्य कारणाय नमः । ६४०

ॐ व्यर्थ कालहरण गुणहरणाय नमः ।

ॐ वासनात्रय विमर्शकाय नमः ।

ॐ विश्व पर्यटने आत्मविद्या ज्योति स्थापकाय नमः ।

ॐ विज्ञानमय कोशे प्रचण्ड धीशक्ति पूर्णाय नमः ।

ॐ हृत्पद्म विराजित ब्रह्मज्योति दर्शकाय नमः ।

ॐ परदेश प्रवासे सत्यज्ञानानन्त तत्त्वघोषाय नमः ।

ॐ शास्त्रज्ञान हीन सूक्ति व्यर्थेति निरूपकाय नमः ।

ॐ शिष्योद्धारणार्थं आश्रम निर्मापकाय नमः ।

ॐ सर्व जीवोन्नति सुख हित चिन्तकाय नमः ।

ॐ सर्वदा सुगुण रत्नाभरण भूषिताय नमः । ६५०

ॐ सर्व संशय भीति भ्रान्ति निवारकाय नमः ।

ॐ संसार बन्ध विमोचकाय नमः ।

ॐ शिष्य गुणशक्ति विद्या परीक्षकाय नमः ।

ॐ सुविशेष धीबल योगबल निधये नमः ।

ॐ सर्वजीव साम्य सौख्य मग्नाय नमः ।

ॐ सदाचार निष्ठे समबुद्धये नमः ।

ॐ सुविचार नीरधि नाविकाय नमः ।

ॐ शिष्य गण योगक्षेमवहाय नमः ।

ॐ सारस्वत लोकाध्यक्षाय नमः ।

ॐ समर्पणे भस्मीकृताहम्भावाय नमः । ६६०

ॐ साधना स्फूर्ति प्रदान कुशलाय नमः ।

ॐ संश्रित दीन रक्षकाय नमः ।

ॐ सङ्कष्ट तारकाय नमः ।

ॐ शीघ्र स्वीकृत श्रद्धान्वित योग प्रियाय नमः ।

ॐ सुगुण वृद्ध्यासक्त शिष्योद्धारकाय नमः ।

ॐ सञ्चित प्रारब्धागामी मर्मज्ञाय नमः ।

ॐ सर्व ललितकलाराधन पूर्णाय नमः ।

ॐ सात्त्विक धृति धारण निर्देशकाय नमः ।

ॐ शुभोद्देशन कृत शास्त्र विधिनिषेध पालकाय नमः ।

ॐ सुगुणैश्वर्ययुत शिष्याराधिताय नमः । ६७०

ॐ शुभाशुभ फल समदर्शिने नमः ।

ॐ संन्यास योगकोविदाय नमः ।

ॐ शाब्धिक धारण शिक्षकाय नमः ।

ॐ सूक्ष्म शरीर प्रयाणे प्राण नियन्त्रकाय नमः ।

ॐ समरस वाक्काय मानसाय नमः ।

ॐ सत्प्रवर्तन शील साधक स्वामिने नमः ।

ॐ सुधीमणि प्रज्ञास्पर्शमण्यै नमः ।

ॐ श्रोत्रीय ब्रह्मनिष्ठाय नमः ।

ॐ साम्यदृष्टि प्रियाय नमः ।

ॐ साधित ध्यान समाधिरताय नमः । ६८०

ॐ षट्चक्रोपासना विधि बोधकाय नमः ।

ॐ षड्दर्शन गिरिश्रेणि विहाराय नमः ।

ॐ शिव पञ्चाक्षरी मन्त्र मग्नाय नमः ।

ॐ श‍ृति स्मृति भगवद्गीतार्थ निलयाय नमः ।

ॐ सच्चिदानन्द रूपाय नमः ।

ॐ शब्दार्थ भावार्थ भेदवेत्ताय नमः ।

ॐ सात्त्विक साधक कृपावर्षाय नमः ।

ॐ सत्त्वसंशुद्धि पूर्णाय नमः ।

ॐ संयोग वियोग धर्म साक्षिणे नमः ।

ॐ सार्वभौम गुरुकुलाचार्याय नमः । ६९०

ॐ सङ्कल्प विकल्प रहिताय नमः ।

ॐ षड्विकारमय देह मोह दूराय नमः ।

ॐ सोहम्भाव पूर्णाय नमः ।

ॐ स्थूल सूक्ष कारण शरीर त्रय बन्धज्ञाय नमः ।

ॐ शुद्ध जीवन यात्रा शिक्षकाय नमः ।

ॐ सुख जीव यात्रा कारणाय नमः ।

ॐ सुसूत्र कर्माचरण निर्देशकाय नमः ।

ॐ श्रीयुत भक्तवृन्द दान कर्म प्रेरकाय नमः ।

ॐ लोकसञ्चारिणे नमः ।

ॐ वेदोक्ति रत्नमाला प्रियाय नमः । ७००

ॐ वेद वेदाङ्ग परिणताय नमः ।

ॐ शरणागत सुलभाय नमः ।

ॐ रजो गुणोद्वेग नियन्त्रकाय नमः ।

ॐ योग विज्ञान संशोधकाय नमः ।

ॐ लोक कल्याणकारी मधु हृदयाय नमः ।

ॐ श्रद्धापूर्णस्य शीघ्र ज्ञान प्रवर्तकाय नमः ।

ॐ लौकिक विद्यारङ्ग मार्गदर्शकाय नमः ।

ॐ रचनात्मक तन्त्रज्ञ धी प्रकाशकाय नमः ।

ॐ सृजनात्मिक कलाभिज्ञानामपि महत् सृजनकारकाय नमः ।

ॐ शिष्य समुदाय भविष्य चिन्तन निरताय नमः । ७१०

ॐ रागानुराग बन्ध रहिताय नमः ।

ॐ शुद्ध प्रेम पारिजाताय नमः ।

ॐ स्वधर्म महत्त्व बोधकाय नमः ।

ॐ सत्त्व गुण वर्धकाय नमः ।

ॐ सत्य धर्म निरताय नमः ।

ॐ स्वभाव जन्य सौम्य शीलाय नमः ।

ॐ साधकासुरीगुण निवारकाय नमः ।

ॐ सर्व जीव साधु कर्मणे नमः ।

ॐ क्षणक्षण विचलित मनो निग्रह बलदायकाय नमः ।

ॐ स्व बान्धवा मोहराहित्य हर्षाय नमः । ७२०

ॐ सुजन बान्धव्य पराय नमः ।

ॐ साधक परिवार पूज्याय नमः ।

ॐ साधक वृन्द सौम्य गुणाराध्याय नमः ।

ॐ सार्वत्रिक परिश्रम संलग्नाय नमः ।

ॐ सुमेधाय नमः ।

ॐ सिद्धीश्वराय नमः ।

ॐ सुधीन्द्राय नमः ।

ॐ सुज्ञान सञ्छिन्न संशयाय नमः ।

ॐ सुमनसाराधित विपश्चिताय नमः ।

ॐ शास्त्रान्तर्य परायणाय नमः । ७३०

ॐ स्व प्रयोजन दृष्टि दूराय नमः ।

ॐ क्षराक्षर भेदज्ञाय नमः ।

ॐ शुभार्थं शास्त्र विहित धर्मनेम पालकाय नमः ।

ॐ शतापराध क्षमापण सौमनस्य पूर्णाय नमः ।

ॐ शास्त्र विधि ज्ञान प्रकाशाय नमः ।

ॐ हर्षोल्लासोत्साह वर्धकाय नमः ।

ॐ शिष्टाचार सम्पन्नाय नमः ।

ॐ विश्व प्रेम मुदित मनस्काय नमः ।

ॐ विशाल सुमतीन्द्राय नमः ।

ॐ श्वेत शुभ्रदुकूलान्विताय नमः । ७४०

ॐ शोकाधीन मानस परिवर्तकाय नमः ।

ॐ विषम समये तप्त हृदये शान्ति स्थापकाय नमः ।

ॐ शौच सन्तोष तपोमय कर्म निष्ठाय नमः ।

ॐ सूर्य नमस्कार तोषाय नमः ।

ॐ शिष्यान्तःकरण मथनाय नमः ।

ॐ क्षीण दुरित साधकोत्कर्षाय नमः ।

ॐ विशिष्ठाय नमः ।

ॐ प्रशान्ताय नमः ।

ॐ विपश्चिताय नमः ।

ॐ विश्वरञ्जिताय नमः । ७५०

ॐ वासनाधीन हृदये विवेक दीप स्थापकाय नमः ।

ॐ वैराग्य धनाय नमः ।

ॐ सुमति बल तेजः पूर्णाय नमः ।

ॐ लोक सेवायां ईश सेवा दर्शिने नमः ।

ॐ लोक सम्पर्क विधि विधान पावनाय नमः ।

ॐ सहज सौम्य हितमित वचन सुधाकराय नमः ।

ॐ वारिज चरण द्वयाय नमः ।

ॐ सन्तृप्ति सदनाय नमः ।

ॐ लौकिक जन संसद्यनासक्ताय नमः ।

ॐ शान्ति निलय वायु विहारिणे नमः । ७६०

ॐ शुभा शुभातीताय नमः ।

ॐ श्रवण मनन निधिध्यासनरक्ताय नमः ।

ॐ श्रमरहित कर्म, भाव स्पन्दन प्रेरकाय नमः ।

ॐ सत्त्व गुणाश्रये महान् सहस्र ज्ञान यज्ञ कर्तृवे नमः ।

ॐ सच्चारित्र्य रत्न निधये नमः ।

ॐ समस्त जीव हित चिन्तकाय नमः ।

ॐ समस्त शिष्यवृन्द परिरक्षकाय नमः ।

ॐ स्वावलम्बन सुखप्रदर्शकाय नमः ।

ॐ साधक गुणदोष कारण वेत्ताय नमः ।

ॐ सार्वकालिक पूज्याय नमः । ७७०

ॐ समबुद्धि स्वाराज्य संस्थापकाय नमः ।

ॐ सर्वदा मन्दस्मिताय नमः ।

ॐ स्थूल सूक्ष्म विवेचनापराय नमः ।

ॐ शिष्य वृन्द कृत पुण्य साकार मूर्तये नमः ।

ॐ सर्व साधक स्तोम सम्भाविताय नमः ।

ॐ सनातन संस्कृति परिरक्षकाय नमः ।

ॐ वात्सल्यासक्ति भक्ति पुलकित मानसाय नमः ।

ॐ विशुद्ध चक्रे षोडशदळ वारिजदर्शकाय नमः ।

ॐ वेद वाणि पीयूष प्रसाददायकाय नमः ।

ॐ वैशाल्य औदार्य गुणभूषिताय नमः । ७८०

ॐ विषयमय विश्वे स्थित प्रज्ञाय नमः ।

ॐ संश्रित कारुण्य कल्पतरवे नमः ।

ॐ सत्य सन्धाय नमः ।

ॐ सात्विक धृति पूर्णाय नमः ।

ॐ सनातन धर्म सारथ्यै नमः ।

ॐ भक्त समुदाय गेयाय नमः ।

ॐ समस्त विश्व बुधजन वन्द्याय नमः ।

ॐ श्रेष्ठ सिद्धि बुद्धि स्थान राजिताय नमः ।

ॐ स्वाधिष्ठान चक्रे षड्दळकमल ध्यानरञ्जिताय नमः ।

ॐ हं षं अक्षर द्वयोत्पत्ति दर्शकाय नमः । ७९०

ॐ सद्वर्तन सुख जीवन विधान बोधकाय नमः ।

ॐ भक्त शिखामणि सम्प्रीत ज्ञान वैभवाय नमः ।

ॐ सच्छिष्य गुणरत्न तोषिताय नमः ।

ॐ साधन पर्यन्त शिष्यवेष्टिताय नमः ।

ॐ सप्तधातुर्मय तनु शुद्धि विधि शिक्षकाय नमः ।

ॐ विध विध सङ्कट हरणाय नमः ।

ॐ विनीत शिष्योद्धारकाय नमः ।

ॐ लोकाभिमुखे सर्वकार्यकलाप कुशलाय नमः ।

ॐ श‍ृति घोष ज्ञान यज्ञ कर्तृवे नमः ।

ॐ वेदार्थ ब्रह्म विद्या सुधा सागराय नमः । ८००

ॐ गीतसुधाश्रय कल्पतरवे नमः ।

ॐ क्षिप्रं मन्त्रदीक्षाव्रत ज्ञान संवर्धकाय नमः ।

ॐ योग विद्या प्रसारे सूत्रधाराय नमः ।

ॐ विपरीत निमित्त विचलित स्थैर्यदायकाय नमः ।

ॐ वर्णसङ्करकारक दोष निवर्तकाय नमः ।

ॐ राज्यदाह त्यागिनः ब्रह्मतत्त्व बोधकाय नमः ।

ॐ शास्त्रज्ञान प्रधानार्थं सर्वकाल सिद्धाय नमः ।

ॐ सुदुराचारि गुण परिवर्तकाय नमः ।

ॐ हृदय ग्रन्थि विभेदकाय नमः ।

ॐ दशनाद श्रवण भाग्ये प्रहर्षाय नमः । ८१०

ॐ सर्व भूतान्तरात्मा दर्शिने नमः ।

ॐ समस्त स्थावर जङ्गमात्मके ब्रह्मतत्त्व दर्शकाय नमः ।

ॐ श्रद्धा तपश्चर्य सिद्धाय नमः ।

ॐ सर्वोपाधि सहिताः जीवात्मा भावयुताः इति वेत्ताय नमः ।

ॐ षोडशकला प्रपूर्ण भगवत्तत्त्वाराधकाय नमः ।

ॐ समष्टि व्यष्टि भेदाभेद शिक्षण प्रदाय नमः ।

ॐ साधनाभीप्सा वर्धकाय नमः ।

ॐ क्षराक्षर पुरुषौ विवेचकाय नमः ।

ॐ भवार्णव तारकाय नमः ।

ॐ प्रकृति लीलाबोधक वरद मूर्तये नमः । ८२०

ॐ वेदवेदाङ्ग विशारदाय नमः ।

ॐ वेदोपनिषत् ब्रह्मसूत्र भाष्यकाराय नमः ।

ॐ विषयेन्द्रिय संयोगाद्दुःखमेव फलमिति निर्णायकाय नमः ।

ॐ सार्वत्रिक पूर्णानुभवज्ञाय नमः ।

ॐ सार्वकालिक सत्य ब्रह्मतत्त्वानुभविने नमः ।

ॐ सार्वदेशिक प्रकृतिनियम परिज्ञातृवे नमः ।

ॐ योगयाने आमिष पाशदूराय नमः ।

ॐ पूजा प्रसादं मित्यनुभवे दर्शिताय नमः ।

ॐ षोडशोपचारार्चन प्रियाय नमः ।

ॐ विद्यार्जनं जीवन ज्योति स्थापनार्थमिति बोधकाय नमः । ८३०

ॐ विस्मयकर विकास प्रक्रिया निर्देशकाय नमः ।

ॐ विश्व तैजस प्राज्ञ तत्त्व भेधज्ञाय नमः ।

ॐ विरक्ति साम्राज्य साम्राटाय नमः ।

ॐ विद्वत् सन्यासिने नमः ।

ॐ वीत राग द्वेषाय नमः ।

ॐ राजाधिराज कुलगुरवे नमः ।

ॐ स्वात्म तेजोवलये शिष्यतेज प्रकाशकाय नमः ।

ॐ साधक जन्मकारणवेद्याय नमः ।

ॐ साधक जीवनोन्नतिकारणाय नमः ।

ॐ साधक स्फूर्तिकर दिव्यानुष्ठाय नमः । ८४०

ॐ सदृढगात्राय नमः ।

ॐ संसेव्यमान सुज्ञान सुरधेनवे नमः ।

ॐ सुमूर्त चरितार्थाय नमः ।

ॐ हृदय दौर्बल्यवशस्य मनोबलप्रदाय नमः ।

ॐ सर्वगुणशक्ति सिद्धि निधीश्वराय नमः ।

ॐ सर्वप्रयोग साफल्य समेताय नमः ।

ॐ सर्वजनहितकरोत्सवपराय नमः ।

ॐ समस्त जनोल्लासोत्साह प्रियाय नमः ।

ॐ सत्य ज्ञानानन्त तत्त्वज्ञाय नमः ।

ॐ साकार विराड्रूपी ब्रह्मोपासकाय नमः । ८५०

ॐ सालोक्य सामीप्य मुक्तिवेत्ताय नमः ।

ॐ सारूप्य सायुज्य मुक्तिधामे गुणातीताय नमः ।

ॐ सचित्र चित्ते बहुस्मृति शक्तिसंवर्धकाय नमः ।

ॐ सुप्रसन्न मनस्क हसन्मुखाय नमः ।

ॐ सच्चरितार्थ पुरुषोत्तमाय नमः ।

ॐ शुद्ध वाग्वैखरी समायुक्ताय नमः ।

ॐ स्वार्थसङ्ग्रह लेपरहिताय नमः ।

ॐ शास्त्रोद्भवलाभ प्रचारकाय नमः ।

ॐ परा विद्यालय स्थापकाय नमः ।

ॐ सुज्ञान भिक्षा प्रदायकाय नमः । ८६०

ॐ संश्रित वत्सलाय नमः ।

ॐ शिष्य समुदाय परिपोषकाय नमः ।

ॐ सारस्वत निधीश्वराय नमः ।

ॐ साधक सम्भाषिताय नमः ।

ॐ शिष्य सन्दर्शन सन्तुष्टाय नमः ।

ॐ स्थैर्य वीर्य सम्पन्नाय नमः ।

ॐ क्षिप्तचित्त नियामकाय नमः ।

ॐ विक्षिप्त चित्त नियन्त्रकाय नमः ।

ॐ क्षण क्षणं कृत सार्थक कर्माय नमः ।

ॐ दिन दिनं दत्तज्ञान कुसुमगुच्छाय नमः । ८७०

ॐ शिष्योभूत्वा विधेय शरणागताय नमः ।

ॐ सद्भक्ति पारवश्ये विद्रावक हृदयाय नमः ।

ॐ विनीत शिष्योद्धारकाय नमः ।

ॐ विचार विनिमय विशारदाय नमः ।

ॐ क्षमाशील मातृ हृदयाय नमः ।

ॐ विनूतन योग तन्त्रज्ञाय नमः ।

ॐ वायवीय धारणक्रम वेत्ताय नमः ।

ॐ वैदिक सम्प्रदाय प्रवर्तकाय नमः ।

ॐ विध विध भक्ति सुममालिकार्पण प्रमोदाय नमः ।

ॐ सृजन कार्यनिमित्त कल्पना शक्त्युद्दीपकाय नमः । ८८०

ॐ स्वार्थपर जनमध्ये पवित्र गुरुकुल रक्षकाय नमः ।

ॐ योगसेवा दीक्षाप्रदाय नमः ।

ॐ सुज्ञान विज्ञान तृप्तात्मने नमः ।

ॐ विश्वगुरु पीठाधिपतये नमः ।

ॐ सत्प्रवर्तन सहित हर्षिताय नमः ।

ॐ दृग् दृश्य विवेके चिन्तामण्यैव शोभिताय नमः ।

ॐ गोचरागोचर तत्त्व कोविदाय नमः ।

ॐ अनभिषिक्त विश्वाचार्याय नमः ।

ॐ योगबलेन प्रज्ञासञ्चारिणे नमः ।

ॐ अवस्थात्रय भेदसाक्षिणे नमः । ८९०

ॐ तुरीयाय नमः ।

ॐ जनानुरागी विरागिणे नमः ।

ॐ ज्ञानप्रसादेन सन्तृप्ताय नमः ।

ॐ विशुद्धसत्वाय नमः ।

ॐ धन कनक वस्तु व्यामोह दूरीकराय नमः ।

ॐ सदभ्यास वशे सन्तुष्टिरिति निरूपकाय नमः ।

ॐ कुटुम्ब सौख्यसाधनं प्रेममात्रमिति वेत्ताय नमः ।

ॐ जीवभाषाकर्षक वाग्सुधा समेताय नमः ।

ॐ बहु द्रव्यमय कार्यं बहुलायासमिति प्रशिक्षकाय नमः ।

ॐ सात्विकाहार सेवने सुगुण शीलाय नमः । ९००

ॐ युक्त विहारोल्लासाय नमः ।

ॐ कलाविद वृन्द कृत सारस्वतोत्सवानन्दिताय नमः ।

ॐ सत्त्वगुण प्राधान्ये निरुपम सन्तोषाय नमः ।

ॐ तामसिकाहार फलं दुःखमिति संशोधकाय नमः ।

ॐ सुधारित शिक्षणक्रम प्रियाय नमः ।

ॐ सर्वयोग समन्वय चक्रवर्तिने नमः ।

ॐ षड्विकाराधीन देह साक्षिणे नमः ।

ॐ अनुदिनं प्राण शक्त्योपासकाय नमः ।

ॐ शब्द तन्मात्रादाकाशोत्पत्ति रिति वेत्ताय नमः ।

ॐ स्पर्श तन्मात्रादनलोत्पत्तिरिति ज्ञातृवे नमः । ९१०

ॐ रूप तन्मात्रादग्नि सम्भवमिति ज्ञानिने नमः ।

ॐ रस तन्मात्रा जलोत्पत्ति कारणमिति बोधकाय नमः ।

ॐ गन्ध तन्मात्रा पृथ्वी भूत सृष्टिरिति वेत्ताय नमः ।

ॐ ईर्ष्या विषाद घृणादि दुर्गुण दूराय नमः ।

ॐ ध्यानाभ्यास नैरन्तर्ये साफल्य स्वामिने नमः ।

ॐ धार्मिक कैङ्कर्य सम्प्रीताय नमः ।

ॐ पिण्डाण्ड विज्ञान समायुक्ताय नमः ।

ॐ ब्रह्माण्ड विज्ञान प्राप्ति पूर्णाय नमः ।

ॐ विस्मयकर विकास प्रक्रियाप्रेक्षकाय नमः ।

ॐ विश्व तैजस प्राज्ञ तत्त्वभेदज्ञाय नमः । ९२०

ॐ विचारविनिमय विशारदाय नमः ।

ॐ विनूतन योगतन्त्र शोधकाय नमः ।

ॐ सुषुम्नानाडि महिमा वर्णन तोषिताय नमः ।

ॐ सुषुम्नानाडि प्राधान्यता दर्शकाय नमः ।

ॐ द्विसप्ततिः सहस्रनाडीयुक्त देहविज्ञानिने नमः ।

ॐ सुषुम्ना शाखाद्वय प्रकाशिनी प्रकाशिका ज्ञातृवे नमः ।

ॐ आर्यकावैद्युति नाडिद्वय स्पर्शाय नमः ।

ॐ इडापिङ्गळा नाडिद्वयेन श्वासयान रञ्जनाय नमः ।

ॐ चित्तपरिवर्तक योग चिकित्सकाय नमः ।

ॐ दयार्द्र भवरोग भिषजे नमः । ९३०

ॐ अकर्मकृते नमः ।

ॐ अद्वितीय आत्मतत्त्व दर्शिने नमः ।

ॐ आत्मसाक्षात्कारार्थं सुखेषु विगतस्पृहाय नमः ।

ॐ आध्यात्मिकानुभव रत्नाकराय नमः ।

ॐ अधिभौतिक विश्वे धर्म ध्वजारोहिणे नमः ।

ॐ अधिदैविक ज्ञानाधीश ऋषये नमः ।

ॐ आत्यन्तिक निवृत्ति निर्मग्नाय नमः ।

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ॐ अनुद्विग्न मनस्काय नमः ।

ॐ आनन्दमयकोशे चित्तवृत्ति रूपाकार दर्शकाय नमः ।

ॐ गतसङ्गाय नमः । ९४०

ॐ सर्वदा सत्सङ्गरताय नमः ।

ॐ चरग्रन्थालयाय नमः ।

ॐ असङ्ग शस्त्राय नमः ।

ॐ सर्वशास्त्र पारङ्गताय नमः ।

ॐ नवरसमय भाव जीवन विश्लेषकाय नमः ।

ॐ वज्रमणिवत् प्रकाशित धीवराय नमः ।

ॐ जगन्निवासध्याने मुदिताय नमः ।

ॐ जन्मकर्म फलभोगे निश्चलचित्ताय नमः ।

ॐ जाग्रदवस्थे सर्वपाश दर्शकाय नमः ।

ॐ साक्षात् जीवन्मुक्त परब्रह्मणे नमः । ९५०

ॐ गुणावगुण सङ्ग्रामे नित्य विजेताय नमः ।

ॐ वंशपावनकर कार्यदीपकाय नमः ।

ॐ वरद मूर्तये नमः ।

ॐ वशीकृत गुणत्रय सङ्घर्षणाय नमः ।

ॐ स्वाधीनकृत देहत्रय धर्माय नमः ।

ॐ षड्रसमय भक्तिनिवेदन पुलकिताय नमः ।

ॐ पृथ्वि जल सङ्गमोद्भव मधुरसाकर्षिताय नमः ।

ॐ पृथ्वि तेज सङ्गमोदित आम्लरस प्रियाय नमः ।

ॐ अप्तेजोद्भव प्रधानोपयुक्त लवणरस प्रियाय नमः ।

ॐ आकाश वायु मिश्रणोद्भव तिक्तरसाकर्षिताय नमः । ९६०

ॐ तेज वायु सङ्गमसम्भव कटुरसाहार प्रियाय नमः ।

ॐ पृथ्वि वायु मिश्रण रूप कषायौषधरस प्रियाय नमः ।

ॐ भक्ष्य भोज्य लेह्य चोष्येति चतुर्विधान्न सेवनासक्ताय नमः ।

ॐ मन्त्राभ्यासेन ज्ञेयतत्त्ववेत्ताय नमः ।

ॐ कृपानिकेतनाय नमः ।

ॐ रुद्राक्षिमाला धारिणे नमः ।

ॐ बहुशास्त्र रहस्यविदे नमः ।

ॐ दशेन्द्रिय युक्तोऽपि अतीन्द्रियाय नमः ।

ॐ मनोविलास युक्तोऽपि अमनस्क योगज्ञाय नमः ।

ॐ बुद्धि विवेचन पूर्णोऽपि बुद्धाय नमः । ९७०

ॐ चिद्विलास रञ्जनाय नमः ।

ॐ सर्व बीजाक्षर माला जपयज्ञविदे नमः ।

ॐ इडानाडि गङ्गा नद्येत्युपासकाय नमः ।

ॐ पिङ्गळा नाडि यमुना नद्येतर्चकाय नमः ।

ॐ सुषुम्ना नाडि गुप्त गामिनि सरस्वत्याराधकाय नमः ।

ॐ सम्यज्ञान पूर्णाय नमः ।

ॐ सम्यग्दर्शि ब्रह्मर्षिणे नमः ।

ॐ सम्यग्जीवनादर्श महर्षिणे नमः ।

ॐ स्थूल सूक्ष्म जगत्सञ्चारिणे नमः ।

ॐ सप्त लोक गमनागमनवेत्ते नमः । ९८०

ॐ सत्य ज्ञानानन्त तत्त्वलीनाय नमः ।

ॐ सगुण निर्गुण समन्वय मूर्तये नमः ।

ॐ सच्चिदानन्द रूपिणे नमः ।

ॐ ब्रह्म निर्वाणपदे परमानन्दाय नमः ।

ॐ दक्षिण नेत्रे गान्धारि नाडियुताय नमः ।

ॐ वामनेत्रे अस्थिजिह्वानाडियुक्ताय नमः ।

ॐ दक्षिण कर्णे पुंसानाडि सहिताय नमः ।

ॐ वामकर्णे पयस्विनि नाडि समेताय नमः ।

ॐ मुखारविन्दे आलम्बू नाडिवेत्ताय नमः ।

ॐ उपस्थ स्थाने लकुहा नाडिविदे नमः । ९९०

ॐ नाभिस्थाने शङ्खिनी नाडि पूर्णाय नमः ।

ॐ इडा पिङ्गळा सुषुम्ना नाडि गमनविदे नमः ।

ॐ मूलाधार चक्रे “लं” बीजाक्षरोपासकाय नमः ।

ॐ स्वाधिष्ठान कमले “वं” बीजाक्षर जपरताय नमः ।

ॐ मणिपूर पद्मे “रं” बीजाक्षर निरताय नमः ।

ॐ अनाहत सदने “यं” बीजाक्षर संलग्नाय नमः ।

ॐ विशुद्ध स्थाने “हं” बीजाक्षर निमग्नाय नमः ।

ॐ आज्ञा चक्रे “ॐ” बीजाक्षर जपकर्तृवे नमः ।

ॐ सहस्रार कमले “अः” जपयज्ञ तोषिताय नमः ।

ॐ ब्रह्मरन्ध्रे मनो बुद्धिवलये मन्त्रजप निष्ठाय नमः । १०००

ॐ विविदाद्भुत दशनाद श्रवणे आश्चर्यवत् आत्मज्ञाय नमः ।

ॐ नेति नेति भावे आत्म संस्पर्शकाय नमः ।

ॐ सम्यग्दर्शिने नमः ।

ॐ अन्तर्विज्ञान सार्वभौमाय नमः ।

ॐ ज्ञान सिंहासनारूढाय नमः ।

ॐ आत्मज्ञान हिमशैल धामाय नमः ।

ॐ मुक्तिद्वार कवाट पाटन कराय नमः ।

ॐ गीतसुधा नीराजनप्रहर्षिताय नमः । १००८

॥ इति गीतसुधा विरचिता श्री गुरु सहस्त्रनाम सम्पूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री गुरु सहस्त्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्री गुरु सहस्त्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्त्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैदिक दर्शन और ‘गुरु-तत्व’ को समझने के लिए हमें गुरु की महिमा, शिव के दक्षिणामूर्ति स्वरूप और सहस्त्रनाम के विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

परब्रह्म और गुरु का अद्वैत स्वरूप (Non-Duality of Guru and God)

शास्त्र कहते हैं— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥” गुरु कोई साधारण शरीर या मनुष्य नहीं है; गुरु एक ‘तत्व’ (Principle) है। जब ईश्वर आप पर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, तो वे आपको गुरु से मिलाते हैं, और जब गुरु प्रसन्न होते हैं, तो वे आपको ईश्वर से मिला देते हैं। श्री गुरु सहस्त्रनाम का गान करना वास्तव में उस परब्रह्म चेतना की स्तुति करना है जो संपूर्ण चराचर जगत को संचालित कर रही है। जब हम गुरु के 1000 नामों का पाठ करते हैं, तो हम अपनी आत्मा को साक्षात परमात्मा से जोड़ रहे होते हैं।

सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra) का जागरण

योग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, मानव शरीर में सात मुख्य चक्र होते हैं। सबसे ऊपर, सिर के शिखर पर ‘सहस्रार चक्र’ (हज़ार पंखुड़ियों वाला कमल) स्थित होता है, जिसे गुरु का स्थान माना गया है। ‘सहस्त्रनाम’ (1000 नाम) सीधे इस सहस्रार चक्र से जुड़े हैं। जब साधक इन 1000 नामों का लयबद्ध और भावपूर्ण उच्चारण करता है, तो प्रत्येक नाम की ध्वनि-तरंग (Vibration) इस चक्र पर आघात करती है। इसके जाग्रत होने से साधक के भीतर साक्षात ईश्वरीय ज्ञान का अवतरण होने लगता है और अज्ञानता की सारी गांठें स्वतः खुल जाती हैं।

‘नाद-विज्ञान’ (The Science of Sound)

श्री गुरु सहस्त्रनाम के 1000 नाम (जैसे- ॐ परब्रह्मणे नमः, ॐ चिदानन्दाय नमः, ॐ दक्षिणामूर्तये नमः, ॐ दत्तात्रेयाय नमः) केवल सम्बोधन नहीं हैं; ये 1000 बीज मंत्र हैं। प्रत्येक नाम गुरु के एक विशिष्ट गुण, उनकी करुणा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। जब इन नामों का सस्वर पाठ किया जाता है, तो आस-पास का वातावरण ‘गुरु-चेतना’ से भर जाता है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) को शुद्ध कर उसे ग्रहणशील (Receptive) बनाता है।

2. श्री गुरु सहस्त्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

गुरु की कृपा से रंक भी राजा बन जाता है और मूक (गूंगा) भी शास्त्रों का ज्ञाता हो जाता है। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्त्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

बौद्धिक, शैक्षणिक और करियर संबंधी लाभ (Intellect & Career Success)

  • कुशाग्र बुद्धि और स्मरण शक्ति की प्राप्ति: गुरु साक्षात बृहस्पति (ज्ञान के देवता) के स्वरूप हैं। विद्यार्थियों (Students), शोधकर्ताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह सहस्त्रनाम वेद-तुल्य है। इसके पाठ से एकाग्रता (Focus) बढ़ती है और सीखी हुई विद्या कभी विस्मृत नहीं होती।

  • सही मार्गदर्शन (Right Guidance): जीवन या करियर के जिस मोड़ पर व्यक्ति भ्रमित हो जाता है (Confusion), वहाँ यह पाठ मस्तिष्क को वह स्पष्टता (Clarity) प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति सही निर्णय ले पाता है। यदि आपके जीवन में कोई भौतिक गुरु नहीं है, तो इस पाठ से आपको प्रकृति या अदृश्य शक्तियों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है।

  • वाक्-सिद्धि और आकर्षण: गुरु उपासक की वाणी में एक अद्भुत ओज, सत्य और आकर्षण (Charisma) आ जाता है। समाज और कार्यक्षेत्र में लोग उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं और उसका सम्मान करते हैं।

लौकिक, पारिवारिक और आर्थिक लाभ (Worldly & Financial Bliss)

  • स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति: गुरु कृपा के बिना प्राप्त हुआ धन अक्सर अहंकार और बीमारियां लाता है। गुरु सहस्त्रनाम के पाठ से प्राप्त होने वाला धन ‘सात्विक’ और ‘स्थिर’ होता है, जो घर में अपार शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आता है।

  • पारिवारिक क्लेश का शमन: जिस घर में नित्य गुरु वंदना की ध्वनि गूंजती है, वहाँ से अज्ञान, अहंकार और क्लेश हमेशा के लिए विदा हो जाते हैं। परिवार के सदस्यों में सामंजस्य और गुरु-भक्ति बढ़ती है।

ज्योतिषीय और कर्मिक लाभ (Astrological & Karmic Healing)

  • गुरु चंडाल योग और बृहस्पति दोष की अचूक शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि जन्म कुंडली में बृहस्पति (Jupiter) नीच का हो, राहु के साथ ‘गुरु चंडाल योग’ बना रहा हो, या पितृ दोष हो, तो व्यक्ति को हर कार्य में असफलता और अपयश मिलता है। श्री गुरु सहस्त्रनाम नवग्रहों के गुरु ‘बृहस्पति’ को अत्यंत बलवान कर देता है, जिससे सभी राजयोग फलित होने लगते हैं।

  • पाप कर्मों का नाश: गुरु की एक कृपा-दृष्टि करोड़ों जन्मों के संचित पापों (Negative Karma) को भस्म कर सकती है। इस पाठ से प्रारब्ध के कठोर कष्ट कट जाते हैं।

आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Spiritual & Psychological)

  • तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: आधुनिक जीवन के तनाव, चिंता (Anxiety) और अकेलेपन को शांत करने के लिए गुरु का स्मरण अमोघ है। यह महसूस करना कि “गुरु मेरे साथ हैं”, व्यक्ति के मन से हर प्रकार का भय निकाल देता है।

  • आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization): यह सहस्त्रनाम साधक को भौतिकता के मायाजाल से निकालकर मोक्ष (Liberation) का मार्ग प्रशस्त करता है।

3. श्री गुरु सहस्त्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

गुरु की उपासना अत्यंत सात्विक, निर्मल, और समर्पण-युक्त होती है। इस सिद्ध सहस्त्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: गुरु-तत्व की आराधना के लिए गुरुवार (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है।

  • विशेष तिथियां: गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा), दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), वसंत पंचमी, और किसी भी मास की पूर्णिमा या एकादशी के दिन इस सहस्त्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) होता है। इसके अतिरिक्त, संध्याकाल (गोधूलि बेला) को भी इसका पाठ किया जा सकता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव उत्तर (North – हिमालय/शिव की दिशा) या पूर्व (East – ज्ञान की दिशा) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), सफेद या कुशा के आसन का प्रयोग करें।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में हल्के पीले (बृहस्पति और गुरु का प्रिय रंग) या श्वेत रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।

प्रतिमा स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र एक स्वच्छ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर परम गुरु (जैसे भगवान दत्तात्रेय, आदि शंकराचार्य, श्री दक्षिणामूर्ति, या आपके अपने सद्गुरु) का चित्र अथवा ‘पादुका’ स्थापित करें।
दीपक गुरुदेव के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। चंदन, मोगरा या केसर की सात्विक धूप जलाएं।
तिलक गुरुदेव के चित्र पर केसर, पीला चंदन, अष्टगंध या गोपी चंदन का तिलक लगाएं। स्वयं भी मस्तक पर पीला चंदन अवश्य धारण करें।
पुष्प और नैवेद्य उन्हें पीले पुष्प (गेंदा, चंपा, कनेर) अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी दल भी अर्पित किया जा सकता है (यदि इष्ट विष्णु/दत्त स्वरूप हों)।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (पीले रंगे हुए चावल) और एक पीला पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे परम गुरुदेव, मैं अपने जीवन से समस्त अज्ञान, बौद्धिक जड़ता व अस्थिरता के नाश, परीक्षा/व्यापार में सफलता, और आपकी अहैतुकी कृपा के लिए श्री गुरु सहस्त्रनाम का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्त्रनाम का पाठ (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का मानसिक ध्यान कर उन्हें प्रणाम करें।

  • अपने माता-पिता को मानसिक रूप से वंदन करें (क्योंकि वे प्रथम गुरु हैं)।

  • गुरु मंत्र (जो आपको गुरु से प्राप्त हुआ हो) या “ॐ गुं गुरुभ्यो नमः” अथवा “ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (रुद्राक्ष, हल्दी या स्फटिक की माला पर) जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और पूर्ण शरणागति के साथ ‘श्री गुरु सहस्त्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • सहस्त्रार्चन विधि: यदि आप विशेष ज्ञान या किसी घोर संकट से मुक्ति चाहते हैं, तो सहस्त्रनाम के प्रत्येक नाम के साथ गुरुदेव के चित्र या पादुका पर एक पीला पुष्प या पीला अक्षत दाना अर्पित करें।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद गुरुदेव को बेसन के लड्डू, चने की दाल और गुड़, केले, या केसर युक्त खीर का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से गुरुदेव की आरती (जय गुरुदेव…) गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

गुरु की साधना में किसी भौतिक आडंबर की आवश्यकता नहीं होती, परंतु ‘आचरण की शुद्धता’ सबसे बड़ी मांग है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान: जो व्यक्ति अपने माता-पिता का निरादर करता है, वृद्धाश्रम छोड़ता है, या अपने स्कूल/कॉलेज के शिक्षकों का अपमान करता है, उसे दुनिया की कोई भी ‘गुरु साधना’ फल नहीं दे सकती। यह प्रथम और सबसे कठोर नियम है।

  2. अहंकार शून्यता (Zero Ego): “मैं बहुत ज्ञानी हूँ”, “मेरे पास बहुत धन है”—गुरु के द्वार पर यह अहंकार शून्य होना चाहिए। जिस पात्र में अहंकार भरा हो, उसमें गुरु ज्ञान का जल नहीं डाल सकते। खाली होकर (Receptive) साधना करें।

  3. पूर्ण सात्विकता (Sattvic Diet): अनुष्ठान के दौरान घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें। तामसिक भोजन बुद्धि को मलिन (Dull) करता है।

  4. सत्य का आचरण: व्यापार या नौकरी में बेईमानी, धोखाधड़ी या चुगली का सहारा लेकर सफलता चाहने वालों से गुरु-तत्व रुष्ट हो जाता है। वाणी में सत्य और मधुरता रखें।

  5. ब्रह्मचर्य का पालन: किसी विशेष मनोकामना के लिए अनुष्ठान (21 या 41 दिन) के दौरान शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्री गुरु सहस्त्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो:

  • गुरु निंदा से बचें: शास्त्रों में सबसे बड़ा पाप ‘गुरु निंदा’ को माना गया है। न तो स्वयं किसी संत/गुरु की निंदा करें और न ही जहाँ निंदा हो रही हो, वहाँ खड़े रहें।

  • निरंतरता (Consistency): गुरु साधना में नागा (Break) नहीं होना चाहिए। इसे नित्य नियम बनाकर उसी समय पर करना चाहिए। यह आपके और परब्रह्म के बीच एक अनुशासन स्थापित करता है।

  • दिखावा न करें (No Show-off): अपनी साधना, मंत्र या अनुष्ठान का प्रदर्शन समाज में न करें। आध्यात्मिक साधना जितनी गुप्त होती है, उतनी ही अधिक ऊर्जावान बनती है।

  • शारीरिक पवित्रता: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था में गुरु की मूर्ति, पादुका, यंत्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है।

6. आधुनिक युग में श्री गुरु सहस्त्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘सूचनाओं की बाढ़’ (Information Overload), ‘वैचारिक भटकाव’, और ‘मानसिक अकेलेपन’ का युग है। इंटरनेट और स्मार्टफोन के कारण आज हमारे पास ‘डेटा’ और ‘सूचना’ तो बहुत है, लेकिन ‘ज्ञान’ (Wisdom) और ‘दिशा’ (Direction) पूरी तरह नदारद है।

हम जानते सब कुछ हैं, लेकिन करना क्या है, यह कोई नहीं जानता। करियर की अंधी दौड़, रिश्तों में अविश्वास, और भविष्य की अनिश्चितता ने आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression) और एंग्जायटी (Anxiety) का मरीज बना दिया है। युवाओं को एक सच्चे ‘मेंटर’ (Mentor) की तलाश है, जो उन्हें जज न करे, बल्कि रास्ता दिखाए।

‘श्री गुरु सहस्त्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘बौद्धिक भटकाव’, ‘अकेलेपन’ और ‘दिशाहीनता’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है। जब आप प्रातःकाल शांत मन से बैठकर संस्कृत के इन ओजस्वी 1000 नामों का गान करते हैं, तो:

  1. यह सहस्त्रनाम आपके मस्तिष्क को शांत कर ‘फोकस’ (Focus) वापस लाता है। यह आपको सिखाता है कि इंटरनेट के शोर-शराबे के बीच अपने ‘भीतर की आवाज़’ (Inner Voice) को कैसे सुनें।

  2. यह आपके अवचेतन मन से ‘असुरक्षा’ (Insecurity) के भाव को जड़ से मिटाता है। जब आप यह विश्वास कर लेते हैं कि ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति (गुरु) आपका हाथ पकड़े हुए है, तो अकेलेपन का भय तुरंत नष्ट हो जाता है।

  3. यह आपके आस-पास एक ऐसा शक्तिशाली ‘तेजस्वी ऑरा’ (Aura of Wisdom) बनाता है कि आपके व्यक्तित्व में एक गजब का आकर्षण और नेतृत्व क्षमता (Leadership) आ जाती है।

  4. यह आज के युग में आपके घर को हर प्रकार की ‘वैचारिक नकारात्मकता’ से सुरक्षित रखता है, जिससे परिवार में अपार शांति, स्वास्थ्य, और सुसंस्कारों का वास होता है।

Shri Guru Sahasranama (श्री गुरु सहस्त्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस परब्रह्म चेतना का साक्षात आवाहन है जो अंधों को दृष्टि, गूंगों को स्वर, और भटके हुए राही को मंजिल प्रदान करती है। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, सात्विकता और अहंकार रहित होकर इन पवित्र नामों का गान करता है, तो गुरु-तत्व उसके अंतःकरण को अपने परम प्रकाश से आलोकित कर देता है।

सद्गुरु अत्यंत कृपालु, ज्ञानदाता और अपने भक्तों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले साक्षात ईश्वर हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में सब कुछ धुंधला हो गया है, बहुत मेहनत के बाद भी सही रास्ता नहीं मिल रहा, शिक्षा या करियर में भटकाव है, और मन अशांत है, तो गुरुवार की सुबह पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक जलाएं, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘गुरुदेव’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि गुरु के इन पावन नामों ने आपके जीवन की सारी मानसिक बाधाओं, अज्ञानता और भयों को भस्म कर दिया है, और साक्षात ईश्वरीय कृपा ने आपके जीवन को अपार सफलता, असीम शांति, कुशाग्र बुद्धि और परम ज्ञान के दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ गुं गुरुभ्यो नमः!

श्री गुरु सहस्त्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री गुरु सहस्त्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री गुरु सहस्त्रनाम परब्रह्म स्वरूप सद्गुरु (गुरु-तत्व) के 1000 पावन व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इन नामों में गुरु की महिमा, उनका अनंत ज्ञान, और उनकी ब्रह्मांडीय शक्तियां समाहित हैं। इसका महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि यह स्तुति साधक के भीतर से अज्ञान को नष्ट करती है, सही मार्गदर्शन (Guidance) प्रदान करती है, और जीवन में शिक्षा, करियर व अध्यात्म में सर्वोच्च सफलता दिलाती है।

2. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस सहस्त्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘कुशाग्र बुद्धि की प्राप्ति’, ‘सही निर्णय लेने की क्षमता’ और ‘मानसिक तनाव से मुक्ति’ है। इसके नियमित पाठ से जन्म कुंडली के भयंकर गुरु चंडाल दोष और पितृ दोष शांत होते हैं, रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं, और व्यक्ति को समाज में अपार मान-सम्मान व स्थिर धन की प्राप्ति होती है।

3. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?

गुरु की आराधना के लिए ‘गुरुवार’ (Thursday – बृहस्पति का दिन) सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। गुरु पूर्णिमा, वसंत पंचमी और पूर्णिमा के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में स्नान के पश्चात, पीले वस्त्र धारण कर, पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।

4. यदि मेरा कोई देहधारी (मनुष्य) गुरु नहीं है, तो मैं किसका ध्यान करके यह पाठ करूँ?

यदि आपने अभी तक किसी को गुरु नहीं बनाया है, तो आपको निराश होने की आवश्यकता नहीं है। सनातन धर्म में ‘भगवान शिव’ (दक्षिणामूर्ति स्वरूप) और ‘भगवान दत्तात्रेय’ को आदिगुरु माना गया है। आप उनका ध्यान करके, या परब्रह्म परमात्मा को ही अपना गुरु मानकर इस सहस्त्रनाम का पाठ कर सकते हैं। समय आने पर प्रकृति आपको स्वयं एक योग्य गुरु तक पहुंचा देगी।

5. गुरु वंदना और इस साधना का सबसे बड़ा नियम क्या है?

गुरु साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘माता-पिता व शिक्षकों का सम्मान’ और ‘अहंकार का त्याग’ है। जो व्यक्ति अपनों से बड़ों का निरादर करता है या अपनी विद्या/धन पर घमंड करता है, उसे गुरु की कृपा कभी प्राप्त नहीं हो सकती। इसके अलावा, पूर्ण सात्विकता (मांस-मदिरा का त्याग), सत्य का आचरण, और निरंतरता इस साधना के मूलभूत नियम हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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