सनातन धर्म, वैष्णव वांग्मय और आगम शास्त्रों के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब बात अजेय शत्रुओं के संहार, अकारण मृत्यु के भय (Phobia) से मुक्ति, भयंकर कर्जों (Debts) के नाश, और परम वात्सल्य की आती है, तो भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह (Lord Lakshmi Narasimha) का स्मरण सर्वोपरि है।
भगवान नृसिंह का अवतार भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्य के संहार के लिए हुआ था। जब भगवान ने खंभे से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध किया, तब उनका क्रोध इतना प्रचंड था (उग्र नृसिंह) कि देवता भी उनके समीप जाने से कांप रहे थे। तब देवताओं की प्रार्थना पर भक्त प्रह्लाद ने उनकी स्तुति की और माता महालक्ष्मी उनके वाम अंग (बायीं जंघा) पर आकर विराजमान हो गईं। माता लक्ष्मी के स्पर्श मात्र से भगवान नृसिंह का प्रचंड क्रोध शांत हो गया और वे अत्यंत सौम्य, वात्सल्यमयी और कृपालु रूप में आ गए। इसी शांत और वरद स्वरूप को शास्त्रों में ‘श्री लक्ष्मी नृसिंह’ या ‘मालोल’ (माता लक्ष्मी के प्रिय) कहा जाता है।
मनुष्य का जीवन कई बार ऐसे अंधकारमय मोड़ पर आ खड़ा होता है, जहाँ हर तरफ से निराशा, प्राणघातक शत्रु, अकारण मुकदमों का जाल, भारी आर्थिक संकट, और नकारात्मक शक्तियों की छाया मंडराने लगती है। जब जीवन में हर तरफ भय व्याप्त हो जाए, तब भगवान लक्ष्मी नृसिंह की शरण में जाना साक्षात काल के मस्तक पर पैर रखकर निर्भय हो जाने के समान है। भगवान नृसिंह की अजेय रक्षक ऊर्जा और माता लक्ष्मी की ऐश्वर्यमयी करुणा को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों और पुराणों (जैसे नृसिंह पुराण) में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र, जाग्रत और अत्यंत शक्तिशाली नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम’ (Shri Lakshmi Narasimha Sahasranama) के नाम से जाना जाता है।
‘सहस्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नामों की वह पवित्र श्रृंखला जिसका उपयोग भगवान के अर्चन (पूजा) और नाम-जप के लिए किया जाता है। यह कोई साधारण स्तुति नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा अभेद्य अग्नि-कवच है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर संकटों, ग्रहों की पीड़ा और दरिद्रता को पल भर में भस्म कर देता है।
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम हिंदी | Shri Lakshmi Narsimha Sahasranaam
ॐ ह्रीं श्रीं ऐं क्ष्रौं
ॐ नारसिंहाय नमः
ॐ वज्रदंष्ट्राय नमः
ॐ वज्रिणे नमः
ॐ वज्रदेहाय नमः
ॐ वज्राय नमः
ॐ वज्रनखाय नमः
ॐ वासुदेवाय नमः
ॐ वन्द्याय नमः
ॐ वरदाय नमः
ॐ वरात्मने नमः
ॐ वरदाभयहस्ताय नमः
ॐ वराय नमः
ॐ वररूपिणे नमः
ॐ वरेण्याय नमः
ॐ वरिष्ठाय नमः
ॐ श्रीवराय नमः
ॐ प्रह्लादवरदाय नमः
ॐ प्रत्यक्षवरदाय नमः
ॐ परात्परपरेशाय नमः
ॐ पवित्राय नमः
ॐ पिनाकिने नमः
ॐ पावनाय नमः
ॐ प्रसन्नाय नमः
ॐ पाशिने नमः
ॐ पापहारिणे नमः
ॐ पुरुष्टुताय नमः
ॐ पुण्याय नमः
ॐ पुरुहूताय नमः
ॐ तत्पुरुषाय नमः
ॐ तथ्याय नमः
ॐ पुराणपुरुषाय नमः
ॐ पुरोधसे नमः
ॐ पूर्वजाय नमः
ॐ पुष्कराक्षाय नमः
ॐ पुष्पहासाय नमः
ॐ हासाय नमः
ॐ महाहासाय नमः
ॐ शार्ङ्गिणे नमः
ॐ सिंहाय नमः
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ सिंहराजाय नमः
ॐ जगद्वश्याय नमः
ॐ अट्टहासाय नमः
ॐ रोषाय नमः
ॐ जलवासाय नमः
ॐ भूतावासाय नमः
ॐ भासाय नमः
ॐ श्रीनिवासाय नमः
ॐ खड्गिने नमः
ॐ खड्ग जिह्वाय नमः
ॐ सिंहाय नमः
ॐ खड्गवासाय नमः
ॐ मूलाधिवासाय नमः
ॐ धर्मवासाय नमः
ॐ धन्विने नमः
ॐ धनञ्जयाय नमः
ॐ धन्याय नमः
ॐ मृत्युञ्जयाय नमः
ॐ शुभञ्जयाय नमः
ॐ सूत्राय नमः
ॐ शत्रुञ्जयाय नमः
ॐ निरञ्जनाय नमः
ॐ नीराय नमः
ॐ निर्गुणाय नमः
ॐ गुणाय नमः
ॐ निष्प्रपञ्चाय नमः
ॐ निर्वाणपदाय नमः
ॐ निबिडाय नमः
ॐ निरालम्बाय नमः
ॐ नीलाय नमः
ॐ निष्कळाय नमः
ॐ कळाय नमः
ॐ निमेषाय नमः
ॐ निबन्धाय नमः
ॐ निमेषगमनाय नमः
ॐ निर्द्वन्द्वाय नमः
ॐ निराशाय नमः
ॐ निश्चयाय नमः
ॐ निराय नमः
ॐ निर्मलाय नमः
ॐ निबन्धाय नमः
ॐ निर्मोहाय नमः
ॐ निराकृते नमः
ॐ नित्याय नमः
ॐ सत्याय नमः
ॐ सत्कर्मनिरताय नमः
ॐ सत्यध्वजाय नमः
ॐ मुञ्जाय नमः
ॐ मुञ्जकेशाय नमः
ॐ केशिने नमः
ॐ हरीशाय नमः
ॐ शेषाय नमः
ॐ गुडाकेशाय नमः
ॐ सुकेशाय नमः
ॐ ऊर्ध्वकेशाय नमः
ॐ केशिसंहारकाय नमः
ॐ जलेशाय नमः
ॐ स्थलेशाय नमः
ॐ पद्मेशाय नमः
ॐ उग्ररूपिणे नमः ॥ 100 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ कुशेशयाय नमः
ॐ कूलाय नमः
ॐ केशवाय नमः
ॐ सूक्तिकर्णाय नमः
ॐ सूक्ताय नमः
ॐ रक्तजिह्वाय नमः
ॐ रागिणे नमः
ॐ दीप्तरूपाय नमः
ॐ दीप्ताय नमः
ॐ प्रदीप्ताय नमः
ॐ प्रलोभिने नमः
ॐ प्रच्छिन्नाय नमः
ॐ प्रबोधाय नमः
ॐ प्रभवे नमः
ॐ विभवे नमः
ॐ प्रभञ्जनाय नमः
ॐ पान्थाय नमः
ॐ प्रमायाप्रमिताय नमः
ॐ प्रकाशाय नमः
ॐ प्रतापाय नमः
ॐ प्रज्वलाय नमः
ॐ उज्ज्वलाय नमः
ॐ ज्वालामालास्वरूपाय नमः
ॐ ज्वलज्जिह्वाय नमः
ॐ ज्वालिने नमः
ॐ महूज्ज्वालाय नमः
ॐ कालाय नमः
ॐ कालमूर्तिधराय नमः
ॐ कालान्तकाय नमः
ॐ कल्पाय नमः
ॐ कलनाय नमः
ॐ कृते नमः
ॐ कालचक्राय नमः
ॐ चक्राय नमः
ॐ वषट्चक्राय नमः
ॐ चक्रिणे नमः
ॐ अक्रूराय नमः
ॐ कृतान्ताय नमः
ॐ विक्रमाय नमः
ॐ क्रमाय नमः
ॐ कृत्तिने नमः
ॐ कृत्तिवासाय नमः
ॐ कृतघ्नाय नमः
ॐ कृतात्मने नमः
ॐ संक्रमाय नमः
ॐ क्रुद्धाय नमः
ॐ क्रांतलोकत्रयाय नमः
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ अरूपाय नमः
ॐ स्वरूपाय नमः
ॐ हरये नमः
ॐ परमात्मने नमः
ॐ अजयाय नमः
ॐ आदिदेवाय नमः
ॐ अक्षयाय नमः
ॐ क्षयाय नमः
ॐ अघोराय नमः
ॐ सुघोराय नमः
ॐ घोरघोरतराय नमः
ॐ अघोरवीर्याय नमः
ॐ लसद्घोराय नमः
ॐ घोराध्यक्षाय नमः
ॐ दक्षाय नमः
ॐ दक्षिणाय नमः
ॐ आर्याय नमः
ॐ शम्भवे नमः
ॐ अमोघाय नमः
ॐ गुणौघाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ अघहारिणे नमः
ॐ मेघनादाय नमः
ॐ नादाय नमः
ॐ मेघात्मने नमः
ॐ मेघवाहनरूपाय नमः
ॐ मेघश्यामाय नमः
ॐ मालिने नमः
ॐ व्यालयज्ञोपवीताय नमः
ॐ व्याघ्रदेहाय नमः
ॐ व्याघ्रपादाय नमः
ॐ व्याघ्रकर्मिणे नमः
ॐ व्यापकाय नमः
ॐ विकटास्याय नमः
ॐ वीराय नमः
ॐ विष्टरश्रवसे नमः
ॐ विकीर्णनखदंष्ट्राय नमः
ॐ नखदंष्ट्रायुधाय नमः
ॐ विष्वक्सेनाय नमः
ॐ सेनाय नमः
ॐ विह्वलाय नमः
ॐ बलाय नमः
ॐ विरूपाक्षाय नमः
ॐ वीराय नमः
ॐ विशेषाक्षाय नमः
ॐ साक्षिणे नमः
ॐ वीतशोकाय नमः
ॐ विस्तीर्णवदनाय नमः
ॐ विधेयाय नमः
ॐ विजयाय नमः
ॐ जयाय नमः
ॐ विबुधाय नमः
ॐ विभावाय नमः ॥ 200 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ विश्वम्भराय नमः
ॐ वीतरागाय नमः
ॐ विप्राय नमः
ॐ विटङ्कनयनाय नमः
ॐ विपुलाय नमः
ॐ विनीताय नमः
ॐ विश्वयोनये नमः
ॐ चिदम्बराय नमः
ॐ वित्ताय नमः
ॐ विश्रुताय नमः
ॐ वियोनये नमः
ॐ विह्वलाय नमः
ॐ विकल्पाय नमः
ॐ कल्पातीताय नमः
ॐ शिल्पिने नमः
ॐ कल्पनाय नमः
ॐ स्वरूपाय नमः
ॐ फणितल्पाय नमः
ॐ तटित्प्रभाय नमः
ॐ तार्याय नमः
ॐ तरुणाय नमः
ॐ तरस्विने नमः
ॐ तपनाय नमः
ॐ तरक्षाय नमः
ॐ तापत्रयहराय नमः
ॐ तारकाय नमः
ॐ तमोघ्नाय नमः
ॐ तत्वाय नमः
ॐ तपस्विने नमः
ॐ तक्षकाय नमः
ॐ तनुत्राय नमः
ॐ तटिने नमः
ॐ तरलाय नमः
ॐ शतरूपाय नमः
ॐ शान्ताय नमः
ॐ शतधाराय नमः
ॐ शतपत्राय नमः
ॐ तार्क्ष्याय नमः
ॐ स्थिताय नमः
ॐ शतमूर्तये नमः
ॐ शतक्रतुस्वरूपाय नमः
ॐ शाश्वताय नमः
ॐ शतात्मने नमः
ॐ सहस्रशिरसे नमः
ॐ सहस्रवदनाय नमः
ॐ सहस्राक्षाय नमः
ॐ देवाय नमः
ॐ दिशश्रोत्राय नमः
ॐ सहस्रजिह्वाय नमः
ॐ महाजिह्वाय नमः
ॐ सहस्रनामधेयाय नमः
ॐ सहस्राक्षधराय नमः
ॐ सहस्रबाहवे नमः
ॐ सहस्रचरणाय नमः
ॐ सहस्रार्कप्रकाशाय नमः
ॐ सहस्रायुधधारिणे नमः
ॐ स्थूलाय नमः
ॐ सूक्ष्माय नमः
ॐ सुसूक्ष्माय नमः
ॐ सुक्षुण्णाय नमः
ॐ सुभिक्षाय नमः
ॐ सुराध्यक्षाय नमः
ॐ शौरिणे नमः
ॐ धर्माध्यक्षाय नमः
ॐ धर्माय नमः
ॐ लोकाध्यक्षाय नमः
ॐ शिक्षाय नमः
ॐ विपक्षक्षयमूर्तये नमः
ॐ कालाध्यक्षाय नमः
ॐ तीक्ष्णाय नमः
ॐ मूलाध्यक्षाय नमः
ॐ अधोक्षजाय नमः
ॐ मित्राय नमः
ॐ सुमित्रवरुणाय नमः
ॐ शत्रुघ्नाय नमः
ॐ अविघ्नाय नमः
ॐ विघ्नकोटिहराय नमः
ॐ रक्षोघ्नाय नमः
ॐ तमोघ्नाय नमः
ॐ भूतघ्नाय नमः
ॐ भूतपालाय नमः
ॐ भूताय नमः
ॐ भूतावासाय नमः
ॐ भूतिने नमः
ॐ भूतभेताळघाताय नमः
ॐ भूताधिपतये नमः
ॐ भूतग्रहविनाशाय नमः
ॐ भूसंयमते नमः
ॐ महाभूताय नमः
ॐ भृगवे नमः
ॐ सर्वभूतात्मने नमः
ॐ सर्वारिष्टविनाशाय नमः
ॐ सर्वसम्पत्कराय नमः
ॐ सर्वाधाराय नमः
ॐ शर्वाय नमः
ॐ सर्वार्तिहरये नमः
ॐ सर्वदुःखप्रशान्ताय नमः
ॐ सर्वसौभाग्यदायिने नमः
ॐ सर्वज्ञाय नमः
ॐ अनन्ताय नमः ॥ 300 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ सर्वशक्तिधराय नमः
ॐ सर्वैश्वर्यप्रदात्रे नमः
ॐ सर्वकार्यविधायिने नमः
ॐ सर्वज्वरविनाशाय नमः
ॐ सर्वरोगापहारिणे नमः
ॐ सर्वाभिचारहन्त्रे नमः
ॐ सर्वैश्वर्यविधायिने नमः
ॐ पिङ्गाक्षाय नमः
ॐ एकशृङ्गाय नमः
ॐ द्विशृङ्गाय नमः
ॐ मरीचये नमः
ॐ बहुशृङ्गाय नमः
ॐ लिङ्गाय नमः
ॐ महाशृङ्गाय नमः
ॐ माङ्गल्याय नमः
ॐ मनोज्ञाय नमः
ॐ मन्तव्याय नमः
ॐ महात्मने नमः
ॐ महादेवाय नमः
ॐ देवाय नमः
ॐ मातुलिङ्गधराय नमः
ॐ महामायाप्रसूताय नमः
ॐ प्रस्तुताय नमः
ॐ मायिने नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ अनन्तरूपाय नमः
ॐ मायिने नमः
ॐ जलशायिने नमः
ॐ महोदराय नमः
ॐ मन्दाय नमः
ॐ मददाय नमः
ॐ मदाय नमः
ॐ मधुकैटभहन्त्रे नमः
ॐ माधवाय नमः
ॐ मुरारये नमः
ॐ महावीर्याय नमः
ॐ धैर्याय नमः
ॐ चित्रवीर्याय नमः
ॐ चित्रकूर्माय नमः
ॐ चित्राय नमः
ॐ चित्रभावने नमः
ॐ मायातीताय नमः
ॐ मायाय नमः
ॐ महावीराय नमः
ॐ महातेजाय नमः
ॐ बीजाय नमः
ॐ तेजोधाम्ने नमः
ॐ बीजिने नमः
ॐ तेजोमयनृसिंहाय नमः
ॐ चित्रभानवे नमः
ॐ महादंष्ट्राय नमः
ॐ तुष्टाय नमः
ॐ पुष्टिकराय नमः
ॐ शिपिविष्टाय नमः
ॐ हृष्टाय नमः
ॐ पुष्टाय नमः
ॐ परमेष्ठिने नमः
ॐ विशिष्टाय नमः
ॐ शिष्टाय नमः
ॐ गरिष्ठाय नमः
ॐ इष्टदायिने नमः
ॐ ज्येष्ठाय नमः
ॐ श्रेष्ठाय नमः
ॐ तुष्टाय नमः
ॐ अमिततेजसे नमः
ॐ अष्टाङ्गव्यस्तरूपाय नमः
ॐ सर्वदुष्टान्तकाय नमः
ॐ वैकुण्ठाय नमः
ॐ विकुण्ठाय नमः
ॐ केशिकण्ठाय नमः
ॐ कण्ठीरवाय नमः
ॐ लुण्ठाय नमः
ॐ निश्शठाय नमः
ॐ हठाय नमः
ॐ सत्वोद्रिक्ताय नमः
ॐ रुद्राय नमः
ॐ ऋग्यजुस्सामगाय नमः
ॐ ऋतुध्वजाय नमः
ॐ वज्राय नमः
ॐ मन्त्रराजाय नमः
ॐ मन्त्रिणे नमः
ॐ त्रिनेत्राय नमः
ॐ त्रिवर्गाय नमः
ॐ त्रिधाम्ने नमः
ॐ त्रिशूलिने नमः
ॐ त्रिकालज्ञानरूपाय नमः
ॐ त्रिदेहाय नमः
ॐ त्रिधात्मने नमः
ॐ त्रिमूर्तिविद्याय नमः
ॐ त्रितत्वज्ञानिने नमः
ॐ अक्षोभ्याय नमः
ॐ अनिरुद्धाय नमः
ॐ अप्रमेयाय नमः
ॐ भानवे नमः
ॐ अमृताय नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ अमिताय नमः
ॐ आमितौजसे नमः
ॐ अपमृत्युविनाशाय नमः
ॐ अपस्मारविघातिने नमः ॥ 400 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ अन्नदाय नमः
ॐ अन्नरूपाय नमः
ॐ अन्नाय नमः
ॐ अन्नभुजे नमः
ॐ नाद्याय नमः
ॐ निरवद्याय नमः
ॐ विद्याय नमः
ॐ अद्भुतकर्मणे नमः
ॐ सद्योजाताय नमः
ॐ सङ्घाय नमः
ॐ वैद्युताय नमः
ॐ अध्वातीताय नमः
ॐ सत्वाय नमः
ॐ वागतीताय नमः
ॐ वाग्मिने नमः
ॐ वागीश्वराय नमः
ॐ गोपाय नमः
ॐ गोहिताय नमः
ॐ गवांपतये नमः
ॐ गन्धर्वाय नमः
ॐ गभीराय नमः
ॐ गर्जिताय नमः
ॐ ऊर्जिताय नमः
ॐ पर्जन्याय नमः
ॐ प्रबुद्धाय नमः
ॐ प्रधानपुरुषाय नमः
ॐ पद्माभाय नमः
ॐ सुनाभाय नमः
ॐ पद्मनाभाय नमः
ॐ पद्मनाभाय नमः
ॐ मानिने नमः
ॐ पद्मनेत्राय नमः
ॐ पद्माय नमः
ॐ पद्मायाः पतये नमः
ॐ पद्मोदराय नमः
ॐ पूताय नमः
ॐ पद्मकल्पोद्भवाय नमः
ॐ हृत्पद्मवासाय नमः
ॐ भूपद्मोद्धरणाय नमः
ॐ शब्दब्रह्मस्वरूपाय नमः
ॐ ब्रह्मरूपधराय नमः
ॐ ब्रह्मणे नमः
ॐ ब्रह्मरूपाय नमः
ॐ पद्मनेत्राय नमः
ॐ ब्रह्मादये नमः
ॐ ब्राह्मणाय नमः
ॐ ब्रह्मणे नमः
ॐ ब्रह्मात्मने नमः
ॐ सुब्रह्मण्याय नमः
ॐ देवाय नमः
ॐ ब्रह्मण्याय नमः
ॐ त्रिवेदिने नमः
ॐ परब्रह्मस्वरूपाय नमः
ॐ पञ्चब्रह्मात्मने नमः
ॐ ब्रह्मशिरसे नमः
ॐ अश्वशिरसे नमः
ॐ अधर्वशिरसे नमः
ॐ नित्यमशनिप्रमिताय नमः
ॐ तीक्षण दंष्ट्राय नमः
ॐ लोलाय नमः
ॐ ललिताय नमः
ॐ लावण्याय नमः
ॐ लवित्राय नमः
ॐ भासकाय नमः
ॐ लक्षणज्ञाय नमः
ॐ लसद्दीप्ताय नमः
ॐ लिप्ताय नमः
ॐ विष्णवे नमः
ॐ प्रभविष्णवे नमः
ॐ वृष्णिमूलाय नमः
ॐ कृष्णाय नमः
ॐ श्रीमहाविष्णवे नमः
ॐ महासिंहाय नमः
ॐ हारिणे नमः
ॐ वनमालिने नमः
ॐ किरीटिने नमः
ॐ कुण्डलिने नमः
ॐ सर्वाङ्गाय नमः
ॐ सर्वतोमुखाय नमः
ॐ सर्वतः पाणिपादोरसे नमः
ॐ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखाय नमः
ॐ सर्वेश्वराय नमः
ॐ सदातुष्टाय नमः
ॐ समर्थाय नमः
ॐ समरप्रियाय नमः
ॐ बहुयोजनविस्तीर्णाय नमः
ॐ बहुयोजनमायताय नमः
ॐ बहुयोजनहस्ताङ्घ्रये नमः
ॐ बहुयोजननासिकाय नमः
ॐ महारूपाय नमः
ॐ महावक्राय नमः
ॐ महादंष्ट्राय नमः
ॐ महाबलाय नमः
ॐ महाभुजाय नमः
ॐ महानादाय नमः
ॐ महारौद्राय नमः
ॐ महाकायाय नमः
ॐ अनाभेर्ब्रह्मणोरूपाय नमः
ॐ आगलाद्वैष्णवाय नमः
ॐ आशीर्षाद्रन्ध्रमीशानाय नमः ॥ 500 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ अग्रेसर्वतश्शिवाय नमः
ॐ नारायणनारासिंहाय नमः
ॐ नारायणवीरसिंहाय नमः
ॐ नारायणक्रूरसिंहाय नमः
ॐ नारायणदिव्यसिंहाय नमः
ॐ नारायणव्याघ्रसिंहाय नमः
ॐ नारायणपुच्छसिंहाय नमः
ॐ नारायणपूर्णसिंहाय नमः
ॐ नारायणरौद्रसिंहाय नमः
ॐ भीषणभद्रसिंहाय नमः
ॐ विह्वलनेत्रसिंहाय नमः
ॐ बृंहितभूतसिंहाय नमः
ॐ निर्मलचित्रसिंहाय नमः
ॐ निर्जितकालसिंहाय नमः
ॐ कल्पितकल्पसिंहाय नमः
ॐ कामदकामसिंहाय नमः
ॐ भुवनैकसिंहाय नमः
ॐ विष्णवे नमः
ॐ भविष्णवे नमः
ॐ सहिष्णवे नमः
ॐ भ्राजिष्णवे नमः
ॐ जिष्णवे नमः
ॐ पृथिव्यै नमः
ॐ अन्तरिक्षाय नमः
ॐ पर्वताय नमः
ॐ अरण्याय नमः
ॐ कलाकाष्ठाविलिप्ताय नमः
ॐ मुहूर्तप्रहरादिकाय नमः
ॐ अहोरात्राय नमः
ॐ त्रिसन्ध्याय नमः
ॐ पक्षाय नमः
ॐ मासाय नमः
ॐ ऋतवे नमः
ॐ वत्सराय नमः
ॐ युगादयेनमः
ॐ युगभेदाय नमः
ॐ संयुगाय नमः
ॐ युगसन्धये नमः
ॐ नित्याय नमः
ॐ नैमित्तिकाय नमः
ॐ दैनाय नमः
ॐ महाप्रलयाय नमः
ॐ करणाय नमः
ॐ कारणाय नमः
ॐ कर्त्रे नमः
ॐ भर्त्रे नमः
ॐ हर्त्रे नमः
ॐ ईश्वराय नमः
ॐ सत्कर्त्रे नमः
ॐ सत्कृतये नमः
ॐ गोप्त्रे नमः
ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः
ॐ प्राणाय नमः
ॐ प्राणिनांप्रत्यगात्मने नमः
ॐ सुज्योतिषे नमः
ॐ परंज्योतिषे नमः
ॐ आत्मज्योतिषे नमः
ॐ सनातनाय नमः
ॐ ज्योतिषे नमः
ॐ ज्ञेयाय नमः
ॐ ज्योतिषांपतये नमः
ॐ स्वाहाकाराय नमः
ॐ स्वधाकाराय नमः
ॐ वषट्काराय नमः
ॐ कृपाकराय नमः
ॐ हन्तकाराय नमः
ॐ निराकाराय नमः
ॐ वेगाकाराय नमः
ॐ शङ्कराय नमः
ॐ आकारादिहकारान्ताय नमः
ॐ ओंकाराय नमः
ॐ लोककारकाय नमः
ॐ एकात्मने नमः
ॐ अनेकात्मने नमः
ॐ चतुरात्मने नमः
ॐ चतुर्भुजाय नमः
ॐ चतुर्मूर्तये नमः
ॐ चतुर्दंष्ट्राय नमः
ॐ तचुर्वदेमयाय नमः
ॐ उत्तमाय नमः
ॐ लोकप्रियाय नमः
ॐ लोकगुरवे नमः
ॐ लोकेशाय नमः
ॐ लोकनायकाय नमः
ॐ लोकसाक्षिणे नमः
ॐ लोकपतये नमः
ॐ लोकात्मने नमः
ॐ लोकलोचनाय नमः
ॐ लोकाधाराय नमः
ॐ बृहल्लोकाय नमः
ॐ लोकालोकामयाय नमः
ॐ विभवे नमः
ॐ लोककर्त्रे नमः
ॐ विश्वकर्त्रे नमः
ॐ कृतावर्ताय नमः
ॐ कृतागमाय नमः
ॐ अनादये नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ अभूताय नमः
ॐ भूतविग्रहाय नमः ॥ 600 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ स्तुतये नमः
ॐ स्तुत्याय नमः
ॐ स्तवप्रीताय नमः
ॐ स्तोत्रे नमः
ॐ नेत्रे नमः
ॐ नियामकाय नमः
ॐ गतये नमः
ॐ मतये नमः
ॐ पित्रे नमः
ॐ मात्रे नमः
ॐ गुरुवे नमः
ॐ सख्ये नमः
ॐ सुहृदश्चात्मरूपाय नमः
ॐ मन्त्ररूपाय नमः
ॐ अस्त्ररूपाय नमः
ॐ बहुरूपाय नमः
ॐ रूपाय नमः
ॐ पञ्चरूपधराय नमः
ॐ भद्ररूपाय नमः
ॐ रूढाय नमः
ॐ योगरूपाय नमः
ॐ योगिने नमः
ॐ समरूपाय नमः
ॐ योगाय नमः
ॐ योगपीठस्थिताय नमः
ॐ योगगम्याय नमः
ॐ सौम्याय नमः
ॐ ध्यानगम्याय नमः
ॐ ध्यायिने नमः
ॐ ध्येयगम्याय नमः
ॐ धाम्ने नमः
ॐ धामाधिपतये नमः
ॐ धराधराय नमः
ॐ धर्माय नमः
ॐ धारणाभिरताय नमः
ॐ धात्रे नमः
ॐ सन्धात्रे नमः
ॐ विधात्रे नमः
ॐ धराय नमः
ॐ दामोदराय नमः
ॐ दान्ताय नमः
ॐ दानवांतकराय नमः
ॐ संसारवैद्याय नमः
ॐ भेषजाय नमः
ॐ सीरध्वजाय नमः
ॐ शीताय नमः
ॐ वाताय नमः
ॐ प्रमिताय नमः
ॐ सारस्वताय नमः
ॐ संसारनाशनाय नमः
ॐ अक्षमालिने नमः
ॐ असिधर्मधराय नमः
ॐ षट्कर्मनिरताय नमः
ॐ विकर्माय नमः
ॐ सुकर्माय नमः
ॐ परकर्मविधायिने नमः
ॐ सुशर्मणे नमः
ॐ मन्मथाय नमः
ॐ वर्माय नमः
ॐ वर्मिणे नमः
ॐ करिचर्मवसनाय नमः
ॐ करालवदनाय नमः
ॐ कवये नमः
ॐ पद्मगर्भाय नमः
ॐ भूतगर्भाय नमः
ॐ घृणानिधये नमः
ॐ ब्रह्मगर्भाय नमः
ॐ गर्भाय नमः
ॐ बृहद्गर्भाय नमः
ॐ धूर्जटाय नमः
ॐ विश्वगर्भाय नमः
ॐ श्रीगर्भाय नमः
ॐ जितारये नमः
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ हिरण्यकवचाय नमः
ॐ हिरण्यवर्णदेहाय नमः
ॐ हिरण्याक्षविनाशिने नमः
ॐ हिरण्यकशिपोर्हन्त्रे नमः
ॐ हिरण्यनयनाय नमः
ॐ हिरण्यरेतसे नमः
ॐ हिरण्यवदनाय नमः
ॐ हिरण्यशृङ्गाय नमः
ॐ निश्शृङ्गाय नमः
ॐ शृङ्गिणे नमः
ॐ भैरवाय नमः
ॐ सुकेशाय नमः
ॐ भीषणाय नमः
ॐ आन्त्रमालिने नमः
ॐ चण्डाय नमः
ॐ रुण्डमालाय नमः
ॐ दण्डधराय नमः
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ अखण्डतत्वरूपाय नमः
ॐ कमण्डलुधराय नमः
ॐ खण्डसिंहाय नमः
ॐ सत्यसिंहाय नमः
ॐ श्वेतसिंहाय नमः
ॐ पीतसिंहाय नमः
ॐ नीलसिंहाय नमः
ॐ नीलाय नमः
ॐ रक्तसिंहाय नमः ॥ 700 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ हारिद्रसिंहाय नमः
ॐ धूम्रसिंहाय नमः
ॐ मूलसिंहाय नमः
ॐ मूलाय नमः
ॐ बृहत्सिंहाय नमः
ॐ पातालस्थितसिंहाय नमः
ॐ पर्वतवासिने नमः
ॐ जलस्थितसिंहाय नमः
ॐ अन्तरिक्षस्थिताय नमः
ॐ कालाग्निरुद्रसिंहाय नमः
ॐ चण्डसिंहाय नमः
ॐ अनन्तसिंहाय नमः
ॐ अनन्तगतये नमः
ॐ विचित्रसिंहाय नमः
ॐ बहुसिंहस्वरूपिणे नमः
ॐ अभयङ्करसिंहाय नमः
ॐ नरसिंहाय नमः
ॐ सिंहराजाय नमः
ॐ नरसिंहाय नमः
ॐ सप्ताब्धिमेखलाय नमः
ॐ सत्याय नमः
ॐ सत्यरूपिणे नमः
ॐ सप्तलोकान्तरस्थाय नमः
ॐ सप्तस्वरमयाय नमः
ॐ सप्तार्चिरूपदन्ष्ट्राय नमः
ॐ सप्ताश्वरथरूपिणे नमः
ॐ सप्तवायुस्वरूपाय नमः
ॐ सप्तच्छन्दोमयाय नमः
ॐ स्वच्छाय नमः
ॐ स्वच्छरूपाय नमः
ॐ स्वच्छन्दाय नमः
ॐ श्रीवत्साय नमः
ॐ सुवेधाय नमः
ॐ श्रुतये नमः
ॐ श्रुतिमूर्तये नमः
ॐ शुचिश्रवाय नमः
ॐ शूराय नमः
ॐ सुप्रभाय नमः
ॐ सुधन्विने नमः
ॐ शुभ्राय नमः
ॐ सुरनाथाय नमः
ॐ सुप्रभाय नमः
ॐ शुभाय नमः
ॐ सुदर्शनाय नमः
ॐ सूक्ष्माय नमः
ॐ निरुक्ताय नमः
ॐ सुप्रभाय नमः
ॐ स्वभावाय नमः
ॐ भवाय नमः
ॐ विभवाय नमः
ॐ सुशाखाय नमः
ॐ विशाखाय नमः
ॐ सुमुखाय नमः
ॐ मुखाय नमः
ॐ सुनखाय नमः
ॐ सुदंष्ट्राय नमः
ॐ सुरथाय नमः
ॐ सुधाय नमः
ॐ सांख्याय नमः
ॐ सुरमुख्याय नमः
ॐ प्रख्याताय नमः
ॐ प्रभाय नमः
ॐ खट्वांगहस्ताय नमः
ॐ खेटमुद्गरपाणये नमः
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ खगेन्द्राय नमः
ॐ मृगेंद्राय नमः
ॐ नागेंद्राय नमः
ॐ दृढाय नमः
ॐ नागकेयूरहाराय नमः
ॐ नागेन्द्राय नमः
ॐ अघमर्दिने नमः
ॐ नदीवासाय नमः
ॐ नग्नाय नमः
ॐ नानारूपधराय नमः
ॐ नागेश्वराय नमः
ॐ नागाय नमः
ॐ नमिताय नमः
ॐ नराय नमः
ॐ नागान्तकरथाय नमः
ॐ नरनारायणाय नमः
ॐ मत्स्यस्वरूपाय नमः
ॐ कच्छपाय नमः
ॐ यज्ञवराहाय नमः
ॐ नारसिंहाय नमः
ॐ विक्रमाक्रान्तलोकाय नमः
ॐ वामनाय नमः
ॐ महौजसे नमः
ॐ भार्गवरामाय नमः
ॐ रावणान्तकराय नमः
ॐ बलरामाय नमः
ॐ कंसप्रध्वंसकारिणे नमः
ॐ बुद्धाय नमः
ॐ बुद्धरूपाय नमः
ॐ तीक्षणरूपाय नमः
ॐ कल्किने नमः
ॐ आत्रेयाय नमः
ॐ अग्निनेत्राय नमः
ॐ कपिलाय नमः
ॐ द्विजाय नमः
ॐ क्षेत्राय नमः ॥ 800 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ पशुपालाय नमः
ॐ पशुवक्त्राय नमः
ॐ गृहस्थाय नमः
ॐ वनस्थाय नमः
ॐ यतये नमः
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः
ॐ स्वर्गापवर्गदात्रे नमः
ॐ भोक्त्रे नमः
ॐ मुमुक्षवे नमः
ॐ सालग्रामनिवासाय नमः
ॐ क्षीराब्धिशयनाय नमः
ॐ श्रीशैलाद्रिनिवासाय नमः
ॐ शिलावासाय नमः
ॐ योगिहृत्पद्मवासाय नमः
ॐ महाहासाय नमः
ॐ गुहावासाय नमः
ॐ गुह्याय नमः
ॐ गुप्ताय नमः
ॐ गुरवे नमः
ॐ मूलाधिवासाय नमः
ॐ नीलवस्त्रधराय नमः
ॐ पीतवस्त्राय नमः
ॐ शस्त्राय नमः
ॐ रक्तवस्त्रधराय नमः
ॐ रक्तमालाविभूषाय नमः
ॐ रक्तगन्धानुलेपनाय नमः
ॐ धुरन्धराय नमः
ॐ धूर्ताय नमः
ॐ दुर्धराय नमः
ॐ धराय नमः
ॐ दुर्मदाय नमः
ॐ दुरन्ताय नमः
ॐ दुर्धराय नमः
ॐ दुर्निरीक्ष्याय नमः
ॐ निष्ठायै नमः
ॐ दुर्दर्शाय नमः
ॐ द्रुमाय नमः
ॐ दुर्भेदाय नमः
ॐ दुराशाय नमः
ॐ दुर्लभाय नमः
ॐ दृप्ताय नमः
ॐ दृप्तवक्त्राय नमः
ॐ अदृप्तनयनाय नमः
ॐ उन्मत्ताय नमः
ॐ प्रमत्ताय नमः
ॐ दैत्यारये नमः
ॐ रसज्ञाय नमः
ॐ रसेशाय नमः
ॐ अरक्तरसनाय नमः
ॐ पथ्याय नमः
ॐ परितोषाय नमः
ॐ रथ्याय नमः
ॐ रसिकाय नमः
ॐ ऊर्ध्वकेशाय नमः
ॐ ऊर्ध्वरूपाय नमः
ॐ ऊर्ध्वरेतसे नमः
ॐ ऊर्ध्वसिंहाय नमः
ॐ सिंहाय नमः
ॐ ऊर्ध्वबाहवे नमः
ॐ परप्रध्वंसकाय नमः
ॐ शङ्खचक्रधराय नमः
ॐ गदापद्मधराय नमः
ॐ पञ्चबाणधराय नमः
ॐ कामेश्वराय नमः
ॐ कामाय नमः
ॐ कामपालाय नमः
ॐ कामिने नमः
ॐ कामविहारायनमः
ॐ कामरूपधराय नमः
ॐ सोमसूर्याग्निनेत्राय नमः
ॐ सोमपाय नमः
ॐ सोमाय नमः
ॐ वामाय नमः
ॐ वामदेवाय नमः
ॐ सामस्वनाय नमः
ॐ सौम्याय नमः
ॐ भक्तिगम्याय नमः
ॐ कूष्मांडगणनाथाय नमः
ॐ सर्वश्रेयस्कराय नमः
ॐ भीष्माय नमः
ॐ भीषदाय नमः
ॐ भीमविक्रमणाय नमः
ॐ मृगग्रीवाय नमः
ॐ जीवाय नमः
ॐ जिताय नमः
ॐ जितकारिणे नमः
ॐ जटिने नमः
ॐ जामदग्न्याय नमः
ॐ जातवेदसे नमः
ॐ जपाकुसुमवर्णाय नमः
ॐ जप्याय नमः
ॐ जपिताय नमः
ॐ जरायुजाय नमः
ॐ अण्डजाय नमः
ॐ स्वेदजाय नमः
ॐ उद्भिजाय नमः
ॐ जनार्दनाय नमः
ॐ रामाय नमः
ॐ जाह्नवीजनकाय नमः
ॐ जराजन्मादिदूराय नमः ॥ 900 ॥
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम
ॐ पद्युम्नाय नमः
ॐ प्रमादिने नमः
ॐ जिह्वाय नमः
ॐ रौद्राय नमः
ॐ रुद्राय नमः
ॐ वीरभद्राय नमः
ॐ चिद्रूपाय नमः
ॐ समुद्राय नमः
ॐ कद्रुद्राय नमः
ॐ प्रचेतसे नमः
ॐ इन्द्रियाय नमः
ॐ इन्द्रियज्ञाय नमः
ॐ इन्द्रानुजाय नमः
ॐ अतीन्द्रियाय नमः
ॐ साराय नमः
ॐ इन्दिरापतये नमः
ॐ ईशानाय नमः
ॐ ईड्याय नमः
ॐ ईशित्रे नमः
ॐ इनाय नमः
ॐ व्योमात्मने नमः
ॐ व्योम्ने नमः
ॐ श्योमकेशिने नमः
ॐ व्योमाधाराय नमः
ॐ व्योमवक्त्राय नमः
ॐ सुरघातिने नमः
ॐ व्योमदंष्ट्राय नमः
ॐ व्योमवासाय नमः
ॐ सुकुमाराय नमः
ॐ रामाय नमः
ॐ शुभाचाराय नमः
ॐ विश्वाय नमः
ॐ विश्वरूपाय नमः
ॐ विश्वात्मकाय नमः
ॐ ज्ञानात्मकाय नमः
ॐ ज्ञानाय नमः
ॐ विश्वेशाय नमः
ॐ परात्मने नमः
ॐ एकात्मने नमः
ॐ द्वादशात्मने नमः
ॐ चतुर्विंशतिरूपाय नमः
ॐ पञ्चविंशतिमूर्तये नमः
ॐ षड्विंशकात्मने नमः
ॐ नित्याय नमः
ॐ सप्तविंशतिकात्मने नमः
ॐ धर्मार्थकाममोक्षाय नमः
ॐ विरक्ताय नमः
ॐ भावशुद्धाय नमः
ॐ सिद्धाय नमः
ॐ साध्याय नमः
ॐ शरभाय नमः
ॐ प्रबोधाय नमः
ॐ सुबोधाय नमः
ॐ बुद्धिप्रियाय नमः
ॐ स्निग्धाय नमः
ॐ विदग्धाय नमः
ॐ मुग्धाय नमः
ॐ मुनये नमः
ॐ प्रियंवदाय नमः
ॐ श्रव्याय नमः
ॐ स्रुक्स्रुवाय नमः
ॐ श्रिताय नमः
ॐ गृहेशाय नमः
ॐ महेशाय नमः
ॐ ब्रह्मेशाय नमः
ॐ श्रीधराय नमः
ॐ सुतीर्थाय नमः
ॐ हयग्रीवाय नमः
ॐ उग्राय नमः
ॐ उग्रवेगाय नमः
ॐ उग्रकर्मरताय नमः
ॐ उग्रनेत्राय नमः
ॐ व्यग्राय नमः
ॐ समग्रगुणशालिने नमः
ॐ बालग्रहविनाशाय नमः
ॐ पिशाचग्रहघातिने नमः
ॐ दुष्टग्रहनिहन्त्रे नमः
ॐ निग्रहानुग्रहाय नमः
ॐ वृषध्वजाय नमः
ॐ वृष्ण्याय नमः
ॐ वृषाय नमः
ॐ वृषभाय नमः
ॐ उग्रश्रवाय नमः
ॐ शान्ताय नमः
ॐ श्रुतिधराय नमः
ॐ देवदेवेशाय नमः
ॐ मधुसूदनाय नमः
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः
ॐ दुरितक्षयाय नमः
ॐ करुणासिन्धवे नमः
ॐ अमितञ्जयाय नमः
ॐ नरसिंहाय नमः
ॐ गरुडध्वजाय नमः
ॐ यज्ञनेत्राय नमः
ॐ कालध्वजाय नमः
ॐ जयध्वजाय नमः
ॐ अग्निनेत्राय नमः
ॐ अमरप्रियाय नमः
ॐ महानेत्राय नमः
ॐ भक्तवत्सलाय नमः
ॐ धर्मनेत्राय नमः
ॐ करुणाकराय नमः
ॐ पुण्यनेत्राय नमः
ॐ अभीष्टदायकाय नमः
ॐ जयसिंहरूपाय नमः
ॐ नरसिंहरूपाय नमः
ॐ रणसिंहरूपाय नमः
॥ इति श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम सम्पूर्ण ॥
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
1. श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान सहस्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैष्णव अद्वैत दर्शन और ‘नृसिंह-तत्व’ को समझने के लिए हमें हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद के प्रतीकवाद, लक्ष्मी-नृसिंह के सामंजस्य, और सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।
हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद का मनोवैज्ञानिक रहस्य
‘हिरण्य’ का अर्थ है सोना (धन/Gold) और ‘कशिपु’ का अर्थ है कोमल बिस्तर (सुख-सुविधा)। हिरण्यकशिपु मनुष्य के भीतर बैठे उस ‘अहंकार’ (Ego) और ‘भौतिक लालच’ का प्रतीक है, जो ईश्वर की सत्ता को नकारता है। वहीं ‘प्रह्लाद’ का अर्थ है ‘परम आनंद’ या ‘विशुद्ध भक्ति’। जब मनुष्य के भीतर भौतिक अहंकार (हिरण्यकशिपु) उसकी शुद्ध भक्ति (प्रह्लाद) को मारने का प्रयास करता है, तब हृदय रूपी खंभे को चीरकर ज्ञान और वैराग्य के रूप में भगवान नृसिंह प्रकट होते हैं। सहस्रनाम का पाठ हमारे भीतर के अहंकार को चीरकर शुद्ध भक्ति की स्थापना करता है।
श्री लक्ष्मी और नृसिंह का अद्वैत (Balance of Power and Grace)
भगवान नृसिंह प्रचंड ‘शक्ति’ (Power and Justice) के प्रतीक हैं, और माता लक्ष्मी अहैतुकी ‘कृपा’ (Grace and Wealth) की प्रतीक हैं। यदि केवल नृसिंह की पूजा की जाए, तो वह ऊर्जा अत्यंत उग्र हो सकती है। परंतु लक्ष्मी नृसिंह की युगल उपासना से जीवन में शक्ति और शांति का गजब का संतुलन आता है। यह पाठ जीवन के शत्रुओं का संहार भी करता है और घर में अपार धन-संपदा का वास भी कराता है।
‘सहस्रनाम’ का नाद-विज्ञान (Sound Vibrations)
सनातन परंपरा में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र (सहस्रार चक्र) का प्रतीक माना जाता है। भगवान लक्ष्मी नृसिंह के ये हज़ार नाम वास्तव में 1000 प्रचंड ब्रह्मांडीय आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। नृसिंह भगवान का संबंध ‘मणिपूर चक्र’ (Navel Chakra) और ‘अनाहत चक्र’ (Heart Chakra) से है। जब साधक पूर्ण नाद (ध्वनि) के साथ इन नामों का अर्चन करता है, तो उसके शरीर में एक तीव्र स्वर्णिम अग्नि (Golden Fire) उत्पन्न होती है, जो साधक के आभामंडल (Aura) को एक अभेद्य कवच में बदल देती है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति, भूत-प्रेत या अकाल मृत्यु भेद नहीं सकती।
2. श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह साक्षात त्वरित न्याय, अमोघ रक्षा, निर्भयता, और परम ऐश्वर्य के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण निष्ठा, सात्विकता, पवित्रता, और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्रनाम का पाठ या अर्चन करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
संकट मोचन, अजेय रक्षा और तांत्रिक बाधा निवारण (Ultimate Protection)
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काले जादू और नकारात्मक ऊर्जा का तत्काल विध्वंस: यदि किसी ने साधक या उसके परिवार पर भयंकर से भयंकर तांत्रिक क्रिया (Black Magic), मूठ-करणी, या भूत-प्रेत का प्रयोग किया है, तो श्री लक्ष्मी नृसिंह के 1000 नाम उसे पल भर में भस्म कर पलट (Revert) देते हैं। भगवान का सुदर्शन चक्र और उनके नख (Nails) हर बुरी शक्ति को फाड़ देते हैं।
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अजेय शत्रु विजय और मुकदमों में सफलता: जो शत्रु अकारण ही आपके प्राणों के प्यासे हों या आपको झूठे मुकदमों (Court Cases) में फंसा रहे हों, उनका अहंकार इस पाठ से छिन्न-भिन्न हो जाता है। भगवान नृसिंह न्याय के देवता हैं; वे अपने भक्त की पुकार पर तुरंत आते हैं।
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अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा: यह पाठ एक अभेद्य सुरक्षा कवच है। जिन लोगों को अकारण मृत्यु (Premature Death) का भय रहता है या गंभीर दुर्घटनाओं के योग हैं, भगवान साक्षात महाकाल बनकर उनकी रक्षा करते हैं।
आर्थिक, व्यापारिक और भौतिक लाभ (Wealth & Debt Relief)
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भयंकर कर्जों (Debts) और कुबेर ऋण से मुक्ति: माता लक्ष्मी के साथ होने के कारण यह स्वरूप आर्थिक संकटों को नष्ट करने में अद्वितीय है। जो व्यक्ति भारी कर्जों के बोझ तले दब चुका है, इस पाठ से उसके लिए आय के अप्रत्याशित स्रोत खुल जाते हैं और वह शीघ्र ऋण-मुक्त हो जाता है।
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व्यापार में वृद्धि और घोर दरिद्रता का नाश: जिस घर में यह पाठ नित्य होता है, वहाँ कभी अन्न और धन का अभाव नहीं रहता। ‘अलक्ष्मी’ (दरिद्रता) उस घर से तुरंत विदा हो जाती है।
ज्योतिषीय और मनोवैज्ञानिक लाभ (Mental Peace & Astrological Remedies)
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राहु, केतु और मंगल की पीड़ा का अचूक निवारण: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान नृसिंह मंगल और राहु के उग्र प्रभावों को नियंत्रित करते हैं। कालसर्प दोष, मांगलिक दोष, या राहु की भयंकर महादशा में यह पाठ इन क्रूर ग्रहों को तुरंत शांत कर देता है।
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परम निर्भयता (Absolute Fearlessness) की प्राप्ति: जिन लोगों को रात में घबराहट होती है, पैनिक अटैक (Panic Attacks) आते हैं, या अज्ञात डर (Phobias) सताता है, वे इस पाठ से प्रह्लाद के समान अदम्य साहसी और निर्भय बन जाते हैं।
3. श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह की उपासना अत्यंत सात्विक, पवित्र और दृढ़ विश्वास (श्रद्धा) से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध सहस्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैष्णव आगम ग्रंथों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान नृसिंह की आराधना के लिए मंगलवार (Tuesday – शक्ति और पराक्रम का दिन), गुरुवार (Thursday – विष्णु का दिन) और शनिवार (Saturday – शनि/राहु की शांति के लिए) सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माने जाते हैं।
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विशेष तिथियां: नृसिंह चतुर्दशी (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी), स्वाति नक्षत्र (जो भगवान नृसिंह का जन्म नक्षत्र है), और किसी भी माह की एकादशी या पूर्णिमा के दिन इस सहस्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।
-
समय: भगवान नृसिंह गोधूलि बेला में प्रकट हुए थे (न दिन, न रात)। अतः इनकी साधना का सबसे उत्तम समय ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के ठीक समय) होता है। प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ में भी इसका पाठ किया जा सकता है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर रखें।
-
आसन: बैठने के लिए लाल (Red), पीले (Yellow), या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में लाल, पीले (पीतांबर), या श्वेत (सफेद) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
| सामग्री / विधान | विवरण |
| प्रतिमा / चित्र / यंत्र | एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह (जिसमें माता लक्ष्मी उनकी बायीं जंघा पर बैठी हों) का सुंदर चित्र या पीतल/शालिग्राम की मूर्ति स्थापित करें। (उग्र नृसिंह का चित्र घर में न रखें)। |
| दीपक | भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। चंदन, मोगरा या कर्पूर की सात्विक धूप जलाएं। |
| तिलक और शृंगार | भगवान को पीला चंदन (गोपी चंदन) या अष्टगंध का तिलक लगाएं। माता लक्ष्मी को कुमकुम अर्पित करें। स्वयं के मस्तक पर भी गोपी चंदन का ‘ऊर्ध्वपुण्ड्र’ (U-shaped) तिलक धारण करें। |
| पुष्प और तुलसी दल | उन्हें लाल पुष्प (गुलाब, गुड़हल) और पीले पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। भगवान नृसिंह की पूजा बिना तुलसी दल (Tulsi leaves) के कभी स्वीकार नहीं होती, अतः तुलसी प्रचुर मात्रा में रखें। |
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ आरंभ करने से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी से रंगे हुए), और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे भक्त-वत्सल श्री लक्ष्मी नृसिंह, मैं अपने जीवन से समस्त भयों, प्राणघातक शत्रुओं, भारी कर्जों के समूल नाश, अखंड सुख-शांति तथा आपकी अहैतुकी रक्षा-कृपा के लिए श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ/तुलसी-अर्चन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ”), और फिर जल को ज़मीन पर छोड़ दें।
सहस्रनाम का पाठ और तुलसी-अर्चन विधि (Chanting Method & Archana)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश, माता लक्ष्मी, और भक्त शिरोमणि प्रह्लाद जी का मानसिक स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।
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भगवान नृसिंह के जाग्रत मंत्र “ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥” या सरल मंत्र “ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंहाय नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (तुलसी या स्फटिक की माला पर) अवश्य जपें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर और भीतर एक अजेय निर्भयता का अनुभव करते हुए ‘श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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सहस्रार्चन / तुलसी-अर्चन विधि (अचूक और चमत्कारिक उपाय): अत्यंत शीघ्र फल प्राप्ति (विशेषकर कर्ज मुक्ति या संकट नाश) के लिए, नामावली का पाठ करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण (जैसे— ॐ नृसिंहाय नमः, ॐ महासिंहाय नमः) के साथ भगवान के चित्र या शालिग्राम पर एक तुलसी का पत्ता (Tulsi Dal), पीला पुष्प, या हल्दी से रंगे अक्षत अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। भगवान विष्णु के इस अवतार को प्रसन्न करने का यह अमोघ ब्रह्मास्त्र है।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
ध्यान दें: भगवान नृसिंह का अवतार अत्यंत उग्र था, इसलिए उन्हें शीतल (Cooling) चीजें प्रिय हैं। दक्षिण भारत की परंपरा के अनुसार उन्हें पानकम (Panakam – गुड़, काली मिर्च, सोंठ और जल का शरबत), दूध की खीर, माखन-मिश्री, या ताजे मीठे फलों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी पत्र अवश्य डालें। अंत में कर्पूर जलाकर भगवान की आरती गाएं। पूजा के अंत में हाथ जोड़कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
भगवान नृसिंह साक्षात परमेश्वर हैं, जो एक क्षण में अत्यंत उग्र और दूसरे ही क्षण अत्यंत वात्सल्यमयी हो सकते हैं। वे अनुशासनहीनता और अशुद्धता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते। गृहस्थ साधकों को इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
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पूर्ण सात्विक जीवन और आहार (Absolute Sattvic Diet): यह वैष्णव साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम है। अनुष्ठान की अवधि (21/41 दिन) के दौरान साधक को घर में और अपने आहार में मांस (Meat), मदिरा (Alcohol), अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। जो व्यक्ति तामसिक भोजन करता है, उसकी पूजा भगवान कभी स्वीकार नहीं करते। यह एक महा-अपराध है।
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क्रोध पर नियंत्रण (Control over Anger): भगवान नृसिंह ने क्रोध इसलिए किया था ताकि वे धर्म की रक्षा कर सकें। यदि आप उनके 1000 नामों का जप कर रहे हैं, तो आपको अपने व्यक्तिगत जीवन में क्रोध, गाली-गलौज, और चीखने-चिल्लाने का त्याग करना होगा। जो बात-बात पर क्रोध करता है, उसकी साधना निष्फल हो जाती है।
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तुलसी की अनिवार्यता और आदर: भगवान नृसिंह को तुलसी अत्यंत प्रिय है। बिना तुलसी के वे कोई भोग ग्रहण नहीं करते। तुलसी के पौधे का पूर्ण सम्मान करें; अशुद्ध अवस्था में उसे कभी न छुएं।
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स्त्रियों और असहायों की रक्षा: भगवान ने प्रह्लाद (एक असहाय बालक) की रक्षा के लिए अवतार लिया था। जो व्यक्ति अपने पद या बल का दुरुपयोग कर घर की स्त्रियों, बच्चों, या असहाय लोगों को सताता है, उस पर भगवान नृसिंह का भयंकर कोप गिरता है।
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कठोर ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): किसी विशेष मनोकामना के लिए अनुष्ठान के दौरान साधक को शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम एक अत्यंत प्रचंड और जाग्रत स्तोत्र है, अतः इसकी साधना करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं:
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सकाम या प्रतिशोध की भावना का निषेध (No Revenge Motive): यह स्तुति आपकी आत्मरक्षा, कर्ज-मुक्ति, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए है। किसी निर्दोष व्यक्ति का अकारण अहित करने, उसे मुकदमे में फंसाने, या अपना व्यक्तिगत ‘अहंकारी बदला’ लेने की नीयत से इसका पाठ भूलकर भी न करें। भगवान न्यायकारी हैं; गलत मंशा से किया गया पाठ साधक का ही सर्वनाश कर देगा।
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चित्र का चयन (Choosing the Right Idol/Picture): घर के पूजा कक्ष में कभी भी ‘उग्र नृसिंह’ (जिसमें वे हिरण्यकशिपु का पेट फाड़ रहे हों और क्रोधित हों) का चित्र या मूर्ति स्थापित न करें। घर के लिए हमेशा ‘लक्ष्मी नृसिंह’ (शांत मुद्रा, माता लक्ष्मी साथ में, और प्रह्लाद जी प्रार्थना करते हुए) का चित्र ही शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।
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तुलसी तोड़ने के कठोर नियम: शास्त्रों के अनुसार— रविवार, एकादशी, द्वादशी, सूर्य/चंद्र ग्रहण, और संध्याकाल (सूर्यास्त के बाद) तुलसी के पत्ते तोड़ना सर्वथा वर्जित और महापाप है। पूजा के लिए तुलसी हमेशा एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें।
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शारीरिक अपवित्रता का ध्यान: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अशुद्ध अवस्था (सूतक, पातक) में सहस्रनाम की पुस्तक, तुलसी, या भगवान की मूर्ति का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दौरान इस पाठ से पूर्णतः दूर रहना चाहिए।
6. आधुनिक युग में श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक युग एक ‘अदृश्य कुरुक्षेत्र’ बन चुका है। लोग ‘अहंकार’, ‘स्वार्थ’, और ‘गलाकाट प्रतिस्पर्धा’ की दुनिया में जी रहे हैं। आज के समय में हिरण्यकशिपु जैसे राक्षस हथियारों से नहीं लड़ते; वे पीठ पीछे कॉर्पोरेट राजनीति, भारी कर्जों (Loans/EMIs) के जाल, साइबर बुलिंग, झूठे मुकदमों, और षड्यंत्रों के रूप में प्रहार करते हैं।
इसके साथ ही, जीवन की गति इतनी तेज़ है कि अचानक क्या विपत्ति आ जाए, कोई नहीं जानता। दुर्घटनाएं, रातों-रात नौकरी का जाना, व्यापार में घाटा, और भविष्य का डर—यह सब आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression), पैनिक अटैक (Panic Attacks) और एंग्जायटी से भर रहा है।
‘श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम’ आधुनिक इंसान के इन्हीं आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, और ऊर्जा संकटों का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक उपचार है:
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वित्तीय सुरक्षा और कर्ज से आजादी (Financial Healing): आज हर दूसरा व्यक्ति लोन (Loan) के जाल में फंसा है। माता लक्ष्मी के साथ नृसिंह भगवान का यह ध्यान व्यक्ति के लिए धन के नए मार्ग खोलता है। यह पाठ आपको उस ‘कर्ज के डिप्रेशन’ से निकालकर एक व्यावहारिक समाधान (Practical Solution) की ओर ले जाता है।
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टॉक्सिक (Toxic) लोगों और कॉर्पोरेट राजनीति से रक्षा: यह पाठ साधक के आभामंडल (Aura) को एक अभेद्य ‘स्वर्णिम कवच’ से ढक देता है। कार्यालय (Office) या समाज की नकारात्मक राजनीति और ईर्ष्यालु लोग आपका मानसिक संतुलन नहीं बिगाड़ पाते। जो आपके खिलाफ साजिश रचते हैं, वे खुद ही हार मान लेते हैं।
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अनिश्चितता के डर का नाश (Fearlessness): आज हर व्यक्ति इस डर में जी रहा है कि “कल क्या होगा?” भगवान नृसिंह का स्मरण अवचेतन मन से भविष्य के इस अकारण डर (Insecurity) को उखाड़ फेंकता है। साधक को यह अटूट विश्वास हो जाता है कि उसका रक्षक किसी खंभे (हर कण) में मौजूद है।
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इमोशनल स्टेबिलिटी (Emotional Resilience): क्रोध और शांति का जो संतुलन भगवान लक्ष्मी नृसिंह में है, वही संतुलन आधुनिक मनुष्य को अपने करियर (जहां शक्ति चाहिए) और परिवार (जहां करुणा चाहिए) के बीच स्थापित करने में यह पाठ मदद करता है।
Shri Lakshmi Narasimha Sahasranama (श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय रक्षक, त्वरित न्याय के देवता, और परम ऐश्वर्य-दायिनी महालक्ष्मी का साक्षात आवाहन है, जिसकी एक गर्जना मात्र से साक्षात यमराज, दरिद्रता, राहु-केतु की पीड़ा, और भयंकर तांत्रिक शक्तियां भी थर-थर कांप उठती हैं। जब एक साधक अपने सारे लौकिक ज्ञान और अहंकार को त्यागकर, प्रह्लाद के समान पूर्ण शरणागति के साथ इस नामावली को भगवान के चरणों में समर्पित करता है, तो भगवान नृसिंह जड़ (खंभे) से भी प्रकट होकर उसकी रक्षा के लिए तुरंत दौड़े चले आते हैं।
भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह बाहर से भले ही परम प्रतापी और अजेय रक्षक दिखाई दें, परंतु वे भीतर से अपने निश्छल भक्तों के लिए परम दयामयी, वात्सल्यपूर्ण और संकटों को हरने वाले साक्षात श्री हरि हैं। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के भौतिक संघर्षों में पूरी तरह टूट चुके हैं, भयंकर शत्रुओं ने आपको घेर लिया है, भारी कर्जों ने रातों की नींद उड़ा दी है, या आपका साहस खत्म हो रहा है, तो मंगलवार या गोधूलि बेला में लाल/पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक प्रज्वलित करें, और गुरु व भगवान विष्णु को साक्षी मानकर पूर्ण निर्भयता के साथ, तुलसी दल अर्पित करते हुए इस सहस्रनाम का गान करें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि भगवान नृसिंह ने आपके जीवन की सारी बाधाओं, झूठे आरोपों, शत्रुओं और भयों को फाड़कर भस्म कर दिया है, और साक्षात माता लक्ष्मी ने आपके जीवन को अपार ऐश्वर्य, स्थिर धन, अदम्य साहस, और परम शांति के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंहाय नमः!
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?
श्री लक्ष्मी नृसिंह सहस्रनाम भगवान श्री हरि विष्णु के चतुर्थ अवतार, भगवान नृसिंह (माता लक्ष्मी के साथ शांत स्वरूप) के 1000 परम पवित्र, जाग्रत और अत्यंत शक्तिशाली नामों का एक सिद्ध वैष्णव संकलन है। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह सहस्रनाम अजेय शत्रुओं का नाश करने, भारी कर्जों (Debts) से तुरंत मुक्ति दिलाने, अकारण मृत्यु के भय को मिटाने और घर में अखंड धन-संपदा (महालक्ष्मी) लाने का सबसे तीव्र और अमोघ उपाय है।
2. इस सहस्रनाम का पाठ या ‘तुलसी-अर्चन’ करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ मिलता है?
इस नामावली का सबसे प्रत्यक्ष और त्वरित लाभ ‘प्राणघातक शत्रुओं व षड्यंत्रों का समूल नाश’, ‘भयंकर कर्ज व आर्थिक संकट से छुटकारा’, और ‘अज्ञात भय (Phobia) व मानसिक डिप्रेशन का अंत’ है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक नाम के साथ तुलसी दल अर्पित करने से व्यक्ति की दरिद्रता दूर होती है, कोर्ट-कचहरी (मुकदमों) में विजय मिलती है, और राहु-मंगल जैसे क्रूर ग्रहों की पीड़ा तुरंत शांत होती है।
3. क्या एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति (परिवार वाला) भगवान नृसिंह की साधना कर सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल! एक गृहस्थ व्यक्ति भगवान नृसिंह की साधना कर सकता है, परंतु उसे केवल ‘श्री लक्ष्मी नृसिंह’ (शांत स्वरूप) की ही पूजा करनी चाहिए (उग्र नृसिंह की नहीं)। इसके लिए ‘पूर्ण सात्विक जीवन’ (मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज का पूर्ण त्याग) अपनाना अनिवार्य है। भगवान को सात्विक भोग (पानकम, दूध की खीर) और तुलसी अर्पित करने से वे अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
4. भगवान लक्ष्मी नृसिंह की आराधना के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?
भगवान नृसिंह की आराधना के लिए ‘मंगलवार’ (Tuesday – शक्ति का दिन), ‘गुरुवार’ (Thursday – विष्णु का दिन), और ‘शनिवार’ (Saturday) सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माने जाते हैं। नृसिंह चतुर्दशी (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी), स्वाति नक्षत्र, और किसी भी एकादशी के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इनका पाठ करने का सबसे उत्तम समय ‘गोधूलि बेला’ (सूर्यास्त का समय – प्रदोष काल) या प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ होता है।
5. भगवान नृसिंह की इस साधना को करते समय सबसे बड़ी सावधानी और नियम क्या है?
इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम यह है कि साधक को अपने जीवन में ‘क्रोध’ (Anger) का पूर्ण रूप से त्याग करना चाहिए और ‘पूर्ण सात्विकता’ अपनानी चाहिए। घर में कभी भी ‘उग्र नृसिंह’ की तस्वीर नहीं लगानी चाहिए। इसके अलावा, इस पाठ का प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष व्यक्ति से बदला लेने (प्रतिशोध) की भावना से नहीं करना चाहिए, क्योंकि भगवान न्याय के देवता हैं। पूजा में ‘तुलसी’ का प्रयोग सर्वथा अनिवार्य है।