Shri Lakshmi Sahasranama (श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 32 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, वेदों और पुराणों के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब बात जीवन के पोषण, ऐश्वर्य, सौंदर्य, और भौतिक व आध्यात्मिक समृद्धि की आती है, तो जगतजननी माता महालक्ष्मी (Goddess Lakshmi) का स्मरण सर्वोपरि है। माता लक्ष्मी केवल धन (Money) की देवी नहीं हैं; वे ‘श्री’ (Shree) हैं। ‘श्री’ का अर्थ है वह तेज, वह आकर्षण, वह ऐश्वर्य और वह पवित्रता जो जीवन को सुखमय, संतुलित और सुंदर बनाती है। जहाँ भगवान श्री हरि विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं, वहीं माता लक्ष्मी उस पालन के लिए आवश्यक ऊर्जा और साधन (Resources) हैं। बिना ‘श्री’ के नारायण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

जब मनुष्य का जीवन घोर आर्थिक संकटों, भयंकर कर्ज (Debt), व्यापार में लगातार हो रहे घाटे, घर में अकारण होने वाले क्लेश, और दरिद्रता से घिर जाता है, तब माता लक्ष्मी की शरण में जाना साक्षात जीवन में वसंत ऋतु को आमंत्रित करने के समान है। माता की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अष्टलक्ष्मी (Ashtalakshmi) स्वरूप, और अहैतुकी कृपा को अपने भीतर और अपने घर में स्थिर (Permanent) करने के लिए सिद्ध ऋषियों (विशेषकर स्कंद पुराण में सनतकुमारों) ने उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ (Shri Lakshmi Sahasranama) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्त्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा आध्यात्मिक कल्पवृक्ष है, जो जीवन की भयंकर से भयंकर दरिद्रता (अलक्ष्मी), दुर्भाग्य, और रुके हुए धन के मार्गों को पल भर में खोल देता है। जब व्यक्ति को समाज में अपार सुख-शांति, स्थिर धन-संपदा, कुशाग्र बुद्धि वाली संतान, और जीवन में अजेय ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है, तब यह ‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ साक्षात कामधेनु सिद्ध होता है।

श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम | Lakshmi Sahastranaam

ॐ नित्यागतायै नमः।

ॐ अनन्तनित्यायै नमः।

ॐ नन्दिन्यै नमः।

ॐ जनरञ्जन्यै नमः।

ॐ नित्यप्रकाशिन्यै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ स्वप्रकाशस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

ॐ महाकाल्यै नमः।

ॐ महाकन्यायै नमः।

ॐ सरस्वत्यै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ भोगवैभवसन्धात्र्यै नमः।

ॐ भक्तानुग्रहकारिण्यै नमः।

ॐ ईशावास्यायै नमः।

ॐ महामायायै नमः।

ॐ महादेव्यै नमः।

ॐ महेश्वर्यै नमः।

ॐ हृल्लेखायै नमः।

ॐ परमायै नमः।

ॐ शक्त्यै नमः।

ॐ मातृकाबीजरूपिण्यै नमः।

ॐ नित्यानन्दायै नमः।

ॐ नित्यबोधायै नमः।

ॐ नादिन्यै नमः।

ॐ जन्मोदिन्यै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ सत्यप्रत्ययिन्यै नमः।

ॐ स्वप्रकाशात्मरूपिण्यै नमः।

ॐ त्रिपुरायै नमः।

ॐ भैरव्यै नमः।

ॐ विद्यायै नमः।

ॐ हंसायै नमः।

ॐ वागीश्वर्यै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ शिवायै नमः।

ॐ वाग्देव्यै नमः।

ॐ महारात्र्यै नमः।

ॐ कालरात्र्यै नमः।

ॐ त्रिलोचनायै नमः।

ॐ भद्रकाल्यै नमः।

ॐ कराल्यै नमः।

ॐ महाकाल्यै नमः।

ॐ तिलोत्तमायै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ काल्यै नमः।

ॐ करालवक्त्रान्तायै नमः।

ॐ कामाक्ष्यै नमः।

ॐ कामदायै नमः।

ॐ शुभायै नमः।

ॐ चण्डिकायै नमः। लक्ष्मी सहस्त्रनाम

ॐ चण्डरुपेशायै नमः।

ॐ चामुण्डायै नमः।

ॐ चक्रधारिण्यै नमः।

ॐ त्रैलोक्यजनन्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ त्रैलोक्यविजयोत्तमायै नमः।

ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः।

ॐ क्रियालक्ष्म्यै नमः।

ॐ मोक्षलक्ष्म्यै नमः।

ॐ प्रसादिन्यै नमः।

ॐ उमायै नमः।

ॐ भगवत्यै नमः।

ॐ दुर्गायै नमः।

ॐ चान्द्र्यै नमः।

ॐ दाक्षायण्यै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः।

ॐ धरायै नमः।

ॐ वेलायै नमः।

ॐ लोकमात्रे नमः।

ॐ हरिप्रियायै नमः।

ॐ पार्वत्यै नमः।

ॐ परमायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ ब्रह्मविद्याप्रदायिन्यै नमः।

ॐ अरूपायै नमः।

ॐ बहुरूपायै नमः।

ॐ विरूपायै नमः।

ॐ विश्वरूपिण्यै नमः।

ॐ पञ्चभूतात्मिकायै नमः।

ॐ वाण्यै नमः।

ॐ पञ्चभूतात्मिकायै नमः।

ॐ परायै नमः।

ॐ कालिम्नयै नमः।

ॐ पञ्चिकायै नमः।

ॐ वाग्म्यै नमः।

ॐ हविषे नमः।

ॐ प्रत्यधिदेवतायै नमः।

ॐ देवमात्रे नमः।

ॐ सुरेशानायै नमः।

ॐ वेदगर्भायै नमः।

ॐ अम्बिकायै नमः।

ॐ धृतये नमः।

ॐ सङ्ख्यायै नमः।

ॐ जातये नमः।

ॐ क्रियाशक्त्यै नमः।

ॐ प्रकृत्यै नमः।

ॐ मोहिन्यै नमः।

ॐ मह्यै नमः।

ॐ यज्ञविद्यायै नमः।

ॐ महाविद्यायै नमः।

ॐ गुह्यविद्यायै नमः।

ॐ विभावर्यै नमः।

ॐ ज्योतिष्मत्यै नमः।

ॐ महामात्रे नमः।

ॐ सर्वमन्त्रफलप्रदायै नमः।

ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ हृदयग्रन्थिभेदिन्यै नमः।

ॐ सहस्रादित्यसङ्काशायै नमः।

ॐ चन्द्रिकायै नमः।

ॐ चन्द्ररूपिण्यै नमः।

ॐ गायत्र्यै नमः।

ॐ सोमसम्भूत्यै नमः।

ॐ सावित्र्यै नमः।

ॐ प्रणवात्मिकायै नमः।

ॐ शाङ्कर्यै नमः।

ॐ वैष्णव्यै नमः।

ॐ ब्राह्मयै नमः।

ॐ सर्वदेवनमस्कृतायै नमः।

ॐ सेव्यदुर्गायै नमः।

ॐ कुबेराक्ष्यै नमः।

ॐ करवीरनिवासिन्यै नमः।

ॐ जयायै नमः।

ॐ विजयायै नमः।

ॐ जयन्त्यै नमः।

ॐ अपराजितायै नमः।

ॐ कुब्जिकायै नमः।

ॐ कालिकायै नमः।

ॐ शास्त्र्यै नमः।

ॐ विनापुस्तकधारिण्यै नमः।

ॐ सर्वज्ञशक्त्यै नमः।

ॐ श्रीशक्त्यै नमः।

ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै नमः।

ॐ इडापिङ्गलिकामध्यमृणाली-तन्तुरूपिण्यै नमः।

ॐ यज्ञेशान्यै नमः।

ॐ प्रथायै नमः।

ॐ दीक्षायै नमः।

ॐ दक्षिणायै नमः।

ॐ सर्वमोहिन्यै नमः।

ॐ अष्टाङ्गयोगिन्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ निर्बीजध्यानगोचरायै नमः।

ॐ सर्वतीर्थस्थितायै नमः।

ॐ शुद्धायै नमः।

ॐ सर्वपर्वतवासिन्यै नमः।

ॐ वेदशास्त्रप्रमायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ षडङ्गादिपदक्रमायै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ धात्र्यै नमः।

ॐ शुभानन्दायै नमः।

ॐ यज्ञकर्मस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ व्रतिन्यै नमः।

ॐ मेनकायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ ब्रह्माण्यै नमः।

ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः।

ॐ एकाक्षरपरायै नमः।

ॐ तारायै नमः।

ॐ भवबन्धविनाशिन्यै नमः।

ॐ विश्वम्भरायै नमः।

ॐ धराधारायै नमः।

ॐ निराधारायै नमः।

ॐ अधिकस्वरायै नमः।

ॐ राकायै नमः।

ॐ कुह्वे नमः।

ॐ अमावास्यायै नमः।

ॐ पूर्णिमायै नमः।

ॐ अनुमत्यै नमः।

ॐ द्युत्ये नमः।

ॐ सिनीवाल्यै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ अवश्यायै नमः।

ॐ वैश्वादेव्यै नमः।

ॐ पिशङ्गीलायै नमः।

ॐ पिप्पलायै नमः।

ॐ विशालाक्ष्यै नमः।

ॐ रक्षोघ्नयै नमः।

ॐ वृष्टिकारिण्यै नमः।

ॐ दुष्टविद्राविण्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सर्वोपद्रवनाशिन्यै नमः।

ॐ शारदायै नमः।

ॐ शरसन्धानायै नमः।

ॐ सर्वशस्त्रस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ युद्धमध्यस्थितायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सर्वभूतप्रभञ्जन्यै नमः।

ॐ अयुद्धायै नमः।

ॐ युद्धरूपायै नमः।

ॐ शान्तायै नमः।

ॐ शान्तिस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ गङ्गायै नमः।

ॐ सरस्वत्यै नमः।

ॐ वेण्यै नमः।

ॐ यमुनायै नमः।

ॐ नर्मदायै नमः।

ॐ आपगायै नमः।

ॐ समुद्रवसनावासायै नमः।

ॐ ब्रह्माण्डश्रेणिमेखलायै नमः।

ॐ पञ्चवक्त्रायै नमः।

ॐ दशभुजायै नमः।

ॐ शुद्धस्फटिकसन्निभायै नमः।

ॐ रक्तायै नमः।

ॐ कृष्णायै नमः।

ॐ सीतायै नमः।

ॐ पीतायै नमः।

ॐ सर्ववर्णायै नमः।

ॐ निरीश्वर्यै नमः।

ॐ कालिकायै नमः।

ॐ चक्रिकायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सत्यायै नमः।

ॐ वटुकायै नमः।

ॐ स्थितायै नमः।

ॐ तरुण्यै नमः।

ॐ वारुण्यै नमः।

ॐ नार्यै नमः।

ॐ ज्येष्ठादेव्यै नमः।

ॐ सुरेश्वर्यै नमः।

ॐ विश्वम्भरायै नमः।

ॐ धरायै नमः।

ॐ कर्त्र्यै नमः।

ॐ गलार्गलविभञ्जन्यै नमः।

ॐ सन्ध्यायै नमः।

ॐ रात्रयै नमः।

ॐ दिवे नमः।

ॐ ज्योत्स्नायै नमः।

ॐ कलायै नमः।

ॐ काष्ठायै नमः।

ॐ निमेषिकायै नमः।

ॐ उर्व्यै नमः।

ॐ कात्यायन्यै नमः।

ॐ शुभ्रायै नमः।

ॐ संसारार्णवतारिण्यै नमः।

ॐ कपिलायै नमः।

ॐ कीलिकायै नमः।

ॐ अशोकायै नमः।

ॐ मल्लिकानवमालिकायै नमः।

ॐ देविकायै नमः।

ॐ नन्दिकायै नमः।

ॐ शान्तायै नमः।

ॐ भञ्जिकायै नमः।

ॐ भयभञ्जिकायै नमः।

ॐ कौशिक्यै नमः।

ॐ वैदिक्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सौर्यै नमः।

ॐ रूपाधिकायै नमः।

ॐ अतिभायै नमः।

ॐ दिग्वस्त्रायै नमः।

ॐ नववस्त्रायै नमः।

ॐ कन्यकायै नमः।

ॐ कमलोद्भवायै नमः।

ॐ श्रियै नमः।

ॐ सौम्यलक्षणायै नमः।

ॐ अतीतदुर्गायै नमः।

ॐ सूत्रप्रबोधिकायै नमः।

ॐ श्रद्धायै नमः।

ॐ मेधायै नमः।

ॐ कृत्ये नमः।

ॐ प्रज्ञायै नमः।

ॐ धारणायै नमः।

ॐ कान्त्यै नमः।

ॐ श्रुतये नमः।

ॐ स्मृतये नमः।

ॐ धृतये नमः।

ॐ धन्यायै नमः।

ॐ भूतये नमः।

ॐ इष्टयै नमः।

ॐ मनीषिण्यै नमः।

ॐ विरक्तये नमः।

ॐ व्यापिन्यै नमः।

ॐ मायायै नमः।

ॐ सर्वमायाप्रभञ्जन्यै नमः।

ॐ माहेन्द्र्यै नमः।

ॐ मन्त्रिण्यै नमः।

ॐ सिंह्यै नमः।

ॐ इन्द्रजालस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ अवस्थात्रयनिर्मुक्तायै नमः।

ॐ गुणत्रयविवर्जितायै नमः।

ॐ ईषणात्रयनिर्मुक्तायै नमः।

ॐ सर्वरोगविवर्जितायै नमः।

ॐ योगिध्यानान्तगम्यायै नमः।

ॐ योगध्यानपरायणायै नमः।

ॐ त्रयीशिखाविशेषज्ञायै नमः।

ॐ वेदान्तज्ञानरूपिण्यै नमः।

ॐ भारत्यै नमः।

ॐ कमलायै नमः।

ॐ भाषायै नमः।

ॐ पद्मायै नमः।

ॐ पद्मवत्यै नमः।

ॐ कृतये नमः।

ॐ गौतम्यै नमः।

ॐ गोमत्यै नमः।

ॐ गौर्यै नमः।

ॐ ईशानायै नमः।

ॐ हंसवाहिन्यै नमः।

ॐ नारायण्यै नमः।

ॐ प्रभाधारायै नमः।

ॐ जाह्नव्यै नमः।

ॐ शङ्करात्मजायै नमः।

ॐ चित्रघण्टायै नमः।

ॐ सुनन्दायै नमः।

ॐ श्रियै नमः।

ॐ मानव्यै नमः।

ॐ मनुसम्भवायै नमः।

ॐ स्तम्भिन्यै नमः।

ॐ क्षोभिण्यै नमः।

ॐ मार्यै नमः।

ॐ भ्रामिण्यै नमः।

ॐ शत्रुमारिण्यै नमः।

ॐ मोहिन्यै नमः।

ॐ द्वेषिण्यै नमः।

ये भी पढ़ें:  Shri Ganesh Sahasranama (श्री गणेश सहस्त्रनाम): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

ॐ वीरायै नमः।

ॐ अघोरायै नमः।

ॐ रुद्ररूपिण्यै नमः।

ॐ रुद्रैकादशिन्यै नमः।

ॐ पुण्यायै नमः।

ॐ कल्याण्यै नमः।

ॐ लाभकारिण्यै नमः।

ॐ देवदुर्गायै नमः।

ॐ महादुर्गायै नमः।

ॐ स्वप्नदुर्गायै नमः।

ॐ अष्टभैरव्यै नमः।

ॐ सूर्यचन्द्राग्निरूपायै नमः।

ॐ ग्रहनक्षत्ररूपिण्यै नमः।

ॐ बिन्दुनादकलातीतायै नमः।

ॐ बिन्दुनादकलात्मिकायै नमः।

ॐ दशवायुजयाकारायै नमः।

ॐ कलाषोडशसंयुतायै नमः।

ॐ काश्यप्यै नमः।

ॐ कमलायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ नादचक्रनिवासिन्यै नमः।

ॐ मृडाधारायै नमः।

ॐ स्थिरायै नमः।

ॐ गुह्यायै नमः।

ॐ देविकायै नमः।

ॐ चक्ररूपिण्यै नमः।

ॐ अविद्यायै नमः।

ॐ शार्वर्यै नमः।

ॐ भुञ्जायै नमः।

ॐ जम्भासुरनिबर्हिण्यै नमः।

ॐ श्रीकायायै नमः।

ॐ श्रीकलायै नमः।

ॐ शुभ्रायै नमः।

ॐ कर्मनिर्मूलकारिण्यै नमः।

ॐ आदिलक्ष्म्यै नमः।

ॐ गुणाधारायै नमः।

ॐ पञ्चब्रह्मात्मिकायै नमः।

ॐ परायै नमः।

ॐ श्रुतये नमः।

ॐ ब्रह्ममुखावासायै नमः।

ॐ सर्वसम्पत्तिरूपिण्यै नमः।

ॐ मृतसञ्जीविन्यै नमः।

ॐ मैत्र्यै नमः।

ॐ कामिन्यै नमः।

ॐ कामवर्जितायै नमः।

ॐ निर्वाणमार्गदायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ हंसिन्यै नमः।

ॐ काशिकायै नमः।

ॐ क्षमायै नमः।

ॐ सपर्यायै नमः।

ॐ गुणिन्यै नमः।

ॐ भिन्नायै नमः।

ॐ निर्गुणायै नमः।

ॐ अखण्डितायै नमः।

ॐ शुभायै नमः।

ॐ स्वामिन्यै नमः।

ॐ वेदिन्यै नमः।

ॐ शक्यायै नमः।

ॐ शाम्बर्यै नमः।

ॐ चक्रधारिण्यै नमः।

ॐ दण्डिन्यै नमः।

ॐ मुण्डिन्यै नमः।

ॐ व्याघ्र्यै नमः।

ॐ शिखिन्यै नमः।

ॐ सोमसंहतये नमः।

ॐ चिन्तामणये नमः।

ॐ चिदानन्दायै नमः।

ॐ पञ्चबाणप्रबोधिन्यै नमः।

ॐ बाणश्रेणये नमः।

ॐ सहस्राक्ष्यै नमः।

ॐ सहस्रभुजापादुकायै नमः।

ॐ सन्ध्याबलये नमः।

ॐ त्रिसन्ध्याख्यायै नमः।

ॐ ब्रह्माण्डमणिभूषणायै नमः।

ॐ वासव्यै नमः।

ॐ वारुणीसेनायै नमः।

ॐ कुलिकायै नमः।

ॐ मन्त्ररञ्जिन्यै नमः।

ॐ जिताप्राणस्वरूपायै नमः।

ॐ कान्तायै नमः।

ॐ काम्यवरप्रदायै नमः।

ॐ मन्त्रब्राह्मणविद्यार्थायै नमः।

ॐ नादरूपायै नमः।

ॐ हविष्मत्यै नमः।

ॐ आथर्वणीश्रुतये नमः।

ॐ शून्यायै नमः।

ॐ कल्पनावर्जितायै नमः।

ॐ सत्यै नमः।

ॐ सत्ताजातये नमः।

ॐ प्रमायै नमः।

ॐ अमेयायै नमः।

ॐ अप्रमित्यै नमः।

ॐ प्राणदायै नमः।

ॐ गतये नमः।

ॐ अवर्णायै नमः।

ॐ पञ्चवर्णायै नमः।

ॐ सर्वदायै नमः।

ॐ भुवनेश्वर्यै नमः।

ॐ त्रैलोक्यमोहिन्यै नमः।

ॐ विद्यायै नमः।

ॐ सर्वभर्त्यै नमः।

ॐ क्षरायै नमः।

ॐ अक्षरायै नमः।

ॐ हिरण्यवर्णायै नमः।

ॐ हरिण्यै नमः।

ॐ सर्वोपद्रवनाशिन्यै नमः।

ॐ कैवल्यपदवीरेखायै नमः।

ॐ सूर्यमण्डलसंस्थितायै नमः।

ॐ सोममण्डलमध्यस्थायै नमः।

ॐ वह्निमण्डलसंस्थितायै नमः।

ॐ वायुमण्डलमध्यस्थायै नमः।

ॐ व्योममण्डलसंस्थितायै नमः।

ॐ चक्रिकायै नमः।

ॐ चक्रमध्यस्थायै नमः।

ॐ चक्रमार्गप्रवर्तिन्यै नमः।

ॐ कोकिलाकुलचक्राशायै नमः।

ॐ पक्षतये नमः।

ॐ पङ्क्तिपावनायै नमः।

ॐ सर्वसिद्धान्तमार्गस्थायै नमः।

ॐ षड्वर्णायै नमः।

ॐ वर्णवर्जितायै नमः।

ॐ शतरुद्रहरायै नमः।

ॐ हन्त्र्यै नमः।

ॐ सर्वसंहारकारिण्यै नमः।

ॐ पुरुषायै नमः।

ॐ पौरुष्यै नमः।

ॐ तुष्टये नमः।

ॐ सर्वतन्त्रप्रसूतिकायै नमः।

ॐ अर्धनारीश्वर्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सर्वविद्याप्रदायिन्यै नमः।

ॐ भार्गव्यै नमः।

ॐ भूजुषीविद्यायै नमः।

ॐ सर्वोपनिषदास्थितायै नमः।

ॐ व्योमकेशायै नमः।

ॐ अखिलप्राणायै नमः।

ॐ पञ्चकोशविलक्षणायै नमः।

ॐ पञ्चकोषात्मिकायै नमः।

ॐ प्रत्यक्यै नमः।

ॐ पञ्चब्रह्मात्मिकायै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ जगज्जराजनित्र्यै नमः।

ॐ पञ्चकर्मप्रसूतिकायै नमः।

ॐ वाग्देव्यै नमः।

ॐ आभरणाकारायै नमः।

ॐ सर्वकाम्यस्थितायै नमः।

ॐ स्थित्यै नमः।

ॐ अष्टादशचतुष्षष्टिपीठिकायै नमः।

ॐ विद्यायुतायै नमः।

ॐ कालिकायै नमः।

ॐ कर्षण्यै नमः।

ॐ शयामायै नमः।

ॐ यक्षिण्यै नमः।

ॐ किन्नरेश्वर्यै नमः।

ॐ केतक्यै नमः।

ॐ मल्लिकायै नमः।

ॐ अशोकायै नमः।

ॐ वाराह्यै नमः।

ॐ धरण्यै नमः।

ॐ ध्रुवायै नमः।

ॐ नारसिंह्यै नमः।

ॐ महोग्रास्यायै नमः।

ॐ भक्तानामार्तिनाशिन्यै नमः।

ॐ अन्तर्बलायै नमः।

ॐ स्थिरायै नमः।

ॐ लक्ष्म्यै नमः।

ॐ जरामरणनाशिन्यै नमः।

ॐ श्रीरञ्जितायै नमः।

ॐ महामायायै नमः।

ॐ सोमसुर्याग्निलोचनायै नमः।

ॐ अदितये नमः।

ॐ देवमात्रे नमः।

ॐ अष्टपुत्रायै नमः।

ॐ अष्टयोगिन्यै नमः।

ॐ अष्टप्रकृतये नमः।

ॐ अष्टाष्टविभ्राजद्विकृताकृतये नमः।

ॐ दुर्बिक्षध्वंसिन्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ सीतायै नमः।

ॐ सत्यायै नमः।

ॐ रुक्मिण्यै नमः।

ॐ ख्यातिजायै नमः।

ॐ भार्गव्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ देवयोनये नमः।

ॐ तपस्विन्यै नमः।

ॐ शाकम्भर्यै नमः।

ॐ महाशोणायै नमः।

ॐ गरुडोपरिसंस्थितायै नमः।

ॐ सिंहगायै नमः।

ॐ व्याघ्रगायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ वायुगायै नमः।

ॐ महाद्रिगायै नमः।

ॐ आकारादिक्षकारांतायै नमः।

ॐ सर्वविद्याधिदेवतायै नमः।

ॐ मन्त्रव्याख्याननिपुणायै नमः।

ॐ ज्योतिश्शास्त्रैकलोचनायै नमः।

ॐ इडापिङ्गलिकामध्यसुषुम्नायै नमः।

ॐ ग्रन्थिभेदिन्यै नमः।

ॐ कालचक्राश्रयोपेतायै नमः।

ॐ कालचक्रस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ वैशारद्यै नमः।

ॐ मतिश्रेष्ठायै नमः।

ॐ वरिष्ठायै नमः।

ॐ सर्वदीपिकायै नमः।

ॐ वैनायक्यै नमः।

ॐ वरारोहायै नमः।

ॐ श्रोणिवेलायै नमः।

ॐ बहिर्वलये नमः।

ॐ जम्भिन्यै नमः।

ॐ जृम्भिण्यै नमः।

ॐ जृम्भकारिण्यै नमः।

ॐ गणकारिकायै नमः।

ॐ शरण्यै नमः।

ॐ चक्रिकायै नमः।

ॐ अनन्तायै नमः।

ॐ सर्वव्याधिचिकित्सक्यै नमः।

ॐ देवक्यै नमः।

ॐ देवसङ्काशायै नमः।

ॐ वारिधये नमः।

ॐ करुणाकरायै नमः।

ॐ शर्वर्यै नमः।

ॐ सर्वसम्पन्नायै नमः।

ॐ सर्वपापप्रभञ्जन्यै नमः।

ॐ एकमात्रायै नमः।

ॐ द्विमात्रायै नमः।

ॐ त्रिमात्रायै नमः।

ॐ अपरायै नमः।

ॐ अर्धमात्रायै नमः।

ॐ परायै नमः।

ॐ सूक्ष्मायै नमः।

ॐ सूक्ष्मार्थार्थपरायै नमः।

ॐ अपरायै नमः।

ॐ एकवीरायै नमः।

ॐ विषेशाख्यायै नमः।

ॐ षष्ठ्यै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ मनस्विन्यै नमः।

ॐ नैष्कर्म्यायै नमः।

ॐ निष्कलालोकायै नमः।

ॐ ज्ञानकर्माधिकायै नमः।

ॐ गुणायै नमः।

ॐ सबन्ध्वानन्दसन्दोहायै नमः।

ॐ व्योमाकारायै नमः।

ॐ निरूपितायै नमः।

ॐ गद्यपद्यात्मिकायै नमः।

ॐ वाण्यै नमः।

ॐ सर्वालङ्कारसंयुतायै नमः।

ॐ साधुबन्धपदन्यासायै नमः।

ॐ सर्वोकसे नमः।

ॐ घटिकावलये नमः।

ॐ षट्कर्मिण्यै नमः।

ॐ कर्कशाकारायै नमः।

ॐ सर्वकर्मविवर्जितायै नमः।

ॐ आदित्यवर्णायै नमः।

ॐ अपर्णायै नमः।

ॐ कामिन्यै नमः।

ॐ वररूपिण्यै नमः।

ॐ ब्रह्माण्यै नमः।

ॐ ब्रह्मसन्तानायै नमः।

ॐ वेदवाचे नमः।

ॐ ईश्वर्यै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ पुराणन्यायमीमांसा-धर्मशास्त्रागमश्रुतायै नमः।

ॐ सद्योवेदवत्यै नमः।

ॐ सर्वायै नमः।

ॐ हंस्यै नमः।

ॐ विद्याधिदेवतायै नमः।

ॐ विश्वेश्वर्यै नमः।

ॐ जगद्धात्र्यै नमः।

ॐ विश्वनिर्माणकारिण्यै नमः।

ॐ वैदिक्यै नमः।

ॐ वेदरूपायै नमः।

ॐ कालिकायै नमः।

ॐ कालरूपिण्यै नमः।

ॐ नारायण्यै नमः।

ॐ महादेव्यै नमः।

ॐ सर्वतत्त्वप्रवर्तिन्यै नमः।

ॐ हिरण्यवर्णरूपायै नमः।

ॐ हिरण्यपदसम्भवायै नमः।

ॐ कैवल्यपदव्यै नमः।

ॐ पुण्यायै नमः।

ॐ कैवल्यज्ञानलक्षितायै नमः।

ॐ ब्रह्मसम्पत्तिरूपायै नमः।

ॐ ब्रह्मसम्पत्तिकारिण्यै नमः।

ॐ वारुण्यै नमः।

ॐ वरुणाराध्यायै नमः।

ॐ सर्वकर्मप्रवतिन्यै नमः।

ॐ एकाक्षरपरायै नमः।

ॐ युक्तायै नमः।

ॐ सर्वदारिद्र्यभञ्जिन्यै नमः।

ॐ पाशाङ्कुशान्वितायै नमः।

ॐ दिव्यायै नमः।

ॐ वीणाव्याख्याक्षसूत्रभृते नमः।

ॐ एकमूर्तये नमः।

ॐ त्रयीमूर्तये नमः।

ॐ मधुकैटभभञ्जिन्यै नमः।

ॐ साङ्ख्यायै नमः।

ॐ साङ्ख्यवत्यै नमः।

ॐ ज्वालायै नमः।

ॐ ज्वलन्त्यै नमः।

ॐ कामरूपिण्यै नमः।

ॐ जाग्रत्यै नमः।

ॐ सर्वसम्पत्तये नमः।

ॐ सुषुप्तायै नमः।

ॐ स्वेष्टदायिन्यै नमः।

ॐ कपालिन्यै नमः।

ॐ महादंष्ट्रायै नमः।

ॐ भ्रुकुटीकुटिलाननायै नमः।

ॐ सर्वावासायै नमः।

ॐ सुवासायै नमः।

ॐ बृहत्यै नमः।

ॐ अष्टये नमः।

ॐ शक्वर्यै नमः।

ॐ छन्दोगणप्रतीकाशायै नमः।

ॐ कल्माष्यै नमः।

ॐ करुणात्मिकायै नमः।

ॐ चक्षुष्मत्यै नमः।

ॐ महाघोषायै नमः।

ॐ खङ्गचर्मधरायै नमः।

ॐ अशनये नमः।

ॐ शिल्पवैचित्र्यविद्योतायै नमः।

ॐ सर्वतोभद्रवासिन्यै नमः।

ॐ अचिन्त्यलक्षणाकारायै नमः।

ॐ सूत्रभाष्यनिबन्धनायै नमः।

ॐ सर्ववेदान्तसम्पत्तये नमः।

ॐ सर्वशास्त्रार्थमातृकायै नमः।

ॐ अकारादिक्षकारान्त-सर्ववर्णकृतस्थलायै नमः।

ॐ सर्वलक्ष्म्यै नमः।

ॐ सादानन्दायै नमः।

ॐ सारविद्यायै नमः।

ॐ सदाशिवायै नमः।

ॐ सर्वज्ञायै नमः।

ॐ सर्वशक्त्यै नमः।

ॐ खेचरीरूपगायै नमः।

ॐ उच्छितायै नमः।

ॐ अणिमादिगुणोपेतायै नमः।

ॐ परायै नमः।

ॐ काष्ठायै नमः।

ॐ परागतये नमः।

ॐ हंसयुक्तविमानस्थायै नमः।

ॐ हंसारूढायै नमः।

ॐ शशिप्रभायै नमः।

ॐ भवान्यै नमः।

ॐ वासनाशक्तये नमः।

ॐ आकृतिस्थायै नमः।

ॐ खिलायै नमः।

ॐ अखिलायै नमः।

ॐ तन्त्रहेतवे नमः।

ॐ विचित्राङ्ग्यै नमः।

ॐ व्योमगङ्गाविनोदिन्यै नमः।

ॐ वर्षायै नमः।

ॐ वर्षिकायै नमः।

ॐ ऋग्यजुस्सामरूपिण्यै नमः।

ॐ महानद्यै नमः।

ॐ नदीपुण्यायै नमः।

ॐ अगण्यपुण्यगुणक्रियायै नमः।

ॐ समाधिगतलभ्यायै नमः।

ॐ अर्थायै नमः।

ॐ श्रोतव्यायै नमः।

ॐ स्वप्रियायै नमः।

ॐ घृणायै नमः।

ॐ नामाक्षरपरायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ उपसर्गनखाञ्चितायै नमः।

ॐ निपातोरुद्व्यायै नमः।

ॐ जङ्घामातृकायै नमः।

ॐ मन्त्ररूपिण्यै नमः।

ॐ आसीनायै नमः।

ये भी पढ़ें:  Shrimat Shankaracharya Sahasranamavali (श्रीमत शंकराचार्य सहस्रनामावली): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

ॐ शयानायै नमः।

ॐ तिष्ठन्त्यै नमः।

ॐ धावनाधिकायै नमः।

ॐ लक्ष्यलक्षणयोगाढ्यायै नमः।

ॐ ताद्रूपगणनाकृतये नमः।

ॐ एकरूपायै नमः।

ॐ अनैकरूपायै नमः।

ॐ तस्यै नमः।

ॐ इन्दुरूपायै नमः।

ॐ तदाकृतये नमः।

ॐ समासतद्धिताकारायै नमः।

ॐ विभक्तिवचनात्मिकायै नमः।

ॐ स्वाहाकारायै नमः।

ॐ स्वधाकारायै नमः।

ॐ श्रीपत्यर्धाङ्गनन्दिन्यै नमः।

ॐ गम्भीरायै नमः।

ॐ गहनायै नमः।

ॐ गुह्यायै नमः।

ॐ योनिलिङ्गार्धधारिण्यै नमः।

ॐ शेषवासुकिसंसेव्यायै नमः।

ॐ चपलायै नमः।

ॐ वरवर्णिन्यै नमः।

ॐ कारुण्याकारसम्पत्तये नमः।

ॐ कीलकृते नमः।

ॐ मन्त्रकीलिकायै नमः।

ॐ शक्तिबीजात्मिकायै नमः।

ॐ सर्वमन्त्रेष्टायै नमः।

ॐ अक्षयकामनायै नमः।

ॐ आग्नेय्यै नमः।

ॐ पार्थिवायै नमः।

ॐ आप्यायै नमः।

ॐ वायव्यायै नमः।

ॐ व्योमकेतनायै नमः।

ॐ सत्यज्ञानात्मिकायै नमः।

ॐ नन्दायै नमः।

ॐ ब्राह्म्यै नमः।

ॐ ब्रह्मणे नमः।

ॐ सनातन्यै नमः।

ॐ अविद्यावासनायै नमः।

ॐ मायायै नमः।

ॐ प्रकृत्यै नमः।

ॐ सर्वमोहिन्यै नमः।

ॐ शक्तये नमः।

ॐ धारणशक्तयेयोगिन्यै नमः।

ॐ चिदचिच्छक्त्यै नमः।

ॐ वक्त्रायै नमः।

ॐ अरुणायै नमः।

ॐ महामायायै नमः।

ॐ मरीचये नमः।

ॐ मदमर्दिन्यै नमः।

ॐ विराजे नमः।

ॐ स्वाहायै नमः।

ॐ स्वधायै नमः।

ॐ शुद्धायै नमः।

ॐ निरूपास्तये नमः।

ॐ सुभक्तिगायै नमः।

ॐ निरूपिताद्व्य्यै नमः।

ॐ विद्यायै नमः।

ॐ नित्यानित्यस्वरूपिण्यै नमः।

ॐ वैराजमार्गसञ्चारायै नमः।

ॐ सर्वसत्पथदर्शिन्यै नमः।

ॐ जालन्धर्यै नमः।

ॐ मृडान्यै नमः।

ॐ भवान्यै नमः।

ॐ भवभञ्जिन्यै नमः।

ॐ त्रैकालिकज्ञानतन्तवे नमः।

ॐ त्रिकालज्ञानदायिन्यै नमः।

ॐ नादातीतायै नमः।

ॐ स्मृतये नमः।

ॐ प्रज्ञायै नमः।

ॐ धात्रीरूपायै नमः।

ॐ त्रिपुष्करायै नमः।

ॐ पराजितायै नमः।

ॐ विधानज्ञायै नमः।

ॐ विशेषितगुणात्मिकायै नमः।

ॐ हिरण्यकेशिन्यै नमः।

ॐ हेमब्रह्मसूत्रविचक्षणायै नमः।

ॐ असङ्ख्येयपरार्धान्तस्वर-व्यञ्जनवैखर्यै नमः।

ॐ मधुजिह्वायै नमः।

ॐ मधुमत्यै नमः।

ॐ मधुमासोदयायै नमः।

ॐ मधवे नमः।

ॐ माधव्यै नमः।

ॐ महाभागायै नमः।

ॐ मेघगम्भीरनिस्वनायै नमः।

ॐ ब्रह्मविष्णुमहेशादि-ज्ञातव्यार्थविशेषगायै नमः।

ॐ नाभौवह्निशिखाकारायै नमः।

ॐ ललाटेचन्द्रसन्निभायै नमः।

ॐ भ्रूमध्येभास्कराकारायै नमः।

ॐ हृदिसर्वताराकृत्यै नमः।

ॐ कृत्तिकादिभरण्यन्त-नक्षत्रेष्ट्यार्चितोदयायै नमः।

ॐ ग्रहविद्यात्मिकायै नमः।

ॐ ज्योतिषे नमः।

ॐ ज्योतिर्विदे नमः।

ॐ मतिजीविकायै नमः।

ॐ ब्रह्माण्डगर्भिण्यै नमः।

ॐ बालायै नमः।

ॐ सप्तावरणदेवतायै नमः।

ॐ वैराजोत्तमसाम्राज्यायै नमः।

ॐ कुमारकुशलोदयायै नमः।

ॐ बगलायै नमः।

ॐ भ्रमराम्बायै नमः।

ॐ शिवदूत्यै नमः।

ॐ शिवात्मिकायै नमः।

ॐ मेरुविन्ध्यान्त संस्थानायै नमः।

ॐ काश्मीरपुरवासिन्यै नमः।

ॐ योगनिद्रायै नमः।

ॐ महानिद्रायै नमः।

ॐ विनिद्रायै नमः।

ॐ राक्षसाश्रितायै नमः।

ॐ सुवर्णदायै नमः।

ॐ महागङ्गायै नमः।

ॐ पञ्चाख्यायै नमः।

ॐ पञ्चसंहत्यै नमः।

ॐ सुप्रजातायै नमः।

ॐ सुवीरायै नमः।

ॐ सुपोषायै नमः।

ॐ सुपतये नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ सुगृह्यै नमः।

ॐ रक्तबीजान्तायै नमः।

ॐ हतकन्दर्पजीविकायै नमः।

ॐ समुद्रव्योममध्यस्थायै नमः।

ॐ समबिन्दुसमाश्रयायै नमः।

ॐ सौभाग्यरसजीवातवे नमः।

ॐ सारासारविवेकदृशे नमः।

ॐ त्रिवल्यादिसुपुष्टाङ्गायै नमः।

ॐ भारत्यै नमः।

ॐ भरताश्रितायै नमः।

ॐ नादब्रह्ममयीविद्यायै नमः।

ॐ ज्ञानब्रह्ममयीपरायै नमः।

ॐ ब्रह्मनाड्यै नमः।

ॐ निरुक्तये नमः।

ॐ ब्रह्मकैवल्यसाधनायै नमः।

ॐ कालिकेयमहोदारवीर्य-विक्रमरूपिण्यै नमः।

ॐ बडबाग्निशिखावक्त्रायै नमः।

ॐ महाकबलतर्पणायै नमः।

ॐ महाभूतायै नमः।

ॐ महादर्पायै नमः।

ॐ महासारायै नमः।

ॐ महाक्रतवे नमः।

ॐ पञ्चभूतमहाग्रासायै नमः।

ॐ पञ्चभूताधिदेवतायै नमः।

ॐ सर्वप्रमाणायै नमः।

ॐ सम्पत्तये नमः।

ॐ सर्वरोगप्रतिक्रियायै नमः।

ॐ ब्रह्माण्डान्तर्बहिर्व्याप्तायै नमः।

ॐ विष्णुवक्षोविभूषिण्यै नमः।

ॐ शाङ्कर्यै नमः।

ॐ विधिवक्त्रस्थायै नमः।

ॐ प्रवरायै नमः।

ॐ वरहेतुक्यै नमः।

ॐ हेममालायै नमः।

ॐ शिखामालायै नमः।

ॐ त्रिशिखायै नमः।

ॐ पञ्चलोचनायै नमः।

ॐ सर्वागमसदाचारमर्यादायै नमः।

ॐ यातुभञ्जन्यै नमः।

ॐ पुण्यश्लोकप्रबन्धाढ्यायै नमः।

ॐ सर्वान्तर्यामिरूपिण्यै नमः।

ॐ सामगानसमाराध्यायै नमः।

ॐ श्रोतृकर्णरसायनायै नमः।

ॐ जीवलोकैकजीवात्मने नमः।

ॐ भद्रोदारविलोकनायै नमः।

ॐ तडित्कोटिलसत्कान्त्यै नमः।

ॐ तरुण्यै नमः।

ॐ हरिसुन्दर्यै नमः।

ॐ मीननेत्रायै नमः।

ॐ इन्द्राक्ष्यै नमः।

ॐ विशालाक्ष्यै नमः।

ॐ सुमङ्गलायै नमः।

ॐ सर्वमङ्गलसम्पन्नायै नमः।

ॐ साक्षान्मङ्गलदेवतायै नमः।

ॐ देहिहृद्दीपिकायै नमः।

ॐ दीप्तये नमः।

ॐ जिह्मपापप्रनाशिन्यै नमः।

ॐ अर्धचन्द्रोल्लसद्धंष्ट्रायै नमः।

ॐ यज्ञवाटीविलासिन्यै नमः।

ॐ महादुर्गायै नमः।

ॐ महोत्साहायै नमः।

ॐ महादेवबलोदयायै नमः।

ॐ डाकिनीड्यायै नमः।

ॐ शाकिनीड्यायै नमः।

ॐ साकिनीड्यायै नमः।

ॐ समस्तजुषे नमः।

ॐ निरङ्कुशायै नमः।

ॐ नाकिवन्द्यायै नमः।

ॐ षडाधाराधिदेवतायै नमः।

ॐ भुवनज्ञाननिश्रेणये नमः।

ॐ भुवनाकारवल्लर्यै नमः।

ॐ शाश्वत्यै नमः।

ॐ शाश्वताकारायै नमः।

ॐ लोकानुग्रहकारिण्यै नमः।

ॐ सारस्यै नमः।

ॐ मानस्यै नमः।

ॐ हंस्यै नमः।

ॐ हंसलोकप्रदायिन्यै नमः।

ॐ चिन्मुद्रालङ्कृतकरायै नमः।

ॐ कोटिसूर्यसमप्रभायै नमः।

ॐ सुखप्राणिशिरोरेखायै नमः।

ॐ सददृष्टप्रदायिन्यै नमः।

ॐ सर्वसाङ्कर्यदोषघ्नयै नमः।

ॐ ग्रहोपद्रवनाशिन्यै नमः।

ॐ क्षुद्रजन्तुभयघ्नयै नमः।

ॐ विषरोगादिभञ्जन्यै नमः।

ॐ सदाशान्तायै नमः।

ॐ सदाशुद्धायै नमः।

ॐ गृहच्छिद्रनिवारिण्यै नमः।

ॐ कलिदोषप्रशमन्यै नमः।

ॐ कोलाहलपुरस्थितायै नमः।

ॐ गौर्यै नमः।

ॐ लाक्षणिक्यै नमः।

ॐ मुख्यायै नमः।

ॐ जघन्याकृतिवर्जितायै नमः।

ॐ मायायै नमः।

ॐ विद्यायै नमः।

ॐ मूलभूतायै नमः।

ॐ वासव्यै नमः।

ॐ विष्णुचेतनायै नमः।

ॐ वादिन्यै नमः।

ॐ वसुरूपायै नमः।

ॐ वसुरत्नपरिच्छदायै नमः।

ॐ छांदस्यै नमः।

ॐ चन्द्रहृदयायै नमः।

ॐ मन्त्रस्वच्छन्दभैरव्यै नमः।

ॐ वनमालायै नमः।

ॐ वैजयन्त्यै नमः।

ॐ पञ्चदिव्यायुधात्मिकायै नमः।

ॐ पीताम्बरमय्यै नमः।

ॐ चञ्चत्कौस्तुभायै नमः।

ॐ हरिकामिन्यै नमः।

ॐ नित्यायै नमः।

ॐ तथ्यायै नमः।

ॐ रमायै नमः।

ॐ रामायै नमः।

ॐ रमण्यै नमः।

ॐ मृत्युभञ्जन्यै नमः।

ॐ ज्येष्ठायै नमः।

ॐ काष्ठायै नमः।

ॐ धनिष्ठान्तायै नमः।

ॐ शराङ्ग्यै नमः।

ॐ निर्गुणप्रियायै नमः।

ॐ मैत्रेयायै नमः।

ॐ मित्रविन्दायै नमः।

ॐ शेष्यशेषकलाशयायै नमः।

ॐ वाराणसीवासलभ्यायै नमः।

ॐ आर्यावर्तजनस्तुतायै नमः।

ॐ जगदुत्पत्तिसंस्थानसंहार-त्रयकारणायै नमः।

ॐ तुभ्यं नमः।

ॐ अम्बायै नमः।

ॐ विष्णुसर्वस्वायै नमः।

ॐ महेश्वर्यै नमः।

ॐ सर्वलोकानाम्जनन्यै नमः।

ॐ पुण्यमूर्तये नमः।

ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः।

ॐ महाकाल्यै नमः।

ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

ॐ सद्योजातादि-पञ्चाग्निरूपायै नमः।

ॐ पञ्चकपञ्चकायै नमः।

ॐ यन्त्रलक्ष्म्यै नमः।

ॐ भवत्यै नमः।

ॐ आद्ये नमः।

ॐ आद्यादये नमः।

ॐ सृष्ट्यादिकारणाकारविततये नमः।

ॐ दोषवर्जितायै नमः।

ॐ जगल्लक्ष्म्यै नमः।

ॐ जगन्मात्रे नमः।

ॐ विष्णुपत्न्यै नमः।

ॐ नवकोटिमहाशक्ति-समुपास्यपदाम्भुजायै नमः।

ॐ कनत्सौवर्णरत्नाढ्यायै नमः।

ॐ सर्वाभरणभूषितायै नमः।

ॐ अनन्तनित्यमहिष्यै नमः।

ॐ प्रपञ्चेश्वरनायक्यै नमः।

ॐ अत्युच्छ्रितपदान्तस्थायै नमः।

ॐ परमव्योमनायक्यै नमः।

ॐ नाकपृष्ठगताराध्यायै नमः।

ॐ विष्णुलोकविलासिन्यै नमः।

ॐ वैकुण्ठराजमहिष्यै नमः।

ॐ श्रीरङ्गनगराश्रित्यै नमः।

ॐ रङ्गनायक्यै नमः।

ॐ भूपुत्र्यै नमः।

ॐ कृष्णायै नमः।

ॐ वरदवल्लभायै नमः।

ॐ कोटिब्रह्मादिसंसेव्यायै नमः।

ॐ कोटिरुद्रादिकीर्तितायै नमः।

ॐ मातुलुङ्गमयं खेटं बिभ्रत्यै नमः।

ॐ सौवर्णचषकं बिभ्रत्यै नमः।

ॐ पद्मद्वयं दधानायै नमः।

ॐ पूर्णकुम्भं बिभ्रत्यै नमः।

ॐ कीरं दधानायै नमः।

ॐ वरदाभय दधानायै नमः।

ॐ पाशं बिभ्रत्यै नमः।

ॐ अङ्कुशं बिभ्रत्यै नमः।

ॐ शङ्खं वहन्त्यै नमः।

ॐ चक्रं वहन्त्यै नमः।

ॐ शूलं वहन्त्यै नमः।

ॐ कृपाणिकां वहन्त्यै नमः।

ॐ धनुर्बाणौ बिभ्रत्यै नमः।

ॐ अक्षमालां दधानायै नमः।

ॐ चिन्मुद्रां बिभ्रत्यै नमः।

ॐ अष्टादशभुजायै नमः।

ॐ लक्ष्म्यै नमः।

ॐ महाष्टादशपीठगायै नमः।

ॐ भूमिनीलादिसंसेव्यायै नमः।

ॐ स्वमिचित्तानुवर्तिन्यै नमः।

ॐ पद्मायै नमः।

ॐ पद्मालयायै नमः।

ॐ पद्मिन्यै नमः।

ॐ पूर्णकुम्भाभिषेचितायै नमः।

ॐ इन्दिरायै नमः।

ॐ इन्दिराभाक्ष्यै नमः।

ॐ क्षीरसागरकन्यकायै नमः।

ॐ भार्गव्यै नमः।

ॐ स्वतन्त्रेच्छायै नमः।

ॐ वशीकृतजगत्पतये नमः।

ॐ मङ्गलानां मङ्गलायै नमः।

ॐ देवतानां देवतायै नमः।

ॐ उत्तमानामुत्तमायै नमः।

ॐ श्रेयसे नमः।

ॐ परमामृतयै नमः।

ॐ धनधान्याभिवृद्धये नमः।

ॐ सार्वभौमसुखोच्छ्रयायै नमः।

ॐ आन्दोलिकादिसौभाग्यायै नमः।

ॐ मत्तेभादिमहोदयायै नमः।

ॐ पुत्रपौत्राभिवृद्धये नमः।

ॐ विद्याभोगबलाधिकायै नमः।

ॐ आयुरारोग्यसम्पत्तये नमः।

ॐ अष्टैश्वर्यायै नमः।

ॐ परमेशविभूतये नमः।

ॐ सुक्ष्मात्सूक्ष्मतरागतये नमः।

ॐ सदयापाङ्गसन्दत्त ब्रह्मेन्द्रादि पदस्थितये नमः।

ॐ अव्याहतमहाभाग्यायै नमः।

ॐ अक्षोभ्यविक्रमायै नमः।

ॐ वेदानाम्समन्वयायै नमः।

ॐ वेदानामविरोधायै नमः।

ॐ निश्रेयसपदप्राप्तिसाधनायै नमः।

ॐ फलायै नमः।

ॐ श्रीमन्त्रराजराज्ञ्यै नमः।

ॐ श्रीविद्यायै नमः।

ॐ क्षेमकारिण्यै नमः।

ॐ श्रीम्बीजजपसन्तुष्टायै नमः।

ॐ ऐं ह्रिं श्रीं बीजपालिकायै नमः।

ॐ प्रपत्तिमार्गसुलभायै नमः।

ॐ विष्णुप्रथमकिङ्कर्यै नमः।

ॐ क्लीङ्कारार्थसवित्र्यै नमः।

ॐ सौमङ्गल्याधिदेवतायै नमः।

ॐ श्रीषोडशाक्षरीविद्यायै नमः।

ॐ श्रीयन्त्रपुरवासिन्यै नमः।

ॐ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यायै नमः।

ॐ शिवायै नमः।

ॐ सर्वार्थसाधिकायै नमः।

ॐ शरण्यायै नमः।

ॐ त्र्यम्बकायै नमः।

ॐ देव्यै नमः।

ॐ नारायण्यै नमः।

॥ इति श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम सम्पूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्त्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैदिक दर्शन और ‘श्री-तत्व’ को समझने के लिए हमें माता लक्ष्मी के अष्ट स्वरूपों, उनके समुद्र मंथन से प्राकट्य और सहस्त्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

ये भी पढ़ें:  Narmada Sahasranama Stotram (नर्मदा सहस्रनाम स्तोत्रं): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

‘श्री’ तत्व और अष्टलक्ष्मी का संगम (The Essence of Ashtalakshmi)

माता लक्ष्मी के आठ मुख्य स्वरूप हैं— आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी (धैर्यलक्ष्मी), विजयालक्ष्मी, और विद्यालक्ष्मी। मनुष्य को जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए इन आठों प्रकार के ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है। केवल बैंक बैलेंस होना ‘धन’ है, परंतु स्वास्थ्य, परिवार, सम्मान और शांति होना ‘ऐश्वर्य’ है। ‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ इन आठों स्वरूपों का एक समेकित (Integrated) स्तोत्र है। जब आप इसके 1000 नामों का गान करते हैं, तो आप केवल धन नहीं मांग रहे होते, बल्कि आप जीवन के हर क्षेत्र (बुद्धि, संतान, साहस, विजय) में पूर्णता का आवाहन कर रहे होते हैं।

चंचला से ‘स्थिर लक्ष्मी’ का रहस्य

माता लक्ष्मी का एक नाम ‘चंचला’ भी है (अर्थात् जो एक जगह टिकती नहीं)। परंतु, जब माता लक्ष्मी भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में होती हैं, तो वे अत्यंत शांत और ‘स्थिर’ हो जाती हैं। श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम वास्तव में भगवान नारायण के प्रति माता की अनन्य भक्ति और उनके मंगलमयी स्वरूप का गान है। जो व्यक्ति इस सहस्त्रनाम का पाठ करता है, उसके घर में लक्ष्मी कभी ‘चंचला’ होकर नहीं आतीं, बल्कि ‘स्थिर लक्ष्मी’ के रूप में सदा के लिए निवास करती हैं।

‘सहस्त्रनाम’ का नाद-विज्ञान (The Science of 1000 Cosmic Vibrations)

सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च चक्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। माता लक्ष्मी के ये हज़ार नाम (जैसे- ॐ प्रकृत्यै नमः, ॐ विद्यायै नमः, ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः, ॐ विष्णुपत्न्यै नमः, ॐ महालक्ष्म्यै नमः) वास्तव में ब्रह्मांडीय संपन्नता की 1000 आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक इन नामों का लयबद्ध उच्चारण करता है, तो उसके आभामंडल (Aura) में एक अद्भुत स्वर्णिम (Golden) और गुलाबी (Pink) रंग की ऊर्जा का निर्माण होता है। यह ऊर्जा चुंबक (Magnet) की तरह ब्रह्मांड से धन, सकारात्मकता और अवसरों को साधक की ओर खींचती है।

2. श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवती महालक्ष्मी साक्षात प्रेम, ऐश्वर्य, सौंदर्य और मोक्ष की प्रदात्री हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्त्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

आर्थिक, व्यापारिक और भौतिक लाभ (Wealth & Financial Bliss)

  • घोर दरिद्रता (Poverty) का समूल नाश: यह इस सहस्त्रनाम का सबसे प्रत्यक्ष और अचूक फल है। जिस घर में यह पाठ नित्य होता है, वहाँ कभी अन्न और धन का अभाव नहीं रहता। ‘अलक्ष्मी’ (दरिद्रता की देवी) उस घर से तुरंत विदा हो जाती है।

  • भयंकर कर्जों (Debts) से तुरंत मुक्ति: जो व्यक्ति भारी कर्जों के बोझ तले दब चुका है और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा, उसे श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ और कुमकुमार्चन अवश्य करना चाहिए। इससे आय के नए स्रोत (Income streams) खुलते हैं और कर्ज शीघ्र चुकता हो जाता है।

  • व्यापार और नौकरी में अजेय वृद्धि: जो लोग व्यापार में मंदी का सामना कर रहे हैं या जिनकी नौकरी छूट गई है, यह स्तोत्र उनके लिए नए अवसर पैदा करता है। साधक की निर्णय क्षमता (Decision making) इतनी सटीक हो जाती है कि वह मिट्टी को भी छुए तो वह सोना बन जाती है।

पारिवारिक, सामाजिक और लौकिक लाभ (Family & Social Harmony)

  • घर में अखंड सुख-शांति और प्रेम: जहाँ माता लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ कभी कलह नहीं होती। यह पाठ परिवार के सदस्यों (विशेषकर पति-पत्नी) के बीच सामंजस्य, अगाध प्रेम और समझ (Understanding) विकसित करता है।

  • सुयोग्य संतान और उनका उज्ज्वल भविष्य: ‘संतान लक्ष्मी’ के स्वरूप की वंदना होने के कारण, निःसंतान दंपत्तियों को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है और बच्चों का भविष्य सुरक्षित व उज्ज्वल होता है।

  • समाज में अपार मान-सम्मान (Fame): व्यक्ति को न केवल धन मिलता है, बल्कि समाज में ‘कीर्ति’ (यश) भी प्राप्त होता है। लोग उसके आभामंडल से आकर्षित होते हैं।

मानसिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Spiritual Liberation)

  • तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: वित्तीय समस्याओं के कारण होने वाला भारी मानसिक तनाव और चिंता (Anxiety) इस स्तुति के गान से शांत होती है। मस्तिष्क को असीम शीतलता प्राप्त होती है।

  • हरि-भक्ति की प्राप्ति: माता लक्ष्मी कभी भी नारायण के बिना नहीं आतीं। लक्ष्मी जी की स्तुति करने वाले साधक को अंततः भगवान श्री हरि की शुद्ध भक्ति और वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

3. श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

माता लक्ष्मी की उपासना अत्यंत सौम्य, सात्विक, सुगंधित और सौंदर्य से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध सहस्त्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: माता लक्ष्मी की आराधना के लिए शुक्रवार (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है।

  • विशेष तिथियां: दीपावली (कार्तिक अमावस्या), शरद पूर्णिमा, धनतेरस, अक्षय तृतीया, और किसी भी मास की पूर्णिमा या शुक्ल पक्ष की पंचमी (श्री पंचमी) तिथि के दिन इस सहस्त्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) या ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के बाद का समय, जब माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं) होता है। मध्यरात्रि (निशीथ काल) में भी दीवाली के दिन इसका पाठ अमोघ है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव उत्तर (North – कुबेर और धन की दिशा) या पूर्व (East – ज्ञान की दिशा) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए गुलाबी (Pink), लाल (Red), पीले या रेशमी आसन का प्रयोग करें।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में गुलाबी, लाल, पीले या श्वेत रंग के स्वच्छ और इत्र लगे हुए वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र / यंत्र एक स्वच्छ चौकी पर लाल या गुलाबी रेशमी कपड़ा बिछाकर माता महालक्ष्मी (कमल पर विराजमान और स्वर्ण मुद्राएं गिराते हुए) का चित्र या पीतल/चांदी की मूर्ति स्थापित करें। साथ में श्री यंत्र (Shree Yantra) और कमलगट्टे (Lotus Seeds) अवश्य रखें। भगवान विष्णु का चित्र भी साथ होना चाहिए।
दीपक माता के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीपक (जिसमें लाल कलावे की बत्ती हो) प्रज्वलित करें। गुलाब या चंदन की सुगंधित धूप/अगरबत्ती जलाएं।
तिलक और शृंगार माता लक्ष्मी को कुमकुम, हल्दी और इत्र (गुलाब) अर्पित करें। उन्हें लाल या गुलाबी चुनरी ओढ़ाएं। स्वयं भी मस्तक पर कुमकुम या केसर का तिलक धारण करें।
पुष्प माता को कमल का फूल (Lotus) सर्वाधिक प्रिय है। यदि कमल न हो तो लाल गुलाब या गुड़हल के पुष्प अर्पित करें।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी या कुमकुम से रंगे हुए चावल) और एक लाल पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे जगन्माता महालक्ष्मी, मैं अपने जीवन से दरिद्रता, कर्जों व समस्त बाधाओं के नाश, अखंड स्थिर धन की प्राप्ति, और आपकी अहैतुकी कृपा के लिए श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम का 21/41 दिन तक (या प्रत्येक शुक्रवार) पाठ/अर्चन करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्त्रनाम का पाठ और कुमकुमार्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें (महालक्ष्मी की पूजा हमेशा गणेश जी के साथ ही होती है)।

  • भगवान विष्णु का मानसिक ध्यान करें।

  • माता लक्ष्मी के बीज मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” या सरल मंत्र “ॐ श्रीं श्रियै नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (कमलगट्टे की माला पर) जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और पूर्ण वात्सल्य के साथ ‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • कुमकुमार्चन / पुष्पार्चन (सबसे चमत्कारी उपाय): यदि आप विशेष आर्थिक संकट में हैं, तो सहस्त्रनाम के प्रत्येक नाम (जैसे- ॐ प्रकृत्यै नमः) के साथ श्री यंत्र या माता की मूर्ति पर चुटकी भर शुद्ध कुमकुम, अक्षत, या गुलाब की पंखुड़ी अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। यह अत्यंत शक्तिशाली और अचूक प्रयोग है।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद माता लक्ष्मी को उनके सबसे प्रिय व्यंजन गाय के दूध की खीर (मखाने और केसर युक्त), बताशे, अनार, सफेद मिष्ठान्न, या पंचामृत का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से माता की आरती (ॐ जय लक्ष्मी माता…) गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

माता लक्ष्मी परम पावनी और चंचला हैं; वे थोड़ी सी भी अशुद्धता या कलह वाले स्थान पर एक क्षण भी नहीं रुकतीं। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. स्त्रियों का सर्वोच्च सम्मान (The Ultimate Rule): माता लक्ष्मी संपूर्ण ब्रह्मांड की स्त्री-शक्ति का मूल हैं। जिस घर में महिलाओं (पत्नी, माता, बहन, पुत्री) का अपमान होता है, उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं, या उन पर हाथ उठाया जाता है, वहाँ माता लक्ष्मी कभी भी प्रवेश नहीं करतीं। स्त्रियों का सम्मान इस साधना की पहली शर्त है।

  2. घर में परम स्वच्छता (Absolute Cleanliness): गंदगी और अव्यवस्था ‘अलक्ष्मी’ को आकर्षित करती है। घर, विशेषकर पूजा कक्ष, रसोईघर और मुख्य द्वार हमेशा साफ और सुगंधित होना चाहिए। मकड़ी के जाले, सीलन और कबाड़ घर में नहीं होना चाहिए।

  3. पूर्ण सात्विक जीवन और आहार: अनुष्ठान के दौरान या नित्य पाठ करने वाले साधक को घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। तामसिक भोजन आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट कर देता है।

  4. सत्य और धर्म का आचरण: व्यापार या नौकरी में बेईमानी, धोखाधड़ी, रिश्वत या असत्य का सहारा लेकर कमाया गया धन माता लक्ष्मी की पूजा से कभी स्थिर नहीं होता। वह धन रोग और क्लेश लेकर आता है (जिसे ‘ब्लैक मनी’ या पाप की कमाई कहते हैं)। मेहनत और सत्य के मार्ग पर चलें।

  5. क्रोध और कलह का त्याग: जिस घर में सदस्य जोर-जोर से चिल्लाते हैं, बात-बात पर झगड़ा करते हैं, वहाँ माता लक्ष्मी नहीं टिकतीं। वाणी में मधुरता और हृदय में शांति बनाए रखें।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

माता लक्ष्मी की पूजा और श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई विपरीत प्रभाव न पड़े:

  • तुलसी दल का प्रयोग न करें: भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय है, परंतु माता लक्ष्मी की पूजा या उनके भोग में तुलसी के पत्तों (Tulsi leaves) का प्रयोग वर्जित माना गया है (गणेश जी और लक्ष्मी जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती)।

  • अकेले लक्ष्मी जी की पूजा से बचें: माता लक्ष्मी को हमेशा भगवान विष्णु या श्री गणेश जी के साथ ही पूजना चाहिए। केवल धन की देवी मानकर उनकी पूजा करने से वे ‘चंचला’ हो जाती हैं। नारायण के साथ पूजने से वे स्थिर रहती हैं।

  • काले कपड़ों का निषेध: माता लक्ष्मी की पूजा में काले (Black) या भूरे (Brown) रंग के वस्त्र पहनना या ऐसे रंग के आसन का प्रयोग करना सर्वथा वर्जित है।

  • शारीरिक पवित्रता: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक/पातक या स्त्रियों द्वारा मासिक धर्म के दौरान) में मूर्ति, यंत्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है।

  • दीपक का बुझना: कुमकुमार्चन या पाठ के बीच में घी का दीपक बुझना नहीं चाहिए। उसमें पर्याप्त घी डालकर रखें और वायु से बचाएं।

6. आधुनिक युग में श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘आर्थिक प्रतिस्पर्धा’ (Economic Competition), ‘ईएमआई (EMI) के बोझ’, ‘दिखावे (Show-off)’ और ‘मानसिक अस्थिरता’ का युग है। लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में दिन-रात भाग रहे हैं (Hustle Culture)। धन तो आ रहा है, लेकिन उस धन में ‘बरकत’ (Prosperity) नहीं है।

अत्यधिक लालच, धोखाधड़ी, और तनावपूर्ण नौकरियों ने आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression) और अनिद्रा का मरीज बना दिया है। लोगों के पास पैसा है, लेकिन घर में शांति और स्वास्थ्य नहीं है।

‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘वित्तीय तनाव’ (Financial Stress), ‘अस्थिरता’ और ‘अशांति’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है:

  1. ‘सात्विक धन’ का आगमन (Ethical Wealth): यह सहस्त्रनाम केवल बैंक बैलेंस नहीं बढ़ाता; यह आपको वह ‘सात्विक धन’ (Satvik Dhan) प्रदान करता है जो आपके घर में स्वास्थ्य, शांति और सुसंस्कार लेकर आता है। यह आपको बेईमानी के रास्ते से हटाकर सही दिशा में मेहनत करने की प्रेरणा देता है।

  2. मानसिक शांति और एबंडेंस माइंडसेट (Abundance Mindset): जब आप 1000 बार माता के ऐश्वर्य का गान करते हैं, तो आपके अवचेतन मन (Subconscious mind) से ‘कमी’ (Scarcity) का भाव मिट जाता है। आप डिप्रेशन से बाहर आकर अवसरों (Opportunities) को देखने लगते हैं। आपका माइंडसेट ‘एबंडेंस’ (प्रचुरता) का हो जाता है।

  3. कर्ज से मुक्ति (Financial Discipline): यह पाठ आपको अनावश्यक दिखावे और व्यर्थ के खर्चों से बचाता है, जिससे आप धीरे-धीरे अपने सभी कर्जों (Debts) से मुक्त होकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र (Financially Independent) हो जाते हैं।

  4. आभामंडल का चुंबकत्व (Magnetic Aura): इस पाठ से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक ऐसा आकर्षण आ जाता है कि कार्यक्षेत्र में लोग उस पर भरोसा करते हैं, जिससे व्यापारिक डील (Business deals) और नेटवर्किंग में स्वतः ही अपार सफलता मिलती है।

Shri Lakshmi Sahasranama (श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परम सौंदर्य, ऐश्वर्य और पालन-शक्ति का साक्षात आवाहन है, जिसके एक कटाक्ष (दृष्टि) मात्र से रंक भी राजा बन जाता है और दरिद्रता हमेशा के लिए भस्म हो जाती है। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, बिना किसी छल-कपट, और लालच के बिना (निष्काम भाव से) इस स्तुति का गान करता है, तो माता महालक्ष्मी उसके घर को साक्षात वैकुंठ बना देती हैं।

माता लक्ष्मी अत्यंत कृपालु, वात्सल्यमयी और अपने सच्चे भक्तों का हर प्रकार से पोषण करने वाली जगन्माता हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में बहुत अधिक आर्थिक संकट आ गया है, मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिल रही है, कर्ज का बोझ बढ़ गया है, और घर में अशांति है, तो शुक्रवार की शाम गुलाबी आसन पर बैठें, घी का अखंड दीपक जलाएं, श्री यंत्र स्थापित करें, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए (या कुमकुमार्चन करते हुए) अपनी ‘महालक्ष्मी माता’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि माता के इन पावन 1000 नामों ने आपके जीवन की सारी दरिद्रता, बाधाओं, और भयों को दूर कर दिया है, और साक्षात अष्टलक्ष्मी ने आपके जीवन को अपार सफलता, असीम शांति, स्थिर धन, और परम ऐश्वर्य के दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः!

श्री लक्ष्मी सहस्त्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम धन, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री माता महालक्ष्मी के 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इन नामों में माता के अष्टलक्ष्मी स्वरूपों (धन, धान्य, संतान, विद्या, विजय आदि) की शक्तियां समाहित हैं। इसका महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि यह स्तुति जीवन की बड़ी से बड़ी दरिद्रता, भारी कर्जों और दुर्भाग्य को दूर कर घर में अखंड और स्थिर धन-संपदा का वास कराती है।

2. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस सहस्त्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘भयंकर कर्ज (Debts) से मुक्ति’, ‘व्यापार व आय में वृद्धि’, और ‘घर में स्थिर लक्ष्मी का वास’ है। इसके नियमित पाठ और कुमकुमार्चन से अलक्ष्मी (दरिद्रता) घर से विदा हो जाती है, रुके हुए धन की प्राप्ति होती है, और परिवार में अपार सुख, शांति, और सामंजस्य (Harmony) स्थापित होता है।

3. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?

माता लक्ष्मी की आराधना के लिए ‘शुक्रवार’ (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है। दीपावली, धनतेरस, अक्षय तृतीया और पूर्णिमा के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या गोधूलि बेला (सूर्यास्त के बाद का समय) में स्नान के पश्चात, लाल या गुलाबी वस्त्र धारण कर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।

4. ‘कुमकुमार्चन’ क्या है और लक्ष्मी सहस्त्रनाम में इसका क्या महत्व है?

कुमकुमार्चन माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक/वैदिक उपाय है। इसमें साधक ‘श्री लक्ष्मी सहस्त्रनाम’ के प्रत्येक नाम (1000 नामों) के उच्चारण के साथ (जैसे ॐ प्रकृत्यै नमः) माता की मूर्ति या श्री यंत्र पर चुटकी भर शुद्ध कुमकुम (रोली) अर्पित करता है। यह प्रयोग आर्थिक संकटों को तत्काल दूर करने और किसी भी बड़ी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए अचूक माना गया है।

5. माता लक्ष्मी की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा नियम व निषेध क्या है?

माता लक्ष्मी की साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘स्त्रियों का सम्मान’ और ‘घर में परम स्वच्छता’ रखना है। जिस घर में महिलाओं का अपमान होता है या गंदगी होती है, वहां लक्ष्मी जी कभी नहीं टिकतीं। इसके अतिरिक्त, माता लक्ष्मी की पूजा में काले वस्त्र पहनना, उन्हें तुलसी दल (Tulsi leaves) अर्पित करना, और घर में कलह-क्लेश करना पूर्णतः निषिद्ध (मना) है। भगवान विष्णु और गणेश जी के बिना माता लक्ष्मी की पूजा अपूर्ण मानी जाती है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!