सनातन धर्म, वैदिक वांग्मय और विशेषकर वैष्णव परंपरा के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब कलियुग में साक्षात ईश्वर के दर्शन, त्वरित फल प्राप्ति, और जीवन के हर अभाव को मिटाने वाली सत्ता की बात आती है, तो शेषाचलम की सात पहाड़ियों (सप्तगिरि) पर विराजमान भगवान श्री वेङ्कटेश्वर (Lord Venkateswara) का स्मरण सर्वोपरि है। दक्षिण भारत में इन्हें अत्यंत प्रेम और श्रद्धा के साथ ‘तिरुपति बालाजी’, ‘श्रीनिवास’, ‘गोविंदा’ और ‘एडुकोंडालवाडु’ (सात पहाड़ियों के स्वामी) के नाम से जाना जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है— “कलौ वेङ्कटनायकः” (अर्थात् कलियुग में वेङ्कटेश्वर ही सर्वोच्च रक्षक और प्रत्यक्ष देव हैं)। भगवान श्री हरि विष्णु ने भृगु महर्षि के प्रहार और माता लक्ष्मी के वैकुंठ त्यागने के पश्चात, माता पद्मावती से विवाह करने और कलियुग में अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए तिरुमला की पहाड़ियों पर यह दिव्य अवतार लिया था।
जब मनुष्य का जीवन भयंकर आर्थिक संकटों, ऋणों (कर्जों) के बोझ, व्यापारिक असफलताॐ, रोगों और घोर मानसिक अशांति से घिर जाता है, तब भगवान वेङ्कटेश्वर की शरण में जाना साक्षात कलियुग के वैकुंठ का द्वार खोलने के समान है। भगवान श्रीनिवास की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत ऐश्वर्य, और उनकी परम वात्सल्यमयी करुणा को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए पुराणों (विशेषकर ब्रह्मांड और वराह पुराण) में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम’ (Shri Venkateswara Sahasranama) के नाम से जाना जाता है।
‘सहस्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा आध्यात्मिक कल्पवृक्ष है, जो जीवन की भयंकर से भयंकर दरिद्रता, दुर्भाग्य और प्रारब्ध के कठोर कर्मों को पल भर में भस्म कर देता है।
श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम हिंदी | Venkateswara Sahasranaam
ॐ श्री वेङ्कटेशाय नमः
ॐ विरूपाक्षाय नमः
ॐ विश्वेशाय नमः
ॐ विश्वभावनाय नमः
ॐ विश्वसृजे नमः
ॐ विश्वसंहर्त्रे नमः
ॐ विश्वप्राणाय नमः
ॐ विराड्वपुषे नमः
ॐ शेषाद्रिनिलयाय नमः
ॐ अशेषभक्तदुःखप्रणाशनाय नमः ॥ १० ॥
ॐ शेषस्तुत्याय नमः
ॐ शेषशायिने नमः
ॐ विशेषज्ञाय नमः
ॐ विभवे नमः
ॐ स्वभुवे नमः
ॐ विष्णवे नमः
ॐ जिष्णवे नमः
ॐ वर्धिष्णवे नमः
ॐ उत्सहिष्णवे नमः
ॐ सहिष्णुकाय नमः ॥ २० ॥
ॐ भ्राजिष्णवे नमः
ॐ ग्रसिष्णवे नमः
ॐ वर्तिष्णवे नमः
ॐ भरिष्णुकाय नमः
ॐ कालयन्त्रे नमः
ॐ कालगोप्त्रे नमः
ॐ कालाय नमः
ॐ कालान्तकाय नमः
ॐ अखिलाय नमः
ॐ कालगम्याय नमः ॥ ३० ॥
ॐ कालकण्ठवन्द्याय नमः
ॐ कालकलेश्वराय नमः
ॐ शम्भवे नमः
ॐ स्वयम्भुवे नमः
ॐ अम्भोजनाभाय नमः
ॐ स्तम्भितवारिधये नमः
ॐ अम्भोधिनन्दिनीजानये नमः
ॐ शोणाम्भोजपदप्रभाय नमः
ॐ कम्बुग्रीवाय नमः
ॐ शम्बरारिरूपाय नमः ॥ ४० ॥
ॐ शम्बरजेक्षणाय नमः
ॐ बिम्बाधराय नमः
ॐ बिम्बरूपिणे नमः
ॐ प्रतिबिम्बक्रियातिगाय नमः
ॐ गुणवते नमः
ॐ गुणगम्याय नमः
ॐ गुणातीताय नमः
ॐ गुणप्रियाय नमः
ॐ दुर्गुणध्वंसकृते नमः
ॐ सर्वसुगुणाय नमः ॥ ५० ॥
ॐ गुणभासकाय नमः
ॐ परेशाय नमः
ॐ परमात्मने नमः
ॐ परस्मैज्योतिषे नमः
ॐ परायैगतये नमः
ॐ परस्मैपदाय नमः
ॐ वियद्वासने नमः
ॐ पारम्पर्यशुभप्रदाय नमः
ॐ ब्रह्माण्डगर्भाय नमः
ॐ ब्रह्मण्याय नमः ॥ ६० ॥
ॐ ब्रह्मसृजे नमः
ॐ ब्रह्मबोधिताय नमः
ॐ ब्रह्मस्तुत्याय नमः
ॐ ब्रह्मवादिने नमः
ॐ ब्रह्मचर्यपरायणाय नमः
ॐ सत्यव्रतार्थसन्तुष्टाय नमः
ॐ सत्यरूपिणे नमः
ॐ झषाङ्गवते नमः
ॐ सोमकप्राणहारिणे नमः
ॐ आनीताम्नायाय नमः ॥ ७० ॥
ॐ अब्धिसञ्चराय नमः
ॐ देवासुरवरस्तुत्याय नमः
ॐ पतन्मन्दरधारकाय नमः
ॐ धन्वन्तरये नमः
ॐ कच्छपाङ्गाय नमः
ॐ पयोनिधिविमन्थकाय नमः
ॐ अमरामृतसन्धात्रे नमः
ॐ धृतसम्मोहिनीवपुषे नमः
ॐ हरमोहकमायाविने नमः
ॐ रक्षस्सन्दोहभञ्जनाय नमः ॥ ८० ॥
ॐ हिरण्याक्षविदारिणे नमः
ॐ यज्ञाय नमः
ॐ यज्ञविभावनाय नमः
ॐ यज्ञीयोर्वीसमुद्धर्त्रे नमः
ॐ लीलाक्रोडाय नमः
ॐ प्रतापवते नमः
ॐ दण्डकासुरविध्वंसिने नमः
ॐ वक्रदम्ष्ट्राय नमः
ॐ क्षमाधराय नमः
ॐ गन्धर्वशापहरणाय नमः ॥ ९० ॥
ॐ पुण्यगन्धाय नमः
ॐ विचक्षणाय नमः
ॐ करालवक्त्राय नमः
ॐ सोमार्कनेत्राय नमः
ॐ षड्गुणवैभवाय नमः
ॐ श्वेतघोणिने नमः
ॐ घूर्णितभ्रुवे नमः
ॐ घुर्घुरध्वनिविभ्रमाय नमः
ॐ द्राघीयसे नमः
ॐ नीलकेशिने नमः ॥ १०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ जाग्रदम्बुजलोचनाय नमः
ॐ घृणावते नमः
ॐ घृणिसम्मोहाय नमः
ॐ महाकालाग्निदीधितये नमः
ॐ ज्वालाकरालवदनाय नमः
ॐ महोल्काकुलवीक्षणाय नमः
ॐ सटानिर्भिण्णमेघौघाय नमः
ॐ दम्ष्ट्रारुग्व्याप्तदिक्तटाय नमः
ॐ उच्छ्वासाकृष्टभूतेशाय नमः
ॐ निश्श्वासत्यक्तविश्वसृजे नमः ॥ ११० ॥
ॐ अन्तर्भ्रमज्जगद्गर्भाय नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ ब्रह्मकपालहृते नमः
ॐ उग्राय नमः
ॐ वीराय नमः
ॐ महाविष्णवे नमः
ॐ ज्वलनाय नमः
ॐ सर्वतोमुखाय नमः
ॐ नृसिंहाय नमः
ॐ भीषणाय नमः ॥ १२० ॥
ॐ भद्राय नमः
ॐ मृत्युमृत्यवे नमः
ॐ सनातनाय नमः
ॐ सभास्तम्भोद्भवाय नमः
ॐ भीमाय नमः
ॐ शिरोमालिने नमः
ॐ महेश्वराय नमः
ॐ द्वादशादित्यचूडालाय नमः
ॐ कल्पधूमसटाच्छवये नमः
ॐ हिरण्यकोरस्थलभिन्नखाय नमः ॥ १३० ॥
ॐ सिंहमुखाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ प्रह्लादवरदाय नमः
ॐ धीमते नमः
ॐ भक्तसङ्घप्रतिष्ठिताय नमः
ॐ ब्रह्मरुद्रादिसंसेव्याय नमः
ॐ सिद्धसाध्यप्रपूजिताय नमः
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय नमः
ॐ देवेशाय नमः
ॐ ज्वालाजिह्वान्त्रमालिकाय नमः ॥ १४० ॥
ॐ खड्गिने नमः
ॐ खेटिने नमः
ॐ महेष्वासिने नमः
ॐ कपालिने नमः
ॐ मुसलिने नमः
ॐ हलिने नमः
ॐ पाशिने नमः
ॐ शूलिने नमः
ॐ महाबाहवे नमः
ॐ ज्वरघ्नाय नमः ॥ १५० ॥
ॐ रोगलुण्ठकाय नमः
ॐ मौञ्जीयुजे नमः
ॐ छात्रकाय नमः
ॐ दण्डिने नमः
ॐ कृष्णाजिनधराय नमः
ॐ वटवे नमः
ॐ अधीतवेदाय नमः
ॐ वेदान्तोद्धारकाय नमः
ॐ ब्रह्मनैष्ठिकाय नमः
ॐ अहीनशयनप्रीताय नमः ॥ १६० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ आदितेयाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ हरये नमः
ॐ संवित्प्रियाय नमः
ॐ सामवेद्याय नमः
ॐ बलिवेश्मप्रतिष्ठिताय नमः
ॐ बलिक्षालितपादाब्जाय नमः
ॐ विन्ध्यावलिविमानिताय नमः
ॐ त्रिपादभूमिस्वीकर्त्रे नमः
ॐ विश्वरूपप्रदर्शकाय नमः ॥ १७० ॥
ॐ धृतत्रिविक्रमाय नमः
ॐ स्वाङ्घ्रीनखभिन्नाण्डकर्पराय नमः
ॐ पज्जातवाहिनीधारापवित्रितजगत्त्रयाय नमः
ॐ विधिसम्मानिताय नमः
ॐ पुण्याय नमः
ॐ दैत्ययोद्ध्रे नमः
ॐ जयोर्जिताय नमः
ॐ सुरराज्यप्रदाय नमः
ॐ शुक्रमदहृते नमः
ॐ सुगतीश्वराय नमः ॥ १८० ॥
ॐ जामदग्न्याय नमः
ॐ कुठारिणे नमः
ॐ कार्तवीर्यविदारणाय नमः
ॐ रेणुकायाश्शिरोहारिणे नमः
ॐ दुष्टक्षत्रियमर्दनाय नमः
ॐ वर्चस्विने नमः
ॐ दानशीलाय नमः
ॐ धनुष्मते नमः
ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः
ॐ अत्युदग्राय नमः ॥ १९० ॥
ॐ समग्राय नमः
ॐ न्यग्रोधाय नमः
ॐ दुष्टनिग्रहाय नमः
ॐ रविवंशसमुद्भूताय नमः
ॐ राघवाय नमः
ॐ भरताग्रजाय नमः
ॐ कौसल्यातनयाय नमः
ॐ रामाय नमः
ॐ विश्वामित्रप्रियङ्कराय नमः
ॐ ताटकारये नमः ॥ २०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ सुबाहुघ्नाय नमः
ॐ बलातिबलमन्त्रवते नमः
ॐ अहल्याशापविच्छेदिने नमः
ॐ प्रविष्टजनकालयाय नमः
ॐ स्वयंवरसभासंस्थाय नमः
ॐ ईशचापप्रभञ्जनाय नमः
ॐ जानकीपरिणेत्रे नमः
ॐ जनकाधीशसंस्तुताय नमः
ॐ जमदग्नितनूजातयोद्ध्रे नमः
ॐ अयोध्याधिपाग्रण्ये नमः ॥ २१० ॥
ॐ पितृवाक्यप्रतीपालाय नमः
ॐ त्यक्तराज्याय नमः
ॐ सलक्ष्मणाय नमः
ॐ ससीताय नमः
ॐ चित्रकूटस्थाय नमः
ॐ भरताहितराज्यकाय नमः
ॐ काकदर्पप्रहर्ते नमः
ॐ दण्डकारण्यवासकाय नमः
ॐ पञ्चवट्यां विहारिणे नमः
ॐ स्वधर्मपरिपोषकाय नमः ॥ २२० ॥
ॐ विराधघ्ने नमः
ॐ अगस्त्यमुख्यमुनि सम्मानिताय नमः
ॐ पुंसे नमः
ॐ इन्द्रचापधराय नमः
ॐ खड्गधराय नमः
ॐ अक्षयसायकाय नमः
ॐ खरान्तकाय नमः
ॐ धूषणारये नमः
ॐ त्रिशिरस्करिपवे नमः
ॐ वृषाय नमः ॥ २३० ॥
ॐ शूर्पणखानासाच्छेत्त्रे नमः
ॐ वल्कलधारकाय नमः
ॐ जटावते नमः
ॐ पर्णशालास्थाय नमः
ॐ मारीचबलमर्दकाय नमः
ॐ पक्षिराट्कृतसंवादाय नमः
ॐ रवितेजसे नमः
ॐ महाबलाय नमः
ॐ शबर्यानीतफलभुजे नमः
ॐ हनूमत्परितोषिताय नमः ॥ २४० ॥
ॐ सुग्रीवाभयदाय नमः
ॐ दैत्यकायक्षेपणभासुराय नमः
ॐ सप्तसालसमुच्छेत्त्रे नमः
ॐ वालिहृते नमः
ॐ कपिसंवृताय नमः
ॐ वायुसूनुकृतासेवाय नमः
ॐ त्यक्तपम्पाय नमः
ॐ कुशासनाय नमः
ॐ उदन्वत्तीरगाय नमः
ॐ शूराय नमः ॥ २५० ॥
ॐ विभीषणवरप्रदाय नमः
ॐ सेतुकृते नमः
ॐ दैत्यघ्ने नमः
ॐ प्राप्तलङ्काय नमः
ॐ अलङ्कारवते नमः
ॐ अतिकायशिरश्छेत्त्रे नमः
ॐ कुम्भकर्णविभेदनाय नमः
ॐ दशकण्ठशिरोध्वंसिने नमः
ॐ जाम्बवत्प्रमुखावृताय नमः
ॐ जानकीशाय नमः ॥ २६० ॥
ॐ सुराध्यक्षाय नमः
ॐ साकेतेशाय नमः
ॐ पुरातनाय नमः
ॐ पुण्यश्लोकाय नमः
ॐ वेदवेद्याय नमः
ॐ स्वामितीर्थनिवासकाय नमः
ॐ लक्ष्मीसरःकेलिलोलाय नमः
ॐ लक्ष्मीशाय नमः
ॐ लोकरक्षकाय नमः
ॐ देवकीगर्भसम्भूताय नमः ॥ २७० ॥
ॐ यशोदेक्षणलालिताय नमः
ॐ वसुदेवकृतस्तोत्राय नमः
ॐ नन्दगोपमनोहराय नमः
ॐ चतुर्भुजाय नमः
ॐ कोमलाङ्गाय नमः
ॐ गदावते नमः
ॐ नीलकुन्तलाय नमः
ॐ पूतनाप्राणसंहर्त्रे नमः
ॐ तृणावर्तविनाशनाय नमः
ॐ गर्गारोपितनामाङ्काय नमः ॥ २८० ॥
ॐ वासुदेवाय नमः
ॐ अधोक्षजाय नमः
ॐ गोपिकास्तन्यपायिने नमः
ॐ बलभद्रानुजाय नमः
ॐ अच्युताय नमः
ॐ वैयाघ्रनखभूषाय नमः
ॐ वत्सजिते नमः
ॐ वत्सवर्धनाय नमः
ॐ क्षीरसाराशनरताय नमः
ॐ दधिभाण्डप्रमर्धनाय नमः ॥ २९० ॥
ॐ नवनीतापहर्त्रे नमः
ॐ नीलनीरदभासुराय नमः
ॐ आभीरदृष्टदौर्जन्याय नमः
ॐ नीलपद्मनिभाननाय नमः
ॐ मातृदर्शितविश्वास्याय नमः
ॐ उलूखलनिबन्धनाय नमः
ॐ नलकूबरशापान्ताय नमः
ॐ गोधूलिच्छुरिताङ्गकाय नमः
ॐ गोसङ्घरक्षकाय नमः
ॐ श्रीशाय नमः ॥ ३०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ बृन्दारण्यनिवासकाय नमः
ॐ वत्सान्तकाय नमः
ॐ बकद्वेषिणे नमः
ॐ दैत्याम्बुदमहानिलाय नमः
ॐ महाजगरचण्डाग्नये नमः
ॐ शकटप्राणकण्टकाय नमः
ॐ इन्द्रसेव्याय नमः
ॐ पुण्यगात्राय नमः
ॐ खरजिते नमः
ॐ चण्डदीधितये नमः ॥ ३१० ॥
ॐ तालपक्वफलाशिने नमः
ॐ कालीयफणिदर्पघ्ने नमः
ॐ नागपत्नीस्तुतिप्रीताय नमः
ॐ प्रलम्बासुरखण्डनाय नमः
ॐ दावाग्निबलसंहारिणे नमः
ॐ फलाहारिणे नमः
ॐ गदाग्रजाय नमः
ॐ गोपाङ्गनाचेलचोराय नमः
ॐ पाथोलीलाविशारदाय नमः
ॐ वंशगानप्रवीणाय नमः ॥ ३२० ॥
ॐ गोपीहस्ताम्बुजार्चिताय नमः
ॐ मुनिपत्न्याहृताहाराय नमः
ॐ मुनिश्रेष्ठाय नमः
ॐ मुनिप्रियाय नमः
ॐ गोवर्धनाद्रिसन्धर्त्रे नमः
ॐ सङ्क्रन्दनतमोपहाय नमः
ॐ सदुद्यानविलासिने नमः
ॐ रासक्रीडापरायणाय नमः
ॐ वरुणाभ्यर्चिताय नमः
ॐ गोपीप्रार्थिताय नमः ॥ ३३० ॥
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः
ॐ अक्रूरस्तुतिसम्प्रीताय नमः
ॐ कुब्जायौवनदायकाय नमः
ॐ मुष्टिकोरःप्रहारिणे नमः
ॐ चाणूरोदरदारणाय नमः
ॐ मल्लयुद्धाग्रगण्याय नमः
ॐ पितृबन्धनमोचकाय नमः
ॐ मत्तमातङ्गपञ्चास्याय नमः
ॐ कंसग्रीवानिकृन्तनाय नमः
ॐ उग्रसेनप्रतिष्ठात्रे नमः ॥ ३४० ॥
ॐ रत्नसिंहासनस्थिताय नमः
ॐ कालनेमिखलद्वेषिणे नमः
ॐ मुचुकुन्दवरप्रदाय नमः
ॐ साल्वसेवितदुर्धर्षराजस्मयनिवारणाय नमः
ॐ रुक्मिगर्वापहारिणे नमः
ॐ रुक्मिणीनयनोत्सवाय नमः
ॐ प्रद्युम्नजनकाय नमः
ॐ कामिने नमः
ॐ प्रद्युम्नाय नमः
ॐ द्वारकाधिपाय नमः ॥ ३५० ॥
ॐ मण्याहर्त्रे नमः
ॐ महामायाय नमः
ॐ जाम्बवत्कृतसङ्गराय नमः
ॐ जाम्बूनदाम्बरधराय नमः
ॐ गम्याय नमः
ॐ जाम्बवतीविभवे नमः
ॐ कालिन्दीप्रथितारामकेलये नमः
ॐ गुञ्जावतंसकाय नमः
ॐ मन्दारसुमनोभास्वते नमः
ॐ शचीशाभीष्टदायकाय नमः ॥ ३६० ॥
ॐ सत्राजिन्मानसोल्लासिने नमः
ॐ सत्याजानये नमः
ॐ शुभावहाय नमः
ॐ शतधन्वहराय नमः
ॐ सिद्धाय नमः
ॐ पाण्डवप्रियकोत्सवाय नमः
ॐ भद्रप्रियाय नमः
ॐ सुभद्रायाः भ्रात्रे नमः
ॐ नाग्नजितीविभवे नमः
ॐ किरीटकुण्डलधराय नमः ॥ ३७० ॥
ॐ कल्पपल्लवलालिताय नमः
ॐ भैष्मीप्रणयभाषावते नमः
ॐ मित्रविन्दाधिपाय नमः
ॐ अभयाय नमः
ॐ स्वमूर्तिकेलिसम्प्रीताय नमः
ॐ लक्ष्मणोदारमानसाय नमः
ॐ प्राग्ज्योतिषाधिपध्वंसिने नमः
ॐ तत्सैन्यान्तकराय नमः
ॐ अमृताय नमः
ॐ भूमिस्तुताय नमः ॥ ३८० ॥
ॐ भूरिभोगाय नमः
ॐ भूषणाम्बरसम्युताय नमः
ॐ बहुरामाकृताह्लादाय नमः
ॐ गन्धमाल्यानुलेपनाय नमः
ॐ नारदादृष्टचरिताय नमः
ॐ देवेशाय नमः
ॐ विश्वराजे नमः
ॐ गुरवे नमः
ॐ बाणबाहुविदाराय नमः
ॐ तापज्वरविनाशनाय नमः ॥ ३९० ॥
ॐ उपोद्धर्षयित्रे नमः
ॐ अव्यक्ताय नमः
ॐ शिववाक्तुष्टमानसाय नमः
ॐ महेशज्वरसंस्तुत्याय नमः
ॐ शीतज्वरभयान्तकाय नमः
ॐ नृगराजोद्धारकाय नमः
ॐ पौण्ड्रकादिवधोद्यताय नमः
ॐ विविधारिच्छलोद्विग्न ब्राह्मणेषु दयापराय नमः
ॐ जरासन्धबलद्वेषिणे नमः
ॐ केशिदैत्यभयङ्कराय नमः ॥ ४०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ चक्रिणे नमः
ॐ चैद्यान्तकाय नमः
ॐ सभ्याय नमः
ॐ राजबन्धविमोचकाय नमः
ॐ राजसूयहविर्भोक्त्रे नमः
ॐ स्निग्धाङ्गाय नमः
ॐ शुभलक्षणाय नमः
ॐ धानाभक्षणसम्प्रीताय नमः
ॐ कुचेलाभीष्टदायकाय नमः
ॐ सत्त्वादिगुणगम्भीराय नमः ॥ ४१० ॥
ॐ द्रौपदीमानरक्षकाय नमः
ॐ भीष्मध्येयाय नमः
ॐ भक्तवश्याय नमः
ॐ भीमपूज्याय नमः
ॐ दयानिधये नमः
ॐ दन्तवक्त्रशिरश्छेत्त्रे नमः
ॐ कृष्णाय नमः
ॐ कृष्णासखाय नमः
ॐ स्वराजे नमः
ॐ वैजयन्तीप्रमोदिने नमः ॥ ४२० ॥
ॐ बर्हिबर्हविभूषणाय नमः
ॐ पार्थकौरवसन्धानकारिणे नमः
ॐ दुश्शासनान्तकाय नमः
ॐ बुद्धाय नमः
ॐ विशुद्धाय नमः
ॐ सर्वज्ञाय नमः
ॐ क्रतुहिंसाविनिन्दकाय नमः
ॐ त्रिपुरस्त्रीमानभङ्गाय नमः
ॐ सर्वशास्त्रविशारदाय नमः
ॐ निर्विकाराय नमः ॥ ४३० ॥
ॐ निर्ममाय नमः
ॐ निराभासाय नमः
ॐ निरामयाय नमः
ॐ जगन्मोहकधर्मिणे नमः
ॐ दिग्वस्त्राय नमः
ॐ दिक्पतीश्वरायाय नमः
ॐ कल्किने नमः
ॐ म्लेच्छप्रहर्त्रे नमः
ॐ दुष्टनिग्रहकारकाय नमः
ॐ धर्मप्रतिष्ठाकारिणे नमः ॥ ४४० ॥
ॐ चातुर्वर्ण्यविभागकृते नमः
ॐ युगान्तकाय नमः
ॐ युगाक्रान्ताय नमः
ॐ युगकृते नमः
ॐ युगभासकाय नमः
ॐ कामारये नमः
ॐ कामकारिणे नमः
ॐ निष्कामाय नमः
ॐ कामितार्थदाय नमः
ॐ सवितुर्वरेण्याय भर्गसे नमः ॥ ४५० ॥
ॐ शार्ङ्गिणे नमः
ॐ वैकुण्ठमन्दिराय नमः
ॐ हयग्रीवाय नमः
ॐ कैटभारये नमः
ॐ ग्राहघ्नाय नमः
ॐ गजरक्षकाय नमः
ॐ सर्वसंशयविच्छेत्त्रे नमः
ॐ सर्वभक्तसमुत्सुकाय नमः
ॐ कपर्दिने नमः
ॐ कामहारिणे नमः ॥ ४६० ॥
ॐ कलायै नमः
ॐ काष्ठायै नमः
ॐ स्मृतये नमः
ॐ धृतये नमः
ॐ अनादये नमः
ॐ अप्रमेयौजसे नमः
ॐ प्रधानाय नमः
ॐ सन्निरूपकाय नमः
ॐ निर्लेपाय नमः
ॐ निस्स्पृहाय नमः ॥ ४७० ॥
ॐ असङ्गाय नमः
ॐ निर्भयाय नमः
ॐ नीतिपारगाय नमः
ॐ निष्प्रेष्याय नमः
ॐ निष्क्रियाय नमः
ॐ शान्ताय नमः
ॐ निष्प्रपञ्चाय नमः
ॐ निधये नमः
ॐ नयाय नमः
ॐ कर्मिणे नमः ॥ ४८० ॥
ॐ अकर्मिणे नमः
ॐ विकर्मिणे नमः
ॐ कर्मेप्सवे नमः
ॐ कर्मभावनाय नमः
ॐ कर्माङ्गाय नमः
ॐ कर्मविन्यासाय नमः
ॐ महाकर्मिणे नमः
ॐ महाव्रतिने नमः
ॐ कर्मभुजे नमः
ॐ कर्मफलदाय नमः ॥ ४९० ॥
ॐ कर्मेशाय नमः
ॐ कर्मनिग्रहाय नमः
ॐ नराय नमः
ॐ नारायणाय नमः
ॐ दान्ताय नमः
ॐ कपिलाय नमः
ॐ कामदाय नमः
ॐ शुचये नमः
ॐ तप्त्रे नमः
ॐ जप्त्रे नमः ॥ ५०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ अक्षमालावते नमः
ॐ गन्त्रे नमः
ॐ नेत्रे नमः
ॐ लयाय नमः
ॐ गतये नमः
ॐ शिष्टाय नमः
ॐ द्रष्ट्रे नमः
ॐ रिपुद्वेष्ट्रे नमः
ॐ रोष्ट्रे नमः
ॐ वेष्ट्रे नमः ॥ ५१० ॥
ॐ महानटाय नमः
ॐ रोद्ध्रे नमः
ॐ बोद्ध्रे नमः
ॐ महायोद्ध्रे नमः
ॐ श्रद्धावते नमः
ॐ सत्यधिये नमः
ॐ शुभाय नमः
ॐ मन्त्रिणे नमः
ॐ मन्त्राय नमः
ॐ मन्त्रगम्याय नमः ॥ ५२० ॥
ॐ मन्त्रकृते नमः
ॐ परमन्त्रहृते नमः
ॐ मन्त्रभृते नमः
ॐ मन्त्रफलदाय नमः
ॐ मन्त्रेशाय नमः
ॐ मन्त्रविग्रहाय नमः
ॐ मन्त्राङ्गाय नमः
ॐ मन्त्रविन्यासाय नमः
ॐ महामन्त्राय नमः
ॐ महाक्रमाय नमः ॥ ५३० ॥
ॐ स्थिरधिये नमः
ॐ स्थिरविज्ञानाय नमः
ॐ स्थिरप्रज्ञाय नमः
ॐ स्थिरासनाय नमः
ॐ स्थिरयोगाय नमः
ॐ स्थिराधाराय नमः
ॐ स्थिरमार्गाय नमः
ॐ स्थिरागमाय नमः
ॐ निश्श्रेयसाय नमः
ॐ निरीहाय नमः ॥ ५४० ॥
ॐ अग्नये नमः
ॐ निरवद्याय नमः
ॐ निरञ्जनाय नमः
ॐ निर्वैराय नमः
ॐ निरहङ्काराय नमः
ॐ निर्दम्भाय नमः
ॐ निरसूयकाय नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ अनन्तबाहूरवे नमः
ॐ अनन्ताङ्घ्रये नमः ॥ ५५० ॥
ॐ अनन्तदृशे नमः
ॐ अनन्तवक्त्राय नमः
ॐ अनन्ताङ्गाय नमः
ॐ अनन्तरूपाय नमः
ॐ अनन्तकृते नमः
ॐ ऊर्ध्वरेतसे नमः
ॐ ऊर्ध्वलिङ्गाय नमः
ॐ ऊर्ध्वमूर्ध्ने नमः
ॐ ऊर्ध्वशाखकाय नमः
ॐ ऊर्ध्वाय नमः ॥ ५६० ॥
ॐ ऊर्ध्वाध्वरक्षिणे नमः
ॐ ऊर्ध्वज्वालाय नमः
ॐ निराकुलाय नमः
ॐ बीजाय नमः
ॐ बीजप्रदाय नमः
ॐ नित्याय नमः
ॐ निदानाय नमः
ॐ निष्कृतये नमः
ॐ कृतिने नमः
ॐ महते नमः ॥ ५७० ॥
ॐ अणीयसे नमः
ॐ गरिम्णे नमः
ॐ सुषमाय नमः
ॐ चित्रमालिकाय नमः
ॐ नभःस्पृशे नमः
ॐ नभसो ज्योतिषे नमः
ॐ नभस्वते नमः
ॐ निर्नभसे नमः
ॐ नभसे नमः
ॐ अभवे नमः ॥ ५८० ॥
ॐ विभवे नमः
ॐ प्रभवे नमः
ॐ शम्भवे नमः
ॐ महीयसे नमः
ॐ भूर्भुवाकृतये नमः
ॐ महानन्दाय नमः
ॐ महाशूराय नमः
ॐ महोराशये नमः
ॐ महोत्सवाय नमः
ॐ महाक्रोधाय नमः ॥ ५९० ॥
ॐ महाज्वालाय नमः
ॐ महाशान्ताय नमः
ॐ महागुणाय नमः
ॐ सत्यव्रताय नमः
ॐ सत्यपराय नमः
ॐ सत्यसन्धाय नमः
ॐ सताङ्गतये नमः
ॐ सत्येशाय नमः
ॐ सत्यसङ्कल्पाय नमः
ॐ सत्यचारित्रलक्षणाय नमः ॥ ६०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ अन्तश्चराय नमः
ॐ अन्तरात्मने नमः
ॐ परमात्मने नमः
ॐ चिदात्मकाय नमः
ॐ रोचनाय नमः
ॐ रोचमानाय नमः
ॐ साक्षिणे नमः
ॐ शौरये नमः
ॐ जनार्दनाय नमः
ॐ मुकुन्दाय नमः ॥ ६१० ॥
ॐ नन्दनिष्पन्दाय नमः
ॐ स्वर्णबिन्दवे नमः
ॐ पुरन्दराय नमः
ॐ अरिन्दमाय नमः
ॐ सुमन्दाय नमः
ॐ कुन्दमन्दारहासवते नमः
ॐ स्यन्दनारूढचण्डाङ्गाय नमः
ॐ आनन्दिने नमः
ॐ नन्दनन्दाय नमः
ॐ अनसूयानन्दनाय नमः ॥ ६२० ॥
ॐ अत्रिनेत्रानन्दाय नमः
ॐ सुनन्दवते नमः
ॐ शङ्खवते नमः
ॐ पङ्कजकराय नमः
ॐ कुङ्कुमाङ्काय नमः
ॐ जयाङ्कुशाय नमः
ॐ अम्भोजमकरन्दाढ्याय नमः
ॐ निष्पङ्काय नमः
ॐ अगरुपङ्किलाय नमः
ॐ इन्द्राय नमः ॥ ६३० ॥
ॐ चन्द्ररथाय नमः
ॐ चन्द्राय नमः
ॐ अतिचन्द्राय नमः
ॐ चन्द्रभासकाय नमः
ॐ उपेन्द्राय नमः
ॐ इन्द्रराजाय नमः
ॐ वागीन्द्राय नमः
ॐ चन्द्रलोचनाय नमः
ॐ प्रतीचे नमः
ॐ पराचे नमः ॥ ६४० ॥
ॐ परस्मै धाम्ने नमः
ॐ परमार्थाय नमः
ॐ परात्पराय नमः
ॐ अपारवाचे नमः
ॐ पारगामिने नमः
ॐ पारावाराय नमः
ॐ परावराय नमः
ॐ सहस्वते नमः
ॐ अर्थदात्रे नमः
ॐ सहनाय नमः ॥ ६५० ॥
ॐ साहसिने नमः
ॐ जयिने नमः
ॐ तेजस्विने नमः
ॐ वायुविशिखिने नमः
ॐ तपस्विने नमः
ॐ तापसोत्तमाय नमः
ॐ ऐश्वर्योद्भूतिकृते नमः
ॐ भूतये नमः
ॐ ऐश्वर्याङ्गकलापवते नमः
ॐ अम्भोधिशायिने नमः ॥ ६६० ॥
ॐ भगवते नमः
ॐ सर्वज्ञाय नमः
ॐ सामपारगाय नमः
ॐ महायोगिने नमः
ॐ महाधीराय नमः
ॐ महाभोगिने नमः
ॐ महाप्रभवे नमः
ॐ महावीराय नमः
ॐ महातुष्टये नमः
ॐ महापुष्टये नमः ॥ ६७० ॥
ॐ महागुणाय नमः
ॐ महादेवाय नमः
ॐ महाबाहवे नमः
ॐ महाधर्माय नमः
ॐ महेश्वराय नमः
ॐ समीपगाय नमः
ॐ दूरगामिने नमः
ॐ स्वर्गमार्गनिरर्गलाय नमः ॥ ६८० ॥
ॐ नगाय नमः
ॐ नगधराय नमः
ॐ नागाय नमः
ॐ नागेशाय नमः
ॐ नागपालकाय नमः
ॐ हिरण्मयाय नमः
ॐ स्वर्णरेतसे नमः
ॐ हिरण्यार्चिषे नमः
ॐ हिरण्यदाय नमः
ॐ गुणगण्याय नमः
ॐ शरण्याय नमः
ॐ पुण्यकीर्तये नमः ॥ ६९० ॥
ॐ पुराणगाय नमः
ॐ जन्यभृते नमः
ॐ जन्यसन्नद्धाय नमः
ॐ दिव्यपञ्चायुधाय नमः
ॐ विशिने नमः
ॐ दौर्जन्यभङ्गाय नमः
ॐ पर्जन्याय नमः
ॐ सौजन्यनिलयाय नमः
ॐ अलयाय नमः
ॐ जलन्धरान्तकाय नमः ॥ ७०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ भस्मदैत्यनाशिने नमः
ॐ महामनसे नमः
ॐ श्रेष्ठाय नमः
ॐ श्रविष्ठाय नमः
ॐ द्राघिष्ठाय नमः
ॐ गरिष्ठाय नमः
ॐ गरुडध्वजाय नमः
ॐ ज्येष्ठाय नमः
ॐ द्रढिष्ठाय नमः
ॐ वर्षिष्ठाय नमः ॥ ७१० ॥
ॐ द्राघीयसे नमः
ॐ प्रणवाय नमः
ॐ फणिने नमः
ॐ सम्प्रदायकराय नमः
ॐ स्वामिने नमः
ॐ सुरेशाय नमः
ॐ माधवाय नमः
ॐ मधवे नमः
ॐ निर्णिमेषाय नमः
ॐ विधये नमः ॥ ७२० ॥
ॐ वेधसे नमः
ॐ बलवते नमः
ॐ जीवनाय नमः
ॐ बलिने नमः
ॐ स्मर्त्रे नमः
ॐ श्रोत्रे नमः
ॐ विकर्त्रे नमः
ॐ ध्यात्रे नमः
ॐ नेत्रे नमः
ॐ समाय नमः ॥ ७३० ॥
ॐ असमाय नमः
ॐ होत्रे नमः
ॐ पोत्रे नमः
ॐ महावक्त्रे नमः
ॐ रन्त्रे नमः
ॐ मन्त्रे नमः
ॐ खलान्तकाय नमः
ॐ दात्रे नमः
ॐ ग्राहयित्रे नमः
ॐ मात्रे नमः ॥ ७४० ॥
ॐ नियन्त्रे नमः
ॐ अनन्तवैभवाय नमः
ॐ गोप्त्रे नमः
ॐ गोपयित्रे नमः
ॐ हन्त्रे नमः
ॐ धर्मजागरित्रे नमः
ॐ धवाय नमः
ॐ कर्त्रे नमः
ॐ क्षेत्रकराय नमः
ॐ क्षेत्रप्रदाय नमः ॥ ७५० ॥
ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः
ॐ आत्मविदे नमः
ॐ क्षेत्रिणे नमः
ॐ क्षेत्रहराय नमः
ॐ क्षेत्रप्रियाय नमः
ॐ क्षेमकराय नमः
ॐ मरुते नमः
ॐ भक्तिप्रदाय नमः
ॐ मुक्तिदायिने नमः
ॐ शक्तिदाय नमः ॥ ७६० ॥
ॐ युक्तिदायकाय नमः
ॐ शक्तियुजे नमः
ॐ मौक्तिकस्रग्विणे नमः
ॐ सूक्तये नमः
ॐ आम्नायसूक्तिगाय नमः
ॐ धनञ्जयाय नमः
ॐ धनाध्यक्षाय नमः
ॐ धनिकाय नमः
ॐ धनदाधिपाय नमः
ॐ महाधनाय नमः ॥ ७७० ॥
ॐ महामानिने नमः
ॐ दुर्योधनविमानिताय नमः
ॐ रत्नाकराय नमः
ॐ रत्न रोचिषे नमः
ॐ रत्नगर्भाश्रयाय नमः
ॐ शुचये नमः
ॐ रत्नसानुनिधये नमः
ॐ मौलिरत्नभासे नमः
ॐ रत्नकङ्कणाय नमः
ॐ अन्तर्लक्ष्याय नमः ॥ ७८० ॥
ॐ अन्तरभ्यासिने नमः
ॐ अन्तर्ध्येयाय नमः
ॐ जितासनाय नमः
ॐ अन्तरङ्गाय नमः
ॐ दयावते नमः
ॐ अन्तर्मायाय नमः
ॐ महार्णवाय नमः
ॐ सरसाय नमः
ॐ सिद्धरसिकाय नमः
ॐ सिद्धये नमः ॥ ७९० ॥
ॐ साध्याय नमः
ॐ सदागतये नमः
ॐ आयुःप्रदाय नमः
ॐ महायुष्मते नमः
ॐ अर्चिष्मते नमः
ॐ ओषधीपतये नमः
ॐ अष्टश्रियै नमः
ॐ अष्टभागाय नमः
ॐ अष्टककुब्व्याप्तयशसे नमः
ॐ व्रतिने नमः ॥ ८०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ अष्टापदाय नमः
ॐ सुवर्णाभाय नमः
ॐ अष्टमूर्तये नमः
ॐ त्रिमूर्तिमते नमः
ॐ अस्वप्नाय नमः
ॐ स्वप्नगाय नमः
ॐ स्वप्नाय नमः
ॐ सुस्वप्नफलदायकाय नमः
ॐ दुस्स्वप्नध्वंसकाय नमः
ॐ ध्वस्तदुर्निमित्ताय नमः ॥ ८१० ॥
ॐ शिवङ्कराय नमः
ॐ सुवर्णवर्णाय नमः
ॐ सम्भाव्याय नमः
ॐ वर्णिताय नमः
ॐ वर्णसम्मुखाय नमः
ॐ सुवर्णमुखरीतीरशिव ध्यातपदाम्बुजाय नमः
ॐ दाक्षायणीवचस्तुष्टाय नमः
ॐ दुर्वासोदृष्टिगोचराय नमः
ॐ अम्बरीषव्रतप्रीताय नमः
ॐ महाकृत्तिविभञ्जनाय नमः ॥ ८२० ॥
ॐ महाभिचारकध्वंसिने नमः
ॐ कालसर्पभयान्तकाय नमः
ॐ सुदर्शनाय नमः
ॐ कालमेघश्यामाय नमः
ॐ श्रीमन्त्रभाविताय नमः
ॐ हेमाम्बुजसरस्नायिने नमः
ॐ श्रीमनोभाविताकृतये नमः
ॐ श्रीप्रदत्ताम्बुजस्रग्विणे नमः
ॐ श्रीकेलये नमः
ॐ श्रीनिधये नमः ॥ ८३० ॥
ॐ भवाय नमः
ॐ श्रीप्रदाय नमः
ॐ वामनाय नमः
ॐ लक्ष्मीनायकाय नमः
ॐ चतुर्भुजाय नमः
ॐ सन्तृप्ताय नमः
ॐ तर्पिताय नमः
ॐ तीर्थस्नातृसौख्यप्रदर्शकाय नमः
ॐ अगस्त्यस्तुतिसंहृष्टाय नमः
ॐ दर्शिताव्यक्तभावनाय नमः ॥ ८४० ॥
ॐ कपिलार्चिषे नमः
ॐ कपिलवते नमः
ॐ सुस्नाताघाविपाटनाय नमः
ॐ वृषाकपये नमः
ॐ कपिस्वामिमनोन्तस्थितविग्रहाय नमः
ॐ वह्निप्रियाय नमः
ॐ अर्थसम्भवाय नमः
ॐ जनलोकविधायकाय नमः
ॐ वह्निप्रभाय नमः
ॐ वह्नितेजसे नमः ॥ ८५० ॥
ॐ शुभाभीष्टप्रदाय नमः
ॐ यमिने नमः
ॐ वारुणक्षेत्रनिलयाय नमः
ॐ वरुणाय नमः
ॐ वारणार्चिताय नमः
ॐ वायुस्थानकृतावासाय नमः
ॐ वायुगाय नमः
ॐ वायुसम्भृताय नमः
ॐ यमान्तकाय नमः
ॐ अभिजननाय नमः ॥ ८६० ॥
ॐ यमलोकनिवारणाय नमः
ॐ यमिनामग्रगण्याय नमः
ॐ सम्यमिने नमः
ॐ यमभाविताय नमः
ॐ इन्द्रोद्यानसमीपस्थाय नमः
ॐ इन्द्रदृग्विषयाय नमः
ॐ प्रभवे नमः
ॐ यक्षराट्सरसीवासाय नमः
ॐ अक्षय्यनिधिकोशकृते नमः
ॐ स्वामितीर्थकृतावासाय नमः ॥ ८७० ॥
ॐ स्वामिध्येयाय नमः
ॐ अधोक्षजाय नमः
ॐ वराहाद्यष्टतीर्थाभिसेविताङ्घ्रिसरोरुहाय नमः
ॐ पाण्डुतीर्थाभिषिक्ताङ्गाय नमः
ॐ युधिष्ठिरवरप्रदाय नमः
ॐ भीमान्तःकरणारूढाय नमः
ॐ श्वेतवाहनसख्यवते नमः
ॐ नकुलाभयदाय नमः
ॐ माद्रीसहदेवाभिवन्दिताय नमः
ॐ कृष्णाशपथसन्धात्रे नमः ॥ ८८० ॥
ॐ कुन्तीस्तुतिरताय नमः
ॐ दमिने नमः
ॐ नारदादिमुनिस्तुत्याय नमः
ॐ नित्यकर्मपरायणाय नमः
ॐ दर्शिताव्यक्तरूपाय नमः
ॐ वीणानादप्रमोदिताय नमः
ॐ षट्कोटितीर्थचर्यावते नमः
ॐ देवतीर्थकृताश्रमाय नमः
ॐ बिल्वामलजलस्नायिने नमः
ॐ सरस्वत्यम्बुसेविताय नमः ॥ ८९० ॥
ॐ तुम्बुरूदकसंस्पर्शजनचित्ततमोपहाय नमः
ॐ मत्स्यवामनकूर्मादितीर्थराजाय नमः
ॐ पुराणभृते नमः
ॐ चक्रध्येयपदाम्भोजाय नमः
ॐ शङ्खपूजितपादुकाय नमः
ॐ रामतीर्थविहारिणे नमः
ॐ बलभद्रप्रतिष्ठिताय नमः
ॐ जामदग्न्यसरस्तीर्थजलसेचनतर्पिताय नमः
ॐ पापापहारिकीलालसुस्नाताघविनाशनाय नमः
ॐ नभोगङ्गाभिषिक्ताय नमः ॥ ९०० ॥
Venkateswara Sahasranaam (वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम)
ॐ नागतीर्थाभिषेकवते नमः
ॐ कुमारधारातीर्थस्थाय नमः
ॐ वटुवेषाय नमः
ॐ सुमेखलाय नमः
ॐ वृद्धस्यसुकुमारत्व प्रदाय नमः
ॐ सौन्दर्यवते नमः
ॐ सुखिने नमः
ॐ प्रियंवदाय नमः
ॐ महाकुक्षये नमः
ॐ इक्ष्वाकुकुलनन्दनाय नमः ॥ ९१० ॥
ॐ नीलगोक्षीरधाराभुवे नमः
ॐ वराहाचलनायकाय नमः
ॐ भरद्वाजप्रतिष्ठावते नमः
ॐ बृहस्पतिविभाविताय नमः
ॐ अञ्जनाकृतपूजावते नमः
ॐ आञ्जनेयकरार्चिताय नमः
ॐ अञ्जनाद्रिनिवासाय नमः
ॐ मुञ्जकेशाय नमः
ॐ पुरन्दराय नमः
ॐ किन्नरद्वन्द्वसम्बन्धिबन्धमोक्षप्रदायकाय नमः ॥ ९२० ॥
ॐ वैखानसमखारम्भाय नमः
ॐ वृषज्ञेयाय नमः
ॐ वृषाचलाय नमः
ॐ वृषकायप्रभेत्त्रे नमः
ॐ क्रीडनाचारसम्भ्रमाय नमः
ॐ सौवर्चलेयविन्यस्तराज्याय नमः
ॐ नारायणप्रियाय नमः
ॐ दुर्मेधोभञ्जकाय नमः
ॐ प्राज्ञाय नमः
ॐ ब्रह्मोत्सवमहोत्सुकाय नमः ॥ ९३० ॥
ॐ भद्रासुरशिरश्छेत्रे नमः
ॐ भद्रक्षेत्रिणे नमः
ॐ सुभद्रवते नमः
ॐ मृगयाक्षीणसन्नाहाय नमः
ॐ शङ्खराजन्यतुष्टिदाय नमः
ॐ स्थाणुस्थाय नमः
ॐ वैनतेयाङ्गभाविताय नमः
ॐ अशरीरवते नमः
ॐ भोगीन्द्रभोगसंस्थानाय नमः
ॐ ब्रह्मादिगणसेविताय नमः ॥ ९४० ॥
ॐ सहस्रार्कच्छटाभास्वद्विमानान्तःस्थिताय नमः
ॐ गुणिने नमः
ॐ विष्वक्सेनकृतस्तोत्राय नमः
ॐ सनन्दनपरीवृताय नमः
ॐ जाह्नव्यादिनदीसेव्याय नमः
ॐ सुरेशाद्यभिवन्दिताय नमः
ॐ सुराङ्गनानृत्यपराय नमः
ॐ गन्धर्वोद्गायनप्रियाय नमः
ॐ राकेन्दुसङ्काशनखाय नमः
ॐ कोमलाङ्घ्रिसरोरुहाय नमः ॥ ९५० ॥
ॐ कच्छपप्रपदाय नमः
ॐ कुन्दगुल्फकाय नमः
ॐ स्वच्छकूर्पराय नमः
ॐ मेदुरस्वर्णवस्त्राढ्यकटिदेशस्थमेखलाय नमः
ॐ प्रोल्लसच्छुरिकाभास्वत्कटिदेशाय नमः
ॐ शुभङ्कराय नमः
ॐ अनन्तपद्मजस्थाननाभये नमः
ॐ मौक्तिकमालिकाय नमः
ॐ मन्दारचाम्पेयमालिने नमः
ॐ रत्नाभरणसम्भृताय नमः ॥ ९६० ॥
ॐ लम्बयज्ञोपवीतिने नमः
ॐ चन्द्रश्रीखण्डलेपवते नमः
ॐ वरदाय नमः
ॐ अभयदाय नमः
ॐ चक्रिणे नमः
ॐ शङ्खिने नमः
ॐ कौस्तुभदीप्तिमते नमः
ॐ श्रीवत्साङ्कितवक्षस्काय नमः
ॐ लक्ष्मीसंश्रितहृत्तटाय नमः
ॐ नीलोत्पलनिभाकाराय नमः ॥ ९७० ॥
ॐ शोणाम्भोजसमाननाय नमः
ॐ कोटिमन्मथलावण्याय नमः
ॐ चन्द्रिकास्मितपूरिताय नमः
ॐ सुधास्वच्छोर्ध्वपुण्ड्राय नमः
ॐ कस्तूरीतिलकाञ्चिताय नमः
ॐ पुण्डरीकेक्षणाय नमः
ॐ स्वच्छाय नमः
ॐ मौलिशोभाविराजिताय नमः
ॐ पद्मस्थाय नमः
ॐ पद्मनाभाय नमः ॥ ९८० ॥
ॐ सोममण्डलगाय नमः
ॐ बुधाय नमः
ॐ वह्निमण्डलगाय नमः
ॐ सूर्याय नमः
ॐ सूर्यमण्डलसंस्थिताय नमः
ॐ श्रीपतये नमः
ॐ भूमिजानये नमः
ॐ विमलाद्यभिसंवृताय नमः
ॐ जगत्कुटुम्बजनित्रे नमः
ॐ रक्षकाय नमः ॥ ९९० ॥
ॐ कामितप्रदाय नमः
ॐ अवस्थात्रययन्त्रे नमः
ॐ विश्वतेजस्स्वरूपवते नमः
ॐ ज्ञप्तये नमः
ॐ ज्ञेयाय नमः
ॐ ज्ञानगम्याय नमः
ॐ ज्ञानातीताय नमः
ॐ सुरातिगाय नमः
ॐ ब्रह्माण्डान्तर्बहिर्व्याप्ताय नमः
ॐ वेङ्कटाद्रिगदाधराय नमः ॥ १००० ॥
॥ इति श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम संपूर्ण ॥
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
1. श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान सहस्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैष्णव दर्शन और ‘वेङ्कट-तत्व’ को समझने के लिए हमें भगवान के प्राकट्य, कुबेर ऋण की कथा और सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।
‘वेङ्कट’ शब्द का तात्विक और मनोवैज्ञानिक रहस्य
‘वेङ्कट’ शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है— ‘वेम्’ (पाप) और ‘कट’ (जलाने वाला/नष्ट करने वाला)। अर्थात्, वह पवित्र स्थान या वह ईश्वरीय सत्ता जो मनुष्य के करोड़ों जन्मों के संचित पापों को जलाकर राख कर दे, वही ‘वेङ्कटेश्वर’ हैं। जब साधक श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का गान करता है, तो उसके भीतर बैठे अज्ञान, अहंकार और पूर्व जन्मों के पापकर्म स्वतः ही भस्म होने लगते हैं, जिससे जीवन में आ रही रुकावटें (Blockages) दूर हो जाती हैं।
कुबेर के ऋण (Debt) का दार्शनिक अर्थ
पौराणिक कथाॐ के अनुसार, भगवान श्रीनिवास ने माता पद्मावती (लक्ष्मी स्वरूपा) से विवाह करने के लिए धन के देवता कुबेर से भारी ऋण (Loan) लिया था, जिसे वे कलियुग के अंत तक चुका रहे हैं। इसी कारण भक्त तिरुपति में अपार दान करते हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि भगवान स्वयं ऋण का बोझ उठाते हैं ताकि उनके भक्त कर्जों से मुक्त रह सकें। जो व्यक्ति वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का पाठ करता है, भगवान उसके जीवन के सभी भौतिक और कार्मिक ऋणों (Karmic Debts) को स्वयं चुका देते हैं और उसे पूर्ण स्वतंत्र कर देते हैं।
‘सहस्रनाम’ का नाद-विज्ञान (The Science of Sound Vibrations)
सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। भगवान बालाजी के ये हज़ार नाम वास्तव में 1000 ब्रह्मांडीय आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक पूर्ण लय और नाद के साथ इन नामों का गान करता है, तो उसके आभामंडल (Aura) में एक दिव्य सुनहरे (Golden) प्रकाश का निर्माण होता है। यह ऊर्जा चुंबक (Magnet) की तरह ब्रह्मांड से धन, सकारात्मकता और अवसरों को साधक की ओर खींचती है।
2. श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
भगवान वेङ्कटेश्वर साक्षात ऐश्वर्य, करुणा, मोक्ष और आनंद के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
आर्थिक, व्यापारिक और भौतिक लाभ (Wealth & Debt Relief)
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भयंकर कर्जों (Debts) से तुरंत मुक्ति: यह इस सहस्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष चमत्कार है। जो व्यक्ति भारी कर्जों के बोझ तले दबा हुआ है, ईएमआई (EMI) या व्यापारिक घाटे ने जिसे घेर लिया है, भगवान श्रीनिवास की स्तुति उसके लिए आय के नए और अप्रत्याशित स्रोत खोल देती है, जिससे कर्ज शीघ्र चुकता हो जाता है।
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अखंड सुख-समृद्धि और स्थिर लक्ष्मी (Wealth): जहाँ भगवान वेङ्कटेश्वर (श्रीनिवास) का स्मरण होता है, वहाँ माता पद्मावती (महालक्ष्मी) और माता भूदेवी स्थायी रूप से निवास करती हैं। यह पाठ घोर दरिद्रता (Poverty) का समूल नाश कर घर में अन्न और धन के भंडार भर देता है।
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व्यापार और करियर में अजेय उन्नति: नौकरी में प्रमोशन, व्यापार में वृद्धि या विदेश यात्रा (Foreign Travel) की कामना रखने वाले साधकों के लिए यह सहस्रनाम बंद दरवाजों को खोल देता है।
ज्योतिषीय और नवग्रह शांति (Astrological Benefits)
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शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से रक्षा: भगवान वेङ्कटेश्वर की आराधना करने वाले भक्तों को शनि देव कभी प्रताड़ित नहीं करते। शनि के दुष्प्रभावों, विशेषकर आर्थिक नुकसान और मानसिक कष्टों को शांत करने के लिए तिरुपति बालाजी की स्तुति अचूक है।
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राहु-केतु और सर्प दोष निवारण: चूँकि भगवान बालाजी सप्तगिरि (शेषनाग के सात फन) पर विराजमान हैं और उनके पीछे साक्षात आदिप्रकार का सर्प है, इसलिए कालसर्प दोष या राहु-केतु के कुप्रभाव इस पाठ से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ (Health & Mental Peace)
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तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: वित्तीय समस्याॐ के कारण होने वाला भारी मानसिक तनाव और चिंता (Anxiety) इस स्तुति के गान से शांत होती है। मस्तिष्क को असीम शीतलता प्राप्त होती है और ‘गोविंदा’ नाम के उच्चारण से हृदय गदगद हो जाता है।
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असाध्य रोगों से रक्षा: भगवान विष्णु का यह स्वरूप साक्षात धन्वंतरि भी है। इस पाठ से अभिमंत्रित जल के सेवन से गंभीर व्याधियों में चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ होता है।
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मोक्ष और वैकुंठ की प्राप्ति: भगवान बालाजी की स्तुति करने वाले साधक को अंततः भगवान श्री हरि की शुद्ध भक्ति और वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
3. श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
भगवान वेङ्कटेश्वर की उपासना अत्यंत राजसी (Royal), सात्विक, सुगंधित और पवित्र होती है। इस सिद्ध सहस्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान वेङ्कटेश्वर की आराधना के लिए शनिवार (Saturday – जिसे ‘स्थिरवार’ भी कहा जाता है, जो बालाजी का अत्यंत प्रिय दिन है) सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है। गुरुवार और शुक्रवार को भी पाठ किया जा सकता है।
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विशेष तिथियां: एकादशी (विशेषकर वैकुंठ एकादशी), ब्रह्मोत्सवम के दिन, पूर्णिमा, और अक्षय तृतीया के दिन इस सहस्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।
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समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) होता है, जब तिरुमला में भगवान का ‘सुप्रभातम्’ होता है। इसके अतिरिक्त गोधूलि बेला में भी इसका पाठ अमोघ है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East – ज्ञान के लिए) या उत्तर (North – समृद्धि के लिए) दिशा की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), सफेद या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में हल्के पीले, चंदन रंग या श्वेत (White) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
| सामग्री / विधान | विवरण |
| प्रतिमा / चित्र | एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान वेङ्कटेश्वर (तिरुपति बालाजी) का सुंदर चित्र या पीतल की मूर्ति (माता पद्मावती के साथ) स्थापित करें। यदि घर में शालिग्राम जी हों, तो उन्हें अवश्य विराजमान करें। |
| दीपक | भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। चंदन, मोगरा या कर्पूर की सात्विक धूप जलाएं। |
| तिलक और शृंगार | भगवान बालाजी को सफेद चंदन और कस्तूरी (या केसर/कुमकुम) का ऊर्ध्वपुण्ड्र (U-आकार का तिलक) लगाएं। स्वयं भी मस्तक पर पीला चंदन धारण करें। |
| पुष्प और तुलसी दल | उन्हें कमल के फूल (Lotus) या पीले पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। सबसे महत्वपूर्ण: भगवान विष्णु के स्वरूप होने के कारण पूजा में तुलसी दल (Tulsi leaves) का होना अनिवार्य है। |
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी से रंगे हुए पीले चावल) और एक पीला पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे सप्तगिरि के स्वामी श्रीनिवास, मैं अपने परिवार के समस्त पापों, कर्जों व दरिद्रता के नाश, अखंड सुख-समृद्धि, और आपकी अहैतुकी कृपा के लिए श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का नित्य (या 41 दिन तक) पाठ/अर्चन करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
स्तोत्र का पाठ और सहस्त्रार्चन विधि (Chanting Method & Archana)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का मानसिक ध्यान कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।
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माता पद्मावती, माता भूदेवी और अपने गुरुदेव का स्मरण करें।
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भगवान वेङ्कटेश्वर के सिद्ध मंत्र “ॐ नमो वेङ्कटेशाय” या “ॐ श्रीनिवासाम नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (तुलसी की माला पर) जप करें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और हृदय में ‘गोविंदा’ का ध्यान करते हुए ‘श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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सहस्त्रार्चन विधि (विशेष मनोकामना हेतु): यदि आप स्तोत्र के बजाय नामावली (प्रत्येक नाम के अंत में नमः लगाकर, जैसे- ॐ वेङ्कटेशाय नमः) का पाठ कर रहे हैं, तो प्रत्येक नाम के साथ भगवान के चित्र पर एक तुलसी दल, पीला पुष्प, या हल्दी से रंगे अक्षत अर्पित करें। यह 1000 बार किया जाता है और यह किसी भी बड़ी से बड़ी आर्थिक मनोकामना को पूर्ण करने का ब्रह्मास्त्र है।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान को तिरुपति में चढ़ने वाले भोग जैसी सात्विक वस्तुॐ का भोग लगाएं—जैसे दही-चावल (Daddojanam), इमली वाले चावल (Pulihora), लड्डू (Tirupati Laddu का स्मरण करते हुए बेसन/मोतीचूर का लड्डू), या गाय के दूध की खीर। भोग में तुलसी पत्र अवश्य डालें। अंत में कर्पूर से भगवान की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें। (मन ही मन ७ बार “गोविंदा गोविंदा” का जयघोष करें)।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
भगवान वेङ्कटेश्वर परम वैष्णव, सात्विकता और ऐश्वर्य की प्रतिमूर्ति हैं। तिरुमला में कठोर नियमों का पालन होता है, इसलिए घर पर भी इनकी साधना में हृदय की निर्मलता और आचरण की पवित्रता की आवश्यकता होती है:
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पूर्ण सात्विक जीवन (Pure Sattvic Diet): यह श्रीनिवास साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम है। जो व्यक्ति मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का सेवन करता है, उसकी पूजा भगवान बालाजी कभी स्वीकार नहीं करते। अनुष्ठान करने वाले के घर में पूर्ण सात्विकता होनी चाहिए।
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तुलसी की अनिवार्यता: भगवान को ‘तुलसी-प्रिय’ कहा जाता है। बिना तुलसी के वे छप्पन भोग भी ग्रहण नहीं करते। पूजा और नैवेद्य (भोग) में तुलसी का प्रयोग अनिवार्य है।
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सत्य और धर्म का आचरण (Ethical Wealth): भगवान वेङ्कटेश्वर धर्म के रक्षक हैं। यदि आप व्यापार या नौकरी में बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वत या धोखाधड़ी करते हैं, तो भगवान की कृपा कभी प्राप्त नहीं होगी। बेईमानी का धन वेङ्कटेश्वर के दरबार में टिकता नहीं है।
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हुंडी दान (Donation Concept): तिरुपति बालाजी के भक्त अपनी आय का एक छोटा सा हिस्सा (चाहे वह कितना भी हो) भगवान के नाम पर अलग रख देते हैं (जिसे ‘श्रीवारी हुंडी’ में डालना कहते हैं)। यह दान की भावना आपको धन के प्रति आसक्ति (Greed) से बचाती है।
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ब्रह्मचर्य का पालन: किसी विशेष मनोकामना के लिए अनुष्ठान (जैसे 41 दिन का मण्डल संकल्प) के दौरान शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई दोष न लगे:
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तुलसी तोड़ने के नियम: भगवान विष्णु/बालाजी की पूजा के लिए तुलसी अनिवार्य है, परंतु शास्त्रों के अनुसार— रविवार (Sunday), एकादशी, द्वादशी, और संध्याकाल (सूर्यास्त के बाद) तुलसी के पत्ते तोड़ना सर्वथा वर्जित है। पूजा के लिए तुलसी एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें (तुलसी कभी बासी नहीं होती)।
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अक्षत (चावल) का प्रयोग: भगवान की पूजा में पूर्ण रूप से सफेद चावल (अक्षत) नहीं चढ़ाने चाहिए। चावलों को हमेशा थोड़ी हल्दी या कुमकुम में रंगकर (पीला करके) ही अर्पित करें।
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शारीरिक पवित्रता (Sutak/Patak): बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक, पातक) में भगवान की मूर्ति या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाॐ को अपने मासिक धर्म के दौरान पूजा कक्ष में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
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अहंकार का त्याग: भगवान बालाजी राजाॐ के राजा हैं। उनकी साधना करते समय स्वयं को अत्यंत तुच्छ और उनका दास मानकर ही पाठ करें।
6. आधुनिक युग में श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘आर्थिक प्रतिस्पर्धा’ (Economic Competition), ‘ईएमआई (EMI) के बोझ’, ‘दिखावे (Show-off)’ और ‘मानसिक अस्थिरता’ का युग है। लोग भौतिक सुख-सुविधाॐ की अंधी दौड़ में दिन-रात भाग रहे हैं (Hustle Culture)। धन तो आ रहा है, लेकिन उस धन में शांति और ‘बरकत’ (Prosperity) नहीं है।
अत्यधिक लालच, कर्जे, और तनावपूर्ण नौकरियों ने आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression) और अनिद्रा का मरीज बना दिया है।
‘श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘वित्तीय तनाव’ (Financial Stress), ‘अहंकार’ और ‘अशांति’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है:
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कर्ज से मुक्ति (Financial Discipline): यह पाठ आपको अनावश्यक दिखावे और व्यर्थ के खर्चों से बचाता है। भगवान कुबेर के ऋण की कथा हमें वित्तीय अनुशासन सिखाती है, जिससे साधक धीरे-धीरे अपने सभी कर्जों (Debts) से मुक्त होकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है।
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‘सात्विक धन’ का आगमन (Ethical Wealth): यह सहस्रनाम केवल बैंक बैलेंस नहीं बढ़ाता; यह आपको वह ‘सात्विक धन’ प्रदान करता है जो आपके घर में स्वास्थ्य, शांति और सुसंस्कार लेकर आता है।
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समर्पण और तनावमुक्ति (Surrender & Relief): जब आप ‘श्रीनिवास’ की शरण में जाते हैं, तो आपके अवचेतन मन से यह बोझ उतर जाता है कि “सब कुछ मुझे ही नियंत्रित करना है”। “गोविंदा गोविंदा” का नाद आधुनिक तनाव और एंग्जायटी का सबसे बड़ा इलाज है।
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फोकस (Mental Clarity): 1000 नामों का लगातार उच्चारण एक अत्यंत उच्च कोटि का ‘माइंडफुलनेस’ (Mindfulness) अभ्यास है। यह मस्तिष्क के ‘ब्रेन फॉग’ को हटाकर एकाग्रता (Focus) को शिखर पर ले जाता है, जिससे आप अपने करियर में सही निर्णय ले पाते हैं।
Shri Venkateswara Sahasranama (श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस परम परमेश्वर, कलियुग के प्रत्यक्ष देव और साक्षात परब्रह्म नारायण का साक्षात आवाहन है, जिनके दरबार में राजा से लेकर रंक तक सभी सिर झुकाते हैं। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, सात्विकता और पवित्र हृदय से इस स्तुति का गान करता है, तो भगवान बालाजी उसके जीवन के सारे दुखों, कर्जों और पापों को अपने सुदर्शन चक्र से काट देते हैं।
भगवान श्री वेङ्कटेश्वर अत्यंत कृपालु, मोक्षदायिनी और अपने भक्तों के सभी दुखों को हरने वाले साक्षात करुणा-सागर हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में बहुत अंधकार है, घर में क्लेश है, भारी कर्जों ने आपको घेर लिया है, और मन अत्यंत अशांत है, तो शनिवार की सुबह पीले आसन पर बैठें, गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें, भगवान के चित्र पर तुलसी दल अर्पित करें, और पूर्ण हृदय से इस महास्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘गोविंदा’ को पुकारें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि श्रीनिवास के इन पावन नामों ने आपके जीवन की सारी मानसिक और भौतिक बाधाॐ को भस्म कर दिया है, और साक्षात भगवान बालाजी व माता पद्मावती ने आपके जीवन को अपार सफलता, सुख-समृद्धि, असीम शांति और परम हरि-भक्ति के दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ नमो वेङ्कटेशाय! गोविंदा गोविंदा!
श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?
श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम तिरुमला के स्वामी, भगवान श्री वेङ्कटेश्वर (तिरुपति बालाजी) के 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि कलियुग में भगवान बालाजी को प्रत्यक्ष देवता (Pratyaksha Daivam) माना गया है। यह स्तुति घोर दरिद्रता, भारी कर्जों, और प्रारब्ध के कठोर कर्मों को जड़ से मिटाकर व्यक्ति को अखंड सुख-समृद्धि और भगवान श्री हरि की शुद्ध भक्ति प्रदान करती है।
2. इस सहस्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?
इस स्तोत्र का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘भयंकर कर्जों (Debts) से तुरंत मुक्ति’ और ‘स्थिर लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति’ है। इसके नियमित पाठ से व्यापार में अपार वृद्धि होती है, शनि की साढ़ेसाती के कष्ट शांत होते हैं, असाध्य रोगों में चमत्कारिक आरोग्य प्राप्त होता है, और व्यक्ति को मानसिक तनाव से पूर्णतः मुक्ति मिलती है।
3. श्री वेङ्कटेश्वर सहस्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन सर्वोत्तम है?
भगवान वेङ्कटेश्वर की आराधना के लिए ‘शनिवार’ (Saturday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रिय माना जाता है (इसे स्थिरवार भी कहते हैं)। एकादशी, अक्षय तृतीया, और पूर्णिमा के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में पीले या सफेद वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
4. ‘सहस्रार्चन’ विधि क्या है और बालाजी की पूजा में इसका क्या प्रयोग है?
सहस्रार्चन विधि में भगवान के 1000 नामों की नामावली का पाठ किया जाता है (प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगता है, जैसे- ॐ श्रीनिवासाय नमः)। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ भगवान बालाजी के चित्र या शालिग्राम पर एक ‘तुलसी पत्र’, पीला फूल, या हल्दी से रंगे अक्षत (चावल) चढ़ाए जाते हैं। यह किसी भी आर्थिक संकट को दूर करने और बड़ी मनोकामना को पूर्ण करने का सबसे तीव्र और अमोघ उपाय है।
5. भगवान वेङ्कटेश्वर की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा नियम क्या है?
बालाजी की साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘पूर्ण सात्विकता’ और ‘तुलसी दल का प्रयोग’ है। जो व्यक्ति मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन करता है, उसकी पूजा भगवान कभी स्वीकार नहीं करते। इसके अतिरिक्त, भगवान को अर्पित किए जाने वाले हर नैवेद्य (भोग) में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य है। सत्य का आचरण, ईमानदारी की कमाई, और अहंकार का त्याग इस साधना के मूलभूत नियम हैं।