Shri Uchchhishta Ganapati Sahasranama Stotra (मन्त्रमहार्णवान्तर्गतम्): Lyrics in Sanskrit, तांत्रिक गणपति की महास्तुति, सिद्ध पाठ विधि और अकल्पनीय लाभIt takes 18 minutes... to read this article !

सनातन धर्म के तंत्र शास्त्र और आगम ग्रंथों में भगवान श्री गणेश को परब्रह्म और संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा का आदि-स्रोत माना गया है। भगवान गणेश के 32 प्रमुख स्वरूपों में से सबसे रहस्यमयी, उग्र, जाग्रत और शीघ्र फल प्रदान करने वाला स्वरूप ‘श्री उच्छिष्ट गणपति’ (Shri Uchchhishta Ganapati) का है।

जब हम उच्छिष्ट गणपति की तांत्रिक साधना की बात करते हैं, तो परम प्रामाणिक ग्रंथ ‘मन्त्रमहार्णव’ (Mantramaharnava) का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है। इस महान तांत्रिक ग्रंथ में भगवान उच्छिष्ट गणपति की उपासना के लिए जो अमोघ अस्त्र प्रदान किया गया है, वह है— ‘श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र’ (Shri Uchchhishta Ganapati Sahasranama Stotra)

जब जीवन में चारों ओर से अंधकार छा जाए, भयंकर कर्ज (Debt) से बाहर निकलने का कोई रास्ता न बचे, शत्रु हर कदम पर विनाश की योजना बना रहे हों, और भयंकर तांत्रिक बाधाओं ने परिवार की सुख-शांति छीन ली हो, तब इस तांत्रिक सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ साधक को रंक से राजा बनाने की क्षमता रखता है।

इस अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि ‘मन्त्रमहार्णव’ ग्रंथ क्या है, उच्छिष्ट गणपति के इस विशिष्ट स्तोत्र का रहस्य क्या है, इसके पाठ से जीवन में कौन से चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं, और इस महास्तोत्र को सिद्ध करने की प्रामाणिक तांत्रिक विधि क्या है।

‘मन्त्रमहार्णव’ ग्रंथ और उच्छिष्ट गणपति का तांत्रिक रहस्य

‘मन्त्रमहार्णव’ (Mantramaharnava) तंत्र और मंत्र शास्त्र का एक अत्यंत विशाल और प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसकी रचना श्री माधव राय वैद्य द्वारा की गई थी। ‘महार्णव’ का अर्थ है ‘महान महासागर’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ तांत्रिक मंत्रों, यंत्रों, स्तोत्रों और साधना विधियों का एक अथाह सागर है। इसी ग्रंथ के अंतर्गत भगवान उच्छिष्ट गणपति के इस महाशक्तिशाली सहस्रनाम स्तोत्र का वर्णन मिलता है।

‘उच्छिष्ट’ का तांत्रिक और दार्शनिक अर्थ: सामान्य भाषा में ‘उच्छिष्ट’ का अर्थ होता है ‘जूठा’ (Leftover या Tasted)। सनातन धर्म की सामान्य (वैदिक) पूजा पद्धति में जूठे मुँह भगवान का नाम लेना घोर पाप माना जाता है। परंतु ‘वाम मार्ग’ (Tantric Left-Hand Path) की साधना में भगवान उच्छिष्ट गणपति की उपासना ‘जूठे मुँह’ ही की जाती है।

साधक अपने मुँह में पान का पत्ता, लौंग, इलायची या प्रसाद चबाते हुए भगवान का ध्यान और पाठ करता है। इसके पीछे का आध्यात्मिक दर्शन यह है कि परब्रह्म के लिए पवित्र (Pure) और अपवित्र (Impure) का कोई द्वैत (Duality) नहीं है। जब साधक इस द्वैत भाव से मुक्त हो जाता है, तभी वह ब्रह्मांड की उस चरम ऊर्जा को प्राप्त कर सकता है जिसे ‘उच्छिष्ट गणपति’ कहा गया है।

स्तोत्र और नामावली में मूल अंतर

तंत्र साधना में शब्दों की लय (Rhythm) का बहुत महत्व है।

  • नामावली (Namavali): इसमें भगवान के प्रत्येक नाम को अलग-अलग बीज मंत्र की तरह बोला जाता है (जैसे- ॐ उग्ररूपाय नमः) और इसका प्रयोग फूल या आहुति चढ़ाने (अर्चन) के लिए किया जाता है।

  • स्तोत्र (Stotra): ‘श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र’ में भगवान के 1000 नामों को श्लोकों (संस्कृत छंदों) के रूप में अत्यंत सुंदरता से गूंथा गया है। इसे बिना रुके, एक विशेष लय और नाद (Sound Vibration) के साथ पढ़ा या सुना जाता है। स्तोत्र का सस्वर पाठ करने से साधक के शरीर के सातों चक्र (मूलाधार से सहस्रार तक) ऊर्जा से स्पंदित होने लगते हैं।

Shri Uchchhishta Ganapati Sahasranama Stotra (मन्त्रमहार्णवान्तर्गतम्) | (श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र: संस्कृत स्तुति)

(नोट: मन्त्रमहार्णव में वर्णित यह सहस्रनाम स्तोत्र अत्यंत गोपनीय और विशुद्ध तांत्रिक है। तंत्र शास्त्र के नियमानुसार, संपूर्ण 1000 नामों के श्लोकों का पाठ किसी योग्य गुरु के निर्देशन में या प्रामाणिक तांत्रिक ग्रंथ से देखकर ही करना चाहिए। यहाँ इस स्तोत्र का सिद्ध ध्यान श्लोक और मूल शीर्षक प्रस्तुत किया जा रहा है।)

॥ श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र (मन्त्रमहार्णवान्तर्गतम्) ॥

विनियोग (Viniyoga): अस्य श्री उच्छिष्टगणपति सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य, भार्गव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री उच्छिष्टगणपतिर्देवता, मम सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

ध्यानम् (Dhyana Shloka): सहस्रनाम स्तोत्र का आरंभ करने से पूर्व साधक को अपनी आँखें बंद करके लाल या नीले पुष्प हाथ में लेकर भगवान के इस प्रचंड स्वरूप का ध्यान करना चाहिए:

सिन्दूरवर्णमभयं वरदं च हस्तैर्- बीजापूरकमिक्षुकार्मुक-शरं पाशाङ्कुशौ सन्दधत्। वामाङ्गे मधुमत्-कपाल-कलशां देवीं तडित्सन्निभां आलिङ्गन्तमुदेत्युमा-सुत-महं वन्दे गणेशं परम्॥

(अर्थ: जिनका वर्ण सिंदूर के समान लाल है, जो अपने हाथों में अभय मुद्रा, वर मुद्रा, अनार (बीजापूरक), गन्ने का धनुष, बाण, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं। जिनके वाम (बाएं) भाग में अमृत से भरे कपाल (कलश) को धारण करने वाली और बिजली के समान चमकने वाली शक्ति (देवी) विराजमान हैं, जिन्हें वे आलिंगन किए हुए हैं, ऐसे माता उमा (पार्वती) के परम पुत्र भगवान श्री गणेश की मैं वंदना करता हूँ।)

(ध्यान के पश्चात् मन्त्रमहार्णव में वर्णित 1000 नामों वाले श्लोकों का लयबद्ध सस्वर पाठ किया जाता है।)

उच्छिष्टगणेशसहस्रनामस्तोत्रम् २

श्रीभैरव उवाच ।

श‍ृणु देवि रहस्यं मे यत्पुरा सूचितं मया ।
तव भक्त्या गणेशस्य वक्ष्ये नामसहस्रकम् ॥ १॥

देव्युवाच ।

ॐ भगवन्गणनाथस्थ उच्छिष्टस्य महात्मनः ।
श्रोतुं नामसहस्रं मे हदयं चोत्सुकायते ॥ २॥

भैरव उवाच ।

प्राङ्मुख त्रिपुरानाथे जातविघ्नाकुले शिवे ।
मोहने मुच्यते चेतस्ते सवे बलदर्पिताः ॥ ३॥

तदा प्रभुं गणाध्यक्षं स्तुत्वा नामसहस्रकम् ।
विघ्ना दूरात्यपलायते कालरुद्रादिव प्रजाः ॥ ४॥

तस्यानुग्रहतो देवि जातोऽहं त्रिपुरान्तकः ।
तमद्यापि गणेशानं स्तात्रं नामसहस्रकैः ॥ ५॥

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तमेव तव भक्त्याहं साधकानां हिताय च ।
महागणपतेर्वक्ष्ये दिव्यं नामसहस्रकम् ॥ ६॥

विनियोगः

ॐ अस्य श्रीउच्छिष्टगणेश सहस्रनामस्तोत्र मन्त्रस्य श्रीभैरव ऋषिः । गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपतिर्देवता ।
गं बीजम् । ह्रीं शक्तिः । कुरुकुरु कीलकम् । मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।

मूल पाठ 

ॐ ह्रीं श्रीं श्रीगणाध्यक्षो ग्लौं गं गणपतिर्गुणी ।
गुणाढ्यो निर्गुणो गोप्ता गजवक्त्रो विभावसुः ॥ ७॥

विश्वेश्वरो विभादीप्तो दीपनो धीवरो धनी ।
सदाशान्तो जगत्त्राता विश्वावर्तो विभाकरः ॥ ८॥

विश्रम्भी विजयो वैद्यो वारान्निधिरनुत्तमः ।
अणिमाविभवः श्रेष्ठो ज्येष्ठो गाथाप्रियो गुरुः ॥ ९॥

सृष्टिकर्ता जगद्धर्ता विश्वभर्ता जगन्निधिः ।
पतिः पीतविभूषाङ्को रक्तास्यो लोहिताम्बरः ॥ १०॥

द्विपाक्षोच्चविमानस्थो विनयः सदयः सुखी ।
सुरूपः सात्त्विकः सत्यः शुद्धः शङ्करनन्दनः ॥ ११॥

नन्दीश्वरो जयानन्दी बन्धस्तुत्यो विचक्षणः ।
दैत्यमर्द्दी सदाक्षीवो मदिरारुणलोचनः ॥ १२॥

सरात्मा विश्वासारश्च विश्वधारो विलेपनः ।
परं ब्रह्म परं ज्योतिः साक्षी त्र्यक्षो त्रिकस्थितः ॥ १३॥

विश्वेश्वरो वीरहर्ता सौभाग्यो भाग्यवर्द्धनः ।
भृङ्गीरिटी भृङ्गमाली भृङ्गकूजितनादितः ॥ १४॥

विवर्तको विनीतोऽपि नयनानन्दनार्चितः ।
गङ्गाजलपानप्रियो गङ्गातीरविहारणः ॥ १५॥

गङ्गाप्रियो गङ्गजश्च वाहनानि पुरः सदा ।
गन्धमादनसंवासो गन्धमादनकेलिकृत ॥ १६॥

गन्धानुलिप्तपूर्वाङ्गः सर्वदेवस्मरः सदा ।
गन्धर्वगणराजेशो गन्धर्वगणसेवितः ॥ १७॥

गन्धर्वपूजितो नित्यं सर्वरोगविनाशकः ।
गन्धर्वगणसंसेव्यो गन्धर्ववरदायकः ॥ १८॥

गन्धर्वो गन्धमातङ्गो गन्धर्वकुलदैवतः ।
गन्धर्वगर्वसंवेगो गन्धर्ववरदायकः ॥ १९॥

गन्धर्वप्रवलाः सत्वं गन्धर्वगणसंयुतः ।
गन्धर्वादिगुणानन्दो नन्दोऽनन्तगुणात्मकः ॥ २०॥

विश्वमूर्तिर्विश्वधाता विनतास्यो विनर्तकः ।
करालः कामदः कान्तः कमनीयः कलानिधिः ॥ २१॥

कारुण्यरूपः कुटिलः कुलाचारी कुलेश्वरः ।
विकरालो रणः श्रेष्ठः संहारो हारभूषणः ॥ २२॥

ऊरूरम्यमुखो रक्तो देवतादयितो रसः ।
महाकालो महादंष्ट्रो महोरगभयानकः ॥ २३॥

उन्मत्तरूपः कालाग्निरग्निसूर्येन्दुलोचनः ।
सितास्यश्चासितात्मा भैरवसौभाग्यवान्भगः ॥ २४॥

भर्गात्मजो भगावासो भगदो भगवर्द्धनः ।
शुभङ्करः शुचिः शान्तः श्रेष्ठः श्रव्यः शचीपतिः ॥ २५॥

वेदाद्यो वेदकर्ता च वेदवेद्यः सनातनः ।
विद्याप्रदो वेदरसो वैदिको वेदपारगः ॥ २६॥

वेदध्वनिरतो वीरो वेदवेदाङ्गस्वर्थवित् ।
तत्वज्ञः सर्वगः साधुः सदयः सदसन्मयः ॥ २७॥

शिवङ्करः शिवसुतः शिवानन्दविवर्द्धनः ।
सैन्यः श्वेतः शतमुखो मुग्धो मोदकभञ्जनः ॥ २८॥

देवदेवो दिनकरो धृतिमान्द्युतिमान्धनः ।
शुद्धात्मा शुद्धमतिमाञ्शुद्धदीपति: शुचिव्रतः ॥ २९॥

शरण्यः शौनकः शूरः शब्ददम्भी जटोरुकः ।
दारकः शिखिवाहेष्टः सितः शङ्करवल्लभः ॥ ३०॥

शङ्करो निर्भयो नित्यो लयकृल्लास्यतत्परः ।
लूतो लीलारसोल्लासी विलासी विभ्रमो भ्रमः ॥ ३१॥

भ्रमणः शशिभृत्सूर्यः शनिर्धरणिनन्दनः ।
बुधो विबुधसेव्यश्च बुधराजो बलन्धरः ॥ ३२॥

जीवो जीवप्रदो जेता स्तुत्यो नित्यो रतिप्रियः ।
कविः काव्यार्थकुशलो जनरक्षणतत्परः ॥ ३३॥

जनानन्दप्रदाता च जनकाह्लादकारकः ।
गच्छो गणपतिर्गच्छनायको गच्छगर्वहा ॥ ३४॥

गच्छराजोऽथ गच्छेशो गच्छराजनमस्कृतः ।
गच्छप्रियो गच्छगुरुर्गच्छत्राकृद्यमातुरः ॥ ३५॥

गच्छप्रभुर्गच्छचरो गच्छप्रियकृतोद्यमः ।
गच्छगीतगुणो गर्तो मर्यादाप्रतिपालकः ॥ ३६॥

गीर्वाणागमसारश्च नभो गीर्वाणदेवता ।
सम्पत्तिसदनाकारः सम्पत्तिसुखदायकः ॥ ३७॥

सम्पत्तिसुखकर्ता च सम्पत्तिसुभगाननः ।
सम्पत्तिशुभदो नित्यं सम्पत्तिश्च तपोधनः ॥ ३८॥

रुचको मेचकस्तुष्टः प्रभुस्तोमरघातकः ।
दण्डी चण्डांशुरव्यक्तः कमण्डलुधरोऽनघः ॥ ३९॥

कामी कर्मरतः कालकोलः क्रन्दितदिक्तटः ।
भ्रामको जातिपूज्यश्च जाड्यहा जडसूदनः ॥ ४०॥

जालन्धरो जगद्धासी हासकृद्गहनो गुहः ।
हविष्मान्हव्यवाहाक्षो हाटको हाटकाङ्गदः ॥ ४१॥

सुमेरुर्हिमवान्होता हरपुत्रो हलाङ्कपः ।
हालाप्रियो हृदा शान्तः कान्ताहृदयपोषणः ॥। ४२॥

शोषणः क्लेशहा क्रूरः कुबेरः कविताकृतिः ।
कुबेरो धीमयो धाता ध्येयो धीमान्दयानिधिः ॥ ४३॥

दविष्ठो दमनो हृष्टो दाता त्राता सितासमः ।
निर्गतो नैगमो गम्यो निर्जयो जटिलोऽजरः ॥ ४४॥

जनजीवो जितारातिर्जगद्व्यापी जगन्मयः ।
चामीकरनिभो नाभ्यो नलिनायतलोचनः ॥ ४५॥

रोचनामोचको मन्त्री मन्त्रकोटिसमाश्रितः ।
पञ्चभूतात्मकः पञ्चसायकः पञ्चवक्त्रकः ॥ ४६॥

पञ्चमः पश्चिमः पूर्वः पूर्णः कीर्णालकः कुणिः ।
कठोरहृदयग्रीवोऽलङ्कृतो ललिताशयः ॥ ४७॥

लोलचित्तो बृहन्नासो मासपक्षर्तुरूपवान् ।
ध्रुवो द्रुतगतिर्बन्धो धर्मवान्किंप्रियो नलः ॥ ४८॥

अगस्त्यग्रस्तभुवनो भुवनैकमलापहः ।
सागरः स्वर्गतिः स्वक्षः सानन्दः साधुपूजितः ॥ ४९॥

सतीपतिः समरसः सनकः सरलः सरः ।
सुरप्रियो वसुमतिर्वासवो वसुपूजितः ॥ ५०॥

वित्तदो वित्तनाथश्च धनिनां धनदायकः ।
राजीवनयनः स्मर्ता स्मृतिहा कृत्तिकाम्बरः ॥ ५१॥

अश्विनोऽश्विमुखः शुभ्रो भरणो भरणीप्रियः ।
कृत्तिकासनकः कोलो रोहिणी रोहिणोपमः ॥ ५२॥

क्रतवोष्टोरिमन्दी च रोहिणीमोहिनीभृतः ।
मृगराजो मृगशिरो माधवो मधुरध्वनिः ॥ ५३॥

आर्द्रानलो महाबुद्धिर्महोरगविभूषणः ।
भ्रूक्षेपदन्तविभवो भ्रूकरालः पुनर्नवः ॥ ५४॥

पुनर्देवः पुनर्जेता पुनर्जीवः पुनर्वसुः ।
तिमिरस्तिमिकेतुश्च तिमिवासरघातनः ॥ ५५॥

तिष्यस्तुलाधरो जृम्भो विश्लेषाश्लेषदानराट् ।
मानवो माधवो माघो वाचालो मघवा यमः ॥ ५६॥

मघो मघाप्रियो मेघो महाशुण्डो महाभुजः ।
पूर्वाफाल्गुनिकः प्रीतः फल्गुरुत्तरफाल्गुनः ॥ ५७॥

फेनिलो ब्रह्मदो ब्रह्मा सप्ततन्तुसमाश्रयः ।
घोणाहस्तश्चतुर्हस्तो हस्तिवक्त्रो हलायुधः ॥ ५८॥

चित्राम्बरोऽर्चितपदः स्वस्तिदः स्वस्तिविग्रहः ।
विशाखाशिखिसेव्यश्च शिखिध्वजसहोदरः ॥ ५९॥

अणूरेणूकरस्कारो रूरूरेणू सुतीनरः ।
अनूराधाप्रियो राधः श्रीमाञ्छुक्लः शुचिस्मितः ॥ ६०॥

ज्येष्ठः श्रेष्ठार्चितपदो मूलं त्रिजगतो गुरुः ।
शुचिः पूर्वोत्तराषाढश्चोत्तराषाढ ईश्वरः ॥ ६१॥

श्रव्योऽभिजिदनन्तात्मा श्रवश्चेष्टितदानवः ।
श्रावणः स्रावणः श्रोता धनी धन्यो धनप्रदः ॥ ६२॥

धनेच्छुकः सदातीव्रः शीतकुम्भः शरद्द्युतिः ।
पूर्वाभाद्रपदाभाद्रश्चोत्तराभाद्रपादितः ॥ ६३॥

रेणुकस्तनयो रामो रेवतीरमणो रमी ।
अश्वयुक्कार्तिकेयेष्टो मार्गशीर्षो मृगोत्तमः ॥ ६४॥

पौषैश्वर्यः फाल्गुनात्मा वसन्तश्चित्रको मधुः ।
राज्यदोऽभिजिदात्मीयस्तारेशस्तारकद्युतिः ॥ ६५॥

प्रतीतः प्रोर्जितः प्रीतः परमः परमो हितः ।
परहा पञ्चभूः पञ्चवायुपूज्यः परो महः ॥ ६६॥

पुराणागमविद्योगी महिषो रासभोऽग्रगः ।
ग्रहो मेषो वृषो मन्दो मन्मथो मिथुनाकृतिः ॥ ६७॥

कल्पभृत्कण्टकटको दीपो मर्कटेशप्रभुः ।
कर्कटो घृणिकुक्कूटो वनजो हंसयोहसः ॥ ६८॥

सिंहसिंहासनो भूष्यो मुहुर्मूषकवाहनः ।
कन्याकलावतीपुत्रो कन्याप्रीतः कुलोद्वहः ॥ ६९॥

अतुल्यरूपो बलदस्तुल्यभृत्तुल्यसाक्षिकः ।
अलिश्चापधरो धन्वी कच्छपो मकरो मणिः ॥ ७०॥

कुम्भभृत्कलशः कुब्जी मीनमांससुतर्पितः ।
राशिताराग्रहमयस्तिथिरूपो जगद्विभुः ॥ ७१॥

प्रतापी प्रतिपत्प्रेयो द्वितीयाद्वैतनिश्चितः ।
त्रिरुपश्च तृतीयाग्निस्त्रयीरूपस्त्रयीतनुः ॥ ७२॥

चतुर्थीवल्लभो देवो परागः पञ्चमीश्वरः ।
षड्रसास्वादको जातः षष्ठी षष्ठीकवत्सलः ॥ ७३॥

सप्तार्णवगतिः सारः सप्तमीश्वररोहितः ।
अष्टमीनन्दनोऽनन्तो नवमीभक्तिभावितः ॥ ७४॥

दशदिकपतिपूज्यश्च दशमीद्रुहिणो द्रुतः ।
एकादशात्मगणपो द्वादशीयुगचर्चितः ॥ ७५॥

त्रयोदशमणिस्तुत्यश्चतुर्दशस्वरप्रियः ।
चतुर्दशेन्द्रसंस्तुत्यः पूर्णिमानन्दविग्रहः ॥ ७६॥

दर्शादर्शौ दर्शगश्च वानप्रस्थो महेश्वरः ।
मौर्वी मधुरवाग्मूलं मूर्तिमान्मेघवाहनः ॥ ७७॥

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महागजो जितक्रोधो जितशत्रुर्जयाश्रयः ।
रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रो रुद्रपुत्रोऽघनाशनः ॥ ७८॥

भवप्रियो भवानीष्टो भारभृद्भूतभावनः ।
गन्धर्वकुशलः कुण्ठो वैकुण्ठोऽभीष्टसेवितः ॥ ७९॥

वृत्रहा विघ्नहा सीरः समस्तदुरितापहा ।
मञ्जुरो मार्जरो मत्तो दुर्गापुत्रो दुरालसः ॥ ८०॥

अनन्तचित्सुधाधारो वीरवीर्यैकसाधकः ।
भास्वन्मुकुटमाणिक्यः कूजत्किङ्किणिजालकः ॥ ८१॥

शुण्डाधारी तुण्डचलः कुण्डली मुण्डमालकः ।
पद्माक्षः पद्महस्तश्च पद्मनाभसमर्चितः ॥ ८२॥

उदितारुणदन्तास्यो मालाभूषणभूषितः ।
नारदो वारणो लोलश्रवणः शूर्पकर्णकः ॥ ८३॥

बृहदुल्लासनासाढ्यो व्याप्तत्रैलोक्यमण्डलः ।
रत्नमण्डलासीनः कृशानुरूपशीलकः ॥ ८४॥

बृहत्कर्णाश्चलोद्भूतवायुवीजितदिक्पटः ।
बृहदास्यरवाक्रान्तो भीमब्रह्माण्डभाण्डकः ॥ ८५॥

बृहत्पादसमाक्रान्तः सप्तपातालदीपितः ।
बृहद्दन्तकृतात्युग्ररणानन्दरसालसः ॥ ८६॥

बृहद्धस्तधृताशेषायुधनर्जितदानवः ।
स्फुरत्सिन्दूरवदनः स्फुरत्तेजोऽग्निलोचनः ॥ ८७॥

उद्दीपितमणिस्फूर्जन्नूपुरध्वनिनादितः ।
चलतोयप्रवाहाढ्यो नदीजलकणाकरः ॥ ८८॥

भ्रमत्कुञ्जरसङ्घातवन्दिताङ्घ्रिशिरोरुहः ।
ब्रह्माच्युतमहारुद्रपुरःसरसुरार्चितः ॥ ८९॥

अशेषशेषप्रभृतिव्यालजालोपसेवितः ।
गर्जत्पञ्चाननारावप्रसादितधरातलः ॥ ९०॥

हाहाहूहूगतात्युग्रस्वरविभ्रान्तमानसः ।
पञ्चाशद्वर्णबीजाढयो मन्त्री मन्त्रितविग्रहः ॥ ९१॥

वेदान्तशास्त्रपीयूषधाराप्लावितभूतलः ।
शङ्खध्वनिसमाक्रान्तपातालादिनभस्तलः ॥ ९२॥

चिन्तामणिर्महामल्लो बल्लहस्तो बलिः कविः ।
कृतत्रेतायुगोल्लासभासमानजगत्त्रयः ॥ ९३॥

द्वापरः परलोकैकः कर्मध्वान्तसुधाकरः ।
सुधासिक्तवपुर्व्यासो ब्रह्माण्डादिकबाहुकः ॥ ९४॥

अकारादिक्षकारान्तवर्णपङ्क्तिसमुज्ज्वलः ।
अकाराकारमोद्गीतताननादनिनादितः ॥ ९५॥

इकारेकारमन्त्राढ्यो मालाभरणलालसः ।
उकारोकारमोहारिर्घोरनागोपवीतकः ॥ ९६॥

ऋवर्णाङ्कित ॠकारपद्मालयसमुज्जवलः ।
लृकारयुतॡकारशङ्खपूर्णदिगन्तरः ॥ ९७॥

एकारैकारगिरिजास्तनपानविचक्षणः ।
ओकारौकारविश्वादिकृतसृष्टिक्रमालसः ॥ ९८॥

अंओवर्णावलीव्याप्तपादादिशीर्षमण्डलः ।
कर्णतालकृतात्युच्चैर्वायुवीजितनिर्जरः ॥ ९९॥

खगेशध्वजरत्नाङ्कः किरीटारुणपादकः ।
गर्विताशेषगन्धर्व्वगीततत्परश्रोतृकः ॥ १००॥

घनवाहनवागीशपुरःसरसुरार्चितः ।
ङवर्णामृतवाराढ्यसोममानैकदन्तकः ॥ १०१॥

चन्द्रकुङ्कुमजम्बाललिप्तसिन्दूरविग्रहः ।
छत्रचामररत्नाढ्यमुकुटालङ्कृताननः ॥ १०२॥

जटाद्धमहानर्घमणिपङ्क्तिविराजितः ।
झङ्कारिमधुपव्रातगाननादविनादितः ॥ १०३॥

ञवर्णकृतसंहारदैत्यासृक्पर्णमुद्गरः ।
टकारश्च फलास्वादी वेपिताशेषमूर्धजः ॥ १०४॥

ताम्रसिन्दूरपूजाढ्यो ललाटफलकच्छविः ।
थकारधनपङ्क्त्याढ्यः सन्तोषितद्विजव्रजः ॥ १०५॥

दयामृतहृदम्भोजधृतन्रैलोक्यमण्डलः ।
धनदादिमहायक्षसंसेवितपदाम्बुजः ॥ १०६॥

नमिताशेषदेवौघकिरीटमणिरञ्जितः ।
परवर्गापवर्गादिभोगच्छेदनदक्षकः ॥ १०७॥

फणिचक्रसमाकरान्तमल्लमण्डलमण्डितः ।
बद्धभ्रूयुगभीमोग्रसंतर्जितसुरासुरः ॥ १०८॥

भवानीहृदयानन्दवर्द्धनैकनिशाकरः ।
मदिराकलशप्रीतः करालैककराम्बुजः ॥ १०९॥

यज्ञान्तरायसङ्घातसज्जीकृतवरायुधः ।
रत्नाकरसुताक्रान्तकान्तिकीर्तिविवर्धनः ॥ ११०॥

लम्बोदरमहाभीमवपुर्दीप्कृतासुरः ।
वरुणादिदिगीशानामर्चितार्चनचर्चितः ॥ १११॥

शङ्करैकप्रियः प्रेमनयनानन्दवर्द्धनः ।
षोडशस्वरतालापगीतगानविचक्षणः ॥ ११२॥

समदुर्गसरिन्नाथस्तारणार्कोडुपोहरः ।
ब्रह्मवैकुण्ठब्रह्मज्ञसंरक्षिततनूचरः ॥ ११३॥

ताराङ्कमन्त्रवर्णैकविग्रहोज्ज्वलविग्रहः ।
अकारादिक्षकारान्तविद्याभूषितविग्रहः ॥ ११४॥

ॐ श्रीविनायको ॐ ह्रीं विघ्नाध्यक्षो गणाधिपः ।
हेरम्बो मोदकाहारो वक्रतुण्डो विधिः स्मृतः ॥ ११५॥

वेदान्तगीतो विद्यार्थिसिद्धमन्त्रः षडक्षरः ।
गणेशो वरदो देवो द्वादशाक्षरमन्त्रितः ॥ ११६॥

सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रिताशेषविग्रहः ।
गाङ्गेयो गणसेव्यक्ष ॐ श्रीद्वैमातुरः शिवः ॥ ११७॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लौं गं देवो महागणपतिः प्रभुः ।

इदं नामसहस्रं ते महागणपतेः स्मृतम् ॥ ११८॥

गुह्यं गोप्यतमं सिद्धं सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।
सर्वमन्त्रमयं दिव्यं सर्वमन्त्रविनायकम् ॥ ११९॥

ग्रहतारामयं राशिवर्णपङ्क्तिसमन्वितम् ।
सर्वविद्यामयं ब्रह्मसाधनं साधकप्रियम् ॥ १२०॥

गणेशस्य च सर्वस्वं रहस्यं त्रिदिवौकसाम् ।
यथेष्टफलदं लोके मनोरथप्रपूरणम् ॥ १२१॥

अष्टसिद्धिमयं श्रेष्ठं साधकानां जयप्रदम् ।
विनार्चनं बिना होमं विना न्यासं विना जपम् ॥ १२२॥

अणिमाद्यष्टसिद्धीनां साधनं स्मृतिमात्रतः ।
चतुर्थ्यामर्धरात्रे तु पठेन्मन्त्री चतुष्पथे ॥ १२३॥

लिखेद्भूर्जे महादेवि पुण्यं नामसहस्रकम् ।
धारयेत्तं चतुर्दश्यां मध्याह्ने मूर्ध्नि वा भुजे ॥ १२४॥

योषिद्वामकरे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ।
स्तम्भयेदपि ब्रह्माणं मोहयेदपि शङ्करम् ॥ १२५॥

वशयेदपि त्रैलोक्यं मारयेदखिलान्रिपून् ।
उच्चाटयेच्च गीर्वाणं शमयेच्च धनञ्जयम् ॥ १२६॥

वन्ध्या पुत्रं लभेच्छीघ्रं निर्धनो धनमाप्नुयात् ।
त्रिवारं यः पठेद्रात्रौ गणेशस्य पुरः शिवे ॥ १२७॥

नक्तं शक्तियुतो देवि भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ।
प्रत्यक्षवरदं पश्येद्गणेशं साधकोत्तमः ॥ १२८॥

पराह्णे पठ्यते नाम्नां सहस्रं भक्तिपूर्वकम् ।
तस्य वित्तादिविभवो दारायुःसम्पदः सदा ॥ १२९॥

रणे राजभये द्यूते पठेन्नामसहस्रकम् ।
सर्वत्र जयमाप्नोति गणेशस्य प्रसादतः ॥ १३०॥

इतीदं पुण्यसर्वस्वं मन्त्रनामसहस्रकम् ।
महागणपतेः पुण्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ १३१॥

॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे उच्छिष्टगणेशसहस्रनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥

श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र गीतार्थ सहित | Ucchista Ganesha Strotra With Lyrics And Meaning

श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र पाठ के अमोघ और अकल्पनीय लाभ (Benefits)

उच्छिष्ट गणपति की साधना को कलियुग में सबसे त्वरित (Quick) फल देने वाली विद्या माना गया है। जो भी साधक मन्त्रमहार्णव में बताए गए नियमों के अनुसार इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन से असंभव शब्द हमेशा के लिए मिट जाता है। आइए इसके अत्यंत शक्तिशाली लाभों को विस्तार से जानें:

1. भयंकर कर्ज (Debt) और दरिद्रता का समूल नाश

यह उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र का सबसे बड़ा चमत्कार है। जो व्यक्ति कर्जे के महाजाल में इस कदर फंस चुका हो कि आत्महत्या के विचार आ रहे हों, उसे यह स्तोत्र जीवनदान देता है। इसके नियमित पाठ से भगवान गणेश साधक की बुद्धि को ऐसी दिशा देते हैं और धन आगमन के ऐसे गुप्त मार्ग खोलते हैं कि भारी से भारी कर्ज कुछ ही महीनों में हवा हो जाता है। घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।

2. तीव्र वशीकरण और आकर्षण (Magnetic Vashikaran)

तंत्र में उच्छिष्ट गणपति को ‘वशीकरण’ का अधिपति कहा गया है। यह स्तोत्र साधक के आभामंडल (Aura) में एक असीम सम्मोहन पैदा कर देता है। पारिवारिक कलह, पति-पत्नी के बीच टूटने की कगार पर पहुँच चुके रिश्ते, या उच्चाधिकारियों से मतभेद—इस पाठ के प्रभाव से सभी आपके अनुकूल हो जाते हैं। आपकी वाणी में ऐसा प्रभाव आ जाता है कि लोग आपकी बात मानने पर विवश हो जाते हैं।

3. गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का पूर्ण स्तम्भन

जब विरोधी आपकी प्रतिष्ठा, व्यापार या जीवन को नष्ट करने के लिए षड्यंत्र रच रहे हों, तब उच्छिष्ट गणपति का यह स्तोत्र एक ढाल बन जाता है। इस स्तोत्र के श्लोक शत्रुओं की बुद्धि और विचारों का ‘स्तम्भन’ (Paralyze) कर देते हैं। विरोधी आपस में ही उलझकर नष्ट हो जाते हैं और साधक का बाल भी बांका नहीं कर पाते।

4. मुकदमों (Court Cases) और कानूनी विवादों में एकतरफा विजय

झूठे मुकदमों में फंसे हुए लोगों के लिए मन्त्रमहार्णव का यह स्तोत्र किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। मान्यता है कि कोर्ट की तारीख से एक रात पहले यदि निशीथ काल में इस स्तोत्र का 3 बार पाठ किया जाए, तो अदालत का निर्णय साधक के पक्ष में आने की प्रबल संभावना बन जाती है।

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5. भयंकर तंत्र-बाधा, काले जादू और ऊपरी सायों से मुक्ति

भगवान उच्छिष्ट गणपति स्वयं तंत्र के स्वामी हैं। जिस घर में उच्छिष्ट गणपति के सहस्रनाम स्तोत्र का सस्वर पाठ गूंजता है, वहाँ भूत-पिशाच, मारण-उच्चाटन के प्रयोग, डाकिनी-शाकिनी या कोई भी नकारात्मक शक्ति (Negative Entity) एक सेकंड भी नहीं टिक सकती। यह काले जादू का सबसे बड़ा काट है।

6. भौतिक इच्छाओं की पूर्ति और राजयोग की प्राप्ति

उच्छिष्ट गणपति मोक्ष से अधिक ‘भोग’ (भौतिक सुख) के देवता हैं। वे अपने साधक को समाज में उच्च पद, सत्ता, वाहन, आलीशान भवन और राजमान्यता प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति की हर जायज भौतिक इच्छा को पूर्ण कर उसे समाज में एक शक्तिशाली व्यक्ति बना देता है।

श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र की प्रामाणिक तांत्रिक पाठ विधि (Authentic Puja Vidhi)

मन्त्रमहार्णव एक विशुद्ध तांत्रिक ग्रंथ है, इसलिए इसमें वर्णित विधियां सामान्य पूजा से थोड़ी भिन्न और अत्यंत शक्तिशाली होती हैं। इसे पूर्ण फलदायी बनाने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:

1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)

उच्छिष्ट गणपति की साधना के लिए चतुर्थी तिथि (विशेषकर कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी), मंगलवार (Tuesday), या शुक्रवार (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। पाठ का समय: इस स्तोत्र का पाठ हमेशा रात्रि काल (निशीथ काल – रात 10 बजे के बाद) में ही करना चाहिए। दिन में इसका पाठ उतना तांत्रिक प्रभाव उत्पन्न नहीं करता।

2. वस्त्र, दिशा और आसन का विधान

स्नान करके पूर्णतः शुद्ध हो जाएं। तांत्रिक साधना में लाल या नीले/काले रंग के वस्त्र (बिना सिले हुए) धारण करना उत्तम माना जाता है। पूजा करते समय अपना मुख पश्चिम (West) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें। बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।

3. पूजन सामग्री और कलश स्थापना

एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान उच्छिष्ट गणपति का चित्र या एक सिद्ध ‘उच्छिष्ट गणपति यंत्र’ स्थापित करें। उनके सामने तिल के तेल या सरसों के तेल का एक अखंड दीपक जलाएं। अगरबत्ती या गुग्गुल/लोहबान की धूप प्रज्वलित करें।

4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa) और न्यास

दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, लाल अक्षत और एक लाल फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- अमुक कर्ज से मुक्ति या शत्रु नाश) बोलें। फिर जल धरती पर छोड़ दें। इसके बाद अपने गुरु (यदि हैं) और भगवान शिव का मानसिक ध्यान करें।

5. वाम मार्ग या दक्षिण मार्ग से पाठ (The Secret Method)

  • दक्षिण मार्ग (सामान्य गृहस्थों के लिए): आप सामान्य रूप से शुद्ध होकर (बिना कुछ खाए) एकाग्र चित्त से इस सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यह पूर्णतः सुरक्षित और फलदायी है।

  • वाम मार्ग (दीक्षित साधकों के लिए): जो साधक दीक्षित हैं, वे ‘उच्छिष्ट’ अवस्था में पाठ करते हैं। मुँह में पान का पत्ता (Tambul), लौंग, या इलायची रखकर उसे चबाते हुए स्तोत्र का पाठ किया जाता है। (चेतावनी: यह विधि केवल गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए)।

6. नैवेद्य (भोग) और आरती

पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान को अनार (Pomegranate), मोदक, गुड़, या तिल के लड्डू का भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से आरती करें और अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

साधना के अत्यंत कठोर नियम और सावधानियां (Strict Rules & Precautions)

उच्छिष्ट गणपति की साधना आग से खेलने के समान है; यदि सही तरीके से की जाए तो यह घर को रोशन कर देगी, अन्यथा जला भी सकती है। इन नियमों का कड़ाई से पालन करें:

  • गुरु दीक्षा का महत्व: ‘मन्त्रमहार्णव’ के तांत्रिक प्रयोग और वाम मार्गी साधना बिना योग्य गुरु के कभी नहीं करनी चाहिए। यदि आप सामान्य गृहस्थ हैं, तो ‘दक्षिण मार्ग’ से ही इसका पाठ करें।

  • अनैतिक वशीकरण का निषेध: वशीकरण की शक्ति प्राप्त होने पर इसका प्रयोग किसी स्त्री/पुरुष का जीवन बर्बाद करने या अपनी वासना पूर्ति के लिए कभी न करें। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं, गलत नीयत से किया गया प्रयोग साधक का ही सर्वनाश कर देता है।

  • गोपनीयता (Secrecy): अपनी साधना, स्तोत्र पाठ के समय और अपने संकल्प को पूरी तरह गुप्त रखें। किसी को यह न बताएं कि आप उच्छिष्ट गणपति की साधना कर रहे हैं।

  • स्त्रियों का सर्वोच्च सम्मान: तंत्र शास्त्र में स्त्री साक्षात ‘शक्ति’ है। उच्छिष्ट गणपति अपनी शक्ति के साथ ही विराजमान होते हैं। जो व्यक्ति स्त्रियों का अपमान करता है, उसकी यह साधना तुरंत निष्फल हो जाती है।

Shri Uchchhishta Ganapati Sahasranama Stotra (Mantramaharnava) केवल संस्कृत के श्लोकों का संग्रह नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत तांत्रिक ‘ब्रह्मास्त्र’ है जो मनुष्य के जीवन से असफलता, दरिद्रता और भय को हमेशा के लिए मिटा सकता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि परमात्मा को प्राप्त करने के लिए किसी बाहरी कर्मकांड या ‘पवित्रता’ के दिखावे की आवश्यकता नहीं है। यदि आपका समर्पण सच्चा है, तो भगवान आपके जूठे भाव को भी स्वीकार कर लेते हैं।

जब भी आपको लगे कि जीवन की उलझनें सुलझने का नाम नहीं ले रही हैं, अदालत के चक्करों ने परेशान कर दिया है या कर्ज ने नींद उड़ा दी है, तो रात्रि के सन्नाटे में इस सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ आरंभ करें। मन्त्रमहार्णव की ऊर्जा और विघ्नहर्ता का यह तांत्रिक स्वरूप आपके जीवन की हर बाधा को चीर कर आपके लिए राजयोग और परम सुख के द्वार खोल देगा। ॐ श्री उच्छिष्ट गणपतये नमः!

श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. ‘मन्त्रमहार्णव’ ग्रंथ क्या है और इसमें उच्छिष्ट गणपति का क्या महत्व है?

‘मन्त्रमहार्णव’ श्री माधव राय वैद्य द्वारा रचित एक अत्यंत प्रामाणिक और विशाल तांत्रिक ग्रंथ है। इसमें देवी-देवताओं के गुप्त तंत्र, मंत्र और स्तोत्रों का संकलन है। इसी ग्रंथ में श्री उच्छिष्ट गणपति सहस्रनाम स्तोत्र का वर्णन है, जिसे तंत्र जगत में अत्यंत जाग्रत, उग्र और त्वरित फलदायी माना गया है।

2. उच्छिष्ट गणपति साधना में ‘उच्छिष्ट’ (जूठा) का क्या रहस्य है?

सामान्य पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है, परंतु उच्छिष्ट साधना में साधक मुँह में पान, लौंग या प्रसाद चबाते हुए (जूठे मुँह) भगवान का पाठ करता है। तांत्रिक दर्शन के अनुसार, यह ‘पवित्र और अपवित्र’ के द्वैत (भेदभाव) को मिटाकर सीधे परब्रह्म से जुड़ने का एक अत्यंत शक्तिशाली मार्ग है।

3. क्या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति इस सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ कर सकता है?

जी हाँ, सामान्य गृहस्थ व्यक्ति भी अपनी मनोकामना पूर्ति (जैसे कर्ज मुक्ति, शत्रु शांति) के लिए इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। हालांकि, गृहस्थों को तांत्रिक ‘वाम मार्ग’ (जूठे मुँह) की बजाय ‘दक्षिण मार्ग’ (स्वच्छ होकर, बिना कुछ खाए) से सात्विक रूप में पाठ करना चाहिए। यह पूर्णतः सुरक्षित है।

4. इस सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ समय कौन सा है?

उच्छिष्ट गणपति की साधना तंत्रोक्त होने के कारण रात्रि के समय (निशीथ काल – रात 10 बजे से मध्य रात्रि 2 बजे के बीच) सबसे अधिक फलदायी होती है। इसे कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (संकष्टी चतुर्थी), मंगलवार या शुक्रवार की रात को आरंभ करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

5. क्या उच्छिष्ट गणपति के इस स्तोत्र से कोर्ट केस और कर्ज से मुक्ति मिलती है?

जी हाँ, बिल्कुल। मन्त्रमहार्णव में वर्णित इस सहस्रनाम स्तोत्र का सबसे बड़ा लाभ भारी कर्ज से मुक्ति दिलाना और मुकदमों (Court Cases) में विजय प्राप्त कराना है। इसके नियमित रात्रि पाठ से शत्रुओं का स्तम्भन होता है और धन आगमन के नए व अचूक मार्ग खुल जाते हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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