Shri Uchchhishta Ganapati Kavach (श्री उच्छिष्ट गणपति कवच): Sanskrit Lyrics अकल्पनीय शक्तियों का महास्त्रोत, मूल संस्कृत पाठ, पाठ विधि और अचूक लाभIt takes 9 minutes... to read this article !

सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में भगवान गणेश के कई विशिष्ट और गूढ़ स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इन्हीं में से एक अत्यंत शक्तिशाली, शीघ्र फलदायी और रहस्यमयी स्वरूप है— श्री उच्छिष्ट गणपति (Shri Uchchhishta Ganapati)। सामान्यतः पूजा-पाठ में शुद्धता का अत्यधिक ध्यान रखा जाता है, लेकिन उच्छिष्ट गणपति की साधना वाम मार्ग और तंत्र शास्त्र की एक ऐसी अद्भुत साधना है जिसमें बाह्य शुद्धि से अधिक साधक की आंतरिक निष्ठा और भाव को महत्व दिया जाता है।

आपकी आध्यात्मिक उन्नति और सर्वकार्य सिद्धि के लिए Sadhanas.in पर आज हम रुद्रयामल तंत्र के उमा-महेश्वर संवाद से लिया गया ‘श्री उच्छिष्ट गणपति कवच’ प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कवच इतना प्रभावशाली है कि इसके केवल स्मरण मात्र से ही व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने लगती हैं।

श्री उच्छिष्ट गणपति कवच का महत्व (Importance in Tantra)

रुद्रयामल तंत्र में भगवान शिव स्वयं माता पार्वती से कहते हैं कि यह विद्या ‘राजवती’ विद्या है। इस कवच की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए किसी विशेष ध्यान, लंबे अनुष्ठान, होम (हवन) या कठिन नियमों की आवश्यकता नहीं होती।

  • नियमों में छूट: इस कवच के पाठ के लिए स्नान-शौच आदि का कोई कठोर बंधन नहीं है (श्लोक 6)।

  • शीघ्र सिद्धि: कलियुग में यह कवच प्रत्यक्ष सिद्धि देने वाला है। जो भी साधक इसका पाठ करता है, उसे राजभोग, ऐश्वर्य और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

  • पात्रता: भगवान शिव स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि यह रहस्यमयी कवच निंदक, कुटिल, दुष्ट, गुरुद्रोही और शठ व्यक्ति को कभी नहीं देना चाहिए। यह केवल सच्चे और गुरुभक्त शिष्य के लिए ही है।

श्री उच्छिष्ट गणपति कवचम् (मूल संस्कृत पाठ) (रुद्रयामलान्तर्गतम्)

अथ श्रीउच्छिष्टगणेशकवचं प्रारम्भः

देव्युवाच

देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थितिलयात्मक ।
विना ध्यानं विना मन्त्रं विना होमं विना जपम् ॥ १॥
येन स्मरणमात्रेण लभ्यते चाशु चिन्तितम् ।
तदेव श्रोतुमिच्छामि कथयस्व जगत्प्रभो ॥ २॥

ईश्वर उवाच

श्रुणु देवी प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् ।
उच्छिष्टगणनाथस्य कवचं सर्वसिद्धिदम् ॥ ३॥
अल्पायासैर्विना कष्टैर्जपमात्रेण सिद्धिदम् ।
एकान्ते निर्जनेऽरण्ये गह्वरे च रणाङ्गणे ॥ ४॥
सिन्धुतीरे च गङ्गायाः(गाङ्गीये) कूले वृक्षतले जले ।
सर्वदेवालये तीर्थे लब्ध्वा सम्यग्जपं चरेत् ॥ ५॥
स्नानशौचादिकं नास्ति नास्ति निर्बन्धनं प्रिये ।
दारिद्र्यान्तकरं शीघ्रं सर्वतत्त्वं जनप्रिये ॥ ६॥
सहस्रशपथं कृत्वा यदि स्नेहोऽस्ति मां प्रति ।
निन्दकाय कुशिष्याय खलाय कुटिलाय च ॥ ७॥
दुष्टाय परशिष्याय घातकाय शठाय च ।
वञ्चकाय वरघ्नाय ब्राह्मणीगमनाय च ॥ ८॥
अशक्ताय च क्रूराय गुरूद्रोहरताय च ।
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ॥ ९॥
गुरूभक्ताय दातव्यं सच्छिष्याय विशेषतः ।
तेषां सिध्यन्ति शीघ्रेण ह्यन्यथा न च सिध्यति ॥ १०॥
गुरूसन्तुष्टिमात्रेण कलौ प्रत्यक्षसिद्धिदम् ।
देहोच्छिष्टैः प्रजप्तव्यं तथोच्छिष्टैर्महामनुः ॥ ११॥ (प्रजप्तव्य इति शेषः)
आकाशे च फलं प्राप्तं नान्यथा वचनं मम ।
एषा राजवती विद्या विना पुण्यं न लभ्यते ॥ १२॥
अथ वक्ष्यामि देवेशि कवचं मन्त्रपूर्वकम् ।
येन विज्ञातमात्रेण राजभोगफलप्रदम् ॥ १३॥

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मूल कवच पाठ

ऋषिर्मे गणकः पातु शिरसि च निरन्तरम् ।
त्राहि मां देवि गायत्रीछन्दो ऋषिः सदा मुखे ॥ १४॥
हृदये पातु मां नित्यमुच्छिष्टगणदेवता ।
गुह्ये रक्षतु तद्बीजं स्वाहा शक्तिश्च पादयोः ॥ १५॥
कामकीलकसर्वाङ्गे विनियोगश्च सर्वदा ।
पार्श्वर्द्वये सदा पातु स्वशक्तिं गणनायकः ॥ १६॥
शिखायां पातु तद्बीजं भ्रूमध्ये तारबीजकम् ।
हस्तिवक्त्रश्च शिरसि लम्बोदरो ललाटके ॥ १७॥
उच्छिष्टो नेत्रयोः पातु कर्णौ पातु महात्मने ।
पाशाङ्कुशमहाबीजं नासिकायां च रक्षतु ॥ १८॥
भूतीश्वरः परः पातु आस्यं जिह्वां स्वयं वपुः ।
तद्बीजं पातु मां नित्यं ग्रीवायां कण्ठदेशके ॥ १९॥
गं बीजं च तथा रक्षेत्तथा त्वग्रे च पृष्ठके ।
सर्वकामश्च हृत्पातु पातु मां च करद्वये ॥ २०॥
उच्छिष्टाय च हृदये वह्निबीजं तथोदरे ।
मायाबीजं तथा कट्यां द्वावूरू सिद्धिदायकः ॥ २१॥
जङ्घायां गणनाथश्च पादौ पातु विनायकः ।
शिरसः पादपर्यन्तमुच्छिष्टगणनायकः ॥ २२॥
आपादमस्तकान्तं च उमापुत्रश्च पातु माम् ।
दिशोऽष्टौ च तथाकाशे पाताले विदिशाष्टके ॥ २३॥
अहर्निशं च मां पातु मदचञ्चललोचनः ।
जलेऽनले च सङ्ग्रामे दुष्टकारागृहे वने ॥ २४॥
राजद्वारे घोरपथे पातु मां गणनायकः ।
इदं तु कवचं गुह्यं मम वक्त्राद्विनिर्गतम् ॥ २५॥
त्रैलौक्ये सततं पातु द्विभुजश्च चतुर्भुजः ।
बाह्यमभ्यन्तरं पातु सिद्धिबुद्धिर्विनायकः ॥ २६॥
सर्वसिद्धिप्रदं देवि कवचमृद्धिसिद्धिदम् ।
एकान्ते प्रजपेन्मन्त्रं कवचं युक्तिसंयुतम् ॥ २७॥
इदं रहस्यं कवचमुच्छिष्टगणनायकम् ।
सर्ववर्मसु देवेशि इदं कवचनायकम् ॥ २८॥
एतत्कवचमाहात्म्यं वर्णितुं नैव शक्यते ।
धर्मार्थकाममोक्षं च नानाफलप्रदं नृणाम् ॥ २९॥
शिवपुत्रः सदा पातु पातु मां सुरार्चितः ।
गजाननः सदा पातु गणराजश्च पातु माम् ॥ ३०॥
सदा शक्तिरतः पातु पातु मां कामविह्वलः ।
सर्वाभरणभूषाढयः पातु मां सिन्दूरार्चितः ॥ ३१॥
पञ्चमोदकरः पातु पातु मां पार्वतीसुतः ।
पाशाङ्कुशधरः पातु पातु मां च धनेश्वरः ॥ ३२॥
गदाधरः सदा पातु पातु मां काममोहितः ।
नग्ननारीरतः पातु पातु मां च गणेश्वरः ॥ ३३॥
अक्षयं वरदः पातु शक्तियुक्तिः सदाऽवतु ।
भालचन्द्रः सदा पातु नानारत्नविभूषितः ॥ ३४॥
उच्छिष्टगणनाथश्च मदाघूर्णितलोचनः ।
नारीयोनिरसास्वादः पातु मां गजकर्णकः ॥ ३५॥
प्रसन्नवदनः पातु पातु मां भगवल्लभः ।
जटाधरः सदा पातु पातु मां च किरीटिकः(किरीटधृक्) ॥ ३६॥
पद्मासनास्थितः पातु रक्तवर्णश्च पातु माम् ।
नग्नसाममदोन्मत्तः पातु मां गणदैवतः ॥ ३७॥
वामाङ्गे सुन्दरीयुक्तः पातु मां मन्मथप्रभुः ।
क्षेत्रपः पिशितं(क्षेत्रप्रवसितः) पातु पातु मां श्रुतिपाठकः ॥ ३८॥
भूषणाढ्यस्तु मां पातु नानाभोगसमन्वितः ।
स्मिताननः सदा पातु श्रीगणेशकुलान्वितः ॥ ३९॥
श्रीरक्तचन्दनमयः सुलक्षणगणेश्वरः ।
श्वेतार्कगणनाथश्च हरिद्रागणनायकः ॥ ४०॥
पारभद्रगणेशश्च पातु सप्तगणेश्वरः ।
प्रवालकगणाध्यक्षो गजदन्तो गणेश्वरः ॥ ४१॥
हरबीजगणेशश्च भद्राक्षगणनायकः ।
दिव्यौषधिसमुद्भूतो गणेशाश्चिन्तितप्रदः ॥ ४२॥
लवणस्य गणाध्यक्षो मृत्तिकागणनायकः ।
तण्डुलाक्षगणाध्यक्षो गोमयश्च गणेश्वरः ॥ ४३॥
स्फटिकाक्षगणाध्यक्षो रुद्राक्षगणदैवतः ।
नवरत्नगणेशश्च आदिदेवो गणेश्वरः ॥ ४४॥
पञ्चाननश्चतुर्वक्त्रः षडाननगणेश्वरः ।
मयूरवाहनः पातु पातु मां मूषकासनः ॥ ४५॥
पातु मां देवदेवेशः पातु मामृषिपूजितः ।
पातु मां सर्वदा देवो देवदानवपूजितः ॥ ४६॥
त्रैलोक्यपूजितो देवः पातु मां च विभुः प्रभुः ।
रङ्गस्थं च सदा पातु सागरस्थं सदाऽवतु ॥ ४७॥
भूमिस्थं च सदा पातु पातालस्थं च पातु माम् ।
अन्तरिक्षे सदा पातु आकाशस्थं सदाऽवतु ॥ ४८॥
चतुष्पथे सदा पातु त्रिपथस्थं च पातु माम् ।
बिल्वस्थं च वनस्थं च पातु मां सर्वतस्तनुम्(सर्वतस्थितम्) ॥ ४९॥
राजद्वारस्थितं पातु पातु मां शीघ्रसिद्धिदः ।
भवानीपूजितः पातु ब्रह्माविष्णुशिवार्चितः ॥ ५०॥

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फल श्रुति

इदं तु कवचं देवि पठनात्सर्वसिद्धिदम् ।
उच्छिष्टगणनाथस्य समन्त्रं कवचं परम् ॥ ५१॥
स्मरणाद्भूपतित्वं च लभते साङ्गतां ध्रुवम् । स्मरणाद्भूभुजत्वं
वाचः सिद्धिकरं शीघ्रं परसैन्यविदारणम् ॥ ५२॥
प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने दिवा रात्रौ पठेन्नरः ।
चतुर्थ्यां दिवसे रात्रौ पूजने मानदायकम् ॥ ५३॥
सर्वसौभाग्यदं शीघ्रं दारिद्र्यार्णवघातकम् ।
सुदारसुप्रजासौख्यं सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ॥ ५४॥
जलेऽथवाऽनलेऽरण्ये सिन्धुतीरे सरित्तटे ।
श्मशाने दूरदेशे च रणे पर्वतगह्वरे ॥ ५५॥
राजद्वारे भये घोरे निर्भयो जायते ध्रुवम् ।
सागरे च महाशीते दुर्भिक्षे दुष्टसङ्कटे ॥ ५६॥
भूतप्रेतपिशाचादियक्षराक्षसजे भये ।
राक्षसीयक्षिणीक्रूराशाकिनीडाकीनीगणाः ॥ ५७॥
राजमृत्युहरं देवि कवचं कामधेनुवत् ।
अनन्तफलदं देवि सति मोक्षं(तथाऽमोघं) च पार्वति ॥ ५८॥
कवचेन विना मन्त्रं यो जपेद्गणनायकम् ।
इह जन्मानि पापिष्ठो जन्मान्ते मूषको भवेत् ॥ ५९॥
इति परमरहस्यं देवदेवार्चनं च
कवचपरमदिव्यं पार्वतीपुत्ररूपम् ।
पठति परमभोगैश्वर्यमोक्षप्रदं च
लभति सकलसौख्यं शक्तिपुत्रप्रसादात् ॥ ६०॥
(इति परमरहस्यं देवदेवार्चितस्य-
कवचमुदितमेतत्पार्वतीशेन देव्यै ।
पठति स लभ्यते वै भक्तितो भक्तवर्यः
प्रचुरसकलसौख्यं शक्तिपुत्रप्रसादात् ॥ ६०॥)

॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे उमामहेश्वरसंवादे श्रीमदुच्छिष्टगणेशकवचं समाप्तम् ॥

 

श्री उच्छिष्ट गणपति कवच का विस्तृत अर्थ और फलश्रुति

इस दिव्य कवच में उच्छिष्ट गणपति के विभिन्न स्वरूपों (जैसे हरिद्रा गणपति, श्वेतार्क गणपति, रुद्राक्ष गणपति, स्फटिक गणपति) का आवाहन किया गया है। शरीर के हर अंग की रक्षा के लिए भगवान गणेश के अलग-अलग नामों और बीजाक्षरों को न्यस्त किया गया है।

 

अंग रक्षा विधान (Nyasa & Protection): कवच में प्रार्थना की गई है कि हस्तिवक्त्र (हाथी के मुख वाले) मेरे सिर की रक्षा करें, लम्बोदर मेरे ललाट (माथे) की, उच्छिष्ट गणपति मेरे नेत्रों की और गणनायक मेरे कानों की रक्षा करें। इसी प्रकार नासिका, जिह्वा, कण्ठ, हृदय, कटि (कमर), जंघा और पैरों तक की रक्षा का भार भगवान विनायक को सौंपा गया है।

 

हर परिस्थिति में सुरक्षा: श्लोक 23 से 25 के अनुसार, भगवान उमापुत्र दसों दिशाओं, पाताल, आकाश, जल, अग्नि, युद्ध के मैदान, कारागार (जेल), भयानक वनों और राज दरबार (कोर्ट-कचहरी) में साधक की रक्षा करते हैं।

कवच के चमत्कारिक लाभ (Benefits of the Kavach):

  1. दरिद्रता का नाश: यह कवच “दारिद्र्यार्णवघातकम्” कहा गया है, अर्थात् यह गरीबी के विशाल समुद्र को सुखा देने वाला है। इसके नित्य पाठ से रातों-रात आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगता है।

  2. शत्रु शमन: जो व्यक्ति इस कवच का पाठ करता है, उसके विरोधी और शत्रु शांत हो जाते हैं। ‘परसैन्यविदारणम्’ का अर्थ है कि यह बड़े से बड़े शत्रु पक्ष को परास्त करने की क्षमता रखता है।

  3. भूत-प्रेत बाधा निवारण: श्लोक 57 स्पष्ट करता है कि भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, शाकिनी, डाकिनी आदि कोई भी नकारात्मक शक्ति इस कवच का पाठ करने वाले साधक को स्पर्श तक नहीं कर सकती।

  4. वाक् सिद्धि: इसके नियमित पाठ से साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है (वाचः सिद्धिकरं)। वह जो भी बोलता है, वह सत्य होने लगता है।

  5. सर्व सौभाग्य प्राप्ति: यह कवच कामधेनु के समान है। यह उत्तम जीवनसाथी, सुयोग्य संतान और सभी प्रकार के सांसारिक सुख प्रदान करता है।

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पाठ करने की विधि (How to Chant)

हालाँकि रुद्रयामल तंत्र में भगवान शिव ने स्वयं कहा है कि इस कवच के लिए किसी विशेष स्थान या शुद्धि की आवश्यकता नहीं है, फिर भी एक सामान्य साधक को इसे पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए।

  • समय: इस कवच का पाठ प्रातः, मध्याह्न (दोपहर), सायंकाल या रात्रि— किसी भी समय किया जा सकता है। विशेष रूप से चतुर्थी तिथि की रात्रि में इसका पाठ अत्यधिक फलदायी माना गया है।

  • चेतावनी: श्लोक 59 में भगवान शिव स्पष्ट कहते हैं कि जो व्यक्ति इस कवच का पाठ किए बिना उच्छिष्ट गणपति के मूल मंत्र का जाप करता है, उसे साधना में सफलता नहीं मिलती। अतः मंत्र जाप से पूर्व इस कवच का पाठ अनिवार्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. उच्छिष्ट गणपति साधना क्या है?

उच्छिष्ट गणपति साधना तंत्र शास्त्र की एक अत्यंत गुप्त और तीव्र फलदायी साधना है। ‘उच्छिष्ट’ का अर्थ होता है जूठा या बचा हुआ। वाम मार्ग में इस साधना को बिना मुख धोए (उच्छिष्ट अवस्था में) करने का भी विधान है, जो भौतिक सुखों की त्वरित प्राप्ति कराता है।

2. क्या गृहस्थ लोग श्री उच्छिष्ट गणपति कवच का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। गृहस्थ व्यक्ति भी पूर्ण श्रद्धा के साथ इस कवच का पाठ कर सकते हैं। यह पारिवारिक कलह को मिटाने, धन वृद्धि और सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी है। बस ध्यान रहे कि इसका उपयोग किसी का अहित करने के लिए न किया जाए।

3. इस कवच का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?

कवच के अनुसार, साधक अपनी सुविधा और संकल्प के अनुसार इसे प्रातः, दोपहर और रात्रि में पढ़ सकता है। यदि आप किसी विशेष कार्य की सिद्धि चाहते हैं, तो प्रतिदिन 3 या 11 बार पाठ का संकल्प ले सकते हैं।

4. क्या उच्छिष्ट गणपति कवच के पाठ के लिए कोई विशेष दिशा निर्धारित है?

तंत्र शास्त्र के अनुसार, भगवान गणेश की साधना के लिए पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके बैठना श्रेष्ठ माना जाता है। लाल रंग के आसन का प्रयोग करना उत्तम होता है।

5. कवच में बताई गई चेतावनियों का क्या अर्थ है?

कवच में भगवान शिव ने चेतावनी दी है कि यह विद्या दुष्ट, धोखेबाज़, क्रूर और गुरु का अपमान करने वाले लोगों को नहीं देनी चाहिए। इसका अर्थ है कि इस साधना में सफलता तभी मिलती है जब साधक का मन निष्कपट हो और वह अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित हो।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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