सनातन धर्म, शैव परंपरा और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब संपूर्ण ब्रह्मांड के संहार, वैराग्य, परम ज्ञान और असीम करुणा की बात आती है, तो भगवान शिव (Lord Shiva) का स्मरण सर्वोपरि है। वे देवों के देव ‘महादेव’ हैं। जहाँ वे एक ओर प्रलयंकारी ‘रुद्र’ और ‘महाकाल’ हैं, वहीं दूसरी ओर वे एक लोटे जल और एक बिल्वपत्र से प्रसन्न होने वाले अत्यंत भोले ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं। सृष्टि के कण-कण में शिव का वास है।
मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के कर्म बंधनों, अकारण भयों, असाध्य रोगों, मृत्यु के डर और मानसिक क्लेशों से घिरा रहता है। जब जीवन में हर तरफ अंधकार छा जाए, ग्रह-नक्षत्र विपरीत हो जाएं, और कोई भी मार्ग न सूझे, तब भगवान शिव की शरण में जाना साक्षात काल को भी परास्त कर देने के समान है। भगवान शिव की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत वैराग्य, और उनकी अहैतुकी कृपा को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए महर्षियों ने उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री शिव सहस्त्रनाम स्तोत्रम्’ (Shiva Sahasranama Stotram) के नाम से जाना जाता है।
‘सहस्त्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा आध्यात्मिक ब्रह्मास्त्र है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर दुखों, अकाल मृत्यु के भय, दरिद्रता, और जन्म-मरण के चक्र को पल भर में भस्म कर देता है।
शिव सहस्त्रनाम | Shiv Sahastranaam
ॐ स्थिराय नमः,
ॐ स्थाणवे नमः,
ॐ प्रभवे नमः,
ॐ भीमाय नमः,
ॐ प्रवराय नमः,
ॐ वरदाय नमः,
ॐ वराय नमः,
ॐ सर्वात्मने नमः,
ॐ सर्वविख्याताय नमः,
ॐ सर्वस्मै नमः
ॐ सर्वकाराय नमः,
ॐ भवाय नमः,
ॐ जटिने नमः,
ॐ चर्मिणे नमः,
ॐ शिखण्डिने नमः,
ॐ सर्वांङ्गाय नमः,
ॐ सर्वभावाय नमः,
ॐ हराय नमः,
ॐ हरिणाक्षाय नमः,
ॐ सर्वभूतहराय नमः
ॐ प्रभवे नमः,
ॐ प्रवृत्तये नमः,
ॐ निवृत्तये नमः,
ॐ नियताय नमः,
ॐ शाश्वताय नमः,
ॐ ध्रुवाय नमः,
ॐ श्मशानवासिने नमः,
ॐ भगवते नमः,
ॐ खेचराय नमः,
ॐ गोचराय नमः
ॐ अर्दनाय नमः,
ॐ अभिवाद्याय नमः,
ॐ महाकर्मणे नमः,
ॐ तपस्विने नमः,
ॐ भूतभावनाय नमः,
ॐ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नाय नमः,
ॐ सर्वलोकप्रजापतये नमः,
ॐ महारूपाय नमः,
ॐ महाकायाय नमः,
ॐ वृषरूपाय नमः
ॐ महायशसे नमः,
ॐ महात्मने नमः,
ॐ सर्वभूतात्मने नमः,
ॐ विश्वरूपाय नमः,
ॐ महाहनवे नमः,
ॐ लोकपालाय नमः,
ॐ अंतर्हितात्मने नमः,
ॐ प्रसादाय नमः,
ॐ हयगर्दभाय नमः,
ॐ पवित्राय नमः (50)
ॐ महते नमः,
ॐ नियमाय नमः,
ॐ नियमाश्रिताय नमः,
ॐ सर्वकर्मणे नमः,
ॐ स्वयंभूताय नमः,
ॐ आदये नमः,
ॐ आदिकराय नमः,
ॐ निधये नमः,
ॐ सहस्राक्षाय नमः,
ॐ विशालाक्षाय नमः,
ॐ सोमाय नमः,
ॐ नक्षत्रसाधकाय नमः,
ॐ चंद्राय नमः,
ॐ सूर्याय नमः,
ॐ शनये नमः,
ॐ केतवे नमः,
ॐ ग्रहाय नमः,
ॐ ग्रहपतये नमः,
ॐ वराय नमः,
ॐ अत्रये नमः,
ॐ अत्र्यानमस्कर्त्रे नमः,
ॐ मृगबाणार्पणाय नमः,
ॐ अनघाय नमः,
ॐ महातपसे नमः,
ॐ घोरतपसे नमः,
ॐ अदीनाय नमः,
ॐ दीनसाधककराय नमः,
ॐ संवत्सरकराय नमः,
ॐ मंत्राय नमः,
ॐ प्रमाणाय नमः,
ॐ परमन्तपाय नमः,
ॐ योगिने नमः,
ॐ योज्याय नमः,
ॐ महाबीजाय नमः,
ॐ महारेतसे नमः,
ॐ महाबलाय नमः,
ॐ सुवर्णरेतसे नमः,
ॐ सर्वज्ञाय नमः,
ॐ सुबीजाय नमः,
ॐ बीजवाहनाय नमः,
ॐ दशबाहवे नमः,
ॐ अनिमिषाय नमः,
ॐ नीलकण्ठाय नमः,
ॐ उमापतये नमः,
ॐ विश्वरूपाय नमः,
ॐ स्वयंश्रेष्ठाय नमः,
ॐ बलवीराय नमः,
ॐ अबलोगणाय नमः,
ॐ गणकर्त्रे नमः,
ॐ गणपतये नमः (100)
ॐ दिग्वाससे नमः,
ॐ कामाय नमः,
ॐ मंत्रविदे नमः,
ॐ परममन्त्राय नमः,
ॐ सर्वभावकराय नमः,
ॐ हराय नमः,
ॐ कमण्डलुधराय नमः,
ॐ धन्विते नमः,
ॐ बाणहस्ताय नमः,
ॐ कपालवते नमः,
ॐ अशनिने नमः,
ॐ शतघ्निने नमः,
ॐ खड्गिने नमः,
ॐ पट्टिशिने नमः,
ॐ आयुधिने नमः,
ॐ महते नमः,
ॐ स्रुवहस्ताय नमः,
ॐ सुरूपाय नमः,
ॐ तेजसे नमः,
ॐ तेजस्करनिधये नमः
ॐ उष्णीषिणे नमः,
ॐ सुवक्त्राय नमः,
ॐ उदग्राय नमः,
ॐ विनताय नमः,
ॐ दीर्घाय नमः,
ॐ हरिकेशाय नमः,
ॐ सुतीर्थाय नमः,
ॐ कृष्णाय नमः,
ॐ श्रृगालरूपाय नमः,
ॐ सिद्धार्थाय नमः
ॐ मुण्डाय नमः,
ॐ सर्वशुभंकराय नमः,
ॐ अजाय नमः,
ॐ बहुरूपाय नमः,
ॐ गन्धधारिणे नमः,
ॐ कपर्दिने नमः,
ॐ उर्ध्वरेतसे नमः,
ॐ उर्ध्वलिंगाय नमः,
ॐ उर्ध्वशायिने नमः,
ॐ नभस्थलाय नमः,
ॐ त्रिजटाय नमः,
ॐ चीरवाससे नमः,
ॐ रूद्राय नमः,
ॐ सेनापतये नमः,
ॐ विभवे नमः,
ॐ अहश्चराय नमः,
ॐ नक्तंचराय नमः,
ॐ तिग्ममन्यवे नमः,
ॐ सुवर्चसाय नमः,
ॐ गजघ्ने नमः (150)
ॐ दैत्यघ्ने नमः,
ॐ कालाय नमः,
ॐ लोकधात्रे नमः,
ॐ गुणाकराय नमः,
ॐ सिंहसार्दूलरूपाय नमः,
ॐ आर्द्रचर्माम्बराय नमः,
ॐ कालयोगिने नमः,
ॐ महानादाय नमः,
ॐ सर्वकामाय नमः,
ॐ चतुष्पथाय नमः,
ॐ निशाचराय नमः,
ॐ प्रेतचारिणे नमः,
ॐ भूतचारिणे नमः,
ॐ महेश्वराय नमः,
ॐ बहुभूताय नमः,
ॐ बहुधराय नमः,
ॐ स्वर्भानवे नमः,
ॐ अमिताय नमः,
ॐ गतये नमः,
ॐ नृत्यप्रियाय नमः,
ॐ नृत्यनर्ताय नमः,
ॐ नर्तकाय नमः,
ॐ सर्वलालसाय नमः,
ॐ घोराय नमः,
ॐ महातपसे नमः,
ॐ पाशाय नमः,
ॐ नित्याय नमः,
ॐ गिरिरूहाय नमः,
ॐ नभसे नमः,
ॐ सहस्रहस्ताय नमः,
ॐ विजयाय नमः,
ॐ व्यवसायाय नमः,
ॐ अतन्द्रियाय नमः,
ॐ अधर्षणाय नमः,
ॐ धर्षणात्मने नमः,
ॐ यज्ञघ्ने नमः,
ॐ कामनाशकाय नमः,
ॐ दक्षयागापहारिणे नमः,
ॐ सुसहाय नमः,
ॐ मध्यमाय नमः,
ॐ तेजोपहारिणे नमः,
ॐ बलघ्ने नमः,
ॐ मुदिताय नमः,
ॐ अर्थाय नमः,
ॐ अजिताय नमः,
ॐ अवराय नमः,
ॐ गम्भीरघोषाय नमः,
ॐ गम्भीराय नमः,
ॐ गंभीरबलवाहनाय नमः,
ॐ न्यग्रोधरूपाय नमः (200)
ॐ न्यग्रोधाय नमः,
ॐ वृक्षकर्णस्थितये नमः,
ॐ विभवे नमः,
ॐ सुतीक्ष्णदशनाय नमः,
ॐ महाकायाय नमः,
ॐ महाननाय नमः,
ॐ विश्वकसेनाय नमः,
ॐ हरये नमः,
ॐ यज्ञाय नमः,
ॐ संयुगापीडवाहनाय नमः,
ॐ तीक्ष्णतापाय नमः,
ॐ हर्यश्वाय नमः,
ॐ सहायाय नमः,
ॐ कर्मकालविदे नमः,
ॐ विष्णुप्रसादिताय नमः,
ॐ यज्ञाय नमः,
ॐ समुद्राय नमः,
ॐ वडमुखाय नमः,
ॐ हुताशनसहायाय नमः,
ॐ प्रशान्तात्मने नमः,
ॐ हुताशनाय नमः,
ॐ उग्रतेजसे नमः,
ॐ महातेजसे नमः,
ॐ जन्याय नमः,
ॐ विजयकालविदे नमः,
ॐ ज्योतिषामयनाय नमः,
ॐ सिद्धये नमः,
ॐ सर्वविग्रहाय नमः,
ॐ शिखिने नमः,
ॐ मुण्डिने नमः,
ॐ जटिने नमः,
ॐ ज्वालिने नमः,
ॐ मूर्तिजाय नमः,
ॐ मूर्ध्दगाय नमः,
ॐ बलिने नमः,
ॐ वेणविने नमः,
ॐ पणविने नमः,
ॐ तालिने नमः,
ॐ खलिने नमः,
ॐ कालकंटकाय नमः,
ॐ नक्षत्रविग्रहमतये नमः,
ॐ गुणबुद्धये नमः,
ॐ लयाय नमः,
ॐ अगमाय नमः,
ॐ प्रजापतये नमः,
ॐ विश्वबाहवे नमः,
ॐ विभागाय नमः,
ॐ सर्वगाय नमः,
ॐ अमुखाय नमः,
ॐ विमोचनाय नमः (250)
ॐ सुसरणाय नमः,
ॐ हिरण्यकवचोद्भाय नमः,
ॐ मेढ्रजाय नमः,
ॐ बलचारिणे नमः,
ॐ महीचारिणे नमः,
ॐ स्रुत्याय नमः,
ॐ सर्वतूर्यनिनादिने नमः,
ॐ सर्वतोद्यपरिग्रहाय नमः,
ॐ व्यालरूपाय नमः,
ॐ गुहावासिने नमः,
ॐ गुहाय नमः,
ॐ मालिने नमः,
ॐ तरंगविदे नमः,
ॐ त्रिदशाय नमः,
ॐ त्रिकालधृगे नमः,
ॐ कर्मसर्वबन्ध-विमोचनाय नमः,
ॐ असुरेन्द्राणां बन्धनाय नमः,
ॐ युधि शत्रुवानाशिने नमः,
ॐ सांख्यप्रसादाय नमः,
ॐ दुर्वाससे नमः,
ॐ सर्वसाधुनिषेविताय नमः,
ॐ प्रस्कन्दनाय नमः,
ॐ विभागज्ञाय नमः,
ॐ अतुल्याय नमः,
ॐ यज्ञविभागविदे नमः,
ॐ सर्वचारिणे नमः,
ॐ सर्ववासाय नमः,
ॐ दुर्वाससे नमः,
ॐ वासवाय नमः,
ॐ अमराय नमः,
ॐ हैमाय नमः,
ॐ हेमकराय नमः,
ॐ अयज्ञसर्वधारिणे नमः,
ॐ धरोत्तमाय नमः,
ॐ लोहिताक्षाय नमः,
ॐ महाक्षाय नमः,
ॐ विजयाक्षाय नमः,
ॐ विशारदाय नमः,
ॐ संग्रहाय नमः,
ॐ निग्रहाय नमः,
ॐ कर्त्रे नमः,
ॐ सर्पचीरनिवसनाय नमः,
ॐ मुख्याय नमः,
ॐ अमुख्याय नमः,
ॐ देहाय नमः,
ॐ काहलये नमः,
ॐ सर्वकामदाय नमः,
ॐ सर्वकालप्रसादाय नमः,
ॐ सुबलाय नमः,
ॐ बलरूपधृगे नमः(300)
ॐ सर्वकामवराय नमः,
ॐ सर्वदाय नमः,
ॐ सर्वतोमुखाय नमः,
ॐ आकाशनिर्विरूपाय नमः,
ॐ निपातिने नमः,
ॐ अवशाय नमः,
ॐ खगाय नमः,
ॐ रौद्ररूपाय नमः,
ॐ अंशवे नमः,
ॐ आदित्याय नमः,
ॐ बहुरश्मये नमः,
ॐ सुवर्चसिने नमः,
ॐ वसुवेगाय नमः,
ॐ महावेगाय नमः,
ॐ मनोवेगाय नमः,
ॐ निशाचराय नमः,
ॐ सर्ववासिने नमः,
ॐ श्रियावासिने नमः,
ॐ उपदेशकराय नमः,
ॐ अकराय नमः,
ॐ मुनये नमः,
ॐ आत्मनिरालोकाय नमः,
ॐ संभग्नाय नमः,
ॐ सहस्रदाय नमः,
ॐ पक्षिणे नमः,
ॐ पक्षरूपाय नमः,
ॐ अतिदीप्ताय नमः,
ॐ विशाम्पतये नमः,
ॐ उन्मादाय नमः,
ॐ मदनाय नमः,
ॐ कामाय नमः,
ॐ अश्वत्थाय नमः,
ॐ अर्थकराय नमः,
ॐ यशसे नमः,
ॐ वामदेवाय नमः,
ॐ वामाय नमः,
ॐ प्राचे नमः,
ॐ दक्षिणाय नमः,
ॐ वामनाय नमः,
ॐ सिद्धयोगिने नमः,
ॐ महर्षये नमः,
ॐ सिद्धार्थाय नमः,
ॐ सिद्धसाधकाय नमः,
ॐ भिक्षवे नमः,
ॐ भिक्षुरूपाय नमः,
ॐ विपणाय नमः,
ॐ मृदवे नमः,
ॐ अव्ययाय नमः,
ॐ महासेनाय नमः,
ॐ विशाखाय नमः (350)
ॐ षष्टिभागाय नमः,
ॐ गवाम्पतये नमः,
ॐ वज्रहस्ताय नमः,
ॐ विष्कम्भिने नमः,
ॐ चमुस्तंभनाय नमः,
ॐ वृत्तावृत्तकराय नमः,
ॐ तालाय नमः,
ॐ मधवे नमः,
ॐ मधुकलोचनाय नमः,
ॐ वाचस्पतये नमः,
ॐ वाजसनाय नमः,
ॐ नित्यमाश्रमपूजिताय नमः,
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः,
ॐ लोकचारिणे नमः,
ॐ सर्वचारिणे नमः,
ॐ विचारविदे नमः,
ॐ ईशानाय नमः,
ॐ ईश्वराय नमः,
ॐ कालाय नमः,
ॐ निशाचारिणे नमः,
ॐ पिनाकधृगे नमः,
ॐ निमितस्थाय नमः,
ॐ निमित्ताय नमः,
ॐ नन्दये नमः,
ॐ नन्दिकराय नमः,
ॐ हरये नमः,
ॐ नन्दीश्वराय नमः,
ॐ नन्दिने नमः,
ॐ नन्दनाय नमः,
ॐ नंन्दीवर्धनाय नमः,
ॐ भगहारिणे नमः,
ॐ निहन्त्रे नमः,
ॐ कालाय नमः,
ॐ ब्रह्मणे नमः,
ॐ पितामहाय नमः,
ॐ चतुर्मुखाय नमः,
ॐ महालिंगाय नमः,
ॐ चारूलिंगाय नमः,
ॐ लिंगाध्यक्षाय नमः,
ॐ सुराध्यक्षाय नमः,
ॐ योगाध्यक्षाय नमः,
ॐ युगावहाय नमः,
ॐ बीजाध्यक्षाय नमः,
ॐ बीजकर्त्रे नमः,
ॐ अध्यात्मानुगताय नमः,
ॐ बलाय नमः,
ॐ इतिहासाय नमः,
ॐ सकल्पाय नमः,
ॐ गौतमाय नमः,
ॐ निशाकराय नमः (400)
ॐ दम्भाय नमः,
ॐ अदम्भाय नमः,
ॐ वैदम्भाय नमः,
ॐ वश्याय नमः,
ॐ वशकराय नमः,
ॐ कलये नमः,
ॐ लोककर्त्रे नमः,
ॐ पशुपतये नमः,
ॐ महाकर्त्रे नमः,
ॐ अनौषधाय नमः,
ॐ अक्षराय नमः,
ॐ परब्रह्मणे नमः,
ॐ बलवते नमः,
ॐ शक्राय नमः,
ॐ नीतये नमः,
ॐ अनीतये नमः,
ॐ शुद्धात्मने नमः,
ॐ मान्याय नमः,
ॐ शुद्धाय नमः,
ॐ गतागताय नमः,
ॐ बहुप्रसादाय नमः,
ॐ सुस्पप्नाय नमः,
ॐ दर्पणाय नमः,
ॐ अमित्रजिते नमः,
ॐ वेदकराय नमः,
ॐ मंत्रकराय नमः,
ॐ विदुषे नमः,
ॐ समरमर्दनाय नमः,
ॐ महामेघनिवासिने नमः,
ॐ महाघोराय नमः,
ॐ वशिने नमः,
ॐ कराय नमः,
ॐ अग्निज्वालाय नमः,
ॐ महाज्वालाय नमः,
ॐ अतिधूम्राय नमः,
ॐ हुताय नमः,
ॐ हविषे नमः,
ॐ वृषणाय नमः,
ॐ शंकराय नमः,
ॐ नित्यंवर्चस्विने नमः,
ॐ धूमकेताय नमः,
ॐ नीलाय नमः,
ॐ अंगलुब्धाय नमः,
ॐ शोभनाय नमः,
ॐ निरवग्रहाय नमः,
ॐ स्वस्तिदायकाय नमः,
ॐ स्वस्तिभावाय नमः,
ॐ भागिने नमः,
ॐ भागकराय नमः,
ॐ लघवे नमः(450)
ॐ उत्संगाय नमः,
ॐ महांगाय नमः,
ॐ महागर्भपरायणाय नमः,
ॐ कृष्णवर्णाय नमः,
ॐ सुवर्णाय नमः,
ॐ सर्वदेहिनामिनिन्द्राय नमः,
ॐ महापादाय नमः,
ॐ महाहस्ताय नमः,
ॐ महाकायाय नमः,
ॐ महायशसे नमः,
ॐ महामूर्धने नमः,
ॐ महामात्राय नमः,
ॐ महानेत्राय नमः,
ॐ निशालयाय नमः,
ॐ महान्तकाय नमः,
ॐ महाकर्णाय नमः,
ॐ महोष्ठाय नमः,
ॐ महाहनवे नमः,
ॐ महानासाय नमः,
ॐ महाकम्बवे नमः,
ॐ महाग्रीवाय नमः,
ॐ श्मशानभाजे नमः,
ॐ महावक्षसे नमः,
ॐ महोरस्काय नमः,
ॐ अंतरात्मने नमः,
ॐ मृगालयाय नमः,
ॐ लंबनाय नमः,
ॐ लम्बितोष्ठाय नमः,
ॐ महामायाय नमः,
ॐ पयोनिधये नमः,
ॐ महादन्ताय नमः,
ॐ महाद्रष्टाय नमः,
ॐ महाजिह्वाय नमः,
ॐ महामुखाय नमः,
ॐ महारोम्णे नमः,
ॐ महाकोशाय नमः,
ॐ महाजटाय नमः,
ॐ प्रसन्नाय नमः,
ॐ प्रसादाय नमः,
ॐ प्रत्ययाय नमः,
ॐ गिरिसाधनाय नमः,
ॐ स्नेहनाय नमः,
ॐ अस्नेहनाय नमः,
ॐ अजिताय नमः,
ॐ महामुनये नमः,
ॐ वृक्षाकाराय नमः,
ॐ वृक्षकेतवे नमः,
ॐ अनलाय नमः,
ॐ वायुवाहनाय नमः (500)
ॐ गण्डलिने नमः,
ॐ मेरूधाम्ने नमः,
ॐ देवाधिपतये नमः,
ॐ अथर्वशीर्षाय नमः,
ॐ सामास्या नमः,
ॐ ऋक्सहस्रामितेक्षणाय नमः,
ॐ यजुः पादभुजाय नमः,
ॐ गुह्याय नमः,
ॐ प्रकाशाय नमः,
ॐ जंगमाय नमः,
ॐ अमोघार्थाय नमः,
ॐ प्रसादाय नमः,
ॐ अभिगम्याय नमः,
ॐ सुदर्शनाय नमः,
ॐ उपकाराय नमः,
ॐ प्रियाय नमः,
ॐ सर्वाय नमः,
ॐ कनकाय नमः,
ॐ काञ्चनवच्छये नमः,
ॐ नाभये नमः,
ॐ नन्दिकराय नमः,
ॐ भावाय नमः,
ॐ पुष्करथपतये नमः,
ॐ स्थिराय नमः,
ॐ द्वादशाय नमः,
ॐ त्रासनाय नमः,
ॐ आद्याय नमः,
ॐ यज्ञाय नमः,
ॐ यज्ञसमाहिताय नमः,
ॐ नक्तंस्वरूपाय नमः,
ॐ कलये नमः,
ॐ कालाय नमः,
ॐ मकराय नमः,
ॐ कालपूजिताय नमः,
ॐ सगणाय नमः,
ॐ गणकराय नमः,
ॐ भूतवाहनसारथये नमः,
ॐ भस्मशयाय नमः,
ॐ भस्मगोप्त्रे नमः,
ॐ भस्मभूताय नमः,
ॐ तरवे नमः,
ॐ गणाय नमः,
ॐ लोकपालाय नमः,
ॐ आलोकाय नमः,
ॐ महात्मने नमः,
ॐ सर्वपूजिताय नमः,
ॐ शुक्लाय नमः,
ॐ त्रिशुक्लाय नमः,
ॐ संपन्नाय नमः,
ॐ शुचये नमः (550)
ॐ भूतनिशेविताय नमः,
ॐ आश्रमस्थाय नमः,
ॐ क्रियावस्थाय नमः,
ॐ विश्वकर्ममतये नमः,
ॐ वराय नमः,
ॐ विशालशाखाय नमः,
ॐ ताम्रोष्ठाय नमः,
ॐ अम्बुजालाय नमः,
ॐ सुनिश्चलाय नमः,
ॐ कपिलाय नमः,
ॐ कपिशाय नमः,
ॐ शुक्लाय नमः,
ॐ आयुषे नमः,
ॐ पराय नमः,
ॐ अपराय नमः,
ॐ गंधर्वाय नमः,
ॐ अदितये नमः,
ॐ ताक्ष्याय नमः,
ॐ सुविज्ञेयाय नमः,
ॐ सुशारदाय नमः,
ॐ परश्वधायुधाय नमः,
ॐ देवाय नमः,
ॐ अनुकारिणे नमः,
ॐ सुबान्धवाय नमः,
ॐ तुम्बवीणाय नमः,
ॐ महाक्रोधाय नमः,
ॐ ऊर्ध्वरेतसे नमः,
ॐ जलेशयाय नमः,
ॐ उग्राय नमः,
ॐ वंशकराय नमः,
ॐ वंशाय नमः,
ॐ वंशानादाय नमः,
ॐ अनिन्दिताय नमः,
ॐ सर्वांगरूपाय नमः,
ॐ मायाविने नमः,
ॐ सुहृदे नमः,
ॐ अनिलाय नमः,
ॐ अनलाय नमः,
ॐ बन्धनाय नमः,
ॐ बन्धकर्त्रे नमः,
ॐ सुवन्धनविमोचनाय नमः,
ॐ सयज्ञयारये नमः,
ॐ सकामारये नमः,
ॐ महाद्रष्टाय नमः,
ॐ महायुधाय नमः,
ॐ बहुधानिन्दिताय नमः,
ॐ शर्वाय नमः,
ॐ शंकराय नमः,
ॐ शं कराय नमः,
ॐ अधनाय नमः (600)
ॐ अमरेशाय नमः,
ॐ महादेवाय नमः,
ॐ विश्वदेवाय नमः,
ॐ सुरारिघ्ने नमः,
ॐ अहिर्बुद्धिन्याय नमः,
ॐ अनिलाभाय नमः,
ॐ चेकितानाय नमः,
ॐ हविषे नमः,
ॐ अजैकपादे नमः,
ॐ कापालिने नमः,
ॐ त्रिशंकवे नमः,
ॐ अजिताय नमः,
ॐ शिवाय नमः,
ॐ धन्वन्तरये नमः,
ॐ धूमकेतवे नमः,
ॐ स्कन्दाय नमः,
ॐ वैश्रवणाय नमः,
ॐ धात्रे नमः,
ॐ शक्राय नमः,
ॐ विष्णवे नमः,
ॐ मित्राय नमः,
ॐ त्वष्ट्रे नमः,
ॐ ध्रुवाय नमः,
ॐ धराय नमः,
ॐ प्रभावाय नमः,
ॐ सर्वगोवायवे नमः,
ॐ अर्यम्णे नमः,
ॐ सवित्रे नमः,
ॐ रवये नमः,
ॐ उषंगवे नमः,
ॐ विधात्रे नमः,
ॐ मानधात्रे नमः,
ॐ भूतवाहनाय नमः,
ॐ विभवे नमः,
ॐ वर्णविभाविने नमः,
ॐ सर्वकामगुणवाहनाय नमः,
ॐ पद्मनाभाय नमः,
ॐ महागर्भाय नमः,
ॐ चन्द्रवक्त्राय नमः,
ॐ अनिलाय नमः,
ॐ अनलाय नमः,
ॐ बलवते नमः,
ॐ उपशान्ताय नमः,
ॐ पुराणाय नमः,
ॐ पुण्यचञ्चवे नमः,
ॐ ईरूपाय नमः,
ॐ कुरूकर्त्रे नमः,
ॐ कुरूवासिने नमः,
ॐ कुरूभूताय नमः,
ॐ गुणौषधाय नमः (650)
ॐ सर्वाशयाय नमः,
ॐ दर्भचारिणे नमः,
ॐ सर्वप्राणिपतये नमः,
ॐ देवदेवाय नमः,
ॐ सुखासक्ताय नमः,
ॐ सत स्वरूपाय नमः,
ॐ असत् रूपाय नमः,
ॐ सर्वरत्नविदे नमः,
ॐ कैलाशगिरिवासने नमः,
ॐ हिमवद्गिरिसंश्रयाय नमः,
ॐ कूलहारिणे नमः,
ॐ कुलकर्त्रे नमः,
ॐ बहुविद्याय नमः,
ॐ बहुप्रदाय नमः,
ॐ वणिजाय नमः,
ॐ वर्धकिने नमः,
ॐ वृक्षाय नमः,
ॐ बकुलाय नमः,
ॐ चंदनाय नमः,
ॐ छदाय नमः,
ॐ सारग्रीवाय नमः,
ॐ महाजत्रवे नमः,
ॐ अलोलाय नमः,
ॐ महौषधाय नमः,
ॐ सिद्धार्थकारिणे नमः,
ॐ छन्दोव्याकरणोत्तर-सिद्धार्थाय नमः,
ॐ सिंहनादाय नमः,
ॐ सिंहद्रंष्टाय नमः,
ॐ सिंहगाय नमः,
ॐ सिंहवाहनाय नमः,
ॐ प्रभावात्मने नमः,
ॐ जगतकालस्थालाय नमः,
ॐ लोकहिताय नमः,
ॐ तरवे नमः,
ॐ सारंगाय नमः,
ॐ नवचक्रांगाय नमः,
ॐ केतुमालिने नमः,
ॐ सभावनाय नमः,
ॐ भूतालयाय नमः,
ॐ भूतपतये नमः,
ॐ अहोरात्राय नमः,
ॐ अनिन्दिताय नमः,
ॐ सर्वभूतवाहित्रे नमः,
ॐ सर्वभूतनिलयाय नमः,
ॐ विभवे नमः,
ॐ भवाय नमः,
ॐ अमोघाय नमः,
ॐ संयताय नमः,
ॐ अश्वाय नमः,
ॐ भोजनाय नमः, (700)
ॐ प्राणधारणाय नमः,
ॐ धृतिमते नमः,
ॐ मतिमते नमः,
ॐ दक्षाय नमः
ॐ सत्कृयाय नमः,
ॐ युगाधिपाय नमः,
ॐ गोपाल्यै नमः,
ॐ गोपतये नमः,
ॐ ग्रामाय नमः,
ॐ गोचर्मवसनाय नमः,
ॐ हरये नमः,
ॐ हिरण्यबाहवे नमः,
ॐ प्रवेशिनांगुहापालाय नमः,
ॐ प्रकृष्टारये नमः,
ॐ महाहर्षाय नमः,
ॐ जितकामाय नमः,
ॐ जितेन्द्रियाय नमः,
ॐ गांधाराय नमः,
ॐ सुवासाय नमः,
ॐ तपःसक्ताय नमः,
ॐ रतये नमः,
ॐ नराय नमः,
ॐ महागीताय नमः,
ॐ महानृत्याय नमः,
ॐ अप्सरोगणसेविताय नमः,
ॐ महाकेतवे नमः,
ॐ महाधातवे नमः,
ॐ नैकसानुचराय नमः,
ॐ चलाय नमः,
ॐ आवेदनीयाय नमः,
ॐ आदेशाय नमः,
ॐ सर्वगंधसुखावहाय नमः,
ॐ तोरणाय नमः,
ॐ तारणाय नमः,
ॐ वाताय नमः,
ॐ परिधये नमः,
ॐ पतिखेचराय नमः,
ॐ संयोगवर्धनाय नमः,
ॐ वृद्धाय नमः,
ॐ गुणाधिकाय नमः,
ॐ अतिवृद्धाय नमः,
ॐ नित्यात्मसहायाय नमः,
ॐ देवासुरपतये नमः,
ॐ पत्ये नमः,
ॐ युक्ताय नमः,
ॐ युक्तबाहवे नमः,
ॐ दिविसुपर्वदेवाय नमः,
ॐ आषाढाय नमः,
ॐ सुषाढ़ाय नमः,
ॐ ध्रुवाय नमः (750)
ॐ हरिणाय नमः,
ॐ हराय नमः,
ॐ आवर्तमानवपुषे नमः,
ॐ वसुश्रेष्ठाय नमः,
ॐ महापथाय नमः,
ॐ विमर्षशिरोहारिणे नमः,
ॐ सर्वलक्षणलक्षिताय नमः,
ॐ अक्षरथयोगिने नमः,
ॐ सर्वयोगिने नमः,
ॐ महाबलाय नमः,
ॐ समाम्नायाय नमः,
ॐ असाम्नायाय नमः,
ॐ तीर्थदेवाय नमः,
ॐ महारथाय नमः,
ॐ निर्जीवाय नमः,
ॐ जीवनाय नमः,
ॐ मंत्राय नमः,
ॐ शुभाक्षाय नमः,
ॐ बहुकर्कशाय नमः,
ॐ रत्नप्रभूताय नमः,
ॐ रत्नांगाय नमः,
ॐ महार्णवनिपानविदे नमः,
ॐ मूलाय नमः,
ॐ विशालाय नमः,
ॐ अमृताय नमः,
ॐ व्यक्ताव्यवक्ताय नमः,
ॐ तपोनिधये नमः,
ॐ आरोहणाय नमः,
ॐ अधिरोहाय नमः,
ॐ शीलधारिणे नमः,
ॐ महायशसे नमः,
ॐ सेनाकल्पाय नमः,
ॐ महाकल्पाय नमः,
ॐ योगाय नमः,
ॐ युगकराय नमः,
ॐ हरये नमः,
ॐ युगरूपाय नमः,
ॐ महारूपाय नमः,
ॐ महानागहतकाय नमः,
ॐ अवधाय नमः,
ॐ न्यायनिर्वपणाय नमः,
ॐ पादाय नमः,
ॐ पण्डिताय नमः,
ॐ अचलोपमाय नमः,
ॐ बहुमालाय नमः,
ॐ महामालाय नमः,
ॐ शशिहरसुलोचनाय नमः,
ॐ विस्तारलवणकूपाय नमः,
ॐ त्रिगुणाय नमः,
ॐ सफलोदयाय नमः (800)
ॐ त्रिलोचनाय नमः,
ॐ विषण्डागाय नमः,
ॐ मणिविद्धाय नमः,
ॐ जटाधराय नमः,
ॐ बिन्दवे नमः,
ॐ विसर्गाय नमः,
ॐ सुमुखाय नमः,
ॐ शराय नमः,
ॐ सर्वायुधाय नमः,
ॐ सहाय नमः,
ॐ सहाय नमः,
ॐ निवेदनाय नमः,
ॐ सुखाजाताय नमः,
ॐ सुगन्धराय नमः,
ॐ महाधनुषे नमः,
ॐ गंधपालिभगवते नमः,
ॐ सर्वकर्मोत्थानाय नमः,
ॐ मन्थानबहुलवायवे नमः,
ॐ सकलाय नमः,
ॐ सर्वलोचनाय नमः,
ॐ तलस्तालाय नमः,
ॐ करस्थालिने नमः,
ॐ ऊर्ध्वसंहननाय नमः,
ॐ महते नमः,
ॐ छात्राय नमः,
ॐ सुच्छत्राय नमः,
ॐ विख्यातलोकाय नमः,
ॐ सर्वाश्रयक्रमाय नमः,
ॐ मुण्डाय नमः,
ॐ विरूपाय नमः,
ॐ विकृताय नमः,
ॐ दण्डिने नमः,
ॐ कुदण्डिने नमः,
ॐ विकुर्वणाय नमः,
ॐ हर्यक्षाय नमः,
ॐ ककुभाय नमः,
ॐ वज्रिणे नमः,
ॐ शतजिह्वाय नमः,
ॐ सहस्रपदे नमः,
ॐ देवेन्द्राय नमः,
ॐ सर्वदेवमयाय नमः,
ॐ गुरवे नमः,
ॐ सहस्रबाहवे नमः,
ॐ सर्वांगाय नमः,
ॐ शरण्याय नमः,
ॐ सर्वलोककृते नमः,
ॐ पवित्राय नमः,
ॐ त्रिककुन्मंत्राय नमः,
ॐ कनिष्ठाय नमः,
ॐ कृष्णपिंगलाय नमः (850)
ॐ ब्रह्मदण्डविनिर्मात्रे नमः,
ॐ शतघ्नीपाशशक्तिमते नमः,
ॐ पद्मगर्भाय नमः,
ॐ महागर्भाय नमः,
ॐ ब्रह्मगर्भाय नमः,
ॐ जलोद्भावाय नमः,
ॐ गभस्तये नमः,
ॐ ब्रह्मकृते नमः,
ॐ ब्रह्मिणे नमः,
ॐ ब्रह्मविदे नमः,
ॐ ब्राह्मणाय नमः,
ॐ गतये नमः,
ॐ अनंतरूपाय नमः,
ॐ नैकात्मने नमः,
ॐ स्वयंभुवतिग्मतेजसे नमः,
ॐ उर्ध्वगात्मने नमः,
ॐ पशुपतये नमः,
ॐ वातरंहसे नमः,
ॐ मनोजवाय नमः,
ॐ चंदनिने नमः,
ॐ पद्मनालाग्राय नमः,
ॐ सुरभ्युत्तारणाय नमः,
ॐ नराय नमः,
ॐ कर्णिकारमहास्रग्विणमे नमः,
ॐ नीलमौलये नमः,
ॐ पिनाकधृषे नमः,
ॐ उमापतये नमः,
ॐ उमाकान्ताय नमः,
ॐ जाह्नवीधृषे नमः,
ॐ उमादवाय नमः,
ॐ वरवराहाय नमः,
ॐ वरदाय नमः,
ॐ वरेण्याय नमः,
ॐ सुमहास्वनाय नमः,
ॐ महाप्रसादाय नमः,
ॐ दमनाय नमः,
ॐ शत्रुघ्ने नमः,
ॐ श्वेतपिंगलाय नमः,
ॐ पीतात्मने नमः,
ॐ परमात्मने नमः,
ॐ प्रयतात्मने नमः,
ॐ प्रधानधृषे नमः,
ॐ सर्वपार्श्वमुखाय नमः,
ॐ त्रक्षाय नमः,
ॐ धर्मसाधारणवराय नमः,
ॐ चराचरात्मने नमः,
ॐ सूक्ष्मात्मने नमः,
ॐ अमृतगोवृषेश्वराय नमः,
ॐ साध्यर्षये नमः,
ॐ आदित्यवसवे नमः (900)
ॐ विवस्वत्सवित्रमृताय नमः,
ॐ व्यासाय नमः,
ॐ सर्गसुसंक्षेपविस्तराय नमः,
ॐ पर्ययोनराय नमः,
ॐ ऋतवे नमः,
ॐ संवत्सराय नमः,
ॐ मासाय नमः,
ॐ पक्षाय नमः,
ॐ संख्यासमापनाय नमः,
ॐ कलायै नमः,
ॐ काष्ठायै नमः,
ॐ लवेभ्यो नमः,
ॐ मात्रेभ्यो नमः,
ॐ मुहूर्ताहःक्षपाभ्यो नमः,
ॐ क्षणेभ्यो नमः,
ॐ विश्वक्षेत्राय नमः,
ॐ प्रजाबीजाय नमः,
ॐ लिंगाय नमः,
ॐ आद्यनिर्गमाय नमः,
ॐ सत् स्वरूपाय नमः,
ॐ असत् रूपाय नमः,
ॐ व्यक्ताय नमः,
ॐ अव्यक्ताय नमः,
ॐ पित्रे नमः,
ॐ मात्रे नमः,
ॐ पितामहाय नमः,
ॐ स्वर्गद्वाराय नमः,
ॐ प्रजाद्वाराय नमः,
ॐ मोक्षद्वाराय नमः,
ॐ त्रिविष्टपाय नमः,
ॐ निर्वाणाय नमः,
ॐ ह्लादनाय नमः,
ॐ ब्रह्मलोकाय नमः,
ॐ परागतये नमः,
ॐ देवासुरविनिर्मात्रे नमः,
ॐ देवासुरपरायणाय नमः,
ॐ देवासुरगुरूवे नमः,
ॐ देवाय नमः,
ॐ देवासुरनमस्कृताय नमः,
ॐ देवासुरमहामात्राय नमः,
ॐ देवासुरमहामात्राय नमः,
ॐ देवासुरगणाश्रयाय नमः,
ॐ देवासुरगणाध्यक्षाय नमः,
ॐ देवासुरगणाग्रण्ये नमः,
ॐ देवातिदेवाय नमः,
ॐ देवर्षये नमः,
ॐ देवासुरवरप्रदाय नमः,
ॐ विश्वाय नमः,
ॐ देवासुरमहेश्वराय नमः,
ॐ सर्वदेवमयाय नमः(950)
ॐ अचिंत्याय नमः,
ॐ देवात्मने नमः,
ॐ आत्मसंबवाय नमः,
ॐ उद्भिदे नमः,
ॐ त्रिविक्रमाय नमः,
ॐ वैद्याय नमः,
ॐ विरजाय नमः,
ॐ नीरजाय नमः,
ॐ अमराय नमः,
ॐ इड्याय नमः,
ॐ हस्तीश्वराय नमः,
ॐ व्याघ्राय नमः,
ॐ देवसिंहाय नमः,
ॐ नरर्षभाय नमः,
ॐ विभुदाय नमः,
ॐ अग्रवराय नमः,
ॐ सूक्ष्माय नमः,
ॐ सर्वदेवाय नमः,
ॐ तपोमयाय नमः,
ॐ सुयुक्ताय नमः,
ॐ शोभनाय नमः,
ॐ वज्रिणे नमः,
ॐ प्रासानाम्प्रभवाय नमः,
ॐ अव्ययाय नमः,
ॐ गुहाय नमः,
ॐ कान्ताय नमः,
ॐ निजसर्गाय नमः,
ॐ पवित्राय नमः,
ॐ सर्वपावनाय नमः,
ॐ श्रृंगिणे नमः,
ॐ श्रृंगप्रियाय नमः,
ॐ बभ्रवे नमः,
ॐ राजराजाय नमः,
ॐ निरामयाय नमः,
ॐ अभिरामाय नमः,
ॐ सुरगणाय नमः,
ॐ विरामाय नमः,
ॐ सर्वसाधनाय नमः,
ॐ ललाटाक्षाय नमः,
ॐ विश्वदेवाय नमः,
ॐ हरिणाय नमः,
ॐ ब्रह्मवर्चसे नमः,
ॐ स्थावरपतये नमः,
ॐ नियमेन्द्रियवर्धनाय नमः,
ॐ सिद्धार्थाय नमः,
ॐ सिद्धभूतार्थाय नमः,
ॐ अचिन्ताय नमः,
ॐ सत्यव्रताय नमः,
ॐ शुचये नमः,
ॐ व्रताधिपाय नमः,
ॐ पराय नमः,
ॐ ब्रह्मणे नमः,
ॐ भक्तानांपरमागतये नमः,
ॐ विमुक्ताय नमः,
ॐ मुक्ततेजसे नमः,
ॐ श्रीमते नमः,
ॐ श्रीवर्धनाय नमः,
ॐ श्री जगते नमः (1008)
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
॥ इति शिव सहस्त्रनाम सम्पूर्ण ॥
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री शिव सहस्त्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
1. श्री शिव सहस्त्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान सहस्त्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैदिक दर्शन और ‘शिव-तत्व’ को समझने के लिए हमें इसके प्राकट्य, पुराणों के प्रसंग और इसके नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।
उत्पत्ति और महाभारत का प्रसंग
श्री शिव सहस्त्रनाम के कई स्वरूप मिलते हैं। लिंग पुराण और शिव पुराण में इसके अलग-अलग पाठ हैं। परंतु सबसे प्रसिद्ध ‘शिव सहस्त्रनाम’ महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित है। जब चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से शिव जी की महिमा के बारे में पूछा, तब श्रीकृष्ण ने महर्षि उपमन्यु (या महर्षि तंडी) द्वारा रचित शिव के 1000 नामों का उपदेश दिया। भगवान विष्णु ने स्वयं शिव के इन 1000 नामों का गान करते हुए उन्हें 1000 कमल पुष्प अर्पित किए थे, जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें अजेय ‘सुदर्शन चक्र’ प्रदान किया था। जब साक्षात नारायण शिव की स्तुति करते हैं, तो उस स्तोत्र की शक्ति का अनुमान लगाना भी मानवीय बुद्धि से परे है।
परब्रह्म और शून्य का स्वरूप
शिव का अर्थ है— ‘कल्याणकारी’। शिव वह शून्य हैं जहाँ से सब कुछ उत्पन्न होता है और जहाँ सब कुछ विलीन हो जाता है। भगवान के इन 1000 नामों (जैसे- ॐ शिवाय नमः, ॐ हराय नमः, ॐ नीलकंठाय नमः, ॐ मृत्युंजयाय नमः) में संपूर्ण वेदों का सार छिपा है। भगवान का प्रत्येक नाम उनके एक विशिष्ट गुण, उनके अनंत ऐश्वर्य और परब्रह्म स्वरूप का दर्शन कराता है।
‘सहस्त्रनाम’ का अद्भुत नाद-विज्ञान (The Science of Sound Vibrations)
सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। जब साधक पूर्ण लय, श्रद्धा और नाद के साथ इन 1000 नामों का सस्वर पाठ करता है, तो उसके शरीर की 72,000 नाड़ियों में एक गजब का कंपन (Vibration) पैदा होता है। यह ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के जालों को साफ करती हैं और साधक के मूलाधार में सोई कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर उसे सहस्रार तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
2. श्री शिव सहस्त्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
भगवान शिव साक्षात करुणा, आरोग्य, वैराग्य और मोक्ष के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या सोमवार/प्रदोष जैसे विशेष पर्वों पर इस सहस्त्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
स्वास्थ्य, आयु और शारीरिक लाभ (Health & Longevity)
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अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा: भगवान शिव ‘महामृत्युंजय’ और ‘कालान्तक’ (काल का भी अंत करने वाले) हैं। जो साधक नित्य शिव सहस्त्रनाम का पाठ करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय कभी नहीं सताता। यह पाठ साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बना देता है।
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असाध्य रोगों से मुक्ति (Healing Power): शिव साक्षात ‘वैद्यनाथ’ हैं। यदि घर में कोई व्यक्ति गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित है, तो इस स्तोत्र के पाठ से अभिमंत्रित किया गया जल (रुद्राभिषेक का जल) साक्षात संजीवनी का कार्य करता है।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Spiritual Bliss)
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तनाव, डिप्रेशन और भय से मुक्ति: शिव का स्मरण भयंकर अवसाद (Depression), डर (Phobias) और चिंताओं को समाप्त कर देता है। भगवान का ‘नीलकंठ’ स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन के विष (कष्टों) को कैसे पीकर शांत रहा जाए। मस्तिष्क को असीम शीतलता प्राप्त होती है।
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वैराग्य और मोक्ष की प्राप्ति: जीवन के अंतिम चरण में या निष्काम भाव से इसका पाठ करने वाले साधक को मृत्यु के समय शिव लोक (कैलाश) की प्राप्ति होती है। यह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर देता है।
लौकिक, आर्थिक और नवग्रह शांति (Astrological & Worldly Benefits)
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नवग्रह दोष और शनि-राहु की शांति: भगवान शिव नवग्रहों के भी स्वामी (नवग्रहेश्वर) हैं। शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, या राहु-केतु की भयंकर महादशा में जब व्यक्ति टूट जाता है, तब शिव सहस्त्रनाम का पाठ इन क्रूर ग्रहों को तुरंत शांत कर देता है।
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अखंड सुख-समृद्धि की प्राप्ति: भगवान शिव भले ही वैरागी हों, परंतु वे अपने भक्तों को कुबेर के समान धनवान बना सकते हैं। दरिद्रता का नाश करने और जीवन में भौतिक स्थिरता (नौकरी, व्यापार) प्राप्त करने के लिए यह पाठ अचूक है।
3. श्री शिव सहस्त्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
भगवान शिव की उपासना अत्यंत सरल, सात्विक और आडंबर-रहित होती है। इस सिद्ध स्तोत्र का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक ग्रंथों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान शिव की आराधना के लिए सोमवार (Monday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक फलदायी माना जाता है।
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विशेष तिथियां: प्रत्येक मास की त्रयोदशी (प्रदोष व्रत), मासिक शिवरात्रि (कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी), महाशिवरात्रि, और श्रावण (सावन) मास का प्रत्येक दिन इसका पाठ करने के लिए हज़ारों गुणा अधिक जाग्रत माना गया है।
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समय: पाठ का सबसे उत्तम समय ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद का समय) या प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) होता है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East – ज्ञान व प्रकाश के लिए) या उत्तर (North – हिमालय/शिव की दिशा व समृद्धि के लिए) की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए सफेद, कुशा का आसन, या बाघंबर/मृगछाला (यदि उपलब्ध हो) का प्रयोग करें।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में श्वेत (White) रंग, भस्म रंग, या हल्के पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
| सामग्री / विधान | विवरण |
| प्रतिमा / शिवलिंग | एक स्वच्छ चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर भगवान शिव का चित्र/मूर्ति या नर्मदेश्वर/पारद शिवलिंग स्थापित करें। शिव पूजा में शिवलिंग का होना सर्वोत्तम है। |
| दीपक | भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। चंदन या भस्म की धूप जलाएं। |
| तिलक और शृंगार | शिवलिंग पर पवित्र भस्म (विभूति) और श्वेत चंदन का त्रिपुंड लगाएं। स्वयं भी मस्तक, कंठ और भुजाओं पर त्रिपुंड धारण करें। |
| पुष्प और बिल्वपत्र | उन्हें श्वेत पुष्प (आक, धतूरा, मदार, चमेली) अत्यंत प्रिय हैं। सबसे महत्वपूर्ण: भगवान शिव की पूजा बिना बिल्वपत्र (Bel Patra) के पूर्ण नहीं होती। |
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (साबुत चावल) और एक बिल्वपत्र लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे देवाधिदेव महादेव, मैं अपने परिवार के समस्त पापों, व्याधियों (रोगों) व संकटों के नाश, अखंड सुख-समृद्धि, अकाल मृत्यु से रक्षा और आपकी अहैतुकी भक्ति के लिए श्री शिव सहस्त्रनाम का 21/41 दिन तक (या नित्य/प्रत्येक सोमवार) पाठ करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
स्तोत्र का पाठ और सहस्त्रार्चन विधि (Chanting Method & Archana)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और माता पार्वती का मानसिक ध्यान कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।
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नंदीश्वर भगवान को मानसिक रूप से प्रणाम करें।
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भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” की कम से कम 11 बार या एक माला (रुद्राक्ष की माला पर) जप करें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और हृदय में शिव के वैरागी व कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन करते हुए ‘श्री शिव सहस्त्रनाम’ के 1000 नामों का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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सहस्त्रार्चन विधि (अचूक चमत्कार हेतु): यदि आप स्तोत्र के बजाय ‘नामावली’ (प्रत्येक नाम के अंत में नमः लगाकर, जैसे- ॐ शिवाय नमः, ॐ हराय नमः) का पाठ कर रहे हैं, तो प्रत्येक नाम के साथ शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र, श्वेत पुष्प, या अक्षत अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। इसे ‘शिव सहस्त्रार्चन’ कहते हैं, जो असाध्य रोगों को मिटाने और किसी भी बड़ी से बड़ी मनोकामना को पूर्ण करने का ब्रह्मास्त्र है (भगवान विष्णु ने इसी विधि से सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था)।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान शिव को गाय के कच्चे दूध, पंचामृत, भांग, सफेद मिष्ठान्न, या केवल मिश्री का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से भगवान की आरती (ॐ जय शिव ओंकारा…) गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
भगवान शिव आशुतोष हैं, वे जल की एक बूंद से भी प्रसन्न हो जाते हैं, परंतु उनकी साधना में हृदय की निर्मलता और आचरण की पवित्रता की अत्यधिक आवश्यकता होती है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
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पूर्ण सात्विक जीवन (Pure Sattvic Diet): यह शिव साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम है। जो व्यक्ति मांस, मदिरा, अंडे का सेवन करता है, उसकी सात्विक पूजा भगवान कभी स्वीकार नहीं करते। अनुष्ठान करने वाले के घर में पूर्ण सात्विकता होनी चाहिए। तामसिक भोजन से स्तोत्र की ऊर्जा खंडित हो जाती है।
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क्रोध का परित्याग: भगवान शिव को क्रोध आता है तो तीसरा नेत्र खुलता है और प्रलय होती है, परंतु वे सदैव शांत रहते हैं। शिव साधक को भी अपने भीतर के क्रोध (विष) को नीलकंठ की भांति पी जाना चाहिए। बात-बात पर चीखने-चिल्लाने वाले पर शिव कृपा नहीं करते।
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सत्य का आचरण: भगवान शिव ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ हैं। जीवन में सत्य और ईमानदारी का कठोरता से पालन करें।
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अहंकार शून्यता (Zero Ego): भगवान शिव श्मशान की भस्म लपेटते हैं, जो यह याद दिलाती है कि अंत में सब कुछ राख होना है। यदि आपके भीतर धन, पद या विद्या का घमंड है, तो भगवान की कृपा नहीं मिलेगी।
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ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): किसी विशेष मनोकामना के लिए अनुष्ठान (जैसे 41 दिन या सावन मास का पूरा संकल्प) के दौरान साधक को शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
श्री शिव सहस्त्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई दोष न लगे:
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तुलसी और सिंदूर का निषेध: भगवान शिव की पूजा में ‘तुलसी’ (Tulsi leaves) और ‘सिंदूर/कुमकुम’ का प्रयोग सर्वथा वर्जित माना गया है। शिवलिंग पर केवल भस्म, चंदन और बिल्वपत्र ही चढ़ाए जाते हैं।
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बिल्वपत्र तोड़ने के नियम: शास्त्रों के अनुसार— सोमवार, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, और संक्रांति के दिन बिल्वपत्र तोड़ना वर्जित है। पूजा के लिए बिल्वपत्र एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें (बिल्वपत्र बासी नहीं माने जाते, आप धोकर पुनः उपयोग कर सकते हैं)।
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प्रतिशोध की भावना का त्याग (No Revenge Motive): यह स्तुति मोक्ष, शांति और संकट-मुक्ति के लिए है। किसी निर्दोष व्यक्ति का अहित करने या अपना व्यक्तिगत बदला लेने की नीयत (Sakam Bhav) से इसका पाठ भूलकर भी न करें। शिव न्यायकारी हैं; गलत मंशा से किया गया पाठ साधक का ही अहित कर सकता है।
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शारीरिक पवित्रता (Sutak/Patak): बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (जन्म-मृत्यु के सूतक/पातक) में शिवलिंग या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दौरान इस पाठ और पूजा कक्ष से दूर रहना चाहिए।
6. आधुनिक युग में श्री शिव सहस्त्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक २१वीं सदी का युग अत्यधिक ‘तनाव’ (Stress), ‘भय’ (Insecurity), ‘मानसिक अस्थिरता’ और ‘गति’ (Speed) का युग है। इंसान हर सुख-सुविधा धन से खरीद रहा है, लेकिन ‘रातों की नींद’ और ‘मन की शांति’ गायब है।
अत्यधिक लालच, प्रतिस्पर्धा और बीमारियों के डर (Health Anxiety) ने आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression) और पैनिक अटैक्स (Panic attacks) का मरीज बना दिया है।
‘श्री शिव सहस्त्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘तनाव’, ‘मृत्यु के भय’ और ‘मानसिक भटकाव’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Healing) है:
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समर्पण और भयमुक्ति (Surrender & Fearlessness): जब आधुनिक जीवन की चुनौतियां बहुत बड़ी लगने लगें, तब शिव के 1000 नाम अवचेतन मन से उस ‘भय’ (विशेषकर मृत्यु या असफलता का भय) को उखाड़ फेंकते हैं। नीलकंठ का स्मरण आपको बताता है कि संकटों के विष को कैसे पचाया जाए।
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मानसिक स्पष्टता और ध्यान (Mental Clarity & Focus): शिव परम योगी हैं। श्लोकों का लयबद्ध उच्चारण मस्तिष्क के न्यूरॉन्स (Neurons) को शांत करता है। यह मस्तिष्क के शोर (Overthinking) को हटाकर एक गहरा मेडिटेशन (ध्यान) प्रदान करता है, जिससे आपकी एकाग्रता शिखर पर पहुँच जाती है।
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डिजिटल डिटॉक्स और ग्राउंडिंग (Digital Detox): पाठ के वे 30 मिनट आपको स्क्रीन और सोशल मीडिया से दूर कर एक गहरा ‘ग्राउंडिंग’ (Grounding) अनुभव देते हैं, जहाँ आप प्रकृति और ब्रह्मांडीय चेतना (शिव) से जुड़ते हैं।
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घर में शांति का ऑरा (Aura of Peace): यह स्तोत्र आपके घर में एक ऐसा शक्तिशाली ‘शांत ऑरा’ बनाता है कि बाहरी दुनिया का तनाव और क्रोध घर की दहलीज पर ही रुक जाता है। परिवार में त्याग और प्रेम की भावना बढ़ती है।
Shiva Sahasranama Stotram (श्री शिव सहस्त्रनाम स्तोत्रम्) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक सुंदर काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस परम शून्य, जगत के संहारक व कल्याणकर्ता, साक्षात परब्रह्म महादेव का आवाहन है, जिनके एक डमरू के नाद से ब्रह्मांड का निर्माण होता है और तीसरे नेत्र से प्रलय। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, सात्विकता और पवित्र हृदय से इस स्तुति का गान करता है, तो भगवान शिव उसके जीवन के सारे दुखों, रोगों, भयों और पापों को भस्म कर देते हैं।
भगवान शिव अत्यंत कृपालु, महामृत्युंजय और अपने भक्तों के सभी दुखों को हरने वाले साक्षात आशुतोष हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में बहुत अंधकार है, घर में भयंकर बीमारियां हैं, ग्रह-दोष ने आपको चारों ओर से घेर लिया है, और मन अत्यंत अशांत है, तो सोमवार की सुबह या प्रदोष काल में श्वेत आसन पर बैठें, घी का दीपक प्रज्वलित करें, शिवलिंग पर बिल्वपत्र अर्पित करें, और पूर्ण हृदय से इस महास्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘महादेव’ को पुकारें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि शिव के इन पावन नामों के नाद ने आपके जीवन की सारी मानसिक और भौतिक बाधाओं को भस्म कर दिया है, और साक्षात भगवान शंकर व माता पार्वती ने आपके जीवन को अपार सफलता, सुख-समृद्धि, असीम शांति, आरोग्य और परम मोक्ष के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। ॐ नमः शिवाय! हर हर महादेव!
श्री शिव सहस्त्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री शिव सहस्त्रनाम क्या है और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
श्री शिव सहस्त्रनाम भगवान शिव के 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों की एक सिद्ध श्रृंखला है। इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में मिलती है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इन 1000 नामों का उपदेश दिया था। इसके अलावा लिंग पुराण और शिव पुराण में भी इसके पाठ मिलते हैं। यह स्तोत्र शिव की महिमा, वैराग्य और अनंत शक्ति का साक्षात वर्णन है।
2. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ प्राप्त होता है?
इस स्तोत्र का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘अकाल मृत्यु के भय से रक्षा’, ‘असाध्य और गंभीर रोगों से मुक्ति’, और ‘ग्रह दोषों (विशेषकर शनि और राहु) की शांति’ है। इसके नियमित पाठ से घर में मानसिक शांति स्थापित होती है, अवसाद (Depression) दूर होता है, और साधक को जीवन के अंत में मोक्ष (शिव लोक) की प्राप्ति होती है।
3. शिव सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?
भगवान शिव की आराधना के लिए ‘सोमवार’ (Monday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। त्रयोदशी (प्रदोष), मासिक शिवरात्रि और श्रावण (सावन) मास में इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के समय) या प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में श्वेत वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना सर्वाधिक उत्तम है।
4. ‘शिव सहस्त्रार्चन’ विधि क्या है और इसका क्या लाभ है?
शिव सहस्त्रार्चन विधि में भगवान शिव के 1000 नामों (नामावली) का पाठ किया जाता है (जैसे- ॐ शिवाय नमः)। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ शिवलिंग पर एक ‘बिल्वपत्र’ (बेलपत्र), अक्षत (चावल), या श्वेत पुष्प चढ़ाया जाता है। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। यह किसी भी गंभीर रोग को मिटाने, भारी संकट से बचने और बड़ी मनोकामना को पूर्ण करने का सबसे अचूक और शक्तिशाली तांत्रिक/वैदिक उपाय है।
5. भगवान शिव की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम क्या है?
शिव साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘पूर्ण सात्विकता’ और ‘अहंकार का त्याग’ है। जो व्यक्ति मांस-मदिरा का सेवन करता है या अपने धन-पद का घमंड करता है, उसकी पूजा भगवान शिव कभी स्वीकार नहीं करते। इसके अतिरिक्त, शिवलिंग पर कभी भी ‘तुलसी’ या ‘सिंदूर’ नहीं चढ़ाना चाहिए। सत्य का आचरण, क्रोध का त्याग, और ब्रह्मचर्य का पालन इस साधना के मूलभूत नियम हैं।