Shri Annapurna Devi Sahasranaam (श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 33 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, उपनिषदों और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब संपूर्ण ब्रह्मांड के पोषण, जीवनदायिनी ऊर्जा और असीम करुणा की बात आती है, तो भगवती अन्नपूर्णा (Maa Annapurna) का स्मरण सर्वोपरि है। उपनिषदों में स्पष्ट उद्घोष है— “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” अर्थात् अन्न ही परब्रह्म है, क्योंकि इसी से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है, इसी से वे जीवित रहते हैं और अंततः इसी में विलीन हो जाते हैं। माता अन्नपूर्णा साक्षात माता पार्वती (गौरी) का ही वह परम कृपालु स्वरूप हैं, जो काशी (वाराणसी) में विराजमान होकर संपूर्ण विश्व का भरण-पोषण करती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार जब पृथ्वी पर घोर अकाल पड़ा और अन्न-जल समाप्त हो गया, तब त्रिलोकीनाथ देवाधिदेव महादेव ने भी जीवों के कल्याण हेतु भिक्षुक का रूप धारण कर काशी में माता अन्नपूर्णा के समक्ष भिक्षाटन किया था। माता ने उन्हें भिक्षा देकर यह वरदान दिया था कि काशी और उनके भक्तों के घर में कभी अन्न-धन का अभाव नहीं रहेगा।

जब मनुष्य का जीवन भयंकर दरिद्रता, घोर आर्थिक संकटों, व्यापारिक घाटों, अन्न के अभाव और मानसिक अशांति से घिर जाता है, तब माता अन्नपूर्णा की शरण में जाना साक्षात जीवन में वसंत ऋतु और संपन्नता को आमंत्रित करने के समान है। माता की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत वात्सल्य, और अहैतुकी कृपा को अपने घर की रसोई और अपने जीवन में स्थिर (Permanent) करने के लिए तंत्र संहिताओं और पुराणों में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम’ (Shri Annapurna Devi Sahasranama) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्त्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा आध्यात्मिक कल्पवृक्ष है, जो जीवन की भयंकर से भयंकर दरिद्रता, दुर्भाग्य, और कुपोषण (शारीरिक व मानसिक) को पल भर में भस्म कर देता है। जब व्यक्ति को समाज में अपार सुख-शांति, घर में अखंड अन्न-धन के भंडार, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में अजेय ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है, तब यह ‘श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम’ साक्षात कामधेनु सिद्ध होता है।

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम हिंदी | Shri Annapurna Devi Sahasranaam

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

ॐ अन्नपूर्णायै नमः

ॐ अन्नदात्र्यै नमः

ॐ अन्नराशिकृताऽलयायै नमः

ॐ अन्नदायै नमः

ॐ अन्नरूपायै नमः

ॐ अन्नदानरतोत्सवायै नमः

ॐ अनन्तायै नमः

ॐ अनन्ताक्ष्यै नमः

ॐ अनन्तगुणशालिन्यै नमः

ॐ अमृतायै नमः ॥ १०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ अच्युतप्राणायै नमः

ॐ अच्युतानन्दकारिणै नमः

ॐ अव्यक्तायै नमः

ॐ अनन्तमहिमायै नमः

ॐ अनन्तस्य कुलेश्वर्यै नमः

ॐ अब्धिस्थायै नमः

ॐ अब्धिशयनायै नमः

ॐ अब्धिजायै नमः

ॐ अब्धिनन्दिन्यै नमः

ॐ अब्जस्थायै नमः ॥ २०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ अब्जनिलयायै नमः

ॐ अब्जजायै नमः

ॐ अब्जभूषणायै नमः

ॐ अब्जाभायै नमः

ॐ अब्जहस्तायै नमः

ॐ अब्जपत्रशुभेक्षणायै नमः

ॐ अब्जासनायै नमः

ॐ अनन्तात्ममायै नमः

ॐ अग्निस्थायै नमः

ॐ अग्निरूपिण्यै नमः ॥ ३०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ अग्निजायायै नमः

ॐ अग्निमुख्यै नमः

ॐ अग्निकुण्डकृतालयायै नमः

ॐ अकारायै नमः

ॐ अग्निमात्रे नमः

ॐ अजयायै नमः

ॐ अदितिनन्दिन्यै नमः

ॐ आद्यायै नमः

ॐ आदित्यसङ्काशायै नमः

ॐ आत्मज्ञायै नमः ॥ ४०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ आत्मगोचरायै नमः

ॐ आत्मसुवे नमः

ॐ आत्मदयितायै नमः

ॐ आधारायै नमः

ॐ आत्मरूपिण्यै नमः

ॐ आशायै नमः

ॐ आकाशपद्मस्थायै नमः

ॐ अवकाशस्वरूपिण्यै नमः

ॐ आशापूर्यै नमः

ॐ अगाधायै नमः ॥ ५०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ अणिमादिसुसेवितायै नमः

ॐ अम्बिकायै नमः

ॐ अबलायै नमः

ॐ अम्बायै नमः

ॐ अनाद्यायै नमः

ॐ अयोनिजायै नमः

ॐ अनिशायै नमः

ॐ ईशिकायै नमः

ॐ ईशायै नमः

ॐ ईशान्यै नमः ॥ ६०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ ईश्वरप्रियायै नमः

ॐ ईश्वर्यै नमः

ॐ ईश्वरप्राणायै नमः

ॐ ईश्वरानन्ददायिन्यै नमः

ॐ इन्द्राण्यै नमः

ॐ इन्द्रदयितायै नमः

ॐ इन्द्रसुअवे नमः

ॐ इन्द्रपालिन्यै नमः

ॐ इन्दिरायै नमः

ॐ इन्द्रभगिन्यै नमः ॥ ७०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ इन्द्रियायै नमः

ॐ इन्दुभूषणायै नमः

ॐ इन्दुमात्रायै नमः

ॐ इन्दुमुख्यै नमः

ॐ इन्द्रियाणां वशङ्कर्यै नमः

ॐ उमायै नमः

ॐ उमापतेः प्राणायै नमः

ॐ ओड्याणपीठवासिन्यै नमः

ॐ उत्तरज्ञायै नमः

ॐ उत्तराख्यायै नमः ॥ ८०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ उकारायै नमः

ॐ उत्तरात्मिकायै नमः

ॐ ऋमात्रे नमः

ॐ ऋभवायै नमः

ॐ ऋस्थायै नमः

ॐ ऋकारस्वरूपिण्यै नमः

ॐ ऋकारायै नमः

ॐ ऌकारायै नमः

ॐ ऌकारप्रीतिदायिन्यै नमः

ॐ एकायै नमः ॥ ९०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ एकवीरायै नमः

ॐ ऐकाररूपिण्यै नमः

ॐ ओकार्यै नमः

ॐ ओघरूपायै नमः

ॐ ओघत्रयसुपूजितायै नमः

ॐ ओघस्थायै नमः

ॐ ओघसम्भूतायै नमः

ॐ ओघदात्र्यै नमः

ॐ ओघसुवे नमः

ॐ षोडशस्वरसम्भूतायै नमः ॥ १००॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ षोडशस्वररूपिण्यै नमः

ॐ वर्णात्मायै नमः

ॐ वर्णनिलयायै नमः

ॐ शूलिन्यै नमः

ॐ वर्णमालिन्यै नमः

ॐ कालरात्र्यै नमः

ॐ महारात्र्यै नमः

ॐ मोहरात्र्यै नमः

ॐ सुलोचनायै नमः

ॐ काल्यै नमः ॥ ११०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कपालिन्यै नमः

ॐ कृत्यायै नमः

ॐ कलिकायै नमः

ॐ सिंहगामिन्यै नमः

ॐ कात्यायन्यै नमः

ॐ कलाधारायै नमः

ॐ कालदैत्यनिकृन्तिन्यै नमः

ॐ कामिन्यै नमः

ॐ कामवन्द्यायै नमः

ॐ कमनीयायै नमः ॥ १२०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ विनोदिन्यै नमः

ॐ कामसुवे नमः

ॐ कामवनितायै नमः

ॐ कामधुरे नमः

ॐ कमलावत्यै नमः

ॐ कामायै नमः

ॐ कराल्यै नमः

ॐ कामकेलिविनोदिन्यै नमः

ॐ कामनायै नमः

ॐ कामदायै नमः ॥ १३०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ काम्यायै नमः

ॐ कमलायै नमः

ॐ कमलार्चितायै नमः

ॐ काश्मीरलिप्तवक्षोजायै नमः

ॐ काश्मीरद्रवचर्चितायै नमः

ॐ कनकायै नमः

ॐ कनकप्राणायै नमः

ॐ कनकाचलवासिन्यै नमः

ॐ कनकाभायै नमः

ॐ काननस्थायै नमः ॥ १४०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कामाख्यायै नमः

ॐ कनकप्रदायै नमः

ॐ कामपीठस्थितायै नमः

ॐ नित्यायै नमः

ॐ कामधामनिवासिन्यै नमः

ॐ कम्बुकण्ठ्यै नमः

ॐ करालाक्ष्यै नमः

ॐ किशोर्यै नमः

ॐ चलनादिन्यै नमः

ॐ कलायै नमः ॥ १५०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ काष्ठायै नमः

ॐ निमेषायै नमः

ॐ कालस्थायै नमः

ॐ कालरूपिण्यै नमः

ॐ कालज्ञायै नमः

ॐ कालमात्रायै नमः

ॐ कालधात्र्यै नमः

ॐ कलावत्यै नमः

ॐ कालदायै नमः

ॐ कालहायै नमः ॥ १६०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कुल्यायै नमः

ॐ कुरुकुल्लायै नमः

ॐ कुलाङ्गनायै नमः

ॐ कीर्तिदायै नमः

ॐ कीर्तिहायै नमः

ॐ कीर्त्यै नमः

ॐ कीर्तिस्थायै नमः

ॐ कीर्त्तिवर्धिन्यै नमः

ॐ कीर्त्तिज्ञायै नमः

ॐ कीर्त्तितपदायै नमः ॥ १७०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कृत्तिकायै नमः

ॐ केशवप्रियायै नमः

ॐ केशिहायै नमः

ॐ केलिकायै नमः

ॐ केशवानन्दकारिण्यै नमः

ॐ कुमुदाभायै नमः

ॐ कुमार्यै नमः

ॐ कर्मदायै नमः

ॐ कमलेक्षणायै नमः

ॐ कौमुद्यै नमः ॥ १८०॥

ॐ कुमुदानन्दायै नमः

ॐ कालिक्यै नमः

ॐ कुमुद्वत्यै नमः

ॐ कोदण्डधारिण्यै नमः

ॐ क्रोधायै नमः

ॐ कूटस्थायै नमः

ॐ कोटराश्रयायै नमः

ॐ कलकण्ठ्यै नमः

ॐ करलाङ्ग्यै नमः

ॐ कालाङ्ग्यै नमः ॥ १९०॥

ॐ कालभूषणायै नमः

ॐ कङ्काल्यै नमः

ॐ कामदामायै नमः

ॐ कङ्कालकृतभूषणायै नमः

ॐ कपालकर्तृककरायै नमः

ॐ करवीरस्वरूपिण्यै नमः

ॐ कपर्दिन्यै नमः

ॐ कोमलाङ्ग्यै नमः

ॐ कृपासिन्धवे नमः

ॐ कृपामय्यै नमः ॥ २००॥

ॐ कुशावत्यै नमः

ॐ कुण्डसंस्थायै नमः

ॐ कौवेर्यै नमः

ॐ कौशिक्यै नमः

ॐ काश्यप्यै नमः

ॐ कद्रुतनयायै नमः

ॐ कलिकल्मषनाशिन्यै नमः

ॐ कञ्जज्ञायै नमः

ॐ कञ्जवदनायै नमः

ॐ कञ्जकिञ्जल्कचर्चितायै नमः ॥ २१०॥

ॐ कञ्जाभायै नमः

ॐ कञ्जमध्यस्थायै नमः

ॐ कञ्जनेत्रायै नमः

ॐ कचोद्भवायै नमः

ॐ कामरूपायै नमः

ॐ ह्रींकार्यै नमः

ॐ कश्यपान्वयवर्धिन्यै नमः

ॐ खर्वायै नमः

ॐ खञ्जनद्वन्द्वलोचनायै नमः

ॐ खर्ववाहिन्यै नमः ॥ २२०॥

ॐ खड्गिन्यै नमः

ॐ खड्गहस्तायै नमः

ॐ खेचर्यै नमः

ॐ खड्गरूपिण्यै नमः

ॐ खगस्थायै नमः

ॐ खगरूपायै नमः

ॐ खगगायै नमः

ॐ खगसम्भवायै नमः

ॐ खगधात्र्यै नमः

ॐ खगानन्दायै नमः ॥ २३०॥

ॐ खगयोनिस्वरूपिण्यै नमः

ॐ खगेश्यै नमः

ॐ खेटककरायै नमः

ॐ खगानन्दविवर्धिन्यै नमः

ॐ खगमान्यायै नमः

ॐ खगाधारायै नमः

ॐ खगगर्वविमोचिन्यै नमः

ॐ गङ्गायै नमः

ॐ गोदावर्यै नमः

ॐ गीत्यै नमः ॥ २४०॥

ॐ गायत्र्यै नमः

ॐ गगनालयायै नमः

ॐ गीर्वाणसुन्दर्यै नमः

ॐ गवे नमः

ॐ गाधायै नमः

ॐ गीर्वाणपूजितायै नमः

ॐ गीर्वाणचर्चितपदायै नमः

ॐ गान्धार्यै नमः

ॐ गोमत्यै नमः

ॐ गर्विण्यै नमः ॥ २५०॥

ॐ गर्वहन्त्र्यै नमः

ॐ गर्भस्थायै नमः

ॐ गर्भधारिण्यै नमः

ॐ गर्भदायै नमः

ॐ गर्भहन्त्र्यै नमः

ॐ गन्धर्वकुलपूजितायै नमः

ॐ गयायै नमः

ॐ गौर्यै नमः

ॐ गिरिजायै नमः

ॐ गिरिस्थायै नमः ॥ २६०॥

ॐ गिरिसम्भवायै नमः

ॐ गिरिगह्वरमध्यस्थायै नमः

ॐ कुञ्जरेश्वरगामिन्यै नमः

ॐ किरीटिन्यै नमः

ॐ गदिन्यै नमः

ॐ गुञ्जाहारविभूषणायै नमः

ॐ गणपायै नमः

ॐ गणकायै नमः

ॐ गुण्यायै नमः

ॐ गुणकानन्दकारिण्यै नमः ॥ २७०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ गुणपूज्यायै नमः

ॐ गीर्वाणायै नमः

ॐ गणपानन्दविवर्धिन्यै नमः

ॐ गुरुरमात्रायै नमः

ॐ गुरुरतायै नमः

ॐ गुरुभक्तिपरायणायै नमः

ॐ गोत्रायै नमः

ॐ गवे नमः

ॐ कृष्णभगिन्यै नमः

ॐ कृष्णसुवे नमः ॥ २८०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कृष्णनन्दिन्यै नमः

ॐ गोवर्धन्यै नमः

ॐ गोत्रधरायै नमः

ॐ गोवर्धनकृतालयायै नमः

ॐ गोवर्धनधरायै नमः

ॐ गोदायै नमः

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ॐ गौराङ्ग्यै नमः

ॐ गौतमात्मजायै नमः

ॐ घर्घरायै नमः

ॐ घोररूपायै नमः ॥ २९०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ घोरायै नमः

ॐ घर्घरनादिन्यै नमः

ॐ श्यामायै नमः

ॐ घनरवायै नमः

ॐ अघोरायै नमः

ॐ घनायै नमः

ॐ घोरार्त्तिनाशिन्यै नमः

ॐ घनस्थायै नमः

ॐ घनानन्दायै नमः

ॐ दारिद्र्यघननाशिन्यै नमः ॥ ३००॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ चित्तज्ञायै नमः

ॐ चिन्तितपदायै नमः

ॐ चित्तस्थायै नमः

ॐ चित्तरूपिण्यै नमः

ॐ चक्रिण्यै नमः

ॐ चारुचम्पाभायै नमः

ॐ चारुचम्पकमालिन्यै नमः

ॐ चन्द्रिकायै नमः

ॐ चन्द्रकान्त्यै नमः

ॐ चापिन्यै नमः ॥ ३१०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ चन्द्रशेखरायै नमः

ॐ चण्डिकायै नमः

ॐ चण्डदैत्यघन्यै नमः

ॐ चन्द्रशेखरवल्लभायै नमः

ॐ चाण्डालिन्यै नमः

ॐ चामुण्डायै नमः

ॐ चण्डमुण्डवधोद्यतायै नमः

ॐ चैतन्यभैरव्यै नमः

ॐ चण्डायै नमः

ॐ चैतन्यघनगेहिन्यै नमः ॥ ३२०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ चित्स्वरूपायै नमः

ॐ चिदाधारायै नमः

ॐ चण्डवेगायै नमः

ॐ चिदालयायै नमः

ॐ चन्द्रमण्डलमध्यस्थायै नमः

ॐ चन्द्रकोटिसुशीलतायै नमः

ॐ चपलायै नमः

ॐ चन्द्रभगिन्यै नमः

ॐ चन्द्रकोटिनिभाननायै नमः

ॐ चिन्तामणिगुणाधारायै नमः ॥ ३३०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ चिन्तामणिविभूषणायै नमः

ॐ चित्तचिन्तामणिकृतालयायै नमः

ॐ चिन्तामणिकृतालयायै नमः

ॐ चारुचन्दनलिप्ताङ्ग्यै नमः

ॐ चतुरायै नमः

ॐ चतुर्मुख्यै नमः

ॐ चैतन्यदायै नमः

ॐ चिदानन्दायै नमः

ॐ चारुचामरवीजितायै नमः

ॐ छत्रदायै नमः ३४०

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ छत्रधार्यै नमः

ॐ छलच्चद्मविनाशिन्यै नमः

ॐ छत्रहायै नमः

ॐ छत्ररूपायै नमः

ॐ छत्रच्छायाकृतालयायै नमः

ॐ जगज्जीवायै नमः

ॐ जगद्धात्त्र्यै नमः

ॐ जगदानन्दकारिण्यै नमः

ॐ यज्ञप्रियायै नमः

ॐ यज्ञरतायै नमः ॥ ३५०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ जपयज्ञपरायणायै नमः

ॐ जनन्यै नमः

ॐ जानक्यै नमः

ॐ यज्वायै नमः

ॐ यज्ञहायै नमः

ॐ यज्ञनन्दिन्यै नमः

ॐ यज्ञदायै नमः

ॐ यज्ञफलदायै नमः

ॐ यज्ञस्थानकृतालयायै नमः

ॐ यज्ञभोक्त्यै नमः ॥ ३६०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ यज्ञरूपायै नमः

ॐ यज्ञविघ्नविनाशिन्यै नमः

ॐ जपाकुसुमसङ्काशायै नमः

ॐ जपाकुसुमशोभितायै नमः

ॐ जालन्धर्यै नमः

ॐ जयायै नमः

ॐ जैत्र्यै नमः

ॐ जीमूतचयभाषिणै नमः

ॐ जयदायै नमः

ॐ जयरूपायै नमः ॥ ३७०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ जयस्थायै नमः

ॐ जयकारिण्यै नमः

ॐ जगदीशप्रियायै नमः

ॐ जीवायै नमः

ॐ जलस्थायै नमः

ॐ जलजेक्षणायै नमः

ॐ जलरूपायै नमः

ॐ जह्नुकन्यायै नमः

ॐ यमुनायै नमः

ॐ जलजोदर्यै नमः ॥ ३८०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ जलजास्यायै नमः

ॐ जाह्नव्यै नमः

ॐ जलजाभायै नमः

ॐ जलोदर्यै नमः

ॐ यदुवंशीद्भवायै नमः

ॐ जीवायै नमः

ॐ यादवानन्दकारिण्यै नमः

ॐ यशोदायै नमः

ॐ यशसांराश्यै नमः

ॐ यशोदानन्दकारिण्यै नमः ॥ ३९०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ ज्वलिन्यै नमः

ॐ ज्वालिन्यै नमः

ॐ ज्वालायै नमः

ॐ ज्वलत्पावकसन्निभायै नमः

ॐ ज्वालामुख्यै नमः

ॐ जगन्मात्रे नमः

ॐ यमलार्जुनभञ्जकायै नमः

ॐ जन्मदायै नमः

ॐ जन्मह्यै नमः

ॐ जन्यायै नमः ॥ ४००॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ जन्मभुवे नमः

ॐ जनकात्मजायै नमः

ॐ जनानन्दायै नमः

ॐ जाम्बवत्यै नमः

ॐ जम्बूद्वीपकृतालयायै नमः

ॐ जाम्बूनदसमानाभायै नमः

ॐ जाम्बूनदविभूषणायै नमः

ॐ जम्भहायै नमः

ॐ जातिदायै नमः

ॐ जात्यै नमः ॥ ४१०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ ज्ञानदायै नमः

ॐ ज्ञानगोचरायै नमः

ॐ ज्ञानभायै नमः

ॐ ज्ञानरूपायै नमः

ॐ ज्ञानविज्ञानशालिन्यै नमः

ॐ जिनजैत्र्यै नमः

ॐ जिनाधारायै नमः

ॐ जिनमात्रे नमः

ॐ जिनेश्वर्यै नमः

ॐ जितेन्द्रियायै नमः ॥ ४२०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ जनाधारायै नमः

ॐ अजिनाम्बरधारिण्यै नमः

ॐ शम्भुकोटिदुराधरायै नमः

ॐ विष्णुकोटिविमर्दिन्यै नमः

ॐ समुद्रकोटिगम्भीरायै नमः

ॐ वायुकोटिमहाबलायै नमः

ॐ सूर्यकोटिप्रतीकाशायै नमः

ॐ यमकोटिदुरापहायै नमः

ॐ कामधुक्कोटिफलदायै नमः

ॐ शक्रकोटिसुराज्यदायै नमः ॥ ४३०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ कन्दर्पकोटिलावण्यायै नमः

ॐ पद्मकोटिनिभाननायै नमः

ॐ पृथ्वीकोटिजनाधारायै नमः

ॐ अग्निकोटिभयङ्कर्यै नमः

ॐ अणिमायै नमः

ॐ महिमायै नमः

ॐ प्राप्त्यै नमः

ॐ गरिमायै नमः

ॐ लघिमायै नमः

ॐ प्राकाम्यदायै नमः ॥ ४४०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ वशङ्कर्यै नमः

ॐ ईशिकायै नमः

ॐ सिद्धिदायै नमः

ॐ महिमादिगुणोपेतायै नमः

ॐ अणिमाद्यष्टसिद्धिदायै नमः

ॐ जवनघ्न्यै नमः

ॐ जनाधीनायै नमः

ॐ जामिन्यै नमः

ॐ जरापहायै नमः

ॐ तारिणै नमः ॥ ४५०॥

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम

ॐ तारिकायै नमः

ॐ तारायै नमः

ॐ तोतलायै नमः

ॐ तुलसीप्रियायै नमः

ॐ तन्त्रिण्यै नमः

ॐ तन्त्ररूपायै नमः

ॐ तन्त्रज्ञायै नमः

ॐ तन्त्रधारिण्यै नमः

ॐ तारहारायै नमः

ॐ तुलजायै नमः ॥ ४६०॥

ॐ डाकिनीतन्त्रगोचरायै नमः

ॐ त्रिपुरायै नमः

ॐ त्रिदशायै नमः

ॐ त्रिस्थायै नमः

ॐ त्रिपुरासुरघातिन्यै नमः

ॐ त्रिगुणायै नमः

ॐ त्रिकोणस्थायै नमः

ॐ त्रिमात्रायै नमः

ॐ त्रितसुस्थितायै नमः

ॐ त्रैविद्यायै नमः ॥ ४७०॥

ॐ त्रय्यै नमः

ॐ त्रिघ्न्यै नमः

ॐ तुरीयायै नमः

ॐ त्रिपुरेश्वर्यै नमः

ॐ त्रिकोदरस्थायै नमः

ॐ त्रिविधायै नमः

ॐ तैलोक्यायै नमः

ॐ त्रिपुरात्मिकायै नमः

ॐ त्रिधाम्न्यै नमः

ॐ त्रिदशाराध्यायै नमः ॥ ४८०॥

ॐ त्र्यक्षायै नमः

ॐ त्रिपुरवासिन्यै नमः

ॐ त्रिवर्णायै नमः

ॐ त्रिपद्यै नमः

ॐ तारायै नमः

ॐ त्रिमूर्तिजनन्यै नमः

ॐ इत्वरायै नमः

ॐ त्रिदिवायै नमः

ॐ त्रिदिवेशायै नमः

ॐ आदिदेव्यै नमः ॥ ४९०॥

ॐ त्रैलोक्यधारिणै नमः

ॐ त्रिमूर्त्यै नमः

ॐ त्रिजनन्यै नमः

ॐ त्रिभुवे नमः

ॐ त्रिपुरसुन्दर्यै नमः

ॐ तपस्विन्यै नमः

ॐ तपोनिष्ठायै नमः

ॐ तरुण्यै नमः

ॐ ताररूपिण्यै नमः

ॐ तामस्यै नमः ॥ ५००॥

ॐ तापस्यै नमः

ॐ तापघ्न्यै नमः

ॐ तमोपहायै नमः

ॐ तरुणार्कप्रतीकाशायै नमः

ॐ तप्तकाञ्चनसन्निभायै नमः

ॐ उन्मादिन्यै नमः

ॐ तन्तुरूपायै नमः

ॐ त्रैलोक्यव्यापिकायै नमः

ॐ ईश्वरै नमः

ॐ तार्किक्यै नमः ॥ ५१०॥

ॐ तर्क विद्यायै नमः

ॐ तापत्रयविनाशिन्यै नमः

ॐ त्रिपुष्करायै नमः

ॐ त्रिकालज्ञायै नमः

ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः

ॐ त्रिलोचनायै नमः

ॐ त्रिवर्गायै नमः

ॐ त्रिवर्गस्थायै नमः

ॐ तपस्सिद्धिदायिन्यै नमः

ॐ अधोक्षजायै नमः ॥ ५२०॥

ॐ अयोध्यायै नमः

ॐ अपर्णायै नमः

ॐ अवन्तिकायै नमः

ॐ कारिकायै नमः

ॐ तीर्थरूपायै नमः

ॐ तीर्थायै नमः

ॐ तीर्थकर्यै नमः

ॐ दारिद्र्यदुःखदलिन्यै नमः

ॐ अदीनायै नमः

ॐ दीनवत्सलायै नमः ॥ ५३०॥

ॐ दीनानाथप्रियायै नमः

ॐ दीर्घायै नमः

ॐ दयापूर्णायै नमः

ॐ दयात्मिकायै नमः

ॐ देवदानवसम्पूज्यायै नमः

ॐ देवानां प्रियकारिण्यै नमः

ॐ दक्षपुत्रै नमः

ॐ दक्षमात्रे नमः

ॐ दक्षयज्ञविनाशिन्यै नमः

ॐ देवसुवे नमः ॥ ५४०॥

ॐ दक्षिणायै नमः

ॐ दक्षायै नमः

ॐ दुर्गायै नमः

ॐ दुर्गतिनाशिन्यै नमः

ॐ देवकीगर्भसम्भूतायै नमः

ॐ दुर्गदैत्यविनाशिन्यै नमः

ॐ अट्टायै नमः

ॐ अट्टहासिन्यै नमः

ॐ दोलायै नमः

ॐ दोलाकर्माभिनन्दिन्यै नमः ॥ ५५०॥

ॐ देवक्यै नमः

ॐ देविकायै नमः

ॐ देव्यै नमः

ॐ दुरितघ्न्यै नमः

ॐ तड्यै नमः

ॐ गण्डक्यै नमः

ॐ गल्लक्यै नमः

ॐ क्षिप्रायै नमः

ॐ द्वारकायै नमः

ॐ द्वारवत्यै नमः ॥ ५६०॥

ॐ अनन्दोदधिमध्यस्थायै नमः

ॐ कटिसूत्रैरलङ्कतायै नमः

ॐ घोराग्निदाहदमन्यै नमः

ॐ दुःखदुस्वप्ननाशिन्यै नमः

ॐ श्रीमय्यै नमः

ॐ श्रीमत्यै नमः

ॐ श्रेष्ठायै नमः

ॐ श्रीकर्यै नमः

ॐ श्रीविभाविन्यै नमः

ॐ श्रीदायै नमः ॥ ५७०॥

ॐ श्रीमायै नमः

ॐ श्रीनिवासायै नमः

ॐ श्रीमत्यै नमः

ॐ श्रियै नमः

ॐ गत्ये नमः

ॐ धनदायै नमः

ॐ दामिन्यै नमः

ॐ दान्तायै नमः

ॐ धर्मदायै नमः ॥ ५८०॥

ॐ धनशालिन्यै नमः

ॐ दाडिमीपुष्पसङ्काशायै नमः

ॐ धनागारायै नमः

ॐ धनञ्जय्यै नमः

ॐ धूम्राभायै नमः

ॐ धूम्रदैत्यघ्न्यै नमः

ॐ धवलायै नमः

ॐ धवलप्रियायै नमः

ॐ धूम्रवक्रायै नमः

ॐ धूम्रनेत्रायै नमः ॥ ५९०॥

ॐ धूम्रकेश्यै नमः

ॐ धूसरायै नमः

ॐ धरण्यै नमः

ॐ धारिण्यै नमः

ॐ धैर्यायै नमः

ॐ धरायै नमः

ॐ धात्र्यै नमः

ॐ धैर्यदायै नमः

ॐ दमिन्यै नमः

ॐ धर्मिण्यै नमः ॥ ६००॥

ॐ धुरे नमः

ॐ दयायै नमः

ॐ दोग्धयै नमः

ॐ दुरासद्दायै नमः

ॐ नारायण्यै नमः

ॐ नारसिंह्यै नमः

ॐ नृसिंहहृदयालयायै नमः

ॐ नागिन्यै नमः

ॐ नागकन्यायै नमः

ॐ नागसुवे नमः ॥ ६१०॥

ॐ नागनायिकायै नमः

ॐ नानारत्नविचित्राङ्ग्यै नमः

ॐ नानाभरणमण्डितायै नमः

ॐ दुर्गस्थायै नमः

ॐ दुर्गरूपायै नमः

ॐ दुःखदुष्कृतनाशिन्यै नमः

ॐ ह्रीङ्कार्यै नमः

ॐ श्रीकार्यै नमः

ॐ हुँकार्यै नमः

ॐ क्लेशनाशिन्यै नमः ॥ ६२०॥

ॐ नागात्मजायै नमः

ॐ नागर्यै नमः

ॐ नवीनायै नमः

ॐ नूतनप्रियायै नमः

ॐ नीरजास्यायै नमः

ॐ नीरदाभायै नमः

ॐ नवलावण्यसुन्दर्यै नमः

ॐ नीतिज्ञायै नमः

ॐ नीतिदायै नमः

ॐ नीत्यै नमः ॥ ६३०॥

ॐ निम्मनाभ्यै नमः

ॐ नागेश्वर्यै नमः

ॐ निष्ठायै नमः

ॐ नित्यायै नमः

ॐ निरातङ्कायै नमः

ॐ नागयज्ञोपवीतिन्यै नमः

ॐ निधिदायै नमः

ॐ निधिरूपायै नमः

ॐ निर्गुणायै नमः

ॐ नरवाहिन्यै नमः ॥ ६४०॥

ॐ नरमांसरतायै नमः

ॐ नार्यै नमः

ॐ नरमुण्डविभूषणायै नमः

ॐ निराधारायै नमः

ॐ निर्विकारायै नमः

ॐ नुत्यै नमः

ॐ निर्वाणसुन्दर्यै नमः

ॐ नरासृक्पानमत्तायै नमः

ॐ निर्वैरायै नमः

ॐ नागगामिन्यै नमः ॥ ६५०॥

ॐ परमायै नमः

ॐ प्रमितायै नमः

ॐ प्राज्ञायै नमः

ॐ पार्वत्यै नमः

ॐ पर्वतात्मजायै नमः

ॐ पर्वप्रियायै नमः

ॐ पर्वरतायै नमः

ॐ पर्वणे नमः

ॐ पर्वपावनपालिन्यै नमः

ॐ परात्परतरायै नमः ॥ ६६०॥

ॐ पूर्वायै नमः

ॐ पश्चिमायै नमः

ॐ पापनाशिन्यै नमः

ॐ पशूनां पतिपत्नयै नमः

ॐ पतिभक्तिपरायण्यै नमः

ॐ परेश्यै नमः

ॐ पारगायै नमः

ॐ पारायै नमः

ॐ परञ्ज्योतिस्वरूपिण्यै नमः

ॐ निष्ठुरायै नमः ॥ ६७०॥

ॐ क्रूरहृदयायै नमः

ॐ परासिद्धये नमः

ॐ परागत्यै नमः

ॐ पशुघ्न्यै नमः

ॐ पशुरूपायै नमः

ॐ पशुहायै नमः

ॐ पशुवाहिन्यै नमः

ॐ पित्रे नमः

ॐ मात्रे नमः

ॐ यन्त्र्यै नमः ॥ ६८०॥

ॐ पशुपाशविनाशिन्यै नमः

ॐ पद्मिन्यै नमः

ॐ पद्महस्तायै नमः

ॐ पद्मकिञ्जल्कवासिन्यै नमः

ॐ पद्मवक्रायै नमः

ॐ पद्माक्ष्यै नमः

ॐ पद्मस्थायै नमः

ॐ पद्मसम्भवायै नमः

ॐ पद्मास्यायै नमः

ॐ पञ्चम्यै नमः ॥ ६९०॥

ॐ पूर्णायै नमः

ॐ पूर्णपीठनिवासिन्यै नमः

ॐ पद्मरागप्रतीकाशायै नमः

ॐ पाञ्चाल्यै नमः

ॐ पञ्चमप्रियायै नमः

ॐ परब्रह्मस्वरूपायै नमः

ॐ परब्रह्मनिवासिन्यै नमः

ॐ परमानन्दमुदितायै नमः

ॐ परचक्रनिवाशिन्यै नमः

ॐ परेश्यै नमः ॥ ७००॥

ॐ परमायै नमः

ॐ पृथ्व्यै नमः

ॐ पीनतुङ्गपयोधरायै नमः

ॐ परावरायै नमः

ॐ परायै नमः

ॐ विद्यायै नमः

ॐ परमानन्ददायिन्यै नमः

ॐ पूज्यायै नमः

ॐ प्रजावत्यै नमः

ॐ पुष्ट्यै नमः ॥ ७१०॥

ॐ पिनाकिपरिकीर्तितायै नमः

ॐ प्राणहायै नमः

ॐ प्राणरूपायै नमः

ॐ प्राणदायै नमः

ॐ प्रियंवदायै नमः

ॐ फणिभूषायै नमः

ॐ फणापेश्यै नमः

ॐ फकाराकुण्ठमालिन्यै नमः

ॐ फणिराट्कृतसर्वाङ्ग्यै नमः

ॐ फलिभागनिवासिन्यै नमः ॥ ७२०॥

ॐ बलभद्रस्यभगिन्यै नमः

ॐ बालायै नमः

ॐ बालप्रदायिन्यै नमः

ॐ फल्गुरूपायै नमः

ॐ प्रलम्बघ्न्यै नमः

ॐ फल्गूत्सवविनोदिन्यै नमः

ॐ भवान्यै नमः

ॐ भवपत्न्यै नमः

ॐ भवभीतिहरायै नमः

ॐ भवायै नमः ॥ ७३०॥

ॐ भवेश्वर्यै नमः

ॐ भवाराध्यायै नमः

ॐ भवेश्यै नमः

ॐ भवनायिकायै नमः

ॐ भवमात्रे नमः

ॐ भवागम्यायै नमः

ॐ भवकण्टकनाशिन्यै नमः

ॐ भवप्रियायै नमः

ॐ भवानन्दायै नमः

ॐ भव्यायै नमः ॥ ७४०॥

ॐ भवमोचिन्यै नमः

ॐ भावनीयायै नमः

ॐ भगवत्यै नमः

ॐ भवभारविनाशिन्यै नमः

ॐ भूतधात्र्यै नमः

ॐ भूतेश्यै नमः

ॐ भूतस्थायै नमः

ॐ भूतरूपिण्यै नमः

ॐ भूतमात्रे नमः

ॐ भूतघ्न्यै नमः ॥ ७५०॥

ॐ भूतपञ्चकवासिन्यै नमः

ॐ भोगोपचारकुशलायै नमः

ॐ भिस्साधात्र्यै नमः

ॐ भूचर्यै नमः

ॐ भीतिघ्न्यै नमः

ॐ भक्तिगम्यायै नमः

ॐ भक्तानामार्तिनाशिन्यै नमः

ॐ भक्तानुकम्पिन्यै नमः

ॐ भीमायै नमः

ॐ भगिन्यै नमः ॥ ७६०॥

ॐ भगनायिकायै नमः

ॐ भगविद्यायै नमः

ॐ भगक्लिनायै नमः

ॐ भगयोन्यै नमः

ॐ भगप्रदायै नमः

ॐ भगेश्यै नमः

ॐ भगरूपायै नमः

ॐ भगगुह्यायै नमः

ॐ भगावहायै नमः

ॐ भगोदर्यै नमः ॥ ७७०॥

ॐ भगानन्दायै नमः

ॐ भाग्यदायै नमः

ॐ भगमालिन्यै नमः

ॐ भोगप्रदायै नमः

ॐ भोगवासायै नमः

ॐ भोगमूलायै नमः

ॐ भोगिन्यै नमः

ॐ खेरुऋहयै नमः

ॐ भेरुण्डायै नमः

ॐ भेदिन्यै नमः

ॐ भीमायै नमः ॥ ७८०॥

ॐ भद्रकाल्यै नमः

ॐ भिदोज्झितायै नमः

ॐ भैरव्यै नमः

ॐ भुवनेशान्यै नमः

ॐ भुवनायै नमः

ॐ भुवनेश्वर्यै नमः

ॐ भीमाक्ष्यै नमः

ॐ भारत्यै नमः

ॐ भैरवाष्टकसेवितायै नमः

ॐ भास्वरायै नमः ॥ ७९०॥

ॐ भास्वत्यै नमः

ॐ भीत्यै नमः

ॐ भास्वदुत्तानशालिन्यै नमः

ॐ भागीरथ्यै नमः

ॐ भोगवत्यै नमः

ॐ भवघ्न्यै नमः

ॐ भुवनात्मिकायै नमः

ॐ भूतिदायै नमः

ॐ भूतिरूपायै नमः

ॐ भूतस्थायै नमः ॥ ८००॥

ॐ भूतवर्धिन्यै नमः

ॐ माहेश्वर्यै नमः

ॐ महामायायै नमः

ॐ महातेजसे नमः

ॐ महासुर्यै नमः

ॐ महाजिह्वायै नमः

ॐ महालोलायै नमः

ॐ महादंष्ट्रायै नमः

ॐ महाभुजायै नमः

ॐ महामोहान्धकारघ्न्यै नमः ॥ ८१०॥

ॐ महामोक्षप्रदायिन्यै नमः

ॐ महादारिद्र्यशमन्यै नमः

ॐ महाशत्रुविमर्दिन्यै नमः

ॐ महाशक्त्यै नमः

ॐ महाज्योतिषे नमः

ॐ महासुरविमर्दिन्यै नमः

ॐ महाकायायै नमः

ॐ महावीर्यायै नमः

ॐ महापातकनाशिन्यै नमः

ॐ महारवायै नमः ॥ ८२०॥

ॐ मन्तमर्य्यै नमः

ॐ मणिपूरनिवासिन्यै नमः

ॐ मानिन्यै नमः

ॐ मानदायै नमः

ॐ मान्यायै नमः

ॐ मनश्चक्षुरगोचरायै नमः

ॐ माहेन्द्यै नमः

ॐ मधुरायै नमः

ॐ मायायै नमः

ॐ महिषासुरमर्दिन्यै नमः ॥ ८३०॥

ॐ महाकुण्डलिन्यै नमः

ॐ शकयै नमः

ॐ महाविभववर्धिन्यै नमः

ॐ मानस्यै नमः

ॐ माधव्यै नमः

ॐ मेधायै नमः

ॐ मतिदायै नमः

ॐ मतिधारिण्यै नमः

ॐ मेनकागर्भसम्भूतायै नमः

ॐ मेनकाभगिन्यै नमः ॥ ८४०॥

ॐ मत्यै नमः

ॐ महोदर्यै नमः

ॐ मुक्तकेश्यै नमः

ॐ मुक्तिकाम्यार्थसिद्धिदायै नमः

ॐ माहेश्यै नमः

ॐ महिषारुढायै नमः

ॐ मधुदैत्यविमर्दिन्यै नमः

ॐ महाव्रतायै नमः

ॐ महामूर्धायै नमः

ॐ महाभयविनाशिन्यै नमः ॥ ८५०॥

ॐ मातङ्ग्यै नमः

ॐ मत्तमातङ्ग्यै नमः

ॐ मातङ्गकुलमण्डितायै नमः

ॐ महाघोरायै नमः

ॐ माननीयायै नमः

ॐ मत्तमातङ्गगामिन्यै नमः

ॐ मुक्ताहारलतोपेतायै नमः

ॐ मदधूर्णितलोचनायै नमः

ॐ महापराधाशिघ्न्यै नमः

ॐ महाचोरभयापहायै नमः ॥ ८६०॥

ॐ महाचिन्त्यस्वरूपायै नमः

ॐ मणिमन्त्रमहौषध्यै नमः

ॐ मणिमण्डपमध्यस्थायै नमः

ॐ मणिमालाविराजितायै नमः

ॐ मन्त्रात्मिकायै नमः

ॐ मन्त्रगम्यायै नमः

ॐ मन्त्रमात्रे नमः

ॐ सुमन्त्रिण्यै नमः

ॐ मेरुमन्दरमध्यस्थायै नमः

ॐ मकराकृतिकुण्डलायै नमः ॥ ८७०॥

ॐ मन्थरायै नमः

ॐ महासूक्ष्मायै नमः

ॐ महादूत्यै नमः

ॐ महेश्वर्यै नमः

ॐ मालिन्यै नमः

ॐ मानव्यै नमः

ॐ माध्व्यै नमः

ॐ मदरूपायै नमः

ॐ मदोत्कटायै नमः

ॐ मदिरायै नमः ॥ ८८०॥

ॐ मधुरायै नमः

ॐ मोदिन्यै नमः

ॐ महोक्षितायै नमः

ॐ मङ्गलायै नमः

ॐ मधुमय्यै नमः

ॐ मधुपानपरायणायै नमः

ॐ मनोरमायै नमः

ॐ रमामात्रे नमः

ॐ राजराजेश्वर्यै नमः

ॐ रमायै नमः ॥ ८९०॥

ॐ राजमान्यायै नमः

ॐ राजपूज्यायै नमः

ॐ रक्तोत्पलविभूषणायै नमः

ॐ राजीवलोचनायै नमः

ॐ रामायै नमः

ॐ राधिकायै नमः

ॐ रामवल्लभायै नमः

ॐ शाकिन्यै नमः

ॐ डाकिन्यै नमः

ॐ लावण्याम्बुधिवीचिकायै नमः ॥ ९००॥

ॐ रुद्राण्यै नमः

ॐ रुद्ररूपायै नमः

ॐ रौद्रायै नमः

ॐ रुद्रार्तिनाशिन्यै नमः

ॐ रक्तप्रियायै नमः

ॐ रक्तवस्त्रायै नमः

ॐ रक्ताक्ष्यै नमः

ॐ रक्तलोचनायै नमः

ॐ रक्तकेश्यै नमः

ॐ रक्तदंष्ट्रायै नमः ॥ ९१०॥

ॐ रक्तचन्दनचर्चितायै नमः

ॐ रक्ताङ्ग्यै नमः

ॐ रक्तभूषायै नमः

ॐ रक्तबीजनिपातिन्यै नमः

ॐ रागादिदोषरहितायै नमः

ॐ रतिजायै नमः

ॐ रतिदायिन्यै नमः

ॐ विश्वेश्वर्यै नमः

ॐ विशालाक्ष्यै नमः

ॐ विन्ध्यपीठनिवासिन्यै नमः ॥ ९२०॥

ॐ विश्वभुवे नमः

ॐ वीरविद्यायै नमः

ॐ वीरसुवे नमः

ॐ वीरनन्दिन्यै नमः

ॐ वीरेश्वर्यै नमः

ॐ विशालाक्ष्यै नमः

ॐ विष्णुमायाविमोहिन्यै नमः

ॐ विद्याव्यै नमः

ॐ विष्णुरूपायै नमः

ॐ विशालनयनोत्पलायै नमः ॥ ९३०॥

ॐ विष्णुमात्रे नमः

ॐ विश्वात्मने नमः

ॐ विष्णुजायास्वरूपिण्यै नमः

ॐ ब्रह्मेश्यै नमः

ॐ ब्रह्मविद्यायै नमः

ॐ ब्राह्म्यै नमः

ॐ ब्रह्मण्यै नमः

ॐ ब्रह्मऋषयै नमः

ॐ ब्रह्मरूपिणै नमः

ॐ द्वारकायै नमः ॥ ९४०॥

ॐ विश्ववन्द्यायै नमः

ॐ विश्वपाशविमोचिन्यै नमः

ॐ विश्वासकारिण्यै नमः

ॐ विश्ववायै नमः

ॐ विश्वशकीर्त्यै नमः

ॐ विचक्षणायै नमः

ॐ बाणचापधरायै नमः

ॐ वीरायै नमः

ॐ बिन्दुस्थायै नमः

ॐ बिन्दुमालिन्यै नमः ॥ ९५०॥

ॐ षट्चक्रभेदिन्यै नमः

ॐ षोढायै नमः

ॐ षोडशारनिवासिन्यै नमः

ॐ शितिकण्ठप्रियायै नमः

ॐ शान्तायै नमः

ॐ वातरूपिणै नमः

ॐ शाश्वत्यै नमः

ॐ शम्भुवनितायै नमः

ॐ शाम्भव्यै नमः ॥ ९६०॥

ॐ शिवरूपिण्यै नमः

ॐ शिवमात्रे नमः

ॐ शिवदायै नमः

ॐ शिवायै नमः

ॐ शिवहृदासनायै नमः

ॐ शुक्लाम्बरायै नमः

ॐ शीतलायै नमः

ॐ शीलायै नमः

ॐ शीलप्रदायिन्यै नमः

ॐ शिशुप्रियायै नमः ॥ ९७०॥

ॐ वैद्यविद्यायै नमः

ॐ सालग्रामशिलायै नमः

ॐ शुचये नमः

ॐ हरिप्रियायै नमः

ॐ हरमूर्त्यै नमः

ॐ हरिनेत्रकृतालयायै नमः

ॐ हरिवक्त्रोद्भवायै नमः

ॐ हालायै नमः

ॐ हरिवक्षस्थ=लस्थितायै नमः

ॐ क्षेमङ्कर्यै नमः ॥ ९८०॥

ॐ क्षित्यै नमः

ॐ क्षेत्रायै नमः

ॐ क्षुधितस्य प्रपूरण्यै नमः

ॐ वैश्यायै नमः

ॐ क्षत्रियायै नमः

ॐ शूद्र्यै नमः

ॐ क्षत्रियाणां कुलेश्वर्यै नमः

ॐ हरपत्न्यै नमः

ॐ हराराध्यायै नमः

ॐ हरसुवे नमः ॥ ९९०॥

ॐ हररूपिण्यै नमः

ॐ सर्वानन्दमय्यै नमः

ॐ आनन्दमय्यै नमः

ॐ सिद्धयै नमः

ॐ सर्वरक्षास्वरूपिण्यै नमः

ॐ सर्वदुष्टप्रशमन्यै नमः

ॐ सर्वेप्सितफलप्रदायै नमः

ॐ सर्वसिद्धेश्वराराध्यायै नमः

ॐ ईश्वराध्यायै नमः

ॐ सर्वमङ्गलमङ्गलायै नमः ॥ १०००॥

ॐ वाराह्यै नमः

ॐ वरदायै नमः

ॐ वन्द्यायै नमः

ॐ विख्यातायै नमः

ॐ विलपत्कचायै नमः

॥ श्री अन्नपूर्णा सहस्र नामावलिः सम्पूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

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1. श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्त्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैदिक दर्शन और ‘अन्न-तत्व’ को समझने के लिए हमें माता अन्नपूर्णा के स्वरूप, काशी के रहस्य और सहस्त्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

‘अन्न’ का तात्विक और मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्न केवल वह भौतिक भोजन नहीं है जिसे हम खाते हैं। वेदांत में ‘अन्न’ का अर्थ वह सब कुछ है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा का पोषण करता है। जब हम माता अन्नपूर्णा की स्तुति करते हैं, तो हम केवल पेट भरने के लिए भोजन नहीं मांग रहे होते, बल्कि हम ‘ज्ञान रूपी अन्न’ (Spiritual Nourishment) भी मांग रहे होते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने ‘अन्नपूर्णा स्तोत्र’ में कहा है— “ज्ञानवैराग्यसिद्धयर्थं भिक्षां देहि च पार्वति।” अर्थात्, हे माता! मुझे ज्ञान और वैराग्य रूपी भिक्षा प्रदान करें। यह सहस्त्रनाम हमारे भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के क्षुधा (भूख) को शांत करता है।

शिव और अन्नपूर्णा का अद्वैत संगम

माता अन्नपूर्णा काशी की साम्राज्ञी हैं। भगवान शिव मोक्ष के प्रदाता हैं, और माता अन्नपूर्णा भुक्ति (सांसारिक पोषण) की प्रदात्री हैं। शिव और अन्नपूर्णा का समन्वय भुक्ति और मुक्ति (Enjoyment and Liberation) का दुर्लभ संगम है। जब साधक श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का गान करता है, तो उसे संसार के सारे सुख (अन्न, धन, वस्त्र) भी मिलते हैं और अंततः वह शिव के मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है।

‘सहस्त्रनाम’ का अद्भुत नाद-विज्ञान (Sound Vibrations)

सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च चक्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। माता अन्नपूर्णा के ये हज़ार नाम वास्तव में ब्रह्मांडीय संपन्नता की 1000 आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक इन नामों का लयबद्ध उच्चारण करता है, तो उसके शरीर के मणिपूर चक्र (Navel Chakra – जो अग्नि और पाचन का केंद्र है) में एक अद्भुत ऊर्जा का निर्माण होता है। यह ऊर्जा शरीर को निरोगी बनाती है और आभामंडल को एक दिव्य आकर्षण से भर देती है, जो स्वतः ही धन-धान्य को अपनी ओर खींचता है।

2. श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवती अन्नपूर्णा साक्षात वात्सल्य, पोषण, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्रदात्री हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्त्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

घर में अखंड अन्न-धन और दरिद्रता का नाश (Wealth & Abundance)

  • अन्न के भंडारों का कभी खाली न होना: यह इस सहस्त्रनाम का सबसे प्रत्यक्ष और अचूक फल है। जिस घर में यह पाठ नित्य होता है, उस घर की रसोई में कभी भी अन्न-जल का अभाव नहीं होता। चाहे कितनी भी बड़ी आर्थिक मंदी क्यों न आ जाए, माता अन्नपूर्णा के भक्तों के घर में कभी चूल्हा बुझने की नौबत नहीं आती।

  • घोर दरिद्रता (Poverty) का समूल नाश: जो व्यक्ति भारी कर्जों के बोझ तले दब चुका है और व्यापार में लगातार घाटा हो रहा है, उसे श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह पाठ आय के नए स्रोत (Income streams) खोलता है और अलक्ष्मी (दरिद्रता) को घर से विदा कर देता है।

स्वास्थ्य, आयु और शारीरिक लाभ (Health & Vitality)

  • अन्न का अमृत में बदलना: माता अन्नपूर्णा की स्तुति से घर में पकाया जाने वाला साधारण भोजन भी ‘प्रसाद’ और ‘औषधि’ (Medicine) बन जाता है। इस भोजन को ग्रहण करने से परिवार के सदस्यों को गंभीर रोग नहीं होते और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) अत्यंत बलवान हो जाती है।

  • पाचन तंत्र और शारीरिक दुर्बलता में लाभ: जिन लोगों को भोजन न पचने की समस्या है, भूख न लगने का रोग है, या जो शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल हैं, उनके लिए यह स्तोत्र साक्षात संजीवनी है।

पारिवारिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Spiritual Liberation)

  • घर में अखंड सुख-शांति और प्रेम: जहाँ माता अन्नपूर्णा का वास होता है, वहाँ परिवार के सदस्यों के बीच कभी कलह नहीं होती। साथ बैठकर भोजन करने और माता का स्मरण करने से अगाध प्रेम और समझ (Understanding) विकसित होती है।

  • तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: वित्तीय समस्याओं या कल की चिंता (Insecurity about the future) के कारण होने वाला मानसिक तनाव इस स्तुति के गान से पूरी तरह शांत हो जाता है। साधक के मन में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि “जब विश्व की माता मेरी रक्षक है, तो मैं भूखा कैसे रह सकता हूँ।”

  • ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति: केवल भौतिक अन्न ही नहीं, माता अपने साधकों को आत्म-ज्ञान और संसार के प्रति एक स्वस्थ वैराग्य भी प्रदान करती हैं, जो परम शांति का मार्ग है।

3. श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

माता अन्नपूर्णा की उपासना अत्यंत सौम्य, सात्विक, निर्मल और वात्सल्य से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध सहस्त्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: माता अन्नपूर्णा की आराधना के लिए शुक्रवार (Friday) और गुरुवार (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है।

  • विशेष तिथियां: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा (अन्नपूर्णा जयंती), अक्षय तृतीया, धनतेरस, और नवरात्रि के दिन इस सहस्त्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) या मध्याह्न (दोपहर के भोजन से पूर्व) होता है। गोधूलि बेला में भी इसका पाठ किया जा सकता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North – धन की दिशा) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), लाल (Red), या रेशमी आसन का प्रयोग करें।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में हल्के पीले, लाल या श्वेत (White) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र घर के पूजा कक्ष या रसोईघर (Kitchen) के ईशान कोण (North-East) में एक स्वच्छ चौकी पर लाल/पीला कपड़ा बिछाकर माता अन्नपूर्णा (जिनके एक हाथ में अन्न का पात्र और दूसरे में स्वर्ण की कलछी हो, और सामने शिव जी भिक्षा मांग रहे हों) का चित्र स्थापित करें।
दीपक माता के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। चंदन या मोगरा की सात्विक धूप जलाएं।
तिलक और शृंगार माता अन्नपूर्णा को हल्दी, कुमकुम और केसर का तिलक लगाएं। उन्हें लाल या पीली चुनरी ओढ़ाएं। स्वयं भी मस्तक पर कुमकुम या हल्दी का तिलक धारण करें।
धान्य (अन्न) की ढेरी चौकी पर थोड़े से अक्षत (चावल) या गेहूं की एक ढेरी अवश्य बनाएं और उस पर एक कलश स्थापित करें। यह अन्नपूर्णा साधना का प्रमुख अंग है।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी से रंगे हुए चावल) और एक पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे जगन्माता अन्नपूर्णा, मैं अपने जीवन से दरिद्रता, व्याधियों व समस्त बाधाओं के नाश, अखंड अन्न-धन की प्राप्ति, और आपकी अहैतुकी कृपा के लिए श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्त्रनाम का पाठ और अर्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और भगवान शिव (काशी विश्वनाथ) का मानसिक ध्यान कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • माता अन्नपूर्णा के बीज मंत्र “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भगवति अन्नपूर्णे नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (कमलगट्टे या रुद्राक्ष की माला पर) जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और पूर्ण वात्सल्य के साथ ‘श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • सहस्त्रार्चन विधि (अचूक चमत्कार हेतु): यदि आप गंभीर आर्थिक संकट में हैं, तो सहस्त्रनाम के प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ माता की मूर्ति या यंत्र पर एक चावल का दाना (अक्षत), पीला फूल, या हल्दी की गांठ अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। पाठ के बाद इन चावलों को अपनी रसोई के मुख्य अन्न भंडार (आटे या चावल के डिब्बे) में मिला दें। घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होगी।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद माता अन्नपूर्णा को उनके सबसे प्रिय व्यंजन गाय के दूध की खीर, हलवा, पूड़ी, ताजे फल, या जो भी सात्विक भोजन घर में बना हो उसका भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से माता की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

माता अन्नपूर्णा परम वात्सल्यमयी हैं, परंतु ‘अन्न’ का अपमान वे कभी बर्दाश्त नहीं करतीं। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. अन्न का रत्ती भर भी अपमान न करें (Never Waste Food): यह अन्नपूर्णा साधना का सबसे बड़ा और कठोर नियम है। जो व्यक्ति अपनी थाली में जूठा भोजन छोड़ता है, अन्न को नाली या कचरे में फेंकता है, उस घर को माता अन्नपूर्णा हमेशा के लिए त्याग देती हैं। उतना ही भोजन लें, जितना खाना हो। अन्न का एक दाना भी बर्बाद नहीं होना चाहिए।

  2. रसोईघर की परम स्वच्छता (Cleanliness of Kitchen): रसोईघर माता अन्नपूर्णा का साक्षात मंदिर है। रात में झूठे बर्तन रसोई में न छोड़ें। रसोईघर को हमेशा साफ, सुगंधित और व्यवस्थित रखें। वहां जूते-चप्पल पहनकर प्रवेश न करें।

  3. पूर्ण सात्विक जीवन और आहार: अनुष्ठान के दौरान या नित्य पाठ करने वाले साधक को घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। माता के मंदिर (रसोई) में तामसिक भोजन पकना महापाप माना जाता है।

  4. दान का महत्व (Anna Daan): जो माता से लेता है, उसे बांटना भी आना चाहिए। जो व्यक्ति भूखे लोगों, साधु-संतों, गायों, कुत्तों और पक्षियों को नित्य अन्न दान करता है, माता अन्नपूर्णा उस पर अनंत काल तक प्रसन्न रहती हैं। अपनी कमाई का एक हिस्सा अन्न दान में अवश्य लगाएं।

  5. स्त्रियों का सम्मान: घर की जो स्त्री भोजन पकाती है, वह साक्षात अन्नपूर्णा का ही स्वरूप होती है। जो व्यक्ति भोजन बनाने वाली स्त्री का अपमान करता है या भोजन निकालते समय क्रोध करता है, उसका सर्वनाश निश्चित है। भोजन हमेशा शांत मन से पकाना और ग्रहण करना चाहिए।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई विपरीत प्रभाव न पड़े:

  • भोजन करने से पूर्व प्रार्थना: जो साधक इस सहस्त्रनाम का पाठ करते हैं, उन्हें कभी भी भोजन सीधा मुख में नहीं डालना चाहिए। भोजन की थाली आने पर हाथ जोड़कर माता अन्नपूर्णा को मानसिक रूप से भोग लगाएं (त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये) और फिर प्रसाद समझकर ग्रहण करें।

  • शारीरिक पवित्रता (Sutak/Patak): बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक/पातक या स्त्रियों द्वारा मासिक धर्म के दौरान) में मूर्ति, यंत्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान रसोई में प्रवेश करने से भी बचना चाहिए।

  • प्रतिशोध की भावना का त्याग: माता अन्नपूर्णा जगत का पालन करने वाली दयामयी माँ हैं। किसी व्यक्ति का अहित करने, उसे भूखा मारने, या बदला लेने की दुर्भावना से माता की स्तुति कभी न करें।

  • बिना शिव के अन्नपूर्णा की स्तुति: माता अन्नपूर्णा शिव की शक्ति हैं। उनकी पूजा से पहले भगवान शिव का स्मरण अवश्य करना चाहिए। काशी विश्वनाथ का स्मरण किए बिना अन्नपूर्णा की साधना अपूर्ण मानी जाती है।

6. आधुनिक युग में श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग विरोधाभासों का युग है। एक ओर जहाँ फाइव-स्टार होटलों और पार्टियों में टनों अन्न हर दिन कचरे में फेंका जा रहा है (Food Wastage), वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोग कुपोषण (Malnutrition) और भुखमरी का शिकार हैं।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक जीवनशैली के कारण लोग ‘ईटिंग डिसऑर्डर’ (Eating Disorders – जैसे एनोरेक्सिया या बिंज ईटिंग) का शिकार हो रहे हैं। लोग टीवी या मोबाइल स्क्रीन देखते हुए यंत्रवत भोजन करते हैं, जिससे शरीर को न तो पोषण मिल रहा है और न ही मन को तृप्ति। रासायनिक खेती (Chemical farming) ने भोजन से ‘प्राण-शक्ति’ को छीन लिया है।

‘श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘अन्न संकट’, ‘मानसिक तनाव’ और ‘असंतुलित जीवनशैली’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है:

  1. माइंडफुल ईटिंग (Mindful Eating): यह सहस्त्रनाम हमें भोजन के प्रति आदर (Gratitude) सिखाता है। जब हम अन्न को परब्रह्म मानकर ग्रहण करते हैं, तो हम एकाग्र होकर (Mindfully) खाते हैं। इससे पाचन तंत्र दुरुस्त होता है और ‘ईटिंग डिसऑर्डर’ स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

  2. भविष्य की आर्थिक असुरक्षा का अंत: आज हर इंसान इस डर में जी रहा है कि “कल मेरी नौकरी चली गई तो मेरा परिवार क्या खाएगा?” माता अन्नपूर्णा के 1000 नाम अवचेतन मन से इस ‘डर’ (Insecurity) को जड़ से उखाड़ फेंकते हैं। यह दृढ़ विश्वास पैदा होता है कि ब्रह्मांड की सत्ता मेरा पालन कर रही है, जिससे भयंकर मानसिक शांति मिलती है।

  3. सतत जीवनशैली (Sustainable Living): अन्नपूर्णा साधना हमें अन्न की बर्बादी रोकने की प्रेरणा देती है। यह केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि आज के ‘क्लाइमेट चेंज’ और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के युग में पृथ्वी के संसाधनों को बचाने का सबसे बड़ा पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) कदम है।

  4. सात्विक आहार से सात्विक विचार: जैसा अन्न, वैसा मन। जब घर में माता का स्मरण कर सात्विक भोजन बनता है, तो परिवार के सदस्यों के विचार शुद्ध होते हैं, क्रोध कम होता है, और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

Shri Annapurna Devi Sahasranama (श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परम सौंदर्य, वात्सल्य और पालन-शक्ति का साक्षात आवाहन है, जिसके समक्ष स्वयं देवाधिदेव महादेव ने भी भिक्षा के लिए हाथ फैलाए थे। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, बिना किसी अहंकार के, और अन्न के प्रति पूर्ण आदर भाव के साथ इस स्तुति का गान करता है, तो माता अन्नपूर्णा उसकी रसोई और उसके जीवन को साक्षात कुबेर के खजाने में बदल देती हैं।

माता अन्नपूर्णा अत्यंत कृपालु, वात्सल्यमयी और अपने बच्चों को कभी भूखा न सोने देने वाली जगन्माता हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में बहुत अधिक आर्थिक संकट आ गया है, मेहनत के बाद भी दो वक्त की रोटी मुश्किल हो रही है, कर्ज का बोझ बढ़ गया है, और घर में बीमारियां या अशांति है, तो शुक्रवार या गुरुवार की सुबह पीले/लाल आसन पर बैठें, घी का अखंड दीपक जलाएं, अक्षत की ढेरी पर कलश स्थापित करें, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपनी ‘अन्नपूर्णा माँ’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि माता के इन पावन 1000 नामों ने आपके जीवन की सारी दरिद्रता, बाधाओं, और भयों को दूर कर दिया है, और साक्षात काशी की साम्राज्ञी ने आपके घर की रसोई को अपार सफलता, असीम शांति, उत्तम स्वास्थ्य, और अखंड धन-धान्य के भंडार से भर दिया है। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भगवति अन्नपूर्णे नमः!

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनामः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम जगत के पालन-पोषण की अधिष्ठात्री, काशी की साम्राज्ञी माता अन्नपूर्णा के 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह स्तुति जीवन की बड़ी से बड़ी दरिद्रता, कुपोषण, और दुर्भाग्य को दूर कर घर में अखंड अन्न-धन का वास कराती है और भगवान शिव के समान आत्म-ज्ञान व वैराग्य प्रदान करती है।

2. इस सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस सहस्त्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘घर के अन्न भंडारों का कभी खाली न होना’ और ‘घोर दरिद्रता से मुक्ति’ है। इसके नियमित पाठ और अन्नपूर्णा मंत्र के प्रभाव से रसोईघर में बरकत आती है, परिवार को उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) प्राप्त होता है, भारी कर्जों से मुक्ति मिलती है, और व्यक्ति को भविष्य की आर्थिक असुरक्षा (डर) से पूर्णतः मानसिक शांति प्राप्त होती है।

3. श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?

माता अन्नपूर्णा की आराधना के लिए ‘शुक्रवार’ (Friday) और ‘गुरुवार’ (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा (अन्नपूर्णा जयंती), अक्षय तृतीया, और धनतेरस के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या मध्याह्न में स्नान के पश्चात, पीले या लाल वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।

4. ‘अन्नपूर्णा सहस्त्रार्चन’ विधि क्या है और इसका क्या चमत्कार है?

सहस्त्रार्चन विधि में साधक ‘श्री अन्नपूर्णा सहस्त्रनाम’ के प्रत्येक नाम (1000 नामों) के उच्चारण के साथ (जैसे ॐ अन्नपूर्णायै नमः) माता की मूर्ति या कलश पर एक चावल का दाना (अक्षत), पीला फूल, या हल्दी की गांठ अर्पित करता है। पाठ के पश्चात उन अभिमंत्रित चावलों को घर के मुख्य अन्न भंडार (आटे/चावल के डिब्बे) में मिला दिया जाता है। यह घर में बरकत और अखंड धन-धान्य लाने का सबसे तीव्र और अमोघ तांत्रिक उपाय है।

5. माता अन्नपूर्णा की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा नियम व निषेध क्या है?

माता अन्नपूर्णा की साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘अन्न का रत्ती भर भी अपमान न करना (Never waste food)’ और ‘रसोईघर में परम स्वच्छता’ रखना है। जो व्यक्ति थाली में जूठा भोजन छोड़ता है या भोजन बनाने वाली स्त्री का अपमान करता है, उस घर से माता अन्नपूर्णा विदा हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त, माता की रसोई में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) पकाना और खाना पूर्णतः निषिद्ध है। भूखों को अन्न दान करना इस साधना की सफलता की कुंजी है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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