Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali (श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 37 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, शैव आगमों और वैदिक वांग्मय के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब प्रेम, दांपत्य सुख, सौंदर्य और शिव-शक्ति के परम मिलन की बात आती है, तो भगवान शिव का ‘कल्याणसुंदर’ (Kalyansundar) स्वरूप सर्वोपरि माना जाता है। ‘कल्याणसुंदर’ भगवान शिव का वह मनमोहक और अत्यंत शुभ स्वरूप है, जिसमें वे माता पार्वती (मीनाक्षी/कामाक्षी) के साथ विवाह के मंडप में खड़े हैं। इस स्वरूप में भगवान विष्णु स्वयं माता पार्वती का कन्यादान कर रहे होते हैं और शिव जी माता का पाणिग्रहण (हाथ थामना) कर रहे होते हैं।

इस स्वरूप के साथ जुड़ा हुआ एक अत्यंत रहस्यमयी शब्द है— ‘पञ्चशर’ (Panchashaar)। पञ्चशर का अर्थ है ‘पांच बाण’ (Five Arrows), जो कामदेव के अस्त्र माने जाते हैं (कमल, अशोक, आम्रपुष्प, चमेली और नीलोत्पल)। जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, तब उन्होंने काम (Desire) को नष्ट करके उसे विशुद्ध प्रेम (Divine Love) में बदल दिया था। भगवान शिव ने कामदेव के पञ्चशरों की ऊर्जा को अपने ‘कल्याणसुंदर’ स्वरूप में समाहित कर लिया, ताकि उनके भक्तों को संसार में दांपत्य सुख और आध्यात्मिक वैराग्य दोनों एक साथ प्राप्त हो सकें।

जब मनुष्य का जीवन विवाह में हो रहे अकारण विलंब, दांपत्य जीवन के घोर कलह, प्रेम संबंधों में विफलता, और आकर्षण की कमी से घिर जाता है, तब भगवान कल्याणसुंदर की शरण में जाना साक्षात जीवन में वसंत ऋतु को आमंत्रित करने के समान है। भगवान शिव के इसी परम सुंदर, मंगलकारी और प्रेममय स्वरूप की ऊर्जा को अपने जीवन में जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों ने उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र नामों का संकलन किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली’ (Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्रनामावली’ का अर्थ है— एक हज़ार नामों की वह श्रृंखला जिसका उपयोग भगवान के अर्चन और नाम-जप के लिए किया जाता है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगाया जाता है)। यह कोई साधारण स्तुति नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर एकाकीपन (Loneliness), मंगली दोष, और रिश्तों की कड़वाहट को पल भर में भस्म कर देता है।

श्रीकल्याणसुन्दरपञ्चाक्षरसहस्रनामावलिः हिंदी | Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

श्रीसुन्दरकुचाम्बिकासमेत श्रीतेजिनीवननाथसहस्रनामावलिः

ॐ श्रीगणेशाय नमः ।

ॐ नकाररूपाय नमः ।

ॐ नभोविदे नमः ।

ॐ नर्तकाय नमः ।

ॐ नदीधराय नमः ।

ॐ नक्षत्रमालिने नमः ।

ॐ नगेशाय नमः ।

ॐ नभोगतये नमः ।

ॐ नरसिंहबाधनाय नमः ।

ॐ नानाशास्त्रविशारदाय नमः ।

ॐ नगहाराय नमः ॥ १०॥

ॐ नभोयोनये नमः ।

ॐ नगाय नमः ।

ॐ नरसिंहनिपातनाय नमः ।

ॐ नन्दिने नमः ।

ॐ नन्दिवराय नमः ।

ॐ नग्नाय नमः ।

ॐ नग्नवृन्दधराय नमः ।

ॐ नभसे नमः ।

ॐ नवपञ्चकनासिकाय नमः ।

ॐ नवीनाचलनायकाय नमः ॥ २०॥

ॐ नवावरणाय नमः ।

ॐ नवविद्रुमाधराय नमः ।

ॐ नादरूपाय नमः ।

ॐ नामरूपविवर्जिताय नमः ।

ॐ नलिनेक्षणाय नमः ।

ॐ नामपारायणप्रियाय नमः ।

ॐ नवशक्तिनायकाय नमः ।

ॐ नवयौवनाय नमः ।

ॐ नटेश्वराय नमः ।

ॐ नरसिंहमहादर्पघातिने नमः ॥ ३०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ नारङ्गफलप्रियाय नमः ।

ॐ नादहस्ताय नमः ।

ॐ नागेश्वराय नमः ।

ॐ नाद्याय नमः ।

ॐ नानार्थविग्रहाय नमः ।

ॐ नारदस्तुताय नमः ।

ॐ नरकवर्जिताय नमः ।

ॐ नारिकेळफलप्रदाय नमः ।

ॐ नयनत्रयाय नमः ।

ॐ नाट्यार्थरूपाय नमः ॥ ४०॥

ॐ नागयज्ञोपवीताय नमः ।

ॐ नगाधिपाय नमः ।

ॐ नागचूडाय नमः ।

ॐ नागाय नमः ।

ॐ नरेशाय नमः ।

ॐ नवनीतप्रियाय नमः ।

ॐ नन्दिवाहनाय नमः ।

ॐ नटराजाय नमः ।

ॐ नवमणिभूषणाय नमः ।

ॐ नववीराय नमः ॥ ५०॥

ॐ नववीराश्रयाय नमः ।

ॐ नवविश्वाय नमः ।

ॐ नवतपसे नमः ।

ॐ नवज्योतिषे नमः ।

ॐ नभःपतये नमः ।

ॐ नवात्मभुवे नमः ।

ॐ नष्टशोकाय नमः ।

ॐ नर्मालापविशारदाय नमः ।

ॐ नयकर्त्रे नमः ।

ॐ नवाय नमः ॥ ६०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ नवविधिप्रियाय नमः ।

ॐ नवक्ल्पकतरवे नमः ।

ॐ नगरनायकाय नमः ।

ॐ नरवरदाय नमः ।

ॐ नागलोकप्रियाय नमः ॥  ।

ॐ नामरूपवर्जिताय नमः ।

ॐ नाहङ्कारिणे नमः ।

ॐ नकळङ्काय नमः ।

ॐ नवग्रहरूपिणे नमः ।

ॐ नव्याव्ययभोजनाय नमः ॥ ७०॥

ॐ नगाधीशाय नमः ।

ॐ नवसुन्दराय नमः ।

ॐ नानृताय नमः ।

ॐ नमज्जनतमोगुणाय नमः ।

ॐ नादपुरस्कृताय नमः ।

ॐ नखोत्पन्नाय नमः ।

ॐ नागेन्द्रवन्दिताय नमः ।

ॐ नागचर्मधराय नमः ।

ॐ नागेन्द्रवन्दिताय नमः ।

ॐ नागेन्द्रवेषधराय नमः ॥ ८०॥

ॐ नगलोकवासिने नमः ।

ॐ नवविद्रुमप्रभाय नमः ।

ॐ नारदादिवन्दिताय नमः ।

ॐ नानाविधविचित्राय नमः ।

ॐ नामानेकविशेषिताय नमः ।

ॐ नवसिद्धवेषधराय नमः ।

ॐ नमोघाय नमः ।

ॐ नवपराय नमः ।

ॐ नवगुणाय नमः ।

ॐ नवगुणातीताय नमः ॥ ९०॥

ॐ नवस्वरूपिणे नमः ।

ॐ नवबीजाय नमः ।

ॐ नवभद्राय नमः ।

ॐ नवपुरुषाय नमः ।

ॐ नाहङ्काराय नमः ।

ॐ नवपञ्चलोकेशाय नमः ।

ॐ नवज्ञानिने नमः ।

ॐ नवबुद्धये नमः ।

ॐ नवानन्दमूर्तये नमः ।

ॐ नवविश्वाय नमः ॥ १००॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ नागविषाशनाय नमः ।

ॐ नागरत्नधराय नमः ।

ॐ नागरञ्जिताय नमः ।

ॐ नागेश्वराय नमः ।

ॐ नागलिङ्गाय नमः ।

ॐ नयोनये नमः ।

ॐ नगधन्वने नमः ।

ॐ नवबालाय नमः ।

ॐ नबालाय नमः ।

ॐ नवहिरण्याय नमः ॥ ११०॥

ॐ नवतिषट्तत्त्वाय नमः ।

ॐ नारायणीनाथाय नमः ।

ॐ नाद्यान्ताय नमः ।

ॐ नभोज्याय नमः ।

ॐ नविशिष्टाय नमः ।

ॐ नागवल्लीदलप्रियाय नमः ।

ॐ नाशवर्जिताय नमः ।

ॐ नवमाणिक्यमकुटाय नमः ।

ॐ नवनाथपूजिताय नमः ।

ॐ नवयौवनशोभिताय नमः ॥ १२०॥

ॐ नास्तिवर्जिताय नमः ।

ॐ नगर्भवासिने नमः ।

ॐ नासत्यवर्जिताय नमः ।

ॐ नार्यर्धदेहाय नमः ।

ॐ नतमसे नमः ।

ॐ नमूर्ताय नमः ।

ॐ नवमूर्ताय नमः ।

ॐ नवरसपूर्णाय नमः ।

ॐ नवकल्याणवेषधराय नमः ।

ॐ नवसूत्रकाराय नमः ॥ १३०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ नभीताय नमः ।

ॐ नादब्रह्ममयाय नमः ।

ॐ नाथदर्पहराय नमः ।

ॐ नाशानर्थाय नमः ।

ॐ नभःस्थाय नमः ।

ॐ नभःस्वरूपाय नमः ।

ॐ नरवेषसदनप्रतिग्रहाय नमः ।

ॐ नरश्वेतान्तकमर्दिताय नमः ।

ॐ नार्तये  नमः ।

ॐ नश्रमोपाधये नमः ॥ १४०॥

ॐ नगवाहनाय नमः ।

ॐ नवनाटकसूत्रधारिणे नमः ।

ॐ नभोनगरेशाय नमः ।

ॐ नगरपञ्चाक्षराय नमः ।

ॐ नवरसोचिताय नमः ।

ॐ नगरपनसारण्यवासिने नमः ।

ॐ नगरभूकैलासनायकाय नमः ।

ॐ नगेन्द्रकुमारीप्रियाय नमः ।

ॐ नाथषण्मङ्गळस्थलाय नमः ।

ॐ नरसिद्धवेषधराय नमः ॥ १५०॥

ॐ नवरत्नक्रयकारकाय नमः ।

ॐ नन्दिमहाकाळाय नमः ।

ॐ नवब्रह्मशिरच्छेत्रे नमः ।

ॐ नागाभरणभूषिताय नमः ।

ॐ नवकोटिशक्तिपरिवृताय नमः ।

ॐ नवव्याकरणकाय नमः ।

ॐ नवावरणपूजिताय नमः ।

ॐ नवकोट्यर्कतेजसे नमः ।

ॐ नभस्सम्मिताय नमः ।

ॐ नदीप्रवाहमानसाय नमः ॥ १६०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ नभीस्थिताय नमः ।

ॐ नरभीतिवर्जिताय नमः ।

ॐ नरशाकप्रियाय नमः ।

ॐ नासक्ताय नमः ।

ॐ नवकोटिमन्मथविग्रहाय नमः ।

ॐ नारीमोहितावधूतवेषधराय नमः ।

ॐ नवकोणान्तर्गताय नमः ।

ॐ नासाबिम्बकविराजिताय नमः ।

ॐ नादृशाय नमः ।

ॐ नाद्याय नमः ॥ १७०॥

ॐ नभोज्योतिषे नमः ।

ॐ नवरत्नगृहान्तस्थाय नमः ।

ॐ नादबिन्दुस्वरूपिणे नमः ।

ॐ नादान्तरूपाय नमः ।

ॐ नराह्लादकराय नमः ।

ॐ नवान्नभोजनाय नमः ।

ॐ नववस्रधारिणे नमः ।

ॐ नवभूषणप्रियाय नमः ।

ॐ नरत्वविवर्जिताय नमः ।

ॐ नवाम्रमूलवासिने नमः ॥ १८०॥

ॐ नादान्तविग्रहाय नमः ।

ॐ नागेन्द्राय नमः ।

ॐ नार्यर्धदेहाय नमः ।

ॐ नवकल्हारलोचनाय नमः ।

ॐ नवकल्पतरुवासिने नमः ।

ॐ नरास्थिमालाप्रियाय नमः ।

ॐ नवबिल्ववनवासिने नमः ।

ॐ नामसह्स्रविशेषिताय नमः ।

ॐ नामालापविनोदिताय नमः ॥  ???

ॐ नभोमणये नमः ॥ १९०॥

ॐ नवखण्डस्वरूपाय नमः ।

ॐ नवखण्डयन्त्रस्थिताय नमः ।

ॐ नवरत्नपीठस्थिताय नमः ।

ॐ नगरत्रयान्तकाय नमः ।

ॐ नवशिष्टाय नमः ।

ॐ नवपुष्टाय नमः ।

ॐ नवतुष्टाय नमः ।

ॐ नवबेराय नमः ।

ॐ नवसाराय नमः ।

ॐ नरतारकाय नमः ॥ २००॥

ॐ नवहेमभूषणाय नमः ।

ॐ नवरत्नमणिमण्डपान्तर्गताय नमः ।

ॐ नदीजटाधारिणे नमः ।

ॐ मकाररूपाय नमः ।

ॐ महेश्वराय नमः ।

ॐ मनोमयाय नमः ।

ॐ महायोगिने नमः ।

ॐ महाकर्मणे नमः ।

ॐ मन्त्रज्ञाय नमः ।

ॐ महिताय नमः ॥ २१०॥

ॐ मन्दारमालाधराय नमः ।

ॐ महौषधाय नमः ।

ॐ महानिधये नमः ।

ॐ महामतये नमः ।

ॐ महर्षये नमः ।

ॐ मरीचये नमः ।

ॐ महीमालाय नमः ।

ॐ महाहृदयाय नमः ।

ॐ महाभक्ताय नमः ।

ॐ महाभूताय नमः ॥ २२०॥

ॐ महानिधये नमः ।

ॐ महाकायाय नमः ।

ॐ मङ्गलालयाय नमः ।

ॐ मङ्गळप्रदाय नमः ।

ॐ महातपसे नमः ।

ॐ महामन्त्राय नमः ।

ॐ महातेजसे नमः ।

ॐ महाबालाय नमः ।

ॐ महादेवाय नमः ।

ॐ मयूरवासभूमये नमः ॥ २३०॥

ॐ मन्ददूराय नमः ।

ॐ मन्मथनाशनाय नमः ।

ॐ मन्त्रविद्याय नमः ॥।  ।

ॐ मन्त्रशास्त्रवक्त्रे नमः ।

ॐ महामायाय नमः ।

ॐ महानाथाय नमः ।

ॐ महोत्साहाय नमः ।

ॐ महाबलाय नमः ॥  ।

ॐ महावीर्याय नमः ।

ॐ महाशक्तये नमः ॥ २४०॥

ॐ महाद्युतये नमः ।

ॐ महाचराय नमः ।

ॐ मध्यस्थाय नमः ।

ॐ महाधनुषे नमः ।

ॐ महेन्द्राय नमः ।

ॐ महाज्ञानिने नमः ।

ॐ मातामहाय नमः ।

ॐ मातरिश्वने नमः ।

ॐ महायशसे नमः ।

ॐ महाकल्पाय नमः ॥ २५०॥

ॐ महाधवाय नमः ।

ॐ मनसे नमः ।

ॐ महारूपाय नमः ।

ॐ महागर्भाय नमः ।

ॐ महादम्भाय नमः ।

ॐ मखद्वेषिणे नमः ।

ॐ मलविमोचकाय नमः ।

ॐ मनोन्मनीपतये नमः ।

ॐ मत्ताय नमः ।

ॐ मत्तधूर्तशिरसे नमः ॥ २६०॥

ॐ महोत्सवाय नमः ।

ॐ मङ्गळाकृतये नमः ।

ॐ मण्डलप्रियाय नमः ।

ॐ मनोजयाय नमः ।

ॐ मारिणे नमः ।

ॐ मानिने नमः ।

ॐ महाकाळाय नमः ।

ॐ महाकेशाय नमः ।

ॐ महावटवे नमः ।

ॐ महात्यागाय नमः ॥ २७०॥

ॐ मध्यस्थाय नमः ।

ॐ मालिने नमः ।

ॐ महिमाणवे नमः ।

ॐ मधुरप्रियाय नमः ।

ॐ महेष्वासाय नमः ।

ॐ महानन्दाय नमः ।

ॐ महासत्त्वाय नमः ।

ॐ महेशाय नमः ।

ॐ महीभर्त्रे नमः ॥

ॐ महाभुजाय नमः ॥ २८०॥

ॐ मन्दस्मितमुखारविन्दाय नमः ।

ॐ माणिक्यमकुटधारिणे नमः ।

ॐ महालावण्याय नमः ।

ॐ महावर्त्माटवीस्थिताय नमः ।

ॐ महापाशुपताय नमः ।

ॐ मणिपुरान्तर्गताय नमः ।

ॐ ममताहन्त्रे नमः ।

ॐ मनोन्मनीप्रियनन्दनाय नमः ।

ॐ महेश्वराय नमः ।

ॐ महापूज्याय नमः ॥ २९०॥

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ॐ महायागसमाराध्याय नमः ।

ॐ महापातकनाशिने नमः ।

ॐ महाभैरवपूजिताय नमः ।

ॐ महायन्त्राय नमः ।

ॐ महासनाय नमः ।

ॐ महातन्त्राय नमः ।

ॐ महाकल्पाय नमः ।

ॐ महाताण्डवसाक्षिणे नमः ।

ॐ मनोवाचामगोचराय नमः ।

ॐ मदमालिने नमः ॥ ३००॥

ॐ मनुविद्याय नमः ।

ॐ महते नमः ।

ॐ महेशाय नमः ।

ॐ मधुमते नमः ।

ॐ मायाय नमः ।

ॐ मायातीताय नमः ।

ॐ महीयसे नमः ।

ॐ महासन्तोषरूपाय नमः ।

ॐ मार्ताण्डभैरवाराध्याय नमः ।

ॐ मातृकावर्णरूपिणे नमः ॥ ३१०॥

ॐ महाकैलासनिलयाय नमः ।

ॐ महासाम्राज्यदायिने नमः ।

ॐ मलयाचलवासिने नमः ।

ॐ महावीरेन्द्रवरदाय नमः ।

ॐ महाग्रासाय नमः ।

ॐ मनुविद्याय नमः ।

ॐ मदघूर्णितरक्ताक्षाय नमः ।

ॐ मांसनिष्ठाय नमः ।

ॐ मधुप्रीताय नमः ।

ॐ मधुमते नमः ॥ ३२०॥

ॐ महीधराय नमः ।

ॐ महाकाळाय नमः ।

ॐ मनस्विने नमः ।

ॐ महात्मने नमः ।

ॐ मध्यमाय नमः ।

ॐ महाहृदयाय नमः ।

ॐ महेन्द्राय नमः ।

ॐ महापरक्रमाय नमः ।

ॐ महादर्पमथनाय नमः ।

ॐ महादान्ताय नमः ॥ ३३०॥

ॐ महात्मने नमः ।

ॐ महेन्द्रोपेन्द्रचन्द्रार्कनिध्याताय नमः ।

ॐ मायाबीजाय नमः ।

ॐ महर्षिवन्दिताय नमः ।

ॐ महाबलपराक्रमाय नमः ।

ॐ महानादाय नमः ।

ॐ मातरिश्वने नमः ।

ॐ महाध्वस्थाय नमः ।

ॐ मयोभुवे नमः ।

ॐ महाककुप्प्रियाय नमः ॥ ३४०॥

ॐ मनुजौपवाह्यक्रतवे नमः ।

ॐ महापापहराय नमः ।

ॐ महाभूताय नमः ।

ॐ महावीर्याय नमः ।

ॐ मातृकापतये नमः ।

ॐ महर्षये नमः ।

ॐ मणिपूराय नमः ।

ॐ महाधर्माय नमः ।

ॐ महासेनजनकाय नमः ।

ॐ मयूरत्वप्रियाय नमः ॥ ३५०॥

ॐ मनोरञ्जिताय नमः ।

ॐ मार्कण्डपूजिताय नमः ।

ॐ मल्लिकार्चिताय नमः ।

ॐ मक्षिकार्चिताय नमः ।

ॐ मातृकावेषधराय नमः ।

ॐ मकरकुण्डलधराय नमः ।

ॐ मराळीगमनप्रियाय नमः ।

ॐ महागणेशजनकाय नमः ।

ॐ मधुरभाषिताय नमः ।

ॐ मरतकाङ्किताय नमः ॥ ३६०  ???

ॐ मन्मथकोटिप्रभाय नमः ।

ॐ मकरासनाय नमः ।

ॐ महदद्भुताय नमः ।

ॐ मस्तकाक्षाय नमः ।

ॐ मन्त्राक्षरस्वरूपाय नमः ।

ॐ मङ्गळवेषधराय नमः ।

ॐ महामेरुस्थिताय नमः ।

ॐ महत्कामिने नमः ।

ॐ महाशान्ताय नमः ।

ॐ महासर्पाय नमः ॥ ३७०॥

ॐ महाबीजाय नमः ।

ॐ महद्भवाय नमः ।

ॐ महाशर्मणे नमः ।

ॐ महाभीमाय नमः ।

ॐ महत्कठोराय नमः ।

ॐ महाविश्वेश्वराय नमः ।

ॐ महागणनाथाय नमः ।

ॐ महाधनदाय नमः ।

ॐ महाभव्याय नमः ।

ॐ महाभूतपतये नमः ॥ ३८०॥

ॐ महदष्टमूर्तये नमः ।

ॐ महदव्यक्ताय नमः ।

ॐ महानन्दाय नमः ।

ॐ महाभगवते नमः ।

ॐ महाविक्रमाय नमः ।

ॐ महाहिरण्याय नमः ।

ॐ महातेजसे नमः ।

ॐ महाप्रचेतसे नमः ।

ॐ मलापहारिणे नमः ।

ॐ महामृत्यवे नमः ॥ ३९०॥

ॐ महाभिक्षुकाय नमः ।

ॐ महाराजाय नमः ।

ॐ महाकटाक्षवीक्षिताय नमः ।

ॐ महाबलिप्रसन्नाय नमः ।

ॐ मदनागमपारङ्गताय नमः ।

ॐ महाभिषजे नमः ।

ॐ महानीलग्रीवाय नमः ।

ॐ महातेजिनीशाय नमः ।

ॐ शिकाररूपाय नमः ।

ॐ शिञ्जानमणिमण्डिताय नमः ॥ ४००॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ शिष्टाय नमः ।

ॐ शिवाय नमः ।

ॐ शिपिविष्टाय नमः ।

ॐ शिवाश्रयाय नमः ।

ॐ शिशवे नमः ।

ॐ शिपिसारथये नमः ।

ॐ शिवालयाय नमः ।

ॐ शिवध्यानरताय नमः ।

ॐ शिखण्डिने नमः ।

ॐ शिवकामेश्वराय नमः ॥ ४१०॥

ॐ शिवदूताय नमः ।

ॐ शिवारध्याय नमः ।

ॐ शिवमूर्तये नमः ।

ॐ शिवशङ्कराय नमः ।

ॐ शिवप्रियाय नमः ।

ॐ शिवपराय नमः ।

ॐ शिष्टपूजिताय नमः ।

ॐ शिवज्ञानप्रदायिने नमः ।

ॐ शिवानन्दाय नमः ।

ॐ शिवतेजसे नमः ॥ ४२०॥

ॐ शिवोपाधिरहिताय नमः ।

ॐ शिवोपद्रवहराय नमः ।

ॐ शिवभूतनाथाय नमः ।

ॐ शिवमूलाय नमः ।

ॐ शिरश्चन्द्राय नमः ।

ॐ शितिकण्ठाय नमः ।

ॐ शिवाराधनतत्पराय नमः ।

ॐ शिवकोमळाय नमः ।

ॐ शिवमार्गपरिपालकाय नमः ।

ॐ शिवघनाय नमः ॥ ४३०॥

ॐ शिवाभिन्नाय नमः ।

ॐ शिवाधीशाय नमः ।

ॐ शिवसायुज्यप्रदाय नमः ।

ॐ शिवसक्ताय नमः ।

ॐ शिवात्मकाय नमः ।

ॐ शिवयोगिने नमः ।

ॐ शिवज्ञानाय नमः ।

ॐ शिवयोगेश्वराय नमः ।

ॐ शिवसुन्दरकुचानाथाय नमः ।

ॐ शिवसिद्धाय नमः ॥ ४४०॥

ॐ शिवनिधये नमः ।

ॐ शिवाध्यक्षाय नमः ।

ॐ शिवात्रस्ताय नमः ।

ॐ शिवलीलाय नमः ।

ॐ शिवतत्त्वाय नमः ।

ॐ शिवसत्वाय नमः ।

ॐ शिवबुद्धये नमः ।

ॐ शिवोत्तमाय नमः ।

ॐ शिवलिङ्गार्चनप्रियाय नमः ।

ॐ शिवशब्दैकनिलयाय नमः ॥ ४५०॥

ॐ शिवभ्क्तजनप्रियाय नमः ।

ॐ शिवानन्दरसाय नमः ।

ॐ शिवसम्पूर्णाय नमः ।

ॐ शिवशम्भवे नमः ।

ॐ शिवज्ञानप्रदाय नमः ।

ॐ शिवदिव्यविलासिने नमः ।

ॐ शिवसाम्राज्यदायिने नमः ।

ॐ शिवसाक्षात्काराय नमः ।

ॐ शिवब्रह्मविद्याय नमः ।

ॐ शिवताण्डवाय नमः ॥ ४६०॥

ॐ शिवशास्त्रैकनिलयाय नमः ।

ॐ शिवेच्छाय नमः ।

ॐ शिवसर्वदाय नमः ।

ॐ शिवाभीष्टप्रदाय नमः ।

ॐ शिवश्रीकण्ठकराय नमः ।

ॐ शिवज्योतिषे नमः ।

ॐ शिवकैलासनिलयाय नमः ।

ॐ शिवरञ्जिने नमः ।

ॐ शिवपरूषिकाय नमः ।

ॐ शिवक्षतदानवाय नमः ॥ ४७०॥

ॐ शिंशुमारशुकावताराय नमः ।

ॐ शिवसङ्कल्पाय नमः ।

ॐ शिखामणये नमः ।

ॐ शिवभक्तैकसुलभाय नमः ।

ॐ शिवात्मसुतचक्षुषे नमः ।

ॐ शितभीतहराय नमः ।

ॐ शिखिवाहनजन्मभुवे नमः ।

ॐ शिवलावण्याय नमः ।

ॐ शिवानन्दरसाश्रयाय नमः ।

ॐ शिवप्रकाशाय नमः ॥ ४८०॥

ॐ शिरःकृतसुरापगाय नमः ।

ॐ शिवकेतनाय नमः ।

ॐ शिवशैलवासिने नमः ।

ॐ शिवशम्भवे नमः ।

ॐ शिवभक्तान्तर्गताय नमः ।

ॐ शिवजीवानुकूलिकाय नमः ।

ॐ शिवपुण्यफलप्रदाय नमः ।

ॐ शिवसौभाग्यनिलयाय नमः ।

ॐ शिवनित्यमनोहराय नमः ।

ॐ शिवदिव्यरसाय नमः ॥ ४९०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ शिवसाम्राज्यविग्रहाय नमः ।

ॐ सिवब्रह्मणे नमः ।

ॐ शिवप्रसादसम्पन्नाय नमः ।

ॐ शिवसाक्षिभूताय नमः ।

ॐ शिवकामिने नमः ।

ॐ शिवलक्षणाय नमः ।

ॐ शिवसौख्याय नमः ।

ॐ शिवास्याय नमः ।

ॐ शिवरह्स्याय नमः ।

ॐ शिवसर्वदाय नमः ॥ ५००॥

ॐ शिवचिन्त्याय नमः ।

ॐ शिवाभीष्टफलप्रदाय नमः ।

ॐ शिवश्रीकण्ठाय नमः ।

ॐ शिवदाय नमः ।

ॐ शिवज्योतिषे नमः ।

ॐ शिवदयाहृदयाय नमः ।

ॐ शिवचिन्तामणिपदाय नमः ।

ॐ शिवविमलज्ञानाय नमः ।

ॐ शिवभाग्याय नमः ।

ॐ शिवभाग्येशाय नमः ॥ ५१०॥

ॐ शिवपदान्ताय नमः ।

ॐ शिवभोक्त्रे नमः ।

ॐ शिवशक्त्येकनिलयाय नमः ।

ॐ शिवसत्यप्रकाशाय नमः ।

ॐ शिवराजार्चिताय नमः ।

ॐ शिवषण्मङ्गळनिलयाय नमः ।

ॐ शिवकामपूजिताय नमः ।

ॐ शिवविद्वदर्चिताय नमः ।

ॐ शिवसाक्षिणे नमः ।

ॐ शिवप्रभावरूपाय नमः ॥ ५२०॥

ॐ शिवमूलप्रकृतये नमः ।

ॐ शिवगोचराय नमः ।

ॐ शिवत्वगणाधीशाय नमः ।

ॐ शिवतुष्टाय नमः ।

ॐ शिवपुष्टाय नमः ।

ॐ शिवशिष्टाय नमः ।

ॐ शिवस्मृतये नमः ।

ॐ शिवकान्तिमते नमः ।

ॐ शिववीरेन्द्रवरदाय नमः ।

ॐ शिवशूलधराय नमः ॥ ५३०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ शिवपञ्चवक्त्राय नमः ।

ॐ शिवशुक्लवर्णाय नमः ।

ॐ शिवानुत्तमाय नमः ।

ॐ शिवभक्तनिधये नमः ।

ॐ शिवदयामूर्तये नमः ।

ॐ शिवगुरुमूर्तये नमः ।

ॐ शिवगुणनिधये नमः ।

ॐ शिवपरमाय नमः ।

ॐ शिवपावनाकृतये नमः ।

ॐ शिवदिव्यविग्रहाय नमः ॥ ५४०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ शिवादित्रयमूर्तये नमः ।

ॐ शिवज्ञानतरवे नमः ।

ॐ शिवयोगिने नमः ।

ॐ शिवनिर्भेदाय नमः ।

ॐ शिवाद्वैताय नमः ।

ॐ शिवाद्वैतवर्जिताय नमः ।

ॐ शिवराजराजेश्वराय नमः ।

ॐ शिवराज्यवल्लभाय नमः ।

ॐ शिवस्वामिने नमः ।

ॐ शिवदीक्षिताय नमः ॥ ५५०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ शिवदक्षिणामूर्तये नमः ।

ॐ शिवनामपारायणप्रियाय नमः ।

ॐ शिवतुङ्गाय नमः ।

ॐ शिवचक्रस्थिताय नमः ।

ॐ शिवस्कन्दपित्रे नमः ।

ॐ शिववर्त्मासनाय नमः ।

ॐ शिवभैरवाय नमः ।

ॐ शिवनादरूपाय नमः ।

ॐ शिवतेजोरूपाय नमः ।

ॐ शिवबहुरूपाय नमः ॥ ५६०॥

ॐ शिवगायत्रीवल्लभाय नमः ।

ॐ शिवव्याहृतये नमः ।

ॐ शिवभावज्ञाय नमः ।

ॐ शिवच्छन्दसे नमः ।

ॐ शिवगम्भीराय नमः ।

ॐ शिवगर्विताय नमः ।

ॐ शिवकेवलाय नमः ।

ॐ शिवकैवल्याय नमः ।

ॐ शिवकैवल्यफलप्रदाय नमः ।

ॐ शिवसाधवे नमः ॥ ५७०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ शिवधर्मवन्दिताय नमः ।

ॐ शिवज्ञानमूर्तये नमः ।

ॐ शिवधर्मबुद्धये नमः ।

ॐ शिवज्ञानगम्याय नमः ।

ॐ शिवाद्भुतचरित्राय नमः ।

ॐ शिवगन्धर्वार्चिताय नमः ।

ॐ शिवोद्दामवैभवाय नमः ।

ॐ शिवव्यवहारिणे नमः ।

ॐ शिवप्रकाशात्मने नमः ।

ॐ शिवकारणाय नमः ॥ ५८०॥

ॐ शिवकारणानन्दविग्रहाय नमः ।

ॐ शिवभूतात्मने नमः ।

ॐ शिवविद्येशाय नमः ।

ॐ शिवपुरजयाय नमः ।

ॐ शिवभीमाय नमः ।

ॐ शिवपराक्रमाय नमः ।

ॐ शिवात्मज्योतिषे नमः ।

ॐ शिवचञ्चलाय नमः ।

ॐ शिवज्ञानमूर्तये नमः ।

ॐ शिवतत्पुरुषाय नमः ॥ ५९०॥

ॐ शिवाघोरमूर्तये नमः ।

ॐ शिववामदेवाय नमः ।

ॐ शिवसद्योजातमूर्तये नमः ।

ॐ शिववेदाय नमः ।

ॐ शिवज्योतिष्मते नमः ।

ॐ शिवतिमिरापहाय नमः ।

ॐ शिवद्विजोत्तमाय नमः ।

ॐ वकाररूपाय नमः ।

ॐ वाचामगोचराय नमः ।

ॐ वनमालिने नमः ॥ ६००॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ वननर्तकाय नमः ।

ॐ वह्निनेत्राय नमः ।

ॐ वञ्चकाय नमः ।

ॐ वारिनिधये नमः ।

ॐ वटुकाद्यष्टरूपाय नमः ।

ॐ वर्षित्रे नमः ।

ॐ वयोवृद्धाय नमः ।

ॐ वदनपङ्कजाय नमः ।

ॐ वक्त्रपञ्चधराय नमः ।

ॐ वलाहकाय नमः ॥ ६१०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ वह्निगर्भाय नमः ।

ॐ वामागमप्रियाय नमः ।

ॐ वासनार्चिताय नमः ।

ॐ वाराहीप्रियनन्दनाय नमः ।

ॐ वह्निस्वरूपाय नमः ।

ॐ वसन्तकालप्रियाय नमः ।

ॐ वसन्तोत्सवाय नमः ।

ॐ वलयवाणिज्याय नमः ।

ॐ वसिष्ठार्चिताय नमः ।

ॐ वामदेवाय नमः ॥ ६२०॥

ॐ वसुदेवप्रियाय नमः ।

ॐ वास्तुमूर्तये नमः ।

ॐ वारिवस्कृताय नमः ।

ॐ वर्याय नमः ।

ॐ वपये नमः ।

ॐ वनजासनाय नमः ।

ॐ वरदायकाय नमः ।

ॐ वसुरुद्रार्करूपाय नमः ।

ॐ वक्त्रे नमः ।

ॐ वसुमते नमः ॥ ६३०॥

ॐ वातपित्तादिरूपाय नमः ।

ॐ वनमालिकाय नमः ।

ॐ वातुळागमपूजिताय नमः ।

ॐ वचस्याय नमः ।

ॐ वर्गोत्तमाय नमः ।

ॐ वाचस्पतये नमः ।

ॐ वनक्रीडाविनोदिताय नमः ।

ॐ वाग्वादिनीपतये नमः ।

ये भी पढ़ें:  Shri Bagalamukhi Sahasranaam (श्री बगलामुखी सहस्रनाम): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

ॐ वनदारुकाभिक्षाटनाय नमः ।

ॐ वराहदर्शिताय नमः ॥ ६४०॥

ॐ वाणीशमराळदर्शिताय नमः ।

ॐ वाजिमेधदशकात्मभूप्रसन्नाय नमः ।

ॐ वनौषधये नमः ।

ॐ वामाचारवियुक्ताय नमः ।

ॐ वरमूर्तये नमः ।

ॐ वरप्रियाय नमः ।

ॐ वरप्रकाशाय नमः ।

ॐ वज्रेश्वराय नमः ।

ॐ वसुधात्रे नमः ।

ॐ वामदीक्षिताय नमः ॥ ६५०॥

ॐ वस्तुत्रयगुणात्मकाय नमः ।

ॐ वर्गत्रयनिलयाय नमः ।

ॐ वशित्वसिद्धये नमः ।

ॐ वासुकीकर्णभूषणाय नमः ।

ॐ वाजिविक्रयिकाय नमः ।

ॐ वातपुरीशाय नमः ।

ॐ वाराणसीपतये नमः ।

ॐ वर्चसे नमः ।

ॐ वपुषे नमः ।

ॐ वज्रसन्निभाय नमः ॥ ६६०॥

ॐ वज्रवल्लीप्रियाय नमः ।

ॐ वास्तुपुरुषाय नमः ।

ॐ वाजिवाहनाय नमः ।

ॐ वाजिवज्जम्बुकवेष्टिताय नमः ।

ॐ वन्दिताखिललोकाय नमः ।

ॐ वारिराजव्रतप्रियाय नमः ।

ॐ वसनवर्जिताय नमः ।

ॐ वाजिमेधप्रियाय नमः ।

ॐ वरवेषधराय नमः ।

ॐ वर्णोत्तमाय नमः ॥ ६७०॥

ॐ वरकामिने नमः ।

ॐ वाक्यसमावृताय नमः ।

ॐ वामपाशाय नमः ।

ॐ वाराङ्गनार्चिताय नमः ।

ॐ वामागमपूजिताय नमः ।

ॐ वशित्वसिद्धये नमः ।

ॐ वपुरकृताय नमः ।

ॐ वसुगुणराशये नमः ।

ॐ वरगुणाकराय नमः ।

ॐ वनानन्दाय नमः ॥ ६८०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ वचोवादिने नमः ।

ॐ वरोन्मत्तवेषाय नमः ।

ॐ वरतारकाय नमः ।

ॐ वसुयोगिने नमः ।

ॐ वरशाश्वताय नमः ।

ॐ वाहनादिविशेषिताय नमः ।

ॐ वस्तुत्रयविशेषिताय नमः ।

ॐ वासवाद्यर्चिताय नमः ।

ॐ वसनागमाय नमः ।

ॐ वस्तुधर्महेतवे नमः ॥ ६९०॥

ॐ वास्तुगताय नमः ।

ॐ वस्त्रादिरत्नप्रवर्तकाय नमः ।

ॐ वरवीरश्रवसे नमः ।

ॐ वरदात्मभुवे नमः ।

ॐ वनकल्पाय नमः ।

ॐ वसुप्रीताय नमः ।

ॐ वाग्विचक्षणाय नमः ।

ॐ वरवारेशाय नमः ।

ॐ वरदेवासुरगुरवे नमः ।

ॐ वरदेवात्मने नमः ॥ ७००॥

ॐ वरदात्मशम्भवे नमः ।

ॐ वरश्रेष्ठाय नमः ।

ॐ वसुधर्मचारिणे नमः ।

ॐ वासनादिप्रियाय नमः ।

ॐ वत्सपयोधराय नमः ।

ॐ वनचन्दनलेपिताय नमः ।

ॐ वसुमङ्गळवासिने नमः ।

ॐ वनकान्तवासिने नमः ।

ॐ वटारण्यपुरीशाय नमः ।

ॐ वास्तुत्रिशूलधराय नमः ॥ ७१०॥

ॐ वास्तुस्ववशाय नमः ।

ॐ वासश्मशानदेवाय नमः ।

ॐ वरदाक्षराय नमः ।

ॐ वनधूर्जिटिने नमः ।

ॐ वरदक्षारये नमः ।

ॐ वसुघनाय नमः ।

ॐ वाससकलाधाराय नमः ।

ॐ वरमृडाय नमः ।

ॐ वरपूर्णाय नमः ।

ॐ वरपूरयित्रे नमः ॥ ७२०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ वाक्पुण्याय नमः ।

ॐ वरसुलोचनाय नमः ।

ॐ वरदानन्दाय नमः ।

ॐ वसद्गतये नमः ।

ॐ वसवत्कृतये नमः ।

ॐ वाशान्ताय नमः ।

ॐ वसद्भूतये नमः ।

ॐ वरलोकबन्धवे नमः ।

ॐ वाचाक्षयाय नमः ।

ॐ वरद्युतिधराय नमः ॥ ७३०॥

ॐ वराग्रगण्याय नमः ।

ॐ वरेश्वराय नमः ।

ॐ वरविशोकाय नमः ।

ॐ वाक्शुद्धाय नमः ।

ॐ वारिगुणाधीशाय नमः ।

ॐ वरनिर्मोहाय नमः ।

ॐ वीरनिर्विघ्नाय नमः ।

ॐ वरप्रभवाय नमः ।

ॐ वरपूर्वजाय नमः ।

ॐ वासदत्ताय नमः ॥ ७४०॥

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali

ॐ वरसत्त्वविदे नमः ।

ॐ वाणीशशिरश्छेत्रे नमः ।

ॐ वर्तिने नमः ।

ॐ वह्निदर्पविघातिने नमः ।

ॐ वल्मीकाय नमः ।

ॐ वायुदर्पविघातिने नमः ।

ॐ वल्मीकवासिने नमः ।

ॐ वामपाशाय नमः ।

ॐ वर्णिने नमः ।

ॐ वटवृक्षगाय नमः ॥ ७५०॥

ॐ वामाचारप्रयुक्ताय नमः ।

ॐ वनपतये नमः ।

ॐ वागीशाय नमः ।

ॐ वर्णाश्रमविभेदिने नमः ।

ॐ वदनानेकविशेषिताय नमः ।

ॐ वाग्विलासाय नमः ।

ॐ वाचालकाय नमः ।

ॐ वासुकिभूषणाय नमः ।

ॐ वशङ्कराय नमः ।

ॐ वत्सराय नमः ॥ ७६०॥

ॐ वैद्येश्वराय नमः ।

ॐ वयःक्रमविवर्जिताय नमः ।

ॐ वाञ्छितार्थप्रदाय नमः ।

ॐ वह्नीशाय नमः ।

ॐ वषट्काराय नमः ।

ॐ वास्तवपुरुषाय नमः ।

ॐ वसनदिशाधराय नमः ।

ॐ वल्लभेशजनकाय नमः ।

ॐ वाचस्पत्यर्चिताय नमः ।

ॐ वयोऽवस्थाविवर्जिताय नमः ॥ ७७०॥

ॐ वस्तुत्रयस्वरूपाय नमः ।

ॐ वलित्रयविशेषिताय नमः ।

ॐ वसुन्धराय नमः ।

ॐ वातात्मजार्चिताय नमः ।

ॐ वर्ज्यावर्ज्यस्वरूपाय नमः ।

ॐ वरीयसे नमः ।

ॐ वरदाय नमः ।

ॐ वन्द्याय नमः ।

ॐ वटवे नमः ।

ॐ वागीशाय नमः ॥ ७८०॥

ॐ वर्णाश्रमगुरवे नमः ।

ॐ वर्णावर्णितरुपाय नमः ।

ॐ वायुवाहनाय नमः ।

ॐ वायुदर्पापहाय नमः ।

ॐ वसुमनसे नमः ।

ॐ वररुचये नमः ।

ॐ वाचस्पतये नमः ।

ॐ वसुश्रवसे नमः ।

ॐ वसुमते नमः ।

ॐ वसन्ताय नमः ॥ ७९०॥

ॐ वराहशिशुपालकाय नमः ।

ॐ वज्रहस्ताय नमः ।

ॐ वसुरेतसे नमः ।

ॐ वर्णाश्रमविधायिने नमः ।

ॐ वन्दारुजनवत्सलाय नमः ।

ॐ वदनपञ्चसमन्विताय नमः ।

ॐ वह्निहस्ताय नमः ।

ॐ वह्निवासिने नमः ।

ॐ वामदेवाय नमः ।

ॐ वज्रायुधभेदिने नमः ॥ ८००॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ वरदादिवन्दिताय नमः ।

ॐ वाग्विभेदिने नमः ।

ॐ वसुदाय नमः ।

ॐ वर्णरूपिणे नमः ।

ॐ वायुस्वरूपिणे नमः ।

ॐ वाग्विशुद्धाय नमः ।

ॐ वज्ररूपाय नमः ।

ॐ वरेण्याय नमः ।

ॐ वराहभेदिने नमः ।

ॐ वर्त्मातिक्रान्ताय नमः ॥ ८१०॥

ॐ यकाररूपाय नमः ।

ॐ यज्ञपतये नमः ।

ॐ यज्ञाङ्गाय नमः ।

ॐ यज्वने नमः ।

ॐ यज्ञाय नमः ।

ॐ यज्ञवाहनाय नमः ।

ॐ यात्राय नमः ।

ॐ यशस्विने नमः ।

ॐ याकिन्यम्बार्धरूपिणे नमः ।

ॐ यज्ञस्वरूपाय नमः ॥ ८२०॥

ॐ यज्ञप्रियाय नमः ।

ॐ यज्ञकर्त्रे नमः ।

ॐ यजमानस्वरूपिणे नमः ।

ॐ यद्विशुद्धाय नमः ।

ॐ यस्य ज्ञानिने नमः ।

ॐ यस्य बुद्धाय नमः ।

ॐ यत्पूर्वजाय नमः ।

ॐ यस्यानन्दमूर्तये नमः ।

ॐ यत्सूक्ष्माय नमः ।

ॐ यद्विश्वात्मने नमः ॥ ८३०॥

ॐ यदात्मलाभाय नमः ।

ॐ यल्लोकनाथाय नमः ।

ॐ यद्व्योमकेशाय नमः ।

ॐ यच्छूलहस्ताय नमः ।

ॐ यद्वामदेवाय नमः ।

ॐ यद्वीरभद्राय नमः ।

ॐ यावद्गुरवे नमः ।

ॐ यत्कामनाशाय नमः ।

ॐ यद्वैद्याय नमः ।

ॐ यत्कालरुपाय नमः ॥ ८४०॥

ॐ यत्प्रणवरूपाय नमः ।

ॐ यत्केदाराय नमः ।

ॐ यदन्तकासुरभेदिने नमः ।

ॐ यद्भक्तहृदिस्थिताय नमः ।

ॐ यस्यापगल्भाय नमः ।

ॐ यदघोराय नमः ।

ॐ यजुर्वेदस्वरूपिणे नमः ।

ॐ यच्चतुर्वेदार्चिताय नमः ।

ॐ यत्सुदेहाय नमः ।

ॐ यद्विषाशनाय नमः ॥ ८५०॥

ॐ यदनाथरक्षकाय नमः ।

ॐ यस्य धर्मशत्रवे नमः ।

ॐ यत्पञ्चकवक्त्राय नमः ।

ॐ यस्याजातशत्रवे नमः ।

ॐ यदेकवर्णाय नमः ।

ॐ यावद्वहुवर्णाय नमः ।

ॐ यद्वासवेशाय नमः ।

ॐ यत्सर्वलोकेशाय नमः ।

ॐ यद्विश्वसाक्षिणे नमः ।

ॐ यदेकादशरुद्राय नमः ॥ ८६०॥

ॐ यत्साक्षिवर्जिताय नमः ।

ॐ यत्कैवल्याय नमः ।

ॐ यत्कर्मफलदायकाय नमः ।

ॐ यत्पद्मासनाय नमः ।

ॐ यद्योनये नमः ।

ॐ यदुत्तमाय नमः ।

ॐ यत्कुबेरबन्धवे नमः ।

ॐ यत्सुखदायिने नमः ।

ॐ यद्गिरिधन्वने नमः ।

ॐ यद्विभवे नमः ॥ ८७०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ यत्पारिजाताय नमः ।

ॐ यत्स्थाणवे नमः ।

ॐ यद्विधात्रे नमः ।

ॐ यत्तरुणाय नमः ।

ॐ यत्पञ्चयज्ञाय नमः ।

ॐ यद्विधात्रे नमः ।

ॐ यद्विशिष्टाय नमः ।

ॐ यत्सन्तुष्टाय नमः ।

ॐ यत्प्रहर्त्रे नमः ।

ॐ यत्सुभगाय नमः ॥ ८८०॥

ॐ यदादित्यतपनाय नमः ।

ॐ यत्तत्पुरुषाय नमः ।

ॐ यस्यानघाय नमः ।

ॐ यदनादिनिधनाय नमः ।

ॐ यस्यामराय नमः ।

ॐ यद्भूतधारिणे नमः ।

ॐ यस्य कृताय नमः ।

ॐ यत्परशुधारिणे नमः ।

ॐ यदच्छात्राय नमः ।

ॐ यस्याजिताय नमः ॥ ८९०॥

ॐ यस्य शुद्धाय नमः ।

ॐ यस्याणिमादिगुणज्ञाय नमः ।

ॐ यत्पुण्यशालिने नमः ।

ॐ यद्विरक्ताय नमः ।

ॐ यद्विचित्राय नमः ।

ॐ यत्परमेशाय नमः ।

ॐ यत्शुशीलाय नमः ।

ॐ यत्पद्मपराय नमः ।

ॐ यदहङ्काररूपाय नमः ।

ॐ यत्कामरूपिणे नमः ॥ ९००॥

ॐ यद्वृषश्रवसे नमः ।

ॐ यत्त्विषीमते नमः ।

ॐ यावत्तत्त्वाधीशाय नमः ।

ॐ यत्पद्मगर्भाय नमः ।

ॐ यावत्तत्त्वस्वरूपाय नमः ।

ॐ यत्सलीलाय नमः ।

ॐ यस्य दीर्घाय नमः ।

ॐ यस्य घोरमूर्तये नमः ।

ॐ यद्ब्रह्मरूपिणे नमः ।

ॐ यत्कळङ्काय नमः ॥ ९१०॥

ॐ यन्निष्कळङ्काय नमः ।

ॐ यत्कलाधराय नमः ।

ॐ यत्तत्त्वविदे नमः ।

ॐ यत्पञ्चभूताय नमः ।

ॐ यदनिर्विण्णाय नमः ।

ॐ यत्पापनाशाय नमः ।

ॐ यदनन्तरूपाय नमः ।

ॐ यदगण्याय नमः ।

ॐ यत्सुगण्याय नमः ।

ॐ यत्प्रतापाय नमः ॥ ९२०॥

ॐ यत्पौरुषाय नमः ।

ॐ यद्विश्वचक्षुषे नमः ।

ॐ यदर्कचक्षुषे नमः ।

ॐ यदिन्दुचक्षुषे नमः ।

ॐ यद्वह्निचक्षुषे नमः ।

ॐ यस्यानुत्तमाय नमः ।

ॐ यस्य भक्तप्रियाय नमः ।

ॐ यदद्भुतचरित्राय नमः ।

ॐ यस्य भूतनाथाय नमः ।

ॐ यद्विजकुलोत्तमाय नमः ॥ ९३०॥

ॐ यस्य वह्निभृते नमः ।

ॐ यद्बहुरूपाय नमः ।

ॐ यदनन्तरूपाय नमः ।

ॐ यच्चन्द्रशेखराय नमः ।

ॐ यच्चन्द्रसञ्जीवनाय नमः ।

ॐ यत्प्रसन्नाय नमः ।

ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः ।

ॐ यद्विश्वपालाय नमः ।

ॐ यद्विश्वगर्भाय नमः ।

ॐ यद्देवगर्भाय नमः ॥ ९४०॥

ॐ यद्वीरगर्भाय नमः ।

ॐ यावदर्थसिद्धये नमः ।

ॐ यावत्काम्यार्थसिद्धये नमः ।

ॐ यावन्मोक्षार्थसिद्धये नमः ।

ॐ यावन्मन्त्रसिद्धये नमः ।

ॐ यावद्यन्त्रसिध्दये नमः ।

ॐ यावत्तन्त्रसिद्धये नमः ।

ॐ यत्तेजोमूर्तये नमः ।

ॐ यावदाश्रमस्थापनाय नमः ।

ॐ यद्वर्णविचित्राय नमः ॥ ९५०॥

ॐ यावच्छास्त्रपारङ्गताय नमः ।

ॐ यावत्कालज्ञानिने नमः ।

ॐ यावत्सङ्गीतपारङ्गताय नमः ।

ॐ यावत्पुराणदेहाय नमः ।

ॐ यद्वेदान्तसारामृताय नमः ।

ॐ यद्विचित्रमायिने नमः ।

ॐ यच्छारदापतये नमः ।

ॐ यद्विशिष्टात्मने नमः ।

ॐ यदलङ्करिष्णवे नमः ।

ॐ यस्याष्टमूर्तये नमः ॥ ९६०॥

ॐ यावज्ज्ञानार्थरूपिणे नमः ।

ॐ यदम्बिकापतये नमः ।

ॐ यत्सत्याय नमः ।

ॐ यदसत्यखण्ण्डिताय नमः ।

ॐ यत्प्रियनित्याय नमः ।

ॐ यत्सुतत्त्वाय नमः ।

ॐ यद्वेदान्तपारङ्गताय नमः ।

ॐ यत्कृतागमाय नमः ।

ॐ यच्छ्रुतिमते नमः ।

ॐ यदश्रोत्राय नमः ॥ ९७०॥

ॐ यदेकवादाय नमः ।

ॐ यदेकवादविग्रहाय नमः ॥  ।

ॐ यद्विमलाय नमः ।

ॐ यदमूर्तये नमः ।

ॐ यदन्तर्यामिणे नमः ।

ॐ यत्प्रेरकाय नमः ।

ॐ यत्सर्वहृदिस्थाय नमः ।

ॐ यत्पुराणपुरुषाय नमः ।

ॐ यत्प्रभावकराय नमः ।

ॐ यद्विषयसञ्चाराय नमः ॥ ९८०॥

श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली

ॐ यत्र सर्वाय नमः ।

ॐ यद्यत्सर्वाङ्गाय नमः ।

ॐ यद्यत्तेजसे नमः ।

ॐ यद्विभवे नमः ।

ॐ यत्कर्पूरदेहाय नमः ।

ॐ यत्तत्संसारपारगाय नमः ।

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ॐ यद्विश्वव्यापिने नमः ।

ॐ यद्भहुव्यापिने नमः ।

ॐ यदन्तर्व्यापिने नमः ।

ॐ यन्निष्क्रियाय नमः ॥ ९९०॥

ॐ यदर्ककोटिप्रकाशाय नमः ।

ॐ यदिन्दुकोटिशीतलाय नमः ।

ॐ यावन्मलविमोचकाय नमः ।

ॐ यस्य दिशाम्पतये नमः ।

ॐ यद्विश्वनाभये नमः ।

ॐ यत्प्राणिहृदयाय नमः ।

ॐ यशोमूर्तये नमः ।

ॐ यत्प्रचेतसे नमः ।

ॐ यदर्धनारीश्वराय नमः ।

ॐ यदनर्थवर्जिताय नमः ॥ १०००॥

ॐ यद्विचित्रभुवनाय नमः ।

ॐ यदग्रगण्याय नमः ।

ॐ यद्वदीशफलप्रदाय नमः ।

ॐ यत्पञ्चतनवे नमः ।

ॐ यावन्मातृरूपाय नमः ।

ॐ याचिताय नमः ।

ॐ यत्कर्मेन्द्रियाय नमः ।

ॐ यद्भुवनेन्द्रियाय नमः ॥ १००८॥

ॐ यदिन्द्रियनिग्रहाय नमः ।

ॐ यद्विषयात्मने नमः ।

ॐ यच्चामुण्डजनकाय नमः ।

ॐ यक्षत्वविनाशिने यत्सत्त्व नमः ।

ॐ यत्कात्यायनीपतये नमः ।

ॐ यदाकाशनगरेशाय नमः ।

ॐ यत्कामधेन्वर्चिताय नमः ।

ॐ यत्पुरूरवप्रसन्नाय नमः ॥ १०१७॥

ॐ यच्छ्वेतवराहमुमुक्षिताय नमः ।

श्रीसुन्दरकुचाम्बासमेत तेजिनीनगरनायकाय नमः ।

एवं नामसहस्राणि योऽर्चयेच्छिवमौलिनि ।

सर्वकामफलं भुङ्क्ते अन्त्यं सायुज्यमाप्नुयात् ॥

॥ इति श्री कल्यान्सुन्दर पञ्चाक्षर सहस्रनामवली संपूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्रनामावली की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे शैव दर्शन और ‘कल्याणसुंदर-तत्व’ को समझने के लिए हमें शिव-पार्वती विवाह के रहस्य, कामदेव के प्रसंग और नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

शिव-शक्ति का मिलन (The Ultimate Union)

भगवान शिव वैराग्य के शिखर हैं और माता पार्वती प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति हैं। कल्याणसुंदर स्वरूप यह दर्शाता है कि चरम वैराग्य (Asceticism) और चरम गृहस्थ जीवन (Family life) में कोई विरोध नहीं है। जब साधक इस नामावली का गान करता है, तो उसके भीतर शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) का संतुलन स्थापित होता है। यह स्वरूप बताता है कि सच्चा प्रेम मोह नहीं है, बल्कि वह दो आत्माओं का एकीकरण है।

पञ्चशर का रूपांतरण (Transformation of Desire)

कामदेव के पांच बाण (पञ्चशर) मनुष्य की पांच इंद्रियों को वश में करके उसे वासना की ओर ले जाते हैं। परंतु जब शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया और रति की प्रार्थना पर उसे ‘अनंग’ (बिना शरीर के) जीवनदान दिया, तो शिव ने उन पांच बाणों की ऊर्जा को ‘दिव्य प्रेम’ में बदल दिया। कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनाम का पाठ करने से साधक के भीतर की वासना (Lust) विशुद्ध प्रेम और आकर्षण (Divine Magnetism) में बदल जाती है। यह आपके आभामंडल को इतना पवित्र और आकर्षक बना देता है कि सही जीवनसाथी स्वतः ही आपकी ओर आकर्षित हो जाता है।

‘सहस्रनामावली’ का नाद-विज्ञान (Sound Vibrations)

सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च चक्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। भगवान कल्याणसुंदर के ये हज़ार नाम वास्तव में प्रेम, सौंदर्य और दांपत्य सुख की 1000 ब्रह्मांडीय आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक इन नामों का लयबद्ध उच्चारण करता है, तो उसके शरीर के ‘अनाहत चक्र’ (Heart Chakra) और ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ (Sacral Chakra) की अशुद्धियां दूर होती हैं, जिससे भावनात्मक स्थिरता (Emotional Stability) प्राप्त होती है।

2. श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवान कल्याणसुंदर साक्षात प्रेम, सौंदर्य, दांपत्य सुख और सद्भाव के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस नामावली का सस्वर पाठ या अर्चन करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

विवाह और दांपत्य जीवन के लाभ (Marital Bliss & Early Marriage)

  • विवाह में हो रहे विलंब का नाश: जिन युवक-युवतियों के विवाह में अकारण देरी हो रही है, रिश्ते आकर टूट जाते हैं, या कोई उपयुक्त जीवनसाथी नहीं मिल रहा है, उनके लिए यह नामावली साक्षात कल्पवृक्ष है। इसके प्रभाव से सभी ग्रह दोष (विशेषकर मांगलिक दोष या सप्तम भाव के दोष) शांत होते हैं और शीघ्र विवाह का योग बनता है।

  • दांपत्य कलह से मुक्ति: जो पति-पत्नी हमेशा झगड़ते रहते हैं, जिनके रिश्ते टूटने (Divorce) की कगार पर पहुँच गए हैं, इस पाठ की ऊर्जा उनके दिलों में जमी कड़वाहट की बर्फ को पिघला देती है। यह पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम और समझ (Understanding) विकसित करता है।

  • सुयोग्य और मनचाहा जीवनसाथी: भगवान शिव की इस स्तुति से साधक को एक ऐसा जीवनसाथी प्राप्त होता है जो केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से भी गुणवान, शिव-भक्त और सहयोगी होता है।

मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और लौकिक लाभ (Psychological & Physical Magnetism)

  • दिव्य आकर्षण और सौंदर्य की प्राप्ति: ‘कल्याणसुंदर’ का अर्थ ही है जो परम कल्याणकारी और परम सुंदर हो। इस पाठ से साधक के मुखमंडल पर एक गजब का तेज (Glow) और आकर्षण (Magnetism) आ जाता है। समाज में लोग उसकी ओर स्वतः आकर्षित होते हैं।

  • तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: प्रेम संबंधों में विफलता या अकेलेपन (Loneliness) के कारण होने वाला भारी मानसिक तनाव इस स्तुति के गान से पूरी तरह शांत हो जाता है। साधक के हृदय में असीम शांति और आत्म-प्रेम (Self-love) जाग्रत होता है।

  • पारिवारिक सुख-शांति: जिस घर में यह पाठ होता है, वहाँ केवल पति-पत्नी ही नहीं, बल्कि सास-बहू, माता-पिता और बच्चों के बीच भी प्रेमपूर्ण वातावरण बना रहता है।

3. श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

भगवान कल्याणसुंदर की उपासना अत्यंत सौम्य, सात्विक, निर्मल और आनंद से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध नामावली का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए वैदिक कर्मकांड में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: भगवान शिव के इस स्वरूप की आराधना के लिए सोमवार (Monday) और शुक्रवार (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है। (शुक्रवार प्रेम और सौंदर्य के ग्रह शुक्र का दिन है)।

  • विशेष तिथियां: महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, वसंत पंचमी (Basant Panchami – कामदेव और रति का उत्सव दिन), तीज (हरितालिका तीज), और श्रावण (सावन) मास का प्रत्येक दिन इस सहस्रनामावली का पाठ करने के लिए हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ या ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के समय) होता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East – नवीन आरंभ के लिए) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए सफेद, पीले या गुलाबी (Pink) रंग के आसन का प्रयोग करें। (गुलाबी और पीला रंग प्रेम व शुभता का प्रतीक है)।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में श्वेत, हल्के पीले, गुलाबी या लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है। काले या गहरे नीले वस्त्रों का प्रयोग न करें।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र एक स्वच्छ चौकी पर पीला या गुलाबी कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह (कल्याणसुंदर स्वरूप) का अत्यंत सुंदर चित्र स्थापित करें। (चित्र में शिव जी माता पार्वती का हाथ थामे हों)।
दीपक भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। गुलाब, मोगरा या चंदन की अत्यंत सुगंधित धूप जलाएं।
तिलक और शृंगार भगवान शिव को श्वेत चंदन और माता पार्वती को कुमकुम/सिंदूर का तिलक लगाएं। स्वयं भी मस्तक पर चंदन या कुमकुम धारण करें।
पुष्प उन्हें सुगंधित पुष्प (गुलाब, मोगरा, चमेली) अत्यंत प्रिय हैं। भगवान शिव को बिल्वपत्र (Bel Patra) अवश्य अर्पित करें।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक सुगंधित पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे परम मंगलकारी कल्याणसुंदर शिव-पार्वती, मैं अपने जीवन से विवाह की समस्त बाधाओं के नाश, दांपत्य सुख की प्राप्ति, और आपकी अहैतुकी कृपा के लिए श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली का 21/41 दिन तक (या नित्य) अर्चन/पाठ करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्रनामावली का पाठ और अर्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का मानसिक ध्यान कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्वरूप का मानसिक ध्यान करें।

  • मूल पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ गौरीशंकराय नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम प्रेम भाव और हृदय में आनंद के साथ ‘श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • सहस्रार्चन विधि (शीघ्र विवाह और दांपत्य सुख हेतु अचूक उपाय): यह नामावली अर्चन के लिए है (जैसे- ॐ कल्याणसुंदराय नमः)। अत्यंत शीघ्र चमत्कार के लिए, प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ भगवान के चित्र या शिवलिंग पर एक गुलाब की पंखुड़ी, सफेद फूल, या हल्दी/कुमकुम से रंगे अक्षत अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। पति-पत्नी यदि एक साथ बैठकर यह अर्चन करें, तो कैसा भी कलह हो, वह तुरंत समाप्त हो जाता है।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान को गाय के दूध की खीर, पंचामृत, सफेद मिष्ठान्न, या ऋतुफल का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से शिव-पार्वती की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

भगवान शिव का यह स्वरूप परम मांगलिक, सात्विक और प्रेम का प्रतीक है। इनकी साधना में हृदय की निर्मलता और आचरण की पवित्रता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. स्त्रियों और जीवनसाथी का सर्वोच्च सम्मान: यह इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम है। शिव ने पार्वती को अपने वाम अंग (Ardhanarishvara) में स्थान दिया है। जो व्यक्ति अपनी पत्नी, प्रेमिका या घर की अन्य स्त्रियों का अपमान करता है, उन पर हाथ उठाता है या उन्हें अपशब्द कहता है, उस पर भगवान कल्याणसुंदर कभी प्रसन्न नहीं होते।

  2. पूर्ण सात्विक जीवन (Pure Sattvic Diet): अनुष्ठान के दौरान घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। तामसिक भोजन आध्यात्मिक और प्रेम की ऊर्जा को नष्ट कर देता है और रिश्ते में क्रोध व कलह पैदा करता है।

  3. सच्चा प्रेम और छल-कपट का त्याग: यह स्तुति विशुद्ध प्रेम के लिए है। किसी को धोखा देने, एक साथ कई रिश्ते (Cheating) रखने, या झूठ बोलने वाले व्यक्ति को इस नामावली का कभी कोई शुभ फल नहीं मिलता। अपने रिश्तों में पूर्णतः ईमानदार रहें।

  4. मानसिक ब्रह्मचर्य: विवाह पूर्व यह साधना कर रहे युवाओं को वासना (Lust) से दूर रहकर मानसिक रूप से पवित्र रहना चाहिए। यह पाठ वासना को प्रेम में बदलने की प्रक्रिया है।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई विपरीत प्रभाव न पड़े:

  • तुलसी दल का निषेध: भगवान शिव की पूजा में ‘तुलसी’ (Tulsi leaves) का प्रयोग सर्वथा वर्जित माना गया है। उन्हें केवल बिल्वपत्र और पुष्प ही अर्पित करें।

  • गलत मंशा से प्रयोग (No Vashikaran): यह सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है। इस अत्यंत पवित्र सहस्रनामावली का प्रयोग कभी भी किसी स्त्री या पुरुष का बलपूर्वक ‘वशीकरण’ (Forced Vashikaran) करने या किसी का घर तोड़ने की नीयत से नहीं करना चाहिए। भगवान शिव न्यायकारी हैं; गलत और स्वार्थी मंशा से किया गया पाठ साधक का ही सर्वनाश कर सकता है। इसे केवल धर्मसम्मत विवाह और अपने दांपत्य जीवन को सुधारने के लिए ही प्रयोग करें।

  • शारीरिक पवित्रता (Sutak/Patak): बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक/पातक) में भगवान की मूर्ति, चित्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दौरान इस पाठ से दूर रहना चाहिए।

  • क्रोध न करें: शिव साधना के दौरान (विशेषकर जब आप प्रेम और शांति मांग रहे हों), बात-बात पर क्रोध करना, चिड़चिड़ाना या घर में चीखना-चिल्लाना आपके द्वारा अर्जित की गई सारी सकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देता है।

6. आधुनिक युग में श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘स्वार्थ’, ‘अस्थिरता’ (Instability in Relationships), और ‘टॉक्सिक रिश्तों’ (Toxic Relationships) का युग है। लोग सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स की आभासी दुनिया में सच्चा प्रेम खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल धोखा, डिप्रेशन (Depression) और मानसिक तनाव (Anxiety) मिल रहा है।

आज के समाज में विवाह टूटने (Divorce) की दर बहुत अधिक हो गई है। छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी के बीच अहंकार (Ego) आ जाता है और रिश्ते अदालत तक पहुँच जाते हैं। विवाह योग्य युवाओं को सही जीवनसाथी न मिलने के कारण भारी मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

‘श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली’ आधुनिक इंसान के इन्ही ‘रिश्तों के संकट’, ‘तनाव’ और ‘अहंकार’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Healing) है:

  1. अहंकार का शमन (Destroying Ego in Relationships): शिव-पार्वती का विवाह हमें सिखाता है कि रिश्ते में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। इस नामावली का पाठ पति और पत्नी दोनों के भीतर से ‘मैं’ (Ego) को खत्म कर ‘हम’ की भावना को जाग्रत करता है, जो आधुनिक विवाहों को बचाने की सबसे बड़ी चाबी है।

  2. मानसिक शांति और हीलिंग (Emotional Healing): जो लोग ब्रेकअप या तलाक के भारी दर्द से गुजर रहे हैं, पञ्चशर की ऊर्जा उनके हृदय के घावों को भरती है। यह पाठ मस्तिष्क को असीम शीतलता प्रदान करता है और अतीत के दुख (Past trauma) से बाहर निकालता है।

  3. सही पार्टनर को आकर्षित करना (Law of Divine Attraction): यह स्तोत्र आपके आभामंडल (Aura) को इतना शुद्ध और सकारात्मक बना देता है कि आप अपने जीवन में केवल उन्हीं लोगों को आकर्षित करते हैं जो आपके लिए सही, ईमानदार और शिव-भक्त हों। यह आपको ‘टॉक्सिक’ लोगों से बचाता है।

  4. पारिवारिक सामंजस्य (Work-Life-Relationship Balance): आज के दौर में करियर के तनाव के बीच रिश्तों को समय न दे पाना आम बात है। यह पाठ आपको वह मानसिक स्पष्टता और ऊर्जा देता है जिससे आप अपने घर और कार्यक्षेत्र दोनों में संतुलन (Balance) बनाए रख सकते हैं।

निष्कर्ष

Shri Kalyansundar Panchashaar Sahasranamavali (श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक सुंदर काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस परम शिव और जगदम्बा के शाश्वत प्रेम, उनके मंगलमय विवाह और संसार को काम-मुक्त (Lust-free) कर प्रेम-युक्त (Love-filled) बनाने की दिव्य चेतना का साक्षात आवाहन है। जब एक साधक पूर्ण शरणागति, सात्विकता और पवित्र हृदय से इस स्तुति का गान करता है, तो भगवान शिव उसके जीवन के सारे अकेलेपन, कलह और निराशा को भस्म कर देते हैं।

भगवान कल्याणसुंदर अत्यंत कृपालु और अपने भक्तों को उत्तम दांपत्य सुख व आनंद प्रदान करने वाले साक्षात प्रेम-स्वरूप हैं। जब भी आपको लगे कि विवाह में बहुत बाधाएं आ रही हैं, आपका दांपत्य जीवन बिखर रहा है, घर में हमेशा झगड़े होते हैं, और मन अत्यंत अशांत है, तो शुक्रवार या सोमवार की सुबह गुलाबी/पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक प्रज्वलित करें, शिव-पार्वती को गुलाब के पुष्प अर्पित करें, और पूर्ण हृदय से इस महास्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘कल्याणसुंदर’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि शिव के इन पावन नामों के नाद ने आपके जीवन की सारी कड़वाहट और बाधाओं को भस्म कर दिया है, और साक्षात भगवान शिव व माता पार्वती ने आपके जीवन को असीम प्रेम, अखंड दांपत्य सुख, सुयोग्य जीवनसाथी और परम शांति के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। ॐ गौरीशंकराय नमः!

श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावलीः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री कल्याणसुंदर पञ्चशर सहस्रनामावली भगवान शिव और माता पार्वती के वैवाहिक स्वरूप (कल्याणसुंदर) को समर्पित 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों की एक सिद्ध श्रृंखला है। इसमें कामदेव के ‘पञ्चशर’ (पांच बाणों) की ऊर्जा को शिव के दिव्य प्रेम में रूपांतरित किया गया है। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह नामावली विवाह में आ रही सभी बाधाओं को दूर करने, दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने और सच्चा प्रेम प्राप्त करने का सबसे बड़ा वैदिक और आध्यात्मिक उपाय है।

2. इस सहस्रनामावली का अर्चन करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ प्राप्त होता है?

इस स्तोत्र का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘शीघ्र और सुयोग्य विवाह का संपन्न होना’ तथा ‘पति-पत्नी के बीच चल रहे गंभीर कलह या तलाक (Divorce) की स्थिति का टलना’ है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के आभामंडल में एक गजब का आकर्षण पैदा होता है, मंगली दोष या सप्तम भाव के दोष शांत होते हैं, और घर में परम प्रेम व शांति का वातावरण स्थापित होता है।

3. इस नामावली का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?

भगवान कल्याणसुंदर की आराधना के लिए ‘शुक्रवार’ (Friday – प्रेम और शुक्र का दिन) तथा ‘सोमवार’ (Monday – शिव का दिन) सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं। महाशिवरात्रि, वसंत पंचमी, और प्रदोष के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल या ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के समय) में गुलाबी, सफेद या पीले वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना सर्वाधिक उत्तम है।

4. ‘सहस्रार्चन’ विधि से इस नामावली का प्रयोग दांपत्य सुख के लिए कैसे करें?

सहस्रार्चन विधि में भगवान शिव के 1000 नामों (नामावली) का पाठ किया जाता है (जैसे- ॐ कल्याणसुंदराय नमः)। अत्यंत शीघ्र लाभ के लिए, पति-पत्नी एक साथ (या अविवाहित युवा अकेले) बैठकर प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ भगवान शिव-पार्वती के चित्र पर एक गुलाब की पंखुड़ी या सफेद पुष्प अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। यह प्रेम संबंधों की कड़वाहट को मिटाने और विवाह के मार्ग खोलने का अचूक उपाय है।

5. भगवान शिव की इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम क्या है?

इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘स्त्रियों (पत्नी/प्रेमिका) का पूर्ण सम्मान’ और ‘छल-कपट का त्याग’ है। जो व्यक्ति रिश्तों में धोखा देता है या अपनी पत्नी का अपमान करता है, उसकी यह पूजा कभी फलित नहीं होती। इसके अतिरिक्त, इस अत्यंत पवित्र नामावली का प्रयोग किसी का बलपूर्वक ‘वशीकरण’ (Forced Vashikaran) करने की दुर्भावना से कभी नहीं करना चाहिए। पूर्ण सात्विकता (मांस-मदिरा का त्याग) और शिव पूजा में तुलसी का निषेध इस साधना के मूलभूत नियम हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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