Shri Padmavati Sahasranama Stotra (श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 26 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, वैष्णव परंपरा और दक्षिण भारत के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब भी अखंड ऐश्वर्य, स्थिर धन, सांसारिक सुख, और भगवान नारायण की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने की बात आती है, तो तिरुचानूर (अलमेलुमंगापुरम) में विराजमान माता श्री पद्मावती (Goddess Padmavati) का स्मरण सर्वोपरि है। दक्षिण भारत में इन्हें अत्यंत प्रेम और श्रद्धा के साथ ‘अलमेलु मंगम्मा’ (Alamelu Mangamma) कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘कमल पर विराजमान देवी’।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महर्षि भृगु के प्रहार से रुष्ट होकर माता महालक्ष्मी ने वैकुंठ त्याग दिया था, तब भगवान श्री हरि विष्णु ने ‘श्रीनिवास’ के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। माता महालक्ष्मी ने स्वर्ण कमल (Golden Lotus) से सुशोभित ‘पद्म सरोवर’ में एक दिव्य कन्या के रूप में अवतार लिया, जिन्हें ‘पद्मावती’ कहा गया। आकाश राज की पुत्री माता पद्मावती का विवाह भगवान श्रीनिवास (तिरुपति बालाजी) के साथ संपन्न हुआ, जो आज भी ब्रह्मांड का सबसे भव्य वैवाहिक प्रसंग माना जाता है।

शास्त्रों का अटल नियम है कि भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने जाते, जब तक भक्त तिरुचानूर जाकर माता पद्मावती के दर्शन न कर ले। कलियुग में भगवान बालाजी अत्यंत उग्र और न्यायकारी हैं, परंतु जब भक्त माता पद्मावती की शरण में जाकर प्रार्थना करता है, तो माता अपने वात्सल्य के कारण भगवान से अपने भक्त की सिफारिश करती हैं, जिससे असंभव कार्य भी तत्काल संभव हो जाते हैं।

जब मनुष्य का जीवन भयंकर आर्थिक संकटों, ऋणों (कर्जों) के भारी बोझ, विवाह में हो रहे विलंब, दांपत्य जीवन के कलह और दुर्भाग्य से घिर जाता है, तब माता पद्मावती की शरण में जाना साक्षात जीवन में स्वर्णिम प्रकाश को आमंत्रित करने के समान है। माता की इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा, उनके अनंत ऐश्वर्य, और उनकी वात्सल्यमयी करुणा को अपने भीतर और अपने घर में स्थिर (Permanent) करने के लिए सिद्ध ऋषियों और वैष्णव आगम ग्रंथों में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र, जाग्रत और कल्याणकारी नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र’ (Shri Padmavati Sahasranama Stotra) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्रनाम’ का अर्थ है— एक हज़ार नाम। यह कोई साधारण स्तुति या केवल नामों की एक सूची नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा आध्यात्मिक कल्पवृक्ष है, जो जीवन की भयंकर से भयंकर दरिद्रता (अलक्ष्मी), दुर्भाग्य, और रुके हुए धन के मार्गों को पल भर में खोल देता है।

 श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्रम् हिंदी | Shri Padmavati Sahasranama Stotra

॥ अथ पद्मावतीशतम् ॥

प्रणम्य परया भक्त्या देव्याः पादाम्बुजां त्रिधा ।
नामान्यष्टसहस्राणि वक्तुं तद्भक्तिहेतवे ॥ १ ॥

श्रीपार्श्वनाथचरणाम्बुजचञ्चरीका
भव्यान्धनेत्रविमलीकरणे शलाका ।
नार्गेद्रप्राणधरणीधरधारणाभृत्
मां पातु सा भगवती नितरामघेभ्यः ॥ २ ॥

पद्मावती पद्मवर्णा पद्महस्तापि पद्मनी ।
पद्मासना पद्मकर्णा पद्मास्या पद्मलोचना ॥ ३ ॥

पद्मा पद्मदलाक्षी च पद्मी पद्मवनस्थिता ।
पद्मालया पद्मगन्धा पद्मरागोपरागिका ॥ ४ ॥

पद्मप्रिया पद्मनाभिः पद्माङ्गा पद्मशायिनी ।
पद्मवर्णवती पूता पवित्रा पापनाशिनी ॥ ५ ॥

प्रभावती प्रसिद्धा च पार्वती पुरवासिनी ।
प्रज्ञा प्रह्लादिनी प्रीतिः पीताभा परमेश्वरी ॥ ६ ॥

पातालवासिनी पूर्णा पद्मयोनिः प्रियंवदा ।
प्रदीप्ता पाशहस्ता च परा पारा परंपरा ॥ ७ ॥

पिङ्गला परमा पूरा पिङ्गा प्राची प्रतीचिका ।
परकार्यकरा पृथ्वी पार्थिवी पृथिवी पवी ॥ ८ ॥

पल्लवा पानदा पात्रा पवित्राङ्गी च पूतना ।
प्रभा पताकिनी पीता पन्नगाधिपशेखरा ॥ ९ ॥

पताका पद्मकटिनी पतिमान्यपराक्रमा ।
पदाम्बुजधरा पुष्टिः परमागमबोधिनी ॥ १० ॥

परमात्मा परानन्दा परमा पात्रपोषिणी ।
पञ्चबाणगतिः पौत्रि पाषण्डघ्नी पितामही ॥ ११ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

प्रहेलिकापि प्रत्यञ्चा पृथुपापौघनाशिनी ।
पूर्णचन्द्रमुखी पुण्या पुलोमा पूर्णिमा तथा ॥ १२ ॥

पावनी परमानन्दा पण्डिता पण्डितेडिता ।
प्रांशुलभ्या प्रमेया च प्रभा प्राकारवर्तिनी ॥ १३ ॥

प्रधाना प्रार्थिता प्रार्थ्या पददा पङ्क्तिवर्जिनी ।
पातालास्येश्वरप्राणप्रेयसी प्रणमामि ताम् ॥ १४ ॥

इति पद्मावतीशतम् ॥ १ ॥

॥ अथ महाज्योतिशतम् ॥

महाज्योतिर्मती माता महामाया महासती ।
महादीप्तिमती मित्रा महाचण्डी च मङ्गला ॥ १ ॥

महीषी मानुषी मेघा महालक्ष्मीर्मनोहरा ।
महाप्रहारनिम्नाङ्गा मानिनी मानशालिनी ॥ २ ॥

मार्गदात्री मुहूर्ता च माध्वी मधुमती मही ।
माहेश्वरी महेज्या च मुक्ताहारविभूषणा ॥ ३ ॥

महामुद्रा मनोज्ञा च महाश्वेतातिमोहिनी ।
मधुप्रिया मतिर्माय मोहिनी च मनस्विनी ॥ ४ ॥

माहिष्मती महावेगा मानदा मानहारिणी ।
महाप्रभा च मदना मन्त्रवश्या मुनिप्रिया ॥ ५ ॥

मन्त्ररूपा च मन्त्राज्ञा मन्त्रदा मन्त्रसागरा ।
मधुप्रिया महाकाया महाशीला महाभुजा ॥ ६ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

महासना महारम्या मनोभेदा महासमा ।
महाकान्तिधरा मुक्तिर्महाव्रतसहायिनी ॥ ७ ॥

मधुश्रवा मूर्छना च मृगाक्षी च मृगावती ।
मृणालिनी मनःपुष्टिर्महाशक्तिर्महार्थदा ॥ ८ ॥

मूलाधारा मृडानी च मत्तमातङ्गगामिनी ।
मन्दाकिनी महाविद्या मर्यादा मेघमालिनी ॥ ९ ॥

मातामही मन्दगतिः महाकेशी महीधरा ।
महोत्साहा महादेवी महिला मानवर्द्धिनी ॥ १० ॥

महाग्रहहरा मारी मोक्षमार्गप्रकाशिनी ।
मान्या मानवती मानि मणिनूपुरशेखरा ॥ ११ ॥
मणिकाञ्चीधरा माना महामतिप्रकाशिनी ।
ईडेश्वरी दिज्येच्छेखे खेन्द्राणी कालरूपिणी ॥ १२ ॥

इति महाज्योतिर्मतिशतम् ॥ २ ॥

॥ अथ जिनमाताशतम् ॥

जिनमाता जिनेन्द्रा च जयन्ती जगदीश्वरी ।
जया जयवती जाया जननी जनपालिनी ॥ १ ॥

जगन्माता जगन्माया जगज्जैत्री जगज्जिता ।
जागरा जर्जरा जैत्री यमुनाजलभासिनी ॥ २ ॥

योगिनी योगमूला च जगद्धात्री जलन्धरा ।
योगपट्टधरा ज्वाला ज्योतिरूपा च जालिनी ॥ ३ ॥

ज्वालामुखी ज्वालमाला ज्वालनी च जगद्धिता ।
जैनेश्वरी जिनाधारा जीवनी यशपालिनी ॥ ४ ॥

यशोदा ज्यायसी जीर्णा जर्जरा ज्वरनाशिनी ।
ज्वररूपा जरा जीर्णा जाङ्गुलाऽऽमयतर्जिनी ॥ ५ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

युगभारा जगन्मित्रा यन्त्रिणी जन्मभूषिणी ।
योगेश्वरी च योर्गङ्गा योगयुक्ता युगादिजा ॥ ६ ॥

यथार्थवादिनी जाम्बूनदकान्तिधरा जया ।
नारायणी नर्मदा च निमेषा नर्त्तिनी नरी ॥ ७ ॥

नीलानन्ता निराकारा निराधारा निराश्रया ।
नृपवश्या निरामान्या निःसङ्गा नृपनन्दिनी ॥ ८ ॥

नृपधर्ममयी नीतिः तोतला नरपालिनी ।
नन्दा नन्दिवती निष्टा नीरदा नागवल्लभा ॥ ९ ॥

नृत्यप्रिया नन्दिनी च नित्या नेका निरामिषा। ।
नागपाशधरा नोका निःकलङ्का निरागसा ॥ १० ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

नागवल्ली नागकन्या नागिनी नागकुण्डली ।
निद्रा च नागदमनी नेत्रा नाराचवर्षिणी ॥ ११ ॥

निर्विकारा च निर्वैरा नागनाथेशवल्लभा ।
निर्लोभा च नमस्तुभ्यं नित्यानन्दविधायिनी ॥ १२ ॥

इति जिनमाताशतम् ॥ ३ ॥

॥ अथ वज्रहस्ताशतम् ॥

वज्रहस्ता च वरदा वज्रशैला वरूथिनी ।
वज्रा वज्रायुधा वाणी विजया विश्वव्यापिनी ॥ १ ॥

वसुदा बलदा वीरा विषया विषवर्द्धिनी ।
वसुन्धरा वरा विश्वा वर्णिनी वायुगामिनी ॥ २ ॥

बहुवर्णा बीजवती विद्या बुद्धिमती विभा ।
वेद्या वामवती वामा विनिद्रा वंशभूषणा ॥ ३ ॥

वरारोहा विशोका च वेदरूपा विभूषणा ।
विशाला वारुणीकल्पा बालिका बालकप्रिया ॥ ४ ॥

वर्तिनी विषहा बाला विवक्ता वनजासिनी ।
वन्द्या विधिसुता बाला विश्वयोनिर्बुधप्रिया ॥ ५ ॥

बलदा वीरमाता च वसुधा वीरनन्दिनी ।
वरायुधधरा वेषी वारिदा बलशालिनी ॥ ६ ॥

बुधमाता वैद्यमाता बन्धुरा बन्धुरूपिणी ।
विद्यावती विशालाक्षी वेदमाता विभास्वरी ॥ ७ ॥

वात्याली विषमा वेषा वेदवेदाङ्गधारिणी ।
वेदमार्गरता व्यक्ता विलोमा वेदशालिनी ॥ ८ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

विश्वमाता विकम्पा च वंशज्ञा विश्वदीपिका ।
वसन्तरूपिणी वर्षा विमला विविधायुधा ॥ ९ ॥

विज्ञाननी पवित्रा च विपञ्ची बन्धमोक्षिणी ।
विषरूपवती वर्द्धा विनीता विशिखा विभा ॥ १० ॥

व्यालिनी व्याललीला च व्याप्ता व्याधिविनाशिनी ।
विमोहा बाणसन्दोहा वर्द्धिनी वर्द्धमानका ॥ ११ ॥

ईशानी तोतरा भिद्रा वरदायी नमोऽस्तु ते ।
व्यालेश्वरी प्रियप्राणा प्रेयसी वसुदायिनी ॥ १२ ॥

इति वज्रहस्ताशतम् ॥ ४ ॥

॥ अथ कामदाशतम् ॥

कामदा कमला काम्या कामाङ्गा कामसाधिनी ।
कलावती कलापूर्णा कलाधारी कनीयसी ॥ १ ॥

कामिनी कमनीयाङ्गा क्वणत्काञ्चनसन्निभा ।
कात्यायिनी कान्तिदा च कमला कामरूपिणी ॥ २ ॥

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कामिनी कमलामोदा कम्रा कान्तिकरी प्रिया ।
कायस्था कालिका काली कुमारी कालरूपिणी ॥ ३ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

कालाकारा कामधेनुः काशी कमललोचना ।
कुन्तला कनकाभा च काश्मीरा कुङ्कुमप्रिया ॥ ४ ॥

कृपावती कुण्डलनी कुण्डलाकारशायिनी ।
कर्कशा कोमला काली कौलिकी कुलवालिका ॥ ५ ॥

कालचक्रधरा कल्पा कालिका काव्यकारिका ।
कविप्रिया च कौशाम्बी कारिणी कोशवर्द्धिनी ॥ ६ ॥

कुशावती किरालाभा कोशस्था कान्तिबद्धनी ।
कादम्बरी कठोरस्था कौशाम्बा कोशवासिनी ॥ ७ ॥म्
कालघ्नी कालहननी कुमारजनती कृतिः ।
कैवल्यदायिनी केका कर्महा कलवर्जिनी ॥ ८ ॥

कलङ्करहिता कन्या कारुण्यालयवासिनी ।
कर्पूरामोदनिःश्वासा कामवीजवती करा ॥ ९ ॥

कुलीना कुन्दपुष्पाभा कुर्कुटोरगवाहिनी ।
कलिप्रिया कामबाणा कमठोपरिशायिनी ॥ १० ॥

कठोरा कठिना क्रूरा कन्दला कदलीप्रिया ।
क्रोधनी क्रोधरूपा च चक्रहूंकारवर्तिनी ॥ ११ ॥

काम्बोजिनी काण्डरूपा कोदण्डकरधारिणी ।
कुहू क्रीडवती क्रीडा कुमारानन्ददायिनी ॥ १२ ॥

कमलासना केतकी च केतुरूपा कुतूहला ।
कोपिनी कोपरूपा च कुसुमावासवासिनी ॥ १३ ॥

इति कामदाशतम् ॥ ५ ॥

॥ अथ सरस्वतीशतम् ॥

सरस्वती शरण्या च सहस्राक्षी सरोजगा ।
शिवा सती सुधारूपा शिवमाया सुता शुभा ॥ १ ॥

सुमेधा सुमुखी शान्ता सावित्री सायगामिनी ।
सुरोत्तमा सुवर्णा च श्रीरूपा शास्त्रशालिनी ॥ २ ॥

शान्ता सुलोचना साध्वी सिद्धा साध्या सुधात्मिका ।
सारदा सरला सारा सुवेषा जशवर्द्विनी ॥ ३ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

शङ्करी शमिता शुद्धा शक्रमान्या शिवङ्करी ।
शुद्धाहाररता श्यामा शीमा शीलवती शरा ॥ ४ ॥

शीतला सुभगा सर्वा सुकेशी शैलवासीनी ।
शालिनी साक्षिणी सीता सुभिक्षा शियप्रेयसी ॥ ५ ॥

सुवर्णा शोणवर्णा च सुन्दरी सुरसुन्दरी ।
शक्तिस्तुषा सारिका च सेव्या श्रीः सुजनार्चिता ॥ ६ ॥

शिवदूती श्वेतवर्णा शुभ्राभा शुभनाशिकी ।
सिंहिका सकला शोभा स्वामिनी शिवपोषिणी ॥ ७ ॥

श्रेयस्करी श्रेयसी च शौरिः सौदामिनी शुचिः ।
सौभागिनी शोषिणी च सुगन्धा सुमनःप्रिया ॥ ८ ॥

सौरमेयी सुसुरभी श्वेतातपत्रधारिणी ।
श‍ृङ्गारिणी सत्यवक्ता सिद्धार्था शीलभूषणा ॥ ९ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

सत्यार्थिनी च सध्याभा शची संक्रान्तिसिद्धिदा ।
संहारकारिणी सिंही सप्तर्चिः सफलार्थदा ॥ १० ॥

सत्या सिन्दूरवर्णाभा सिन्दूरतिलकप्रिया ।
सारङ्गा सुतरा तुभ्यं ते नमोऽस्तु सुयोगिनी ॥ ११ ॥

इति सरस्वतीशतम् ॥ ६ ॥

॥ अथ भुवनेश्वरीशतम् ॥

भुवनेश्वरी भूषणा च भुवना भूमिपप्रिया ।
भूमिगर्भा भूपवद्या भुजङ्गेशप्रिया भगा ॥ १ ॥

भुजङ्गभूषणाभोगाः भुजङ्गाकारशायिनी ।
भवभितिहरा भीमा भूमिर्भीमाट्टहासिनी ॥ २ ॥

भारती भवती भोगा भगनी भोगमन्दिरा ।
भद्रिका भद्ररूपा च भूतात्मा भूतभञ्जिनी ॥ ३ ॥

भवानी भैरवी भीमा भामिनी भ्रमनाशिनी ।
भुजङ्गिनी भ्रुसुण्डी च मेदिनी भूमिभूषणा ॥ ४ ॥

भिन्ना भाग्यवती भासा भोगिनी भोगवल्लभा ।
भुक्तिदा भक्तिग्राहा च भवसागरतारिणी ॥ ५ ॥

भास्वती भास्वरा भूर्तिर्भूतिदा भूतिवर्द्धिनी ।
भाग्यदा भोग्यदा भोग्या भाविनी भवनाशिनी ॥ ६ ॥

भीक्ष्णा भट्टारका भीरूर्भ्रामरी भ्रमरी भवा ।
भट्टिनी भाण्डदा भाण्डा भल्लाकी भूरिभञ्जिनी ॥ ७ ॥

भूमिगा भूमिदा भाषा भक्षिणी भृगुभञ्जिनी ।
भाराक्रान्ताभिनन्दा च भजिनी भूमिपालिनी ॥ ८ ॥

भद्रा भगवती भर्गा वत्सला भगशालिनी ।
खेचरी खड्गहस्ता च खण्डिनी खलमर्द्दिनी ॥ ९ ॥

खट्वाङ्गधारिणी खड्वा खडङ्गा खगवाहिनी ।
षट्चक्रभेदविख्याता खगपूज्या स्वगेश्वरी ॥ १० ॥

लाङ्गली ललना लेखा लेखिनी ललना लता ।
लक्ष्मीर्लक्ष्मवति लक्ष्म्या लाभदा लोभवर्जिता ॥ ११ ॥

इति भुवनेश्वरीशतम् ॥ ७ ॥

॥ अथ लीलावतीशतम् ॥

लीलावती ललामाभा लोहमुद्रा लिपिप्रिया ।
लोकेश्वरी च लोकाङ्गा लब्धिर्लोकान्तपालिनी ॥ १ ॥

लीला लीलाङ्गदा लोला लावण्या ललितार्थिनी ।
लोभदा लावनिर्लङ्का लक्षणा लक्ष्यवर्जिता ॥ २ ॥

उर्मोवसी उदीची च उद्योतोद्योतकारिणी ।
उद्धारण्या धरोदक्यो दिव्योदकनिवासिनी ॥ ३ ॥

उदाहारोत्तमातंसा औषध्युदधितारणी ।
उत्तरोत्तरवादिभ्यो धराधरनिवासिनी ॥ ४ ॥

उत्कीलन्त्युत्कीलिनी च उत्कीर्णोकाररूपिणि ।
ॐकाराकाररूपा च अम्बिकाऽम्बरचारिणी ॥ ५ ॥

अमोघा सा पुरी चान्ताऽणिमादिगुणसंयुता ।
अनादिनिधनाऽनन्ता चातुलाटाऽट्टहासिनी ॥ ६ ॥

अपणार्द्धबिन्दुधरा लोकालल्यालिवाङ्गना ।
आनन्दानन्ददा लोका राष्ट्रसिद्धिप्रदानका ॥ ७ ॥

अव्यक्तास्त्रमयी मूर्तिरजीर्णा जीणहारिणी ।
अहिकृत्य रजाजारा हुंकाररातिरन्तिदा ॥ ८ ॥

अनुरूपाथ मूत्तिघ्नी क्रीडा कैरवपालिनी ।
अनोकहाशुगा भेद्या छेद्या चाकाशगामिनी ॥ ९ ॥

अनन्तरा साधिकारा त्वाङ्गा अनन्तरनाशिनी ।
अलका यवना लङ्घ्या सीता शिखरधारिणी ॥ १० ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

अहिनाथप्रियप्राणा नमस्तुभ्यं महेश्वरी ।
आकर्षण्याधरा रागा मन्दा मोदावधारिणी ॥ ११ ॥

इति लीलावतीशतम् ॥ ८ ॥

॥ अथ त्रिनेत्राशतम् ॥

त्रिनेत्रा त्र्यम्बिका तन्त्री त्रिपुरा त्रिपुरभैरवी ।
त्रिपुष्टा त्रिफणा तारा तोतला त्वरिता तुला ॥ १ ॥

तपप्रिया तापसी च तपोनिष्ठा तपस्विनी ।
त्रैलोक्यदीपका त्रेधा त्रिसन्ध्या त्रिपदाश्रया ॥ २ ॥

त्रिरूपा त्रिपदा त्राणा तारा त्रिपुरसुन्दरी ।
त्रिलोचना त्रिपथगा तारा मानविमर्दिनी ॥ ३ ॥

धर्मप्रिया धर्मदा च धर्मिणी धर्मपालिनी ।
धाराधरधराधारा धात्री धर्माङ्गपालिनी ॥ ४ ॥

धौता धृतिधुरा धीरा धुनुनी च धनुर्द्धरा ।
ब्रह्माणी ब्रह्मगोत्रा च ब्राह्मणी ब्रह्मपालिनी ॥ ५ ॥

गङ्गा गोदावरी गौगा गायत्री गणपालिनी ।
गोचरी गोमती गुर्वाऽगाधा गान्धारिणी गुहा ॥ ६ ॥

ब्राह्मी विद्युत्प्रभा वीरा वीणावासवपूजिता ।
गीताप्रिया गर्भधारा गा गायिनी गजगामिनी ॥ ७ ॥

गरीयसी गुणोपेता गरिष्ठा गरमर्दिनी ।
गम्भीरा गुरुरूपा च गीता गर्वापहारिणी ॥ ८ ॥

ग्रहिणी ग्राहिणी गौरी गन्धारी गन्धवासना ।
गारुडी गासिनी गूढा गौहनी गुणहायिनी ॥ ९ ॥

चक्रमध्या चक्रधरा चित्रणी चित्ररूपिणी ।
चर्चरी चतुरा चित्रा चित्रमाया चतुर्भुजा ॥ १० ॥

चन्द्राभा चन्द्रवर्णा च चक्रिणी चक्रधारिणी ।
चक्रायुधा करधरा चण्डी चण्डपराक्रमा ॥ ११ ॥

इति त्रिनेत्राशतम् ॥ ९ ॥

॥ अथ चक्रेश्वरीशतम् ॥

चक्रेश्वरी चमूश्चिन्ता चापिनी चञ्चलात्मिका ।
चन्द्रलेखा चन्द्रभागा चन्द्रिका चन्द्रमण्डला ॥ १ ॥

चन्द्रकान्तिश्चन्द्रमश्रीश्चन्द्रमण्डलवर्तिनी ।
चतु समुद्रपारान्ता चतुराश्रमवासिनी ॥ २ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

चतुर्मुखी चन्द्रमुखी चतुर्वर्णफलप्रदा ।
चित्स्वरूपा चिदानन्दा चिराश्चिन्तामणिः पिता ॥ ३ ॥

चन्द्रहासा च चामुण्डा चिन्तना चौरवर्जिनी ।
चैत्यप्रिया चत्यलीला चिन्तनार्थफलप्रदा ॥ ४ ॥

ह्रींरूपा हंसगमनी हाकिनी हिङ्गुलाहीता ।
हालाहलधरा हारा हंसवर्णा च हर्षदा ॥ ५ ॥

हिमानी हरिता हीरा हर्षिणी हरिमर्दिनी ।
गोपिनी गौरगीता च दुर्गा दुर्ललिता धरा ॥ ६ ॥

दामिनी दीर्धिका दुग्धा दुर्गमा दुर्लभोदया ।
द्वारिका दक्षिणा दीक्षा दक्षा दक्षातिपूजिता ॥ ७ ॥

दमयन्ती दानवती द्युतिदीप्ता दिवागतिः ।
दरिद्रहा वैरिदूरा दारा दुर्गातिनाशिनी ॥ ८ ॥

दर्पहा दैत्यदासा च दर्शिनी दर्शनप्रिया ।
वृषप्रिया च वृषभा वृषारूढा प्रबोधिनी ॥ ९ ॥

सूक्ष्मा सूक्ष्मगतिः श्लक्ष्णा धनमाला धनद्यूति ।
छाया छात्रच्छविच्छिरक्षीरादा क्षेत्ररक्षिणी ॥ १० ॥

अमरी रतिरात्रीश्च रङ्गिनी रतिदा रुषा ।
स्थूला स्थूलतरा स्थूला स्थण्डिलाशयवासिनी ॥ ११ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

स्थिरा स्थानवती देवी घनघोरनिनादिनी ।
क्षेमङ्करी क्षेमवती क्षेमदा क्षेमवर्द्धिनी ॥ १२ ॥

शेलूषरूपिणो शिष्टा संसारार्णवतारिणी ।
सदा सहायिनी तुभ्यं नमस्तुभ्यं महेश्वरी ॥ १३ ॥

इती चक्रेश्वरीशतम् ॥ १० ॥

 फलश्रुतिः-

नित्यं पुमान् पठति यो नितरां त्रिशुद्ध्या शौचं विधाय विमलं फणिशेखरायाः ।
स्तोत्रं द्युनाथ उदिते सुसहस्रनाम चाष्टोत्तरं भवति सो भवनाधिराजः ॥ १ ॥

तत्कालजातवरगोमयलिप्तभूमौ कुर्याद् दृढासनमतीन्द्रियपद्मकाख्यम् ।
धूपं विधाय वरगुग्गुलुमाज्ययुक्तं रक्ताम्बरं वपुषि भूप्य मनः प्रशस्तः ॥ २ ॥

न तस्य रात्रौ भयमस्ति किञ्चिन्न शोकरोगोद्भवदुःखजालम् ।
न राजपीडा न च दुर्जनस्य पद्मावतीस्तोत्र निशम्यतां वे ॥ ३ ॥

न बन्धनं तस्य न वह्निजातं भयं न चारेर्नृपतोऽपि किञ्चित् ।
न मत्तनागस्य न केशरीभयं यो नित्यपाठी स्तवनस्व पद्मे! ॥ ४ ॥

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र

न सङ्गरे शस्त्रचयाभिघातः न व्याघ्रभीतिर्भुवि भीतिभीतिः ।
पिशाचिनीनां न च डाकिनीनां स्तोत्रं रमायाः पठतीति यो वं ॥ ५ ॥

न राक्षसानां न च शाकिनीनां न चापदा नैव दरिद्रता च ।
न चास्य मृत्योर्भयमस्ति किञ्चित् पद्मावतीस्तोत्र निशम्यतां वै ॥ ६ ॥

स्नानं विधाय विधिवद् भुवि पार्श्वभर्तुः पूजां करोति शुचिद्रव्यचयैर्विधिज्ञः ।
पद्मावती फलति तस्य मनोऽभिलाषं नानाविधं भवभवं सुखसारभूतम् ॥ ७ ॥

सुपूर्वाह्णमध्याह्नसन्ध्यासु पाठं तथैवावकाशं भवेदेकचित्तः ।
भवेत्तस्य लाभार्थं आदित्यवारे करोतीह भक्तिं सदा पार्श्वभर्तुः ॥ ८ ॥

शुभापत्यलक्ष्मीर्नु वाजीन्द्रयूथा गृहे तस्य नित्यं सदा सञ्चरन्ति
नवीनाङ्गनानां गणास्तस्य नित्यं शिवायाः सुनामावलिर्यस्य चित्ते ॥ ९ ॥

ममाल्पबुद्ध्या स्तवनं विधाय करोमि भक्तिं फणिशेस्वरायाः ।
यदर्थमन्त्राक्षरव्यञ्जनच्युतं विशोधनीयं कृपया हि सद्भिः ॥ १० ॥

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भो देवि! भो मात! ममापराधं संक्षम्यति तत्स्तवनाभिधाने ।
माता यथापत्यकृतापराधं संक्षम्यति प्रीत्यपलायनैक्यम् ॥ ११ ॥

॥ इति श्रीभैरवपद्मावतीकल्पे श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

 जपं

(१) ॐ ह्रीं श्रीं क्ळीं ब्लैं कलिकुण्डस्वामिन्! सिद्धिथ्भियं
जगद् वश्यमानय आनय स्वाहा ॥ १०८ ॥

(२) ॐ ह्रीं ऐं श्रीं श्रीगौतमगणराजाय स्वाहा ॥ लक्ष १ ॥

(३) क्व नमो चालिदेवि! पद्मावति! आकृष्टिकरणि! कामचारि,
मोहचारि, अबोलु वोलावि, अदयनुं दिवारि,
आणि पासि घालि दासु ॐ फट् स्वाहा ।
जाप २४ सहस्रं । प्रत्यहं १०८ जपनीयम् । वश्यम् ॥

(४) ओं आं ऐं क्रों ह्रीं हसरूपे! सर्ववश्ये!
श्रीं सोहं पद्मावत्यै ह्रीं नमः प० । जापोऽयं दीपोत्सवे ।
घृरतदीपोऽखण्डः रक्षणीयः ।

॥ शुभं भवतु ॥

॥ इति श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र संपूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्रनाम की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वैष्णव दर्शन और ‘पद्मावती-तत्व’ को समझने के लिए हमें ‘पद्म’ (कमल) के रहस्य, माता के अवतरण और सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

‘पद्म’ (कमल) का तात्विक और मनोवैज्ञानिक रहस्य

माता का नाम ‘पद्मावती’ है, जिसका अर्थ है कमल से उत्पन्न या कमल को धारण करने वाली। ‘कमल’ कीचड़ (Mud) में खिलता है, परंतु उस पर कीचड़ की एक भी बूंद नहीं टिकती। दार्शनिक दृष्टि से, यह संसार कीचड़ के समान है, जहाँ दुख, काम, क्रोध और स्वार्थ भरा है। जब साधक श्री पद्मावती सहस्रनाम का गान करता है, तो माता उसके हृदय में एक कमल खिलाती हैं। साधक इस भौतिक संसार में रहते हुए, धन और ऐश्वर्य का भोग करते हुए भी आंतरिक रूप से पूरी तरह ‘अनासक्त’ (Detached) और पवित्र रहता है।

भगवान की ‘सिफारिशी शक्ति’ (The Divine Mediatrix)

वैष्णव संप्रदाय (विशेषकर श्री संप्रदाय) में माता लक्ष्मी (पद्मावती) को ‘पुरुषकार’ (Mediatrix) माना गया है। भगवान विष्णु न्याय के देवता हैं (कर्मों का फल देते हैं), परंतु माता पद्मावती क्षमा और करुणा की मूर्ति हैं। जब कोई पापी भी माता की स्तुति करता है, तो माता उसकी वकालत करते हुए भगवान बालाजी से कहती हैं— “हे नाथ! यह मेरा बालक है, इसकी भूलों को क्षमा कर इसे अपना लें।” श्री पद्मावती सहस्रनाम का पाठ करने वाला साधक साक्षात माता के वात्सल्य-आंचल की छांव में आ जाता है, जहाँ दुर्भाग्य प्रवेश नहीं कर सकता।

‘सहस्रनाम’ का अद्भुत नाद-विज्ञान (Sound Vibrations)

सनातन धर्म में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता, अनंतता और शरीर के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra) का प्रतीक माना जाता है। माता पद्मावती के ये हज़ार नाम वास्तव में ब्रह्मांडीय संपन्नता, प्रेम और आकर्षण की 1000 आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक इन नामों का लयबद्ध उच्चारण करता है, तो उसके आभामंडल (Aura) में एक अद्भुत स्वर्णिम (Golden) और गुलाबी (Pink) रंग की ऊर्जा का निर्माण होता है। यह ऊर्जा एक शक्तिशाली चुंबक (Magnet) की तरह ब्रह्मांड से धन, सकारात्मकता, अवसरों और सही जीवनसाथी को साधक की ओर खींचती है।

2. श्री पद्मावती सहस्रनाम पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवती पद्मावती साक्षात प्रेम, ऐश्वर्य, सौंदर्य और मोक्ष की प्रदात्री हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्रनाम का सस्वर पाठ या मानसिक श्रवण करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

आर्थिक, व्यापारिक और भौतिक लाभ (Wealth & Financial Bliss)

  • कुबेर ऋण और कर्जों (Debts) से तुरंत मुक्ति: तिरुपति बालाजी ने अपने विवाह के लिए कुबेर से ऋण लिया था। माता पद्मावती की स्तुति उस ऋण के बोझ को उतारने में सहायक है। जो व्यक्ति भारी कर्जों (Loans/EMIs) के बोझ तले दब चुका है, माता की कृपा से उसके लिए आय के अप्रत्याशित स्रोत खुल जाते हैं और वह कर्ज-मुक्त हो जाता है।

  • घोर दरिद्रता (Alakshmi) का समूल नाश: जिस घर में यह पाठ नित्य होता है, वहाँ कभी अन्न और धन का अभाव नहीं रहता। ‘अलक्ष्मी’ (दरिद्रता) उस घर से तुरंत विदा हो जाती है और माता ‘स्थिर लक्ष्मी’ के रूप में वहां निवास करती हैं।

  • व्यापार और करियर में अजेय वृद्धि: जो लोग व्यापार में मंदी का सामना कर रहे हैं, या नौकरी में पदोन्नति (Promotion) चाहते हैं, यह स्तोत्र उनके लिए नए अवसर पैदा करता है।

वैवाहिक, पारिवारिक और सामाजिक लाभ (Marriage & Harmony)

  • शीघ्र और सुयोग्य विवाह: भगवान श्रीनिवास और माता पद्मावती का विवाह ब्रह्मांड का सबसे भव्य वैवाहिक प्रसंग है। जिन युवक-युवतियों के विवाह में बाधाएं आ रही हैं या रिश्ते टूट रहे हैं, उनके लिए यह सहस्रनाम अचूक उपाय है। माता की कृपा से एक संस्कारी और प्रेम करने वाला जीवनसाथी प्राप्त होता है।

  • दांपत्य जीवन में अखंड सुख-शांति: जो पति-पत्नी हमेशा झगड़ते रहते हैं, यह पाठ उनके हृदय की कड़वाहट को दूर कर श्रीनिवास और पद्मावती के समान अगाध प्रेम स्थापित करता है।

  • सुयोग्य संतान की प्राप्ति: निःसंतान दंपत्तियों को माता के वात्सल्य के प्रभाव से अत्यंत तेजस्वी और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।

मानसिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Spiritual Liberation)

  • तनाव और आर्थिक चिंताओं से मुक्ति: वित्तीय समस्याओं के कारण होने वाला भारी मानसिक तनाव और चिंता (Anxiety) इस स्तुति के गान से शांत होती है। मस्तिष्क को असीम शीतलता प्राप्त होती है।

  • भगवान बालाजी की स्वतः प्राप्ति: यह इस पाठ का सबसे बड़ा रहस्य है। जहाँ पद्मावती हैं, वहाँ वेंकटेश्वर स्वतः चले आते हैं। माता की स्तुति करने वाले को भगवान श्री हरि की शुद्ध प्रेमाभक्ति और अंततः वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

3. श्री पद्मावती सहस्रनाम की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

माता पद्मावती की उपासना अत्यंत राजसी, सौम्य, सात्विक, सुगंधित और सौंदर्य से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध सहस्रनाम का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए आगम ग्रंथों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: माता पद्मावती की आराधना के लिए शुक्रवार (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है। (तिरुचानूर में शुक्रवार के दिन विशेष अभिषेक और दर्शन होते हैं)।

  • विशेष तिथियां: पद्मावती परिणयोत्सव के दिन, वराहलक्ष्मी व्रत (सावन का शुक्रवार), दीपावली, अक्षय तृतीया, और कार्तिक मास की पंचमी (पद्मावती अवतरण दिवस) के दिन इस सहस्रनाम का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) या ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के बाद का समय, जब माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं) होता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North – कुबेर और धन की दिशा) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए गुलाबी (Pink), लाल (Red), पीले या रेशमी आसन का प्रयोग करें।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में गुलाबी, लाल, पीले या श्वेत रंग के स्वच्छ और इत्र लगे हुए वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र / यंत्र एक स्वच्छ चौकी पर गुलाबी या लाल रेशमी कपड़ा बिछाकर माता पद्मावती (कमल पर विराजमान) का सुंदर चित्र या पीतल की मूर्ति स्थापित करें। साथ में भगवान वेंकटेश्वर (तिरुपति बालाजी) का चित्र अवश्य रखें।
दीपक माता के समक्ष गाय के शुद्ध घी का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। गुलाब, चंदन या कस्तूरी की अत्यंत सुगंधित धूप/अगरबत्ती जलाएं।
तिलक और शृंगार माता पद्मावती को कुमकुम, हल्दी और इत्र (विशेषकर गुलाब या मोगरा) अर्पित करें। उन्हें लाल या गुलाबी चुनरी ओढ़ाएं। स्वयं भी मस्तक पर कुमकुम का तिलक धारण करें।
पुष्प माता को कमल का फूल (Lotus) सर्वाधिक प्रिय है (उन्हें ‘अलमेलु मंगा’ कहा जाता है)। यदि कमल न हो तो लाल गुलाब या गुलाबी पुष्प अर्पित करें।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी या कुमकुम से रंगे हुए चावल) और एक लाल पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे जगन्माता श्री पद्मावती, मैं अपने जीवन से दरिद्रता, कर्जों व दांपत्य कलह के नाश, अखंड स्थिर धन की प्राप्ति, और आपकी व श्रीनिवास की अहैतुकी कृपा के लिए श्री पद्मावती सहस्रनाम का 21/41 दिन तक (या प्रत्येक शुक्रवार) पाठ/अर्चन करूँगा/करूँगी”), और फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्रनाम का पाठ और कुमकुमार्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और माता आदि-लक्ष्मी का मानसिक स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • भगवान वेंकटेश्वर का मानसिक ध्यान करें।

  • माता पद्मावती के मंत्र “ॐ श्री पद्मावत्यै नमः” या “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद…” की कम से कम 11 बार या एक माला (कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर) जप करें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, असीम शांत भाव और पूर्ण वात्सल्य के साथ ‘श्री पद्मावती सहस्रनाम’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • कुमकुमार्चन / पुष्पार्चन (सबसे चमत्कारी और प्रसिद्ध उपाय): तिरुचानूर मंदिर में कुमकुमार्चन का विशेष महत्व है। यदि आप विशेष आर्थिक संकट या विवाह की समस्या में हैं, तो सहस्रनाम की नामावली (प्रत्येक नाम के अंत में नमः लगाकर) का पाठ करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ माता की मूर्ति या यंत्र पर चुटकी भर शुद्ध लाल कुमकुम, हल्दी से रंगे अक्षत, या गुलाब की पंखुड़ी अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। यह अत्यंत शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र है।

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क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ पूर्ण होने के बाद माता पद्मावती को गाय के दूध की खीर (केसर युक्त), पोंगल (मीठा पोंगल), बूंदी के लड्डू, अनार, या पंचामृत का सात्विक भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से माता की आरती गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें। (मन ही मन ‘अलमेलु मंगा-वेंकटरमण गोविंदा गोविंदा’ का जयघोष करें)।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

माता पद्मावती परम पावनी, राजराजेश्वरी और अत्यंत सात्विक देवी हैं। वे अशुद्धता, कलह, या तामसिक वातावरण में एक क्षण भी नहीं रुकतीं। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. स्त्रियों का सर्वोच्च सम्मान (The Ultimate Rule): माता पद्मावती संपूर्ण ब्रह्मांड की स्त्री-शक्ति और सौंदर्य का मूल हैं। जिस घर में महिलाओं (पत्नी, माता, बहन, पुत्री) का अपमान होता है, उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं, या उन पर हाथ उठाया जाता है, वहाँ माता कभी प्रवेश नहीं करतीं, चाहे आप कितने भी पाठ कर लें। स्त्रियों का सम्मान इस साधना की पहली शर्त है।

  2. पूर्ण सात्विक जीवन और आहार: अनुष्ठान के दौरान या नित्य पाठ करने वाले साधक को घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। तामसिक भोजन आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट कर अलक्ष्मी को आमंत्रित करता है।

  3. घर में परम स्वच्छता (Absolute Cleanliness): गंदगी और अव्यवस्था माता को अप्रिय है। घर, विशेषकर पूजा कक्ष, रसोईघर और मुख्य द्वार हमेशा साफ और सुगंधित होना चाहिए। मकड़ी के जाले, सीलन और जूठे बर्तन माता के आगमन को रोक देते हैं।

  4. सत्य और धर्म का आचरण (Ethical Wealth): व्यापार या नौकरी में बेईमानी, धोखाधड़ी, रिश्वत या असत्य का सहारा लेकर कमाया गया धन माता पद्मावती की पूजा से कभी स्थिर नहीं होता। भगवान बालाजी धर्म के रक्षक हैं, मेहनत और सत्य के मार्ग पर चलें।

  5. क्रोध और कलह का त्याग: जिस घर में सदस्य जोर-जोर से चिल्लाते हैं, बात-बात पर झगड़ा करते हैं, वहाँ माता नहीं टिकतीं। वाणी में मधुरता और हृदय में शांति बनाए रखें।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्री पद्मावती सहस्रनाम के पाठ में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि साधना निर्विघ्न संपन्न हो और कोई विपरीत प्रभाव न पड़े:

  • तुलसी दल का प्रयोग न करें: भगवान वेंकटेश्वर को तुलसी अत्यंत प्रिय है, परंतु माता पद्मावती (लक्ष्मी) की पूजा या उनके भोग में सीधे तुलसी के पत्तों (Tulsi leaves) का प्रयोग वर्जित माना गया है। उन्हें बिल्वपत्र या पुष्प ही अर्पित करें।

  • अकेले माता की पूजा से बचें: माता पद्मावती को हमेशा भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) के साथ ही पूजना चाहिए। केवल धन की देवी मानकर उनकी अकेली पूजा करने से वे ‘चंचला’ हो जाती हैं। नारायण के साथ पूजने से वे स्थिर रहती हैं।

  • काले कपड़ों का निषेध: माता की पूजा में काले (Black) या गहरे भूरे रंग के वस्त्र पहनना या ऐसे रंग के आसन का प्रयोग करना सर्वथा वर्जित है।

  • शारीरिक पवित्रता: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अपवित्र अवस्था (सूतक/पातक या स्त्रियों द्वारा मासिक धर्म के दौरान) में मूर्ति, यंत्र या स्तोत्र की पुस्तक का स्पर्श सर्वथा वर्जित है।

  • दीपक का बुझना: कुमकुमार्चन या पाठ के बीच में घी का दीपक बुझना नहीं चाहिए। उसमें पर्याप्त घी डालकर रखें और वायु से बचाएं।

6. आधुनिक युग में श्री पद्मावती सहस्रनाम की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘आर्थिक प्रतिस्पर्धा’ (Economic Competition), ‘ईएमआई (EMI) के बोझ’, ‘दिखावे (Show-off)’ और ‘मानसिक अस्थिरता’ का युग है। लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में दिन-रात भाग रहे हैं (Hustle Culture)। धन तो आ रहा है, लेकिन उस धन में ‘बरकत’ और मानसिक शांति नहीं है।

अत्यधिक लालच, धोखाधड़ी, और तनावपूर्ण नौकरियों ने आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression), अनिद्रा (Insomnia), और पारिवारिक कलह का मरीज बना दिया है। रिश्तों में तलाक (Divorce) और ब्रेकअप की दर बढ़ गई है।

‘श्री पद्मावती सहस्रनाम’ आधुनिक इंसान के इसी ‘वित्तीय तनाव’, ‘टूटते रिश्तों’ और ‘अशांति’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार है:

  1. ‘सात्विक धन’ का आगमन (Ethical Wealth): यह सहस्रनाम केवल आपका बैंक बैलेंस नहीं बढ़ाता; यह आपको वह ‘सात्विक धन’ (Sthira Lakshmi) प्रदान करता है जो आपके घर में स्वास्थ्य, शांति और सुसंस्कार लेकर आता है। यह आपको शॉर्टकट और बेईमानी के रास्ते से हटाकर सही दिशा में मेहनत करने की प्रेरणा देता है।

  2. रिश्तों में मधुरता (Healing Relationships): श्रीनिवास-पद्मावती का विवाह ब्रह्मांडीय प्रेम का प्रतीक है। इस पाठ से व्यक्ति के भीतर ‘सहयोग’ और ‘समझ’ (Understanding) का विकास होता है, जिससे टूटते हुए दांपत्य रिश्ते भी फिर से प्रेम से भर जाते हैं।

  3. एबंडेंस माइंडसेट (Abundance Mindset): जब आप 1000 बार माता के ऐश्वर्य का गान करते हैं, तो आपके अवचेतन मन (Subconscious mind) से ‘कमी’ (Scarcity) और ‘डर’ का भाव मिट जाता है। आप अवसरों (Opportunities) को देखने लगते हैं।

  4. आभामंडल का चुंबकत्व (Magnetic Aura): इस पाठ से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक ऐसा आकर्षण (Aura) आ जाता है कि कार्यक्षेत्र में लोग उस पर भरोसा करते हैं, जिससे व्यापारिक डील (Business deals) और नेटवर्किंग में स्वतः ही अपार सफलता मिलती है।

Shri Padmavati Sahasranama Stotra (श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परम सौंदर्य, ऐश्वर्य, और उस वात्सल्यमयी माँ का साक्षात आवाहन है, जो अपने भक्तों के लिए भगवान बालाजी से भी लड़ जाती हैं। जब एक भक्त पूर्ण शरणागति, बिना किसी छल-कपट, और लालच के बिना (निष्काम भाव से) इस स्तुति का गान करता है, तो माता पद्मावती उसके घर को साक्षात वैकुंठ बना देती हैं और अलक्ष्मी को हमेशा के लिए बाहर कर देती हैं।

माता पद्मावती अत्यंत कृपालु, वात्सल्यमयी और अपने सच्चे भक्तों का हर प्रकार से पोषण करने वाली जगन्माता हैं। जब भी आपको लगे कि जीवन में बहुत अधिक आर्थिक संकट आ गया है, कर्ज का भारी बोझ है, विवाह में अकारण देरी हो रही है, दांपत्य जीवन में कलह है, और घर में अशांति है, तो शुक्रवार की शाम गुलाबी आसन पर बैठें, घी का अखंड दीपक जलाएं, माता का सुंदर चित्र स्थापित करें, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए (या कुमकुमार्चन करते हुए) अपनी ‘अलमेलु मंगम्मा’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि माता के इन पावन 1000 नामों ने आपके जीवन की सारी दरिद्रता, बाधाओं, और भयों को दूर कर दिया है, और साक्षात माता पद्मावती व भगवान श्रीनिवास ने आपके जीवन को अपार सफलता, असीम शांति, स्थिर धन, और परम ऐश्वर्य के दिव्य प्रकाश से भर दिया है। ॐ श्री पद्मावत्यै नमः! अलमेलु मंगा-वेंकटरमण गोविंदा गोविंदा!

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्रः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्र तिरुचानूर (दक्षिण भारत) में विराजमान, भगवान वेंकटेश्वर (तिरुपति बालाजी) की अर्धांगिनी माता पद्मावती (अलमेलु मंगम्मा) के 1000 परम पवित्र व रहस्यमयी नामों का एक सिद्ध संकलन है। इसका महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि माता पद्मावती साक्षात धन-धान्य, ऐश्वर्य और करुणा की अधिष्ठात्री हैं। यह स्तुति जीवन की बड़ी से बड़ी दरिद्रता, भारी कर्जों (कुबेर ऋण) और दुर्भाग्य को दूर कर घर में अखंड और स्थिर धन-संपदा का वास कराती है।

2. इस सहस्रनाम का पाठ करने से जीवन में सबसे बड़ा लाभ क्या प्राप्त होता है?

इस सहस्रनाम का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ ‘भयंकर कर्ज (Debts) से तुरंत मुक्ति’, ‘व्यापार व आय में वृद्धि’, और ‘शीघ्र व सुयोग्य विवाह’ का होना है। इसके नियमित पाठ और कुमकुमार्चन से अलक्ष्मी (दरिद्रता) घर से विदा हो जाती है, रुके हुए धन की प्राप्ति होती है, और दांपत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच अपार प्रेम और सामंजस्य (Harmony) स्थापित होता है।

3. इस सहस्रनाम का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम है?

माता पद्मावती की आराधना के लिए ‘शुक्रवार’ (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है। वराहलक्ष्मी व्रत, दीपावली, अक्षय तृतीया, और पंचमी तिथि के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या गोधूलि बेला (सूर्यास्त के बाद का समय) में स्नान के पश्चात, गुलाबी या लाल वस्त्र धारण कर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।

4. ‘कुमकुमार्चन’ क्या है और माता पद्मावती की पूजा में इसका क्या महत्व है?

कुमकुमार्चन माता पद्मावती को प्रसन्न करने का एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक/वैदिक उपाय है जो तिरुचानूर में बहुत प्रसिद्ध है। इसमें साधक ‘श्री पद्मावती सहस्रनाम’ के प्रत्येक नाम (1000 नामों) के उच्चारण के साथ (जैसे ॐ पद्मावत्यै नमः) माता की मूर्ति या चित्र पर चुटकी भर शुद्ध लाल कुमकुम अर्पित करता है। यह प्रयोग आर्थिक संकटों को तत्काल दूर करने, कर्ज चुकाने और किसी भी बड़ी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए अचूक ब्रह्मास्त्र माना गया है।

5. माता पद्मावती की पूजा और इस साधना का सबसे बड़ा नियम व निषेध क्या है?

माता पद्मावती की साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘स्त्रियों का पूर्ण सम्मान’ और ‘घर में परम स्वच्छता’ रखना है। जिस घर में महिलाओं का अपमान होता है या गंदगी होती है, वहां माता कभी नहीं टिकतीं। इसके अतिरिक्त, माता की पूजा में काले वस्त्र पहनना, उन्हें सीधे तुलसी दल (Tulsi leaves) अर्पित करना, और घर में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा) का सेवन करना पूर्णतः निषिद्ध (मना) है। भगवान वेंकटेश्वर के बिना माता पद्मावती की पूजा अपूर्ण मानी जाती है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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