Shrimad Dattatreya Sahasranaam (श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 39 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, नाथ संप्रदाय, दत्त संप्रदाय और तंत्र-आगम शास्त्रों के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब बात सर्वोच्च गुरु-तत्त्व की प्राप्ति, पितृ दोष के समूल नाश, भयंकर तांत्रिक बाधाओं (Black Magic) से मुक्ति, और जीवन में अद्वैत ज्ञान के साथ-साथ भौतिक ऐश्वर्य की आती है, तो भगवान श्री दत्तात्रेय (Lord Dattatreya) का स्मरण सर्वोपरि है।

पौराणिक कथाओं (श्रीमद्भागवत और मार्तण्ड पुराण) के अनुसार, महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के सतीत्व और तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) ने स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लिया। चूँकि उन्होंने स्वयं को अत्रि मुनि को ‘दत्त’ (दान) कर दिया था, इसलिए वे ‘दत्तात्रेय’ कहलाए। भगवान दत्तात्रेय के तीन सिर (त्रिदेवों के प्रतीक) और छह भुजाएं हैं। उनके साथ सदैव चार श्वान (कुत्ते) रहते हैं जो साक्षात चार वेदों के प्रतीक हैं, और एक गौ माता (कामधेनु / पृथ्वी) रहती है। वे कलियुग में सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले, ‘स्मृतिगामी’ (केवल स्मरण करने मात्र से प्रकट होने वाले) जाग्रत देव हैं।

मनुष्य का जीवन कई बार अकारण पैदा हुए संकटों, अज्ञात भयों, पीढ़ियों से चले आ रहे पितृ दोष (Ancestral Curses), भयंकर कर्जों, काले जादू, और एक सच्चे गुरु (मार्गदर्शक) के अभाव से घिर जाता है। जब हर ओर से निराशा हाथ लगने लगे, बनते हुए काम बिगड़ने लगें, घर में अकारण बीमारियां और कलह का वास हो जाए, तब श्री गुरुदेव दत्त की शरण में जाना साक्षात उस ब्रह्मांडीय प्रकाश को पुकारना है, जो भक्त के सारे प्रारब्ध (कर्म) अपने कंधों पर ले लेता है।

भगवान दत्तात्रेय की इसी अजेय ऊर्जा, उनके अनंत गुरु-वात्सल्य, और उनकी त्वरित (Instant) रक्षा-शक्ति को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों और दत्त संप्रदाय में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र, जाग्रत और अत्यंत शक्तिशाली नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली’ (Shrimad Dattatreya Sahasranamavali) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्रनामावली’ का अर्थ है— एक हज़ार नामों की वह दिव्य श्रृंखला जिसका उपयोग भगवान के अर्चन (पूजा, पुष्प अर्पित करने) और नाम-जप के लिए किया जाता है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगाया जाता है, जैसे- ॐ दत्तात्रेयाय नमः, ॐ दिगम्बराय नमः)। यह कोई साधारण स्तुति नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा अभेद्य आध्यात्मिक कवच है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर संकटों, पितृ दोषों और कर्म बंधनों को पल भर में भस्म कर साधक को ‘गुरु-कृपा’ और परम शांति से भर देता है।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम हिंदी | Shrimad Dattatreya Sahasranaam

ॐ श्री दत्तात्रेयाय नमः ।

ॐ महायोगिने नमः ।

ॐ योगेशाय नमः ।

ॐ अमरप्रभवे नमः ।

ॐ मुनये नमः ।

ॐ दिगम्बराय नमः ।

ॐ बालाय नमः ।

ॐ मायामुक्ताय नमः ।

ॐ मदापहाय नमः ।

ॐ अवधूताय नमः । १० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ महानाथाय नमः ।

ॐ शङ्कराय नमः ।

ॐ अमरवल्लभाय नमः ।

ॐ महादेवाय नमः ।

ॐ आदिदेवाय नमः ।

ॐ पुराणप्रभवे नमः ।

ॐ ईश्वराय नमः ।

ॐ सत्त्वकृते नमः ।

ॐ सत्त्वभृते नमः ।

ॐ भावाय नमः । २० ।

ॐ सत्त्वात्मने नमः ।

ॐ सत्त्वसागराय नमः ।

ॐ सत्त्वविदे नमः ।

ॐ सत्त्वसाक्षिणे नमः ।

ॐ सत्त्वसाध्याय नमः ।

ॐ अमराधिपाय नमः ।

ॐ भूतकृते नमः ।

ॐ भूतभृते नमः ।

ॐ भूतात्मने नमः ।

ॐ भूतसम्भवाय नमः । ३० ।

ॐ भूतभवाय नमः ।

ॐ भावाय नमः ।

ॐ भूतविदे नमः ।

ॐ भूतकारणाय नमः ।

ॐ भूतसाक्षिणे नमः ।

ॐ प्रभूतये नमः ।

ॐ भूतानां परमं गतये नमः ।

ॐ भूतसङ्गविहीनात्मने नमः ।

ॐ भूतात्मने नमः ।

ॐ भूतशङ्कराय नमः । ४० ।

ॐ भूतनाथाय नमः ।

ॐ भूतमहानाथाय नमः ।

ॐ भूतादिनाथाय नमः ।

ॐ महेश्वराय नमः ।

ॐ सर्वभूतनिवासात्मने नमः ।

ॐ भूतसन्तापनाशनाय नमः ।

ॐ सर्वात्मने नमः ।

ॐ सर्वभृते नमः ।

ॐ सर्वाय नमः ।

ॐ सर्वज्ञाय नमः । ५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ सर्वनिर्णयाय नमः ।

ॐ सर्वसाक्षिणे नमः ।

ॐ बृहद्भानवे नमः ।

ॐ सर्वविदे नमः ।

ॐ सर्वमङ्गलाय नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ सत्याय नमः ।

ॐ शमाय नमः ।

ॐ समाय नमः ।

ॐ एकाकिने नमः । ६० ।

ॐ कमलापतये नमः ।

ॐ रामाय नमः ।

ॐ रामप्रियाय नमः ।

ॐ विरामाय नमः ।

ॐ रामकारणाय नमः ।

ॐ शुद्धात्मने नमः ।

ॐ पवनाय नमः ।

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ प्रतीताय नमः ।

ॐ परमार्थभृते नमः । ७० ।

ॐ हंससाक्षिणे नमः ।

ॐ विभवे नमः ।

ॐ प्रभवे नमः ।

ॐ प्रलयाय नमः ।

ॐ सिद्धात्मने नमः ।

ॐ परमात्मने नमः ।

ॐ सिद्धानां परमगतये नमः ।

ॐ सिद्धिसिद्धये नमः ।

ॐ साध्याय नमः ।

ॐ साधनाय नमः । ८० ।

ॐ उत्तमाय नमः ।

ॐ सुलक्षणाय नमः ।

ॐ सुमेधाविने नमः ।

ॐ विद्यवते नमः ।

ॐ विगतान्तराय नमः ।

ॐ विज्वराय नमः ।

ॐ महाबाहवे नमः ।

ॐ बहुलानन्दवर्धनाय नमः ।

ॐ अव्यक्तपुरुषाय नमः ।

ॐ प्रज्ञाय नमः । ९० ।

ॐ परज्ञाय नमः ।

ॐ परमार्थदृशे नमः ।

ॐ परापरविनिर्मुक्ताय नमः ।

ॐ युक्ताय नमः ।

ॐ तत्त्वप्रकाशवते नमः ।

ॐ दयावते नमः ।

ॐ भगवते नमः ।

ॐ भाविने नमः ।

ॐ भावात्मने नमः ।

ॐ भावकारणाय नमः । १०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ भवसन्तापनाशनाय ॥

ॐ पुष्पवते नमः ।

ॐ पण्डिताय नमः ।

ॐ बुद्धाय नमः ।

ॐ प्रत्यक्षवस्तवे नमः ।

ॐ विश्वात्मने नमः ।

ॐ प्रत्यग्ब्रह्मसनातनाय नमः ।

ॐ प्रमाणविगताय नमः ।

ॐ प्रत्याहारणी योजकाय नमः ।

ॐ प्रणवाय नमः । ११० ।

ॐ प्रणवातीताय नमः ।

ॐ प्रमुखाय नमः ।

ॐ प्रलयात्मकाय नमः ।

ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।

ॐ विविक्तात्मने नमः ।

ॐ शङ्करात्मने नमः ।

ॐ परस्मैवपुषे नमः ।

ॐ परमाय नमः ।

ॐ तनुविज्ञेयाय नमः ।

ॐ परमात्मनिसंस्थिताय नमः । १२० ।

ॐ प्रबोधकलनाधाराय नमः ।

ॐ प्रभाव प्रवरोत्तमाय नमः ।

ॐ चिदम्बराय नमः ।

ॐ चिद्विलासाय नमः ।

ॐ चिदाकाशाय नमः ।

ॐ चिदुत्तमाय नमः ।

ॐ चित्त चैतन्य चित्तात्मने नमः ।

ॐ देवानां परमागतये नमः ।

ॐ अचेत्याय नमः ।

ॐ चेतनाधाराय नमः । १३० ।

ॐ चेतनाचित्तविक्रमाय नमः ।

ॐ चित्तात्मने नमः ।

ॐ चेतनारूपाय नमः ।

ॐ लसत्पङ्कजलोचनाय नमः ।

ॐ परब्रह्मणे नमः ।

ॐ परञ्ज्योतिये नमः ।

ॐ परन्धाम्ने नमः ।

ॐ परन्तपसे नमः ।

ॐ परंसूत्राय नमः ।

ॐ परतन्त्राय नमः । १४० ।

ॐ पवित्राय नमः ।

ॐ परमोहवते नमः ।

ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः ।

ॐ क्षेत्रगाय नमः ।

ॐ क्षेत्राय नमः ।

ॐ क्षेत्राधाराय नमः ।

ॐ पुराञ्ज्यनाय नमः ।

ॐ क्षेत्रशून्याय नमः ।

ॐ लोकसाक्षिणे नमः ।

ॐ क्षेत्रवते नमः । १५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ बहुनायकाय नमः ।

ॐ योगीन्द्राय नमः ।

ॐ योगपूज्याय नमः ।

ॐ योग्याय नमः ।

ॐ आत्मविदंशुचये नमः ।

ॐ योगमायाधराय नमः ।

ॐ स्थानवे नमः ।

ॐ अचलाय नमः ।

ॐ कमलापतये नमः ।

ॐ योगेशाय नमः । १६० ।

ॐ योगनिमन्त्रे नमः ।

ॐ योगज्ञानप्रकाशकाय नमः ।

ॐ योगपालाय नमः ।

ॐ लोकपालाय नमः ।

ॐ संसारतमोनाशनाय नमः ।

ॐ गुह्याय नमः ।

ॐ गुह्यतमाय नमः ।

ॐ गुप्तये नमः ।

ॐ मुक्ताय नमः ।

ॐ युक्ताय नमः । १७० ।

ॐ सनातनाय नमः ।

ॐ गहनाय नमः ।

ॐ गगनाकाराय नमः ।

ॐ गम्भीराय नमः ।

ॐ गणनायकाय नमः ।

ॐ गोविन्दाय नमः ।

ॐ गोपतये नमः ।

ॐ गोप्त्रे नमः ।

ॐ गोभागाय नमः ।

ॐ भावसंस्थिताय नमः । १८० ।

ॐ गोसाक्षिणे नमः ।

ॐ गोतमारये नमः ।

ॐ गान्धाराय नमः ।

ॐ गगनाकृतये नमः ।

ॐ योगयुक्ताय नमः ।

ॐ भोगयुक्ताय नमः ।

ॐ शङ्कामुक्त समाधिमते नमः ।

ॐ सहजाय नमः ।

ॐ सकलेशनाय नमः ।

ॐ कार्तवीर्यवरप्रदाय नमः । १९० ।

ॐ सरजसे नमः ।

ॐ विरजसे नमः ।

ॐ पुंसे नमः ।

ॐ पावनाय नमः ।

ॐ पापनाशनाय नमः ।

ॐ परावरविनिर्मुक्ताय नमः ।

ॐ परञ्ज्योतिये नमः ।

ॐ पुरातनाय नमः ।

ॐ नानाज्योतिषे नमः ।

ॐ अनेकात्मने नमः । २०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ स्वयञ्ज्योतिषे ॥

ॐ सदाशिवाय नमः ।

ॐ दिव्यज्योतिर्मयाय नमः ।

ॐ सत्यविज्ञानभास्कराय नमः ।

ॐ नित्यशुद्धाय नमः ।

ॐ पराय नमः ।

ॐ पूर्णाय नमः ।

ॐ प्रकाशाय नमः ।

ॐ प्रकटोद्भवाय नमः ।

ॐ प्रमादविगताय नमः । २१० ।

ॐ परेशाय नमः ।

ॐ परविक्रमाय नमः ।

ॐ योगिने नमः ।

ॐ योगाय नमः ।

ॐ योगपाय नमः ।

ॐ योगाभ्यासप्रकाशनाय नमः ।

ॐ योक्त्रे नमः ।

ॐ मोक्त्रे नमः ।

ॐ विधात्रे नमः ।

ॐ त्रात्रे नमः । २२० ।

ॐ पात्रे नमः ।

ॐ निरायुधाय नमः ।

ॐ नित्यमुक्ताय नमः ।

ॐ नित्ययुक्ताय नमः ।

ॐ सत्याय नमः ।

ॐ सत्यपराक्रमाय नमः ।

ॐ सत्त्वशुद्धिकराय नमः ।

ॐ सत्त्वाय नमः ।

ॐ सत्त्वभृताङ्गतये नमः ।

ॐ श्रीधराय नमः । २३० ।

ॐ श्रीवपुषे नमः ।

ॐ श्रीमते नमः ।

ॐ श्रीनिवासाय नमः ।

ॐ अमरार्चिताय नमः ।

ॐ श्रीनिधये नमः ।

ॐ श्रीपतये नमः ।

ॐ श्रेष्ठाय नमः ।

ॐ श्रेयस्काय नमः ।

ॐ चरमाश्रयाय नमः ।

ॐ त्यागिने नमः । २४० ।

ॐ त्यागाज्यसम्पन्नाय नमः ।

ॐ त्यागात्मने नमः ।

ॐ त्यागविग्रहाय नमः ।

ॐ त्यागलक्षणसिद्धात्मने नमः ।

ॐ त्यागज्ञाय नमः ।

ॐ त्यागकारणाय नमः ।

ॐ भागाय नमः ।

ॐ भोक्त्रे नमः ।

ॐ भोग्याय नमः ।

ॐ भोगसाधनकारणाय नमः । २५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ भोगिने नमः ।

ॐ भोगार्थसम्पन्नाय नमः ।

ॐ भोगज्ञानप्रकाशनाय नमः ।

ॐ केवलाय नमः ।

ॐ केशवाय नमः ।

ॐ कृष्णाय नमः ।

ॐ कंवाससे नमः ।

ॐ कमलालयाय नमः ।

ॐ कमलासनपूज्याय नमः ।

ॐ हरये नमः । २६० ।

ॐ अज्ञानखण्डनाय नमः ।

ॐ महात्मने नमः ।

ॐ महदादये नमः ।

ॐ महेशोत्तमवन्दिता नमः ।

ॐ मनोवृद्धिविहीनात्मने नमः ।

ॐ मानात्मने नमः ।

ॐ मानवाधिपाय नमः ।

ॐ भुवनेशाय नमः ।

ॐ विभूतये नमः ।

ॐ धृतये नमः । २७० ।

ॐ मेधाये नमः ।

ॐ स्मृतये नमः ।

ॐ दयाये नमः ।

ॐ दुःखदावानलाय नमः ।

ॐ बुद्धाय नमः ।

ॐ प्रबुद्धाय नमः ।

ॐ परमेश्वराय नमः ।

ॐ कामघ्नाय नमः ।

ॐ क्रोधघ्नाय नमः ।

ॐ दम्भदर्पमदापहाय नमः । २८० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ अज्ञानतिमिरारये नमः ।

ॐ भवारये नमः ।

ॐ भुवनेश्वराय नमः ।

ॐ रूपकृते नमः ।

ॐ रूपभृते नमः ।

ॐ रूपिणे नमः ।

ॐ रूपात्मने नमः ।

ॐ रूपकारणाय नमः ।

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ॐ रूपज्ञाय नमः ।

ॐ रूपसाक्षिणे नमः । २९० ।

ॐ नामरूपाय नमः ।

ॐ गुणान्तकाय नमः ।

ॐ अप्रमेयाय नमः ।

ॐ प्रमेयाय नमः ।

ॐ प्रमाणाय नमः ।

ॐ प्रणवाश्रयाय नमः ।

ॐ प्रमाणरहिताय नमः ।

ॐ अचिन्त्याय नमः ।

ॐ चेतनाविगताय नमः ।

ॐ अजराय नमः । ३०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ अक्षराय नमः ।

ॐ अक्षरमुक्ताय नमः ।

ॐ विज्वराय नमः ।

ॐ ज्वरनाशनाय नमः ।

ॐ विशिष्टाय नमः ।

ॐ वित्तशास्त्रिणे नमः ।

ॐ दृष्टाय नमः ।

ॐ दृष्टान्तवर्जिताय नमः ।

ॐ गुणेशाय नमः ।

ॐ गुणकायाय नमः । ३१० ।

ॐ गुणात्मने नमः ।

ॐ गुणभावनाय नमः ।

ॐ अनन्तगुणसम्पन्नाय नमः ।

ॐ गुणगर्भाय नमः ।

ॐ गुणाधिपाय नमः ।

ॐ गुणेशाय नमः ।

ॐ गुणनाथाय नमः ।

ॐ गुणात्मने नमः ।

ॐ गुणभावनाय नमः ।

ॐ गुणबन्धवे नमः । ३२० ।

ॐ विवेकात्मने नमः ।

ॐ गुणयुक्ताय नमः ।

ॐ पराक्रमिणे नमः ।

ॐ अतर्काय नमः ।

ॐ आकृतवे नमः ।

ॐ अग्नये नमः ।

ॐ कृतज्ञाय नमः ।

ॐ सफलाश्रयाय नमः ।

ॐ यज्ञाय नमः ।

ॐ यज्ञफलदात्रे नमः । ३३० ।

ॐ यज्ञात्मने नमः ।

ॐ ईजनाय नमः ।

ॐ अमरोत्तमाय नमः ।

ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ।

ॐ श्रीगर्भाय नमः ।

ॐ स्वगर्भाय नमः ।

ॐ कुणपेश्वराय नमः ।

ॐ मायोगर्भाय नमः ।

ॐ लोकगर्भाय नमः ।

ॐ स्वयम्भुवे नमः । ३४० ।

ॐ भुवनान्तकाय नमः ।

ॐ निष्पापाय नमः ।

ॐ निबिडाय नमः ।

ॐ नन्दिने नमः ।

ॐ बोधिने नमः ।

ॐ बोधसमाश्रयाय नमः ।

ॐ बोधात्मने नमः ।

ॐ बोधनात्मने नमः ।

ॐ भेदवैतण्डखण्डनाय नमः ।

ॐ स्वभाव्याय नमः । ३५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ भावविमुक्ताय नमः ।

ॐ व्यक्ताय नमः ।

ॐ अव्यक्तसमाश्रयाय नमः ।

ॐ नित्यतृप्ताय नमः ।

ॐ निराभासाय नमः ।

ॐ निर्वाणाय नमः ।

ॐ शरणाय नमः ।

ॐ सुहृदे नमः ।

ॐ गुह्येशाय नमः ।

ॐ गुणगम्भीराय नमः । ३६० ।

ॐ गुणदेशनिवारणाय नमः ।

ॐ गुणसङ्गविहीनाय नमः ।

ॐ योगारेर्दर्पनाशनाय नमः ।

ॐ आनन्दाय नमः ।

ॐ परमानन्दाय नमः ।

ॐ स्वानन्दसुखवर्धनाय नमः ।

ॐ सत्यानन्दाय नमः ।

ॐ चिदानन्दाय नमः ।

ॐ सर्वानन्दपरायणाय नमः ।

ॐ सद्रूपाय नमः । ३७० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ सहजाय नमः ।

ॐ सत्याय नमः ।

ॐ स्वानन्दाय नमः ।

ॐ सुमनोहराय नमः ।

ॐ सर्वाय नमः ।

ॐ सर्वान्तराय नमः ।

ॐ पूर्वात्पूर्वान्तराय नमः ।

ॐ स्वमयाय नमः ।

ॐ स्वपराय नमः ।

ॐ स्वादये नमः । ३८० ।

ॐ स्वम्ब्रह्मणे नमः ।

ॐ स्वतनवे नमः ।

ॐ स्वगाय नमः ।

ॐ स्ववाससे नमः ।

ॐ स्वविहीनाय नमः ।

ॐ स्वनिधये नमः ।

ॐ स्वपराक्षयाय नमः ।

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ आदिरूपाय नमः ।

ॐ सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः । ३९० ।

ॐ अमोघाय नमः ।

ॐ परमामोघाय नमः ।

ॐ परेशाय नमः ।

ॐ परादाय नमः ।

ॐ कवये नमः ।

ॐ विश्वचक्षुषे नमः ।

ॐ विश्वसाक्षिणे नमः ।

ॐ विश्वबाहवे नमः ।

ॐ धनेश्वराय नमः ।

ॐ धनञ्जयाय नमः । ४०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ महातेजसे नमः ।

ॐ तेजिष्ठाय नमः ।

ॐ तेजसाय नमः ।

ॐ सुखिने नमः ।

ॐ ज्योतिषे नमः ।

ॐ ज्योतिर्मयाय नमः ।

ॐ जेत्रे नमः ।

ॐ ज्योतिषां ज्योतिरात्मकाय नमः ।

ॐ ज्योतिषामपि ज्योतिषे नमः ।

ॐ जनकाय नमः । ४१० ।

ॐ जनमोहनाय नमः ।

ॐ जितेन्द्रियाय नमः ।

ॐ जितक्रोधाय नमः ।

ॐ जितात्मने नमः ।

ॐ जितमानसाय नमः ।

ॐ जितसङ्गाय नमः ।

ॐ जितप्राणाय नमः ।

ॐ जितसंसार नमः ।

ॐ निर्वासनाय नमः ।

ॐ निरालम्बाय नमः । ४२० ।

ॐ निर्योगक्षेमवर्जिताय नमः ।

ॐ निरीहाय नमः ।

ॐ निरहङ्काराय नमः ।

ॐ निराशीनिरुपाधिकाय नमः ।

ॐ निर्लाबोध्याय नमः ।

ॐ विविक्तात्मने नमः ।

ॐ विशुद्धोत्तम गौरवाय नमः ।

ॐ विद्यायिने नमः ।

ॐ परमार्थिने नमः ।

ॐ श्रद्धार्थिने नमः । ४३० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ साधनात्मकाय नमः ।

ॐ प्रत्याहारिणे नमः ।

ॐ निराहारिणे नमः ।

ॐ सर्वाहारपरायणाय नमः ।

ॐ नित्यशुद्धाय नमः ।

ॐ निराकाङ्क्षिणे नमः ।

ॐ पारायणपरायणाय नमः ।

ॐ अणोर्नुतरया नमः ।

ॐ सूक्ष्माय नमः ।

ॐ स्थूलाय नमः । ४४० ।

ॐ स्थूलतराय नमः ।

ॐ एकाय नमः ।

ॐ अनेकरूपाय नमः ।

ॐ विश्वरूपाय नमः ।

ॐ सनातनाय नमः ।

ॐ नैकरूपाय नमः ।

ॐ निरूपात्मने नमः ।

ॐ नैकबोधमयाय नमः ।

ॐ नैकनाममयाय नमः ।

ॐ नैकविद्याविवर्धनाय नमः । ४५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ एकाय नमः ।

ॐ एकान्तिकाय नमः ।

ॐ नानाभावविवर्जिताय नमः ।

ॐ एकाक्षराय नमः ।

ॐ बीजाय नमः ।

ॐ पूर्णबिम्बाय नमः ।

ॐ सनातनाय नमः ।

ॐ मन्त्रवीर्याय नमः ।

ॐ मन्त्रबीजाय नमः ।

ॐ शास्त्रवीर्याय नमः । ४६० ।

ॐ जगत्पतये नमः ।

ॐ नानावीर्यधराय नमः ।

ॐ शक्त्रेशाय नमः ।

ॐ पृथिवीपतये नमः ।

ॐ प्राणेशाय नमः ।

ॐ प्राणदाय नमः ।

ॐ प्राणाय नमः ।

ॐ प्राणायामपरायणाय नमः ।

ॐ प्रणपञ्चकनिर्मुक्ताय नमः ।

ॐ कोशपञ्चकवर्जिताय नमः । ४७० ।

ॐ निश्चलाय नमः ।

ॐ निष्कलाय नमः ।

ॐ आङ्गाय नमः ।

ॐ निष्प्रपञ्चाय नमः ।

ॐ निरामयाय नमः ।

ॐ निराधाराय नमः ।

ॐ निराकाराय नमः ।

ॐ निर्विकार्याय नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः ।

ॐ निष्प्रतीताय नमः । ४८० ।

ॐ निराभासाय नमः ।

ॐ निरासक्ताय नमः ।

ॐ निराकुलाय नमः ।

ॐ निष्ठासर्वगताय नमः ।

ॐ निरारम्भाय नमः ।

ॐ निराश्रयाय नमः ।

ॐ निरन्तराय नमः ।

ॐ सत्त्वगोप्त्रे नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ दान्ताय नमः । ४९० ।

ॐ महामुनये नमः ।

ॐ निःशब्दाय नमः ।

ॐ सुकृताय नमः ।

ॐ स्वस्थाय नमः ।

ॐ सत्यवादिने नमः ।

ॐ सुरेश्वराय नमः ।

ॐ ज्ञानदाय नमः ।

ॐ ज्ञानविज्ञानिने नमः ।

ॐ ज्ञानात्मने नमः ।

ॐ आनन्दपूरेताय नमः । ५०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ ज्ञानयज्ञविदां दक्षाय नमः ।

ॐ ज्ञानाग्नये नमः ।

ॐ ज्वलनाय नमः ।

ॐ बुधाय नमः ।

ॐ दयावते नमः ।

ॐ भवरोगारये नमः ।

ॐ चिकित्सा चरमागलाये नमः ।

ॐ चन्द्रमण्डल मध्यस्थाय नमः ।

ॐ चन्द्रकोटिसुशीलालये नमः ।

ॐ यन्त्रकृते नमः । ५१० ।

ॐ परमाय नमः ।

ॐ यन्त्रिणे नमः ।

ॐ यन्त्रारूढापराजिताय नमः ।

ॐ यन्त्रविदे नमः ।

ॐ यन्त्रवासाय नमः ।

ॐ यन्त्राधाराय नमः ।

ॐ धराधाराय नमः ।

ॐ तत्त्वज्ञाय नमः ।

ॐ तत्त्वभूतात्मने नमः ।

ॐ महत्तत्त्वप्रकाशनायनमः । ५२० ।

ॐ तत्त्वसङ्ख्यानयोगज्ञाय नमः ।

ॐ साङ्ख्यशास्त्रप्रवर्तकाय नमः ।

ॐ अनन्त विक्रमाय नमः ।

ॐ देवाय नमः ।

ॐ माधवाय नमः ।

ॐ धनेश्वराय नमः ।

ॐ साधवे नमः ।

ॐ साधु वरिष्ठात्मने नमः ।

ॐ सावधानाय नमः ।

ॐ अमरोत्तमाय नमः । ५३० ।

ॐ निःसङ्कल्पाय नमः ।

ॐ निराधाराय नमः ।

ॐ दुर्धराय नमः ।

ॐ आत्मविदे नमः ।

ॐ पतये नमः ।

ॐ आरोग्यसुखदाय नमः ।

ॐ प्रवराय नमः ।

ॐ वासवाय नमः ।

ॐ परेशाय नमः ।

ॐ परमोदाराय नमः । ५४० ।

ॐ प्रत्यक्चैतन्य दुर्गमाय नमः ।

ॐ दुराधर्षाय नमः ।

ॐ दुरावासाय नमः ।

ॐ दूरत्वपरिनाशनाय नमः ।

ॐ वेदविदे नमः ।

ॐ वेदकृते नमः ।

ॐ वेदाय नमः ।

ॐ वेदात्मने नमः ।

ॐ विमलाशयाय नमः ।

ॐ विविक्तसेविने नमः । ५५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ संसारश्रमनाशनाय नमः ।

ॐ ब्रह्मयोनये नमः ।

ॐ बृहद्योनये नमः ।

ॐ विश्वयोनये नमः ।

ॐ विदेहवते नमः ।

ॐ विशालाक्षाय नमः ।

ॐ विश्वनाथाय नमः ।

ॐ हाटकाङ्गदभूषणाय नमः ।

ॐ अबाध्याय नमः ।

ॐ जगदाराध्याय नमः । ५६० ।

ॐ जगदाखिलपालनाय नमः ।

ॐ जनवते नमः ।

ॐ धनवते नमः ।

ॐ धर्मिणे नमः ।

ॐ धर्मगाय नमः ।

ॐ धर्मवर्धनाय नमः ।

ॐ अमृताय नमः ।

ॐ शाश्वताय नमः ।

ॐ साध्याय नमः ।

ॐ सिद्धिदाय नमः । ५७० ।

ॐ सुमनोहराय नमः ।

ॐ खलुब्रह्म खलुस्थानाय नमः ।

ॐ मुनीनां परमागतये नमः ।

ॐ उपदृष्टे नमः ।

ॐ श्रेष्ठाय नमः ।

ॐ शुचिर्भूताय नमः ।

ॐ अनामयाय नमः ।

ॐ वेदसिद्धान्तवेद्याय नमः ।

ॐ मानसाह्लादवर्धनाय नमः ।

ॐ देहादन्याय नमः । ५८० ।

ॐ गुणादन्याय नमः ।

ॐ लोकादन्याय नमः ।

ॐ विवेकविदे नमः ।

ॐ दुष्टस्वप्नहराय नमः ।

ॐ गुरवे नमः ।

ॐ गुरुवरोत्तमाय नमः ।

ॐ कर्मिणे नमः ।

ॐ कर्मविनिर्मुक्ताय नमः ।

ॐ संन्यासिने नमः ।

ॐ साधकेश्वराय नमः । ५९० ।

ॐ सर्वभावविहिनाय नमः ।

ॐ तृष्णासङ्गनिवारणाय नमः ।

ॐ त्यागिने नमः ।

ॐ त्यगवपुषे नमः ।

ॐ त्यागाय नमः ।

ॐ त्यागदानविवर्जिताय नमः ।

ॐ त्यागकारणत्यागात्मने नमः ।

ॐ सद्गुरवे नमः ।

ॐ सुखदायकाय नमः ।

ॐ दक्षाय नमः । ६०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ दक्षादि वन्द्याय नमः ।

ॐ ज्ञानवादप्रवतकाय नमः ।

ॐ शब्दब्रह्ममयात्मने नमः ।

ॐ शब्दब्रह्मप्रकाशवते नमः ।

ॐ ग्रसिष्णवे नमः ।

ॐ प्रभविष्णवे नमः ।

ॐ सहिष्णवे नमः ।

ॐ विगतान्तराय नमः ।

ॐ विद्वत्तमाय नमः ।

ॐ महावन्द्याय नमः । ६१० ।

ॐ विशालोत्तम वाङ्मुनये नमः ।

ॐ ब्रह्मविदे नमः ।

ॐ ब्रह्मभावाय नमः ।

ॐ ब्रह्मऋषये नमः ।

ॐ ब्राह्मणप्रियाय नमः ।

ॐ ब्रह्मणे नमः ।

ॐ ब्रह्मप्रकाशात्मने नमः ।

ॐ ब्रह्मविद्याप्रकाशनाय नमः ।

ॐ अत्रिवंशप्रभूतात्मने नमः ।

ॐ तापसोत्तम् वन्दिताय नमः । ६२० ।

ॐ आत्मवासिने नमः ।

ॐ विधेयात्मने नमः ।

ॐ अत्रिवंशविवर्धनाय नमः ।

ॐ प्रवर्तनाय नमः ।

ॐ निवृत्तात्मने नमः ।

ॐ प्रलयोदकसन्निभाय नमः ।

ॐ नारायणाय नमः ।

ॐ महागर्भाय नमः ।

ॐ भार्गवप्रियकृत्तमाय नमः ।

ॐ सङ्कल्पदुःखदलनाय नमः । ६३० ।

ॐ संसारतमनाशनाय नमः ।

ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।

ॐ त्रिधाकाराय नमः ।

ॐ त्रिमूर्तये नमः ।

ॐ त्रिगुणात्मकाय नमः ।

ॐ भेदत्रयहराय नमः ।

ॐ तापत्रयनिवारकाय नमः ।

ॐ दोषत्रयविभेदिने नमः ।

ॐ संशयार्णवखण्डनाय नमः ।

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ॐ असंशयाय नमः । ६४० ।

ॐ असंमूढाय नमः ।

ॐ अवादिने नमः ।

ॐ राजवन्दिताय नमः ।

ॐ राजयोगिने नमः ।

ॐ महायोगिने नमः ।

ॐ स्वभावगलिताय नमः ।

ॐ पुण्यश्लोकाय नमः ।

ॐ पवित्राङ्घ्रये नमः ।

ॐ ध्यानयोगपरायणाय नमः ।

ॐ ध्यानस्थाय नमः । ६५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ ध्यानगम्याय नमः ।

ॐ विधेयात्मने नमः ।

ॐ पुरातनाय नमः ।

ॐ अविज्ञेयाय नमः ।

ॐ अन्तरात्मने नमः ।

ॐ मुख्यबिम्बसनातनाय नमः ।

ॐ जीवसञ्जीवनाय नमः ।

ॐ जीवाय नमः ।

ॐ चिद्विलासाय नमः ।

ॐ चिदाश्रयाय नमः । ६६० ।

ॐ महेन्द्राय नमः ।

ॐ अमरमान्याय नमः ।

ॐ योगीन्द्राय नमः ।

ॐ योगविद्मयाय नमः ।

ॐ योगधर्माय नमः ।

ॐ योगाय नमः ।

ॐ तत्त्वाय नमः ।

ॐ तत्त्वविनिश्चयाय नमः ।

ॐ नैकबाहवे नमः ।

ॐ अनन्तात्मने नमः । ६७० ।

ॐ नैकनानापराक्रोणाय नमः ।

ॐ नैकाक्षिणे नमः ।

ॐ नैकपादाय नमः ।

ॐ नाथनाथाय नमः ।

ॐ उत्तमोत्तमाय नमः ।

ॐ सहस्रशीर्षिणे नमः ।

ॐ पुरुषाय नमः ।

ॐ सहस्राक्षाय नमः ।

ॐ सहस्रपदे नमः ।

ॐ सहस्ररूपदृशे नमः । ६८० ।

ॐ सहस्रामय उद्भवाय नमः ।

ॐ त्रिपाद पुरुषाय नमः ।

ॐ त्रिपदोर्ध्वाय नमः ।

ॐ त्र्ययम्बकाय नमः ।

ॐ महावीर्याय नमः ।

ॐ योगवीर्यविशारदाय नमः ।

ॐ विजयिने नमः ।

ॐ विनयिने नमः ।

ॐ जेत्रे नमः ।

ॐ वीतरागिणे नमः । ६९० ।

ॐ विराजिताय नमः ।

ॐ रुद्राय नमः ।

ॐ रौद्राय नमः ।

ॐ महाभीमाय नमः ।

ॐ प्राज्ञमुख्याय नमः ।

ॐ सदाशुचये नमः ।

ॐ अन्तर्ज्योतिषे नमः ।

ॐ अनन्तात्मने नमः ।

ॐ प्रत्यगात्मने नमः ।

ॐ निरन्तराय नमः । ७०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ अरूपाय नमः ।

ॐ आत्मरूपाय नमः ।

ॐ सर्वभावविनिर्वृत्ताय नमः ।

ॐ अन्तःशून्याय नमः ।

ॐ बहिःशून्याय नमः ।

ॐ शून्यात्मने नमः ।

ॐ शून्यभावनाय नमः ।

ॐ अन्तःपूर्णाय नमः ।

ॐ बहिःपूर्णाय नमः ।

ॐ पूर्णात्मने नमः । ७१० ।

ॐ पूर्णभावनाय नमः ।

ॐ अन्तस्त्यागिने नमः ।

ॐ बहिस्त्यागिने नमः ।

ॐ त्यागात्मने नमः ।

ॐ सर्वयोगवते नमः ।

ॐ अन्तर्योगिने नमः ।

ॐ बहिर्योगिने नमः ।

ॐ सर्वयोगपरायणाय नमः ।

ॐ अन्तर्भोगिने नमः ।

ॐ बहिर्भोगिने नमः । ७२० ।

ॐ सर्वभिगविदुत्तमाय नमः ।

ॐ अन्तर्निष्ठाय नमः ।

ॐ बहिर्निष्ठाय नमः ।

ॐ सर्वनिष्ठामयाय नमः ।

ॐ बाह्यान्तरविमुक्ताय नमः ।

ॐ बाह्यान्तरविवर्जिताय नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ शुद्धाय नमः ।

ॐ विशुद्धाय नमः ।

ॐ निर्वाणाय नमः । ७३० ।

ॐ प्रकृतिचे पराय नमः ।

ॐ अकालाय नमः ।

ॐ कालनेमिने नमः ।

ॐ कालकालाय नमः ।

ॐ जनेश्वराय नमः ।

ॐ कालात्मने नमः ।

ॐ कालकर्त्रे नमः ।

ॐ कालज्ञाय नमः ।

ॐ कालनाशनाय नमः ।

ॐ कैवल्य्पददात्रे नमः । ७४० ।

ॐ कैवल्यसुखदायकाय नमः ।

ॐ कैवल्यालयधराय नमः ।

ॐ निर्भराय नमः ।

ॐ हर्शवर्धनाय नमः ।

ॐ हृदयस्थाय नमः ।

ॐ हृषिकेषाय नमः ।

ॐ गोविन्दाय नमः ।

ॐ गर्भवर्जिताय नमः ।

ॐ सकलागमपूज्याय नमः ।

ॐ निगमाय नमः । ७५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ निगमाश्रयाय नमः ।

ॐ पराशक्तये नमः ।

ॐ पराकीर्तये नमः ।

ॐ परावृत्तये नमः ।

ॐ निधिस्मृतये नमः ।

ॐ पराविद्या पराक्षान्तये नमः ।

ॐ विभक्तये नमः ।

ॐ युक्तसद्गतये नमः ।

ॐ स्वप्रकाशाय नमः ।

ॐ प्रकाशात्मने नमः । ७६० ।

ॐ परासंवेदनात्मकाय नमः ।

ॐ स्वसेव्याय नमः ।

ॐ स्वविदं स्वात्मने नमः ।

ॐ स्वसंवेद्याय नमः ।

ॐ अनघाय नमः ।

ॐ क्षमिणे नमः ।

ॐ स्वानुसन्धान शीलात्मने नमः ।

ॐ स्वानुसन्धान गोचराय नमः ।

ॐ स्वानुसन्धान शून्यात्मने नमः ।

ॐ स्वनुसन्धानाश्रयाय नमः । ७७० ।

ॐ स्वबोधदर्पणाय नमः ।

ॐ अभङ्गाय नमः ।

ॐ कन्दर्पकुलनाशनाय नमः ।

ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।

ॐ ब्रह्मवेत्रे नमः ।

ॐ ब्राह्मणाय नमः ।

ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः ।

ॐ तत्त्वबोधाय नमः ।

ॐ सुधावर्षाय नमः ।

ॐ पवनाय नमः । ७८० ।

ॐ पापपावकाय नमः ।

ॐ ब्रह्मसूत्रविधेयात्मने नमः ।

ॐ ब्रह्मसूत्रार्थनिर्णयाय नमः ।

ॐ अत्यन्तिकाय नमः ।

ॐ महाकल्पाय नमः ।

ॐ सङ्कल्पावर्त नाशनाय नमः ।

ॐ आधिव्याधिहराय नमः ।

ॐ संशयार्णव शोषकाय नमः ।

ॐ तत्त्वात्मज्ञानसन्देशाय नमः ।

ॐ महानुभावभाविताय नमः । ७९० ।

ॐ आत्मानुभवसम्पन्नाय नमः ।

ॐ स्वानुभवसुखाश्रयाय नमः ।

ॐ अचिन्त्याय नमः ।

ॐ बृहद्भानवे नमः ।

ॐ प्रमदोत्कर्षनाशनाय नमः ।

ॐ अनिकेत प्रशान्तात्मने नमः ।

ॐ शून्यवासाय नमः ।

ॐ जगद्वपुषे नमः ।

ॐ चिद्गतये नमः ।

ॐ चिन्मयाय नमः । ८०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ चक्रिणे ।

ॐ मायाचक्रप्रवर्तकाय नमः ।

ॐ सर्ववर्णविदारम्भिणे नमः ।

ॐ सर्वारम्भपरायणाय नमः ।

ॐ पुराणाय नमः ।

ॐ प्रवराय नमः ।

ॐ दात्रे नमः ।

ॐ सुनराय नमः ।

ॐ कनकाङ्गदिने नमः ।

ॐ अनसूयात्मजाय नमः । ८१० ।

ॐ दत्ताय नमः ।

ॐ सर्वज्ञाय नमः ।

ॐ सर्वकामदाय नमः ।

ॐ कामजिते नमः ।

ॐ कामपटाय नमः ।

ॐ कामिने नमः ।

ॐ कामप्रदागमाय नमः ।

ॐ कामवते नमः ।

ॐ कामपोषाय नमः ।

ॐ सर्वकामनिवर्तकाय नमः । ८२० ।

ॐ सर्वकामफलोत्पत्तये नमः ।

ॐ सर्वकामफलप्रदाय नमः ।

ॐ सर्वकामफलैः पूज्याय नमः ।

ॐ सर्वकामफलाश्रयाय नमः ।

ॐ विश्वकर्मणे नमः ।

ॐ कृतात्मने नमः ।

ॐ कृतज्ञाय नमः ।

ॐ सर्वसाक्षिकाय नमः ।

ॐ सर्वारम्भपरित्यागिने नमः ।

ॐ जडोन्मत्तपिशाचवते नमः । ८३० ।

ॐ भिक्षवे नमः ।

ॐ भिक्षाकराय नमः ।

ॐ भीक्ष्णाहारिणे नमः ।

ॐ निराश्रमणे नमः ।

ॐ अकुलाय नमः ।

ॐ अनुकूलाय नमः ।

ॐ विकलाय नमः ।

ॐ अकलाय नमः ।

ॐ जटिलाय नमः ।

ॐ वनचारिणे नमः । ८४० ।

ॐ दण्डिने नमः ।

ॐ मुण्डिने नमः ।

ॐ गन्धिने नमः ।

ॐ देहधर्मविहीनात्मने नमः ।

ॐ एकाकिने नमः ।

ॐ सङ्गवर्जिताय नमः ।

ॐ आश्रमिणे नमः ।

ॐ अनाश्रमारम्भाय नमः ।

ॐ अनाचारिणे नमः ।

ॐ कर्मवर्जिताय नमः । ८५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ असन्देहिने नमः ।

ॐ सन्देहिने नमः ।

ॐ नकिञ्चनाय नमः

ॐ नृदेहिने नमः ।

ॐ देहशून्याय नमः ।

ॐ नाभाविने नमः ।

ॐ भावनिर्गताय नमः ।

ॐ नाब्रह्मणे नमः ।

ॐ परब्रह्मणे नमः ।

ॐ स्वयमेव निराकुलाय नमः । ८६० ।

ॐ अनघाय नमः ।

ॐ अगुरवे नमः ।

ॐ नाथनाथोत्तमाय नमः ।

ॐ गुरवे नमः ।

ॐ द्विभुजाय नमः ।

ॐ प्राकृताय नमः ।

ॐ जनकाय नमः ।

ॐ पितामहाय नमः ।

ॐ अनात्मने नमः ।

ॐ नचनानात्मने नमः । ८७० ।

ॐ नीतये नमः ।

ॐ नीतिमतां वराय नमः ।

ॐ सहजाय नमः ।

ॐ सदृशाय नमः ।

ॐ सिद्धाय नमः ।

ॐ एकाय नमः ।

ॐ चिन्मात्राय नमः ।

ॐ नकर्त्रे नमः ।

ॐ कर्त्रे नमः ।

ॐ भोक्त्रे नमः । ८८० ।

ॐ भोगविवर्जिताय नमः ।

ॐ तुरीयाय नमः ।

ॐ तुरीयातीताय नमः ।

ॐ स्वच्छाय नमः ।

ॐ सर्वमयाय नमः ।

ॐ सर्वाधिष्ठानरूपय नमः ।

ॐ सर्वध्येयविवर्जिताय नमः ।

ॐ सर्वलोकनिवासात्मने नमः ।

ॐ सकलोत्तमवन्दिताय नमः ।

ॐ देहभृते नमः । ८९० ।

ॐ देहकृते नमः ।

ॐ देहात्मने नमः ।

ॐ देहभावनाय नमः ।

ॐ देहिने नमः ।

ॐ देहविभक्ताय नमः ।

ॐ देहभावप्रकाशनाय नमः ।

ॐ लयस्थाय नमः ।

ॐ लयविदे नमः ।

ॐ लयभावाय नमः ।

ॐ बोधवते नमः । ९०० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ लयातीताय नमः ।

ॐ लयस्यान्ताय नमः ।

ॐ लयभावनिवारणाय नमः ।

ॐ विमुखाय नमः ।

ॐ प्रमुखाय नमः ।

ॐ प्रत्यङ्मुखवदाचारिणे नमः ।

ॐ विश्वभुजे नमः ।

ॐ विश्वघृषे नमः ।

ॐ विश्वाय नमः ।

ॐ विश्वक्षेमकराय नमः । ९१० ।

ॐ अविक्षिप्ताय नमः ।

ॐ अप्रमादिने नमः ।

ॐ परार्धये नमः ।

ॐ परमार्थदृशे नमः ।

ॐ स्वानुभवविहीनाय नमः ।

ॐ स्वानुभवप्रकाशनाय नमः ।

ॐ निरिन्द्रियाय नमः ।

ॐ निर्बुद्धये नमः ।

ॐ निराभासाय नमः ।

ॐ निराकृताय नमः । ९२० ।

ॐ निरहङ्काराय नमः ।

ॐ रूपात्मने नमः ।

ॐ निर्वपुषे नमः ।

ॐ सकलाश्रयाय नमः ।

ॐ शोकदुःखहराय नमः ।

ॐ भोगमोक्षफलप्रदाय नमः ।

ॐ सुप्रसन्नाय नमः ।

ॐ सूक्ष्माय नमः ।

ॐ शब्दब्रह्मार्थसंगृहाय नमः ।

ॐ आगमापाय शून्याय नमः । ९३० ।

ॐ स्थानदाय नमः ।

ॐ सताङ्गतये नमः ।

ॐ आकृताय नमः ।

ॐ सुकृताय नमः ।

ॐ कृतकर्मविनिर्वृताय नमः ।

ॐ भेदत्रयहराय नमः ।

ॐ देहत्रयविनिर्गताय नमः ।

ॐ सर्वकामप्रदाय नमः ।

ॐ सर्वकामनिवर्तकाय नमः ।

ॐ सिद्धेश्वराय नमः । ९४० ।

ॐ अजराय नमः ।

ॐ पञ्चबाणदर्पहुताशनाय नमः ।

ॐ चतुराक्षरबीजात्मने नमः ।

ॐ स्वभुवे नमः ।

ॐ चित्कीर्तिभूषणाय नमः ।

ॐ अगाधबुद्धये नमः ।

ॐ अक्षुब्धाय नमः ।

ॐ चन्द्रसूर्याग्निलोचनाय नमः ।

ॐ यमदंष्ट्राय नमः ।

ॐ अतिसंहर्त्रे नमः । ९५० ।

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम

ॐ परमानन्दसागराय नमः ।

ॐ लीलाविश्वम्भराय नमः ।

ॐ भानवे नमः ।

ॐ भैरवाय नमः ।

ॐ भीमलोचनाय नमः ।

ॐ ब्रह्मचर्माम्बराय नमः ।

ॐ कालाय नमः ।

ॐ अचलाय नमः ।

ॐ चलनान्तकाय नमः ।

ॐ आदिदेवाय नमः । ९६० ।

ॐ जगद्योनये नमः ।

ॐ वासवारि विमर्दनाय नमः ।

ॐ विकर्मकर्मकर्मज्ञाय नमः ।

ॐ अनन्य गमकाय नमः ।

ॐ अगमाय नमः ।

ॐ अबद्धकर्मशून्याय नमः ।

ॐ कामरागकुलक्षयाय नमः ।

ॐ योगान्धकारमथनाय नमः ।

ॐ पद्मजन्मादिवन्दिताय नमः ।

ॐ भक्तकामाय नमः । ९७० ।

ॐ अग्रजाय नमः ।

ॐ चक्रिणे नमः ।

ॐ भावनिर्भावकाय नमः ।

ॐ भेदाङ्काय नमः ।

ॐ महते नमः ।

ॐ अग्रगाय नमः ।

ॐ निगुहाय नमः ।

ॐ गोचरान्तकाय नमः ।

ॐ कालाग्निशमनाय नमः ।

ॐ शङ्खचक्रपद्मगदाधराय नमः । ९८० ।

ॐ दीप्ताय नमः ।

ॐ दीनपतये नमः ।

ॐ शास्त्रे नमः ।

ॐ स्वच्छन्दाय नमः ।

ॐ मुक्तिदायकाय नमः ।

ॐ व्योमधर्माम्बराय नमः ।

ॐ भेत्त्रे नमः ।

ॐ भस्मधारिणे नमः ।

ॐ धराधराय नमः ।

ॐ धर्मगुप्ताय नमः । ९९० ।

ॐ अन्वयात्मने नमः ।

ॐ व्यतिरेकार्थनिर्णयाय नमः ।

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ॐ एकोनेक गुणभासाभासनिर्भासवर्जिताय नमः ।

ॐ भावाभाव स्वभावात्मने नमः ।

ॐ भावाभाव विभावविदे नमः ।

ॐ योगीहृदयविश्रामाय नमः ।

ॐ अनन्तविद्याविवर्धनाय नमः ।

ॐ विघ्नान्तकाय नमः ।

ॐ त्रिकालज्ञाय नमः ।

ॐ तत्त्वात्मज्ञानसागराय नमः । १००० ।

॥ इति श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनाम सम्पूर्णम् ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ या अर्चन से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक/तांत्रिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्रनामावली की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे अद्वैत दर्शन और ‘दत्त-तत्व’ को समझने के लिए हमें त्रिदेव स्वरूप, अवधूत अवस्था, और सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

त्रिदेव स्वरूप और त्रिगुणातीत अवस्था (Beyond the Three Gunas)

भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एकाकार स्वरूप हैं। मनुष्य का जीवन तीन गुणों—सत्त्व (ज्ञान), रजस (कर्म/इच्छा), और तमस (अज्ञान/आलस्य)—से संचालित होता है। दत्तात्रेय के तीन सिर इन्हीं तीन गुणों पर उनके पूर्ण नियंत्रण के प्रतीक हैं। वे ‘त्रिगुणातीत’ (गुणों से परे) हैं। जब साधक ‘श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली’ के 1000 नामों का गान करता है, तो उसके भीतर का असंतुलन (जैसे अत्यधिक क्रोध, आलस्य या भटकाव) नष्ट हो जाता है और वह एक संतुलित, शांत व स्थिर अवस्था को प्राप्त करता है।

चार श्वान, कामधेनु और औदुंबर वृक्ष का रहस्य (Symbolism of Datta)

भगवान दत्त के साथ जो चार श्वान (कुत्ते) हैं, वे कोई साधारण पशु नहीं, बल्कि चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) हैं, जो यह दर्शाते हैं कि सर्वोच्च ज्ञान भगवान के चरणों में कुत्ते की भांति वफादार होकर रहता है। कामधेनु (गाय) यह दर्शाती है कि जो दत्त की शरण में है, उसकी लौकिक इच्छाएं स्वतः पूर्ण होती हैं। भगवान दत्त का निवास ‘औदुंबर’ (गूलर) वृक्ष के नीचे माना गया है, जो अमृत का प्रतीक है। सहस्रनामावली का पाठ साधक के जीवन में इसी वेदान्त ज्ञान और लौकिक ऐश्वर्य (कामधेनु) को एक साथ आकर्षित करता है।

‘सहस्रनाम’ का अद्भुत नाद-विज्ञान (Sound Vibrations of the Guru)

सनातन परंपरा में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता और शरीर के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र (सहस्रार चक्र) का प्रतीक माना जाता है। दत्तात्रेय के ये हज़ार नाम वास्तव में 1000 ‘गुरु-आवृत्तियां’ (Frequencies of the Supreme Master) हैं। जब साधक पूर्ण नाद (ध्वनि) के साथ इनका उच्चारण करता है, तो उसके आज्ञा चक्र (Third Eye) की ग्रंथियां खुल जाती हैं। यह नाद-विज्ञान साधक के आभामंडल (Aura) में एक अत्यंत तेजस्वी स्वर्णिम रंग का सुरक्षा-कवच बना देता है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति या अघोरी विद्या भेद नहीं सकती।

2. श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवान दत्तात्रेय साक्षात त्वरित रक्षा, अमोघ गुरु-कृपा, पितृ दोष निवारण, और परम शांति के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण निष्ठा, सात्विकता, पवित्रता, और एक निश्छल हृदय के साथ प्रतिदिन या गुरुवार के दिन इस नामावली का पाठ या अर्चन करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

पितृ दोष निवारण और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा (Pitru Dosha & Protection)

  • भयंकर पितृ दोष और वंश वृद्धि की बाधाओं का नाश: ज्योतिष और तंत्र शास्त्र में पितृ दोष (Ancestral Curses) के निवारण के लिए भगवान दत्तात्रेय की उपासना सर्वोच्च मानी गई है। यदि घर में अकारण बीमारियां हों, वंश वृद्धि रुकी हुई हो, या घर में हमेशा क्लेश रहता हो, तो दत्त सहस्रनाम का पाठ पीढ़ियों से चले आ रहे दोषों को तुरंत भस्म कर पितरों को मोक्ष प्रदान करता है।

  • काले जादू और तंत्र-मंत्र का अचूक विध्वंस: यदि किसी ने साधक या उसके परिवार पर भयंकर से भयंकर तांत्रिक क्रिया (Black Magic), मूठ-करणी, या बुरी नज़र का प्रयोग किया है, तो श्री दत्तात्रेय के 1000 नाम उसे पल भर में भस्म कर पलट (Revert) देते हैं। दत्तात्रेय भगवान तंत्र के भी अधिपति हैं; उनके साधक को दुनिया का कोई तांत्रिक नुकसान नहीं पहुँचा सकता।

  • अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से अजेय रक्षा: यह पाठ एक अभेद्य सुरक्षा कवच है। भगवान दत्त ‘स्मृतिगामी’ हैं, अर्थात् पुकारते ही आ जाते हैं। यह पाठ दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु के योग को टाल देता है।

मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Spiritual Evolution)

  • तनाव, डिप्रेशन और अज्ञात भय से मुक्ति: आधुनिक जीवन के भयंकर अवसाद (Depression), चिंता और अज्ञात डर को यह पाठ जड़ से मिटा देता है। साधक के हृदय में एक असीम शांति, वैराग्य और आत्मबल का संचार होता है।

  • सच्चे गुरु (मार्गदर्शक) की प्राप्ति: यदि जीवन में कोई सच्चा गुरु नहीं मिल रहा है, तो इस पाठ से स्वयं भगवान दत्तात्रेय सूक्ष्म रूप से साधक का मार्गदर्शन करते हैं या उसे किसी योग्य सद्गुरु तक पहुँचा देते हैं।

  • आत्मज्ञान और मोक्ष: यह पाठ साधक को जीवन्मुक्त कर देता है। सांसारिक कार्यों को करते हुए भी साधक भीतर से अवधूत (अनासक्त) बन जाता है।

आर्थिक, भौतिक और लौकिक लाभ (Wealth & Success)

  • घोर दरिद्रता और कर्जों (Debts) का अंत: भगवान दत्त के साथ कामधेनु सदैव रहती हैं। जो व्यक्ति भारी कर्जों के बोझ तले दब चुका है, इस पाठ से उसके लिए आय के अप्रत्याशित स्रोत खुल जाते हैं और वह शीघ्र ऋण-मुक्त हो जाता है।

  • नौकरी और व्यापार में अजेय सफलता: रुके हुए काम अचानक बनने लगते हैं। जो कार्य लंबे समय से अटके हों, वे गुरुदेव की कृपा से निर्विघ्न पूरे हो जाते हैं।

3. श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

भगवान दत्तात्रेय की उपासना अत्यंत सात्विक, शांत, क्षमाशील, और प्रेम से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध नामावली का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए दत्त संप्रदाय में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: भगवान दत्तात्रेय (जो साक्षात गुरु हैं) की आराधना के लिए गुरुवार (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माना जाता है।

  • विशेष तिथियां: दत्तात्रेय जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) का दिन इस साधना के लिए सर्वोच्च है। इसके अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, और किसी भी माह की पूर्णिमा या एकादशी के दिन इस सहस्रनामावली का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: दत्त साधना का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व 4 से 6 बजे के बीच) या ‘गोधूलि बेला / संध्याकाल’ (सूर्यास्त के समय) होता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), कुशा (Kusha grass), या सफेद आसन का प्रयोग करें। (पीला रंग गुरु और भगवान विष्णु का प्रतीक है)।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में पीले, श्वेत (सफेद), या भगवा रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

सामग्री / विधान विवरण
प्रतिमा / चित्र / यंत्र एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान श्री दत्तात्रेय (तीन सिर, छह हाथ, कामधेनु और श्वान के साथ) का अत्यंत सुंदर चित्र या पीतल की मूर्ति स्थापित करें। यदि घर के पास औदुंबर (गूलर) का वृक्ष हो, तो उसकी जड़ के पास बैठकर पाठ करना सबसे उत्तम है।
दीपक भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। चंदन, मोगरा, गुग्गुल या लोहबान की धूप जलाएं (गुग्गुल से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है)।
तिलक और भस्म भगवान को पीला चंदन (अष्टगंध), भस्म (Vibhuti), और हल्दी का तिलक लगाएं। स्वयं के मस्तक पर भी भस्म का त्रिपुंड और चंदन का तिलक धारण करें।
पुष्प और तुलसी/बिल्व उन्हें पीले पुष्प (गेंदा, चंपा) और श्वेत पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। भगवान दत्त को तुलसी दल और बिल्वपत्र दोनों एक साथ चढ़ाए जाते हैं (क्योंकि वे विष्णु और शिव दोनों हैं)।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ आरंभ करने से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (हल्दी से रंगे हुए), और एक पीला पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे परम गुरु भगवान दत्तात्रेय, मैं अपने जीवन से समस्त पितृ दोषों, तांत्रिक बाधाओं, रोगों व कर्जों के समूल नाश, अखंड सुख-शांति तथा आपकी अहैतुकी गुरु-कृपा के लिए श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली का 21/41 गुरुवार (या नित्य) पाठ और पुष्पार्चन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ”), और फिर जल को ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्रनामावली का पाठ और पुष्पार्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का मानसिक स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • नवनाथ (मच्छिन्द्रनाथ, गोरखनाथ आदि) और दत्त परंपरा के संतों (श्रीपाद श्रीवल्लभ, नृसिंह सरस्वती, स्वामी समर्थ, साईं बाबा) का मानसिक ध्यान करें।

  • दत्त महामंत्र “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” या “ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः” की कम से कम 11 बार या एक माला (रुद्राक्ष, स्फटिक या हल्दी की माला पर) अवश्य जपें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर और भीतर एक असीम शांति का अनुभव करते हुए ‘श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • सहस्रार्चन / पुष्पार्चन विधि (अचूक और चमत्कारिक उपाय): अत्यंत शीघ्र फल प्राप्ति (विशेषकर पितृ दोष शांति या संकट नाश) के लिए, नामावली का प्रयोग करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण (जैसे— ॐ दत्तात्रेयाय नमः, ॐ अनसूयासुताय नमः, ॐ दिगम्बराय नमः) के साथ भगवान के चित्र या मूर्ति पर एक पीला पुष्प, या पीले चंदन से रंगे अक्षत (चावल), या औदुंबर (गूलर) का पत्ता अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। घोर संकटों को नष्ट करने का यह अमोघ ब्रह्मास्त्र है।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

पाठ और अर्चन पूर्ण होने के बाद भगवान को अत्यंत सात्विक भोग लगाएं। भगवान दत्त को भिक्षा अत्यंत प्रिय है, इसलिए जो भी घर में शुद्ध बना हो (जैसे मीठी रोटी, पुरनपोली, बेसन के लड्डू, चने, या गाय के दूध की खीर), उसका भोग लगाएं। भोग में तुलसी पत्र अवश्य डालें। अंत में कर्पूर जलाकर भगवान की आरती गाएं। पूजा के अंत में हाथ जोड़कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

भगवान दत्तात्रेय साक्षात परब्रह्म और परम दयालु हैं, परंतु वे अवधूत भी हैं, अतः उनकी साधना में पवित्रता और सेवा भाव की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. श्वान (कुत्ते) और गौ माता की सेवा (The Absolute Datta Rule): यह दत्त साधना का सबसे बड़ा और अलंघनीय नियम है। यदि आप दत्तात्रेय सहस्रनामावली का पाठ कर रहे हैं, तो आपको प्रतिदिन या कम से कम गुरुवार को कुत्तों (Street Dogs) को रोटी/बिस्किट और गाय को चारा या रोटी अवश्य खिलानी चाहिए। जो व्यक्ति कुत्तों को मारता है, भगाता है या गाय का अपमान करता है, उसकी पूजा भगवान दत्त कभी स्वीकार नहीं करते।

  2. पूर्ण सात्विक जीवन और आहार (Absolute Sattvic Diet): अनुष्ठान की अवधि के दौरान साधक को घर में और अपने आहार में मांस (Meat), मदिरा (Alcohol), अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। तामसिक भोजन आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट कर देता है।

  3. अतिथियों और भिक्षुकों का सम्मान: भगवान दत्त कभी भी, किसी भी रूप में (विशेषकर भिक्षुक के रूप में) आपकी परीक्षा लेने आ सकते हैं। दरवाजे पर आए किसी भी भिखारी या अतिथि का कभी अपमान न करें, उसे भोजन अवश्य दें।

  4. कठोर ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): किसी विशेष मनोकामना के लिए अनुष्ठान (जैसे 21 या 41 दिन का संकल्प) के दौरान साधक को शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

  5. क्रोध और अहंकार का त्याग: ‘मैं’ (Ego) और क्रोध भक्ति के सबसे बड़े शत्रु हैं। स्वयं को भगवान दत्त का एक तुच्छ दास मानकर ही पाठ करें।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली एक अत्यंत जाग्रत और उच्च कोटि का स्तोत्र है, अतः इसकी साधना करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं:

  • सकाम या प्रतिशोध की भावना का निषेध (No Revenge Motive): यह स्तुति आपकी आध्यात्मिक उन्नति, सुख-शांति, पितृ दोष निवारण और संकटों से रक्षा के लिए है। किसी निर्दोष व्यक्ति का अकारण अहित करने, उसे नुकसान पहुँचाने, या अपना व्यक्तिगत ‘अहंकारी बदला’ लेने की नीयत से इसका पाठ भूलकर भी न करें। भगवान दत्त त्रिकालदर्शी हैं; गलत मंशा से किया गया पाठ साधक का ही पतन करेगा।

  • उच्चारण की शुद्धता (Purity of Pronunciation): सहस्रनामों में ध्वनि का विशेष महत्व है। संस्कृत के नामों का उच्चारण यथासंभव शुद्ध करने का प्रयास करें। यदि उच्चारण में थोड़ी भूल भी हो जाए, परंतु हृदय में ‘भाव’ सच्चा है, तो गुरुदेव उसे स्वीकार कर लेते हैं। ‘भाव’ सर्वोपरि है।

  • शारीरिक अपवित्रता का ध्यान: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अशुद्ध अवस्था (सूतक, पातक) में सहस्रनामावली की पुस्तक, भस्म, या भगवान की मूर्ति का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दिनों में इस पाठ और पूजा कक्ष से पूर्णतः दूर रहना चाहिए। वे उन दिनों में केवल ‘दिगंबरा दिगंबरा’ का मानसिक जप कर सकती हैं।

  • औदुंबर वृक्ष का सम्मान: गूलर (औदुंबर) के पेड़ के नीचे थूकना, मल-मूत्र त्यागना या उसकी लकड़ियाँ काटना दत्त संप्रदाय में महापाप माना जाता है। इस वृक्ष का सदैव सम्मान करें।

6. आधुनिक युग में श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘तनाव’ (Stress), ‘अस्थिरता’ (Instability), ‘स्वार्थ’, ‘रिश्तों के टूटने’ (Broken Relationships), और ‘गलाकाट प्रतिस्पर्धा’ का युग है। लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में दिन-रात भाग रहे हैं, लेकिन जीवन से ‘शांति’ (Peace), ‘धैर्य’ (Patience), और ‘संतोष’ पूरी तरह गायब हो चुके हैं।

आज के समय में इंसान ‘जेनरेशनल ट्रॉमा’ (Generational Trauma – जिसे शास्त्रों में पितृ दोष कहा जाता है) से जूझ रहा है। युवाओं में दिशाहीनता (Lack of Direction), करियर का तनाव, और सच्चे मार्गदर्शक (Mentor) का अभाव उन्हें डिप्रेशन (Depression) की ओर धकेल रहा है।

‘श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली’ आधुनिक इंसान के इन्हीं ‘मानसिक संकटों’, ‘पारिवारिक दोषों’, और ‘भटकाव’ का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Healing) है:

  1. मानसिक ‘बर्नआउट’ से बचाव (Mental Peace & Clarity): जब आप 1000 बार भगवान के नामों का गान करते हैं, तो आपका मस्तिष्क ओवरथिंकिंग (Overthinking) से मुक्त हो जाता है। दत्तात्रेय का ध्यान मन को ‘शून्य’ अवस्था (Zero state) में ले जाकर असीम शांति प्रदान करता है, जो आज के समय का सबसे बड़ा स्ट्रेस-बस्टर है।

  2. सच्चे मेंटर (Mentor / Guru) की प्राप्ति: आज हर युवा को करियर और जीवन में एक मेंटर की जरूरत है। भगवान दत्त ‘जगद्गुरु’ हैं। यह पाठ आपके जीवन में सही गुरु, सही विचार और सही लोगों (Right Network) को आकर्षित करता है, जो आपको सही रास्ता दिखाते हैं।

  3. जेनरेशनल ट्रॉमा (Ancestral Healing) का इलाज: वैज्ञानिक भी मानते हैं कि पूर्वजों के आघात (Trauma) डीएनए (DNA) के माध्यम से पीढ़ियों में आते हैं। पितृ दोष शांति का यह पाठ आपके अवचेतन मन और पारिवारिक ऊर्जा से इस नकारात्मक ‘ट्रॉमा’ को डी-प्रोग्राम (De-program) कर देता है।

  4. समभाव और प्रकृति से जुड़ाव (Connecting with Nature): दत्त भगवान के साथ कुत्ते और गाय का होना आधुनिक मनुष्य को यह सिखाता है कि पर्यावरण, जीव-जंतुओं और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर ही सच्चा सुख पाया जा सकता है। यह पाठ हमें डिप्रेशन से निकालकर करुणा (Compassion) से भर देता है।

Shrimad Dattatreya Sahasranamavali (श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस परब्रह्म अवधूत, अकारण करुणा के सागर, और त्रिमूर्ति के साक्षात वांग्मय (नाद) स्वरूप है, जिसके एक स्मरण मात्र से तीनों लोकों के संकट टल जाते हैं। जब एक साधक अपने सारे लौकिक ज्ञान, अहंकार, चिंताओं और प्रारब्ध को त्यागकर, एक अबोध शिष्य की भांति पूर्ण शरणागति के साथ इस नामावली को गुरुदेव के चरणों में (पीले पुष्पों के माध्यम से) समर्पित करता है, तो भगवान दत्तात्रेय उसके जीवन की नैया को स्वयं पार लगा देते हैं।

भगवान श्री दत्तात्रेय अत्यंत कृपालु, भक्त-वत्सल, और अपने निश्छल भक्तों के लिए परम दयामयी और संकट-मोचक गुरु हैं। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के भौतिक संघर्षों में पूरी तरह टूट चुके हैं, भयंकर विपत्तियों या कर्जों ने आपको घेर लिया है, पितृ दोष के कारण घर में कलह है, या आपका मन अत्यंत अशांत है, तो गुरुवार की सुबह पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक प्रज्वलित करें, और गुरुसत्ता को साक्षी मानकर पूर्ण निर्भयता व असीम प्रेम के साथ इस महास्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘गुरुदेव दत्त’ को पुकारें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि दत्तात्रेय भगवान के इन पावन 1000 नामों के नाद ने आपके जीवन की सारी बाधाओं, तंत्र-मंत्र, और भयों को भस्म कर दिया है, और साक्षात त्रिदेवों ने आपके जीवन को अपार सफलता, अदम्य साहस, पारिवारिक सुख, और परम शांति के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा! अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त!

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावलीः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्रीमद दत्तात्रेय सहस्रनामावली ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एकाकार स्वरूप, आदि-गुरु भगवान दत्तात्रेय के 1000 परम पवित्र, जाग्रत और शक्तिशाली नामों का एक सिद्ध वैदिक/तांत्रिक संकलन है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगता है)। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह नामावली जीवन के भयंकर संकटों, पीढ़ियों से चले आ रहे पितृ दोषों, काले जादू (Tantra-Mantra) को जड़ से समाप्त कर साधक को अभेद्य सुरक्षा, मानसिक शांति और गुरु-कृपा प्रदान करती है।

2. इस सहस्रनामावली का पाठ या ‘पुष्पार्चन’ करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ मिलता है?

इस नामावली का सबसे प्रत्यक्ष और त्वरित लाभ ‘भयंकर पितृ दोष (Ancestral Curses) और वंश वृद्धि की बाधाओं का समूल नाश’, ‘काले जादू व बुरी शक्तियों से तुरंत रक्षा’, और ‘भारी कर्जों (Debts) से मुक्ति’ है। इसके नियमित पाठ और पीले पुष्पों के अर्चन से साधक को एक सच्चे गुरु (मार्गदर्शक) की प्राप्ति होती है, और घर में हमेशा सुख-शांति व ऐश्वर्य (कामधेनु) का वास रहता है।

3. क्या एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति (परिवार वाला) भगवान दत्तात्रेय की साधना कर सकता है?

जी हाँ, बिल्कुल! भगवान दत्तात्रेय अवधूत होने के साथ-साथ गृहस्थों के परम रक्षक भी हैं। एक गृहस्थ व्यक्ति इस नामावली का पाठ पूर्ण रूप से कर सकता है। इसके लिए केवल ‘पूर्ण सात्विकता’ (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का त्याग) और ‘पवित्रता’ का आचरण आवश्यक है। भगवान दत्त की पूजा में कोई उग्र नियम नहीं होते, यहाँ केवल हृदय का सच्चा ‘भाव’, ‘समर्पण’ और जीवों के प्रति दया देखी जाती है।

4. भगवान दत्तात्रेय की आराधना के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?

भगवान दत्तात्रेय (जो साक्षात परम गुरु हैं) की आराधना के लिए ‘गुरुवार’ (Thursday) का दिन सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माना जाता है। दत्तात्रेय जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), गुरु पूर्णिमा, और किसी भी माह की पूर्णिमा/एकादशी के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व 4 से 6 बजे) या ‘गोधूलि बेला’ (सूर्यास्त के समय) पीले या श्वेत वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना सर्वाधिक उत्तम है।

5. श्री दत्तात्रेय सहस्रनामावली की इस साधना को करते समय सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम क्या है?

इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम ‘श्वान (कुत्तों) और गौ माता को भोजन कराना’ है। भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते (चार वेद) और एक गाय (कामधेनु) सदैव रहते हैं। जो व्यक्ति कुत्तों को मारता है या गाय का अपमान करता है, उसकी दत्त पूजा कभी स्वीकार नहीं होती। इसके अतिरिक्त, दरवाजे पर आए किसी भी भिखारी/अतिथि का अपमान न करना, और अनुष्ठान के दौरान पूर्ण सात्विकता व ब्रह्मचर्य का पालन करना इस साधना के मूलभूत सिद्धांत हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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