सनातन धर्म, वेदान्त दर्शन, और उपनिषदों के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब बात जीवन के चरम सत्य को जानने, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के बीच का भेद समझने, मोह-माया के अंधकार को मिटाने, और निष्काम कर्म (Action without attachment) की आती है, तो श्रीमद भगवद्गीता (Srimad Bhagavad Gita) का स्मरण सर्वोपरि है। महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब महान योद्धा अर्जुन मोह, शोक और विषाद से घिरकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं, तब उनके सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जो ब्रह्मांडीय ज्ञान देते हैं, वही गीता है।
गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह जीवन जीने की सर्वोच्च कला है। कहा जाता है कि सभी उपनिषद गाएं हैं, भगवान श्रीकृष्ण उन्हें दुहने वाले ग्वाले हैं, अर्जुन बछड़ा हैं, और गीता का ज्ञान उस दूध के समान है, जिसे पीकर मनुष्य अमर (मोक्ष प्राप्त) हो जाता है।
मनुष्य का जीवन कई बार अर्जुन की भांति ही गहरे विषाद, निर्णय न ले पाने की अक्षमता (Confusion), डिप्रेशन, पारिवारिक और व्यावसायिक धर्म-संकटों, और भविष्य के भयों से घिर जाता है। जब हर ओर से निराशा हाथ लगने लगे, सही और गलत का भेद मिट जाए, और जीवन रूपी युद्ध में हार सामने दिखने लगे, तब भगवद्गीता की शरण में जाना साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण को अपना सारथी बना लेने के समान है।
श्रीमद भगवद्गीता की इसी अजेय ऊर्जा, भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप की अनुभूति, और गीता के 18 अध्यायों के सार को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध ऋषियों और वैष्णव आचार्यों ने इसके मर्म को एक हज़ार (1000) परम पवित्र, जाग्रत और कल्याणकारी नामों में संकलित किया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली’ (Srimad Bhagavadgita Sahasranamavali) के नाम से जाना जाता है।
‘सहस्रनामावली’ का अर्थ है— एक हज़ार नामों की वह दिव्य श्रृंखला जिसका उपयोग भगवान (या ग्रंथ स्वरूप परब्रह्म) के अर्चन (पूजा, पुष्प या तुलसी अर्पित करने) और नाम-जप के लिए किया जाता है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगाया जाता है)। यह कोई साधारण स्तुति नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत नाद-ब्रह्म है, जो गीता के 700 श्लोकों की पूरी ऊर्जा को एक साथ साधक के रोम-रोम में प्रवाहित कर देता है, और उसके जीवन के भयंकर से भयंकर मानसिक संतापों और कर्म बंधनों को पल भर में भस्म कर देता है।
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली हिंदी | Srimad Bhagavadgita Sahasranamavali
॥ श्रीः ॥
ॐ परमात्मने नमः
ॐ धर्मक्षेत्राय नमः ।
ॐ कुरुक्षेत्राय नमः ।
ॐ युयुत्सवे नमः ।
ॐ पाण्डुपुत्राचार्याय नमः ।
ॐ धीमते नमः ।
ॐ शूराय नमः ।
ॐ महेष्वासाय नमः ।
ॐ महारथाय नमः ।
ॐ वीर्यवते नमः । १०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ विक्रान्ताय नमः ।
ॐ उत्तमौजसे नमः ।
ॐ भीष्माय नमः ।
ॐ समितिञ्जयाय नमः ।
ॐ नानाशस्त्रप्रहरणाय नमः ।
ॐ युद्धविशारदाय नमः ।
ॐ महास्यन्दनस्थिताय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ पाञ्चजन्याय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः । २०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ भीमकर्मणे नमः ।
ॐ अनन्तविजयाय नमः ।
ॐ परमेष्वासाय नमः ।
ॐ अपराजिताय नमः ।
ॐ महाबाहवे नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ गुडाकेशरथस्थापकाय नमः ।
ॐ पार्थप्रदर्शकाय नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ केशवाय नमः । ३०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ वार्ष्णेयाय नमः ।
ॐ अर्जुनविषादहर्त्रे नमः ।
ॐ भगवते नमः ।
ॐ परन्तपाय नमः ।
ॐ पूजार्हाय नमः ।
ॐ अरिसूदनाय नमः ।
ॐ महानुभावाय नमः । ४०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ प्रपन्नशासकाय नमः ।
ॐ गीतावतारकाय नमः ।
ॐ आत्मतत्त्वनिरूपकाय नमः ।
ॐ धीराय नमः ।
ॐ मात्रास्पर्शविवेचकाय नमः ।
ॐ विषयाव्यथिताय नमः ।
ॐ पुरुषर्षभाय नमः ।
ॐ समदुःखसुखाय नमः ।
ॐ अमृताय नमः ।
ॐ सते नमः । ५०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ सदसद्विभाजकाय नमः ।
ॐ सदसद्विदे नमः ।
ॐ तत्त्वदर्शिने नमः ।
ॐ अविनाशिने नमः ।
ॐ अविनाश्याय नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ सर्वशरीरिणे नमः ।
ॐ नित्याय नमः ।
ॐ अप्रमेयाय नमः ।
ॐ अहन्त्रे नमः । ६०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ अहताय नमः ।
ॐ अविज्ञाताय नमः ।
ॐ अजाय नमः ।
ॐ शाश्वताय नमः ।
ॐ पुराणाय नमः ।
ॐ अच्छेद्याय नमः ।
ॐ अदाह्याय नमः ।
ॐ अक्लेद्याय नमः ।
ॐ अशोष्याय नमः ।
ॐ सर्वगताय नमः । ७०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ स्थाणवे नमः ।
ॐ अचलाय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ अचिन्त्याय नमः ।
ॐ अविकार्याय नमः ।
ॐ अशोच्याय नमः ।
ॐ जन्ममृत्युरहिताय नमः ।
ॐ व्यक्ताव्यक्तभूतविदे नमः ।
ॐ आश्चर्यवद्दृश्याय नमः । ८०
श्रीमद भगवद्गीता सूक्तं
ॐ आश्चर्यवदुदिताय नमः ।
ॐ आश्चर्यवच्छ्रुताय नमः ।
ॐ श्रवणादिवेद्याय नमः ।
ॐ सर्वदेहव्यापिने नमः ।
ॐ अवध्याय नमः ।
ॐ क्षत्त्रधर्मनियामकाय नमः ।
ॐ क्षत्त्रयुद्धप्रशंसिने नमः ।
ॐ स्वधर्मत्यागगर्हिणे नमः ।
ॐ अकीर्तिनिन्दकाय नमः ।
ॐ सम्भाविताय नमः । ९०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ बहुमताय नमः ।
ॐ समलाभालाभाय नमः ।
ॐ समजयाजयाय नमः ।
ॐ साङ्ख्ययोगप्रवक्त्रे नमः ।
ॐ कर्मयोगप्रशंसिने नमः ।
ॐ व्यवसायिने नमः ।
ॐ अव्यवसायिविनिन्दकाय नमः ।
ॐ विपश्चिते नमः ।
ॐ वेदवादपरविदूराय नमः ।
ॐ व्यवसायबुद्धिविधायिने नमः । १००।
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ निस्त्रैगुण्याय नमः ।
ॐ निर्द्वन्द्वाय नमः ।
ॐ नित्यसत्त्वस्थाय नमः ।
ॐ निर्योगक्षेमाय नमः ।
ॐ आत्मवते नमः ।
ॐ विज्ञानफलप्रवक्त्रे नमः ।
ॐ कर्माधिकारबोधकाय नमः ।
ॐ फलसङ्गगर्हिणे नमः ।
ॐ योगस्थाय नमः ।
ॐ त्यक्तसहाय नमः । ११०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ सिद्ध्यसिद्धिसमाय नमः ।
ॐ योगविदे नमः ।
ॐ योगबुद्धिनिरताय नमः ।
ॐ प्रहीणसुकृतदुष्कृताय नमः ।
ॐ योगिप्रशंसिने नमः ।
ॐ मनीषिणे नमः ।
ॐ जन्मबन्धविनिर्मुक्ताय नमः ।
ॐ अनामयपदाय नमः ।
ॐ व्यतितीर्णमोहाय नमः ।
ॐ श्रुतश्रोतव्यनिर्विण्णाय नमः । १२०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ स्थितबुद्धये नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ स्थितप्रज्ञप्रबोधिने नमः ।
ॐ त्यक्तकामाय नमः ।
ॐ आत्मतुष्टाय नमः ।
ॐ स्थितप्रज्ञाय नमः ।
ॐ अनुद्विज्ञाय नमः ।
ॐ विगतस्पृहाय नमः ।
ॐ वीतरागाय नमः । १३०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ वीतभयाय नमः ।
ॐ वीतक्रोधाय नमः ।
ॐ स्थितधिये नमः ।
ॐ मुनये नमः ।
ॐ सर्वाभिस्नेहरहिताय नमः ।
ॐ शुभानभिनन्दिने नमः ।
ॐ अशुभद्वेषरहिताय नमः ।
ॐ संहृतसर्वेन्द्रियाय नमः ।
ॐ प्रतिष्ठितप्रज्ञाय नमः ।
ॐ विनिवृत्तविषयाय नमः । १४०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ निराहाराय नमः ।
ॐ अदुःखाय नमः ।
ॐ प्रसन्नचेतसे नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ सुखिने नमः ।
ॐ निगृहीतमनसे नमः ।
ॐ अहृतप्रज्ञाय नमः ।
ॐ योगफलप्रकाशकाय नमः ।
ॐ रसवर्जिताय नमः ।
ॐ विपश्चिते नमः । १५०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ संयतेन्द्रियाय नमः ।
ॐ युक्ताय नमः ।
ॐ विषयध्यानदूषणाय नमः ।
ॐ अरागविषयसेविने नमः ।
ॐ वश्येन्द्रियाय नमः ।
ॐ प्रसन्नाय नमः ।
ॐ विधेयात्मने नमः ।
ॐ संयमिने नमः ।
ॐ सर्वभूतनिशाजागराय नमः ।
ॐ विषयानिशानिद्राणाय नमः । १६०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ आपूर्यमाणाय नमः ।
ॐ अचलप्रतिष्ठाय नमः ।
ॐ समुद्रसदृशाय नमः ।
ॐ अकामिने नमः ।
ॐ विलीनसर्वकामाय नमः ।
ॐ निर्ममाय नमः ।
ॐ निरहङ्काराय नमः ।
ॐ ब्रह्मनिष्ठाय नमः ।
ॐ ब्रह्मनिष्ठानिबर्हणाय नमः ।
ॐ ब्रह्मणे नमः । १७०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ निर्वाणाय नमः ।
ॐ ज्ञानज्यायसे नमः ।
ॐ पार्थप्रार्थितनिर्णयाय नमः ।
ॐ मोहध्वंसिने नमः ।
ॐ अनघाय नमः ।
ॐ नैष्कर्म्यनिर्णेत्रे नमः ।
ॐ सिद्धिमार्गविधायिने नमः ।
ॐ प्रकृतिकारितकर्मणे नमः ।
ॐ अकर्मकृते नमः ।
ॐ विषयध्यायिविगर्हणाय नमः । १८०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ मिथ्याचारविदे नमः ।
ॐ नियतमनसे नमः ।
ॐ नियतधीन्द्रियाय नमः ।
ॐ कर्मयोगिनिर्णायकाय नमः ।
ॐ अकर्मर्हकाय नमः ।
ॐ कर्मबन्धविवेचकाय नमः ।
ॐ यज्ञकर्मविधायिने नमः ।
ॐ यज्ञसृजे नमः ।
ॐ प्रजापतये नमः ।
ॐ इष्टकामदुहे नमः । १९०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ कर्माराध्यदेवाय नमः ।
ॐ कर्मफलदाय नमः ।
ॐ यज्ञभाविताय नमः ।
ॐ स्तेननिवेदिने नमः ।
ॐ यज्ञशिष्टाशिशंसिने नमः ।
ॐ अघभोजिबोधकाय नमः ।
ॐ कर्मचक्रप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ ब्रह्मोद्भवाय नमः ।
ॐ ब्रह्मप्रतिष्ठाबोधकाय नमः ।
ॐ मोघजीविविवेचकाय नमः । २००।
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ आत्मरतये नमः ।
ॐ आत्मतृप्ताय नमः ।
ॐ आत्मसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ कार्यरहिताय नमः ।
ॐ कार्याकार्यार्थहीनाय नमः ।
ॐ अकृतानार्थरहिताय नमः ।
ॐ अर्थव्यपाश्रयवर्जिताय नमः ।
ॐ कर्मकृते नमः ।
ॐ कर्मासङ्गहीनाय नमः ।
ॐ असङ्गकर्मशंसिने नमः । २१०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ अनेकादिकर्माराधिताय नमः ।
ॐ लोकसङ्ग्रहविधायिने नमः ।
ॐ श्रेष्ठाय नमः ।
ॐ लोकप्रमाणाय नमः ।
ॐ अवाप्तव्यरहिताय नमः ।
ॐ अतन्द्रिताय नमः ।
ॐ मनुष्यानुवर्तिताय नमः ।
ॐ लोकानुत्सादहेतवे नमः ।
ॐ असङ्करकारिणे नमः ।
ॐ प्रजोपघातप्रभीताय नमः । २२०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ विद्वत्कर्मविधायिने नमः ।
ॐ बुद्धिभेदपरिहर्त्रे नमः ।
ॐ कर्मजोषकाय नमः ।
ॐ विदुषे नमः ।
ॐ कर्मकर्तृबोधिने नमः ।
ॐ अहङ्कारनिरीहाय नमः ।
ॐ अकर्त्रे नमः ।
ॐ गुणकर्मविभागविदे नमः ।
ॐ गुणसङ्गवर्जिताय नमः ।
ॐ कृत्स्नविदे नमः । २३०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ कृत्स्नविदविचालकाय नमः ।
ॐ संन्यस्तसर्वकर्मणे नमः ।
ॐ निराशिषे नमः ।
ॐ विगतज्वराय नमः ।
ॐ स्वकर्मानुष्ठायिशंसिने नमः ।
ॐ अनसूयवे नमः ।
ॐ अननुष्ठायिनिन्दकाय नमः ।
ॐ प्रकृतिप्राबल्यविदे नमः ।
ॐ रागद्वेषावंशवदाय नमः ।
ॐ अपरिपन्थिने नमः । २४०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ स्वधर्मश्लाघिने नमः ।
ॐ परधर्मभीताय नमः ।
ॐ अजाय नमः ।
ॐ अव्ययात्मने नमः ।
ॐ भूतेश्वराय नमः ।
ॐ मायाधिष्ठात्रे नमः ।
ॐ मायामयसंभवाय नमः ।
ॐ धर्मग्लानिभिदे नमः ।
ॐ अधर्मोत्थित्यसहनाय नमः ।
ॐ साधुपरत्राणपराय नमः । २५०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ पापहेतुविदे नमः ।
ॐ ज्ञानवैरिविबोधकाय नमः ।
ॐ कामाधिष्ठानवेदिने नमः ।
ॐ कामप्रहाणबोधिने नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ आदियोगविदे नमः ।
ॐ योगपरम्पराप्रवक्त्रे नमः ।
ॐ भक्तप्रियाय नमः ।
ॐ बहुजन्मविदे नमः ।
ॐ दुष्कृद्विनाशनाय नमः । २६०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ धर्मसंस्थापकाय नमः ।
ॐ दिव्यजन्मने नमः ।
ॐ दिव्यकर्मणे नमः ।
ॐ तत्त्वविद्गम्याय नमः ।
ॐ प्रपन्नानुरूपफलदाय नमः ।
ॐ सर्वप्रकारप्रपन्नाय नमः ।
ॐ चातुर्वर्ण्यविधायिने नमः ।
ॐ गुणकर्मविभाजकाय नमः ।
ॐ कर्त्रे नमः ।
ॐ अकर्त्रे नमः । २७०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ कर्मालिप्ताय नमः ।
ॐ फलस्पृहाहीनाय नमः ।
ॐ कर्माकर्मविकर्मविदे नमः ।
ॐ कर्मज्ञशंसिने नमः ।
ॐ कामादिहीनसमारम्भाय नमः ।
ॐ ज्ञानाग्निदग्धकर्मणे नमः ।
ॐ फलसङ्गत्यागिने नमः ।
ॐ नित्यतृप्ताय नमः ।
ॐ निराश्रयाय नमः ।
ॐ अकिञ्चित्कराय नमः । २८०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ यतचित्ताय नमः ।
ॐ यतात्मने नमः ।
ॐ त्यक्तसर्वपरिग्रहाय नमः ।
ॐ अकिल्बिषाय नमः ।
ॐ लब्धसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ द्वन्द्वातीताय नमः ।
ॐ विमत्सराय नमः ।
ॐ गतसङ्गाय नमः ।
ॐ मुक्ताय नमः ।
ॐ ज्ञानावस्थितचेतसे नमः । २९०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ यज्ञाय नमः ।
ॐ अग्नये नमः ।
ॐ हुताय नमः ।
ॐ दैवयज्ञाराध्याय नमः ।
ॐ यज्ञोपहुतयज्ञाग्नये नमः ।
ॐ संयमाग्निहुतेन्द्रियाय नमः ।
ॐ इन्द्रियाग्निहुतविषयाय नमः ।
ॐ संयमाग्निहुतसर्वकर्मणे नमः ।
ॐ द्रव्यतपोयोगयज्ञगम्याय नमः ।
ॐ स्वाध्यायज्ञानयज्ञवेद्याय नमः । ३००।
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ संशितव्रतयतिप्रपन्नाय नमः ।
ॐ प्राणायामपरप्रणयिने नमः ।
ॐ यज्ञगम्यब्रह्मणे नमः ।
ॐ अयज्ञगर्हिणे नमः ।
ॐ यज्ञज्ञानशंसिने नमः ।
ॐ ज्ञानयज्ञपराय नमः ।
ॐ ज्ञानसम्पातिसर्वकर्मणे नमः ।
ॐ ज्ञानोपायप्रदर्शकाय नमः ।
ॐ तत्त्वदर्शिने नमः ।
ॐ ज्ञानविधूतमोहाय नमः । ३१०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ ब्रह्मात्मदृष्टसर्वभूताय नमः ।
ॐ ज्ञानप्लवसन्तीर्णसर्वपापाय नमः ।
ॐ ज्ञानाग्निदग्धकर्मणे नमः ।
ॐ योगसंसिद्धाय नमः ।
ॐ पवित्रतमज्ञानवेद्याय नमः ।
ॐ ज्ञानाधिगतपरशमयाय नमः ।
ॐ श्रद्धासंयमवेद्याय नमः ।
ॐ संशयात्मगर्हिणे नमः ।
ॐ योगसंन्यस्तकर्मणे नमः ।
ॐ ज्ञानसंच्छिन्नसंशयाय नमः । ३२०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ आत्मवते नमः ।
ॐ कर्मानिबद्धाय नमः ।
ॐ संशयच्छेदिने नमः ।
ॐ योगाचार्याय नमः ।
ॐ भारतोत्थापकाय नमः ।
ॐ कर्मयोगप्रियाय नमः ।
ॐ समसाङ्ख्यायोगाय नमः ।
ॐ योगज्ञशंसिने नमः ।
ॐ योगगम्यसंन्यासविदे नमः ।
ॐ विशुद्धात्मने नमः । ३३०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ विजितात्मने नमः ।
ॐ सर्वभूतात्मने नमः ।
ॐ कर्मलेपरहिताय नमः ।
ॐ अकर्त्रात्मविदे नमः ।
ॐ इन्द्रियार्थवृत्तिसाक्षिणे नमः ।
ॐ त्यक्तसङ्गहितकर्मणे नमः ।
ॐ पापालिप्ताय नमः ।
ॐ असङ्गकर्मशुद्धात्मने नमः ।
ॐ शान्तिनिष्ठापराय नमः ।
ॐ संन्यस्तसर्वकर्मणे नमः । ३४०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ अकुर्वते नमः ।
ॐ अकारयते नमः ।
ॐ देहिने नमः ।
ॐ सर्वत्रसमदर्शिने नमः ।
ॐ साम्यस्थितमानसे नमः ।
ॐ जितसर्गाय नमः ।
ॐ ब्रह्मनिष्ठाय नमः ।
ॐ प्रियप्राप्त्यप्रहृष्टाय नमः ।
ॐ अप्रियप्राप्त्यनुद्विग्नाय नमः ।
ॐ स्थिरबुद्धये नमः । ३५०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ असंमूढाय नमः ।
ॐ ब्रह्मविदे नमः ।
ॐ स्वभावप्रवर्तितकर्मफलाय नमः ।
ॐ अनात्तसुकृतदुष्कृताय नमः ।
ॐ मुग्धजन्तुविकल्पिताय नमः ।
ॐ ज्ञाननाशिताज्ञानात्मप्रकाराय नमः ।
ॐ तद्बुद्ध्यादिगम्याय नमः ।
ॐ तदात्मगम्याय नमः ।
ॐ तत्परायणगम्याय नमः ।
ॐ ज्ञाननिर्धूतकल्मषाय नमः । ३६०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ ह्यस्पर्शासक्तात्मने नमः ।
ॐ आत्मविदे नमः ।
ॐ ब्रह्मयोगयुक्तात्मने नमः ।
ॐ अक्षय्यसुखविदे नमः ।
ॐ संस्पर्शसुखानाहृताय नमः ।
ॐ बुधाय नमः ।
ॐ कामादिवेगसहिष्णवे नमः ।
ॐ सुखिने नमः ।
ॐ अन्तस्सुखाय नमः ।
ॐ अन्तरारामाय नमः । ३७०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ अन्तर्ज्योतिषे नमः ।
ॐ अधिगतब्रह्मनिर्वाणाय नमः ।
ॐ छिन्नद्वैधाय नमः ।
ॐ यतात्मने नमः ।
ॐ सर्वभूतहितरताय नमः ।
ॐ विदितात्मने नमः ।
ॐ समाधिगम्याय नमः ।
ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः ।
ॐ तपोभोक्त्रे नमः ।
ॐ सर्वलोकमहेश्वराय नमः । ३८०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ सर्वभूतसुहृदये नमः ।
ॐ शान्तिदाय नमः ।
ॐ कर्मसंन्यसिशंसिने नमः ।
ॐ संन्यस्तसङ्कल्पाय नमः ।
ॐ आरुरुक्षूपायबोधकाय नमः ।
ॐ योगारूढशमविधायिने नमः ।
ॐ योगारूढलक्षकाय नमः ।
ॐ आत्मोद्धारबन्धुज्ञाय नमः ।
ॐ अनात्मशत्रुशंसकाय नमः ।
ॐ जितात्मने नमः । ३९०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ प्रशान्ताय नमः ।
ॐ शीतोष्णादिसमाहितात्मने नमः ।
ॐ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मने नमः ।
ॐ कूटस्थाय नमः ।
ॐ समलोष्टाश्मकाञ्चनाय नमः ।
ॐ सुहृदादिसमबुद्धये नमः ।
ॐ समबुद्धिशंसिनेयोगस्थानविधायिने नमः ।
ॐ एकाकिने नमः ।
ॐ अपरिग्रहाय नमः ।
ॐ योगासनसन्दर्शकाय नमः । ४००।
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ योगफलविदे नमः ।
ॐ संयमप्रकारप्रकटनाय नमः ।
ॐ योगिगम्यसंस्थात्मने नमः ।
ॐ योगियात्राव्याहर्त्रे नमः ।
ॐ युक्तलक्षकाय नमः ।
ॐ योगपरभूमिकानिगादकाय नमः ।
ॐ विषयोपरतिविधायिने नमः ।
ॐ योगिप्राप्यपरसुखाय नमः ।
ॐ सर्वभूतस्थात्मदर्शिने नमः ।
ॐ आत्मस्थसर्वदर्शिने नमः । ४१०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ विद्वत्सन्निहिताय नमः ।
ॐ विद्ववदवियुक्ताय नमः ।
ॐ परमयोगिधर्मज्ञाय नमः ।
ॐ मनोनिग्रहमार्गविदे नमः ।
ॐ योगभ्रष्टगतिविदे नमः ।
ॐ कल्याणारम्भशंसिने नमः ।
ॐ लोकद्वायानुगृहीतयोगभ्रष्टाय नमः ।
ॐ अभ्यासफलप्रापकाय नमः ।
ॐ अनेकजन्मयोगगम्याय नमः ।
ॐ योगफलसमाप्तिभूमये नमः । ४२०
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली
ॐ परापरप्रकृत्यधिष्ठात्रे नमः ।
ॐ जगज्जन्मादिहेतवे नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ सर्वाधिष्ठानाय नमः ।
ॐ रसाय नमः ।
ॐ शशिसूर्यप्रभात्मने नमः ।
ॐ प्रणवात्मने नमः ।
ॐ शब्दात्मने नमः ।
ॐ पौरुषात्मने नमः ।
ॐ पुण्यगन्धात्मने नमः । ४३०
ॐ तेजसे नमः ।
ॐ जीवनाय नमः ।
ॐ तपसे नमः ।
ॐ सनातनबीजाय नमः ।
ॐ बुद्धये नमः ।
ॐ कामादिवर्जितबलाय नमः ।
ॐ धर्माविरुद्धकामाय नमः ।
ॐ सर्वभावाधिष्ठात्रे नमः ।
ॐ सर्वभावास्पृष्टाय नमः ।
ॐ सर्वजगदज्ञाताय नमः । ४४०
ॐ दुरत्ययमायिने नमः ।
ॐ प्रपन्नतीर्णमायाय नमः ।
ॐ नराधमाप्रपन्नाय नमः ।
ॐ बहुजन्मप्राप्यज्ञानगम्याय नमः ।
ॐ सुदुर्लभमहात्मवेद्याय नमः ।
ॐ प्रकृतिनियतार्थितदेवाय नमः ।
ॐ भक्तश्रद्धाविधायिने नमः ।
ॐ कर्मफलविधात्रे नमः ।
ॐ भक्तगम्याय नमः ।
ॐ अबुद्ध्यविदिताय नमः । ४५०
ॐ आतीतातिविदे नमः ।
ॐ अपापसेव्याय नमः ।
ॐ आर्तजनाश्रयाय नमः ।
ॐ जिज्ञासुसेविताय नमः ।
ॐ अर्थार्थिप्रार्थिताय नमः ।
ॐ ज्ञानिजनाविनाभूताय नमः ।
ॐ ज्ञानिप्रियाय नमः ।
ॐ प्रियज्ञानिने नमः ।
ॐ ज्ञानिरूपाय नमः ।
ॐ ज्ञान्यास्थितोत्तमगतये नमः । ४६०
ॐ युक्तचेतोविदिताय नमः ।
ॐ अक्षरब्रह्मणे नमः ।
ॐ अध्यात्मादिविदे नमः ।
ॐ अधियज्ञाय नमः ।
ॐ प्रयाणकालस्मृतिप्राप्याय नमः ।
ॐ सर्वकालस्मर्तव्याय नमः ।
ॐ कवये नमः ।
ॐ अनुशासित्रे नमः ।
ॐ अणोरणीयसे नमः ।
ॐ सर्वधात्रे नमः । ४७०
ॐ अचिन्त्यरूपाय नमः ।
ॐ आदित्यवर्णाय नमः ।
ॐ तमसःपरस्मै नमः ।
ॐ योगबलप्राप्याय नमः ।
ॐ वेदविदुतिताय नमः ।
ॐ वीतरागगम्याय नमः ।
ॐ ब्रह्मचर्यवरणीयाय नमः ।
ॐ ओंकारगम्याय नमः ।
ॐ योगिसुलभाय नमः ।
ॐ अनन्यचेतःसुलभाय नमः । ४८०
ॐ अपुनरावृत्तिपदाय नमः ।
ॐ अव्यक्तसनातनभावाय नमः ।
ॐ अनन्यभक्तिलभ्याय नमः ।
ॐ अन्तःस्थितभूताय नमः ।
ॐ कर्मबन्धरहिताय नमः ।
ॐ प्रकृत्यवष्टम्भाय नमः ।
ॐ सर्वव्यापिने नमः ।
ॐ ज्योतिरादिगतिगम्याय नमः ।
ॐ कृष्णगत्यगम्याय नमः ।
ॐ शुक्लकृष्णगतिशंसिने नमः । ४९०
ॐ राजविद्यागुरवे नमः ।
ॐ राजविद्याविषयाय नमः ।
ॐ सर्वजगद्व्यापिने नमः ।
ॐ अव्यक्तमूर्तये नमः ।
ॐ सर्वभूताधाराय नमः ।
ॐ अनाधाराय नमः ।
ॐ भूतास्पृष्टाय नमः ।
ॐ भूतभावनाय नमः ।
ॐ भूतभृते नमः ।
ॐ कल्पान्तलीनभूतप्रभृतये नमः । ५००।
ॐ कल्पादिसृष्टभूतप्रभृताय नमः ।
ॐ उदासीनवदासीनाय नमः ।
ॐ चराचरप्रकृत्यध्यक्षाय नमः ।
ॐ जगद्विपरिवर्तकाय नमः ।
ॐ मानुषतनुमोहितमूढाय नमः ।
ॐ आसुराज्ञातपरभवाय नमः ।
ॐ महात्मने नमः ।
ॐ दैवप्रकृतिकीर्तिताय नमः ।
ॐ महात्मनमस्यिताय नमः ।
ॐ ज्ञानयज्ञेज्याय नमः । ५१०
ॐ एकत्वेनज्ञाताय नमः ।
ॐ पृथक्त्वनविदिताय नमः ।
ॐ विश्वतोमुखाय नमः ।
ॐ क्रतवे नमः ।
ॐ यज्ञाय नमः ।
ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ औषधाय नमः ।
ॐ मन्त्राय नमः ।
ॐ आज्याय नमः ।
ॐ अग्नये नमः । ५२०
ॐ हुताय नमः ।
ॐ जगत्पित्रे नमः ।
ॐ जगन्मात्रे नमः ।
ॐ जगद्धात्रे नमः ।
ॐ जगत्पितामहाय नमः ।
ॐ जगद्वेद्याय नमः ।
ॐ जगत्पवित्राय नमः ।
ॐ ओंकाराय नमः ।
ॐ ऋचे नमः ।
ॐ साम्ने नमः । ५३०
ॐ यजुषे नमः ।
ॐ जगद्गतये नमः ।
ॐ जगद्भर्त्रे नमः ।
ॐ जगत्प्रभवे नमः ।
ॐ जगत्साक्षिणे नमः ।
ॐ जगन्निवासाय नमः ।
ॐ जगच्छरणाय नमः ।
ॐ जगत्सहृदे नमः ।
ॐ जगत्प्रभवाय नमः ।
ॐ जगत्प्रलयाय नमः । ५४०
ॐ जगत्स्थानाय नमः ।
ॐ जगद्बीजाय नमः ।
ॐ असते नमः ।
ॐ त्रैविद्येष्टाय नमः ।
ॐ सोमपप्रार्थितस्वर्गदाय नमः ।
ॐ त्रयीधर्मप्रसाद्याय नमः ।
ॐ अनन्यभावोपासिताय नमः ।
ॐ भक्तयोगक्षेमनिर्वाहिणे नमः ।
ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः ।
ॐ यज्ञप्रभवे नमः । ५५०
ॐ देवव्रतदेवभावदाय नमः ।
ॐ पितृव्रतपितृभावदाय नमः ।
ॐ भूतेज्यभूतभावदाय नमः ।
ॐ तपते नमः ।
ॐ वर्षनिग्राहकाय नमः ।
ॐ वर्षोत्सर्जकाय नमः ।
ॐ अमृताय नमः ।
ॐ मृत्यवे नमः ।
ॐ सते नमः ।
ॐ आत्मयाज्यात्मभावदाय नमः । ५६०
ॐ भक्त्युपहृतप्राशिने नमः ।
ॐ अपर्णीयकर्तव्याय नमः ।
ॐ अपर्णीयाशितव्याय नमः ।
ॐ अपर्णीयहोतव्याय नमः ।
ॐ अपर्णीयदातव्याय नमः ।
ॐ अपर्णीयतप्तव्याय नमः ।
ॐ आत्मार्पितकर्मफलमोचनाय नमः ।
ॐ सर्वभूतसमाय नमः ।
ॐ अद्वेष्याय नमः ।
ॐ प्रियवर्जिताय नमः । ५७०
ॐ भक्ताश्रिताय नमः ।
ॐ भक्ताश्रयिणे नमः ।
ॐ अनन्यभक्तिप्रशंसिने नमः ।
ॐ भक्ताप्रणाशप्रतिज्ञापकाय नमः ।
ॐ पापयोनिपरगतिप्रदाय नमः ।
ॐ व्यपाश्रितजातिविमुखाय नमः ।
ॐ प्रशंसितब्रह्मक्षत्राय नमः ।
ॐ भक्तिपूर्वमननादिविधायिने नमः ।
ॐ सुरगणाद्यविदितप्रभाय नमः ।
ॐ देवाद्यादये नमः । ५८०
ॐ पापप्रमोचनपरमार्थज्ञानाय नमः ।
ॐ देवाद्यविदितव्यक्तये नमः ।
ॐ स्वयंविदितस्वतत्त्वाय नमः ।
ॐ भूतभावनाय नमः ।
ॐ बुद्ध्याविंशतिप्रभवाय नमः ।
ॐ मनोजनितमहर्षये नमः ।
ॐ मनुप्रभवाय नमः ।
ॐ भावान्वितभजनीयाय नमः ।
ॐ मुक्तिप्रकारप्रबोधकाय नमः ।
ॐ ज्ञानदीपनाशितभक्ताज्ञानाय नमः । ५९०
ॐ परब्रह्मणे नमः ।
ॐ परधाम्ने नमः ।
ॐ शाश्वतपुरुषाय नमः ।
ॐ नारदाद्युक्ततत्त्वाय नमः ।
ॐ भूतेशाय नमः ।
ॐ देवदेवाय नमः ।
ॐ जगत्पतये नमः ।
ॐ दिव्यात्मविभूतये नमः ।
ॐ विभूतिव्याप्तसर्वलोकाय नमः ।
ॐ पार्थप्रार्थितविभूतिज्ञानाय नमः । ६००।
ॐ अनन्तविभूतये नमः ।
ॐ सर्वभूताशयस्थितात्मने नमः ।
ॐ भूतादये नमः ।
ॐ भूतमध्याय नमः ।
ॐ भूतान्ताय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ अंशुमते नमः ।
ॐ मरीचये नमः ।
ॐ शशिने नमः ।
ॐ सामवेदाय नमः । ६१०
ॐ वासवाय नमः ।
ॐ मनसे नमः ।
ॐ चेतनायै नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ।
ॐ वित्तेशाय नमः ।
ॐ पावकाय नमः ।
ॐ मेरवे नमः ।
ॐ बृहस्पतये नमः ।
ॐ स्कन्दाय नमः ।
ॐ सागराय नमः । ६२०
ॐ भृगवे नमः ।
ॐ एकाक्षराय नमः ।
ॐ जपयज्ञाय नमः ।
ॐ हिमालयाय नमः ।
ॐ अश्वत्थाय नमः ।
ॐ नारदाय नमः ।
ॐ चित्ररथाय नमः ।
ॐ कपिलमुनये नमः ।
ॐ उच्चैःश्रवसे नमः ।
ॐ ऐरावताय नमः । ६३०
ॐ नराधिपाय नमः ।
ॐ वज्राय नमः ।
ॐ कामदुहे नमः ।
ॐ प्रजनकन्दर्पाय नमः ।
ॐ वासुकये नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ मृगेन्द्राय नमः ।
ॐ वैनतेयाय नमः ।
ॐ पवनाय नमः ।
ॐ रामाय नमः । ६४०
ॐ मकराय नमः ।
ॐ जाह्नव्यै नमः ।
ॐ सर्गादाय नमः ।
ॐ सर्गमध्याय नमः ।
ॐ सर्गान्ताय नमः ।
ॐ अध्यात्मविद्यारूपाय नमः ।
ॐ वादाय नमः ।
ॐ अकाराय नमः ।
ॐ वरुणाय नमः ।
ॐ अर्यम्णे नमः । ६५०
ॐ यमाय नमः ।
ॐ प्रह्लादाय नमः ।
ॐ कालाय नमः ।
ॐ द्वन्द्वाय नमः ।
ॐ अक्षयकालाय नमः ।
ॐ विश्वतोमुखधात्रे नमः ।
ॐ सर्वोद्भवाय नमः ।
ॐ सर्वहरमृत्यवे नमः ।
ॐ कीर्तये नमः ।
ॐ श्रियै नमः । ६६०
ॐ वाचे नमः ।
ॐ स्मृत्यै नमः ।
ॐ मेधायै नमः ।
ॐ धृत्यै नमः ।
ॐ क्षमायै नमः ।
ॐ बृहत्साम्ने नमः ।
ॐ गायत्र्यै नमः ।
ॐ मार्गशीर्षाय नमः ।
ॐ कुसुमाकराय नमः ।
ॐ द्यूताय नमः । ६७०
ॐ तेजस्वितेजसे नमः ।
ॐ जयाय नमः ।
ॐ व्यवसायाय नमः ।
ॐ सत्त्वाय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ धनञ्जयाय नमः ।
ॐ व्यासाय नमः ।
ॐ उशनसे नमः ।
ॐ नानाविधरूपाय नमः ।
ॐ नानावर्णाकृतिरूपाय नमः । ६८०
ॐ अदृष्टपूर्वाश्चर्यदर्शनाय नमः ।
ॐ देहस्थकृत्स्नजगते नमः ।
ॐ दण्डाय नमः ।
ॐ नीतये नमः ।
ॐ मौनाय नमः ।
ॐ ज्ञानाय नमः ।
ॐ सर्वभूतबीजाय नमः ।
ॐ व्याप्तचराचराय नमः ।
ॐ स्वतेजःसम्भूतविभूत्यादिमते नमः ।
ॐ एकांशविष्टब्धकृत्स्नजगते नमः । ६९०
ॐ कमलपत्राक्षाय नमः ।
ॐ अव्ययमहात्म्याय नमः ।
ॐ पार्थप्रार्थितविश्वरूपप्रदर्शकाय नमः ।
ॐ शतरूपाय नमः ।
ॐ सहस्ररूपाय नमः ।
ॐ पार्थप्रत्तदिव्यचक्षुषे नमः ।
ॐ अनेकवक्त्रनयनाय नमः ।
ॐ अनेकाद्भुतदर्शनाय नमः ।
ॐ अनेकदिव्याभरणाय नमः ।
ॐ दिव्यानेकोद्यतायुधाय नमः । ७००।
ॐ दिव्यमालाम्बरधराय नमः ।
ॐ दिव्यगन्धानुलेपनाय नमः ।
ॐ सर्वाश्चर्यमयाय नमः ।
ॐ अनन्तदेवाय नमः ।
ॐ विश्वतोमुखाय नमः ।
ॐ युगपदुत्थितसहस्रसूर्यभासे नमः ।
ॐ एकस्थप्रविभक्तकृत्स्नजगते नमः ।
ॐ प्रणतधनञ्जयभाषिताय नमः ।
ॐ स्वदेहदृष्टब्रह्मादये नमः ।
ॐ अनेकबाहवे नमः । ७१०
ॐ अनेकोदराय नमः ।
ॐ अनेकवक्त्राय नमः ।
ॐ अनेकनेत्राय नमः ।
ॐ अनन्तरूपाय नमः ।
ॐ सर्वतोदृष्टाय नमः ।
ॐ अदृष्टान्तमध्यादये नमः ।
ॐ विश्वेश्वराय नमः ।
ॐ विश्वरूपाय नमः ।
ॐ किरीटिने नमः ।
ॐ गदिने नमः । ७२०
ॐ चक्रिणे नमः ।
ॐ सर्वतोदीप्ततेजोराशये नमः ।
ॐ दुर्निरीक्षाय नमः ।
ॐ दीप्तानलार्कद्युतये नमः ।
ॐ अप्रमेयाय नमः ।
ॐ अक्षराय नमः ।
ॐ परवेदितव्याय नमः ।
ॐ विश्वनिधानाय नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ शाश्वतधर्मगोप्त्रे नमः । ७३०
ॐ सनातनपुरुषाय नमः ।
ॐ आदिमध्यान्तरहिताय नमः ।
ॐ अनन्तवीर्याय नमः ।
ॐ अनन्तबाहवे नमः ।
ॐ शशिसूर्यनेत्राय नमः ।
ॐ दीप्तहुताशवक्त्राय नमः ।
ॐ स्वतेजस्तप्तविश्वाय नमः ।
ॐ महर्षिस्तुताय नमः ।
ॐ विस्मितरुद्रादिवीक्षिताय नमः ।
ॐ महारूपाय नमः । ७४०
ॐ बहुदंष्ट्राकरालरूपाय नमः ।
ॐ नभःस्पृशे नमः ।
ॐ दीप्ताय नमः ।
ॐ अनेकवर्णाय नमः ।
ॐ व्यत्ताननाय नमः ।
ॐ दीप्तविशालनेत्राय नमः ।
ॐ पार्थभीकरदर्शनाय नमः ।
ॐ दंष्ट्राकरालमुखाय नमः ।
ॐ जगन्निवासाय नमः ।
ॐ व्याप्तद्यावापृथिव्यन्तराय नमः । ७५०
ॐ व्याप्तसर्वदिशे नमः ।
ॐ उग्ररूपव्यथितलोकत्रयाय नमः ।
ॐ सुरसङ्घाविष्टाय नमः ।
ॐ भीष्मादिप्रविष्टवक्त्राय नमः ।
ॐ दशनान्तरलग्नयोधमुख्याय नमः ।
ॐ दशनचूर्णितजनोत्तमाङ्गाय नमः ।
ॐ वक्त्राभिमुखविद्रुतनरलोकवीराय नमः ।
ॐ ज्वलद्वदनग्रस्तसमस्तलोकाय नमः ।
ॐ उग्रतेजःप्रतप्तसमस्तजगते नमः ।
ॐ उग्ररूपाय नमः । ७६०
ॐ देववराय नमः ।
ॐ अप्रज्ञातप्रवृत्तये नमः ।
ॐ कालाय नमः ।
ॐ लोकक्षयकृते नमः ।
ॐ प्रवृद्धाय नमः ।
ॐ लोकसमाहृतिप्रवृत्तये नमः ।
ॐ प्रत्यनीकस्थयोधसंहर्त्रे नमः ।
ॐ सव्यसाचिसमुत्थापकाय नमः ।
ॐ भीतभीतकिरीटिप्रणताय नमः ।
ॐ अर्जुनाभिष्टुताय नमः । ७७०
ॐ रक्षोभयङ्कराय नमः ।
ॐ सिद्धसङ्घनमस्कृताय नमः ।
ॐ गरीयसे नमः ।
ॐ ब्रह्मकर्त्रे नमः ।
ॐ जगन्निवासाय नमः ।
ॐ आदिदेवाय नमः ।
ॐ पुराणपुरुषाय नमः ।
ॐ विश्वनिधानाय नमः ।
ॐ पृष्टतोनमस्कृताय नमः ।
ॐ सर्वतोनमस्कृताय नमः । ७८०
ॐ सर्वस्मै नमः ।
ॐ वेत्त्रे नमः ।
ॐ वेद्याय नमः ।
ॐ विश्वव्यापकाय नमः ।
ॐ अनन्तरूपाय नमः ।
ॐ वायवे नमः ।
ॐ यमाय नमः ।
ॐ अग्नये नमः ।
ॐ वरुणाय नमः ।
ॐ शशाङ्काय नमः । ७९०
ॐ प्रजापतये नमः ।
ॐ प्रपितामहाय नमः ।
ॐ सहस्रकृत्वःप्रणताय नमः ।
ॐ पुर्वेनमस्कृताय नमः ।
ॐ अनन्तवीर्याय नमः ।
ॐ अमितविक्रमाय नमः ।
ॐ व्याप्तसर्वस्वरूपाय नमः ।
ॐ अज्ञातमहिम्ने नमः ।
ॐ प्रमादावधृतसखिभावाय नमः ।
ॐ प्रमादावहसाहिताय नमः । ८००।
ॐ अर्जुनक्षामिताय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ अप्रमेयाय नमः ।
ॐ चराचरपित्रे नमः ।
ॐ लोकपूज्याय नमः ।
ॐ समाभ्यधिकरहिताय नमः ।
ॐ अप्रमितभावाय नमः ।
ॐ पार्थप्रार्थितपूर्वरूपदर्शनाय नमः ।
ॐ सहस्रबाहवे नमः ।
ॐ विश्वमूर्तये नमः । ८१०
ॐ प्रसादप्रदर्शितविश्वरूपाय नमः ।
ॐ वेदाद्यवेद्यविश्वरूपाय नमः ।
ॐ पार्थभीतिप्रणाशनाय नमः ।
ॐ सौम्यवपुषे नमः ।
ॐ महात्मने नमः ।
ॐ अनन्यभक्तिपरितुष्टाय नमः ।
ॐ भक्त्येकदृश्याय नमः ।
ॐ भक्त्येकगम्याय नमः ।
ॐ गुणपूर्णाय नमः ।
ॐ नित्ययुक्तोपासिताय नमः । ८२०
ॐ अक्षराय नमः ।
ॐ अनिर्देश्याय नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ सर्वगाय नमः ।
ॐ अचिन्त्याय नमः ।
ॐ कूटस्थाय नमः ।
ॐ अचलाय नमः ।
ॐ ध्रुवाय नमः ।
ॐ नियतेन्द्रियग्रामगम्याय नमः ।
ॐ सर्वभूतहितरताय नमः । ८३०
ॐ अव्यक्तासक्तचित्तगम्याय नमः ।
ॐ कर्मसंन्यासिसमुपास्याय नमः ।
ॐ सगुणध्यायिसन्तारकाय नमः ।
ॐ समाधिविधायिने नमः ।
ॐ अभ्यासप्रशंसकाय नमः ।
ॐ अभ्यासोपायकर्माराध्याय नमः ।
ॐ क्षमिणे नमः ।
ॐ सततसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ दृढनिश्चयाय नमः ।
ॐ प्रियभक्ताय नमः । ८४०
ॐ समशत्रुमित्राय नमः ।
ॐ सममानापमानाय नमः ।
ॐ सङ्गविवर्जिताय नमः ।
ॐ तुल्यनिन्दास्तुतये नमः ।
ॐ मौनिने नमः ।
ॐ अकारणसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ अनिकेताय नमः ।
ॐ स्थिरमतये नमः ।
ॐ सर्वकर्मफलत्यागप्रीणिताय नमः ।
ॐ अद्वेष्टे नमः । ८५०
ॐ सर्वभूतमित्राय नमः ।
ॐ करुणाय नमः ।
ॐ भक्तियोगपरमाय नमः ।
ॐ क्षेत्रक्षेत्रज्ञविदे नमः ।
ॐ सर्वक्षेत्रक्षेत्रज्ञाय नमः ।
ॐ ऋषिगीताय नमः ।
ॐ छन्दोगीताय नमः ।
ॐ ब्रह्मसूत्रपदगीताय नमः ।
ॐ सविकारक्षेत्रदर्शिने नमः ।
ॐ अमानिने नमः । ८६०
ॐ अदम्भिने नमः ।
ॐ अहिंसकाय नमः ।
ॐ क्षान्ताय नमः ।
ॐ ऋजवे नमः ।
ॐ आचार्योपासकाय नमः ।
ॐ शुचये नमः ।
ॐ स्थिराय नमः ।
ॐ निगृहीतात्मने नमः ।
ॐ विरक्ताय नमः ।
ॐ अनहङ्कृताय नमः । ८७०
ॐ जन्मादिदोषदर्शिने नमः ।
ॐ असक्ताय नमः ।
ॐ अनभिष्वक्ताय नमः ।
ॐ इष्टानिष्टसमाचित्ताय नमः ।
ॐ अनन्ययोगभक्तिग्राहाय नमः ।
ॐ विविक्तदेशसेविताय नमः ।
ॐ अध्यात्मज्ञाननित्याय नमः ।
ॐ गुणभोक्त्रे नमः ।
ॐ भूतबाह्याय नमः ।
ॐ भूतान्तराय नमः । ८८०
ॐ अचराय नमः ।
ॐ ज्ञानोपायप्रदर्शकाय नमः ।
ॐ अनादिमते नमः ।
ॐ परब्रह्मणे नमः ।
ॐ सदसदादिपदानुक्ताय नमः ।
ॐ सर्वतःपाणिपादाय नमः ।
ॐ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखाय नमः ।
ॐ सर्वःश्रुतिमते नमः ।
ॐ सर्ववारकाय नमः ।
ॐ सर्वेन्द्रियगुणाभासाय नमः । ८९०
ॐ सर्वेन्द्रियविवर्जिताय नमः ।
ॐ असक्ताय नमः ।
ॐ सर्वभृते नमः ।
ॐ निर्गुणाय नमः ।
ॐ चराय नमः ।
ॐ सूक्ष्माय नमः ।
ॐ अविज्ञेयाय नमः ।
ॐ दूरस्थाय नमः ।
ॐ अन्तिकस्थाय नमः ।
ॐ भूताविभक्ताय नमः । ९००।
ॐ विभक्तवत्स्थिताय नमः ।
ॐ भूतभर्त्रे नमः ।
ॐ ग्रसिष्णवे नमः ।
ॐ प्रभविष्णवे नमः ।
ॐ ज्योतिषांज्योतिषे नमः ।
ॐ तमःपराय नमः ।
ॐ ज्ञानाय नमः ।
ॐ ज्ञेयाय नमः ।
ॐ ज्ञानगम्याय नमः ।
ॐ सर्वहृदयस्थिताय नमः । ९१०
ॐ प्रकृतिपुरुषविवेचकाय नमः ।
ॐ उपद्रष्टे नमः ।
ॐ अनुमन्त्रे नमः ।
ॐ भर्त्रे नमः ।
ॐ भोक्त्रे नमः ।
ॐ महेश्वराय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः ।
ॐ परपुरुषाय नमः ।
ॐ ध्यानाद्युपायविदिताय नमः ।
ॐ सर्वभूतसमाय नमः । ९२०
ॐ परमेश्वराय नमः ।
ॐ अविनाशिने नमः ।
ॐ प्रकृतिकर्तृत्वविदे नमः ।
ॐ अकर्त्रात्मदर्शिने नमः ।
ॐ भूताधाराय नमः ।
ॐ भूतविस्तारिणे नमः ।
ॐ शरीरस्थाय नमः ।
ॐ अकर्त्रे नमः ।
ॐ अलिप्ताय नमः ।
ॐ सर्वगताकाशसूक्ष्माय नमः । ९३०
ॐ कृत्स्नक्षेत्रप्रकाशकाय नमः ।
ॐ ज्ञानचक्षुषे नमः ।
ॐ उत्तमज्ञानगुरवे नमः ।
ॐ ज्ञानप्राप्यसाधर्म्याय नमः ।
ॐ ब्रह्मयोनये नमः ।
ॐ सर्वभूतसम्भवाय नमः ।
ॐ रजोगुणानिबद्धाय नमः ।
ॐ सर्वमोहनतमःकार्यरहिताय नमः ।
ॐ सत्त्वाभिभूततमोरजसे नमः ।
ॐ रजस्तमोऽनभिभूतसत्त्वाय नमः । ९४०
ॐ विवृद्धसत्त्वप्रकृतये नमः ।
ॐ रजोजातस्मृहादिहीनाय नमः ।
ॐ तमोमूलमोहहीनाय नमः ।
ॐ प्रवृद्धसत्त्वादिप्रलयगातिविदे नमः ।
ॐ सात्विकादिकर्मफलविदे नमः ।
ॐ गुणत्रयकार्यविवेचकाय नमः ।
ॐ सत्त्वस्थादिस्थितिविदे नमः ।
ॐ गुणातीतात्मज्ञानगम्याय नमः ।
ॐ सर्वमूर्तिबीजप्रदाय नमः ।
ॐ बन्धहेतुगुणत्रयविदे नमः । ९५०
ॐ निर्मलसत्त्वप्रधानाय नमः ।
ॐ सुखसङ्गहीनाय नमः ।
ॐ गुणातीतलिङ्गज्ञाय नमः ।
ॐ गुणातीताय नमः ।
ॐ प्रवृत्तप्रकाशादिद्वेषरहिताय नमः ।
ॐ निवृत्तप्रकाशादिकाङ्क्षाहीनाय नमः ।
ॐ उदासीनवदासीनाय नमः ।
ॐ गुणाविचाल्याय नमः ।
ॐ स्वस्थाय नमः ।
ॐ समलोष्टाश्मकाञ्चनाय नमः । ९६०
ॐ तुल्यप्रियाप्रियाय नमः ।
ॐ तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतये नमः ।
ॐ मानापमानतुल्याय नमः ।
ॐ तुल्यमित्रारिपक्षाय नमः ।
ॐ सर्वारम्भपरित्यागिने नमः ।
ॐ ब्रह्मप्रतिष्ठायै नमः ।
ॐ अमृतप्रतिष्ठायै नमः ।
ॐ शाश्वतधर्मप्रतिष्ठायै नमः ।
ॐ अश्वत्थमूलाय नमः ।
ॐ अश्वत्थरूपविदे नमः । ९७०
ॐ अश्वत्थच्छेदस्त्रविदे नमः ।
ॐ मार्गितव्यपदाय नमः ।
ॐ पुराणप्रवृत्तिप्रसारकाय नमः ।
ॐ प्रपत्तव्यपुरुषाय नमः ।
ॐ निर्मानमोहाय नमः ।
ॐ जितसङ्गदोषाय नमः ।
ॐ अध्यात्मनित्याय नमः ।
ॐ विनिवृत्तकामाय नमः ।
ॐ प्राणिदेहाश्रितवैश्वानराय नमः ।
ॐ चतुर्विधान्नपाचकाय नमः । ९८०
ॐ सर्वहृत्सन्निविष्टाय नमः ।
ॐ स्मृत्यादिविदायिने नमः ।
ॐ द्वन्द्वमुक्ताय नमः ।
ॐ अव्ययपदाय नमः ।
ॐ सूर्याद्यभास्यभारूपाय नमः ।
ॐ अंशभूतजीवाय नमः ।
ॐ जीवविषयसेवाविवेचकाय नमः ।
ॐ ज्ञानचक्षुर्वेद्यतत्त्वभूताय नमः ।
ॐ अकृतात्मागम्याय नमः ।
ॐ आदित्यादितेजसे नमः । ९९०
ॐ गामाविष्टाय नमः ।
ॐ भूतधात्रे नमः ।
ॐ ओषधिपोषकाय नमः ।
ॐ सोमाय नमः ।
ॐ सर्ववेदवेद्याय नमः ।
ॐ वेदान्तकृते नमः ।
ॐ वेदविदे नमः ।
ॐ क्षराक्षरविवेचकाय नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः । १००० ।
ॐ लोकभृते नमः ।
ॐ लोकेश्वराय नमः ।
ॐ क्षरातीताय नमः ।
ॐ अक्षरोत्तमाय नमः ।
ॐ लोकवेदप्रथितपुरुषोत्तमाय नमः ।
ॐ सर्ववित्सेविताय नमः ।
ॐ सर्वभावसेविताय नमः ।
ॐ गुह्यतमशास्त्राचार्याय नमः ।
ॐ कृतकृत्यताविधायिने नमः ।
ॐ दैवासुरसम्पद्विवेचकाय नमः । १०१०
ॐ दैवसम्पत्सम्पन्नाय नमः ।
ॐ दैवसम्पदभिगम्याय नमः ।
ॐ आसुरसम्पदनासाद्याय नमः ।
ॐ आसुरस्वभावबोधकाय नमः ।
ॐ कामादित्यागतत्पराय नमः ।
ॐ नरकद्वारविदूराय नमः ।
ॐ विमुक्तकामगम्याय नमः ।
ॐ शास्त्रत्यागासहनाय नमः ।
ॐ कामकारनिराकर्त्रे नमः ।
ॐ कार्यव्यवस्थापकशास्त्रतात्पर्याय नमः । १०२०
ॐ शास्त्रविहिततर्कप्रशंसाय नमः ।
ॐ श्रद्धात्रयविवेक्त्रे नमः ।
ॐ स्वभावसिद्धश्रद्धाविदे नमः ।
ॐ सात्विकाद्याराध्याय नमः ।
ॐ सात्विकाहारानिरताय नमः ।
ॐ राजसाहारविरक्ताय नमः ।
ॐ तामसाहारजिगुप्सकाय नमः ।
ॐ सात्विकयज्ञप्रियाय नमः ।
ॐ राजसेज्यारहिताय नमः ।
ॐ तामसयज्ञगर्हकाय नमः । १०३०
ॐ शारीरतपःपराय नमः ।
ॐ वाङ्मयतपोवेद्याय नमः ।
ॐ मानसतपोगम्याय नमः ।
ॐ सात्विकादितपोविवेचकाय नमः ।
ॐ सात्विकदानाराध्याय नमः ।
ॐ देशकालपात्ररूपाय नमः ।
ॐ सदसदर्थविवेक्त्रे नमः ।
ॐ गाणसंन्यससंशिने नमः ।
ॐ त्यागस्वरूपबोधकाय नमः ।
ॐ असङ्गयज्ञादिविधायिने नमः । १०४०
ॐ सात्विकादित्यागविदे नमः ।
ॐ कर्मकारणविदे नमः ।
ॐ अकर्त्रात्मने नमः ।
ॐ केवलाय नमः ।
ॐ अनहङ्कृतभावाय नमः ।
ॐ अलिप्तबुद्धये नमः ।
ॐ कर्मानिबद्धाय नमः ।
ॐ कर्मचोदनाविज्ञाय नमः ।
ॐ कर्मसङ्ग्रहसंविदिने नमः ।
ॐ रजसदानापूजिताय नमः । १०५०
ॐ तामसदानावज्ञायिने नमः ।
ॐ ओंतत्सदितिनिर्देश्याय नमः ।
ॐ कर्मारम्भनिर्दिष्टनामत्रयाय नमः ।
ॐ सात्विकज्ञानवीक्षिताय नमः ।
ॐ सात्विककर्माराधिताय नमः ।
ॐ सात्विकर्त्राराध्याय नमः ।
ॐ राजसंज्ञानदूराय नमः ।
ॐ रजसकर्तृदूराय नमः ।
ॐ तामसज्ञानदवीयसाय नमः ।
ॐ तामसकर्मदवीयसाय नमः । १०६०
ॐ तामसकर्तृदविष्टाय नमः ।
ॐ सात्विकबुद्धिगम्याय नमः ।
ॐ राजसबुद्धिदूराय नमः ।
ॐ तामसबुद्धिदवीयसाय नमः ।
ॐ सात्विकादिधातृविदे नमः ।
ॐ सात्विकसुखसंविदे नमः ।
ॐ रजससुखविमुखाय नमः ।
ॐ तमससुखजुगुप्सकाय नमः ।
ॐ ब्राह्मणादिकर्मविभाजकाय नमः ।
ॐ स्वकर्मसमाराधिताय नमः । १०७०
ॐ सिद्धिप्रियाय नमः ।
ॐ स्वधर्मप्रवणाय नमः ।
ॐ परधर्मप्रद्वेषिणे नमः ।
ॐ सहजधर्मत्यागनिषेधकाय नमः ।
ॐ असङ्गफलशंसिने नमः ।
ॐ त्यक्तैविषयाय नमः ।
ॐ रागद्वेषव्युदासिने नमः ।
ॐ सर्वभूतहृदयस्थिताय नमः ।
ॐ सर्वभूतभ्रामकाय नमः ।
ॐ सर्वभावगम्यशरणाय नमः । १०८०
ॐ सर्वप्रसन्नाय नमः ।
ॐ विविक्तसेविने नमः ।
ॐ यतवाचे नमः ।
ॐ यतमानसाय नमः ।
ॐ ध्यानयोगपराय नमः ।
ॐ वैराग्यश्रिताय नमः ।
ॐ मुक्तकामक्रोधाय नमः ।
ॐ प्रसन्नात्मने नमः ।
ॐ भक्त्येकगम्याय नमः ।
ॐ शाश्वतपदाय नमः । १०९०
ॐ ज्ञानैकपदाय नमः ।
ॐ कर्मसंन्यसस्थानाय नमः ।
ॐ सर्वदुर्गतारकाय नमः ।
ॐ शाश्वताय नमः ।
ॐ सर्वेष्टाय नमः ।
ॐ सर्वहिताय नमः ।
ॐ भक्तप्रपत्तव्याय नमः ।
ॐ शरणागतत्राणपरायणाय नमः ।
ॐ गीताध्यानसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ गीताश्रवणप्रणीताय नमः । ११००।
॥ इति श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली सम्पूर्ण ॥
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ या अर्चन से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
1. श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
इस महान सहस्रनामावली की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे वेदान्त दर्शन और ‘गीता-तत्व’ को समझने के लिए हमें कर्म, ज्ञान, और भक्ति के समन्वय, तथा सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।
त्रि-योग का समन्वय (Integration of Karma, Jnana, and Bhakti)
भगवद्गीता विश्व का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो कर्म (Action), ज्ञान (Knowledge), और भक्ति (Devotion) का अद्भुत समन्वय करता है। मनुष्य का स्वभाव अलग-अलग होता है; कोई कर्म-प्रधान होता है, कोई बुद्धि-प्रधान, तो कोई भावना-प्रधान। श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली के 1000 नामों में इन तीनों मार्गों का सार छिपा है। जब साधक इन नामों का गान करता है, तो उसके भीतर का आलस्य (Tamas) नष्ट होकर निष्काम कर्म जाग्रत होता है, अज्ञान नष्ट होकर आत्मज्ञान जाग्रत होता है, और अहंकार नष्ट होकर ईश्वर के प्रति परम समर्पण (Bhakti) जाग्रत होता है।
‘विषाद’ से ‘प्रसाद’ तक की यात्रा (Journey from Sorrow to Grace)
गीता का आरंभ ‘अर्जुन विषाद योग’ (शोक) से होता है और अंत ‘मोक्ष संन्यास योग’ (परम शांति) पर होता है। यह 1000 नामों की नामावली भी साधक को इसी यात्रा पर ले जाती है। मनुष्य का मन जब भी किसी सांसारिक समस्या से घबराता है, तो यह पाठ उसे यह याद दिलाता है कि “आत्मा अजर-अमर है, इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती।” यह ज्ञान अवचेतन मन में स्थापित होकर साधक को हर दुख से पार ले जाता है।
‘सहस्रनाम’ का अद्भुत नाद-विज्ञान (Sound Vibrations of the Divine)
सनातन परंपरा में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता और मस्तिष्क के सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र (सहस्रार चक्र) का प्रतीक माना जाता है। गीता सहस्रनामावली के ये हज़ार नाम वास्तव में 1000 ‘ब्रह्मांडीय आवृत्तियां’ (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक पूर्ण लय और नाद के साथ इन नामों का अर्चन करता है, तो उसके मस्तिष्क की नसें और हृदय चक्र (अनाहत चक्र) पूरी तरह जाग्रत हो जाते हैं। व्यक्ति का ‘मैं’ (Ego) परमेश्वर के ‘विराट स्वरूप’ में विलीन हो जाता है।
2. श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
श्रीमद भगवद्गीता साक्षात भगवान का वांग्मय (Word-form) स्वरूप है। जो साधक पूर्ण निष्ठा, सात्विकता, पवित्रता और एक जिज्ञासु हृदय के साथ प्रतिदिन या विशेष पर्वों पर इस सहस्रनामावली का पाठ या अर्चन करता है, उसे जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
मनोवैज्ञानिक और मानसिक लाभ (Mental Peace & Clarity)
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डिप्रेशन, तनाव और शोक का समूल नाश: अर्जुन की तरह जब भी आप डिप्रेशन, एंग्जायटी या गहरे दुख में हों, यह पाठ आपके मन के सारे विषाद को हर लेता है। यह आपको एक नई दृष्टि देता है जिससे संसार की हर समस्या बहुत छोटी लगने लगती है।
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सटीक निर्णय क्षमता (Decision Making Skills): धर्म-संकट के समय जब समझ न आए कि क्या सही है और क्या गलत, तब यह नामावली आपके भीतर एक अद्भुत विवेक (Discernment) जाग्रत करती है। आप भावनाओं में बहे बिना निष्पक्ष और सही निर्णय ले पाते हैं।
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स्थितप्रज्ञ अवस्था की प्राप्ति: सुख में बहुत अधिक खुश न होना और दुख में विचलित न होना—इसे गीता में ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा गया है। इस पाठ से व्यक्ति का मन अत्यंत स्थिर और शांत हो जाता है।
आध्यात्मिक और लौकिक लाभ (Spiritual Evolution & Success in Action)
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निष्काम कर्म और सफलता: यह पाठ व्यक्ति को अपने कर्म (Duty) पर 100% फोकस करना सिखाता है, बिना फल की चिंता किए। वैज्ञानिक रूप से भी, जब आप परिणाम (Result) की चिंता (Anxiety) छोड़ देते हैं, तो आपके कार्य की गुणवत्ता (Quality) कई गुना बढ़ जाती है, जिससे सफलता निश्चित हो जाती है।
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पापों का नाश और मोक्ष: भगवान ने कहा है कि जो भी गीता का आश्रय लेता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इस सहस्रनाम का नियमित गान साधक के जन्म-जन्मांतर के संचित कर्मों (Karmic Baggage) को भस्म कर देता है और अंततः उसे भगवान के परम धाम (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
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जीवन का उद्देश्य (Life Purpose): जो लोग जीवन में दिशाहीन महसूस करते हैं, उन्हें इस पाठ के प्रभाव से अपने ‘स्वधर्म’ (स्वभाव के अनुकूल कर्तव्य) का ज्ञान हो जाता है और वे एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने लगते हैं।
पारिवारिक और सामाजिक लाभ (Harmony & Respect)
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अहंकार का शमन और मधुर संबंध: गीता सिखाती है कि सब में एक ही परमात्मा का वास है (समदर्शन)। जब यह भाव जाग्रत होता है, तो व्यक्ति का ईगो (Ego) खत्म हो जाता है, जिससे घर-परिवार और समाज में उसके संबंध अत्यंत मधुर और आदरपूर्ण हो जाते हैं।
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सुख-शांति और ऐश्वर्य: जहाँ गीता का पाठ होता है, जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, वहाँ विजय, विभूति (ऐश्वर्य) और अचल नीति स्वतः ही निवास करते हैं (गीता का अंतिम श्लोक यही उद्घोष करता है)।
3. श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
श्रीमद भगवद्गीता की उपासना अत्यंत सात्विक, बौद्धिक, शांत और वैदिक मर्यादा से परिपूर्ण होती है। इस सिद्ध नामावली का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान श्रीकृष्ण और भगवद्गीता की आराधना के लिए गुरुवार (Thursday – विष्णु का दिन) और बुधवार (Wednesday) सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माने जाते हैं।
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विशेष तिथियां: गीता जयंती (मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी – मोक्षदा एकादशी) का दिन इस साधना के लिए सर्वोच्च है। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी, गुरु पूर्णिमा, और किसी भी माह की एकादशी के दिन इस सहस्रनामावली का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।
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समय: ज्ञान और मोक्ष की साधना का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व 4:00 से 6:00 बजे के बीच) या ‘गोधूलि बेला / संध्याकाल’ होता है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए पीले (Yellow), कुशा (Kusha grass), या सफेद आसन का प्रयोग करें। (पीला रंग भगवान विष्णु/कृष्ण को अत्यंत प्रिय है)।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा में पीले (पीतांबर), श्वेत (सफेद), या हल्के चंदन रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ परिणाम देता है।
पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)
| सामग्री / विधान | विवरण |
| प्रतिमा / चित्र / ग्रंथ | एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन (रथ पर सवार – पार्थसारथी स्वरूप) का चित्र स्थापित करें। साथ ही ‘श्रीमद भगवद्गीता’ की मूल पुस्तक (ग्रंथ) को भी पीले वस्त्र में लपेटकर स्थापित करें और उसे साक्षात भगवान मानकर पूजें। |
| दीपक | भगवान और गीता ग्रंथ के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक अखंड दीप प्रज्वलित करें। चंदन, मोगरा, या कपूर की सात्विक धूप जलाएं। |
| तिलक | भगवान के चित्र और गीता ग्रंथ पर पीला चंदन (गोपी चंदन), अष्टगंध, या कुमकुम का तिलक लगाएं। स्वयं भी मस्तक (आज्ञा चक्र) पर गोपी चंदन का ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करें। |
| पुष्प और तुलसी दल | उन्हें पीले पुष्प (गेंदा, चंपा) और श्वेत पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। गीता और श्रीकृष्ण की पूजा बिना तुलसी दल (Tulsi leaves) के कभी स्वीकार नहीं होती, अतः तुलसी प्रचुर मात्रा में रखें। |
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ आरंभ करने से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (पीले रंगे हुए), और एक पुष्प (या तुलसी पत्र) लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे योगेश्वर श्रीकृष्ण, मैं अपने जीवन से समस्त शोक, अज्ञान, और कर्म बंधनों के नाश, निष्काम कर्म की सिद्धि, और आपकी अहैतुकी प्रेमाभक्ति के लिए श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ और तुलसी-अर्चन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ”), और फिर जल को ज़मीन पर छोड़ दें।
सहस्रनामावली का पाठ और पुष्पार्चन/तुलसी-अर्चन विधि (Chanting Method & Archana)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश, महर्षि वेदव्यास जी (महाभारत के रचयिता), और अपने गुरुदेव का मानसिक स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।
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गीता ध्यानम् के श्लोक (‘पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयम्…’) का गान करें।
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भगवान के मूल मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने” की कम से कम 11 बार या एक माला (तुलसी की माला पर) अवश्य जपें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर और हृदय में कुरुक्षेत्र के उस दिव्य रथ का ध्यान करते हुए ‘श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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सहस्रार्चन / तुलसी-अर्चन विधि (अचूक और चमत्कारिक उपाय): अत्यंत शीघ्र फल प्राप्ति (विशेषकर मानसिक शांति और संकट नाश) के लिए ‘नामावली’ का प्रयोग करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ भगवान के चित्र या गीता ग्रंथ पर एक तुलसी का पत्ता (Tulsi Dal), या पीला पुष्प अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का यह सबसे शक्तिशाली और सौम्य उपाय है।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)
पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान को अत्यंत सात्विक भोग लगाएं। उन्हें माखन-मिश्री, गाय के दूध की खीर, ताजे फल, या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। भोग में तुलसी पत्र अवश्य डालें। अंत में कर्पूर जलाकर गीता जी की आरती (जय भगवद्गीते…) और श्रीकृष्ण की आरती गाएं। पूजा के अंत में हाथ जोड़कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
श्रीमद भगवद्गीता केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने का पूर्ण विज्ञान है। अतः इसकी साधना में कर्मकांड से अधिक ‘आचरण’ की पवित्रता की आवश्यकता होती है। इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
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निष्काम कर्म (Action without attachment to fruits): यदि आप गीता के नामों का जप कर रहे हैं, तो आपको फल की आसक्ति छोड़नी होगी। “मैं यह पाठ करूँगा तो मुझे तुरंत लॉटरी मिल जाएगी या मेरा शत्रु मर जाएगा”—ऐसी लालची (Greedy) और सकाम भावना से गीता का पाठ नहीं किया जाता। इसे भगवान की प्रसन्नता और आत्म-शुद्धि के लिए करें, भौतिक फल तो भगवान स्वयं बिना मांगे दे देंगे।
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पूर्ण सात्विक जीवन और आहार (Absolute Sattvic Diet): गीता में स्वयं भगवान ने तीन प्रकार के आहारों का वर्णन किया है और सात्विक आहार को श्रेष्ठ बताया है। अनुष्ठान की अवधि के दौरान साधक को घर में और अपने आहार में मांस (Meat), मदिरा (Alcohol), अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए।
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समभाव (Equanimity towards all beings): “विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥” (गीता 5.18)। जो व्यक्ति सभी प्राणियों (इंसान, गाय, हाथी, कुत्ते) में एक ही परमात्मा को देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है। किसी से घृणा करना, जानवरों को सताना या जाति-पाति का भेद करना गीता के उपासक के लिए सर्वथा वर्जित है।
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स्वधर्म का पालन: आप जिस भी भूमिका में हैं (छात्र, व्यापारी, सैनिक, गृहिणी), अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना ही सबसे बड़ी गीता साधना है। कार्य से भागना या संन्यास का दिखावा करना वर्जित है।
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क्रोध और अहंकार का शमन: गीता में क्रोध को नरक का द्वार बताया गया है। साधना काल के दौरान अपनी वाणी और मन को शांत रखें।
5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली एक अत्यंत पवित्र और उच्च कोटि का स्तोत्र है, अतः इसकी साधना करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं:
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पुस्तकों का परम आदर: गीता ग्रंथ को कभी भी नंगे फर्श पर न रखें। इसे सदैव लाल या पीले स्वच्छ कपड़े में लपेटकर लकड़ी के आसन या ऊंचे स्थान पर रखें। अशुद्ध हाथों से या पैरों के पास ग्रंथ को कभी न छुएं।
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सकाम या बुरी नीयत से प्रयोग वर्जित (No Malicious Intent): यह स्तोत्र ज्ञान, मोक्ष और शांति के लिए है। किसी अन्य व्यक्ति का नुकसान करने, या किसी को बर्बाद करने की नीयत से इसका पाठ कभी न करें। भगवान सर्वव्यापी हैं, वे गलत मंशा से किए गए कर्म का फल अवश्य देते हैं।
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शारीरिक अपवित्रता का ध्यान: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अशुद्ध अवस्था (सूतक, पातक) में गीता जी की पुस्तक या तुलसी का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दिनों में इस पाठ और पूजा कक्ष से पूर्णतः दूर रहना चाहिए।
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उच्चारण की शुद्धता (Purity of Pronunciation): संस्कृत के शब्दों का उच्चारण यथासंभव शुद्ध करने का प्रयास करें। यदि संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो धीरे-धीरे पढ़कर अभ्यास करें। भगवान भावग्राही हैं, परंतु उच्चारण की शुद्धता नाद-विज्ञान के लिए आवश्यक है।
6. आधुनिक युग में श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक युग अत्यधिक ‘तनाव’ (Stress), ‘भौतिक अंधी दौड़’ (Rat Race), ‘डिसीजन फटीग’ (Decision Fatigue), और ‘मानसिक भटकाव’ का युग है। लोग भौतिक सुख-सुविधाओं और सफलता की अंधी दौड़ में दिन-रात भाग रहे हैं, लेकिन जीवन से ‘शांति’, ‘संतोष’, और ‘जीवन का उद्देश्य’ (Purpose of Life) पूरी तरह गायब हो चुके हैं।
आज का युवा वर्ग अर्जुन की तरह ही विषाद में है। करियर के दबाव, टूटते रिश्तों, सोशल मीडिया के दिखावे और एंग्जायटी (Anxiety) ने आधुनिक मनुष्य को अंदर से खोखला कर दिया है।
‘श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली’ आधुनिक इंसान के इन्हीं मनोवैज्ञानिक, करियर और भावनात्मक संकटों का सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक और प्रैक्टिकल (Practical) उपचार है:
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मानसिक ‘बर्नआउट’ और डिप्रेशन से मुक्ति (Overcoming Depression): जब आप 1000 नामों का गान करते हैं, तो आपको यह बोध होता है कि आप केवल एक निमित्त (Instrument) हैं, कर्ता (Doer) ईश्वर है। यह भाव मन से काम का सारा बोझ, फेल होने का डर (Fear of Failure) और स्ट्रेस को एक सेकंड में खत्म कर देता है।
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इमोशनल इंटेलिजेंस (Emotional Resilience): आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया में ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ सबसे बड़ी स्किल है। गीता का ‘स्थितप्रज्ञ’ दर्शन आपको कार्यस्थल (Workplace) की गंदी राजनीति, बॉस के गुस्से या अचानक आए नुकसान में भी शांत और स्थिर रहना सिखाता है। आप हर परिस्थिति में कूल (Cool) रहते हैं।
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एकाग्रता और कार्यक्षमता (Productivity): ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का सिद्धांत आधुनिक ‘माइंडफुलनेस’ (Mindfulness) और ‘डीप वर्क’ (Deep Work) का मूल है। जब आपका ध्यान रिजल्ट (Promotion/Money) से हटकर पूरी तरह अपनी ड्यूटी (Task) पर आ जाता है, तो आपकी प्रोडक्टिविटी हज़ारों गुना बढ़ जाती है।
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सही करियर और जीवनसाथी का चुनाव (Clarity in Choices): जब विकल्पों की भरमार (Over-information) के कारण दिमाग काम करना बंद कर दे, तब गीता के इन नामों का ध्यान मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ को शांत कर आपको वह ‘क्लैरिटी’ (Clarity) देता है, जिससे आप अपने स्वभाव (स्वधर्म) के अनुसार सही निर्णय ले पाते हैं।
Srimad Bhagavadgita Sahasranamavali (श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय ज्ञान, परम मेधा, और साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी का नाद स्वरूप है, जिसने अर्जुन के गांडीव को पुनः उठवा दिया था और महाभारत के युद्ध का परिणाम बदल दिया था। जब एक साधक अपने सारे अज्ञान, मोह, व्यर्थ की चिंताओं और अहंकार को त्यागकर, अर्जुन की भांति पूर्ण शरणागति के साथ इस नामावली को भगवान के श्रीचरणों में (तुलसी दल के माध्यम से) समर्पित करता है, तो साक्षात परब्रह्म उसके जीवन के रथ के सारथी बन जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण बाहर से भले ही एक महान कूटनीतिज्ञ और योद्धा दिखाई दें, परंतु वे भीतर से अपने निश्छल सखा (भक्त) के लिए परम वात्सल्यमयी और मार्गदर्शक हैं। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के कुरुक्षेत्र में पूरी तरह टूट चुके हैं, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है, डिप्रेशन खा रहा है, या जीवन का उद्देश्य समझ नहीं आ रहा है, तो गुरुवार या एकादशी की प्रातः पीले आसन पर बैठें, घी का दीपक प्रज्वलित करें, और श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर पूर्ण एकाग्रता के साथ इस सहस्रनामावली का गान करते हुए अपने ‘पार्थसारथी’ को पुकारें।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि भगवान ने आपके जीवन के सारे मानसिक जालों, भ्रमों, और डिप्रेशन को भस्म कर दिया है, और साक्षात गीता-ज्ञान ने आपके जीवन को अपार सफलता, अदम्य आत्मविश्वास, स्थितप्रज्ञ अवस्था, और परम शांति (मोक्ष) के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, ऐश्वर्य और अचल नीति है)। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावलीः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली क्या है और इसका क्या महत्व है?
श्रीमद भगवद्गीता सहस्रनामावली भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए गीता के 700 श्लोकों के गहन मर्म और भगवान के विराट स्वरूप के 1000 परम पवित्र व जाग्रत नामों का एक सिद्ध संकलन है। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह नामावली साधक के भीतर अज्ञान और मोह के अंधकार को मिटाकर साक्षात कुशाग्र बुद्धि, निष्काम कर्म की प्रेरणा, डिप्रेशन (विषाद) से मुक्ति, और अंततः मोक्ष प्रदान करती है। यह मानसिक शांति का अचूक अस्त्र है।
2. इस सहस्रनामावली का पाठ या ‘तुलसी-अर्चन’ करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ मिलता है?
इस नामावली का सबसे प्रत्यक्ष और त्वरित लाभ ‘भयंकर मानसिक तनाव (Depression) व निर्णयहीनता से पूर्ण मुक्ति’, ‘कार्यक्षेत्र (करियर) में बिना तनाव के अजेय सफलता’, और ‘मन की एकाग्रता (Focus)’ है। इसके नियमित पाठ और तुलसी-अर्चन से व्यक्ति का अहंकार नष्ट होता है, जन्मों के पाप कट जाते हैं, और जीवन में असीम शांति व ऐश्वर्य का वास होता है।
3. क्या एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति या विद्यार्थी श्रीमद भगवद्गीता की साधना कर सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल! भगवद्गीता मूल रूप से एक संन्यासी के लिए नहीं, बल्कि अर्जुन जैसे एक गृहस्थ योद्धा के लिए ही रची गई थी। कोई भी गृहस्थ, विद्यार्थी, या व्यापारी इसकी साधना कर सकता है। इसके लिए केवल अपने कर्तव्यों (स्वधर्म) का ईमानदारी से पालन करना, और पूर्णतः सात्विक जीवन (मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज से मुक्त) जीना आवश्यक है। विद्यार्थियों और प्रोफेशनल्स के लिए यह ग्रंथ साक्षात संजीवनी है।
4. श्रीमद भगवद्गीता की आराधना के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?
भगवान श्रीकृष्ण और गीता की आराधना के लिए ‘गुरुवार’ (Thursday – विष्णु का दिन) तथा ‘बुधवार’ (Wednesday) सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माने जाते हैं। गीता जयंती (मोक्षदा एकादशी), जन्माष्टमी, और किसी भी एकादशी के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इसका पाठ करने का सबसे उत्तम समय ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (प्रातः 4 से 6 बजे) या गोधूलि बेला होता है, जब वातावरण शांत होता है।
5. गीता सहस्रनाम की इस साधना को करते समय सबसे बड़ी सावधानी क्या रखनी चाहिए?
इस साधना की सबसे बड़ी और अनिवार्य सावधानी यह है कि साधक को ‘सकाम भावना’ (लालच) का त्याग कर ‘निष्काम भाव’ (बिना फल की चिंता किए) से पाठ करना चाहिए। किसी का बुरा चाहने की नीयत से इसका पाठ कभी न करें। इसके अतिरिक्त, गीता ग्रंथ का सदैव सर्वोच्च सम्मान करना (जमीन पर न रखना), शारीरिक पवित्रता बनाए रखना और सभी जीवों के प्रति समभाव (दया) रखना इस साधना के मूलभूत सिद्धांत हैं।