कलियुग में जीवन को सुचारू, सुखमय और बाधा रहित चलाने के लिए ‘अर्थ’ (धन) को सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माना गया है। सनातन धर्म में धन, वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य और सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी साक्षात् माता महालक्ष्मी हैं। शास्त्रों में माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अनेकों मंत्रों, स्तोत्रों और सूक्तों का वर्णन है। लेकिन जब बात खोए हुए धन को वापस पाने, अथाह दरिद्रता का नाश करने और राजसी ऐश्वर्य प्राप्त करने की आती है, तो “इन्द्र लक्ष्मी मंत्र” की महिमा सर्वोपरि हो जाती है।
यह मंत्र और इसकी साधना विधि सीधे तौर पर स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र से जुड़ी हुई है। यह केवल कुछ शब्दों का संयोजन नहीं है, बल्कि यह वह जाग्रत और चैतन्य ऊर्जा है जिसके माध्यम से स्वयं देवराज इन्द्र ने अपना खोया हुआ स्वर्ग का राजपाट और त्रिलोकी की संपदा माता लक्ष्मी से पुनः प्राप्त की थी।
यदि आप लंबे समय से आर्थिक तंगी, व्यापार में लगातार घाटे, भारी कर्ज, या धन के ठहराव न होने (पैसे का टिकना नहीं) की समस्या से जूझ रहे हैं, तो इन्द्र लक्ष्मी मंत्र की साधना आपके जीवन में चमत्कारिक बदलाव ला सकती है। आज के इस विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में हम इन्द्र लक्ष्मी मंत्र की संपूर्ण साधना विधि, इसके कठोर नियम, अचूक लाभ, इसके पीछे का गूढ़ महत्व और उन सावधानियों पर गहन चर्चा करेंगे, जिन्हें अपनाकर आप भी माता लक्ष्मी की असीम कृपा के पात्र बन सकते हैं।
इन्द्र लक्ष्मी मंत्र की पौराणिक कथा और पृष्ठभूमि
इस अचूक मंत्र की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा वैकुंठ से पृथ्वी की ओर आ रहे थे। उनके पास एक अत्यंत दिव्य, सुगंधित और कभी न मुरझाने वाली पारिजात पुष्पों की माला थी। मार्ग में उनकी भेंट ऐरावत हाथी पर सवार देवराज इन्द्र से हुई।
महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर वह दिव्य माला इन्द्र को भेंट कर दी। परंतु, सत्ता, ऐश्वर्य और धन के अहंकार में अंधे हो चुके इन्द्र ने उस माला का आदर नहीं किया और उसे अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने उस माला को अपनी सूंड से खींचकर जमीन पर फेंक दिया और पैरों तले कुचल दिया।
अपने आशीर्वाद का यह घोर और अकल्पनीय अपमान देखकर महर्षि दुर्वासा का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने तुरंत इन्द्र को श्राप दे दिया— “हे इन्द्र! जिस श्री (धन, वैभव और राजसत्ता) के अहंकार में तूने भगवान के प्रसाद का अपमान किया है, वह श्री आज ही तुझे छोड़कर चली जाएगी। तू और तेरा संपूर्ण त्रिलोक श्रीहीन (दरिद्र) हो जाएगा।”
इस श्राप के प्रभाव से माता लक्ष्मी स्वर्गलोक छोड़कर क्षीरसागर (समुद्र) की गहराइयों में विलीन हो गईं। स्वर्ग से धन, सुख, शांति और वैभव पूरी तरह समाप्त हो गया। देवता कमजोर हो गए और असुरों ने स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए, जिन्होंने उन्हें ‘समुद्र मंथन’ करने का उपाय बताया।
समुद्र मंथन से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई, जिनमें से एक साक्षात् माता लक्ष्मी थीं। माता के पुनः प्रकट होने पर, इन्द्र को अपनी भयंकर भूल का पछतावा हुआ। उन्होंने घोर तपस्या की और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए जिस विशेष मंत्र और स्तुति का आश्रय लिया, उसी से माता लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और उन्होंने इन्द्र को उनका राजपाट वापस लौटाया। इन्द्र द्वारा सिद्ध किए गए इसी मंत्र को ‘इन्द्र लक्ष्मी मंत्र’ कहा जाता है।
इन्द्र लक्ष्मी मंत्र क्या है? (The Powerful Mantra)
शास्त्रों में देवराज इन्द्र द्वारा जपे गए महालक्ष्मी के जिस बीज मंत्र का उल्लेख मिलता है, वह अत्यंत शक्तिशाली है। वैसे तो इन्द्र ने ‘इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र’ की भी रचना की थी, लेकिन मंत्र साधना के अंतर्गत जिस विशिष्ट मंत्र का जाप किया जाता है, वह इस प्रकार है:
मूल इन्द्र लक्ष्मी मंत्र:
ॐ श्रीं इंद्रा श्रीं ह्रीं ॐ नमः |
वैकल्पिक एवं अत्यंत प्रभावशाली महालक्ष्मी मंत्र (जिसे इन्द्र ने जपा था):
“ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः”
मंत्र के बीज अक्षरों का रहस्य:
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ॐ (Om): ब्रह्मांड की आदि ध्वनि, जो मन को एकाग्र करती है।
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श्रीं (Shreem): यह साक्षात् माता लक्ष्मी का बीज मंत्र है, जो धन और पूर्णता को आकर्षित करता है।
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ह्रीं (Hreem): यह माया बीज है, जो देवी भुवनेश्वरी का स्वरूप है। यह आकर्षण, ऊर्जा और नेतृत्व क्षमता प्रदान करता है।
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क्लीं (Kleem): यह कामराज बीज है, जो आपकी इच्छाओं और मनोकामनाओं को भौतिक रूप में प्रकट (Manifest) करने की शक्ति रखता है।
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इन्द्रलक्ष्म्यै: यह माता के उस स्वरूप का आवाहन है जिसने इन्द्र को पुनः ऐश्वर्य प्रदान किया था।
इन बीज अक्षरों का संयोजन इस मंत्र को एक प्रचंड ऊर्जा पुंज बना देता है, जो दरिद्रता के गहरे से गहरे अंधकार को भी चीरकर प्रकाश भर देता है।
इन्द्र लक्ष्मी मंत्र का महत्व (Significance of the Mantra)
हिन्दू धर्म में कई मंत्र हैं, लेकिन इस विशेष मंत्र का महत्व कई मायनों में अद्वितीय है:
1. खोई हुई संपत्ति और मान-सम्मान की वापसी
इस मंत्र का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह ‘रिकवरी’ (Recovery) का मंत्र है। यदि आपका पैसा कहीं फंसा हुआ है, आपका व्यापार जो पहले बहुत अच्छा चलता था लेकिन अब डूब रहा है, या आपकी नौकरी/पद आपसे छिन गया है, तो यह मंत्र उस खोई हुई स्थिति को वापस लाने में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का कार्य करता है।
2. धन में स्थिरता (चंचलता का नाश)
माता लक्ष्मी का एक नाम ‘चंचला’ भी है। धन आता तो है, लेकिन रुकता नहीं है। इन्द्र ने माता से प्रार्थना की थी कि वे उनके राज्य में स्थिर रहें। इस मंत्र के नियमित जाप से घर में ‘स्थिर लक्ष्मी’ का वास होता है। व्यर्थ के खर्चों (Medical bills, sudden losses) पर लगाम लगती है।
3. सकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष निवारण
इस मंत्र की ध्वनि तरंगें (Sound vibrations) घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं। जिस घर में नियमित रूप से यह मंत्र गूंजता है, वहां से नकारात्मक ऊर्जा, कलह, और दरिद्रता कोसों दूर भाग जाती है।
4. नेतृत्व और आत्मविश्वास में वृद्धि
चूंकि यह देवराज (देवताओं के राजा) का मंत्र है, इसलिए यह साधक के भीतर भी एक राजसी गुण, आत्मविश्वास, निर्भयता और नेतृत्व करने की क्षमता (Leadership skills) विकसित करता है।
इन्द्र लक्ष्मी मंत्र साधना विधि (Step-by-Step Sadhana Vidhi)
मंत्र केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है; यह एक विज्ञान है। यदि इस विज्ञान को सही ‘विधि’ (Method) के साथ न किया जाए, तो इसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इन्द्र लक्ष्मी मंत्र की साधना एक विशेष अनुष्ठान की तरह की जानी चाहिए।
1. साधना आरंभ करने का शुभ समय
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दिन: शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित है, इसलिए साधना शुक्रवार से शुरू करें।
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विशेष तिथियां: दीपावली की रात, धनतेरस, अक्षय तृतीया, शरद पूर्णिमा, या किसी भी महीने की पूर्णिमा से इस साधना का आरंभ करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। पुष्य नक्षत्र में भी इसे शुरू किया जा सकता है।
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समय: मंत्र जाप के लिए दो समय सबसे उत्तम हैं— प्रातः काल का ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:00 से 6:00 बजे के बीच) या फिर गोधूलि वेला/रात्रि काल (रात 9:00 बजे के बाद)। आप जो भी समय चुनें, प्रतिदिन उसी समय पर साधना करें।
2. आसन और दिशा
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मंत्र जाप करते समय आपका मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा कुबेर (धन के देवता) की दिशा मानी जाती है।
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बैठने के लिए कुशा का आसन, या लाल/पीले रंग के ऊनी या रेशमी आसन का प्रयोग करें।
3. पूजा स्थल की तैयारी और सामग्री
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घर के ईशान कोण (North-East corner) को साफ करके वहां एक छोटी लकड़ी की चौकी रखें।
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चौकी पर लाल या गुलाबी रंग का साफ कपड़ा बिछाएं।
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उस पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। यदि आपके पास प्राण-प्रतिष्ठित ‘श्रीयंत्र’ या ‘कनकधारा यंत्र’ है, तो उसे अवश्य रखें।
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सामग्री में: शुद्ध गाय का घी, रुई की बत्ती (कलावा), लाल पुष्प (गुलाब या कमल), अक्षत (साबुत चावल), कुमकुम, हल्दी, धूप, इत्र और नैवेद्य (खीर, मखाने या सफेद मिठाई) रखें।
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जाप के लिए कमलगट्टे की माला या स्फटिक की माला सर्वोत्तम है।
4. पवित्रीकरण और आचमन
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साधना स्थल पर बैठकर सबसे पहले हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें (पवित्रीकरण)।
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तत्पश्चात तीन बार आचमन करें (जल पिएं) और शरीर व मन की शुद्धि की भावना करें।
5. दीपक और संकल्प (Sankalpa – सबसे महत्वपूर्ण)
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गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं। दीपक साधना पूरी होने तक बुझना नहीं चाहिए।
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अब दाएं हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (चावल), एक लाल पुष्प और कुछ सिक्के लें।
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संकल्प लें: अपना नाम, अपना गोत्र, आज की तिथि, वार और स्थान का नाम बोलें। फिर माता लक्ष्मी से अपनी मनोकामना कहें (जैसे— हे माता, मैं अपने व्यापार की वृद्धि / कर्ज से मुक्ति / खोए हुए धन की प्राप्ति के लिए आपके इस सिद्ध इन्द्र लक्ष्मी मंत्र का 11 दिन / 21 दिन / 41 दिन तक नित्य 11 माला जाप करने का संकल्प ले रहा/रही हूं। मेरी साधना निर्विघ्न पूर्ण हो और मुझे सफलता मिले)।
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यह जल जमीन पर (या एक कटोरी में) छोड़ दें।
6. भगवान गणेश और नारायण की स्तुति
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किसी भी साधना से पहले प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का ध्यान करें (“ॐ गं गणपतये नमः” की एक माला जाप कर सकते हैं)।
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माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के बिना अधूरी हैं। इसलिए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 11 बार उच्चारण अवश्य करें।
7. इन्द्र लक्ष्मी मंत्र का जाप आरंभ
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अब पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ माता लक्ष्मी के सौम्य, मुस्कुराते हुए और धन वर्षा करते हुए स्वरूप का अपने आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के बीच) में ध्यान करें।
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कमलगट्टे की माला से “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं इन्द्रलक्ष्म्यै नमः” (या जो बड़ा मंत्र ऊपर दिया गया है) का जाप शुरू करें।
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कम से कम 3 माला, 5 माला, 11 माला या 21 माला प्रतिदिन जाप करें। (जितनी माला का संकल्प पहले दिन लिया है, प्रतिदिन उतनी ही माला करें)।
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जाप न तो बहुत तेज स्वर में हो और न ही बहुत धीरे (उपांशु जाप सर्वोत्तम है, जिसमें होंठ हिलें लेकिन आवाज केवल आपको सुनाई दे)।
8. साधना का समापन और आरती
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जाप पूरा होने के बाद माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कपूर या घी के दीपक से आरती करें।
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माता को साष्टांग प्रणाम करें।
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क्षमा प्रार्थना: अंत में यह अवश्य बोलें, “हे माता! मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता। मंत्रों का ज्ञान भी मुझे नहीं है। मेरी जो भी त्रुटि हुई हो, उसे अपनी संतान समझकर क्षमा करें।”
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आसन के नीचे दो बूंद जल डालें और उसे माथे से लगाकर ही आसन से उठें।
मंत्र जाप के महत्वपूर्ण नियम (Rules for Successful Recitation)
इस उच्च कोटि की तांत्रिक और वैदिक साधना में कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। नियमों की अनदेखी से ऊर्जा का क्षय होता है और फल नहीं मिलता।
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ब्रह्मचर्य का कठोर पालन: जब तक आपका संकल्प (11, 21 या 41 दिन) चल रहा है, तब तक पूर्ण रूप से शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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सात्विक आहार: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, अंडा या किसी भी प्रकार के तामसिक और बासी भोजन का पूर्णतः त्याग कर दें। बाहर का भोजन खाने से बचें। सात्विक, शुद्ध और घर का बना ताजा भोजन ही ग्रहण करें।
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वस्त्रों की पवित्रता: प्रतिदिन धुले हुए और साफ वस्त्र पहनकर ही पूजा में बैठें। बिना नहाए साधना स्थल को स्पर्श न करें। लाल, गुलाबी या श्वेत रंग के कपड़े पहनना शुभ है; काले या गहरे नीले रंग के कपड़े भूलकर भी न पहनें।
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नारी का सम्मान: यह शर्त सर्वोपरि है। जिस घर में स्त्री (माता, बहन, पत्नी, पुत्री या कोई भी महिला) का अपमान होता है, उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं या उन पर हाथ उठाया जाता है, वहां साक्षात् कुबेर भी आ जाएं तो लक्ष्मी नहीं टिक सकतीं। साधक को स्त्रियों का हृदय से सम्मान करना चाहिए।
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गोपनीयता (Secrecy): तंत्र और मंत्र विज्ञान का नियम है कि अपनी साधना, अपने अनुभव और अपनी मनोकामना को किसी के साथ साझा न करें (गुरु के अलावा)। साधना गुप्त रहने पर ही फलीभूत होती है।
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भूमि शयन (Optional but Recommended): यदि आप कोई बहुत बड़ी मनोकामना लेकर अनुष्ठान कर रहे हैं, तो संकल्प अवधि तक गद्देदार बिस्तर का त्याग कर दें और जमीन पर चटाई या कंबल बिछाकर सोएं।
इन्द्र लक्ष्मी मंत्र साधना के चमत्कारी लाभ (Miraculous Benefits)
जो साधक पूर्ण नियम, धैर्य और अटूट विश्वास के साथ इन्द्र लक्ष्मी मंत्र को सिद्ध कर लेता है, उसके जीवन में कई अकल्पनीय परिवर्तन आते हैं:
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अथाह दरिद्रता का नाश: घर से गरीबी और पैसे-पैसे की मोहताज होने की स्थिति जड़ से खत्म हो जाती है। आय के नए और अप्रत्याशित स्रोत (Unexpected sources of income) खुलने लगते हैं।
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कर्ज के दलदल से मुक्ति: यदि व्यक्ति भारी कर्ज (Debt) में डूबा है, तो इस मंत्र के प्रभाव से ऐसी परिस्थितियां बनने लगती हैं, ऐसे अवसर मिलते हैं कि वह धीरे-धीरे सारा कर्ज चुका कर मुक्त हो जाता है।
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व्यापार में आश्चर्यजनक वृद्धि: जो व्यापार ठप पड़ गया हो या जिसमें लगातार नुकसान हो रहा हो, वह फिर से लाभ देने लगता है। ग्राहकों की संख्या बढ़ती है और धन का प्रवाह सुचारू हो जाता है।
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अटका हुआ धन वापस मिलना: यदि किसी ने आपका पैसा लिया है और लौटा नहीं रहा है, या कोई पैतृक संपत्ति विवादों में फंसी है, तो इस मंत्र की ऊर्जा से वह रुका हुआ धन प्राप्त होने के मार्ग प्रशस्त होते हैं।
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नौकरी में तरक्की और स्थायित्व: प्राइवेट या सरकारी नौकरी में प्रमोशन, अधिकारियों से सहयोग और कार्यक्षेत्र में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।
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सुख-शांति और ऐश्वर्य: केवल पैसा ही नहीं, यह मंत्र जीवन में लग्जरी (Luxury), अच्छे वस्त्र, आभूषण, वाहन सुख और भौतिक सुख-सुविधाएं भी प्रदान करता है। घर में परिवार के सदस्यों के बीच कलह समाप्त होकर प्रेम बढ़ता है।
ध्यान रखने योग्य सावधानियां (Precautions During Sadhana)
इस मंत्र की ऊर्जा अत्यंत तीव्र होती है, इसलिए कुछ सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है:
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शुद्ध उच्चारण: मंत्र के बीज अक्षरों (श्रीं, ह्रीं, क्लीं) का उच्चारण बहुत ही स्पष्ट होना चाहिए। यदि उच्चारण गलत होगा, तो ध्वनि तरंगें गलत दिशा में काम करेंगी। यदि आपको बोलना नहीं आता, तो पहले किसी ऑडियो को सुनकर अभ्यास कर लें।
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क्रोध और अहंकार का त्याग: इन्द्र का पतन उनके अहंकार के कारण ही हुआ था। यदि मंत्र के प्रभाव से आपके पास धन आने लगे, तो कभी घमंड न करें। गरीबों की मदद करें, दान करें। साधना काल में किसी पर भी क्रोध न करें, गालियां न दें।
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लालच में न पड़ें: इस मंत्र को किसी ‘लॉटरी जीतने’ या रातों-रात अमीर बनने के शॉर्टकट के रूप में न लें। यह आपके कर्मों को शुभता प्रदान करता है, लेकिन आपको अपना कर्म (मेहनत) पूरी ईमानदारी से करना होगा।
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साधना के बीच में उठना: एक बार जब आप जाप के लिए आसन पर बैठ जाएं, तो माला पूरी होने तक किसी से बात न करें, मोबाइल न देखें और आसन से न उठें।
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सात्विकता का दिखावा न करें: केवल बाहरी सात्विकता पर्याप्त नहीं है, मन के भीतर भी किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या दूसरों का धन हड़पने की नीयत नहीं होनी चाहिए।
देवराज इन्द्र द्वारा सिद्ध किया गया इन्द्र लक्ष्मी मंत्र दरिद्रता और आर्थिक संकटों के नाश के लिए एक अमोघ अस्त्र के समान है। यह हमें यह भी सिखाता है कि चाहे आप कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हों, अहंकार आपका सर्वनाश कर सकता है, और सच्ची श्रद्धा, समर्पण एवं ईश्वर की शरण में जाने से खोया हुआ सब कुछ वापस पाया जा सकता है।
मंत्र साधना कोई जादू नहीं है; यह एक विज्ञान है जो आपके अवचेतन मन (Subconscious mind), आपके औरा (Aura) और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक साथ अलाइन (Align) करता है। यदि आप ऊपर बताई गई विधि, नियमों और पूर्ण श्रद्धा के साथ इस मंत्र का आश्रय लेते हैं, तो माता महालक्ष्मी निश्चित रूप से आपके घर को धन, धान्य, सुख, शांति और ऐश्वर्य से भर देंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. इन्द्र लक्ष्मी मंत्र का जाप एक दिन में कितनी बार करना चाहिए?
पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जाप अवश्य करना चाहिए। यदि आप किसी विशेष उद्देश्य या अनुष्ठान के तहत इसे कर रहे हैं, तो प्रतिदिन 5, 11 या 21 माला का जाप करना सर्वोत्तम रहता है।
2. इस मंत्र जाप के लिए कौन सी माला का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है?
माता लक्ष्मी की किसी भी साधना के लिए ‘कमलगट्टे की माला’ (कमल के बीजों से बनी माला) सबसे प्रिय और फलदायी मानी जाती है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो आप ‘स्फटिक की माला’ का उपयोग भी कर सकते हैं। रुद्राक्ष की माला का प्रयोग इस विशेष मंत्र में न करें।
3. क्या महिलाएं भी इन्द्र लक्ष्मी मंत्र की साधना कर सकती हैं?
जी हां, बिल्कुल। माता लक्ष्मी स्वयं स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं। महिलाएं पूर्ण रूप से इस मंत्र का जाप और अनुष्ठान कर सकती हैं। केवल मासिक धर्म (Periods) के उन 4-5 दिनों में उन्हें पूजा स्थल पर बैठने और माला से जाप करने से बचना चाहिए। इस दौरान वे मानसिक जाप (बिना माला के मन ही मन) कर सकती हैं।
4. यदि संकल्प लिए गए दिनों के बीच में कोई दिन छूट जाए तो क्या करें?
अनुष्ठान में निरंतरता बहुत महत्वपूर्ण है। यदि किसी अपरिहार्य कारण या भूलवश एक दिन छूट जाता है, तो साधना खंडित मानी जाती है। ऐसी स्थिति में माता लक्ष्मी से क्षमा मांगकर अनुष्ठान को पहले दिन से (पुनः संकल्प लेकर) शुरू करना चाहिए।
5. क्या इस मंत्र को जपने के लिए किसी गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है?
यद्यपि किसी भी मंत्र को सिद्ध गुरु के मुख से प्राप्त करना (दीक्षा लेना) उसके प्रभाव को हजार गुना बढ़ा देता है, लेकिन इन्द्र लक्ष्मी मंत्र एक सात्विक और कल्याणकारी मंत्र है। यदि आपके पास कोई गुरु नहीं हैं, तो आप भगवान विष्णु या भगवान शिव को अपना गुरु मानकर और उनसे मानसिक अनुमति लेकर पूर्ण भक्ति भाव से इस साधना को शुरू कर सकते हैं।